प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
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Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
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क्या भगवद्गीता 9/32 में क्या भेदभाव है ?


अक्सर विधर्मी शांकरभाष्य द्वारा भगवद्गीता पर स्त्रीशूद्र पापयोनि हैं , आरोप लगाते हैं । आइए जानते हैं , यह कितना सत्य है ।

👉 ब्रह्मपुराण अध्याय १७८ में यही बात भगवान विष्णु कंडुमुनि को कहते हैं , परंतु वहां पर वह अंत्यज व स्त्रीशूद्र को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बताते हैं ।

👉 रामानुजाचार्य गीताभाष्य में शूद्राः च पापयोनयः के द्वारा स्पष्ट रूप से स्त्रीशूद्र व पापयोनि के बीच एक दीवार बना देतें हैं ।

👉 पापयोनि का स्पष्टीकरण करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त इन्हें पशु-पक्षी योनि में बताते हैं और इसके लिए गजेंद्र मोक्ष का उदाहरण देते हैं । स्त्रियों में भी सिर्फ अनपढ़ ( अज्ञा ) को ही मानते हैं ।

👉 नैंबार्क तत्वप्रकाशिका में तो इसका अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है जहां पापयोनि में चांडाल आदि हैं तथा पापकर्म में लिप्त शूद्र वैश्य तथा अनपढ़ स्त्रियों को जातिस्वभावदोष में लिया गया है ।

साथ ही यह स्पष्ट किया है यह बात सभी स्त्रियों , वैश्यों और शूद्रों के लिए नहीं है ।


👉 अंततः श्रीधरीटीका में पापयोनि का अर्थ अंत्यज से लेकर , शूद्र-स्त्रियों को अलग कर दिया गया है ।
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इसी प्रकार छांदोग्य उपनिषद् ५/१०/७ के अनुसार अशुभ योनियों में चांडाल , शूकर और कुत्ते की योनि आती है , जिनको अशुभ कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त किया जाता है ।

इसी प्रकार ब्राह्मण आदि त्रैवर्णिक , मनुष्य योनियां है अतः वह शुभ मानी जाती हैं ।

( यहां पर कुल/वंश/योनि/जाति/परिवार/समाज में जन्म लेने की बात हो रही है , अतः कृपया जन्मना वर्णव्यवस्था घुसा कर मूर्खता ना दिखाएं । )



Note : ( due to insufficient space in the above post )

ऊपर की पोस्ट में श्रीधरी टीका से पहले एक इंग्लिश ट्रांसलेशन है जो संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी टीका से है । संत ज्ञानेश्वर के अनुसार , भगवान बिना किसी जाति-पाति , लिंग , रूप , गुणादि का पक्षपात किये , सभी से प्रेम करते हैं तथा उनकी भक्ति करने वाले को मोक्ष प्रदान करते हैं ।

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परम पवित्र माने जाने वाले श्रावण मास के द्वितीय दिवस , अर्थात् आज से विशेष रूप से भगवान शिव के ऊपर लगाए गए एक एक आक्षेप का बुरी तरीके से खंडन किया जाएगा ।

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ❤️
ॐ नमः शिवाय 🙏


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मेरा येशु येशु : भाग 14

क्या भगवान शिव नशा करते थे?


विधर्मी ईसाई हम पर आरोप लगाते हैं कि भगवान शिव शराब पीते थे और नशीला पदार्थ पीते थे। आइए देखें क्या है हकीकत!!

सबसे पहले, उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए कम से कम कुछ शास्त्र प्रमाण देने होंगे। लेकिन हमेशा की तरह, उन्हें कुछ नहीं मिला। भगवान शिव के नशा करने का कोई शास्त्र प्रमाण नहीं है।

लेकिन अभक्ष्य पदार्थ, शराब और मांस पर उनके क्या विचार थे आइए इसका विस्तृत अवलोकन करें।

भगवान शिव ने हमेशा मांस खाने और शराब पीने से मना किया है। महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 144-45 उनकी अहिंसा और उनकी बताई गई पूर्व शिक्षाओं पर आधारित है।
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि शराब पीना समाज और व्यक्ति के लिए भी हानिकारक है. सत्पुरुष सदैव नशे को अस्वीकार करते हैं।



हालाँकि मार्क 16/17 कहता है: यीशु के विश्वासियों पर किसी भी प्रकार के जहर या साँप के काटने का असर नहीं होगा, वे किसी व्यक्ति को केवल छूकर ही ठीक कर सकते हैं।

मैं उन्हें हार्पिक पान करने की सलाह देता हूं, जिससे यह साबित हो सके कि वे यीशु के सच्चे विश्वासी हैं। 😂😂


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प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
मेरा येशु येशु : भाग 14 क्या भगवान शिव नशा करते थे? विधर्मी ईसाई हम पर आरोप लगाते हैं कि भगवान शिव शराब पीते थे और नशीला पदार्थ पीते थे। आइए देखें क्या है हकीकत!! सबसे पहले, उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए कम से कम कुछ शास्त्र प्रमाण देने होंगे। लेकिन…
मांस मदिरा का सेवन न कर , समस्त प्राणियों पर दया भाव रख , क्रूर प्रवृत्तियों का त्याग कर अपनी समस्त गलतियों को सुधारने की क्षमता रख , दशलक्षण धर्म का पालन करना समाज और विश्वकल्याण की भावना रखते हुए हम तो स्वयं को सच्चा शिवभक्त साबित कर सकते हैं ।

सवाल यह है क्या ईसाइयों में इतनी हिम्मत है , कि वो अपनी बाइबल को और अपने यीशु के प्रति अपनी भक्ति को सही सिद्ध कर सकें ??
अगर उनमें दम हो तो हार्पिक पीकर दिखाएं , बिना किसी उपचार के ही जिंदा बच गए तो यीशु के सच्चे भक्त मान लिए जाएंगे ।

या एक ऐड्स पेशेंट को सिर्फ छूकर ठीक कर दें ।
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विशुद्ध कामेडी इतिहास पढ़ने के लिए इन जैसे लोगों को जरूर फौलो करें ।

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