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👍2
आप जो चाहते हैं
वह तुरंत प्रकट नहीं हो रहा है इसका मतलब
यह नहीं है कि चीजें आपके पक्ष में काम नही कर रही है।
धैर्य रखें और भरोसा रखें कि आप के जीवन में
जो कुछ भी होगा वह सही समय पर होगा ॥✨
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सरकारी कुर्सियों में घमंड का कलफ़ लगा होता है,
बैठते ही इन्सान अकड़ जाता है
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ख्वाब देखे हैं तूने UPSC के तो दर्द भी होगा...✨✅
थोड़ा सब्र कर और मेहनत कर ख्वाब पूरा भी होगा....💫🔥
╭─❀⊰ 𝐉𝐨𝐢𝐧 📚
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╭─❀⊰ 𝐉𝐨𝐢𝐧 📚
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"The journey of a thousand miles begins with a single step. And sometimes, that single step is taken alone."🌼🌻
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गुड़ और तिल की मिठास के साथ आपके जीवन में भी सुख और समृद्धि बनी रहें
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ
🌹🙏
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❤26🥰5👍2
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जीवन में समस्या और परिस्थितियाँ कितनी भी जटिल व नकारात्मक क्यूँ ना हो, सबसे महत्वपूर्ण है कि हम उनका सामना किस नज़रिए से करते हैं 😌और जब कुछ करना तय ही है, तो रोने के बजाय क्यों ना मुस्कुरा कर किया जाये ☺️
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"महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि हर बच्चे को पढ़ाया जाना चाहिए, बल्कि हर बच्चे को सीखने की इच्छा दी जानी चाहिए।" -
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✍
याद रखिये सबसे बड़ा अपराध
अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है। इससे आप गुलाम बन जाओगे...और
गुलाम बन कर जिओगे तो कुत्ता समझ कर लात मारेगी ये दुनिया।
याद रखिये सबसे बड़ा अपराध
अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है। इससे आप गुलाम बन जाओगे...और
गुलाम बन कर जिओगे तो कुत्ता समझ कर लात मारेगी ये दुनिया।
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अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने सिद्ध किया कि आधे ज्ञान का प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। उन्होंने सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए सीखा था कि 'चक्रव्यूह' (विपक्षी को फंसाने के लिए युद्धों इस्तेमाल किया जाने वाला चक्र) में कैसे प्रवेश किया जाए, लेकिन इससे कैसे बाहर निकला जाए, यह नहीं परिणामस्वरूप, वह कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान निर्दयता से मारा गया, जब वह कौरव योद्धाओं के खिलाफ लड़ने के लिए 'चक्रव्यूह' में घुस गया।
महाभारत हमें सिखाता है कि वास्तविक जीवन में ज्ञान के अनुप्रयोग का अभ्यास करते समय व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए, संपूर्ण ज्ञान की तलाश करनी चाहिए और अपने संसाधनों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि आप कभी नहीं जानते कि वे कब विफल हो जाएंगे।👍31🔥2❤1
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अगर हमें अपना परिचय देना है,
तो सफलता एक बेहतर तरीका है।
अगर हमें अपना परिचय देना है,
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अभी नहीं
तो कल होगा ,,
प्रश्न है आज
तो कल हल होगा
मुश्किल है जो
वो सरल होगा,,
सख़्त है जो आज
वो कल मृदुल होगा
हारा है जो
वो सफ़ल होगा,,
थकी हुई सी
हकीकतों पर
ख्वाबों का असर होगा
✍️✍️
तो कल होगा ,,
प्रश्न है आज
तो कल हल होगा
मुश्किल है जो
वो सरल होगा,,
सख़्त है जो आज
वो कल मृदुल होगा
हारा है जो
वो सफ़ल होगा,,
थकी हुई सी
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ख्वाबों का असर होगा
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बढ़ती उम्र बढ़ती जिम्मेदारियां और भविष्य की चिंता। विपरीत परिस्थितियों के बोझ तले अपनों की चिंता। मन मै उपजे शौक मन मै रखकर खुद को संतुष्टि देता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
अपनों की ख्वाहिश पूरी करने कठिन परिश्रम करता। रिश्तेदारों पड़ोसियों की आलोचनाओं का पात्र बनता। मस्ती मजाक वाली उम्र मै जिम्मेदारियों का बोझ ढोता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
बचपन खेल खिलौनों की जगह मिट्टी मै गुजरता । किशोरावस्था मैं मस्ती की जगह मेहनत करता। जवानी भर अपनों के लिए धन दौलत कमाता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
लाख परेशानियों, मजबूरियों अथाह आर्थिक तंगी से झूझता। तमाम दुखों के बाबजूद छोटे से कार्यों मैं खुशी ढूंढ लेता। बिपरीत परिस्थितियों मैं भी चेहरे पर मुस्कान लिए फिरता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
पैसा कमाने के लिए माता पिता परिवार जनों से दूर रहता। कैसी भी हों मजबूरियाँ उनको जीवन का हिस्सा मान लेता। हर जगह पैसा कम खर्च करने का प्रयास वह करता रहता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता
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अपनों की ख्वाहिश पूरी करने कठिन परिश्रम करता। रिश्तेदारों पड़ोसियों की आलोचनाओं का पात्र बनता। मस्ती मजाक वाली उम्र मै जिम्मेदारियों का बोझ ढोता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
बचपन खेल खिलौनों की जगह मिट्टी मै गुजरता । किशोरावस्था मैं मस्ती की जगह मेहनत करता। जवानी भर अपनों के लिए धन दौलत कमाता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
लाख परेशानियों, मजबूरियों अथाह आर्थिक तंगी से झूझता। तमाम दुखों के बाबजूद छोटे से कार्यों मैं खुशी ढूंढ लेता। बिपरीत परिस्थितियों मैं भी चेहरे पर मुस्कान लिए फिरता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।
पैसा कमाने के लिए माता पिता परिवार जनों से दूर रहता। कैसी भी हों मजबूरियाँ उनको जीवन का हिस्सा मान लेता। हर जगह पैसा कम खर्च करने का प्रयास वह करता रहता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता
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छोटी सी एक कहानी
