प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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Mother Goddess and Lord Kartikeya worshipping in South India :-

Worshipping Lord Kartikeya (Murugan) with the clear evidence of Fowl Emblems and Tridents dates back to 1200-800 BCE , in Adichanallur.

Most of the tridents and Fowl banners belong to 1000-600 BCE with some of the fragments of 1200 BCE while this bronze figurine of Mother Goddess Korrovai is dated back to 1500 BCE. Korrovai is the tamil of the name "Durga".

The fact that the concept of Devī as Matrí was well propounded in those times.

Source :-

1. A history of South India by KA Nilakantha Sashtri

T Satyamurthy 2004-05.


Shubha Navaratri !! Glory to the Great Mother ! 🙏🙏

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Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin
सांख्य-योग के विविध ऋषियों , आचार्यों और योगियों के ऊपर शीघ्र ही पोस्ट आएगी । कृपया थोडा समय दें । कृपया आरम्भ से हमारी पुरानी ज्ञानवर्धन अथवा खंडनात्मक पोस्ट पढ़ें , जिनकी लिंक नीचे दी जा रही है :-

१. कर्माशय तथा मुक्ति
२. महत् तत्त्व की उत्पत्ति
३. पुनरावृत्ति और आदिशंकराचार्य
४. सांख्याचार्य विन्ध्यवासी द्वारा बौद्ध विद्वान् मनोरथा की पराजय
५. वसुबन्धु के सांख्यखंडन की भ्रान्ति का निवारण
६. सांख्योक्त अष्टसिद्धियां (अणिमादि नहीं)
७. परमर्षि कपिल :- (१) - (२)
८. महाभारतीय सांख्य :- भाग १
९. महाभारतीय सांख्य :- भाग २
१०. सांख्य की दृष्टि से विकासवाद
११. सांख्ययोगियों को शरण
१२. मोक्ष से पुनरावृत्ति :- (१) आत्यंतिक मोक्ष की व्याख्या
१३. सांख्य द्वारा अन्धपरम्परा का विरोध
१४. षष्ठीतंत्र की प्राचीनता
१५. दुःखों की जगदव्यापकता
१६. सांख्य की व्याख्या
१७. मोक्षप्राप्ति
१८. सांख्य की श्रुतिमूलकता
१९. सांख्याचार्य माधव द्वारा याज्ञिकी हिंसा का विरोध
२०. सूत्रमत और कारिकामत की एकता
२१. व्यासभाष्य और पशुबलि
२२. सलिलदृष्टान्त प्रयोजन और प्रकृतिप्रवृत्ति आशय में भेद
२३. जैगीषव्य-आवट्य संवाद
२४.अद्वैत और सांख्य की जगतप्रपंच व्याख्या
२५. सांख्यसूत्र में पुनरावृत्ति शंका समाधान
२६. शान्तब्रह्मवाद :- सांख्य का ब्रह्मवादन
२७. त्रिविध कर्मशरीरभेद
२८. विषयाश्रित त्रिविधदुःख

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Forwarded from Modern Sāṃkhyavādin
गीता की विस्मृति :- स्वबुद्धि चिंतन


अक्सर कुछ प्रश्न सदैव ही मन में उठते हैं, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया , पश्चात् स्वयं उन्हें वो ज्ञान विस्मृत कैसे हुआ ? हुआ भी था या नहीं ? किस प्रकार यह ज्ञान दिया गया था ? इसे ४ प्रकार से समझते हैं ।

१. विस्मृति को समझने हेतु प्रथम स्मृतिवृत्ति को समझना आवश्यक है । स्मृति अर्थात् अनुभूत विषय का अस्तेय/असम्प्रमोष या पूर्वग्राह्य विषय की अनुभूति । योगीजन उभयविध समाधि करते समय स्मृति का निरोध करते हैं, क्योंकि स्मृति पञ्चवृत्तियों पर ही आश्रित है । प्रमाण या विपर्यय के अभाव में प्रख्याबोध संभव नहीं , जिससे पूर्वानुभूतविषय प्रत्यय की अनुपलब्धि से "यह अब ज्ञात हुआ" ऐसी कालाश्रित ख्याति होती है । यदि ऐसा माना जाए तो यह भगवान् श्रीकृष्ण से मुखोद्भूत योगविषयक ज्ञान सन्दर्भ से विपर्यस्त अव्याप्तिदोष का कारण बनेगा । निद्रावृत्ति की जाड्यता की निवृत्ति हेतु सत्वसंसेवन या सम्प्रजन्यरूप ज्ञानाभ्यास करने से ध्रुवा स्मृति जनित होती है, परन्तु यह स्मृति भी एकाग्रभूमि में निरुद्ध होती है क्योंकि यह भी पूर्ववृत्ति पर आश्रित है । पूर्वस्मृति पर आधारित होने से यदि हम इस ज्ञान को स्मृति का आधार मानें तो अनवस्थादोष आता है । विषयभूत विकल्पवृत्ति समाधिस्थ योगी की ऋतंभराप्रज्ञा से निरुद्ध होती है, अतः यह कहना कि भगवान् श्रीकृष्ण की स्मृति पूर्वोद्धरित किसी भी पञ्चवृत्ति से बाधित थी, यह संभव नहीं ।

