UPSC Exam tips & motivational dose
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"आपके सपनों को हकीकत में बदलने का समय आ गया है।

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अभी नहीं
तो कल होगा ,,
प्रश्न है आज
तो कल हल होगा

मुश्किल है जो
वो सरल होगा,,
सख़्त है जो आज
वो कल मृदुल होगा

हारा है जो
वो सफ़ल होगा,,
थकी हुई सी
हकीकतों पर
ख्वाबों का असर होगा
✍️✍️
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बढ़ती उम्र बढ़ती जिम्मेदारियां और भविष्य की चिंता। विपरीत परिस्थितियों के बोझ तले अपनों की चिंता। मन मै उपजे शौक मन मै रखकर खुद को संतुष्टि देता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।

अपनों की ख्वाहिश पूरी करने कठिन परिश्रम करता। रिश्तेदारों पड़ोसियों की आलोचनाओं का पात्र बनता। मस्ती मजाक वाली उम्र मै जिम्मेदारियों का बोझ ढोता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।

बचपन खेल खिलौनों की जगह मिट्टी मै गुजरता । किशोरावस्था मैं मस्ती की जगह मेहनत करता। जवानी भर अपनों के लिए धन दौलत कमाता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।

लाख परेशानियों, मजबूरियों अथाह आर्थिक तंगी से झूझता। तमाम दुखों के बाबजूद छोटे से कार्यों मैं खुशी ढूंढ लेता। बिपरीत परिस्थितियों मैं भी चेहरे पर मुस्कान लिए फिरता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता।

पैसा कमाने के लिए माता पिता परिवार जनों से दूर रहता। कैसी भी हों मजबूरियाँ उनको जीवन का हिस्सा मान लेता। हर जगह पैसा कम खर्च करने का प्रयास वह करता रहता, हर मध्यमवर्गीय लड़का कुछ इस तरह जीवन जीता


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तुम मेहनत करों,

तेरी किस्मत में जो लिखा है वो भी बदलेगा


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छोटी सी एक कहानी

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है,
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।

उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-

1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।

2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।

3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना
और भोजन खाना....
तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं।

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं,
या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...
या फिर
स्वयं को पुनर्स्थापित करे,
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

बाज पीड़ा चुनता है
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।

वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है,
एकान्त में अपना घोंसला बनाता है,
और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।

सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..!
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये।
तब वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने की।

उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की।
नये चोंच और पंजे आने के बाद
वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।

150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...
और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी।

इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है,
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं,
चोंच सक्रियता की और
पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।

इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की,
सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की,
कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।

इच्छा, सक्रियता और कल्पना...
तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।

हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है,
अर्धजीवन में ही जीवन
समाप्तप्राय सा लगने लगता है,
उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा....
अधोगामी हो जाते हैं।

हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं-
कुछ सरल और त्वरित.!
कुछ पीड़ादायी...!!

हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे
अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा-
बाज के पंजों की तरह।

हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी-
"बाज की चोंच की तरह।"

हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी-
"बाज के पंखों की तरह।"

150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में।
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही,
बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे,
इस बार उड़ानें
और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी,
अनन्तगामी होंगी....!

जीत तक ज़ारी जंग
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घायाल तो यहा हर परिंदा है..
मगर
जो लढ सका वही जिंदा है..!

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श्री कृष्ण ने कहा है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि”
इसका अर्थ है कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही भक्ति है, इसलिए कर्म को पूरे मन से करना चाहिए.

भगवान से मर्जी से तो सबकुछ होता है लेकिन आपके कर्म ही डिसाइड करते है की भगवान की मर्जी आपके लिए क्या है इसलिए किसी भी बात के लिए भगवान को दोष मत देना अपने कर्म को देना

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पंडित जी ने हाथ देख कहा तेरे नसीब में सरकारी नौकरी नहीं, वो पहली बार में बन गया IAS अफसर💐💐
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पंडित की भविष्यवाणी सुन नवजीवन का दिल बैठ सा गया। उन्होंने पंडित जी की बातों पर भरोसा तो कर लिया लेकिन अपनी जीत की तैयारी जारी रखी।

✅ मुंबई. देश में आईएएस अफसर बनने का सपना तो बहुत से बच्चे देखते हैं। पर ये सपना साकार बहुत कम बच्चों का ही पूरा होता है। यूपीएससी को देश की सबसे मुश्‍किल और प्रतिष्‍ठित परीक्षा माना जाता है। इसी परीक्षा को पास करने का सपना महाराष्ट्र के एक छात्र नवजीवन पवार ने भी देखा था। वो एक ज्योतिष के पास गए तो उसने हाथ देखते ही बोल दिया तेरे नसीब में तो सरकारी नौकरी है ही नहीं।

