प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २६७. क्या ईश्वर को उसके कर्मों का फल मिलता है ? उत्तर : जी हाँ, ईश्वर के कर्मों का फल यही है कि उसके कार्य पूर्ण हो जाते हैं, अटकते नहीं । @vaidic_gyan
प्र. २६८. क्या संसार में हिंसा, छल, कपट, भूकम्प आदि जो होते हैं वह ईश्वर कर रहा है ?
उत्तर : नहीं, जीव स्वतन्त्र हैं, उनके कारण भी अनेक अव्यवस्था, दुःख सृष्टि में फैलाये जाते हैं। पृथ्वी आदि पदार्थों में भी स्वभाव से परिवर्तन, टूट-फूट आदि होती रहती है। यह ईश्वर की ओर से नहीं है।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, जीव स्वतन्त्र हैं, उनके कारण भी अनेक अव्यवस्था, दुःख सृष्टि में फैलाये जाते हैं। पृथ्वी आदि पदार्थों में भी स्वभाव से परिवर्तन, टूट-फूट आदि होती रहती है। यह ईश्वर की ओर से नहीं है।
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प्र. २६८. क्या संसार में हिंसा, छल, कपट, भूकम्प आदि जो होते हैं वह ईश्वर कर रहा है ? उत्तर : नहीं, जीव स्वतन्त्र हैं, उनके कारण भी अनेक अव्यवस्था, दुःख सृष्टि में फैलाये जाते हैं। पृथ्वी आदि पदार्थों में भी स्वभाव से परिवर्तन, टूट-फूट आदि होती रहती है। यह…
प्र. २६९. जिस स्थान पर एक ईंट है, उसके स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती । इस सृष्टि में प्रकृति व जीव भी हैं तो सर्वव्यापक ईश्वर उनके स्थान पर कैसे आ सकता है ?
उत्तर : जड़ पदार्थ स्थान घेरते हैं। इसलिए एक ईंट के स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती है। परन्तु चेतन पदार्थ (जीव व ईश्वर) स्थान नहीं घेरते है। इसलिए ईश्वर जड़ पदार्थ प्रकृति व जीवों के साथ एक ही स्थान पर रहता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : जड़ पदार्थ स्थान घेरते हैं। इसलिए एक ईंट के स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती है। परन्तु चेतन पदार्थ (जीव व ईश्वर) स्थान नहीं घेरते है। इसलिए ईश्वर जड़ पदार्थ प्रकृति व जीवों के साथ एक ही स्थान पर रहता है।
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आचार्य मदन अनेजा द्वारा सरल हिन्दी में लिखित आध्यात्मिक पुस्तकें।
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प्र. २६९. जिस स्थान पर एक ईंट है, उसके स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती । इस सृष्टि में प्रकृति व जीव भी हैं तो सर्वव्यापक ईश्वर उनके स्थान पर कैसे आ सकता है ? उत्तर : जड़ पदार्थ स्थान घेरते हैं। इसलिए एक ईंट के स्थान पर दूसरी ईंट नहीं आ सकती है। परन्तु चेतन…
प्र. २७०. मनुष्य ईश्वर की ओर कब झुकता है ?
उत्तर : रोग, वियोग होने पर, सांसारिक भोगों से अतृप्ति होने पर, भयंकर संकट आने पर या धर्म का उपदेश सुनने पर मनुष्य ईश्वर की ओर आकर्षित होता है।
@vaidic_gyan
उत्तर : रोग, वियोग होने पर, सांसारिक भोगों से अतृप्ति होने पर, भयंकर संकट आने पर या धर्म का उपदेश सुनने पर मनुष्य ईश्वर की ओर आकर्षित होता है।
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अध्यात्म जागृति इंटरनेट सत्र - 17वां सत्र
🌹 सादर नमस्ते जी,
🌹 जो अध्यात्मप्रेमी महानुभाव वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि के आधार पर सत्य वैदिक सिद्धांतो को जानना , समझना चाहते हैं। आत्मा, ईश्वर, वेद, यज्ञ, ध्यान, योग, पुनर्जन्म, कर्मफल, मुक्ति, ब्रह्मचर्य आदि विषयों को तथा अंधविश्वास, पाखंड, कुरीतियों को…
🌹 जो अध्यात्मप्रेमी महानुभाव वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि के आधार पर सत्य वैदिक सिद्धांतो को जानना , समझना चाहते हैं। आत्मा, ईश्वर, वेद, यज्ञ, ध्यान, योग, पुनर्जन्म, कर्मफल, मुक्ति, ब्रह्मचर्य आदि विषयों को तथा अंधविश्वास, पाखंड, कुरीतियों को…
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प्र. २७०. मनुष्य ईश्वर की ओर कब झुकता है ? उत्तर : रोग, वियोग होने पर, सांसारिक भोगों से अतृप्ति होने पर, भयंकर संकट आने पर या धर्म का उपदेश सुनने पर मनुष्य ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। @vaidic_gyan
प्र. २७१. ईश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता इसलिए उसकी सत्ता नहीं है। क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर : नहीं, संसार में अनेक पदार्थ हैं जो आँखों से दिखाई नहीं देते फिर भी लोग उन्हें मानते हैं। जैसे वायु, भूख, प्यास, सुख, दुःख, मन, बुद्धि, विद्युत् तरङ्गे इत्यादि ।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, संसार में अनेक पदार्थ हैं जो आँखों से दिखाई नहीं देते फिर भी लोग उन्हें मानते हैं। जैसे वायु, भूख, प्यास, सुख, दुःख, मन, बुद्धि, विद्युत् तरङ्गे इत्यादि ।
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यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि मोक्ष प्राप्ति के लिये शरीरधारी गुरु की आवश्यकता है वा नहीं ? आवश्यकता है ।
प्रश्न = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है या नहीं ?
