प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २०२. ईश्वर किसे कहते है ? उत्तर : एक ऐसी वस्तु जो सब जगह विद्यमान है, चेतन है, निराकार है, अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, न्याय, दया आदि गुण से युक्त है उसका नाम ईश्वर है । @vaidic_gyan
प्र. २०३. ईश्वर का कोई रूप, रंग, भार, आकार, आदि है या नहीं ?
उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं ।
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प्र. २०३. ईश्वर का कोई रूप, रंग, भार, आकार, आदि है या नहीं ? उत्तर : ईश्वर में ये गुण नहीं होते। इसी कारण ईश्वर को निर्गुण भी कहते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २०४. संसार को ईश्वर बनाता है या जीव बनाते हैं या अपने आप बन जाता है।
उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती ।
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Forwarded from 𝗧𝗵𝗲 𝗩𝗲𝗱𝗶𝗰 𝗳𝗶𝗹𝗲𝘀 (࿗ 𝙠𝙖𝙧𝙩𝙞𝙠𝙚𝙮𝙖 ࿗)
धर्मशिक्षा series प्रारंभ हो चुकी है!!
जिसमें धर्म, आर्ष ग्रंथों, सदाचार, यम नियम, वर्ण आश्रम, पंचमहायज्ञ, विद्यार्थियों के गुण दोष आदि के बारे में बताया जाएगा।
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Post 1 - आर्ष ग्रंथ
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To be continued...
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जिसमें धर्म, आर्ष ग्रंथों, सदाचार, यम नियम, वर्ण आश्रम, पंचमहायज्ञ, विद्यार्थियों के गुण दोष आदि के बारे में बताया जाएगा।
नियमित एक पोस्ट 5:55 शाम को पोस्ट कर दी जाती है।
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प्र. २०४. संसार को ईश्वर बनाता है या जीव बनाते हैं या अपने आप बन जाता है। उत्तर : ईश्वर बनाता है। जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है कि वे संसार को बना सकें। प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती । @vaidic_gyan
प्र. २०५. ईश्वर से हमारे क्या क्या सम्बन्ध हैं ?
उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं।
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प्र. २०५. ईश्वर से हमारे क्या क्या सम्बन्ध हैं ? उत्तर : ईश्वर हमारा माता, पिता, गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है। और हम उसके पुत्र, शिष्य, प्रजा, सेवक, उपासक आदि हैं। @vaidic_gyan
प्र. २०६. ईश्वर जीवों से क्या चाहता है ?
उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें ।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें ।
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प्र. २०६. ईश्वर जीवों से क्या चाहता है ? उत्तर : ईश्वर चाहता है कि जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें । @vaidic_gyan
प्र. २०७. ईश्वर की आज्ञा क्या है, यह कैसे पता चलता है ?
उत्तर : वेदों के पढ़ने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं ।
@vaidic_gyan
उत्तर : वेदों के पढ़ने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं ।
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प्र. २०७. ईश्वर की आज्ञा क्या है, यह कैसे पता चलता है ? उत्तर : वेदों के पढ़ने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २०८. ईश्वर और आत्मा में क्या समानता है ?
उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं।
@vaidic_gyan
उत्तर : ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं।
@vaidic_gyan
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Forwarded from ब्रह्मचर्य
[सतीत्व की रक्षा के साधन]:-
स्त्री लोगों के छः दूषण हैं। उनको स्त्री लोग छोड़ दें -
यह भगवान मनु का श्लोक है। इसका यह अभिप्राय है कि (पानं) मद्य और भंगादि का नशा करना, (दुर्जनसंसर्गः) दुष्ट पुरुषों का संग होना, (पत्या विरह) पति और स्त्री का वियोग, अर्थात् स्त्री अन्य देश में और पुरुष अन्य देश में रहे, (अटन) पति को छोड़कर जहाॅं-तहाॅं स्त्री भ्रमण करे ,जैसे कि नाना प्रकार के मन्दिरों में तथा तीर्थों में स्नान के वास्ते और बहुत से पाखण्डियों के दर्शन के वास्ते स्त्री का भ्रमण करना, (स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च) अत्यन्त निद्रा, अन्य के घर में स्त्री का सोना, अन्य के घर में पति के बिना वास करे और अन्य पुरुषों के संग का होना यह अत्यन्त दूषण स्त्रियों के भ्रष्ट होने के कारण हैं, इन छः कर्मों ही से स्त्री अवश्य भ्रष्ट हो जाएगी इसमें कुछ सन्देह नहीं।
और पुरुषों के वास्ते भी ऐसे बहुत दूषण हैं:-
माता, (स्वसा) भगिनी और (दुहिता) कन्या, इनके साथ भी एकान्त में निवास कभी न करे और अत्यन्त संभाषण भी न करे और नेत्र से उनका स्वरूप और चेष्टा न देखे; जो कुछ उनसे कहना वा सुनना होय सो नीचे दृष्टि करके कहे वा सुने। इससे क्या आया कि जितनी व्यभिचारिणी स्त्री वा वेश्या और जितने वेश्यागामी और परस्त्रीगामी पुरुष हैं उनमें प्रीति वा संभाषण अथवा उनका संग कभी न करे। इस प्रकार के दूषणों से ही पुरुष भ्रष्ट हो जाता है क्योंकि ये जो इन्द्रियग्राम अर्थात् मन और इन्द्रियाॅं हैं ये बड़े प्रबल हैं। जो कोई विद्वान् अथवा जितेन्द्रिय वा योगी हैं वे भी इस प्रकार के संगों से भ्रष्ट हो जाते हैं, तो साधारण जो गृहस्थ हैं वे तो अवश्य ही भ्रष्ट हो जाऍंगे।
इस वास्ते स्त्री व पुरुष सदा इन दुष्ट संगों से बचे रहें।
स्त्री लोगों के छः दूषण हैं। उनको स्त्री लोग छोड़ दें -
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट्।।
मनु० ९|१३
यह भगवान मनु का श्लोक है। इसका यह अभिप्राय है कि (पानं) मद्य और भंगादि का नशा करना, (दुर्जनसंसर्गः) दुष्ट पुरुषों का संग होना, (पत्या विरह) पति और स्त्री का वियोग, अर्थात् स्त्री अन्य देश में और पुरुष अन्य देश में रहे, (अटन) पति को छोड़कर जहाॅं-तहाॅं स्त्री भ्रमण करे ,जैसे कि नाना प्रकार के मन्दिरों में तथा तीर्थों में स्नान के वास्ते और बहुत से पाखण्डियों के दर्शन के वास्ते स्त्री का भ्रमण करना, (स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च) अत्यन्त निद्रा, अन्य के घर में स्त्री का सोना, अन्य के घर में पति के बिना वास करे और अन्य पुरुषों के संग का होना यह अत्यन्त दूषण स्त्रियों के भ्रष्ट होने के कारण हैं, इन छः कर्मों ही से स्त्री अवश्य भ्रष्ट हो जाएगी इसमें कुछ सन्देह नहीं।
और पुरुषों के वास्ते भी ऐसे बहुत दूषण हैं:-
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामों विद्वांसमपि कर्षति।।
मनु० २|२१५
माता, (स्वसा) भगिनी और (दुहिता) कन्या, इनके साथ भी एकान्त में निवास कभी न करे और अत्यन्त संभाषण भी न करे और नेत्र से उनका स्वरूप और चेष्टा न देखे; जो कुछ उनसे कहना वा सुनना होय सो नीचे दृष्टि करके कहे वा सुने। इससे क्या आया कि जितनी व्यभिचारिणी स्त्री वा वेश्या और जितने वेश्यागामी और परस्त्रीगामी पुरुष हैं उनमें प्रीति वा संभाषण अथवा उनका संग कभी न करे। इस प्रकार के दूषणों से ही पुरुष भ्रष्ट हो जाता है क्योंकि ये जो इन्द्रियग्राम अर्थात् मन और इन्द्रियाॅं हैं ये बड़े प्रबल हैं। जो कोई विद्वान् अथवा जितेन्द्रिय वा योगी हैं वे भी इस प्रकार के संगों से भ्रष्ट हो जाते हैं, तो साधारण जो गृहस्थ हैं वे तो अवश्य ही भ्रष्ट हो जाऍंगे।
इस वास्ते स्त्री व पुरुष सदा इन दुष्ट संगों से बचे रहें।
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