🔥 Jio Pre-IPO Access Now Available
Don't miss the chance to learn about one of India's most talked-about upcoming market events.
📊 Find out how qualified participants can explore early access opportunities before the public market.
⚡️ Limited spots available
⚡️ Free information session
⚡️ Registration required
👉 Check Availability Now
Don't miss the chance to learn about one of India's most talked-about upcoming market events.
📊 Find out how qualified participants can explore early access opportunities before the public market.
⚡️ Limited spots available
⚡️ Free information session
⚡️ Registration required
👉 Check Availability Now
❤2🔥1
कहानी नॉर्मलाइजेशन की...
1. प्रतियोगी परीक्षा की अधिसूचना (Notification) जारी हुई।
परीक्षा एजेंसी: सभी उम्मीदवारों को सूचित किया जाता है कि परीक्षा अलग-अलग शिफ्ट में होगी। पास होने (कट-ऑफ) के लिए 144 अंक आवश्यक हैं।
(शिफ्ट A के छात्र, शिफ्ट B के छात्र, शिफ्ट C के छात्र)
2. सभी छात्रों ने अपनी तैयारी के अनुसार परीक्षा दी।
(शिफ्ट A, शिफ्ट B, शिफ्ट C के छात्र पेपर हल करते हुए)
3. परीक्षा का परिणाम (रॉ स्कोर / Raw Score) आया...
शिफ्ट A का छात्र: 157 अंक
शिफ्ट B का छात्र: 57 अंक
शिफ्ट C का छात्र: 42 अंक
4. 157 अंक पाने वाले छात्र को पूरा भरोसा था कि उसका सिलेक्शन पक्का है!
छात्र: अब तो नौकरी/सीट हमारी ही है!
5. लेकिन परीक्षा एजेंसी (Exam Agency) की घोषणा...
परीक्षा एजेंसी: 157 अंक मिलने के बावजूद इस छात्र का सिलेक्शन नहीं हो सकता। इनके लिए पासिंग मार्क्स का मानदंड बढ़ाकर 200 अंक कर दिया गया है।
6. छात्र ने पूछा...
छात्र: मेरे पास 144 से ज्यादा यानी 157 अंक हैं। फिर मेरा सिलेक्शन क्यों नहीं?
7. एजेंसी का उत्तर...
परीक्षा एजेंसी: आपने जिस शिफ्ट में परीक्षा दी, वहां का पेपर बहुत आसान था। इसलिए आपके लिए कट-ऑफ का मानदंड 200 अंक किया गया।
बोर्ड: आपके लिए कट-ऑफ = 200 अंक
8. तो फिर 57 और 42 अंक वाले छात्रों का सिलेक्शन कैसे हुआ?
परीक्षा एजेंसी: उन्होंने जिस शिफ्ट में परीक्षा दी, वहां का पेपर बहुत कठिन, पेचीदा और डरावना था। इसलिए उनके लिए कट-ऑफ का मानदंड कम किया गया और उन्हें सिलेक्शन का मौका दिया गया।
बोर्ड: उनके लिए कट-ऑफ = बहुत कम
9. 157 अंक पाने वाले छात्र का सवाल...
छात्र: अगर मैं भी उस कठिन शिफ्ट में बैठता तो अच्छे नंबर लाता, लेकिन आपने हमें पहले तो यह नहीं बताया कि आसान पेपर आने पर हमारे नंबरों की वैल्यू कम हो जाएगी!
10. परीक्षा एजेंसी का उत्तर...
परीक्षा एजेंसी: अंतिम नियम हम पहले नहीं बताते... परिणाम आने के बाद सभी शिफ्टों के औसत (Average) और कठिनता के स्तर के अनुसार तय करते हैं।
11. छात्र का गुस्सा...
छात्र: ये कैसे नियम हैं?
परीक्षा एजेंसी: इसी को तो कहते हैं — नॉर्मलाइजेशन (Normalisation)!
नियम पहले स्पष्ट नहीं... परिणाम के बाद जटिल फॉर्मूले से सब बदल दिया जाए तो उसी को कहते हैं — नॉर्मलाइजेशन!
1. प्रतियोगी परीक्षा की अधिसूचना (Notification) जारी हुई।
परीक्षा एजेंसी: सभी उम्मीदवारों को सूचित किया जाता है कि परीक्षा अलग-अलग शिफ्ट में होगी। पास होने (कट-ऑफ) के लिए 144 अंक आवश्यक हैं।
(शिफ्ट A के छात्र, शिफ्ट B के छात्र, शिफ्ट C के छात्र)
2. सभी छात्रों ने अपनी तैयारी के अनुसार परीक्षा दी।
(शिफ्ट A, शिफ्ट B, शिफ्ट C के छात्र पेपर हल करते हुए)
3. परीक्षा का परिणाम (रॉ स्कोर / Raw Score) आया...