उत्तर = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है ।
प्रश्न = गुरु किसको बनाया जाये ?
उत्तर = जिसको गुरु के रूप में स्वीकार किया जाये वह वास्तविक गुरु हो । अर्थात् वास्तविक गुरु में निम्नलिखित लक्षण होने चाहियें ।
वास्तविक गुरु के लक्षण-
१. वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों के पठन-पाठन को मुक्ति का साधन मानने वाला हो ।
२. सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी हो ।
३. पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा का त्यागी हो ।
४. ईश्वर, जीव और प्रकृति को पृथक् पृथक् मानने वाला हो ।
५. स्वयं अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान करने वाला हो ।
६. सकाम कर्मों को छोड़कर निष्काम कर्म करने वाला हो ।
७. अपनी उन्नति के तुल्य प्राणिमात्र की उन्नति चाहने वाला हो ।
८. पक्षपातरहित न्यायकारी हो ।
९. मद्य, मांसादि अभक्ष्य खान-पान करने वाला न हो ।
१०. मोक्ष की प्राप्ति करने करवाने को मानव जीवन का मुख्यलक्ष्य मानने वाला हो ।
११. वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रंथो में वर्णित योग विद्या का प्रचार-प्रसार करने वाला हो, इत्यादि ।
किसी व्यक्ति में लम्बे काल तक इन गुणों का परीक्षण करना चाहिये । लम्बे परीक्षण के पश्चात् यदि उस व्यक्ति में उपर्युक्त गुण उपलब्ध हों, तभी उसे गुरु बनाना चाहिये ॥ २६ ॥
--- *दिवंगत स्वामी सत्यपति परिव्राजक जी महाराज का संदेश।*
प्रश्न = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है या नहीं ?
उत्तर = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है ।
प्रश्न = गुरु किसको बनाया जाये ?
उत्तर = जिसको गुरु के रूप में स्वीकार किया जाये वह वास्तविक गुरु हो । अर्थात् वास्तविक गुरु में निम्नलिखित लक्षण होने चाहियें ।
वास्तविक गुरु के लक्षण-
१. वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों के पठन-पाठन को मुक्ति का साधन मानने वाला हो ।
२. सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी हो ।
३. पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा का त्यागी हो ।
४. ईश्वर, जीव और प्रकृति को पृथक् पृथक् मानने वाला हो ।
५. स्वयं अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान करने वाला हो ।
६. सकाम कर्मों को छोड़कर निष्काम कर्म करने वाला हो ।
७. अपनी उन्नति के तुल्य प्राणिमात्र की उन्नति चाहने वाला हो ।
८. पक्षपातरहित न्यायकारी हो ।
९. मद्य, मांसादि अभक्ष्य खान-पान करने वाला न हो ।
१०. मोक्ष की प्राप्ति करने करवाने को मानव जीवन का मुख्यलक्ष्य मानने वाला हो ।
११. वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रंथो में वर्णित योग विद्या का प्रचार-प्रसार करने वाला हो, इत्यादि ।
किसी व्यक्ति में लम्बे काल तक इन गुणों का परीक्षण करना चाहिये । लम्बे परीक्षण के पश्चात् यदि उस व्यक्ति में उपर्युक्त गुण उपलब्ध हों, तभी उसे गुरु बनाना चाहिये ॥ २६ ॥
--- *दिवंगत स्वामी सत्यपति परिव्राजक जी महाराज का संदेश।*
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प्र. २७१. ईश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता इसलिए उसकी सत्ता नहीं है। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, संसार में अनेक पदार्थ हैं जो आँखों से दिखाई नहीं देते फिर भी लोग उन्हें मानते हैं। जैसे वायु, भूख, प्यास, सुख, दुःख, मन, बुद्धि, विद्युत् तरङ्गे इत्यादि…
प्र. २७२. बालक के शरीर को माता-पिता बनाते हैं, ईश्वर नहीं । क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर : नहीं, यदि बालक का शरीर माता-पिता ने बनाया होता तो उन्हें शरीर की रचना का पूरा-पूरा ज्ञान होता परन्तु ऐसा नहीं होता । वैज्ञानिक भी आज तक मनुष्य शरीर को पूरा-पूरा नहीं जान पाए ।
@vaidic_gyan
उत्तर : नहीं, यदि बालक का शरीर माता-पिता ने बनाया होता तो उन्हें शरीर की रचना का पूरा-पूरा ज्ञान होता परन्तु ऐसा नहीं होता । वैज्ञानिक भी आज तक मनुष्य शरीर को पूरा-पूरा नहीं जान पाए ।
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प्र. २७२. बालक के शरीर को माता-पिता बनाते हैं, ईश्वर नहीं । क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, यदि बालक का शरीर माता-पिता ने बनाया होता तो उन्हें शरीर की रचना का पूरा-पूरा ज्ञान होता परन्तु ऐसा नहीं होता । वैज्ञानिक भी आज तक मनुष्य शरीर को पूरा-पूरा नहीं…
प्र. २७३. ईश्वर शरीर धारण नहीं करता, इसमें वेद का क्या प्रमाण है ?
उत्तर : यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के आठवें मन्त्र में ईश्वर को 'अकायम्' अर्थात् शरीर रहित कहा है।
@vaidic_gyan
उत्तर : यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के आठवें मन्त्र में ईश्वर को 'अकायम्' अर्थात् शरीर रहित कहा है।
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