समुद्र के किनारे जब एक लहर आयी तो एक बच्चे का चप्पल ही अपने साथ बहा ले गयीं| बच्चा रेत पर अंगुली से लिखता है "समुद्र चोर है"|
उसी समुद्र के एक दूसरे किनारे एक मछुआरा मछली पकड़ रहा होता है! वह उसी रेत पर लिखता है "समुद्र मेरा पालनहार है"|
एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है| उसकी मां रेत पर लिखती है "समुद्र हत्यारा है"|
एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था| उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया| वह रेत पर लिखता है "समुद्र दानी है"|
अचानक एक बड़ी लहर आती है और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है| लोग जो भी कहे समुद्र के बारे में लेकिन विशाल समुद्र अपनी लहरों में मस्त रहता है| अपने उफान और शांति वह अपने हिसाब से तय करता है|
अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें| जो करना है अपने हिसाब से करें| जो गुजर गया उसकी चिंता में ना रहे| हार जीत, खोना पाना, सुख-दुख, इन सबके चलते मन विचलित ना करें!
अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं| जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते हैं|
उसी समुद्र के एक दूसरे किनारे एक मछुआरा मछली पकड़ रहा होता है! वह उसी रेत पर लिखता है "समुद्र मेरा पालनहार है"|
एक युवक समुद्र में डूब कर मर जाता है| उसकी मां रेत पर लिखती है "समुद्र हत्यारा है"|
एक दूसरे किनारे एक गरीब बूढ़ा टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था| उसे एक बड़े सीप में एक अनमोल मोती मिल गया| वह रेत पर लिखता है "समुद्र दानी है"|
अचानक एक बड़ी लहर आती है और सारे लिखा मिटा कर चली जाती है| लोग जो भी कहे समुद्र के बारे में लेकिन विशाल समुद्र अपनी लहरों में मस्त रहता है| अपने उफान और शांति वह अपने हिसाब से तय करता है|
अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें| जो करना है अपने हिसाब से करें| जो गुजर गया उसकी चिंता में ना रहे| हार जीत, खोना पाना, सुख-दुख, इन सबके चलते मन विचलित ना करें!
अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं| जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते हैं|
""वाणी पर नियंत्रण रखे....""
दोस्तों ,
एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर है।
यह बात दूर - दूर तक फैल गई आस - पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे।
नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था।
तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया।
निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया।
पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा..
मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था।
सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा... आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं..
...और जाते समय उस कागज के टुकड़े - टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ..
बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया..
अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को...
जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं...
बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता.. उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी...
अब वे नहीं मिल सकेंगें... मैं कहाँ - कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?
सरपंच ने कहा 'ठीक इसी तरह, एक सरल - सी टिप्पणी भी किसी का मान - सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है...
जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता।
इसलिए यदि किसीके बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें।
वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l
दोस्तों ,
एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर है।
यह बात दूर - दूर तक फैल गई आस - पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे।
नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था।
तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया।
निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया।
पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा..
मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था।
सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा... आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं..
...और जाते समय उस कागज के टुकड़े - टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ..
बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया..
अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को...
जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं...
बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता.. उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी...
अब वे नहीं मिल सकेंगें... मैं कहाँ - कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?
सरपंच ने कहा 'ठीक इसी तरह, एक सरल - सी टिप्पणी भी किसी का मान - सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है...
जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता।
इसलिए यदि किसीके बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें।
वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l
#भला_करने_से_मिलती_ मन_की_शान्ति
एक बुद्धिमान व्यक्ति,जो लिखने का शौकीन था, लिखने के लिए समुद्र के किनारे जा कर बैठ जाता था और फिर उसे प्रेरणायें प्राप्त होती थीं और उसकी लेखनी चल निकलती थी। लेकिन, लिखने के लिए बैठने से पहले वह समुद्र के तट पर कुछ क्षण टहलता अवश्य था।
एक दिन वह समुद्र के तट पर टहल रहा था कि तभी उसे एक व्यक्ति तट से उठा कर कुछ समुद्र में फेंकता हुआ दिखा। जब उसने निकट जाकर देखा तो पाया कि वह व्यक्ति समुद्र के तट से छोटी -छोटी मछलियाँ एक-एक करके उठा रहा था और समुद्र में फेंक रहा था। और ध्यान से अवलोकन करने पर उसने पाया कि समुद्र तट पर तो लाखों कि तादात में छोटी -छोटी मछलियाँ पडी थीं जो कि थोडी ही देर में दम तोड़ने वाली थीं।
अंततः उससे न रहा गया और उस बुद्धिमान मनुष्य ने उस व्यक्ति से पूछ ही लिया,"नमस्ते भाई ! तट पर तो लाखों मछलियाँ हैं। इस प्रकार तुम चंद मछलियाँ पानी में फेंकने पर मरने वाली मछलियों का अंतर कितना कम कर पाओगे? इस पर वह व्यक्ति जो छोटी - छोटी मछलियों को एक - एक करके समुद्र में फेंक रहा था, बोला,"देखिए! सूर्य निकल चुका है और समुद्र की लहरें अब शांत होकर वापस होने की तैयारी में हैं। ऐसे में, मैं तट पर बची सारी मछलियों को तो जीवन दान नहीं दे पाऊँगा। " और फिर वह झुका और एक और मछली को समुद्र में फेंकते हुए बोला," किन्तु, इस मछली के जीवन में तो मैंने अंतर ला ही दिया, और यही मुझे बहुत संतोष प्रदान कर रहा है।