शिफ्ट A का छात्र: 157 अंक
शिफ्ट B का छात्र: 57 अंक
शिफ्ट C का छात्र: 42 अंक
4. 157 अंक पाने वाले छात्र को पूरा भरोसा था कि उसका सिलेक्शन पक्का है!
छात्र: अब तो नौकरी/सीट हमारी ही है!
5. लेकिन परीक्षा एजेंसी (Exam Agency) की घोषणा...
परीक्षा एजेंसी: 157 अंक मिलने के बावजूद इस छात्र का सिलेक्शन नहीं हो सकता। इनके लिए पासिंग मार्क्स का मानदंड बढ़ाकर 200 अंक कर दिया गया है।
6. छात्र ने पूछा...
छात्र: मेरे पास 144 से ज्यादा यानी 157 अंक हैं। फिर मेरा सिलेक्शन क्यों नहीं?
7. एजेंसी का उत्तर...
परीक्षा एजेंसी: आपने जिस शिफ्ट में परीक्षा दी, वहां का पेपर बहुत आसान था। इसलिए आपके लिए कट-ऑफ का मानदंड 200 अंक किया गया।
बोर्ड: आपके लिए कट-ऑफ = 200 अंक
8. तो फिर 57 और 42 अंक वाले छात्रों का सिलेक्शन कैसे हुआ?
परीक्षा एजेंसी: उन्होंने जिस शिफ्ट में परीक्षा दी, वहां का पेपर बहुत कठिन, पेचीदा और डरावना था। इसलिए उनके लिए कट-ऑफ का मानदंड कम किया गया और उन्हें सिलेक्शन का मौका दिया गया।
बोर्ड: उनके लिए कट-ऑफ = बहुत कम
9. 157 अंक पाने वाले छात्र का सवाल...
छात्र: अगर मैं भी उस कठिन शिफ्ट में बैठता तो अच्छे नंबर लाता, लेकिन आपने हमें पहले तो यह नहीं बताया कि आसान पेपर आने पर हमारे नंबरों की वैल्यू कम हो जाएगी!
10. परीक्षा एजेंसी का उत्तर...
परीक्षा एजेंसी: अंतिम नियम हम पहले नहीं बताते... परिणाम आने के बाद सभी शिफ्टों के औसत (Average) और कठिनता के स्तर के अनुसार तय करते हैं।
11. छात्र का गुस्सा...
छात्र: ये कैसे नियम हैं?
परीक्षा एजेंसी: इसी को तो कहते हैं — नॉर्मलाइजेशन (Normalisation)!
नियम पहले स्पष्ट नहीं... परिणाम के बाद जटिल फॉर्मूले से सब बदल दिया जाए तो उसी को कहते हैं — नॉर्मलाइजेशन!
😢21❤10🤣5🕊3
Forwarded from QUOTES DIARIESS..❤️✨
दर्द छुपाना सीख गया हूँ, क्योंकि हर बार अपना दर्द बताया... लोगों ने उसे मज़ाक या कमजोरी समझ लिया। अब मुस्कुराना ही आसान लगता है। ❤️🩹☺️
Good morning Dosto..🌱🌞
Ki haaal chaaal....??🍃
Telegram📩: @quotesdiariess
Good morning Dosto..🌱🌞
Ki haaal chaaal....??🍃
Telegram📩: @quotesdiariess
❤36👏3
शिव सब देख रहे हैं... संघर्ष भी, तकलीफ़ें भी, और मेरी खामोश कोशिशें भी। हर अंधेरी रात के बाद सवेरा ज़रूर होगा। 🕉️❤️☘️🔱📿
Telegram: @quotesdiariess
Telegram: @quotesdiariess
❤59👍3👌2🥰1💯1
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
☝️जीवन में सफ़लता पाने का एक राज है
जो कुछ करना है वक्त उसका आज है
‘आत्मविश्वास’ नही देखता कितने तूफ़ान है
तेज बारिश और तूफानों में उड़ने वाला बाज है ! 🧚♀✨
जो कुछ करना है वक्त उसका आज है
‘आत्मविश्वास’ नही देखता कितने तूफ़ान है
तेज बारिश और तूफानों में उड़ने वाला बाज है ! 🧚♀✨
मोह माया तुम्हे अपनी तरफ बुलाएगी लेकिन ध्यान रखना तुम्हारी मेहनत ही मंजिल दिलाएगी। 🔥❤36🤣2
रिसर्च से पता चला है पढ़ाई के बाद रिवीजन
ना करने की वजह से ज्यादातर लोगों
को पढ़ा हुआ केवल 60 % ही याद रहता है
📚📚🌺
ना करने की वजह से ज्यादातर लोगों
को पढ़ा हुआ केवल 60 % ही याद रहता है
📚📚🌺
❤29🎉14👍5💯2
🍃 चन्द्रगुप्त ने पुछा 🍃
🍃 चाणक्य ने कहा 🍃
अगर किस्मत
पहेले ही लिखी जा चुकी है तो,
कोशिश कर के क्या मिलेगा?🍃 चाणक्य ने कहा 🍃
क्या पता किस्मत में लिखा हो की,
कोशिश करने से ही मिलेगा!👌39👍15❤10🫡4
❇️देश और राजनीतिक सोच
