SUCCESS INSTITUTE HALDWANI 📚📚📖🖌
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जुगल किशोर पेटशाली (7 सितंबर 1947 – 22 अगस्त 2025)
👉 उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक साहित्यकार, नाट्यकर्मी, और लोकसंस्कृति के संरक्षक थे।
👉 उनका जन्म अल्मोड़ा जिले के चितई गाँव में हुआ था।
👉 उन्होंने कुमाऊँनी और हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया, खासकर लोक संस्कृति, काव्य, और नाटकों के माध्यम से।
👉 संग्रहालय का प्रकार - लोक-संस्कृति संग्रहालय (चितई, अल्मोड़ा)
स्थापना वर्ष - 2003
प्रमुख संग्रह - लगभग 30 पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र (जैसे ढोल, दमाऊं, भोंकर, डोंर, बिनाई, जोंया मुरली आदि)
👉 वर्तमान स्थिति संग्रहालय बंद, सामग्री को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को सौंपा गया, आज "जुगल किशोर पेटसाली संग्रह" के नाम से संरक्षित
जुगल किशोर पेटशाली की प्रमुख पुस्तकें -
1. राजुला मालूशाही (महाकाव्य)
2. जय बाला गोरिया
3. कुमाऊं के संस्कार गीत
4. बखत (कुमाउनी कविता संग्रह)
5. उत्तरांचल के लोक वाद्य
6. कुमाउनी लोकगीत
7. पिंगला भृतहरि (महाकाव्य)
8. कुमाऊं के लोकगाथाएं
9. गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो (कुमाउनी होली गीत संग्रह)
10. भ्रमर गीत, (सम्पादित).
11. कुमाऊं की लोकगाथाओं पर आधारित ‘मेरे नाटक‘,
12. ‘जी रया जागि रया‘ (कुमाउनी कविता संग्रह),
13. ‘गंगनाथ-गीतावली‘ (सम्पादित)
14. ‘विभूति योग
15. ‘हे राम‘ (काव्य संग्रह)
👉 'जी रया जागि रया' पेटशाली की कुमाउनी कविताओं का संग्रह है।
इस संकलन में पहाड़ के परिवेश से जुड़ी कई महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।
👉 इनकी ‘विभूति योग‘ पुस्तिका में श्रीमद् भागवत, गीता के दशम अध्याय का हिन्दी व कुमाउनी में भावानुवाद दिया गया है।
👉 ‘गंगनाथ-गीतावली‘ जो साठ के दशक में अल्मोड़ा के वैद्य पीताम्बर पाण्डे ने लिखी थी उसकी भूमिका लेखन और संपादन पेटशाली ने किया है।
👉 वहीं ‘हे राम‘ में उन्होनें श्री राम के चरित्र को अभिनव तरीके से सुंदर काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।
👉 संस्कृति व इतिहास के अध्येता डॉ. योगेश धस्माना ने जुगल किशोर पेटशाली को पर्वतीय लोक के अद्भुत चितेरे की संज्ञा प्रदान की है।
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👉 उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक साहित्यकार, नाट्यकर्मी, और लोकसंस्कृति के संरक्षक थे।
👉 उनका जन्म अल्मोड़ा जिले के चितई गाँव में हुआ था।
👉 उन्होंने कुमाऊँनी और हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया, खासकर लोक संस्कृति, काव्य, और नाटकों के माध्यम से।
👉 संग्रहालय का प्रकार - लोक-संस्कृति संग्रहालय (चितई, अल्मोड़ा)
स्थापना वर्ष - 2003
प्रमुख संग्रह - लगभग 30 पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र (जैसे ढोल, दमाऊं, भोंकर, डोंर, बिनाई, जोंया मुरली आदि)
👉 वर्तमान स्थिति संग्रहालय बंद, सामग्री को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को सौंपा गया, आज "जुगल किशोर पेटसाली संग्रह" के नाम से संरक्षित
जुगल किशोर पेटशाली की प्रमुख पुस्तकें -
1. राजुला मालूशाही (महाकाव्य)
2. जय बाला गोरिया
3. कुमाऊं के संस्कार गीत
4. बखत (कुमाउनी कविता संग्रह)
5. उत्तरांचल के लोक वाद्य
6. कुमाउनी लोकगीत
7. पिंगला भृतहरि (महाकाव्य)
8. कुमाऊं के लोकगाथाएं
9. गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो (कुमाउनी होली गीत संग्रह)
10. भ्रमर गीत, (सम्पादित).