सन्तमत विचार-इसी प्रकार ईश्वर ने आप सब में भी यह योग्यता दी है कि आप एक छोटे से प्रयास से रोज़ किसी न किसी के जीवन में छोटा सा अंतर ला सकते हैं। जैसे, किसी भूखे पशु या मनुष्य को भोजन देना, किसी ज़रूरतमंद की निःस्वार्थ सहायता करना इत्यादि। आप अपनी किस योग्यता से इस समाज को, इस संसार को क्या दे रहे हैं, क्या दे सकते हैं, आपको यही आत्मनिरीक्षण करना है और फिर अपनी उस योग्यता को पहचान कर रोज़ किसी न किसी के मुख पर मुस्कान लाने का प्रयास करना है। और विश्वास जानिए, ऐसा करने से अंततः सबसे अधिक लाभान्वित आप ही होंगे। ऐसा करने से सबसे अधिक अंतर आपको अपने भीतर महसूस होगा। ऐसा करने से सबसे अधिक अंतर आपके ही जीवन में पड़ेगा।🙏🙏हरिओम 🙏🙏
एक बुद्धिमान व्यक्ति,जो लिखने का शौकीन था, लिखने के लिए समुद्र के किनारे जा कर बैठ जाता था और फिर उसे प्रेरणायें प्राप्त होती थीं और उसकी लेखनी चल निकलती थी। लेकिन, लिखने के लिए बैठने से पहले वह समुद्र के तट पर कुछ क्षण टहलता अवश्य था।
एक दिन वह समुद्र के तट पर टहल रहा था कि तभी उसे एक व्यक्ति तट से उठा कर कुछ समुद्र में फेंकता हुआ दिखा। जब उसने निकट जाकर देखा तो पाया कि वह व्यक्ति समुद्र के तट से छोटी -छोटी मछलियाँ एक-एक करके उठा रहा था और समुद्र में फेंक रहा था। और ध्यान से अवलोकन करने पर उसने पाया कि समुद्र तट पर तो लाखों कि तादात में छोटी -छोटी मछलियाँ पडी थीं जो कि थोडी ही देर में दम तोड़ने वाली थीं।
अंततः उससे न रहा गया और उस बुद्धिमान मनुष्य ने उस व्यक्ति से पूछ ही लिया,"नमस्ते भाई ! तट पर तो लाखों मछलियाँ हैं। इस प्रकार तुम चंद मछलियाँ पानी में फेंकने पर मरने वाली मछलियों का अंतर कितना कम कर पाओगे? इस पर वह व्यक्ति जो छोटी - छोटी मछलियों को एक - एक करके समुद्र में फेंक रहा था, बोला,"देखिए! सूर्य निकल चुका है और समुद्र की लहरें अब शांत होकर वापस होने की तैयारी में हैं। ऐसे में, मैं तट पर बची सारी मछलियों को तो जीवन दान नहीं दे पाऊँगा। " और फिर वह झुका और एक और मछली को समुद्र में फेंकते हुए बोला," किन्तु, इस मछली के जीवन में तो मैंने अंतर ला ही दिया, और यही मुझे बहुत संतोष प्रदान कर रहा है।
सन्तमत विचार-इसी प्रकार ईश्वर ने आप सब में भी यह योग्यता दी है कि आप एक छोटे से प्रयास से रोज़ किसी न किसी के जीवन में छोटा सा अंतर ला सकते हैं। जैसे, किसी भूखे पशु या मनुष्य को भोजन देना, किसी ज़रूरतमंद की निःस्वार्थ सहायता करना इत्यादि। आप अपनी किस योग्यता से इस समाज को, इस संसार को क्या दे रहे हैं, क्या दे सकते हैं, आपको यही आत्मनिरीक्षण करना है और फिर अपनी उस योग्यता को पहचान कर रोज़ किसी न किसी के मुख पर मुस्कान लाने का प्रयास करना है। और विश्वास जानिए, ऐसा करने से अंततः सबसे अधिक लाभान्वित आप ही होंगे। ऐसा करने से सबसे अधिक अंतर आपको अपने भीतर महसूस होगा। ऐसा करने से सबसे अधिक अंतर आपके ही जीवन में पड़ेगा।🙏🙏हरिओम 🙏🙏
*🌹आओ विचार करें🌹*
एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा।
गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है।
दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।
*शिक्षा:-*
कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते है।
एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा।
गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है।
दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।
*शिक्षा:-*
कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते है।
*डेढ़ टिकट*
(डेढ़ टिकट में एक बुजुर्ग ने बयां किया श्रीगणेश के प्रति अपना प्रेम)
महानगर के उस अंतिम बसस्टॉप पर जैसे ही कंडक्टर ने बस रोक दरवाज़ा खोला, नीचे खड़े एक देहाती बुज़ुुर्ग ने चढ़ने के लिए हाथ बढ़ाया। एक ही हाथ से सहारा ले डगमगाते क़दमों से वे बस में चढ़े, क्योंकि दूसरे हाथ में थी भगवान गणेश की एक अत्यंत मनोहर बालमूर्ति थी।
गांव जाने वाली उस आख़िरी बस में पांच-छह सवारों के चढ़ने के बाद पैर रखने की जगह भी बची नहीं थी।
बस चलने पर हाथ की मूर्ति को संभाल, उन्हें संतुलन बनाने की असफल कोशिश करते देख जब कंडक्टर ने अपनी सीट ख़ाली करते हुए कहा कि *दद्दा आप यहां बैठ जाइए,* तो वे उस मूर्ति को पेट से सटा आराम से उस सीट पर बैठ गए।
कुछ ही मिनटों में बाल गणेश की वह प्यारी-सी मूर्ति सब के कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र बन गई। अनायास कुछ जोड़ी हाथ श्रद्धा से उस ओर जुड़ गए।
कंडक्टर पीछे के सवारियो से पैसे लेता दद्दा के सामने आ खड़ा हुआ और पूछा, *‘कहां जाओगे दद्दा’*
जवाब देते हुए मूर्ति को थोड़ा इधर-उधर कर उन्होंने धोती की अंटी से पैसे निकालने की असफल कोशिश की।
उन्हें परेशान होता देखकर कंडक्टर ने कहा, *‘अभी रहने दीजिए। उतरते वक़्त दे दीजिएगा।’*
एक बार फिर दद्दा गणपति की मूर्ति को पेट से सटाकर आश्वस्त होकर बैठ गए।
बस अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी। सबका टिकट काटकर कंडक्टर एक सीट का सहारा लेकर खड़ा हो गया और अनायास उनसे पूछ बैठा, *‘दद्दा, आपके गांव में भी तो गणेश की मूर्ति मिलती होगी न, फिर इस उम्र में दो घंटे का सफ़र और इतनी दौड़-धूप करके शहर से यह गणेश की मूर्ति क्यूं ले जा रहे हैं?’*
प्रश्न सुनकर दद्दा मुस्कराते हुए बोले, *‘हां, आजकल तो त्योहार आते ही सब तरफ़ दुकानें सज जाती हैं, गांव में भी मिलती हैं मूर्तियां, पर ऐसी नहीं। देखो यह कितनी प्यारी और जीवंत है।’*
फिर संजीदगी से कहने लगे, *‘यहां से मूर्ति ले जाने की भी एक कहानी है बेटा। दरअसल हम पति-पत्नी को भगवान ने संतान सुख से वंचित रखा। सारे उपचार, तन्त्र-मन्त्र सब किए, फिर नसीब मानकर स्वीकार भी कर लिया और काम-धंधे में मन लगा लिया।..पन्द्रह साल पहले काम के सिलसिले में हम दोनों इसी शहर में आए थे। गणेश पूजा का त्योंहार नज़दीक था तो मूर्ति और पूजा का सामान ख़रीदने यहां बाज़ार गए। अचानक पत्नी की नज़र एकदम ऐसी ही एक मूर्ति पर पड़ी और उसका मातृत्व जाग उठा। ‘मेरा बच्चा’ कहते हुए उसने उस मूर्ति को सीने से लगा लिया। सालों का दर्द आंखों से बह निकला, मूर्तिकार भी यह देखकर भावविह्वल हो गया और मैंने उससे हर साल इसी सांचे की हूबहू ऐसी ही मूर्ति देने का वादा ले लिया। बस! तभी से यह सिलसिला शुरू है। दो साल पहले तक वह भी साथ आती रही अपने बाल गणेश को लेने, पर अब घुटनों के दर्द से लाचार है। मेरी भी उम्र में हो रही है, फिर भी सिर्फ़ दस दिन के लिए ही क्यूं न हो, उसका यह सुख नहीं छीनना चाहता, इसलिए अपने बाल गणेश को बड़े जतन से घर ले जाता हूं।’*
अब तक आसपास के लोगों में अच्छा-ख़ासा कौतूहल जाग चुका था। कुछ लोग अपनी सीट से झांककर तो कुछ उचककर मूर्ति को देख मुस्करा के हाथ जोड़ने लगे।
