प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २५९. क्या उपासना करने वाले व्यक्ति को ईश्वर वास्तव में दिखाई देता है ? उत्तर : दिखाई देता है अर्थात् उसको ईश्वर की अनुभूति होती है। जैसा ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, आनन्द स्वरूप, न्यायकारी, सर्वव्यापक आदि गुणों वाला है वैसा ही उसे अनुभव में आता है।…
प्र. २६०. ईश्वर अपने उपासकों की रक्षा कैसे करता है ? उसकी रक्षा करने का तरीका, विधि, ढंग क्या है ?
उत्तर : ईश्वर अपने उपासक को आपत्ति, कठिनाई, विरोध , बाधा आदि प्रतिकूलता उपस्थित होने पर उत्साह, बल, ज्ञान, पराक्रम, धैर्य, सहनशक्ति आदि गुणों को प्रदान करके समस्याओं से दुःखी होने से बचाता है। यही उसकी रक्षा है।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर अपने उपासक को आपत्ति, कठिनाई, विरोध , बाधा आदि प्रतिकूलता उपस्थित होने पर उत्साह, बल, ज्ञान, पराक्रम, धैर्य, सहनशक्ति आदि गुणों को प्रदान करके समस्याओं से दुःखी होने से बचाता है। यही उसकी रक्षा है।
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प्र. २६०. ईश्वर अपने उपासकों की रक्षा कैसे करता है ? उसकी रक्षा करने का तरीका, विधि, ढंग क्या है ? उत्तर : ईश्वर अपने उपासक को आपत्ति, कठिनाई, विरोध , बाधा आदि प्रतिकूलता उपस्थित होने पर उत्साह, बल, ज्ञान, पराक्रम, धैर्य, सहनशक्ति आदि गुणों को प्रदान करके…
प्र. २६१. क्या ईश्वर अपनी ही इच्छा से किसी व्यक्ति विशेष को धन, बल, प्रतिष्ठा, सम्मान, सफलता, सुख देता है ?
उत्तर : ईश्वर अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति विशेष को धन, बल, प्रतिष्ठा, सम्मान, सफलता, सुख नहीं देता है। ऐसा करे तो वह अन्यायकारी हो जाये ।
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प्र. २६१. क्या ईश्वर अपनी ही इच्छा से किसी व्यक्ति विशेष को धन, बल, प्रतिष्ठा, सम्मान, सफलता, सुख देता है ? उत्तर : ईश्वर अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति विशेष को धन, बल, प्रतिष्ठा, सम्मान, सफलता, सुख नहीं देता है। ऐसा करे तो वह अन्यायकारी हो जाये । @vaidic_gyan
प्र. २६२. किसी व्यक्ति ने ईश्वर का प्रत्यक्ष किया है, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है ?
उत्तर : जो व्यक्ति ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करता है, उसके जीवन, वाणी, व्यवहार में आनंद, शांति, निर्भयता, सत्य, परोपकारिता, निष्पक्षता, निःस्वार्थता आदि दैवीय गुण दिखाई देते हैं। वह दुखी, चिंतित, क्रोधित, द्वेषपूर्ण, पक्षपाती नहीं होता है।
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प्र. २६२. किसी व्यक्ति ने ईश्वर का प्रत्यक्ष किया है, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है ? उत्तर : जो व्यक्ति ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करता है, उसके जीवन, वाणी, व्यवहार में आनंद, शांति, निर्भयता, सत्य, परोपकारिता, निष्पक्षता, निःस्वार्थता आदि दैवीय गुण दिखाई…
प्र. २६३. क्या ईश्वर अपने भक्तों उपासकों से बातचीत भी करता है ? शंका-समाधान करता है ? निर्देश भी करता है ? प्रेरणा देता है ?
उत्तर : हाँ, ईश्वर समाधि अवस्था में अपने उपासकों से बातचीत भी करता है तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करता है।
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उत्तर : हाँ, ईश्वर समाधि अवस्था में अपने उपासकों से बातचीत भी करता है तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करता है।
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प्र. २६३. क्या ईश्वर अपने भक्तों उपासकों से बातचीत भी करता है ? शंका-समाधान करता है ? निर्देश भी करता है ? प्रेरणा देता है ? उत्तर : हाँ, ईश्वर समाधि अवस्था में अपने उपासकों से बातचीत भी करता है तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करता है। @vaidic_gyan
प्र. २६४. क्या ईश्वर मकान, रोटी आदि बना सकते हैं ?
