प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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Divided by caste and religion , United by Temples :-


Sangam Buddhist Text Manimekalai of 2nd-3rd century CE , mentions a temple of Devi Kali in Southern India , worshipped there as Goddess Champapati.

It was open for everyone and every sect in the society. The Nāyika of the text, Manimekalai was herself a Buddhist Bhikshuni. She also used to visit the temple to worship Devi. In fact , She used to feed thousands of hungry people in the temple , daily. Legend says it was due to Devi's bestowing , the Akshaya Patra.


The temple is said to be an Asylum for all the suffering people. It was a place where the अशरणशरणद line was literally in effect.

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हमारे कौवा माफ़ कीजिये कवन जी को कही भूलने की बीमारी तो नहीं लग गया ?😨
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The first Indian epigraphical evidence of Halley's comet is recently found in a 15th century Inscription in Mallikarjuna Jyotirlinga temple , Srisailam , Andhrapradesh !!

You can read the entire report here !!


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क्या यज्ञ बौद्धों से अर्वाचीन हैं ?


नव-बौद्ध अक्सर बोलते हैं कि यज्ञ आदि ब्राह्मणों ने 10वीं शताब्दी के बाद करना शुरू किया | परन्तु क्या आप जानते हैं ?

2nd century CE में लिखे मूलश्रावस्तिवाद बौद्धों के प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ दिव्यावदान में यूप का उल्लेख आता है , जिसकी व्याख्या हमें शतपथादि ब्राह्मण ग्रंथों में मिल जाती है | इतना ही नहीं , अपितु दिव्यावदान यूप को धर्मंचिह्न की भी उपाधि देता है |

संभवतः , इसी धर्मंचिह्न से धर्मस्तम्भ की उत्पत्ति हुई थी | इसका एक और उदाहरण हमें वृषभचिह्न के रूप में भी मिलता है , जिसको अशोक ने रामपुरवा में बनवाया था | पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार धर्मग्रंथों में वर्णित धर्मंरुपी वृषभ ही इस धर्मचिह्न का आधार है |

Courtesy :- Indian arts . VS Agrawala


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प्राचीन भारत के परिधान :-


महाभारत के शांतिपर्व में सांख्यज्ञान को समझाते हुए भीष्म पितामह द्वारा एक सुन्दर दृष्टान्त दिया गया है , जो हमें तत्कालीन समाज के पहनावे के बारे में जानने में सहायता करता है |

" जिस प्रकार पगड़ी पहनने वाला व्यक्ति तीन प्रकार के वस्त्रों को धारण करता है , उसी प्रकार ये देहाभिमानी जीव प्रकृति के सत्व-रज-तम रुपी त्रिगुण से संवृत होता है | "


इससे हमें पता चलता है कि तत्कालीन समाज में ३ प्रकार के वस्त्रों का प्रचलन था :-
१. उष्णीष = पगड़ी , किरीट आदि
२. उर्ध्ववस्त्र = चोली जैसे वस्त्र
३. अधोवस्त्र = धोती जैसे वस्त्र

सभापर्व में हमें भारत के विविध देशों के साथ होने वाले आयात-निर्यात सम्बन्धों का पता चलता है , जैसे चीन से कीटज (रेशम) रंकुमृग आदि के रेशों से बने वस्त्र व दालचीनी का आयात , अन्य अभारतीय स्रोतों से डेक्कन क्षेत्र के कपास , रत्नादि का मिस्रादि देशों में निर्यात होना |

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Strabo's Geography mentioned the worship of Lord Indra as Zeus , the River Ganga and Local deities.

Indra referred to as Zeus here, represented by Greek word Δία which is used for accusative form or direct referring to him in the verb of subject ; in ancient Greek language.

Source :- Strabo's geography 15/1/69


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पैजवन :- एक शूद्र योगी

पूर्वकाल (त्रेता) में एक शूद्र हुए थे जिन्हें पैजवन (पाठान्तर :- पैलवन) नाम से विख्यात थे | शांतिपर्व में इनका उदाहरण देखने को मिलता है |

पाकयज्ञ की दक्षिणा को भी पूर्णपात्रमयी कहा जाता है | ऐसे ही ऐन्द्राग्नी-विधि से यज्ञ कर पैजवन ने १ लाख पूर्णपात्र दान किये थे | यही नहीं , वे धर्मनिष्ठ तथा योगमार्गी भी कहे गए हैं |

स्कन्दपुराण के नागरखंड में इनकी कथा देखने को मिलती है , जहा पर महर्षि गालव द्वारा इन्हें धर्मोपदेश प्राप्त करने का वर्णन है |

हठयोगप्रदीपिका की ज्योत्स्नाव्याख्या में विष्णुधर्मोत्तरपुराण (dated to 5th century CE) के कुछ श्लोक उद्धृत हैं , जिनमे क्रमशः चातुर्वर्ण्य के विभिन्न तपस्वियों का उल्लेख है , जैसे :-