तभी पिछली सीट पर बैठी महिला ने चेहरा आगे की ओर कर पूछा, *‘दद्दा, फिर विसर्जित नहीं करते क्या मूर्ति?’*
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ दद्दा ने कहा, *‘अब भगवान स्वरूप स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करते हैं तो विसर्जन तो करते ही हैं, पर इस वियोग के कारण ही इन दस दिनों में उसके हृदय से मानो वात्सल्य का सोता फूट पड़ता है, जिससे हमारा जीवन बदल जाता है। अभी भी रंगोली डाल, आम के तोरण से द्वार सजाकर, वहीं पर राह देखते बैठी होगी। पहुंचने पर राई और मिर्च से कड़क नज़र उतारती है। पूछो मत, छोटा-सा लोटा, गिलास, थाली, चम्मच सब हैं हमारे बाल गणेश के पास। यही नहीं रंगबिरंगे छोटे कपड़ों का एक बैग भी बना रखा है उसने, इसलिए जब तक संभव होगा, उसे यह सुख देता रहूंगा,’* कहते-कहते दद्दा का गला रुंध गया।
यह सुनकर किसी की आंखें नम हुईं तो किसी का हृदय करुणा से भर गया। बस निर्बाध गति से आगे बढ़ रही थी और दद्दा का गांव आने ही वाला था, इसलिए उन्हें मूर्ति संभालकर खड़े होते देख पास खड़े व्यक्ति ने कहा, *‘लाइए, मूर्ति मुझे दीजिए’* तो उसके हाथों में मूर्ति को धीरे से थमाकर, धोती की अंटी से पैसे निकालकर कंडक्टर को देते हुए दद्दा ने कहा, *‘लो बेटा, डेढ़ टिकट काटना।’*
यह सुनकर कंडक्टर ने आश्चर्य से कहा, *‘अरे आप तो अकेले आए हैं न, फिर ये डेढ़ टिकट?’*
दद्दा ने मुस्कराते हुए कहा, *‘दोनों नहीं आए क्या? एक मैं और एक यह हमारा बाल गणेश।’*
(डेढ़ टिकट में एक बुजुर्ग ने बयां किया श्रीगणेश के प्रति अपना प्रेम)
महानगर के उस अंतिम बसस्टॉप पर जैसे ही कंडक्टर ने बस रोक दरवाज़ा खोला, नीचे खड़े एक देहाती बुज़ुुर्ग ने चढ़ने के लिए हाथ बढ़ाया। एक ही हाथ से सहारा ले डगमगाते क़दमों से वे बस में चढ़े, क्योंकि दूसरे हाथ में थी भगवान गणेश की एक अत्यंत मनोहर बालमूर्ति थी।
गांव जाने वाली उस आख़िरी बस में पांच-छह सवारों के चढ़ने के बाद पैर रखने की जगह भी बची नहीं थी।
बस चलने पर हाथ की मूर्ति को संभाल, उन्हें संतुलन बनाने की असफल कोशिश करते देख जब कंडक्टर ने अपनी सीट ख़ाली करते हुए कहा कि *दद्दा आप यहां बैठ जाइए,* तो वे उस मूर्ति को पेट से सटा आराम से उस सीट पर बैठ गए।
कुछ ही मिनटों में बाल गणेश की वह प्यारी-सी मूर्ति सब के कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र बन गई। अनायास कुछ जोड़ी हाथ श्रद्धा से उस ओर जुड़ गए।
कंडक्टर पीछे के सवारियो से पैसे लेता दद्दा के सामने आ खड़ा हुआ और पूछा, *‘कहां जाओगे दद्दा’*
जवाब देते हुए मूर्ति को थोड़ा इधर-उधर कर उन्होंने धोती की अंटी से पैसे निकालने की असफल कोशिश की।
उन्हें परेशान होता देखकर कंडक्टर ने कहा, *‘अभी रहने दीजिए। उतरते वक़्त दे दीजिएगा।’*
एक बार फिर दद्दा गणपति की मूर्ति को पेट से सटाकर आश्वस्त होकर बैठ गए।
बस अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी। सबका टिकट काटकर कंडक्टर एक सीट का सहारा लेकर खड़ा हो गया और अनायास उनसे पूछ बैठा, *‘दद्दा, आपके गांव में भी तो गणेश की मूर्ति मिलती होगी न, फिर इस उम्र में दो घंटे का सफ़र और इतनी दौड़-धूप करके शहर से यह गणेश की मूर्ति क्यूं ले जा रहे हैं?’*
प्रश्न सुनकर दद्दा मुस्कराते हुए बोले, *‘हां, आजकल तो त्योहार आते ही सब तरफ़ दुकानें सज जाती हैं, गांव में भी मिलती हैं मूर्तियां, पर ऐसी नहीं। देखो यह कितनी प्यारी और जीवंत है।’*
फिर संजीदगी से कहने लगे, *‘यहां से मूर्ति ले जाने की भी एक कहानी है बेटा। दरअसल हम पति-पत्नी को भगवान ने संतान सुख से वंचित रखा। सारे उपचार, तन्त्र-मन्त्र सब किए, फिर नसीब मानकर स्वीकार भी कर लिया और काम-धंधे में मन लगा लिया।..पन्द्रह साल पहले काम के सिलसिले में हम दोनों इसी शहर में आए थे। गणेश पूजा का त्योंहार नज़दीक था तो मूर्ति और पूजा का सामान ख़रीदने यहां बाज़ार गए। अचानक पत्नी की नज़र एकदम ऐसी ही एक मूर्ति पर पड़ी और उसका मातृत्व जाग उठा। ‘मेरा बच्चा’ कहते हुए उसने उस मूर्ति को सीने से लगा लिया। सालों का दर्द आंखों से बह निकला, मूर्तिकार भी यह देखकर भावविह्वल हो गया और मैंने उससे हर साल इसी सांचे की हूबहू ऐसी ही मूर्ति देने का वादा ले लिया। बस! तभी से यह सिलसिला शुरू है। दो साल पहले तक वह भी साथ आती रही अपने बाल गणेश को लेने, पर अब घुटनों के दर्द से लाचार है। मेरी भी उम्र में हो रही है, फिर भी सिर्फ़ दस दिन के लिए ही क्यूं न हो, उसका यह सुख नहीं छीनना चाहता, इसलिए अपने बाल गणेश को बड़े जतन से घर ले जाता हूं।’*
अब तक आसपास के लोगों में अच्छा-ख़ासा कौतूहल जाग चुका था। कुछ लोग अपनी सीट से झांककर तो कुछ उचककर मूर्ति को देख मुस्करा के हाथ जोड़ने लगे।
तभी पिछली सीट पर बैठी महिला ने चेहरा आगे की ओर कर पूछा, *‘दद्दा, फिर विसर्जित नहीं करते क्या मूर्ति?’*
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ दद्दा ने कहा, *‘अब भगवान स्वरूप स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करते हैं तो विसर्जन तो करते ही हैं, पर इस वियोग के कारण ही इन दस दिनों में उसके हृदय से मानो वात्सल्य का सोता फूट पड़ता है, जिससे हमारा जीवन बदल जाता है। अभी भी रंगोली डाल, आम के तोरण से द्वार सजाकर, वहीं पर राह देखते बैठी होगी। पहुंचने पर राई और मिर्च से कड़क नज़र उतारती है। पूछो मत, छोटा-सा लोटा, गिलास, थाली, चम्मच सब हैं हमारे बाल गणेश के पास। यही नहीं रंगबिरंगे छोटे कपड़ों का एक बैग भी बना रखा है उसने, इसलिए जब तक संभव होगा, उसे यह सुख देता रहूंगा,’* कहते-कहते दद्दा का गला रुंध गया।
यह सुनकर किसी की आंखें नम हुईं तो किसी का हृदय करुणा से भर गया। बस निर्बाध गति से आगे बढ़ रही थी और दद्दा का गांव आने ही वाला था, इसलिए उन्हें मूर्ति संभालकर खड़े होते देख पास खड़े व्यक्ति ने कहा, *‘लाइए, मूर्ति मुझे दीजिए’* तो उसके हाथों में मूर्ति को धीरे से थमाकर, धोती की अंटी से पैसे निकालकर कंडक्टर को देते हुए दद्दा ने कहा, *‘लो बेटा, डेढ़ टिकट काटना।’*
यह सुनकर कंडक्टर ने आश्चर्य से कहा, *‘अरे आप तो अकेले आए हैं न, फिर ये डेढ़ टिकट?’*
दद्दा ने मुस्कराते हुए कहा, *‘दोनों नहीं आए क्या? एक मैं और एक यह हमारा बाल गणेश।’*
यह सुनते ही सब उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगे। लोगों के असमंजस को दूर करते हुए उन्होंने फिर कहा, *‘अरे उलझन में क्यूं पड़े हो सब! जिसे देखकर सभी का भाव जागा वह क्या केवल मूर्ति है? जिसे भगवान मानते हैं, प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं वह क्या केवल मिट्टी है? अरे हमसे ज्यादा जीवंत है वह। हम भले ही उसे भगवान मान उससे हर चीज़ मांग लेते हैं, पर उसे तो हमारा प्यार और आलिंगन ही चाहिए।’*
यह कहते हुए दद्दा का कंठ भावातिरेक से अवरुद्ध हो गया ।
