प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
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सादर नमस्ते जी 🙏🏻 🙏🏻 🚩🚩
यहां पर आपको प्राचीन वैदिक ज्ञान से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर दिया जाएगा।
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प्राचीन वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान 🚩
प्र. २७०. मनुष्य ईश्वर की ओर कब झुकता है ? उत्तर : रोग, वियोग होने पर, सांसारिक भोगों से अतृप्ति होने पर, भयंकर संकट आने पर या धर्म का उपदेश सुनने पर मनुष्य ईश्वर की ओर आकर्षित होता है। @vaidic_gyan
प्र. २७१. ईश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता इसलिए उसकी सत्ता नहीं है। क्या यह बात ठीक है ?

उत्तर : नहीं, संसार में अनेक पदार्थ हैं जो आँखों से दिखाई नहीं देते फिर भी लोग उन्हें मानते हैं। जैसे वायु, भूख, प्यास, सुख, दुःख, मन, बुद्धि, विद्युत् तरङ्गे इत्यादि ।

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यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि मोक्ष प्राप्ति के लिये शरीरधारी गुरु की आवश्यकता है वा नहीं ? आवश्यकता है ।

प्रश्न = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है या नहीं ?

उत्तर = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है ।

प्रश्न = गुरु किसको बनाया जाये ?

उत्तर = जिसको गुरु के रूप में स्वीकार किया जाये वह वास्तविक गुरु हो । अर्थात् वास्तविक गुरु में निम्नलिखित लक्षण होने चाहियें ।

वास्तविक गुरु के लक्षण-

१. वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों के पठन-पाठन को मुक्ति का साधन मानने वाला हो ।

२. सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी हो ।

३. पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा का त्यागी हो ।

४. ईश्वर, जीव और प्रकृति को पृथक् पृथक् मानने वाला हो ।

५. स्वयं अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान करने वाला हो ।

६. सकाम कर्मों को छोड़कर निष्काम कर्म करने वाला हो ।

७. अपनी उन्नति के तुल्य प्राणिमात्र की उन्नति चाहने वाला हो ।

८. पक्षपातरहित न्यायकारी हो ।

९. मद्य, मांसादि अभक्ष्य खान-पान करने वाला न हो ।

१०. मोक्ष की प्राप्ति करने करवाने को मानव जीवन का मुख्यलक्ष्य मानने वाला हो ।

११. वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रंथो में वर्णित योग विद्या का प्रचार-प्रसार करने वाला हो, इत्यादि ।

किसी व्यक्ति में लम्बे काल तक इन गुणों का परीक्षण करना चाहिये । लम्बे परीक्षण के पश्चात् यदि उस व्यक्ति में उपर्युक्त गुण उपलब्ध हों, तभी उसे गुरु बनाना चाहिये ॥ २६ ॥
--- *दिवंगत स्वामी सत्यपति परिव्राजक जी महाराज का संदेश।*
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प्र. २७१. ईश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता इसलिए उसकी सत्ता नहीं है। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, संसार में अनेक पदार्थ हैं जो आँखों से दिखाई नहीं देते फिर भी लोग उन्हें मानते हैं। जैसे वायु, भूख, प्यास, सुख, दुःख, मन, बुद्धि, विद्युत् तरङ्गे इत्यादि…
प्र. २७२. बालक के शरीर को माता-पिता बनाते हैं, ईश्वर नहीं । क्या यह बात ठीक है ?

उत्तर : नहीं, यदि बालक का शरीर माता-पिता ने बनाया होता तो उन्हें शरीर की रचना का पूरा-पूरा ज्ञान होता परन्तु ऐसा नहीं होता । वैज्ञानिक भी आज तक मनुष्य शरीर को पूरा-पूरा नहीं जान पाए ।

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प्र. २७३. ईश्वर शरीर धारण नहीं करता, इसमें वेद का क्या प्रमाण है ? उत्तर : यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के आठवें मन्त्र में ईश्वर को 'अकायम्' अर्थात् शरीर रहित कहा है। @vaidic_gyan
प्र. २७४. कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि को उत्पन्न किया, विष्णु सृष्टि का पालन कर रहे हैं व महेश सृष्टि का संहार करते हैं। क्या यह बात ठीक है ?

उत्तर : नहीं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ईश्वर के नाम हैं और वही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं।

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प्र. २७४. कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि को उत्पन्न किया, विष्णु सृष्टि का पालन कर रहे हैं व महेश सृष्टि का संहार करते हैं। क्या यह बात ठीक है ? उत्तर : नहीं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ईश्वर के नाम हैं और वही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं। @vaidic_gyan
प्र. २७५. संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण क्या है ?

उत्तर : अनेक मत, सम्प्रदाय आदि का होना संसार में वैर, विरोध का सबसे बड़ा कारण है। जिन्होंने ईश्वर के वास्तविक स्वरूप के स्थान पर मिथ्या स्वरूपों की कल्पना कर रखी है।

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प्र. २७६. निराकार ईश्वर का प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करना क्या है ? उत्तर : निराकार ईश्वर के ज्ञान, आनन्द आदि गुणों की अनुभूति करना ही उसका प्रत्यक्ष या साक्षात्कार करना है । @vaidic_gyan
प्र. २७७. ईश्वर को प्राप्त करने के रास्ते अलग-अलग हैं किंतु मंजिल सबकी एक हैं, क्या यह मान्यता ठीक है ?

उत्तर : जी नहीं, यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि । आज अनेक प्रकार की पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड, धार्मिक ग्रंथ प्रचलित हैं अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के अलग-अलग रास्ते, अलग-अलग उपाय बताये जा रहे हैं तथा इनकी मंजिल भी अलग अलग हैं। जैसे किसी की मंजिल सातवाँ आसमान, किसी की चौथा आसमान, तो किसी की मंजिल परम धाम तो किसी की अक्षरधाम, तो किसी की गोलोक, वैकुण्ठ लोक या कैलाश है। तो सबकी मंजिल एक कहाँ हुई ?

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प्र. २७७. ईश्वर को प्राप्त करने के रास्ते अलग-अलग हैं किंतु मंजिल सबकी एक हैं, क्या यह मान्यता ठीक है ? उत्तर : जी नहीं, यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि । आज अनेक प्रकार की पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड, धार्मिक ग्रंथ प्रचलित हैं अर्थात् ईश्वर को प्राप्त करने के…
प्र. २७८. व्यक्ति सच्चा और पूर्ण आस्तिक कब बनता है ?

उत्तर : सत्य का पालन, चोरी का त्याग, धैर्य, प्रेम पूर्वक व्यवहार, निष्पक्षता, दया, क्षमा, संयम, निष्कामता आदि उत्तम गुणों को धारण करने से व्यक्ति सच्चा व पूर्ण आस्तिक बनता है।

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