प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
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सादर नमस्ते जी 🙏🏻 🙏🏻 🚩🚩
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २४४. ईश्वर कर्मों का फल तत्काल क्यों नहीं देता ? बाद में देरी से देवे तो मनुष्यों के मन में कर्मफल के विषय में शंका/अनास्था/अश्रद्धा/अविश्वास उत्पन्न होते हैं ? उत्तर : ईश्वर अपने नियमानुसार समय पर ही कर्मों का फल देता है, पूर्व नहीं, जैसे कि फल, फूल…
प्र. २४५. ईश्वर की उपासना करने वाले आस्तिक व्यक्ति संसार में दुःखी दीन, हीन, निर्बल, निर्धन, पराधीन देखे जाते हैं, जबकि नास्तिक व्यक्ति सुखी, सम्पन्न, बलवान, स्वतंत्र देखे जाते हैं, ऐसा क्यों ?

उत्तर : ईश्वर की उपासना के साथ साथ आस्तिक व्यक्तियों को धन, बल, ज्ञान, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए संकल्प, पुरुषार्थ, तपस्या भी करनी चाहिए, जो ऐसा नहीं करते हैं वे आस्तिक दुःखी होते हैं, अन्य नहीं ।

@vaidic_gyan
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प्र. २४५. ईश्वर की उपासना करने वाले आस्तिक व्यक्ति संसार में दुःखी दीन, हीन, निर्बल, निर्धन, पराधीन देखे जाते हैं, जबकि नास्तिक व्यक्ति सुखी, सम्पन्न, बलवान, स्वतंत्र देखे जाते हैं, ऐसा क्यों ? उत्तर : ईश्वर की उपासना के साथ साथ आस्तिक व्यक्तियों को धन, बल…
प्र. २४६. ईश्वर चेतन है तो ईंट, पत्थर, सोना, चांदी आदि जड़ पदार्थों में चेतनता (चलना, फिरना, हिलना, डुलना, इच्छा, प्रयत्न) आदि क्यों नहीं देखे जाते हैं ?

उत्तर : ईंट पत्थर आदि जड़ पदार्थों में चेतन ईश्वर रहता है किन्तु ईंट, पत्थर आदि में जीवात्मा न होने से वे चलते फिरते नहीं हैं, ईश्वर अपनी चेतनता को अपने अधिकार में रखता है इसलिए जड़ पदार्थों में चलना फिरना आदि गति नहीं होती है।

@vaidic_gyan
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प्र. २४७. ईश्वर स्वयं न हिलता हुआ अन्यों (संसार के पदार्थों को) कैसे हिलाता है ? उत्तर : ईश्वर में चुम्बकीय सी शक्ति है, इसी शक्ति से वह स्वयं न हिलता हुआ संसार के जड़ पदार्थों को हिला देता है। @vaidic_gyan
प्र. २४८. क्या ईश्वर संसार में किसी स्थान विशेष में, किसी काल विशेष में, किसी समुदाय विशेष में, किसी जीव विशेष को उनका कल्याण करने के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए भेजता है ?

उत्तर : नहीं, ईश्वर किसी स्थान, काल, समुदाय विशेष में किसी जीव विशेष को नहीं भेजता है। ऐसा करे तो वह सर्वहितकारी नहीं रहेगा, पक्षपाती, अन्यायकारी बन जायेगा सर्वहितकारी नहीं रहेगा, पक्षपाती अन्यायकारी बन जायेगा।

@vaidic_gyan
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प्र. २४८. क्या ईश्वर संसार में किसी स्थान विशेष में, किसी काल विशेष में, किसी समुदाय विशेष में, किसी जीव विशेष को उनका कल्याण करने के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए भेजता है ? उत्तर : नहीं, ईश्वर किसी स्थान, काल, समुदाय विशेष में किसी जीव विशेष को नहीं…
प्र. २४९. क्या ईश्वर जीवों के भविष्य की बातों को जानता है कि वह कब, कहाँ, किसके साथ क्या करेगा ?

उत्तर : नहीं, ईश्वर जीवों के भविष्य की सब बातों को नहीं जानता है। हाँ, जीवों के मन में जो संकल्प/इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं। उनको तो जान लेता है ।

@vaidic_gyan
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Forwarded from Vaidic Physics (Vaidic Physics)
सभी आर्यवर्तियों (भारतीयों) को वासन्ती नवसस्येष्टि (होली) की हार्दिक शुभकामनाएँ!

यह पर्व केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का पर्व भी है। यह पावन अवसर हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन से नकारात्मकता को त्यागें और सत्य, धर्म और स्नेह का अनुसरण करें।

आइए! इस पर्व पर हम सब संकल्प लें कि अपने भीतर प्रेम, मैत्री और सद्भाव को विकसित करेंगे तथा समाज में एकता और सद्भावना का सन्देश फैलाएँगे।

—आचार्य अग्निव्रत
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प्र. २४९. क्या ईश्वर जीवों के भविष्य की बातों को जानता है कि वह कब, कहाँ, किसके साथ क्या करेगा ? उत्तर : नहीं, ईश्वर जीवों के भविष्य की सब बातों को नहीं जानता है। हाँ, जीवों के मन में जो संकल्प/इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं। उनको तो जान लेता है । @vaidic_gyan
प्र. २५०. ईश्वर सर्वज्ञ है, आनन्द स्वरूप है तथा सर्वव्यापक है इसलिए वह सभी जीवों के अन्दर भी है तो फिर सब जीव ईश्वर के सम्पर्क के कारण सर्वज्ञ, आनन्द की अनुभूति क्यों नहीं करते हैं ?