उनकी बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुनते कंडक्टर सहित सहयात्री करुणा और वात्सल्य के इस अनोखे सागर में गोते लगा रहे थे कि उनका गांव आ गया और एक झटके से बस रुक गई। कंडक्टर ने डेढ़ टिकट के पैसे काटकर बचे पैसे और टिकट उन्हें थमाकर आदर से दरवाज़ा खोला।
नीचे उतरकर दद्दा ने जब अपने बाल गणेश को थामने उस यात्री की ओर हाथ बढ़ाए तो कंडक्टर सहित सबके मुंह से अनायास निकला, *‘देखिए दद्दा संभाल के’* और दद्दा किसी नन्हे शिशु की तरह उस मूर्ति को दोनों बांहों में थाम तेज़ क़दमों से पगडंडी पर उतर गए।
🙏🌹🙏
यह कहते हुए दद्दा का कंठ भावातिरेक से अवरुद्ध हो गया ।
उनकी बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुनते कंडक्टर सहित सहयात्री करुणा और वात्सल्य के इस अनोखे सागर में गोते लगा रहे थे कि उनका गांव आ गया और एक झटके से बस रुक गई। कंडक्टर ने डेढ़ टिकट के पैसे काटकर बचे पैसे और टिकट उन्हें थमाकर आदर से दरवाज़ा खोला।
नीचे उतरकर दद्दा ने जब अपने बाल गणेश को थामने उस यात्री की ओर हाथ बढ़ाए तो कंडक्टर सहित सबके मुंह से अनायास निकला, *‘देखिए दद्दा संभाल के’* और दद्दा किसी नन्हे शिशु की तरह उस मूर्ति को दोनों बांहों में थाम तेज़ क़दमों से पगडंडी पर उतर गए।
🙏🌹🙏
*_🤔लोग क्या कहेंगे....?_*
*_☝🏻एक दिन सुबह के समय एक आदमी सड़क पर घूमने निकला। वह कुछ ही दूर गया था। कि गली से बहुत से कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनाई दी। उसने गली में झांककर देखा तो एक लड़का कूड़ा-कचरा उठा रहा था और उस लड़के पर कुछ कुत्ते भौंक रहे थे।_*
*_🤔इसके बाद जो हुआ, यह देखकर वह आदमी चौंक गया। उस आदमी ने देखा की उस लड़के के चेहरे पर डर के भाव नहीं थे। इतना ही नहीं वह उन कुत्तों पर भी ध्यान नहीं दे रहा था। वह लड़का चुप-चाप सड़क से कूड़ा-कचरा उठाने में लगा हुआ था। कचरा उठाने के बाद वह दूसरी गली में गया।_*
*_🤫वहां भी कुछ कुत्तो उसे देखकर भौंकने लगे। वहां भी वह लड़का चुप-चाप कूड़ा-कचरा उठाता रहा। उसने उन कुत्तों पर भी ध्यान नहीं दिया। कचरा उठाने के बाद वह लड़का चला गया। उस दिन उस लड़के ने सौ-दो-सौ रुपये कमा लिये और भौकने वाले भौंकते रह गये।_*
*_💪🏻आप भी उसी लड़के की तरह सोचेंगे तो आप कभी भी पीछे नहीं रहेंगे। आपने जिस भी काम की शुरुआत की है। उसमे आप सफलता जरूर प्राप्त करेंगे।_*
*_👦कहानी का नैतिक आप जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहते है तो आपको लोगो के बारे में सोचना छोड़ना होगा। आपने सूना ही होगा, लोग तो कहेंगे, लोगो का काम है कहना।_*
*_☝🏻एक दिन सुबह के समय एक आदमी सड़क पर घूमने निकला। वह कुछ ही दूर गया था। कि गली से बहुत से कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनाई दी। उसने गली में झांककर देखा तो एक लड़का कूड़ा-कचरा उठा रहा था और उस लड़के पर कुछ कुत्ते भौंक रहे थे।_*
*_🤔इसके बाद जो हुआ, यह देखकर वह आदमी चौंक गया। उस आदमी ने देखा की उस लड़के के चेहरे पर डर के भाव नहीं थे। इतना ही नहीं वह उन कुत्तों पर भी ध्यान नहीं दे रहा था। वह लड़का चुप-चाप सड़क से कूड़ा-कचरा उठाने में लगा हुआ था। कचरा उठाने के बाद वह दूसरी गली में गया।_*
*_🤫वहां भी कुछ कुत्तो उसे देखकर भौंकने लगे। वहां भी वह लड़का चुप-चाप कूड़ा-कचरा उठाता रहा। उसने उन कुत्तों पर भी ध्यान नहीं दिया। कचरा उठाने के बाद वह लड़का चला गया। उस दिन उस लड़के ने सौ-दो-सौ रुपये कमा लिये और भौकने वाले भौंकते रह गये।_*
*_💪🏻आप भी उसी लड़के की तरह सोचेंगे तो आप कभी भी पीछे नहीं रहेंगे। आपने जिस भी काम की शुरुआत की है। उसमे आप सफलता जरूर प्राप्त करेंगे।_*
*_👦कहानी का नैतिक आप जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहते है तो आपको लोगो के बारे में सोचना छोड़ना होगा। आपने सूना ही होगा, लोग तो कहेंगे, लोगो का काम है कहना।_*
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐सास और बहू💐💐*
अरे मधु ... वट सावित्री के व्रत के दिन भी तूने मेंहदी नहीं लगाई... पहले तो हमेशा लगाती थी.... और वो तेरी शादी वाली लाल चुनरी भी नहीं पहनी आज ....।,,
" वो आंटी जी.... बस जल्दी जल्दी में भूल गई । ,,
कहकर मधु नजरें चुराकर आगे जाकर अपनी पूजा करने लगी । दर असल उसे काम काम में याद ही नहीं रहा कि मेंहदी लगानी है, लेकिन रह रहकर उसका ध्यान भी मंदिर में आई बाकी औरतों के हाथों पर जा रहा था । सबके हाथों में रची मेंहदी देखकर आज उसे अपनी सासु माँ की बहुत याद आ रही थी....। कैसे हर त्यौहार के पहले दिन ही वो बोलने लगती थीं , " बहु.... मेंहदी जरूर लगा लेना । त्यौहार पर खाली हाथ! अच्छे नहीं लगते .... ।,,
सास की इस बात पर मधु को बहुत खीझ भी आती थी। वो बुदबुदाती रहती " घर के काम करूँ या मेंहदी लगाकर बैठ जाऊँ??? ,,
सासु माँ भी शायद उसके मन की बात समझ जाती थी और कहतीं,
" अरे बहु.. आजकल तो रेडिमेड मेंहदी की कीप आती हैं.. आधे घंटे में ही रच भी जाती हैं। हमारे टाइम में तो खुद ही मेंहदी घोल कर कीप बनानी पड़ती थी । ऊपर से कम से कम तीन चार घंटे तक उसे सुखाना भी पड़ता था ।
.... चाय वाय तो में भी बना दूंगी तूं जा मेंहदी लगा ले। ,,
उनके बार बार टोकने पर मधु मेंहदी लगा लेती थी । जब सुबह अपने गोरे हाथों में रची हुई मेंहदी देखती तो खुश भी हो जाती थी । मौहल्ले की सारी औरतें जब उसकी मेंहदी की तारिफ़ करती थीं तो उसे अपनी सासु माँ पर बहुत प्यार आता था...।
मंदिर से घर वापस आकर मधु चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर में मधु का बेटा आरव भागते हुए आया और बोला, " मम्मी मम्मी... कुछ खाने को दो ना । ,,
" बेटा वहाँ बिस्किट रखे हैं अभी वो खा लो। ,,
" मुझे नहीं खाने बिस्किट..। पहले तो आप मठरी और लड्डू बनाती थीं लेकिन दादी के जाने के बाद क्यों नहीं बनातीं । ,, आरव ने मुंह फुलाते हुए कहा।
मधु चुप थी..... कहती भी क्या?? सच में सास के जाने के बाद उसने मठरी और लड्डू नहीं बनाए थे । सासु माँ तो पीछे पड़ी रहती थीं, " बहु घर में बनाई हुई चीजें अच्छी रहती हैं और साथ साथ बरकत भी करती हैं । घर में अचानक से कोई मेहमान आ जाए तो भी चाय के साथ नाश्ते के लिए बाहर नहीं भागना पड़ता। ,,
मधु को उस वक्त उनकी बातें अच्छी नहीं लगती थीं । वो कहती , " आजकल सब कुछ रेडिमेड भी तो आता है... ये सब बनाने के चक्कर में सारा दिन निकल जाता है । ,,
लेकिन सासु माँ नहीं मानती और खुद ही मठरी बनाने लग जातीं । फिर मधु को ना चाहते हुए भी ये सब बनवाना पड़ता था ।
ये सब बातें याद करते करते मधु अनमनी हो रही थी । घर के काम करते करते दोपहर हो गई थी । अचानक से उसका सर घूमने लगा तब उसे याद आया कि उसने सुबह से पानी भी नहीं पीया है ।
जब उसकी सास थीं तो व्रत वाले दिन सुबह से ही पीछे पड़ जाती थीं ।