11. कुमाऊं की लोकगाथाओं पर आधारित ‘मेरे नाटक‘,
12. ‘जी रया जागि रया‘ (कुमाउनी कविता संग्रह),
13. ‘गंगनाथ-गीतावली‘ (सम्पादित)
14. ‘विभूति योग
15. ‘हे राम‘ (काव्य संग्रह)
👉 'जी रया जागि रया' पेटशाली की कुमाउनी कविताओं का संग्रह है।
इस संकलन में पहाड़ के परिवेश से जुड़ी कई महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।
👉 इनकी ‘विभूति योग‘ पुस्तिका में श्रीमद् भागवत, गीता के दशम अध्याय का हिन्दी व कुमाउनी में भावानुवाद दिया गया है।
👉 ‘गंगनाथ-गीतावली‘ जो साठ के दशक में अल्मोड़ा के वैद्य पीताम्बर पाण्डे ने लिखी थी उसकी भूमिका लेखन और संपादन पेटशाली ने किया है।
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Group - C
New Foundation Batch
UKSSSC का नया Foundation Batch शुरू!
👉 💐PRINT OUT ALL SUBJECTS NOTES💐
👉 हमसे जुड़कर अपनी तैयारी को और मजबूत करें।
👉 मध्यम - ऑफ-लाइन
👉 समय - सुबह 7:30 से 9:30
कॉल या व्हाट्सएप नंबर- 8006604441/8006604442
Add. D.R.K TOWER 4TH FLOOR NEAR CANARA BANK DURGA CITY CENTRE HALDWANI NAINITAL
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5_6165589067107932685.pdf
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Sub Inspector
(Civil Police/Intelligence), Fire Station Second Officer And Platoon Commander, Male(PAC/IRB) Exam- Results
(Civil Police/Intelligence), Fire Station Second Officer And Platoon Commander, Male(PAC/IRB) Exam- Results
❤3
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सातू-आठू उत्सव
परिचय
सातू-आठू उत्तराखंड (विशेषकर कुमाऊँ क्षेत्र) का लोक पर्व है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. अनाज व व्रत से जुड़ा पर्व
इस दिन लोग सातू (भुने अनाज का आटा) का सेवन करते हैं।
महिलाएँ विशेष रूप से व्रत-उपवास करती हैं।
2. स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना
पर्व का उद्देश्य परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और अच्छी फसल की कामना करना है।
3. पूजा-पद्धति
महिलाएँ घर के आँगन या देवस्थान में पूजा करती हैं।
अनाज, विशेषकर जौ/गेहूँ का सातू अर्पित किया जाता है।
4. सामाजिक महत्व
पर्व को फसल और ऋतु परिवर्तन से भी जोड़ा जाता है।
यह लोकसंस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है।
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परिचय
सातू-आठू उत्तराखंड (विशेषकर कुमाऊँ क्षेत्र) का लोक पर्व है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. अनाज व व्रत से जुड़ा पर्व
इस दिन लोग सातू (भुने अनाज का आटा) का सेवन करते हैं।
महिलाएँ विशेष रूप से व्रत-उपवास करती हैं।
2. स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना
पर्व का उद्देश्य परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और अच्छी फसल की कामना करना है।
3. पूजा-पद्धति
महिलाएँ घर के आँगन या देवस्थान में पूजा करती हैं।
अनाज, विशेषकर जौ/गेहूँ का सातू अर्पित किया जाता है।
4. सामाजिक महत्व
पर्व को फसल और ऋतु परिवर्तन से भी जोड़ा जाता है।
यह लोकसंस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है।
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कुमाऊँनी भाषा दिवस, या कुमाऊँनी भाषा दिवस, उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाने वाला एक वार्षिक कार्यक्रम है। यह हर साल 1 सितंबर को उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता है, जिन्होंने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया था। इस दिवस का उद्देश्य कुमाऊँनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना और संरक्षित करना है।
कुमाऊँनी भाषा का इतिहास और उत्पत्ति
कुमाऊँनी भाषा इंडो-आर्यन भाषा शाखा से ली गई है और यह संस्कृत, प्राकृत, तिब्बती, नेपाली, फारसी, अरबी और अंग्रेजी जैसी विभिन्न अन्य भाषाओं और संस्कृतियों से प्रभावित है।
इस भाषा की शब्दावली और व्याकरण विविध है जो इस क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को दर्शाती है।
इस भाषा की एक मजबूत साहित्यिक और मौखिक परंपरा है जो कुमाऊंनी लोगों के मूल्यों, विश्वासों और रीति-रिवाजों को प्रदर्शित करती है।
कुमाऊँनी भाषा का इतिहास और उत्पत्ति
कुमाऊँनी भाषा इंडो-आर्यन भाषा शाखा से ली गई है और यह संस्कृत, प्राकृत, तिब्बती, नेपाली, फारसी, अरबी और अंग्रेजी जैसी विभिन्न अन्य भाषाओं और संस्कृतियों से प्रभावित है।
इस भाषा की शब्दावली और व्याकरण विविध है जो इस क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को दर्शाती है।
इस भाषा की एक मजबूत साहित्यिक और मौखिक परंपरा है जो कुमाऊंनी लोगों के मूल्यों, विश्वासों और रीति-रिवाजों को प्रदर्शित करती है।
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