यह इतिहास का एक क्रूर विरोधाभास है कि जिस व्यक्ति के जूतों की धमक से पूरा यूरोप कांपता था, उसका अपना दिल एक औरत के कदमों में पनाह मांगता था। नेपोलियन बोनापार्ट, जिसने ऑस्टरलिट्ज़ के मैदान में हज़ारों को धूल चटाई, वह जोसेफिन के प्रेम के जाल में इस कदर उलझा कि साम्राज्य जीतना उसे आसान लगा, पर जोसेफिन का पूर्ण समर्पण पाना असंभव।
सन् 1796 का समय था। नेपोलियन इटली के अभियान पर था। दिन भर वह मानचित्रों पर अपनी तलवार से नई सीमाएं खींचता और रात होते ही मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में जोसेफिन के लिए विरह की चिट्ठियां लिखता। युद्ध के मैदान में उसकी आँखें चील की तरह दुश्मन की कमजोरी ढूंढती थीं, लेकिन वही आँखें जोसेफिन के पत्रों के इंतज़ार में नम हो जाती थीं।
उसने लिखा था— "जोसेफिन, तुम मेरी जीत की प्रेरणा हो, लेकिन तुम्हारी बेरुखी मेरी मौत है।"
नेपोलियन जब युद्ध जीत कर पेरिस लौटा, तो उसके पास विजय के उपहार थे, लेकिन जोसेफिन के पास केवल बहाने। वह पेरिस की महफिलों में मशगूल थी, जबकि नेपोलियन की आत्मा युद्ध की आग में तपकर केवल उसे पुकार रही थी।
कहानी का सबसे रोमांचक मोड़ तब आया जब नेपोलियन को सम्राट घोषित किया गया। सिर पर सोने का ताज था, पैरों के नीचे झुका हुआ यूरोप, लेकिन बगल में बैठी जोसेफिन का दिल कहीं और था। नेपोलियन जान गया था कि वह दुनिया जीत चुका है, पर वह युद्ध हार गया है जो उसने जोसेफिन की रूह को जीतने के लिए लड़ा था।
अंततः, उत्तराधिकारी की चाहत और राजनीतिक दबाव में उसे अपनी 'किस्मत की देवी' जोसेफिन को तलाक देना पड़ा। कहते हैं कि दस्तावेज़ पर दस्तखत करते समय उस महान योद्धा के हाथ कांप रहे थे।
इतिहास का सबक: सेंट हेलेना के द्वीप पर जब नेपोलियन अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, तो उसके होंठों से निकला आखिरी शब्द 'वॉटरलू' (युद्ध) नहीं, बल्कि 'जोसेफिन' था।
वह तलवार से साम्राज्य तो बना सका, लेकिन जज्बातों की जंग में वह एक निहत्था सिपाही बनकर रह गया।
सन् 1796 का समय था। नेपोलियन इटली के अभियान पर था। दिन भर वह मानचित्रों पर अपनी तलवार से नई सीमाएं खींचता और रात होते ही मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में जोसेफिन के लिए विरह की चिट्ठियां लिखता। युद्ध के मैदान में उसकी आँखें चील की तरह दुश्मन की कमजोरी ढूंढती थीं, लेकिन वही आँखें जोसेफिन के पत्रों के इंतज़ार में नम हो जाती थीं।
उसने लिखा था— "जोसेफिन, तुम मेरी जीत की प्रेरणा हो, लेकिन तुम्हारी बेरुखी मेरी मौत है।"
नेपोलियन जब युद्ध जीत कर पेरिस लौटा, तो उसके पास विजय के उपहार थे, लेकिन जोसेफिन के पास केवल बहाने। वह पेरिस की महफिलों में मशगूल थी, जबकि नेपोलियन की आत्मा युद्ध की आग में तपकर केवल उसे पुकार रही थी।
कहानी का सबसे रोमांचक मोड़ तब आया जब नेपोलियन को सम्राट घोषित किया गया। सिर पर सोने का ताज था, पैरों के नीचे झुका हुआ यूरोप, लेकिन बगल में बैठी जोसेफिन का दिल कहीं और था। नेपोलियन जान गया था कि वह दुनिया जीत चुका है, पर वह युद्ध हार गया है जो उसने जोसेफिन की रूह को जीतने के लिए लड़ा था।
अंततः, उत्तराधिकारी की चाहत और राजनीतिक दबाव में उसे अपनी 'किस्मत की देवी' जोसेफिन को तलाक देना पड़ा। कहते हैं कि दस्तावेज़ पर दस्तखत करते समय उस महान योद्धा के हाथ कांप रहे थे।
इतिहास का सबक: सेंट हेलेना के द्वीप पर जब नेपोलियन अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, तो उसके होंठों से निकला आखिरी शब्द 'वॉटरलू' (युद्ध) नहीं, बल्कि 'जोसेफिन' था।
वह तलवार से साम्राज्य तो बना सका, लेकिन जज्बातों की जंग में वह एक निहत्था सिपाही बनकर रह गया।
नेपोलियन युद्ध के मैदान में तो जीत गया लेकिन प्रेम के मैदान में हार गया।