कहतीं " पहले थोड़ा जूस निकाल कर पी ले फिर घर के काम कर लेना । नहीं तो गर्मी में चक्कर आने लगेगा। ,,
आज ये सब बातें मधु को अंदर ही अंदर कचोट रही थीं । उसे हमेशा अपनी सास का टोकना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन अब उसे टोकने वाला कोई नहीं था । फिर भी वो खुश नहीं थी।
कहीं बाहर जाने से पहले भी उसे अब दस बार सोचना पड़ता है। घर के सारे काम करके जाओ फिर आते ही फिर से काम में जुट जाओ। यहाँ तक की घर की चिंता भी लगी रहती है कि कहीं कुछ खुला तो नहीं छोड़ आई । कहीं कपड़े छत पर तो नहीं रह गए ।
सब की नजरों में तो वो आज आजाद थी लेकिन वो कितना बंध गई है ये बात उसके अलावा कोई नहीं जानता था... ।
दोस्तों, हमारे बड़ो का साथ हमारे सर पर छत्रछाया सा होता है जो हमेशा हमारे लिए कवच की तरह काम करता है ... लेकिन उनकी अहमियत को हम नजर अंदाज करते रहते हैं । जब वो हमसे दूर हो जाते हैं तब उनकी कमी का एहसास हमें पल पल होता रहता है.... ।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है। ओम शांति।*
🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏
*💐💐सास और बहू💐💐*
अरे मधु ... वट सावित्री के व्रत के दिन भी तूने मेंहदी नहीं लगाई... पहले तो हमेशा लगाती थी.... और वो तेरी शादी वाली लाल चुनरी भी नहीं पहनी आज ....।,,
" वो आंटी जी.... बस जल्दी जल्दी में भूल गई । ,,
कहकर मधु नजरें चुराकर आगे जाकर अपनी पूजा करने लगी । दर असल उसे काम काम में याद ही नहीं रहा कि मेंहदी लगानी है, लेकिन रह रहकर उसका ध्यान भी मंदिर में आई बाकी औरतों के हाथों पर जा रहा था । सबके हाथों में रची मेंहदी देखकर आज उसे अपनी सासु माँ की बहुत याद आ रही थी....। कैसे हर त्यौहार के पहले दिन ही वो बोलने लगती थीं , " बहु.... मेंहदी जरूर लगा लेना । त्यौहार पर खाली हाथ! अच्छे नहीं लगते .... ।,,
सास की इस बात पर मधु को बहुत खीझ भी आती थी। वो बुदबुदाती रहती " घर के काम करूँ या मेंहदी लगाकर बैठ जाऊँ??? ,,
सासु माँ भी शायद उसके मन की बात समझ जाती थी और कहतीं,
" अरे बहु.. आजकल तो रेडिमेड मेंहदी की कीप आती हैं.. आधे घंटे में ही रच भी जाती हैं। हमारे टाइम में तो खुद ही मेंहदी घोल कर कीप बनानी पड़ती थी । ऊपर से कम से कम तीन चार घंटे तक उसे सुखाना भी पड़ता था ।
.... चाय वाय तो में भी बना दूंगी तूं जा मेंहदी लगा ले। ,,
उनके बार बार टोकने पर मधु मेंहदी लगा लेती थी । जब सुबह अपने गोरे हाथों में रची हुई मेंहदी देखती तो खुश भी हो जाती थी । मौहल्ले की सारी औरतें जब उसकी मेंहदी की तारिफ़ करती थीं तो उसे अपनी सासु माँ पर बहुत प्यार आता था...।
मंदिर से घर वापस आकर मधु चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर में मधु का बेटा आरव भागते हुए आया और बोला, " मम्मी मम्मी... कुछ खाने को दो ना । ,,
" बेटा वहाँ बिस्किट रखे हैं अभी वो खा लो। ,,
" मुझे नहीं खाने बिस्किट..। पहले तो आप मठरी और लड्डू बनाती थीं लेकिन दादी के जाने के बाद क्यों नहीं बनातीं । ,, आरव ने मुंह फुलाते हुए कहा।
मधु चुप थी..... कहती भी क्या?? सच में सास के जाने के बाद उसने मठरी और लड्डू नहीं बनाए थे । सासु माँ तो पीछे पड़ी रहती थीं, " बहु घर में बनाई हुई चीजें अच्छी रहती हैं और साथ साथ बरकत भी करती हैं । घर में अचानक से कोई मेहमान आ जाए तो भी चाय के साथ नाश्ते के लिए बाहर नहीं भागना पड़ता। ,,
मधु को उस वक्त उनकी बातें अच्छी नहीं लगती थीं । वो कहती , " आजकल सब कुछ रेडिमेड भी तो आता है... ये सब बनाने के चक्कर में सारा दिन निकल जाता है । ,,
लेकिन सासु माँ नहीं मानती और खुद ही मठरी बनाने लग जातीं । फिर मधु को ना चाहते हुए भी ये सब बनवाना पड़ता था ।
ये सब बातें याद करते करते मधु अनमनी हो रही थी । घर के काम करते करते दोपहर हो गई थी । अचानक से उसका सर घूमने लगा तब उसे याद आया कि उसने सुबह से पानी भी नहीं पीया है ।
जब उसकी सास थीं तो व्रत वाले दिन सुबह से ही पीछे पड़ जाती थीं ।
कहतीं " पहले थोड़ा जूस निकाल कर पी ले फिर घर के काम कर लेना । नहीं तो गर्मी में चक्कर आने लगेगा। ,,
आज ये सब बातें मधु को अंदर ही अंदर कचोट रही थीं । उसे हमेशा अपनी सास का टोकना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन अब उसे टोकने वाला कोई नहीं था । फिर भी वो खुश नहीं थी।
कहीं बाहर जाने से पहले भी उसे अब दस बार सोचना पड़ता है। घर के सारे काम करके जाओ फिर आते ही फिर से काम में जुट जाओ। यहाँ तक की घर की चिंता भी लगी रहती है कि कहीं कुछ खुला तो नहीं छोड़ आई । कहीं कपड़े छत पर तो नहीं रह गए ।
सब की नजरों में तो वो आज आजाद थी लेकिन वो कितना बंध गई है ये बात उसके अलावा कोई नहीं जानता था... ।
दोस्तों, हमारे बड़ो का साथ हमारे सर पर छत्रछाया सा होता है जो हमेशा हमारे लिए कवच की तरह काम करता है ... लेकिन उनकी अहमियत को हम नजर अंदाज करते रहते हैं । जब वो हमसे दूर हो जाते हैं तब उनकी कमी का एहसास हमें पल पल होता रहता है.... ।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है। ओम शांति।*
🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏
पाप का फल !
*एक मांसाहारी परिवार था...*
*परिवार का प्रमुख रोज एक मुर्गे को हलाल करता था।मुर्गा चीखता और वह अट्टहास भरता !!!*
*उसके तीन अबोध बच्चे थे , बड़ा करीब चार वर्ष का था, दूसरा ढाई वर्ष का और तीसरा गोद का बच्चा था , उसके बच्चे जब पिता के इन कृत्यों को देखते तो उन्हें लगता कि उनके पिता कोई खेल खेलते हैं और पिता को उसमें बड़ा आनन्द आता है ।*
*एक दिन पिता किसी काम से कहीं बाहर गये , घर में मुर्गा नहीं आया तो बच्चों ने सोचा कि आज पिताजी नहीं हैं तो चलो आज हम ही यह खेल खेलें, बड़े बेटे ने छोटे को लिटाया, लिटाकर एक पैर से उसे दबाया, एक हाथ से सिर दबाया और उसके गले को छुरे से रेत दिया , जैसे ही गला रेता, बच्चा चीख पड़ा , भाई की चीख सुनकर यह भी घबराकर भागा।*
*चीख की आवाज़ सुनी, तो माँ जो अपने सबसे छोटे बेटे को टब में नहला रही थी, वह उसे वहीं छोड़कर आवाज की दिशा की ओर भागी , बेटे ने देखा माँ आ रही है और अब मुझे मारेगी तो उसने अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया और छत से कूदकर अपनी जान दे दी, तो इधर वह बेटा भी गले की नस कट जाने के कारण मर चुका था , माँ दोनों बेटों का हाल देखकर वहीं मूर्छित होकर गिर गई।*
*काफी देर बाद जब माँ को होश आया तो याद आया कि वह छोटे बेटे को टब में नहलाता हुआ छोड़कर आई थी, मगर तब तक काफी समय गुजर चुका था , जब वह नीचे आई, तो उसकी गोद का बालक टब में ही शान्त हो चुका था।*
*ये है पाप का कहर , आदमी पाप करता है, तो उसका परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है। मगर अफसोस, कि मनुष्य सब चीजों को देखते हुए समझते हुए भी पाप करने से भय नहीं खाता।*
*जो बोयेंगे, ऐसा ही काटेंगे....*
*पाप का फल, आज नही तो कल*!
