प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २६२. किसी व्यक्ति ने ईश्वर का प्रत्यक्ष किया है, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है ? उत्तर : जो व्यक्ति ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करता है, उसके जीवन, वाणी, व्यवहार में आनंद, शांति, निर्भयता, सत्य, परोपकारिता, निष्पक्षता, निःस्वार्थता आदि दैवीय गुण दिखाई…
प्र. २६३. क्या ईश्वर अपने भक्तों उपासकों से बातचीत भी करता है ? शंका-समाधान करता है ? निर्देश भी करता है ? प्रेरणा देता है ?

उत्तर : हाँ, ईश्वर समाधि अवस्था में अपने उपासकों से बातचीत भी करता है तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करता है।

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प्र. २६३. क्या ईश्वर अपने भक्तों उपासकों से बातचीत भी करता है ? शंका-समाधान करता है ? निर्देश भी करता है ? प्रेरणा देता है ? उत्तर : हाँ, ईश्वर समाधि अवस्था में अपने उपासकों से बातचीत भी करता है तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करता है। @vaidic_gyan
प्र. २६४. क्या ईश्वर मकान, रोटी आदि बना सकते हैं ?

उत्तर : हाँ, परन्तु ईश्वर ने वस्तुओं के निर्माण की सीमा निर्धारित कर रखी है इसलिए वह इन पदार्थों को नहीं बनाते। ये कार्य जीवों के कर्मों की सीमा के अन्तर्गत आते हैं ।

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प्र. २६४. क्या ईश्वर मकान, रोटी आदि बना सकते हैं ? उत्तर : हाँ, परन्तु ईश्वर ने वस्तुओं के निर्माण की सीमा निर्धारित कर रखी है इसलिए वह इन पदार्थों को नहीं बनाते। ये कार्य जीवों के कर्मों की सीमा के अन्तर्गत आते हैं । @vaidic_gyan
प्र. २६५. जब ईश्वर अनन्त है, उसे पूरा तो हम जान ही नहीं सकते, तो उसे जानने का प्रयत्न ही क्यों करें ?

उत्तर : जैसे नदी का पूरा पानी हम नहीं पी सकते फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा सा पानी हम नदी से लेकर पी लेते हैं। ठीक ऐसे ही ईश्वर को जितना जानने से मोक्ष हो जाए उतना तो अवश्य ही जानना चाहिए ।

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प्र. २६५. जब ईश्वर अनन्त है, उसे पूरा तो हम जान ही नहीं सकते, तो उसे जानने का प्रयत्न ही क्यों करें ? उत्तर : जैसे नदी का पूरा पानी हम नहीं पी सकते फिर भी अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा सा पानी हम नदी से लेकर पी लेते हैं। ठीक ऐसे ही ईश्वर को जितना जानने से मोक्ष…
प्र. २६६. ईश्वर दयालु कैसे है ?

उत्तर : दयालु का अर्थ है दया के स्वभाव वाला। दया का अर्थ है दूसरे के हित, उन्नति, कल्याण और सुख चाहना । ईश्वर की सबसे बड़ी दया यह है कि उसने जीवों की उन्नति, सुख के लिए सृष्टि के उत्तम पदार्थ बनाकर दान में दे रखे हैं। ईश्वर की दया का एक स्वरुप यह भी है कि वह सहायता चाहने वाले पुरुषार्थी मनुष्य की सहायता करता है।

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प्र. २६७. क्या ईश्वर को उसके कर्मों का फल मिलता है ? उत्तर : जी हाँ, ईश्वर के कर्मों का फल यही है कि उसके कार्य पूर्ण हो जाते हैं, अटकते नहीं । @vaidic_gyan
प्र. २६८. क्या संसार में हिंसा, छल, कपट, भूकम्प आदि जो होते हैं वह ईश्वर कर रहा है ?

उत्तर : नहीं, जीव स्वतन्त्र हैं, उनके कारण भी अनेक अव्यवस्था, दुःख सृष्टि में फैलाये जाते हैं। पृथ्वी आदि पदार्थों में भी स्वभाव से परिवर्तन, टूट-फूट आदि होती रहती है। यह ईश्वर की ओर से नहीं है।

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प्र. २६८. क्या संसार में हिंसा, छल, कपट, भूकम्प आदि जो होते हैं वह ईश्वर कर रहा है ? उत्तर : नहीं, जीव स्वतन्त्र हैं, उनके कारण भी अनेक अव्यवस्था, दुःख सृष्टि में फैलाये जाते हैं। पृथ्वी आदि पदार्थों में भी स्वभाव से परिवर्तन, टूट-फूट आदि होती रहती है। यह…
प्र. २६९. जिस स्थान पर एक ईंट है, उसके स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती । इस सृष्टि में प्रकृति व जीव भी हैं तो सर्वव्यापक ईश्वर उनके स्थान पर कैसे आ सकता है ?

उत्तर : जड़ पदार्थ स्थान घेरते हैं। इसलिए एक ईंट के स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती है। परन्तु चेतन पदार्थ (जीव व ईश्वर) स्थान नहीं घेरते है। इसलिए ईश्वर जड़ पदार्थ प्रकृति व जीवों के साथ एक ही स्थान पर रहता है।

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आचार्य मदन अनेजा द्वारा सरल हिन्दी में लिखित आध्यात्मिक पुस्तकें।
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