प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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क्या स्त्री-शूद्र को वेद पढ़ने व सुनने का अधिकार नहीं ?

वाल्मीकि रामायण अयोध्याकांड सर्ग ६३-६४ ऋषिकुमार का वर्णन मिलता है ।

ऋषिकुमार शूद्र माता तथा वैश्य पिता से उत्पन्न हुए थे । ये वनवासी तापस ऋषि थे ।
शब्दभेदी बाण लगने से मरणासन्न हो ये कुछ बातें कहते हैं :

श्लोक ६३/२७-२८ में स्वयं को तपस्वी तथा ऋषिमार्ग अनुयायी बताते हैं ।
३६-३७ में दशरथजी ने इन्हें तेजयुक्त तपस्वी बताया है ।
४२ में इन्होंने स्वयं को वेदाध्ययन करने वाला तथा तपस्वी कहा है । ( फलयोगश्रुतस्य वा )
५०-५१ में यह स्वयं को अब्राह्मण व द्विजाति-बाह्य बताते हैं , अर्थात् ये वर्णसंकर थे ।

६४/७ में सब जानने के बावजूद दशरथजी इनके पिता को मुनि कहते हैं ।
श्लोक २४ में इनके पिता इन्हें ब्रह्मवादी तपस्वी बताते हैं ।
श्लोक २९ में उनके माता-पिता को तपस्विनौ कहा गया है , अर्थात दोनों तपस्वी थे ।
३२-३३ अनुसार इनके माता-पिता संध्या करते थे तथा ऋषिकुमार का शास्त्र स्वाध्याय सुनते थे ।
३५ अनुसार उनकी शूद्रा माता तपस्विनी थीं ।
अंततः इनके पिता अपने समस्त कुल को ही तपस्वी कुल बताते हैं ।


यहां से स्त्री-शूद्र का वेद व तपस्या का अधिकार सिद्ध होता है ।
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अरे मूर्ख प्राणी 😂

गूगल अनुवाद से वेद कौन पढ़ता है ? वेद के शब्दों के अर्थ वेदांग अनुसार किए जाते हैं । गूगल ने कौन सा वेदांग पढ़ रखा है यह बता ? आज तक तुमने कभी अष्टाध्यायी भी पढ़ी है जो वेदों का अर्थ समझ सको ?

उदाहरण : लौकिक संस्कृत में गौ का अर्थ गाय होता है ।
वैदिक संस्कृत में गौ / गाव का मुख्य अर्थ गमनशील होता है ।

और जहां तक ये सवाल कि भाष्याकारों ने संस्कृत में अनुवाद क्यों किया है , तो भारत में लंबे समय तक संस्कृत ही जनसामान्य की भाषा रही है । संस्कृत में पूरे भारत को जोड़कर रखा है । ऊपर से संस्कृत की कई सारे ऐसे शब्द है जिनका अन्य भाषाओं में बिल्कुल सही अनुवाद करना संभव नहीं । जिसे भी वेद पढ़ने होते थे वह संस्कृत भाषा सीखता था । संस्कृत जानने के बाद ही कोई वेद पढ़ और समझ सकता है । जैसे अंग्रेजी ग्रंथ , उसी रुप में सही समझ आता है ।


ब्रह्मचारी लोग १२ , २४ , ३६ , ४८ यह कभी-कभी तो संपूर्ण जीवन ही वेदों का अध्ययन करने में लगा देते थे । अगर वेदों को समझना इतना आसान ही होता तो कोई इतने लंबे समय तक उन्हें पढ़ता ही नहीं । यह मूर्ख नहीं थे , ये वही लोग थे जिन्होंने दुनिया में भारतीय ज्ञान का विस्तार किया ।
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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
अरे मूर्ख प्राणी 😂 गूगल अनुवाद से वेद कौन पढ़ता है ? वेद के शब्दों के अर्थ वेदांग अनुसार किए जाते हैं । गूगल ने कौन सा वेदांग पढ़ रखा है यह बता ? आज तक तुमने कभी अष्टाध्यायी भी पढ़ी है जो वेदों का अर्थ समझ सको ? उदाहरण : लौकिक संस्कृत में गौ का अर्थ गाय…
ईसाइयों को संस्कृत नहीं आती , यह उनकी गलती है । उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए और फिर वेदों पर कुछ टिप्पणी करनी चाहिए ।


जहां तक वेदों की भाष्याकारों की बात है , पूर्वाचार्यों में इतना भी विरोध नहीं रहा कि वह एक दूसरे के भाष्य को ही मानने से मना कर दें ।

आज भी सायण , महिधर , वेंकट , उव्वट , स्कंदस्वामी , महर्षि दयानंद सरस्वती , श्रीराम शर्मा आचार्य के भाष्य सर्वमान्य हैं ।
इनमें कई जगह पर विरोधाभास होता है परंतु वेदांगानुकूल जाकर हम इसका सही अर्थ जान सकते हैं ।

जैसे वेदों के कुछ यज्ञपरक मंत्रों का महिधर भाष्य ब्राह्मण ग्रंथों में दिए अर्थ से मेल नहीं खाता , ब्राह्मण ग्रन्थ से आप उन मंत्र का सही आधिदैविक अर्थ जान सकते हैं ।


