प्रज्ञानं ब्रह्म 🙏🚩
1.18K subscribers
1.4K photos
53 videos
6 files
43 links
This Rational Channel is made to clarify doubts and Allegations on Sanatan dharma. I am a Neutral Agnostic & Non sectarian Vedic.

Doubts and Debates are certainly Welcome. No abuses please.

मर्यादा का उल्लंघन ना करें ।
Krishnam Vande Jagadgurum 🙏
Download Telegram
भारतवर्ष में स्त्री-राज्य :-


हवेंत्सांग जो 7th century में भारत आया था , उसने ब्रह्मपुर क्षेत्र से उत्तर में स्थित हिमालय के अंचल में बसे सुवर्णगोत्र देश (वर्त्तमान समय में गढ़वाल-कुमाउनी क्षेत्र) का उल्लेख करता है , जिस राज्य की शासिका सदियों से स्त्रियाँ ही रही हैं | इस देश को प्राच्यस्त्रीराज्य भी कहा जाता है |

वहां पर राजा अवश्य होता है , परन्तु राज्य में उसकी कोई भूमिका नहीं होती (सिर्फ नाम का राजा होता है) | इस देश में वर्णित सामाजिक व्यवस्था का विवरण हमें गरुड़पुराण व 11th century के बिल्हणकृत विक्रमांकदेवचरित में देखने को मिलता हैं |

मेगस्थेनीस व अर्रियन कृत इंडिका में भी पांड्यराज्य में स्त्री-शासन होने का विवरण मिलता है | इसका स्थान भारत के दक्षिण भाग में स्थित मालाबार है , जो सदा से मातृसत्तात्मक रहा है |

इस प्रकार प्राचीन भारत में स्त्री-राज्य का विवरण हमें मौर्य काल से लेकर चालुक्यवंश तक मिलता है | इनके मध्यकाल में आने वाले अन्य स्त्री-राज्यों की बात हम अगली पोस्ट में करेंगे |

Join us at :- @Scienceinsightdharma
👍10❤7
आज कुछ कौवे देवी दुर्गा को काल्पनिक कहते हैं | कारण, देवी के नाम पर फैला हुआ पाखंड और स्ववैचारिक द्वेष से बढ़कर कुछ नही |

वास्तविक दक्षिणमार्गी (वैदिक) शाक्त मत में ये सभी उपासनाएं वर्जित हैं |
प्रश्न : फिर देव्योपासना करते कैसे हैं ?
उत्तर : सात्विक | जैसे कांस्य/ताम्रपात्र में मधु/नारिकेलजल समर्पित करना , जिसको वाममार्गियों ने मदिरा बताया |

2nd century BCE में लिखे ग्रन्थ तिरुमंदिरम में आचार्य तिरुमुलर बताते हैं :-

जो लोग माता पराशक्ति की उपासना के नाम पर मांस-मदिरा-मैथुनरत रहते हैं, पशुबलि देते हैं उनका कभी कल्याण नही होता | इनका जीवन व्यर्थ है | वाममार्ग से हटकर ये दक्षिणमार्गी आचार्य अहिंसा को बढ़ावा देते हैं तथा योगमार्ग, यज्ञ, यंत्रपूज, बीजमन्त्र आदि के द्वारा ही देव्योपासन को सर्वोचित मानते हैं | इनके विचार वेदान्त तथा योग से मिलते हैं |


इसकी प्रमाणिकता ये है कि ये ग्रंथ लगभग 9 प्राचीन व पारंपरिक आगमों का समन्वित रूप है | आचार्य मुलर खुद नंदीपरम्परा से हैं , जो शैवों में अत्यंत उत्कृष्ट मानी जाती है |

मनुष्यकृत्यों की अतिप्रसक्ति करना व प्रमाणहीन होकर देवीमाँ को काल्पनिक बोलना बंद करें |
🔥9🥰4🙏2😁1
Divided by caste and religion , United by Temples :-


Sangam Buddhist Text Manimekalai of 2nd-3rd century CE , mentions a temple of Devi Kali in Southern India , worshipped there as Goddess Champapati.