जब हम किसी एक राजनीतिक दल से दिल से जुड़ जाते हैं, तो हमारी सोच निष्पक्ष नहीं रह पाती और हमारा दिमाग एक खास पैटर्न पर काम करने लगता है। दरअसल, इंसान का स्वभाव है कि वह जिस समूह या नेता को पसंद करता है, उसे अपनी पहचान का हिस्सा मान लेता है। इसके बाद हमारा दिमाग पुष्टिकरण पूर्वाग्रह (Confirmation Bias) का शिकार हो जाता है, जिसका मतलब है कि हम केवल वही खबरें और बातें देखना-सुनना पसंद करते हैं जो हमारी पसंदीदा पार्टी की तारीफ करती हों, भले ही वे सच न हों। वहीं दूसरी तरफ, विरोधी दल के अच्छे कामों को भी हमारा दिमाग तुरंत खारिज कर देता है क्योंकि उन्हें सही मानने से हमारी पुरानी धारणा को ठेस पहुंचती है। आज के दौर में सोशल मीडिया भी लगातार एक ही तरह के वीडियो दिखाकर हमारे विचारों के चारों तरफ एक अदृश्य दीवार बना देता है, जिससे व्यक्ति अपनी पार्टी की गलतियों का भी बचाव करने लगता है।
ऐसी कट्टर मानसिकता वाले लोगों की वजह से देश में सही-गलत का पैमाना बदल जाता है; समाज में आपसी भाईचारे की जगह नफरत और दूरियां बढ़ने लगती हैं। जब जनता काम और विकास के बजाय सिर्फ पार्टी देखकर वोट देने लगती है, तो सरकारें भी जनता के प्रति बेपरवाह हो जाती हैं। नतीजा यह होता है कि देश बुनियादी मुद्दों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में पिछड़ जाता है और एक कमजोर तथा आपस में बंटा हुआ समाज बनता है।
❤22👍3
✅अतीत के पूर्वाग्रहों से परे: वर्तमान भारत की ज़मीनी हकीकत और जागरूक नागरिक का कर्तव्य
आज हमारे देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ निष्पक्ष वैचारिक मंथन की अत्यधिक आवश्यकता है। अक्सर समाज में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि लोग वर्तमान सरकार की नीतियों और फैसलों का आँख बंद करके समर्थन कर रहे हैं। इस अंधसमर्थन के पीछे का सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि अतीत की सरकारें या कांग्रेस नीत शासन व्यवस्था पूरी तरह विफल और भ्रष्ट थी। यह सच हो सकता है कि पुरानी व्यवस्थाओं में कमियां थीं और इसी जन-आक्रोश के कारण देश की जनता ने एक बड़े राजनीतिक बदलाव को चुना। परंतु, लोकतंत्र का यह कतई नियम नहीं है कि हम अतीत की बुराइयों के डर से वर्तमान की गंभीर गलतियों और नाकामियों पर मौन धारण कर लें। एक जीवंत लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को 'अतीत के बंधक' बनकर नहीं जीना चाहिए, बल्कि उसे वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर सरकार की जवाबदेही तय करनी चाहिए।
यदि हम बिना किसी राजनीतिक चश्मे के आज के भारत का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करें, तो हमें सिक्के के दो पहलू स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। एक तरफ सरकार के विकासात्मक दावों की एक लंबी सूची है, जिसमें आधुनिक बुनियादी ढांचा (Infrastructure), हाईवे का जाल, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंच पर देश की मजबूत छवि शामिल है। इन प्रयासों की सराहना निश्चित रूप से होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, सिक्का पलटते ही एक बेहद चिंताजनक और डरावनी तस्वीर भी सामने आती है। आज देश के भीतर भ्रष्टाचार के नए और संस्थागत रूप देखने को मिल रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्यों तक सरकारी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएं आम हो चुकी हैं, जिसने देश के करोड़ों होनहार युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। इसके साथ ही, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते जघन्य अपराध, बलात्कार और समाज के कमजोर वर्गों पर हो रहे अन्याय व अत्याचार की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि कानून व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर गंभीर खामियां हैं।