१. ब्राह्मण में असित , जैगीषव्य (सांख्य)
२. क्षत्रिय में जनक (सांख्य)
३. वैश्य में तुलाधार (कर्मयोगी)
४. शूद्र में पैजवन, धर्मव्याध (कर्मयोगी)
५. तपस्विनी स्त्रियों में शाण्डिली , गार्गी , सुलभादि |


अतः सिद्ध होता है कि शूद्रों को पाकयज्ञ (स्वाहा , नमस्कार , वैदिक मंत्र के साथ ) तथा तपस्या का पूर्ण अधिकार है |

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Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin
क्या व्यासभाष्य पशुबलि का समर्थन करता है ?
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Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin
जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि सांख्ययोग परम्परा के आचार्य कभी भी हिंसा का समर्थन नही करते , भले ही वह यज्ञरूप में भी क्यों न हो | हमने ऊपर आचार्य माधव के वचन का उद्धरण भी दिखाया था | आइये इसी श्रृंखला में व्यासभाष्याकार का मत समझते हैं |

योगसूत्र :- जाति , काल , देश , समय इनसे अपरिच्छिन्न सार्वभौम महाव्रत रूप (अहिंसादि) होते हैं | जब मूल सूत्र में ही हिंसा का सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सार्वजातिक और सार्वसामयिक निषेध है , तो भला भाष्य इसके विरुद्ध भाष्य क्यों होगा ?

व्यासभाष्य :- जातिबाधित (मछुआरों द्वारा मछली आदि की हिंसा , अन्यजीव की नहीं ) , कालबाधित (पवित्र दिनों में अहिंसा) , देशबाधित (तीर्थक्षेत्र में अहिंसा) और समय/आचारबाधित (देव-ब्राह्मण हेतु या युद्ध में की गयी हिंसा , अन्य नहीं) आदि चारों परिस्थितयों से अपरिच्छिन्न /अबाधित अहिंसा का सदैव पालन करना चाहिए | सार्वभौम अर्थात चित्त की ५ भूमियों में किसी में भी निषेधित नहीं हो (यहाँ तक कि मूढ़ , विक्षिप्त व क्षिप्त भूमि में भी नहीं) ,ऐसी अहिंसा का पालन होना चाहिए | यही अर्थ भोजराजकृत राजमार्तंडवृति में भी ग्रहण किया गया है |

क्षिप्त व मूढ़भूमि में में क्रमशः रजो-तमोद्रेक होता है , सूत्रकार व भाष्यकार दोनों ने ही इन भूमियों में भी हिंसा का निषेध कर रखा है तो सत्वप्राधान्य एकाग्रभूमि में , निर्गुण निरुद्धभूमि में तो अदृष्टोत्पादन होने से हिंसा की तो बात ही छोडो !!

विज्ञानभिक्षु ने भी वशिष्ठजी को उद्धरित कर आभ्यंतर यज्ञ का समर्थन करते हुए , "देवब्राह्मणा्र्थहिंसाया अपि त्याज्यत्ववचनेन च" कहकर इसको पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है |


व्यासभाष्य २/३१ जो अक्सर पूर्वपक्षियों द्वारा उद्धृत किया जाता है , उसमे भी बलि का समर्थन न करके उसका विरोध ही किया गया है ; यह स्पष्ट है | देवहिंसा २ प्रकार की हो सकती है :-
१. देवसंबंधित रक्षार्थहिंसा अर्थात यज्ञ से असुरों को दूर करने के लिए की जाने वाली हिंसा , जिसका विधान शतपथब्राह्मण के प्रथम और द्वितीय कांड में किया गया है |
२. मीमांसक औत्तरकालिक यज्ञों की तथाकथित "वैदिक" हिंसा

रक्षार्थहिंसा का कार्य क्षत्रियों तथा अध्वर्यु को दिया जाता है | शतपथ की आख्यायिका के अनुसार शर और स्त्रुवा दोनों ही वज्र के पर्याय हैं जिससे यज्ञविघ्नों का नाश किया जाता है | याज्ञिकी हिंसा का निषेध भी हम पहले ही दिखा चुके हैं |

महर्षि व्यास हिंसादि के प्रति झुकी किंचित मनोवृत्ति को भी दोष मानते हैं तथा इसे वितर्कसंज्ञा देते हैं | वितर्क अनंतदुःख प्रदायक तथा अज्ञान को जन्म देने वाले माने गए हैं | व्यासभाष्य में मुख्यतः 81 प्रकार की हिंसा का निषेध है , जिनमे से मोहरूपा हिंसा में विविध पशुबलियां भी आती हैं | यहाँ पर व्यासजी ने इनका कड़ा निषेध कर रखा है | उनके अनुसार हिंसा करने , कराने तथा अनुमोदित करने वाले भी तिर्यकआदि योनि प्राप्त करके दुःख भोगते हैं |


मूर्खों से निवेदन है कि तनिक पढाई लिखाई में ध्यान दो | चेरी-पिक्किंग में कुछ नही रखा | सांख्ययोग के विषय में एक चीज़ जान लो , न तो हम और न ही हमारे ऋषियों और आचार्यों ने कभी तथाकथित वैदिकीहिंसा का समर्थन किया था , न आगे करेंगे |

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