*एक मांसाहारी परिवार था...*
*परिवार का प्रमुख रोज एक मुर्गे को हलाल करता था।मुर्गा चीखता और वह अट्टहास भरता !!!*
*उसके तीन अबोध बच्चे थे , बड़ा करीब चार वर्ष का था, दूसरा ढाई वर्ष का और तीसरा गोद का बच्चा था , उसके बच्चे जब पिता के इन कृत्यों को देखते तो उन्हें लगता कि उनके पिता कोई खेल खेलते हैं और पिता को उसमें बड़ा आनन्द आता है ।*
*एक दिन पिता किसी काम से कहीं बाहर गये , घर में मुर्गा नहीं आया तो बच्चों ने सोचा कि आज पिताजी नहीं हैं तो चलो आज हम ही यह खेल खेलें, बड़े बेटे ने छोटे को लिटाया, लिटाकर एक पैर से उसे दबाया, एक हाथ से सिर दबाया और उसके गले को छुरे से रेत दिया , जैसे ही गला रेता, बच्चा चीख पड़ा , भाई की चीख सुनकर यह भी घबराकर भागा।*
*चीख की आवाज़ सुनी, तो माँ जो अपने सबसे छोटे बेटे को टब में नहला रही थी, वह उसे वहीं छोड़कर आवाज की दिशा की ओर भागी , बेटे ने देखा माँ आ रही है और अब मुझे मारेगी तो उसने अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया और छत से कूदकर अपनी जान दे दी, तो इधर वह बेटा भी गले की नस कट जाने के कारण मर चुका था , माँ दोनों बेटों का हाल देखकर वहीं मूर्छित होकर गिर गई।*
*काफी देर बाद जब माँ को होश आया तो याद आया कि वह छोटे बेटे को टब में नहलाता हुआ छोड़कर आई थी, मगर तब तक काफी समय गुजर चुका था , जब वह नीचे आई, तो उसकी गोद का बालक टब में ही शान्त हो चुका था।*
*ये है पाप का कहर , आदमी पाप करता है, तो उसका परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है। मगर अफसोस, कि मनुष्य सब चीजों को देखते हुए समझते हुए भी पाप करने से भय नहीं खाता।*
*जो बोयेंगे, ऐसा ही काटेंगे....*
*पाप का फल, आज नही तो कल*!
नाईट स्टोरी🌝🌝🌝🌝♥♥♥♥♥♥♥सुखी आदमी की कमीज़
👕👕👕👕👕👕👕
एक बार एक राजा था। उसके पास सब कुछ था लेकिन वह सुखी नहीं था। वह समझ नहीं पाता था कि कैसे ख़ुश रहा जाए? उसे यह लगने लगा कि वह बीमार है जबकि वह बिलकुल स्वस्थ दिखता था।
राजा के आदेश पर राज्य के एक से एक अच्छे डॉक्टरों को बुलाया गया लेकिन कोई भी उसका इलाज नहीं कर पाया।
अंत में एक बुद्धिमान वैद्य ने राजा की मर्ज समझ ली। उसे एक युक्ति सूझी उसने कहा, "यदि महाराज एक रात्रि के लिए किसी ख़ुश व्यक्ति कि कमीज़ पहन कर सोएं तो इनकी बीमारी दूर हो सकती है।
सैनिकों को राज्य भर में किसी ख़ुश आदमी को खोजने और उसकी कमीज़ लाने का आदेश दिया गया। पूरे राज्य में खोजने पर भी कोई ख़ुश व्यक्ति खोजा नहीं जा सका।
किसी को अपनी निर्धनता का दुःख था तो कोई धनवान और धन की लालसा पाले हुआ था। किसी को दुःख था कि उसकी पत्नी का निधन हो गया था, तो किसी को शिकायत थी कि उसकी पत्नी जीवित क्यों है! किसी को संतान न होने का दुःख था तो कोई संतान से दुःखी था । वस्तुतः सब जन दुःखी थे। कहते भी हैं, ‘नानक दुखिया सब संसार'।
तभी सैनिकों को गाँव के दवार पर एक भिखारी मदमस्त लेटा हुआ दिखाई पड़ा जो अपनी मस्ती में सीटी बजा-बजा कर, हँस-हँसकर गाना गाता हुआ लोटपोट हुए जाता था। वह अत्यधिक प्रसन्नचित्त जान पड़ता था।
सैनिक उसके पास रुकते हुए उसका अभिवादन कर उससे कहा, "ईश्वर आपका भला करे। आप काफी प्रसन्न दिखाई देते हैं।
"हाँ, मैं ख़ुश हूँ और मुझे किसी बात का कोई दुःख नहीं है।"
सैनिक उसे पाकर अभिभूत हो गये थे। उन्होंने उसे कहा कि यदि वह एक रात के लिए अपनी कमीज़ उधारी दे दे तो वे उसे एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ दे देंगे।
यह सुनकर वह जोर-जोर से हँसते-हँसते लोटपोट हो गया फिर किसी तरह अपनी हँसी रोकते हुए बोला, " मैं अवश्य ही अपनी कमीज़ दे देता पर...! मेरे तन पर कोई वस्त्र नहीं है।
में एक आत्मा हूं। एह शरीर आत्मा के कमीज है। आप शरीर को लेकर क्या करेंगे। आत्मा शरीर से निकले तो शरीर मृदा बन जाता हैं।
राजा को हर दिन का समाचार दिया जाता था जिससे वह यह जान सका कि दुनिया में कितने दुःख व्याप्त हैं। अब सैनिकों ने यह समाचार दिया कि उन्हें एक व्यक्ति मिला जो पूर्णतया प्रसन्न व संतुष्ट है लेकिन उसके पास तन ढकने को वस्त्र नहीं हैं!
अब राजा जीवन के गूढ़ तत्व को समझ गया। वह अपनी व्यर्थ के भ्रम को छोड़ कर जनता की भलाई में लग गया। अब राजा व प्रजा दोनों सुखी थे।। ओम शांति।।
😊😊😊😊😊😊😊
🤝🏼🤝🏼🤝🏼🤝🏼🤝🏼🤝🏼🤝🏼💥💥💥💥
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एक बार एक राजा था। उसके पास सब कुछ था लेकिन वह सुखी नहीं था। वह समझ नहीं पाता था कि कैसे ख़ुश रहा जाए? उसे यह लगने लगा कि वह बीमार है जबकि वह बिलकुल स्वस्थ दिखता था।
राजा के आदेश पर राज्य के एक से एक अच्छे डॉक्टरों को बुलाया गया लेकिन कोई भी उसका इलाज नहीं कर पाया।
अंत में एक बुद्धिमान वैद्य ने राजा की मर्ज समझ ली। उसे एक युक्ति सूझी उसने कहा, "यदि महाराज एक रात्रि के लिए किसी ख़ुश व्यक्ति कि कमीज़ पहन कर सोएं तो इनकी बीमारी दूर हो सकती है।
सैनिकों को राज्य भर में किसी ख़ुश आदमी को खोजने और उसकी कमीज़ लाने का आदेश दिया गया। पूरे राज्य में खोजने पर भी कोई ख़ुश व्यक्ति खोजा नहीं जा सका।
किसी को अपनी निर्धनता का दुःख था तो कोई धनवान और धन की लालसा पाले हुआ था। किसी को दुःख था कि उसकी पत्नी का निधन हो गया था, तो किसी को शिकायत थी कि उसकी पत्नी जीवित क्यों है! किसी को संतान न होने का दुःख था तो कोई संतान से दुःखी था । वस्तुतः सब जन दुःखी थे। कहते भी हैं, ‘नानक दुखिया सब संसार'।
तभी सैनिकों को गाँव के दवार पर एक भिखारी मदमस्त लेटा हुआ दिखाई पड़ा जो अपनी मस्ती में सीटी बजा-बजा कर, हँस-हँसकर गाना गाता हुआ लोटपोट हुए जाता था। वह अत्यधिक प्रसन्नचित्त जान पड़ता था।
सैनिक उसके पास रुकते हुए उसका अभिवादन कर उससे कहा, "ईश्वर आपका भला करे। आप काफी प्रसन्न दिखाई देते हैं।
"हाँ, मैं ख़ुश हूँ और मुझे किसी बात का कोई दुःख नहीं है।"
सैनिक उसे पाकर अभिभूत हो गये थे। उन्होंने उसे कहा कि यदि वह एक रात के लिए अपनी कमीज़ उधारी दे दे तो वे उसे एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ दे देंगे।
यह सुनकर वह जोर-जोर से हँसते-हँसते लोटपोट हो गया फिर किसी तरह अपनी हँसी रोकते हुए बोला, " मैं अवश्य ही अपनी कमीज़ दे देता पर...! मेरे तन पर कोई वस्त्र नहीं है।
में एक आत्मा हूं। एह शरीर आत्मा के कमीज है। आप शरीर को लेकर क्या करेंगे। आत्मा शरीर से निकले तो शरीर मृदा बन जाता हैं।
राजा को हर दिन का समाचार दिया जाता था जिससे वह यह जान सका कि दुनिया में कितने दुःख व्याप्त हैं। अब सैनिकों ने यह समाचार दिया कि उन्हें एक व्यक्ति मिला जो पूर्णतया प्रसन्न व संतुष्ट है लेकिन उसके पास तन ढकने को वस्त्र नहीं हैं!