पंडित की भविष्यवाणी सुन नवजीवन का दिल बैठ सा गया। उन्होंने पंडित जी की बातों पर भरोसा तो कर लिया लेकिन अपनी जीत की तैयारी जारी रखी। नवजीवन विजय पवार महाराष्ट्र से हैं। उनके पिता किसान और मां टीचर हैं। वे बचपन से ही पढ़ाई में अच्‍छे थे। उन्‍होंने स्‍कूली एजुकेशन पूरी करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी करने का ठान लिया।

🏆 दिल्‍ली में आकर शुरू की तैयारी

नवजीवन यूपीएससी की तैयारी करने के लिए दिल्‍ली आ गए। यहां आकर उन्‍होंने पढ़ाई शुरू कर दी, लेकिन यहां नवजीवन ने तैयारी के लिए किसी कोचिंग का सहारा नहीं लिया। वो सेल्फ स्टडी पर ज्यादा फोकस करते थे। यहां रहकर उन्‍होंने पढ़ाई शुरू की।

😢 मेन्‍स एग्‍जाम में हुआ डेंगू

नवजीवन ने एक इंटरव्‍यू में बताया, मेन्स एग्जाम के एक महीने पहले मुझे तेज बुखार और शरीर में दर्द होने लगा। अस्पताल गए तो पता चला मुझे डेंगू हो गया है। मैं घर गया तो तुरंत अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। अस्पताल में एक हाथ पर डॉक्टर इंजेक्शन लगा रहे थे और दूसरे हाथ में किताब थी।

✨ फिर शुरू की तैयारी

15 दिनों बाद जब नवजीवन को डेंगू से आराम मिला तो वापस लौटकर दिल्‍ली आए लेकिन अबकी बार वे काफी डिप्रेस हो चुके थे। वो काफी परेशान थे तब उनके दोस्‍त ने उन्‍हें हिम्‍मत बंधाई। फिर वो लगातार पढ़ाई करते रहे और एग्जाम दिए।

✅ पंडित की भविष्यवाणी झुठला दी
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.

जो मिल जाता हैं वो आम हो जाता हैं
खास वही हैं जो काश में हैं।।


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जब तैयारी हो लड़ने की,
स्वयं से आगे बढ़ने की,
रात्रि दिवस का भेद कहाँ तब,
बस हो,इच्छाशक्ति गढ़ने की...✍️
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यदी एक मनुष्य किसी कार्य को उठाये  तो उसको
उस कार्य को अंतिम लक्ष्य बना लेना चाहिए
तथा उस समय तक कार्य में लगे रहना  चाहिए
जब तक की वह उसको पूर्ण ना कर ले---

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प्रसन्न' वही है, जिसने 'अपना' मूल्यांकन किया

और 'परेशान' वही है, जिसने 'औरों' का मूल्यांकन किया...
!!


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मेरे बेटे
कभी इतने ऊंचे मत होना
कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे
तो उसे लगानी पड़े सीढियां

इतने धार्मिक मत होना
कि ईश्वर को बचाने के लिए
इंसान पर उठ जाय तुम्हारा हाथ

न कभी इतने देशभक्त
कि घायल को उठाने को
झंडा जमीन पर न रख सको।
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कितने सुन्दर होते हैं वो घर
जहां स्त्रियां काम से घर लौटती हैं
काम से काम पर नहीं


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श्रेष्ठ वही है जिसमें
दृढ़ता हो, जिद नहीं
बहादुरी हो, जल्दबाजी नहीं
दया हो, कमजोरी नहीं
ज्ञान हो, अहंकार नहीं
करूणा हो,प्रतिशोध नहीं
निर्णायकता हो, असमंजस नहीं !
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Sometimes we get hurt from caring too much. Sometimes we cry because we care too much. That’s the problem, you care too much. We wanted to not really care much about other people but we can’t. It’s just that we care for them because we love them. But in the end, you’ll just get hurt. It seems like caring is a bad act.
You’ll always put everyone before yourself. You’ve taken care of people before yourself. You always make people happy before yourself. You always start caring and worrying way too much about people’s lives and problems. And now you’ll end up being hurt again and again. You care so much that you don’t have time for yourself. Maybe it’s time to be fair of yourself. It’s time for yourself. You need to learn to stop caring too much.


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ग़ायब हो जाओ, सार्वजनिक जीवन में आना भूल जाओ, बस अकेले में अपना विकास करो।

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