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प्र. १६२. निष्काम कर्म और अकर्मण्यता में क्या भेद है ? उत्तर : दोनों में भेद यह है कि निष्काम कर्म सबसे श्रेष्ठ उत्तमकर्म है जिसके करने से व्यक्ति योगी, ऋषि-महर्षि बनकर अन्त में ईश्वर को प्राप्त कर समस्त दुःखों से छूट जाता है जबकि अकर्मण्यता निकृष्ट स्थिति…
प्र. १६३. मनुष्य शरीर से कितने और कौन कौन से शुभ (अच्छे) कर्म करता है ?
उत्तर : मुख्य रूप से मनुष्य शरीर से तीन प्रकार के अच्छे कर्म करता है :
(१) रक्षा करना,
(२) दान देना,
(३) सेवा करना ।
@vaidic_gyan
उत्तर : मुख्य रूप से मनुष्य शरीर से तीन प्रकार के अच्छे कर्म करता है :
(१) रक्षा करना,
(२) दान देना,
(३) सेवा करना ।
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प्र. १६३. मनुष्य शरीर से कितने और कौन कौन से शुभ (अच्छे) कर्म करता है ? उत्तर : मुख्य रूप से मनुष्य शरीर से तीन प्रकार के अच्छे कर्म करता है : (१) रक्षा करना, (२) दान देना, (३) सेवा करना । @vaidic_gyan
प्र. १६४. वाणी से किये जाने वाले शुभ (अच्छे) कर्म कितने व कौन कौन से हैं ?
उत्तर : वाणी से किये जाने वाले शुभ कर्म शास्त्र में चार प्रकार के बताये गये हैं :
(१) सत्य बोलना,
(२) मधुर (= मीठा) बोलना,
(३) हितकर बोलना,
(४) स्वाध्याय करना ।
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उत्तर : वाणी से किये जाने वाले शुभ कर्म शास्त्र में चार प्रकार के बताये गये हैं :
(१) सत्य बोलना,
(२) मधुर (= मीठा) बोलना,
(३) हितकर बोलना,
(४) स्वाध्याय करना ।
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प्र. १६४. वाणी से किये जाने वाले शुभ (अच्छे) कर्म कितने व कौन कौन से हैं ? उत्तर : वाणी से किये जाने वाले शुभ कर्म शास्त्र में चार प्रकार के बताये गये हैं : (१) सत्य बोलना, (२) मधुर (= मीठा) बोलना, (३) हितकर बोलना, (४) स्वाध्याय करना । @vaidic_gyan
प्र. १६५. मन से जो अच्छे कर्म किये जाते हैं, वे कितने व कौन कौन से हैं ?
उत्तर : मन से तीन प्रकार के अच्छे कर्म किये जाते हैं:
(१) दया,
(२) अस्पृहा,
(३) आस्तिकता ।
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उत्तर : मन से तीन प्रकार के अच्छे कर्म किये जाते हैं:
(१) दया,
(२) अस्पृहा,
(३) आस्तिकता ।
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11.8.2024
भोजन जितनी मात्रा में खाया जाता है, औषधि उतनी मात्रा में नहीं खाई जाती। *"थोड़ी सी मात्रा में खाई गई औषधि भी, बड़े-बड़े शारीरिक रोगों का निवारण करने में समर्थ होती है। इसलिए औषधि बहुत थोड़ी मात्रा में खाई जाती है।"*
*"जैसे शारीरिक रोगों की चिकित्सा में भौतिक औषधि का प्रभाव होता है, ऐसे ही मानसिक रोगों की चिकित्सा में ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना का प्रभाव होता है।"* ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भी औषधि के समान ही कार्य करती है।
*"जैसे बड़े बड़े शारीरिक रोगों को दूर करने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में भौतिक औषधि का सेवन किया जाता है। ऐसे ही काम क्रोध लोभ ईर्ष्या द्वेष अभिमान इत्यादि बड़े-बड़े मानसिक रोगों की चिकित्सा करने में, ईश्वर की थोड़ी सी स्तुति प्रार्थना उपासना भी, इन बड़े-बड़े मानसिक रोगों को नष्ट कर देती है।"*
*"अतः यदि आप शारीरिक रूप से रोगी हो जाएं, तो भौतिक औषधियों का सेवन करें। यदि मानसिक रूप से रोगी हो जाएं, तो ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना रूपी औषधि का सेवन करें। आपके सब मानसिक रोगों/दुखों की चिकित्सा बहुत ही शीघ्र हो जाएगी।"*