इस सामाजिक संकट के साथ-साथ देश की आर्थिक नीतियां भी आम जनता की कमर तोड़ रही हैं। आज भारत का युवा डिग्री हाथ में लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है, क्योंकि रोजगार के नए अवसर पैदा होने के बजाय लगातार कम हो रहे हैं। बेरोजगारी का आंकड़ा ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर पहुंच चुका है। इसके ऊपर से बेकाबू होती महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों का जीना मुहाल कर दिया है। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल और राशन से लेकर बुनियादी आवश्यकताओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जा रही है, जो सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता को साफ दर्शाता है।
ऐसी स्थिति में, प्रत्येक नागरिक को खुद से यह सवाल पूछना होगा कि क्या केवल चमचमाती सड़कों और डिजिटल प्रगति से एक स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है, जहाँ देश का युवा और महिलाएं खुद को असुरक्षित, बेरोजगार और ठगा हुआ महसूस करें? कोई भी सरकार हो—चाहे वह भाजपा की हो या किसी अन्य दल की—सत्ता में आने के बाद यदि उसकी नीतियां आम जनता के लिए कष्टकारी साबित हो रही हैं, तो उसके खिलाफ आवाज उठाना किसी भी प्रकार का देशद्रोह या विरोध नहीं, बल्कि परम नागरिक कर्तव्य है। लोकतंत्र की आत्मा सरकारों से सवाल पूछने में बसती है, उनका अंधानुकरण करने में नहीं। जब जनता अपनी चुनी हुई सरकार की कमियों पर पर्दा डालने लगती है, तो सत्ता निरंकुश होने लगती है।
अतः आज समय की मांग है कि हम राजनीतिक दलों के प्रति अपनी व्यक्तिगत निष्ठाओं से ऊपर उठें। विकास के आंकड़ों और विज्ञापनों की तुलना ज़मीनी स्तर पर हो रहे अपराध, पेपर लीक, रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार की कड़वी हकीकत से करें। सरकारें और राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, लेकिन यह देश, इसका सामाजिक ताना-बाना और हमारे युवाओं का भविष्य हमेशा रहेगा। यदि हम आज सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस नहीं जुटा पाए, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक कमजोर और दिशाहीन भारत सौंपेंगे। आइए, पूर्वाग्रहों को छोड़कर देशहित में जागरूक बनें और वर्तमान परिस्थितियों पर गहराई से विचार करें।
इस गंभीर विषय पर चर्चा की शुरुआत के लिए, हमें खुद से और अपने आसपास के लोगों से कुछ सीधे सवाल पूछने होंगे:
1. क्या पूर्ववर्ती सरकारों की नाकामियां आज की सरकार को हर मोर्चे पर क्लीन चिट देने का बहाना बन सकती हैं?
2. यदि पेपर लीक से युवाओं का भविष्य और अपराध से महिलाओं की सुरक्षा खतरे में है, तो हम विकास की किस परिभाषा पर जश्न मना रहे हैं?
3. महंगाई और बेरोजगारी के इस दौर में क्या एक आम नागरिक के अधिकार और उसकी आवाज को दबाया नहीं जा रहा है?
4. एक सच्चे देशभक्त का कर्तव्य सरकार के हर फैसले पर ताली बजाना है या उसकी गलतियों पर सवाल उठाना?