उत्तर : हाँ, परन्तु ईश्वर ने वस्तुओं के निर्माण की सीमा निर्धारित कर रखी है इसलिए वह इन पदार्थों को नहीं बनाते। ये कार्य जीवों के कर्मों की सीमा के अन्तर्गत आते हैं ।
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उत्तर : हाँ, परन्तु ईश्वर ने वस्तुओं के निर्माण की सीमा निर्धारित कर रखी है इसलिए वह इन पदार्थों को नहीं बनाते। ये कार्य जीवों के कर्मों की सीमा के अन्तर्गत आते हैं ।
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प्र. २६४. क्या ईश्वर मकान, रोटी आदि बना सकते हैं ? उत्तर : हाँ, परन्तु ईश्वर ने वस्तुओं के निर्माण की सीमा निर्धारित कर रखी है इसलिए वह इन पदार्थों को नहीं बनाते। ये कार्य जीवों के कर्मों की सीमा के अन्तर्गत आते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २६५. जब ईश्वर अनन्त है, उसे पूरा तो हम जान ही नहीं सकते, तो उसे जानने का प्रयत्न ही क्यों करें ?
उत्तर : जैसे नदी का पूरा पानी हम नहीं पी सकते फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा सा पानी हम नदी से लेकर पी लेते हैं। ठीक ऐसे ही ईश्वर को जितना जानने से मोक्ष हो जाए उतना तो अवश्य ही जानना चाहिए ।
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उत्तर : जैसे नदी का पूरा पानी हम नहीं पी सकते फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा सा पानी हम नदी से लेकर पी लेते हैं। ठीक ऐसे ही ईश्वर को जितना जानने से मोक्ष हो जाए उतना तो अवश्य ही जानना चाहिए ।
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प्र. २६५. जब ईश्वर अनन्त है, उसे पूरा तो हम जान ही नहीं सकते, तो उसे जानने का प्रयत्न ही क्यों करें ? उत्तर : जैसे नदी का पूरा पानी हम नहीं पी सकते फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा सा पानी हम नदी से लेकर पी लेते हैं। ठीक ऐसे ही ईश्वर को जितना जानने से मोक्ष…
प्र. २६६. ईश्वर दयालु कैसे है ?
उत्तर : दयालु का अर्थ है दया के स्वभाव वाला। दया का अर्थ है दूसरे के हित, उन्नति, कल्याण और सुख चाहना । ईश्वर की सबसे बड़ी दया यह है कि उसने जीवों की उन्नति, सुख के लिए सृष्टि के उत्तम पदार्थ बनाकर दान में दे रखे हैं। ईश्वर की दया का एक स्वरुप यह भी है कि वह सहायता चाहने वाले पुरुषार्थी मनुष्य की सहायता करता है।
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उत्तर : दयालु का अर्थ है दया के स्वभाव वाला। दया का अर्थ है दूसरे के हित, उन्नति, कल्याण और सुख चाहना । ईश्वर की सबसे बड़ी दया यह है कि उसने जीवों की उन्नति, सुख के लिए सृष्टि के उत्तम पदार्थ बनाकर दान में दे रखे हैं। ईश्वर की दया का एक स्वरुप यह भी है कि वह सहायता चाहने वाले पुरुषार्थी मनुष्य की सहायता करता है।
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प्र. २६६. ईश्वर दयालु कैसे है ? उत्तर : दयालु का अर्थ है दया के स्वभाव वाला। दया का अर्थ है दूसरे के हित, उन्नति, कल्याण और सुख चाहना । ईश्वर की सबसे बड़ी दया यह है कि उसने जीवों की उन्नति, सुख के लिए सृष्टि के उत्तम पदार्थ बनाकर दान में दे रखे हैं। ईश्वर…
प्र. २६७. क्या ईश्वर को उसके कर्मों का फल मिलता है ?
उत्तर : जी हाँ, ईश्वर के कर्मों का फल यही है कि उसके कार्य पूर्ण हो जाते हैं, अटकते नहीं ।
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उत्तर : जी हाँ, ईश्वर के कर्मों का फल यही है कि उसके कार्य पूर्ण हो जाते हैं, अटकते नहीं ।
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