बाज लगभग 70 वर्ष जीता है,
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।
उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-
1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।
2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।
3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।
भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना
और भोजन खाना....
तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं।
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं,
या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...
या फिर
स्वयं को पुनर्स्थापित करे,
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।
बाज पीड़ा चुनता है
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।
वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है,
एकान्त में अपना घोंसला बनाता है,
और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..!
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये।
तब वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने की।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की।
नये चोंच और पंजे आने के बाद
वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।
150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...
और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी।
इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है,
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।
प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं,
चोंच सक्रियता की और
पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।
इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की,
सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की,
कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।
इच्छा, सक्रियता और कल्पना...
तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।
हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है,
अर्धजीवन में ही जीवन
समाप्तप्राय सा लगने लगता है,
उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा....
अधोगामी हो जाते हैं।
हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं-
कुछ सरल और त्वरित.!
कुछ पीड़ादायी...!!
हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे
अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा-
बाज के पंजों की तरह।
हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी-
"बाज की चोंच की तरह।"
हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी-
"बाज के पंखों की तरह।"
150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में।
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही,
बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे,
इस बार उड़ानें
और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी,
अनन्तगामी होंगी....!
जीत तक ज़ारी जंग
💐🙏
बाज लगभग 70 वर्ष जीता है,
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।
उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-
1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।
2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।
3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।
भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना
और भोजन खाना....
तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं।
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं,
या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...
या फिर
स्वयं को पुनर्स्थापित करे,
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।
बाज पीड़ा चुनता है
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।
वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है,
एकान्त में अपना घोंसला बनाता है,
और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..!
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये।
तब वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने की।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की।
नये चोंच और पंजे आने के बाद
वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।
150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...
और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी।
इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है,
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।
प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं,
चोंच सक्रियता की और
पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।
इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की,
सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की,
कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।
इच्छा, सक्रियता और कल्पना...
तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।
हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है,
अर्धजीवन में ही जीवन
समाप्तप्राय सा लगने लगता है,
उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा....
अधोगामी हो जाते हैं।
हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं-
कुछ सरल और त्वरित.!
कुछ पीड़ादायी...!!
हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे
अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा-
बाज के पंजों की तरह।
हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी-
"बाज की चोंच की तरह।"
हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी-
"बाज के पंखों की तरह।"
150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में।
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही,
बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे,
इस बार उड़ानें
और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी,
अनन्तगामी होंगी....!
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