The Narrative
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दिमागी नक्सल क्या है? कौन हैं? क्या है इनकी कार्यशैली? क्या भारत में अराजकता फैलाने वाले दिमागी नक्सल हैं? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!

> दिमागी नक्सल - नक्सलवाद के वैचारिक समर्थक कौन?

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महरौली का लौह स्तंभ - 1600 वर्षों अडिग खड़ा भारतीय धातुकर्म

दिल्ली के महरौली स्थित लौह स्तंभ, प्राचीन भारत की धातुकर्म और शिल्पकला की असाधारण उपलब्धि का जीवंत प्रमाण है. लगभग 7.2 मीटर ऊँचा यह स्तंभ गुप्तकाल का है और इसके अभिलेख में राजा चंद्र का उल्लेख मिलता है.

लगभग 1,600 वर्षों से खुले वातावरण में खड़े इस लौह स्तंभ पर अभी तक कोई गंभीर जंग दिखाई नहीं देती है. इसके पीछे इसके लौह की संरचना, निर्माण तकनीक और दिल्ली की स्थानीय जलवायु, इन सभी का योगदान माना जाता है.

स्तंभ पर संस्कृत में उत्कीर्ण अभिलेख राजा चंद्र की विजयों और भगवान विष्णु के प्रति उनकी भक्ति का उल्लेख करता है. इससे यह केवल धातु की अद्भुत वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास, भाषा, धर्म और विज्ञान, चारों का संगम बन जाता है.

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Narrative - Positive Narrative

> From Aryabhata to Gaganyaan, India’s space journey carries forward a centuries-old legacy of astronomical observation, mathematics and scientific inquiry.

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Global Narrative

> A Pakistani cleric’s 10,000-militant claim puts Hafiz Saeed’s Kashmir network and political ecosystem back under the spotlight.

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तरपा नृत्य - जनजाति जीवन, प्रकृति और सामूहिक आनंद की लय

महाराष्ट्र के वारली समाज की पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तरपा नृत्य, लोकजीवन, प्रकृति और सामाजिक एकता से गहराई से जुड़ी हुई है.

इस नृत्य में कलाकार एक-दूसरे का हाथ थामकर गोलाकार या सर्पिल आकृति में नृत्य करते हैं, जबकि बीच में ‘तरपा’ नामक पारंपरिक वाद्य बजाया जाता है.

तरपा की धुन के साथ नृत्य की गति बदलती रहती है और पूरा समुदाय एक लय में बंध जाता है. इसमें किसी एक नर्तक का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता इसका मूल भाव है.

परंपरागत रूप से यह नृत्य फसल, उत्सव और सामाजिक अवसरों से जुड़ा रहा है. इसके माध्यम से वारली समाज की प्रकृति के प्रति निकटता और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति गहरा जुड़ाव दिखाई देता है.

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Bharat - Internal Security

> Who are the “Dimagi Naxals” driving ideological narratives, influencing institutions and challenging India’s sovereignty from within?

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हिमालयी क्षेत्र में चीन के द्वारा की जा रही अनैतिक गतिविधियों के विरुद्ध भारत कैसे अपनी रणनीति को जमीन पर उतार रहा है? पढ़िए द नैरेटिव की विशेष ग्राफिकल रिपोर्ट में!

> HOW INDIA IS COUNTERING CHINA IN THE HIMALAYAS.pdf

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नटराज का ब्रह्मांडीय दर्शन

भारत की परंपरा में नटराज भगवान शिव के उस दिव्य स्वरूप का प्रतीक हैं, जिसमें उनका तांडव समस्त सृष्टि की गति और परिवर्तन को अभिव्यक्त करता है.

नटराज की उठी हुई भुजाओं और गतिशील मुद्रा में सृष्टि के सृजन, संरक्षण और संहार का दर्शन देखा जाता है. उनके हाथ में स्थित डमरू सृष्टि की आदि नाद का, जबकि अग्नि परिवर्तन और संहार का प्रतीक मानी जाती है.

नटराज का एक पैर अपस्मार नामक बौने स्वरूप पर स्थित है, जिसे अज्ञान और अविद्या का प्रतीक माना जाता है. दूसरा उठा हुआ चरण मुक्ति और आध्यात्मिक उत्थान की ओर संकेत करता है.