It was open for everyone and every sect in the society. The Nāyika of the text, Manimekalai was herself a Buddhist Bhikshuni. She also used to visit the temple to worship Devi. In fact , She used to feed thousands of hungry people in the temple , daily. Legend says it was due to Devi's bestowing , the Akshaya Patra.


The temple is said to be an Asylum for all the suffering people. It was a place where the अशरणशरणद line was literally in effect.

Follow us for more :-
@Scienceinsightdharma
❤11
हमारे कौवा माफ़ कीजिये कवन जी को कही भूलने की बीमारी तो नहीं लग गया ?😨
😁13😭2😱1
The first Indian epigraphical evidence of Halley's comet is recently found in a 15th century Inscription in Mallikarjuna Jyotirlinga temple , Srisailam , Andhrapradesh !!

You can read the entire report here !!


Follow us at 👇⬇️
@scienceinsightdharma
🔥10❤1
क्या यज्ञ बौद्धों से अर्वाचीन हैं ?


नव-बौद्ध अक्सर बोलते हैं कि यज्ञ आदि ब्राह्मणों ने 10वीं शताब्दी के बाद करना शुरू किया | परन्तु क्या आप जानते हैं ?

2nd century CE में लिखे मूलश्रावस्तिवाद बौद्धों के प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ दिव्यावदान में यूप का उल्लेख आता है , जिसकी व्याख्या हमें शतपथादि ब्राह्मण ग्रंथों में मिल जाती है | इतना ही नहीं , अपितु दिव्यावदान यूप को धर्मंचिह्न की भी उपाधि देता है |

संभवतः , इसी धर्मंचिह्न से धर्मस्तम्भ की उत्पत्ति हुई थी | इसका एक और उदाहरण हमें वृषभचिह्न के रूप में भी मिलता है , जिसको अशोक ने रामपुरवा में बनवाया था | पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार धर्मग्रंथों में वर्णित धर्मंरुपी वृषभ ही इस धर्मचिह्न का आधार है |

Courtesy :- Indian arts . VS Agrawala


Join us at :-
@scienceinsightdharma
❤18🔥1
प्राचीन भारत के परिधान :-


महाभारत के शांतिपर्व में सांख्यज्ञान को समझाते हुए भीष्म पितामह द्वारा एक सुन्दर दृष्टान्त दिया गया है , जो हमें तत्कालीन समाज के पहनावे के बारे में जानने में सहायता करता है |

" जिस प्रकार पगड़ी पहनने वाला व्यक्ति तीन प्रकार के वस्त्रों को धारण करता है , उसी प्रकार ये देहाभिमानी जीव प्रकृति के सत्व-रज-तम रुपी त्रिगुण से संवृत होता है | "


इससे हमें पता चलता है कि तत्कालीन समाज में ३ प्रकार के वस्त्रों का प्रचलन था :-
१. उष्णीष = पगड़ी , किरीट आदि
२. उर्ध्ववस्त्र = चोली जैसे वस्त्र
३. अधोवस्त्र = धोती जैसे वस्त्र

सभापर्व में हमें भारत के विविध देशों के साथ होने वाले आयात-निर्यात सम्बन्धों का पता चलता है , जैसे चीन से कीटज (रेशम) रंकुमृग आदि के रेशों से बने वस्त्र व दालचीनी का आयात , अन्य अभारतीय स्रोतों से डेक्कन क्षेत्र के कपास , रत्नादि का मिस्रादि देशों में निर्यात होना |

Join us at 👇⬇️
@scienceinsightdharma
❤14
Strabo's Geography mentioned the worship of Lord Indra as Zeus , the River Ganga and Local deities.

Indra referred to as Zeus here, represented by Greek word Δία which is used for accusative form or direct referring to him in the verb of subject ; in ancient Greek language.

Source :- Strabo's geography 15/1/69


Join us at 👇⬇️
@scienceinsightdharma
😍12😭1