*"शारीरिक रूप से तो व्यक्ति कभी कभी रोगी होता है, इसलिए उसकी भौतिक औषधि भी कभी-कभी खानी पड़ती है।" "परंतु काम क्रोध लोभ ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि मानसिक रोगों या दुखों से तो व्यक्ति प्रतिदिन पीड़ित रहता है। इसलिए इसकी चिकित्सा के रूप में ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भी प्रतिदिन ही करनी चाहिए। सुबह और शाम प्रतिदिन दोनों समय करनी चाहिए। तभी आप इन मानसिक दुखों से बचकर आनंदपूर्वक जीवन जी सकेंगे।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
भोजन जितनी मात्रा में खाया जाता है, औषधि उतनी मात्रा में नहीं खाई जाती। *"थोड़ी सी मात्रा में खाई गई औषधि भी, बड़े-बड़े शारीरिक रोगों का निवारण करने में समर्थ होती है। इसलिए औषधि बहुत थोड़ी मात्रा में खाई जाती है।"*
*"जैसे शारीरिक रोगों की चिकित्सा में भौतिक औषधि का प्रभाव होता है, ऐसे ही मानसिक रोगों की चिकित्सा में ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना का प्रभाव होता है।"* ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भी औषधि के समान ही कार्य करती है।
*"जैसे बड़े बड़े शारीरिक रोगों को दूर करने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में भौतिक औषधि का सेवन किया जाता है। ऐसे ही काम क्रोध लोभ ईर्ष्या द्वेष अभिमान इत्यादि बड़े-बड़े मानसिक रोगों की चिकित्सा करने में, ईश्वर की थोड़ी सी स्तुति प्रार्थना उपासना भी, इन बड़े-बड़े मानसिक रोगों को नष्ट कर देती है।"*
*"अतः यदि आप शारीरिक रूप से रोगी हो जाएं, तो भौतिक औषधियों का सेवन करें। यदि मानसिक रूप से रोगी हो जाएं, तो ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना रूपी औषधि का सेवन करें। आपके सब मानसिक रोगों/दुखों की चिकित्सा बहुत ही शीघ्र हो जाएगी।"*
*"शारीरिक रूप से तो व्यक्ति कभी कभी रोगी होता है, इसलिए उसकी भौतिक औषधि भी कभी-कभी खानी पड़ती है।" "परंतु काम क्रोध लोभ ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि मानसिक रोगों या दुखों से तो व्यक्ति प्रतिदिन पीड़ित रहता है। इसलिए इसकी चिकित्सा के रूप में ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भी प्रतिदिन ही करनी चाहिए। सुबह और शाम प्रतिदिन दोनों समय करनी चाहिए। तभी आप इन मानसिक दुखों से बचकर आनंदपूर्वक जीवन जी सकेंगे।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
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प्र. १६५. मन से जो अच्छे कर्म किये जाते हैं, वे कितने व कौन कौन से हैं ? उत्तर : मन से तीन प्रकार के अच्छे कर्म किये जाते हैं: (१) दया, (२) अस्पृहा, (३) आस्तिकता । @vaidic_gyan
प्र. १६६. मनुष्य शरीर से बुरे कर्म भी करता है। वे कितने और कौन कौन से हैं ?
उत्तर : मनुष्य शरीर से मुख्य रूप से तीन प्रकार के बुरे कर्म करता है :
(१) हिंसा करना,
(२) चोरी करना,
(३) व्यभिचार करना ।
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उत्तर : मनुष्य शरीर से मुख्य रूप से तीन प्रकार के बुरे कर्म करता है :
(१) हिंसा करना,
(२) चोरी करना,
(३) व्यभिचार करना ।
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प्र. १६६. मनुष्य शरीर से बुरे कर्म भी करता है। वे कितने और कौन कौन से हैं ? उत्तर : मनुष्य शरीर से मुख्य रूप से तीन प्रकार के बुरे कर्म करता है : (१) हिंसा करना, (२) चोरी करना, (३) व्यभिचार करना । @vaidic_gyan
प्र. १६७. मनुष्य वाणी से जो अशुभ कर्म करता है। उनकी संख्या शास्त्र में कितनी बताई गई और वे कौन कौन से हैं ?
उत्तर : मनुष्य वाणी से जो अशुभ कर्म करता है, उनकी संख्या शास्त्रानुसार चार हैं -
(१) असत्य (झूठ) बोलना,
(२) कठोर बोलना,
(३) अहितकर बोलना,
(४) व्यर्थ बोलना (असंगत = प्रसंग के बाहर बोलना) ।
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उत्तर : मनुष्य वाणी से जो अशुभ कर्म करता है, उनकी संख्या शास्त्रानुसार चार हैं -
(१) असत्य (झूठ) बोलना,
(२) कठोर बोलना,
(३) अहितकर बोलना,
(४) व्यर्थ बोलना (असंगत = प्रसंग के बाहर बोलना) ।
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