उनके चारों ओर बनी अग्नि की प्रभामंडलाकार रचना निरंतर गतिमान ब्रह्मांड और जीवन के चक्र का प्रतीक मानी जाती है. स्थिर प्रतिमा में दिखाई देता यह नृत्य, भारतीय दर्शन की गहरी गतिशीलता को व्यक्त करता है.

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भारत - विचार

> चिदंबरम ने खुद को “दिमागी नक्सल” कहने पर गर्व जताया, लेकिन गृह मंत्री रहते हुए माओवादी नेटवर्क और शहरी समर्थक गतिविधियों पर क्या कहा था? पढ़िए बस्तर के प्रसिद्ध साहित्यकार राजीव रंजन प्रसाद का लेख!

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चाईना इन फोकस - चीन मुख्यभूमि

> कैसे एक शांतिपूर्ण आध्यात्मिक आंदोलन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बन गया? पढ़िए पूरी कहानी!

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गंगेश्वर महादेव - जहाँ समुद्र स्वयं करता है अभिषेक

> श्रावण सोमवार विशेष 🚩

दमन-दीव के समुद्र तट पर स्थित गंगेश्वर महादेव वह स्थान है जहाँ प्रकृति और आस्था एक साथ सांस लेती हैं.

वनवास के समय पांडवों ने यहाँ पाँच शिवलिंग स्थापित किए थे. इन पाँचों शिवलिंगों को “पंचलिंगेश्वर” कहा जाता है.

अद्भुत यह कि समुद्र की लहरें प्रतिदिन इन शिवलिंगों को स्पर्श करती हैं, मानो स्वयं गंगा आकर भगवान शिव का अभिषेक कर रही हो.

यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि संदेश है कि जहाँ जल, भूमि और आकाश एक होते हैं, वहीं शिव प्रकट होते हैं.

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त्रिलोकीनाथ गांव – जहां शिव और अवलोकितेश्वर एक साथ पूजे जाते है🛕🏔🚩

हिमालय की शांत वादियों में स्थित त्रिलोकीनाथ गांव, आस्था और समन्वय का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है। यहां का प्राचीन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, पर बौद्ध परम्परा में इसे अवलोकितेश्वर का पवित्र स्थल माना जाता है।

चंद्रभागा घाटी में स्थित यह स्थान सदियों से दोनों परंपराओं को जोड़ता आया है, जहां श्रद्धा का स्वरूप सीमाओं से परे एकत्व का संदेश देता है।

आस्था है कि यहां की पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती है, और साधक और साधक को शांति, करुणा तथा संतुलन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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हरिहर गढ़, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के नासिक में सह्याद्रि पर्वतमाला की हर्षगढ़ पहाड़ी की चोटी में स्थित है हरिहर गढ़.

इस गढ़ तक पहुँचने के लिए जो मार्ग है, उसे विश्व के सबसे खतरनाक ट्रैक में से एक माना जाता है. 

170 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित इस गढ़ तक पहुंचने के लिए 117 सीढ़ियां बनी हैं जो एक मीटर चौड़ी है. 

किले की लगभग 50 सीढ़ियों की चढ़ाई के बाद इस गढ़ का मुख्य द्वार (महादरवाजा) आता है जो आज भी बहुत अच्छी स्थिति में है.

गढ़ के शीर्ष से बासगढ़ और ब्रह्मा पहाड़ी का सुंदर नजारा भी देखा जा सकता है.

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जनजातीय विषय - षड्यंत्र

> बस्तर में ईसाई कन्वर्ज़न के विरुद्ध क्यों भड़का आक्रोश? कांकेर के बाद सुकमा की ग्रामसभा ने लिया बड़ा फैसला! क्या यह पूरे बस्तर में बदलते माहौल का संकेत है? पढ़िए पूरी कहानी!

https://tinyurl.com/bdhx86rp

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Communism - Propaganda

> A century of Indian Left politics shows how prioritising Marxist class struggle over national sentiment repeatedly created a disconnect with India’s political and cultural realities.

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