वृन्दावन रस अमृत
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जहाँ भक्ति रानी भी आकर हो जाती है फिर से जवां ऐसे श्री धाम वृन्दावन की रस महिमा सुनिए रसिक संतो के श्री मुख से,जिनके सत्संग और भजन सुनकर हमारे जीवन को प्रभु की और अग्रसित होने का मार्ग मिलेगा। स्वागत है आप सभी का प्रभु की प्रेरणा से बनाये हुए इस चेंनल मे।
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श्री हित सेवक जू

श्री सेवक जी का चरित्र बहुत रहस्यमय है क्योंकि उन्होंने श्री हित हरिवंश जी का कभी साक्षात्कार नहीं किया पर वह उनके सबसे बड़े कृपापात्र थे।

उनका जन्म 1577 के लगभग माना जाता है जबलपुर में गड़ा नामक एक गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ एवं बाल्यकाल से ही भक्ति भाव में संपन्न थे। उसी परिवार में उत्पन्न श्री चतुर्भुजदास नामक एक व्यक्ति थे जो उन्हीं के समान निष्ठावान और भक्त परायण थे।

उनके गांव में एक बार श्री हितहरिवंश जी के कुछ शिष्य साधु भ्रमण करते हुए गड़ा पहुंचे जहां हितहरिवंश जी के राधा कृष्ण के केली से संबंधित मधुर पदों का गान किया, पद सुनकर सेवक जी और चतुर्भुजदास जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने वृंदावन जाकर श्री हितहरिवंश जी से दीक्षा लेने का निश्चय किया। परंतु दुर्भाग्य से हितहरिवंश जी नित्य निकुंज पर प्रवेश कर चुके थे उनके अंतर्धान संवाद पाकर सेवक जी अत्यंत मर्माहत हुए। चतुर्भुजदास जी ने तब हितहरिवंश जी के ज्येष्ठ पुत्र आचार्य वनचंद्र दास जी से दीक्षा लेने का विचार किया। सेवक जी से भी उन्होंने यही प्रस्ताव किया पर सेवक जी ने कहा मैं हित हरिवंश जी को अपना गुरु मान चुका हूं, दूसरे किसी से दीक्षा लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। इतनी ही नहीं उन्होंने कहा यदि हित हरिवंश दीक्षा देंगे तो ठीक, नहीं तो प्राण विसर्जन कर दूंगा।
चतुर्भुजदास जी ने सेवक जी से बार बार निवेदन किया परंतु वह असफल हुए और अकेले ही वह वृंदावन जाकर श्री आचार्य वनचंद्र दास जी से दीक्षा लेकर लौटें। लेकिन वापस लौट कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ यह देखकर कि सेवक जी भी उसी मंत्र का प्रेम पूर्वक जाप कर रहे हैं जो वन चंद जी ने उन्हें दिया था। सेवक जी पर हित हरिवंश जी की कृपा हो गई, उन्होंने स्वप्न में स्वयं मंत्र देकर दिव्य वृंदावन के दर्शन करा कर उन्हें कृतार्थ किया था। अनन्य भक्ति और निष्ठा में कितना बल है यह उन्होंने अपने उदाहरण से सिद्ध कर दिया।
मंत्र जाप करते करते और हृदय से ध्यान करते हुए उनकी बुद्धि में दिव्य ज्ञान होने लगा और हितचौरासी के पदों का गूढ़ अर्थ उनकी समझ में अपने आप आने लगा। हितहरिवंश जी की रसोपासना के सिद्धांत का रहस्य उनके हृदय में अंकुरित होने लगा और उन्होंने हितहरिवंश जी की वाणी करने वाले सूचक पदों का सृजन किया जो कि सेवक वाणी के नाम से प्रसिद्ध हुई। हितचौरासी के भाष्य के रूप में इसकी मान्यता हुई जब यह वाणी वृंदावन में श्री वन चंद्र जी, हितहरिवंश जी के सुपुत्र के पास पहुंची तो उन्होंने आज्ञा दी कि वह हितचौरासी के साथ ही लिखी और पढ़ी जाया करें।
वन चंद्र जी उस वाणी से इतना प्रभावित हुए कि सेवक जी को देखने की उनकी उत्कंठा दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने सेवक जी को वृंदावन आने के लिए निमंत्रण दिया और भेजने के साथ साथ निमंत्रण उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया कि जिस दिन सेवक जी वृंदावन आएंगे उस दिन वह उनके आगमन की खुशी में श्री राधा वल्लभ जी का सारा वैभव लुटा देंगे। सेवक जी वन चंद जी के निमंत्रण की उपेक्षा नहीं कर सकते थे। वह स्वयं भी वृंदावन जाकर राधा वल्लभ जी के दर्शन करने को उत्सुक थे, वह इस निमंत्रण को उन्होंने श्री राधा वल्लभ जी का ही निमंत्रण माना पर जब उन्हें वन चंद्र जी के निश्चय का पता चला कि वह उनके वहां पहुंचने पर राधा वल्लभ जी का सारा वैभव लुटा देंगे तब वह संकट में दुविधा में पड़ गए, अंत में उन्होंने वेश बदलकर जाने का निश्चय किया जिससे वह पहचान में ना आएं और उनके कारण श्री राधा वल्लभ जी को किसी प्रकार की दिक्कत न हो।
पर वृंदावन पहुंचकर जब वह श्री राधा वल्लभ जी के मंदिर गए, तब वन चंद्र जी ने उनकी भावविभोरता देख उन्हें पहचान लिया और आनंदित हो उन्हें प्रेम आलिंगन प्रदान किया। सेवक जी को भय हुआ कि कहीं वह अपने निश्चय के अनुसार श्री राधा बल्लभ का वैभव लुटा ना दें और उन्होंने हाथ जोड़ प्रार्थना की कि वह ऐसा कुछ ना करें। तब वन चंद्र जी को अपना निश्चय बदलना पड़ा। उन्होंने सेवक जी के उपलक्ष में केवल प्रसादी पदार्थों का ही वितरण किया। सेवक जी १० दिन वृंदावन में रह सके। कहते हैं कि एक दिन श्री हित हरिवंश के निकुंज गमन को एक ही वर्ष हुआ था, और उसी दिन वह रास मंडल में एक वृक्ष के नीचे ध्यान अवस्था में बैठे-बैठे निकुंज लीला में प्रवेश कर गए।
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