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प्र. १९८. मनुष्य सुखी कैसे होता है ? उत्तर : विद्या, बुद्धि व ज्ञान प्राप्त करने , अच्छे कर्म करने और ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य सुखी होता है । @vaidic_gyan
प्र. १९९. क्या मांस या अण्डा खाने वाले को पाप लगेगा ?
उत्तर : हाँ, मांस हो या अण्डा हो, दोनों के खानेवाले को पाप लगेगा। क्योकि इससे प्राणियों की हिंसा होती है। शास्त्र में भी इसका निषेध किया है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : हाँ, मांस हो या अण्डा हो, दोनों के खानेवाले को पाप लगेगा। क्योकि इससे प्राणियों की हिंसा होती है। शास्त्र में भी इसका निषेध किया है ।
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प्र. १९९. क्या मांस या अण्डा खाने वाले को पाप लगेगा ? उत्तर : हाँ, मांस हो या अण्डा हो, दोनों के खानेवाले को पाप लगेगा। क्योकि इससे प्राणियों की हिंसा होती है। शास्त्र में भी इसका निषेध किया है । @vaidic_gyan
प्र. २००. व्यक्ति को किसी भी श्रेष्ठ कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर : किसी भी श्रेष्ठ कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए छः चीजों की आवश्यकता है, व्यक्ति को उनका संग्रह और उपयोग करना चाहिए। वे छः चीजें इस प्रकार हैं-
(१) संस्कार,
(२) तीव्र इच्छा,
(३) पर्याप्त साधनों की उपलब्धि,
(४) साधनों को प्रयोग करने की सही विधि,
(५) परम पुरुषार्थ,
(६) घोर तपस्या ।
@vaidic_gyan
उत्तर : किसी भी श्रेष्ठ कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए छः चीजों की आवश्यकता है, व्यक्ति को उनका संग्रह और उपयोग करना चाहिए। वे छः चीजें इस प्रकार हैं-
(१) संस्कार,
(२) तीव्र इच्छा,
(३) पर्याप्त साधनों की उपलब्धि,
(४) साधनों को प्रयोग करने की सही विधि,
(५) परम पुरुषार्थ,
(६) घोर तपस्या ।
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प्र. २००. व्यक्ति को किसी भी श्रेष्ठ कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ? उत्तर : किसी भी श्रेष्ठ कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए छः चीजों की आवश्यकता है, व्यक्ति को उनका संग्रह और उपयोग करना चाहिए। वे छः चीजें इस प्रकार हैं- (१) संस्कार…
प्र. २०१. सबसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म कौन सा है और उसका फल क्या है ?
उत्तर : बिना किसी लौकिक फल सुख की कामना के दूसरों का उपकार अर्थात् निष्काम कर्म सबसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म है। और उसका फल है जीते जी विशुद्ध ईश्वरीय सुख को भोगना तथा मृत्यु के बाद ३६ हजार बार सृष्टि के बनने और बिगड़ने तक पुनः जन्म न लेना, केवल आनन्द ही आनन्द भोगते रहना, दुःख का लेशमात्र भी स्पर्श न होना । इस मोक्ष फल में शुद्ध ज्ञान व शुद्ध उपासना भी कारण है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : बिना किसी लौकिक फल सुख की कामना के दूसरों का उपकार अर्थात् निष्काम कर्म सबसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म है। और उसका फल है जीते जी विशुद्ध ईश्वरीय सुख को भोगना तथा मृत्यु के बाद ३६ हजार बार सृष्टि के बनने और बिगड़ने तक पुनः जन्म न लेना, केवल आनन्द ही आनन्द भोगते रहना, दुःख का लेशमात्र भी स्पर्श न होना । इस मोक्ष फल में शुद्ध ज्ञान व शुद्ध उपासना भी कारण है ।
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Forwarded from सत्यार्थ प्रकाश 🚩
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*कामनाओं को पूरा करने से वे बढ़ती जाती है जैसे अग्नि में घी डालने से अग्नि बढ़ती है:-*
*न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।*
*हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते।।*
*अर्थ:- यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में इन्धन और घी डालने से बढ़ता जाता है वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त कभी नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है। इसलिये मनुष्य को विषयासक्त कभी न होना चाहिए।*
*-(सत्यार्थप्रकाश दशमसमुल्लास)*
*कामनाओं को पूरा करने से वे बढ़ती जाती है जैसे अग्नि में घी डालने से अग्नि बढ़ती है:-*
*न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।*
*हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते।।*
*अर्थ:- यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में इन्धन और घी डालने से बढ़ता जाता है वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त कभी नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है। इसलिये मनुष्य को विषयासक्त कभी न होना चाहिए।*
*-(सत्यार्थप्रकाश दशमसमुल्लास)*
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प्र. २०१. सबसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म कौन सा है और उसका फल क्या है ? उत्तर : बिना किसी लौकिक फल सुख की कामना के दूसरों का उपकार अर्थात् निष्काम कर्म सबसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म है। और उसका फल है जीते जी विशुद्ध ईश्वरीय सुख को भोगना तथा मृत्यु के बाद ३६ हजार बार…
प्र. २०२. ईश्वर किसे कहते है ?
उत्तर : एक ऐसी वस्तु जो सब जगह विद्यमान है, चेतन है, निराकार है, अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, न्याय, दया आदि गुण से युक्त है उसका नाम ईश्वर है ।
@vaidic_gyan
उत्तर : एक ऐसी वस्तु जो सब जगह विद्यमान है, चेतन है, निराकार है, अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, न्याय, दया आदि गुण से युक्त है उसका नाम ईश्वर है ।
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प्र. २०२. ईश्वर किसे कहते है ? उत्तर : एक ऐसी वस्तु जो सब जगह विद्यमान है, चेतन है, निराकार है, अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, न्याय, दया आदि गुण से युक्त है उसका नाम ईश्वर है । @vaidic_gyan
प्र. २०३. ईश्वर का कोई रूप, रंग, भार, आकार, आदि है या नहीं ?
उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं ।
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प्र. २०३. ईश्वर का कोई रूप, रंग, भार, आकार, आदि है या नहीं ? उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २०४. संसार को ईश्वर बनाता है या जीव बनाते हैं या अपने आप बन जाता है।
उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती ।
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Forwarded from 𝗧𝗵𝗲 𝗩𝗲𝗱𝗶𝗰 𝗳𝗶𝗹𝗲𝘀 (࿗ 𝙠𝙖𝙧𝙩𝙞𝙠𝙚𝙮𝙖 ࿗)
धर्मशिक्षा series प्रारंभ हो चुकी है!!
जिसमें धर्म, आर्ष ग्रंथों, सदाचार, यम नियम, वर्ण आश्रम, पंचमहायज्ञ, विद्यार्थियों के गुण दोष आदि के बारे में बताया जाएगा।
सभी posts का लिंक 👇
Post 1 - आर्ष ग्रंथ
Post 2
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Post 4
Post 5
Post 6
Post 7
To be continued...
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जिसमें धर्म, आर्ष ग्रंथों, सदाचार, यम नियम, वर्ण आश्रम, पंचमहायज्ञ, विद्यार्थियों के गुण दोष आदि के बारे में बताया जाएगा।
नियमित एक पोस्ट 5:55 शाम को पोस्ट कर दी जाती है।
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प्र. २०४. संसार को ईश्वर बनाता है या जीव बनाते हैं या अपने आप बन जाता है। उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती । @vaidic_gyan
प्र. २०५. ईश्वर से हमारे क्या क्या सम्बन्ध हैं ?
उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं।
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