आज हमारे देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ निष्पक्ष वैचारिक मंथन की अत्यधिक आवश्यकता है। अक्सर समाज में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि लोग वर्तमान सरकार की नीतियों और फैसलों का आँख बंद करके समर्थन कर रहे हैं। इस अंधसमर्थन के पीछे का सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि अतीत की सरकारें या कांग्रेस नीत शासन व्यवस्था पूरी तरह विफल और भ्रष्ट थी। यह सच हो सकता है कि पुरानी व्यवस्थाओं में कमियां थीं और इसी जन-आक्रोश के कारण देश की जनता ने एक बड़े राजनीतिक बदलाव को चुना। परंतु, लोकतंत्र का यह कतई नियम नहीं है कि हम अतीत की बुराइयों के डर से वर्तमान की गंभीर गलतियों और नाकामियों पर मौन धारण कर लें। एक जीवंत लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को 'अतीत के बंधक' बनकर नहीं जीना चाहिए, बल्कि उसे वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर सरकार की जवाबदेही तय करनी चाहिए।
यदि हम बिना किसी राजनीतिक चश्मे के आज के भारत का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करें, तो हमें सिक्के के दो पहलू स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। एक तरफ सरकार के विकासात्मक दावों की एक लंबी सूची है, जिसमें आधुनिक बुनियादी ढांचा (Infrastructure), हाईवे का जाल, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंच पर देश की मजबूत छवि शामिल है। इन प्रयासों की सराहना निश्चित रूप से होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, सिक्का पलटते ही एक बेहद चिंताजनक और डरावनी तस्वीर भी सामने आती है। आज देश के भीतर भ्रष्टाचार के नए और संस्थागत रूप देखने को मिल रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्यों तक सरकारी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएं आम हो चुकी हैं, जिसने देश के करोड़ों होनहार युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। इसके साथ ही, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते जघन्य अपराध, बलात्कार और समाज के कमजोर वर्गों पर हो रहे अन्याय व अत्याचार की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि कानून व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर गंभीर खामियां हैं।
इस सामाजिक संकट के साथ-साथ देश की आर्थिक नीतियां भी आम जनता की कमर तोड़ रही हैं। आज भारत का युवा डिग्री हाथ में लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है, क्योंकि रोजगार के नए अवसर पैदा होने के बजाय लगातार कम हो रहे हैं। बेरोजगारी का आंकड़ा ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर पहुंच चुका है। इसके ऊपर से बेकाबू होती महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों का जीना मुहाल कर दिया है। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल और राशन से लेकर बुनियादी आवश्यकताओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जा रही है, जो सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता को साफ दर्शाता है।
ऐसी स्थिति में, प्रत्येक नागरिक को खुद से यह सवाल पूछना होगा कि क्या केवल चमचमाती सड़कों और डिजिटल प्रगति से एक स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है, जहाँ देश का युवा और महिलाएं खुद को असुरक्षित, बेरोजगार और ठगा हुआ महसूस करें? कोई भी सरकार हो—चाहे वह भाजपा की हो या किसी अन्य दल की—सत्ता में आने के बाद यदि उसकी नीतियां आम जनता के लिए कष्टकारी साबित हो रही हैं, तो उसके खिलाफ आवाज उठाना किसी भी प्रकार का देशद्रोह या विरोध नहीं, बल्कि परम नागरिक कर्तव्य है। लोकतंत्र की आत्मा सरकारों से सवाल पूछने में बसती है, उनका अंधानुकरण करने में नहीं। जब जनता अपनी चुनी हुई सरकार की कमियों पर पर्दा डालने लगती है, तो सत्ता निरंकुश होने लगती है।
अतः आज समय की मांग है कि हम राजनीतिक दलों के प्रति अपनी व्यक्तिगत निष्ठाओं से ऊपर उठें। विकास के आंकड़ों और विज्ञापनों की तुलना ज़मीनी स्तर पर हो रहे अपराध, पेपर लीक, रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार की कड़वी हकीकत से करें। सरकारें और राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, लेकिन यह देश, इसका सामाजिक ताना-बाना और हमारे युवाओं का भविष्य हमेशा रहेगा। यदि हम आज सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस नहीं जुटा पाए, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक कमजोर और दिशाहीन भारत सौंपेंगे। आइए, पूर्वाग्रहों को छोड़कर देशहित में जागरूक बनें और वर्तमान परिस्थितियों पर गहराई से विचार करें।
इस गंभीर विषय पर चर्चा की शुरुआत के लिए, हमें खुद से और अपने आसपास के लोगों से कुछ सीधे सवाल पूछने होंगे:
1. क्या पूर्ववर्ती सरकारों की नाकामियां आज की सरकार को हर मोर्चे पर क्लीन चिट देने का बहाना बन सकती हैं?
2. यदि पेपर लीक से युवाओं का भविष्य और अपराध से महिलाओं की सुरक्षा खतरे में है, तो हम विकास की किस परिभाषा पर जश्न मना रहे हैं?
3. महंगाई और बेरोजगारी के इस दौर में क्या एक आम नागरिक के अधिकार और उसकी आवाज को दबाया नहीं जा रहा है?
4. एक सच्चे देशभक्त का कर्तव्य सरकार के हर फैसले पर ताली बजाना है या उसकी गलतियों पर सवाल उठाना?
❤31