२. मनोमालिन्यरहित निर्माणचित्त तथा योगजकर्माशय में विहित अकृष्णाशुक्ल कर्मो के कारण आशयहीनता के कारण स्मृतिलोप होना संभव नहीं । उदाहरण देते हैं, वारि द्वारा अग्निशमन होना । पूर्व में समझा चुके हैं की किस प्रकार समाधिजन्य ज्ञान अबाध होता है । क्लिष्टा व अक्लिष्टा वृत्तियों से अनाभिभूत यह ख्याति निर्माणचित्त द्वारा ही जिज्ञासुओं को प्रदान की जाती है , जैसा अर्जुन के साथ हुआ था । यदि यह क्लिष्टावृत्ति से बाधित हो तो यह योगप्रतिपक्षी प्रमाद रूपी अन्तराय की जननी होती है । यथा भाष्यकार का वचन है, अक्लिष्टाछिद्र से क्लिष्टा का भी जन्म हो सकता है , सुतरां समाधिसाधनों का सुविशुद्ध और निर्विप्लव होना अत्यंत आवश्यक है । जैसा प्रभु गीता में कहते हैं "प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ।।" श्वेतार्क जहाँ प्राणवायु देता है , वहीँ विष से पीड़ा भी दे सकता है। यही मनोमालिन्यता है जिसकी एकाग्र भूमि में निवृत्ति होती है । इनकी निवृत्ति के पश्चात् ही निर्माणचित्त व निर्माणतनु की उपलब्धि होती है । योगी का निर्माणचित्त उसके प्रशांतवाहिता चित्त से शुद्धास्मिता से निर्मित होने के कारण स्वयं भी पूर्णतः क्लेशमलरहित होता है । आशयहीनता योगियों के अकृष्णाशुक्लकर्मों में ही होती है अतः वे नवसंस्कार उद्भूत न होकर चित्त में ही अव्यक्तप्रलीन रहते हैं । अतः चित्त की समाधिसिद्ध भूमियों (एकाग्र, निरुद्ध) में अक्लिष्टा वृत्तियों की अनुपस्थिति होने के कारण स्मृतिबाध होना संभव नहीं ।

३. प्रवृत्यालोक में मनोस्थिति :- समाधि के समय ज्योतिष्मती प्रवृत्ति योगी के मनोभाव को निस्तरंग महासागर जैसे शांत करती है , जिससे समस्त विप्रकृष्ट और सूक्ष्म विषय भी प्रकाशित होते हैं ।

४. वक्तु-श्रोत दृष्टव्य :- वक्ता का ज्ञान श्रोता पर भी निर्धारित है । आप्तपुरुषों द्वारा किसी भी ज्ञान को शिष्य के सामने व्यपदिष्ट करना शिष्य की मति अनुरूप होता है , यथा विरोचन-इन्द्र-का प्रजापति द्वारा समानरूप ज्ञान को अन्यबोध और अलग उहापोह से समझना और इन्द्र के सत्यदर्शी होने से प्रजापति द्वारा उसे सही उपदेश का ज्ञान । यह केनोपनिषद् में यक्ष-इन्द्र और उमा हैमवती के संवाद में भी दृष्टिगोचर होता है । अर्जुन का चित्त मलिन था , क्षणिक स्थिर होने के कारण गीत के समय विक्षिप्तभूमि में स्थित था , वहीँ श्रीकृष्ण का एकाग्रभूमि में निर्माणचित्त में । अतः विस्मृति अर्जुन को थी , श्रीकृष्ण को नहीं । जैसा अर्जुन ने महाभारत में बारम्बार "एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्" इत्यादि वाक्यों में अपने ज्ञान की सीमितता और "नष्टं मे भ्रष्टचेतसः" में अपने विक्षिप्तभूमि में निहित चित्त को भलीभांति दिखाया है । वहीँ भगवान् केशव ने इसी कारण अर्जुन को "दुर्मेधा" युक्त बोलकर स्वयं को "पूरा ज्ञान यथापूर्व दोहरा नही सकता" कहकर अर्जुन के प्रति अशक्ति नहीं , अपनी करुणा ही व्यक्त की है । अर्जुन को सरल शब्दों में समझकर ही उनके अन्दर के विक्षिप्तता का भलीभांति निवारण किया जा सकता था, इसका अनुमान होने के कारण ही श्रीकृष्ण द्वारा ऐसे वाक्य संभव हैं । अन्यथा योगेश्वर को ज्ञान विस्मृत होना अनवस्थिता और अलब्धभूमिकता अन्तराय के प्रतिक होंगे ,जिससे उनकी आप्तता संदेहास्पद होगी ।

~ मेरे विचार

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