वैदिक धर्म में सत्य जानने के अनेकों मार्ग हैं । चलना तुम्हें है , रिसर्च तुम्हें करनी है , पढ़ाई तुम्हें करनी है और जानना भी तुम्हें है ।

लेख खत्म करने के पहले एक छोटा सा सवाल :

वेदों के भाष्याकारों को तुमने किस आधार पर गलत सिद्ध करने का प्रयास किया ?
इसके लिए तुम्हारे पास क्या शास्त्र व श्रुतिप्रमाण है ?
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मेरा येशु येशु : भाग 13

यह नेपत पेरुरा क्या बला है 😂😂
और ये बुद्धि का सर्प कौन सा आशीर्वाद देता है भाई 😨
और कौन सा देवता लंगड़ा है हमारे यहां 😂😂

यह है इनका गूगल अनुवाद जिसको यह सही अर्थ बता रहे हैं 😆👌
एक भी अर्थ इसका सही व सटीक नहीं लग रहा ।

मंत्रार्थ - :

यहां सभी मनुष्यों के कल्याणार्थ ईश्वर से शांतिप्रार्थना की जा रही है ।

जहां पर गूगल ने देवताओं का देवता अर्थ किया है वहां पर वास्तविक अर्थ देवों द्वारा रक्षित पृथ्वी ( पृश्नि ) होगा ।

वैदिक संस्कृत में पेरू शब्द का अर्थ उपद्रवकारी होता है , अतः मन्त्रार्थ में ईश्वर से प्रार्थना की जा रही है कि समस्त विघ्नों की शांति हो ।

जहां पर बुद्धि का सर्प अर्थ किया है , वहां पर अहिर्बुध्न्य अर्थात समस्त विश्व को संतुलित रखने वाली शक्ति से शांतिप्रार्थना की जा रही है ।

देवता अजएकपाद की व्याख्या निरुक्त की दुर्गाचार्य वृत्ति में सूर्यरूप में की गई है अर्थात् सौरऊर्जा विश्व के लिए कल्याणकारक हो ।

इसी प्रकार अपानपात् अर्थात् मेघ से वर्षाजल द्वारा कल्याण करने की प्रार्थना है ।


वेदार्थ का अनर्थ न करो भाई ।

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https://www.thehindu.com/news/cities/Vijayawada/women-not-barred-from-learning-vedas/article5877128.ece

Finally I can say : " Mera desh badal raha hai , aage badh raha hai " 🗿🗿


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ऋषियों ने वैदिकज्ञान / धर्म का साक्षात्कार किया था । उन्होंने धर्म से साक्षात्कार न किए हुए लोगों को वैदिक ज्ञान स्वरूप मंत्रों का उपदेश दिया ।

~ निरुक्त १/१९


भला वैदिक ऋषि धर्म को जानते हुए भी उसके विरुद्ध आचरण क्यों करेंगे ? अगर वे धर्म विरुद्ध आचरण करते हैं तो आप्तवचन को शब्दप्रमाण में उन्हें नहीं लिया जाएगा ।
परंतु ऐसा नहीं है ।
हम सभी लोग उनके वचनों का बहुत आदर करते हैं तथा सदैव ही उनके उपदेशों पर चलते हैं । ऋषि तो वह थे जिन्होंने इस जगत को एक नयी दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनका सम्मान होना चाहिए , अपमान नहीं ।

अतः धर्माचरण करने वाले वैदिक ऋषियों पर आए दिन बलात्कार आदि के लगाए जाने वाले झूठे कलंक , मिथ्या ही प्रतीत होते हैं ।

अपने ऋषियों , महापुरुषों , देवताओं , अवतारों तथा अन्य बहुत से ज्ञानवान मनुष्य आदि के चरित्र पर लगने वाले झूठे दावों का हमें कड़ा विरोध करना चाहिए ।

जयतु भारतं , जयतु संस्कृतम् , यतो धर्मस्ततो जयः


~ वैनतेय गरुड़ 🦅 की कलम से आम जनमानस तथा हिंदुओं को एक संदेश

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Ashoka : Was he really following the path of non violence ?? 😂

Neo buddhists often say : Ashoka was very non violent 😭

But do you know , Sugar daddy of Neo Buddhists used to eat meat 😈🤡


Formerly , hundreds and thousands of animals in his kitchen were killed just to make curry.
Even after writing the inscriptions , he didn't leave his habit.

During the Inscription period , in Ashoka's Chefs used to cook 2 peacocks daily and 1 deer for him , occasionally.


Ashoka promised that he would leave this habit in future ; but who knows if he did this or not..


Ashokavadana says he was cruel even after he became a Buddhist. He tortured around 1 lakh Kalinga war soldiers after war.

Even Hieun Tsang mentioned the same :
" He made hell for torturing living beings. Anyone who passes by the place was taken and executed without mercy or chance of self defense. "


Since he converted to Buddhism before the Kalinga war , evidently Ashoka was not so good in nature.

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