उत्तर : ईश्वर का आनन्द अपने अधिकार में है। वह जिस को योग्य/पात्र समझता है, उसे ही अपना आनन्द प्रदान करता है। अयोग्य को नहीं प्रदान करता है।

@vaidic_gyan
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २५०. ईश्वर सर्वज्ञ है, आनन्द स्वरूप है तथा सर्वव्यापक है इसलिए वह सभी जीवों के अन्दर भी है तो फिर सब जीव ईश्वर के सम्पर्क के कारण सर्वज्ञ, आनन्द की अनुभूति क्यों नहीं करते हैं ? उत्तर : ईश्वर का आनन्द अपने अधिकार में है। वह जिस को योग्य/पात्र समझता है…
प्र. २५१. ईश्वर सर्वव्यापक होने से शौचालय में विद्यमान मलमूत्र में भी उपस्थित है तो फिर उसे दुर्गन्ध की अनुभूति भी होती होगी ?

उत्तर : ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, वह मल आदि दुर्गन्ध का ज्ञान करते हुवे भी उससे दुःखी या विचलित नहीं होता है। किन्तु अपने बल से उसे रोक देता है।

@vaidic_gyan
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‼️ओ३म्‼️🚩

भगत सिंह को देश प्रेम की प्रेरणा कहां से मिली।

आर्यों द्वारा स्थापित डीएवी कॉलेज, लाहौर का भव्य भवन जहा पर भाई परमानंद जी ने भगत सिंह नाम की चिंगारी को मशाल मे बदल दिया था...

भगत सिंह के दादा श्री अर्जुन सिंह जी का यज्ञोपवीत संस्कार स्वयं "महर्षि दयानंद सरस्वती जी" ने ही करवाया था ओर तो ओर दादा ने अपने दोनो पोतों का....."स्मरण" रहे सिख समाज मे यज्ञोपवित संस्कार नही होता हैं...

सरदार अर्जुन सिंह जी एक कट्टर आर्य समाजी थे। वे महर्षि दयानंद जी के आरम्भिक शिष्यों में से एक थे जिनका यज्ञोपवित संस्कार स्वयं महर्षि दयानंद जी ने करवाया था ।

लोगो ने तो मंदिर से आर्य समाज तक का सफ़र तय किया था लेकिन सरदार अर्जुन सिंह जी ने गुरुद्वारे से आर्य समाज तक का सफर तय किया था।

उनको वैदिक साहित्य का इतना अध्ययन
था की मूर्ति पूजा श्राद्ध आदि विषयों पर आर्य समाज की तरफ से शास्त्रार्थ लड़ते थे । प्रतिदिन यज्ञ करना उनकी आदत थी ।

जब वे सफ़र में जाते थे तब भी अपनी हवन सामग्री यज्ञ कुंड इत्यादि साथ लेकर चलते थे ।
जब उन्होंने अपने दोनों पोतो जगत सिंह और भगत सिंह का यज्ञोपवीत करवाया था तब उन्होंने अपने दोनों पोतो को दायं और बायं बाजू के निचे लेकर ये प्रतिज्ञा ली थी की मै अपने दोनों पोतो को देश की बली वेदी पर दान करता हूँ।

भगतसिंह जी के पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह था और माँ का नाम विद्यावती था । दोनों परिवार सिख थे लेकिन उनका विवाह शुद्ध वैदिक तरीके से हुआ था अर्थात फेरे गुरु

ग्रन्थ साहिब के स्थान पर यज्ञ वेदि के फेरे लिए थे । उस समय लोगो ने कहा की देखो कैसा दामाद आया है जो खुद मन्त्र पढ़ रहा है ।

भगत सिंह जी के चाचा अजित सिंह जी भी दृढ़ आर्य समाजी थे । आर्य समाज के लिए उन्होंने बहुत ट्रैक्ट लिखे जिनमे से ' विधवा की पुकार' मुख्य है ।

भगत सिंह अपने दादा जी को जब भी पत्र लिखते थे तो ओ३म् और नमस्ते ही लिखते थे। भगत सिंह लाला लाजपत राय जी द्वारा संचालित नेशनल कोलेज के छात्र थे । और प्रसिद्ध आर्य विद्वान जयचन्द्र विद्यालंकार , उदयवीर शास्त्री तथा भाई
परमानन्द जी के शिष्य थे ।

भगतसिंह का जनेऊ संस्कार "पूजनीय प्रभो हमारे...." के रचनाकार पूज्य लोकनाथ वाचस्पति जी द्वारा हुआ था । भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र तिरछी टोपी वाला आर्यसमाज कलकत्ता(विधान सारणी) में लिया गया था क्योंकी भगत सिंह ने लाहौर में सांडर्स को मारने के बाद वेश बदलकर वही शरण ली थी ।

‼️ओ३म्‼️🚩
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