असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षार्थी ग्रुप
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जब गड़बड़ी का कोई साक्ष्य ही नहीं है तो पास छात्र को किस आधार पर नयी परीक्षा देने के लिए कह सकते हैं।
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जब योगिया सरकार ने हाईकोर्ट में स्वीकार कर लिया है कि 28 विषयों में गड़बड़ी का कोई साक्ष्य नहीं है तो सुप्रीमकोर्ट में कैसे कहेगी कि पूरी परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी और इसलिए पूरी परीक्षा को रद्द कर दिया।
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सरकार सुप्रीम कोर्ट में बहस से भाग रही है या कहिए कि बच रही है।
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जब भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के लिए निगरानी समिति बना दी गई थी तो परीक्षा कैसे रद्द हुई? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। अगर भ्रष्टाचार हुआ था तो परीक्षा परिणाम क्यों दिया गया? इसका भी जवाब किसी के पास नहीं है। एक ईमानदार अध्यक्ष से त्यागपत्र लेकर चहेते के लिए नियम तक बदल दिए गए। क्यों? अब ओएमआर नष्ट करेंगे जिससे कोई साक्ष्य ही न रहे।
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पुराने रिजल्ट में सरकार के चहेते फेल हो गए थे तो परीक्षा के साल भर बाद नई परीक्षा का तमाशा किया गया है। अगर सरकार ईमानदार होती तो डिवीजन बेंच के फैसले के बाद परीक्षा नहीं लेती बल्कि सुप्रीम कोर्ट से डिवीजन बेंच के फैसले पर स्टे ऑर्डर लेकर परीक्षा कराती। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया जिससे पता चलता है कुछ जुगाड़ू हैं जिन्हें सरकार सीधे प्रोफेसर बनाना चाहती है। इसलिए डिवीजन बेंच के फैसले के बाद भी ओएमआर चेक करके रिजल्ट दिया गया है।
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प्रश्न है निगरानी समिति क्या आयोग में घास छील रही थी?
अगर भ्रष्टाचार हुआ था तो निगरानी समिति ने परीक्षा परिणाम क्यों जारी होने दिया?
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सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बिना असिस्टेंट प्रोफेसर विज्ञापन संख्या 51 रीएग्जाम का इंटरव्यू लेना एक अनावश्यक कार्यवाही है जिसका कोई औचित्य नहीं है क्योंकि बहुत संभव है सुप्रीम कोर्ट से पुराना परीक्षा परिणाम ही मान्य होगा और नए कैंडिडेट इंटरव्यू देकर स्वयं को ठगा हुआ महसूस करेंगे।
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