अब राजा जीवन के गूढ़ तत्व को समझ गया। वह अपनी व्यर्थ के भ्रम को छोड़ कर जनता की भलाई में लग गया। अब राजा व प्रजा दोनों सुखी थे।। ओम शांति।।
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*एक रिटायर्ड अधिकारी को अपने ऑफिस जाने की जिज्ञासा हुई। वह अपने मन में बड़े-बड़े सपने लेकर जैसे कि :- मैं जब ऑफिस पहुंचूँगा तो सभी अधिकारी एवं कर्मचारी मेरा बढ़-चढ़कर स्वागत करेंगे तत्काल अच्छा नाश्ता मंगाया जाएगा आदि आदि। ऐसा सोचते सोचते वह अपने वाहन से ऑफिस जा रहा था। जैसे ही गेट पर पहुंचा तो गार्ड ने रोका और कहा कि "आप अंदर जाने से पहले गाड़ी बाहर ही साइड पर लगा दें"। इस पर अधिकारी भौचक्का रह गया, और कहा कि "अरे! तुम जानते नहीं हो, मैं यहां का ऑफिसर रहा हूं। गत वर्ष ही रिटायर हुआ हूं"। इस पर गार्ड बोला- "तब थे, अब नहीं हो। गाड़ी गेट के अंदर नहीं जाएगी"। अधिकारी बहुत नाराज हुआ और वहां के अधिकारी को फोन कर गेट पर बुलाया। अधिकारी गेट पर आया और रिटायर्ड चीफ ऑफिसर को अंदर ले गया।गाड़ी भी अंदर करवाई और अपने चेंबर में जाते ही वह चेयर पर बैठ गया और चपरासी से कहा- "साहब को जो भी कार्य हो, संबंधित कर्मचारी के पास ले जाकर बता दो"। चपरासी साहब को ले गया और संबंधित कर्मचारी के काउंटर पर छोड़ आया। चीफ साहब अवाक से खड़े सोचते रहे। कार्यालय आते समय जो सपने संजोए थे, वह चकनाचूर हो चुके थे। पद का घमंड धड़ाम हो चुका था। वह घर पर चले आए। काफी सोचने के बाद उन्होंने अपनी डायरी में लिखा- *एक विभाग के कर्मचारी शतरंज के मोहरों की तरह होते हैं। कोई राजा कोई वजीर कोई हाथी घोड़ा, ऊंट तो कोई पैदल बनता है। खेलने के बाद सभी मोहरों को एक थैले में डालकर अलग रख दिया जाता है। खेलने के बाद उसके पद का कोई महत्व नहीं रह जाता है। अतः इंसान को अपने परिवार और समाज को नहीं भूलना चाहिए। कितने भी ऊंचे पद पर पहुंच जाओ लौटकर अपने ही समाज में आओगे*।
सीख:-समाज से वास्ता हमेशा बनाये रखें, आपके कद और पद की गरिमा बनी रहेगी ।
सीख:-समाज से वास्ता हमेशा बनाये रखें, आपके कद और पद की गरिमा बनी रहेगी ।
*"धीरे चलो"*
🕉️🕉️🕉️
*नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा "यहां से नगर कितनी दूर है ?*
सुना है, सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है।
अब तो शाम होने ही वाली है। क्या मैं वहां पहुंच जाऊंगा ?'
*वृद्ध ने कहा "धीरे चलो तो पहुंच भी सकते हो।" भिक्षु यह सुनकर हैरत में पड़ गया।*
वह सोचने लगा कि लोग कहते हैं कि जल्दी से जाओ, पर यह तो विपरीत बात कह रहा है।
*भिक्षु तेजी से भागा। लेकिन रास्ता ऊबड़-खाबड़ और पथरीला था। थोड़ी देर बाद ही भिक्षु लड़खड़ाकर गिर पड़ा।*
*किसी तरह वह उठ तो गया लेकिन दर्द से परेशान था।*
उसे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। वह किसी तरह आगे बढ़ा लेकिन तब तक अंधेरा हो गया।
*उस समय वह नगर से थोड़ी ही दूर पर था। उसने देखा कि दरवाजा बंद हो रहा है। उसके ठीक पास से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु को देखा तो हंसने लगा भिक्षु ने नाराज होकर कहा, "तुम हंस क्यों रहे हो?"*
उस व्यक्ति ने कहा, 'आज आपकी जो हालत हुई है, वह कभी मेरी भी हुई थी। आप भी उस बाबा जी की बात नहीं समझ पाए जो नदी किनारे रहते हैं।'
*भिक्षु की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पूछा "साफ साफ बताओ भाई।*
" उस व्यक्ति ने कहा "जब बाबाजी कहते हैं कि धीरे चलो तो लोगों को अटपटा लगता है। *असल में वह बताना चाहते हैं कि रास्ता गड़बड़ है, अगर संभलकर चलोगे तो पहुंच सकते हो ।*
*कथा का तात्पर्य*
*जिंदगी में सिर्फ तेज भागना ही काफी नहीं है। सोच-समझकर संभलकर चलना ज्यादा काम आता है।*
✴️✴️✴️✴️✴️
🕉️🕉️🕉️
*नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा "यहां से नगर कितनी दूर है ?*
सुना है, सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है।
अब तो शाम होने ही वाली है। क्या मैं वहां पहुंच जाऊंगा ?'
*वृद्ध ने कहा "धीरे चलो तो पहुंच भी सकते हो।" भिक्षु यह सुनकर हैरत में पड़ गया।*
वह सोचने लगा कि लोग कहते हैं कि जल्दी से जाओ, पर यह तो विपरीत बात कह रहा है।
*भिक्षु तेजी से भागा। लेकिन रास्ता ऊबड़-खाबड़ और पथरीला था। थोड़ी देर बाद ही भिक्षु लड़खड़ाकर गिर पड़ा।*
*किसी तरह वह उठ तो गया लेकिन दर्द से परेशान था।*
उसे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। वह किसी तरह आगे बढ़ा लेकिन तब तक अंधेरा हो गया।
*उस समय वह नगर से थोड़ी ही दूर पर था। उसने देखा कि दरवाजा बंद हो रहा है। उसके ठीक पास से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु को देखा तो हंसने लगा भिक्षु ने नाराज होकर कहा, "तुम हंस क्यों रहे हो?"*
उस व्यक्ति ने कहा, 'आज आपकी जो हालत हुई है, वह कभी मेरी भी हुई थी। आप भी उस बाबा जी की बात नहीं समझ पाए जो नदी किनारे रहते हैं।'
*भिक्षु की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पूछा "साफ साफ बताओ भाई।*
" उस व्यक्ति ने कहा "जब बाबाजी कहते हैं कि धीरे चलो तो लोगों को अटपटा लगता है। *असल में वह बताना चाहते हैं कि रास्ता गड़बड़ है, अगर संभलकर चलोगे तो पहुंच सकते हो ।*
*कथा का तात्पर्य*
*जिंदगी में सिर्फ तेज भागना ही काफी नहीं है। सोच-समझकर संभलकर चलना ज्यादा काम आता है।*
✴️✴️✴️✴️✴️
निष्ठा पूर्वक कर्म
〰️〰️🌼〰️〰️
कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी।
ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा, “भगवन् ! थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है।
गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।” ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई ?
ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा।
वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा, “तपोधन कौशिक देव ! आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूँगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये।“ ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना ?
थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइये। कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे।
वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा, “भगवन् ! आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूँगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”
चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा, “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”
तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिकता का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
🙏🌹 ओम शांति 🌹🙏
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कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी।
ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा, “भगवन् ! थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है।
गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।” ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई ?
ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा।
वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा, “तपोधन कौशिक देव ! आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूँगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये।“ ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना ?
थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइये। कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे।
वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा, “भगवन् ! आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूँगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”
चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा, “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”
तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिकता का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
🙏🌹 ओम शांति 🌹🙏
*✍️आत्मा से तृप्त लोग*🆚🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*✍️दिल्ली बस स्टैंड पर बैठा, लेखक पंजाब जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। अभी बस काउंटर पर नही लगी थी। लेखक बैठा हुआ एक किताब पढ़ रहा था। उस को देखकर कोई दस साल की बच्ची उस के पास आकर बोली,*
*🙏"बाबू, पैन ले लो, दस के चार दे दूंगी। बहुत भूख लगी है कुछ खा लूंगी।"*
*✍️उसके साथ एक छोटा-सा लड़का भी था, शायद भाई हो उसका। लेखक ने कहा, "मुझे पैन तो नहीं चाहिए।"*
*✍️उसका जवाब इतना प्यारा था। उसने कहा,*
*"फिर हम कुछ खाएंगे कैसे?"*
*✍️लेखक ने कहा,*
*"मुझे पैन तो नहीं चाहिए पर तुम खाओगे कुछ जरूर।"*
*✍️लेखक के बैग में बिस्कुट के दो पैकेट थे, उस ने बैग से निकाल एक-एक पैकेट दोनों को पकड़ा दिया।*
*✍️पर उस की हैरानी की कोई हद ना रही जब उसने एक पैकेट वापिस करके कहा,*
*🙏"बाबू जी, एक ही काफी है, हम बाँट लेंगे।"*
*✍️लेखक हैरान हो गया जवाब सुन कर। लेखक ने दुबारा कहा,*
*"रख लो दोनों, कोई बात नहीं।"*
*✍️फिर आत्मा को झिझोड़ दिया उसके के जवाब ने। उसने कहा,*
*"तो फिर आप क्या खाओगे?"*
*✍️लेखक ने अंदर ही अंदर अपने आप से कहा कि*
*"यह होते हैं आत्मा से तृप्त लोग"।*🙏🆚🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*✍️बेशक कपड़े होण मैले,*
*पर इज्जत होवे कज्जी।*
*ढिडों बेशक भुखा होवे,*
*पर रूह होवे रज्जी।। ओम शांति।।*✍️🆚🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*✍️दिल्ली बस स्टैंड पर बैठा, लेखक पंजाब जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था। अभी बस काउंटर पर नही लगी थी। लेखक बैठा हुआ एक किताब पढ़ रहा था। उस को देखकर कोई दस साल की बच्ची उस के पास आकर बोली,*
*🙏"बाबू, पैन ले लो, दस के चार दे दूंगी। बहुत भूख लगी है कुछ खा लूंगी।"*
*✍️उसके साथ एक छोटा-सा लड़का भी था, शायद भाई हो उसका। लेखक ने कहा, "मुझे पैन तो नहीं चाहिए।"*
*✍️उसका जवाब इतना प्यारा था। उसने कहा,*
*"फिर हम कुछ खाएंगे कैसे?"*
*✍️लेखक ने कहा,*
*"मुझे पैन तो नहीं चाहिए पर तुम खाओगे कुछ जरूर।"*
*✍️लेखक के बैग में बिस्कुट के दो पैकेट थे, उस ने बैग से निकाल एक-एक पैकेट दोनों को पकड़ा दिया।*
*✍️पर उस की हैरानी की कोई हद ना रही जब उसने एक पैकेट वापिस करके कहा,*
*🙏"बाबू जी, एक ही काफी है, हम बाँट लेंगे।"*
*✍️लेखक हैरान हो गया जवाब सुन कर। लेखक ने दुबारा कहा,*
*"रख लो दोनों, कोई बात नहीं।"*
*✍️फिर आत्मा को झिझोड़ दिया उसके के जवाब ने। उसने कहा,*
*"तो फिर आप क्या खाओगे?"*
*✍️लेखक ने अंदर ही अंदर अपने आप से कहा कि*
*"यह होते हैं आत्मा से तृप्त लोग"।*🙏🆚🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*✍️बेशक कपड़े होण मैले,*
*पर इज्जत होवे कज्जी।*
*ढिडों बेशक भुखा होवे,*
*पर रूह होवे रज्जी।। ओम शांति।।*✍️🆚🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*Most powerful Positive Affirmations*
1. मेरे जीवन में हर तरफ से खुशियाँ आ रही हैं।
2. मुझे स्वयं से बहुत प्रेम है।
3. मुझे अपने परिवार के सदस्यों से बहुत प्रेम है।
4. मेरा जीवन सुन्दर है।
5. मेरे पास रोटी, कपड़ा और घर है।
6. मेरा जीवन सुखी है।
7. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी मदद करता है।
8. मेरी आय दिन-रात बढ़ती जा रही है।
9. मेरे परिवार के सदस्य दिन-रात और अच्छे बनते जा रहे हैं।
10. मेरे परिवार के सारे सदस्य मुझसे बहुत प्यार करते हैं।
11. मेरे एवं मेरे परिवार के सदस्यों के ऊपर ईश्वर की कृपा है।
12. लोग मेरे कार्यों से खुश होकर मुझे पर्याप्त से ज्यादा धन देते हैं।
13. खुश रहना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए मैं पर्याप्त से ज्यादा धन कमाता हूँ।
14. मेरे परिवार के सदस्य अपने जीवन में खुश हैं।
15. मैं उन सभी लोगों को क्षमा करता हूँ जिन्होंने कभी मुझे दुख पहुँचाया।
16. मैं उनसे माफी माँगता हूँ जिनको मुझसे कभी दु:ख पहुँचा हो।
17.मैं विश्व की जीवन दायिनी शक्ति से प्रार्थना करता हूँकि समस्त प्राणियों के जीवन में खुशियाँ भरें।
18. मैं और मेरे परिवार के सारे सदस्य शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।
19. मेरा एवं मेरे परिवार के सदस्यों के विचार सकारात्मक हैं।
20. मेरे परिवार के सदस्यों में बहुत अच्छा तालमेल है और आपसी एकता एवं भाईचारे की भावना से एक साथ मिलकर खुश रहते हैं।
21. मैं सचमुच हृदय से कृतज्ञ हूँ कि मेरे पास एक अच्छा परिवार हैं।
धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद,
याद रखें कि आपके विचार आपकी वास्तविकता बनाते हैं! इसलिए प्रतिदिन इन Affirmations का अभ्यास अपने अवचेतन में आसानी से टैप करने के लिए करें, और जल्द ही आप सफलता के लिए अपने दिमाग को पुन: प्रोग्राम करने के शक्तिशाली प्रभाव महसूस करेंगे।✨🪄🧘♂️🪄✨
1. मेरे जीवन में हर तरफ से खुशियाँ आ रही हैं।
2. मुझे स्वयं से बहुत प्रेम है।
3. मुझे अपने परिवार के सदस्यों से बहुत प्रेम है।
4. मेरा जीवन सुन्दर है।
5. मेरे पास रोटी, कपड़ा और घर है।
6. मेरा जीवन सुखी है।
7. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी मदद करता है।
8. मेरी आय दिन-रात बढ़ती जा रही है।
9. मेरे परिवार के सदस्य दिन-रात और अच्छे बनते जा रहे हैं।
10. मेरे परिवार के सारे सदस्य मुझसे बहुत प्यार करते हैं।
11. मेरे एवं मेरे परिवार के सदस्यों के ऊपर ईश्वर की कृपा है।
12. लोग मेरे कार्यों से खुश होकर मुझे पर्याप्त से ज्यादा धन देते हैं।
13. खुश रहना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए मैं पर्याप्त से ज्यादा धन कमाता हूँ।
14. मेरे परिवार के सदस्य अपने जीवन में खुश हैं।
15. मैं उन सभी लोगों को क्षमा करता हूँ जिन्होंने कभी मुझे दुख पहुँचाया।
16. मैं उनसे माफी माँगता हूँ जिनको मुझसे कभी दु:ख पहुँचा हो।
17.मैं विश्व की जीवन दायिनी शक्ति से प्रार्थना करता हूँकि समस्त प्राणियों के जीवन में खुशियाँ भरें।
18. मैं और मेरे परिवार के सारे सदस्य शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।
19. मेरा एवं मेरे परिवार के सदस्यों के विचार सकारात्मक हैं।
20. मेरे परिवार के सदस्यों में बहुत अच्छा तालमेल है और आपसी एकता एवं भाईचारे की भावना से एक साथ मिलकर खुश रहते हैं।
21. मैं सचमुच हृदय से कृतज्ञ हूँ कि मेरे पास एक अच्छा परिवार हैं।
धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद,
याद रखें कि आपके विचार आपकी वास्तविकता बनाते हैं! इसलिए प्रतिदिन इन Affirmations का अभ्यास अपने अवचेतन में आसानी से टैप करने के लिए करें, और जल्द ही आप सफलता के लिए अपने दिमाग को पुन: प्रोग्राम करने के शक्तिशाली प्रभाव महसूस करेंगे।✨🪄🧘♂️🪄✨
♦️♦️♦️रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️
👉 हमारे शब्द ही कर्मो के फल होते हैं 🏵️
🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅
18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष ' जैसा कर दिया था ...
शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी,
शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..
पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था ।
अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।
तभी,
श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं ।
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है ...
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं ।
थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।
द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।
कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !
वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है..
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !
तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव भी समाप्त हो गए तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !
द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?
कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।
द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?
कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो...
लेकिन,
तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।
द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?
तुम बहुत कुछ कर सकती थी
कृष्ण:- जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ...
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया...
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।
और
उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया...
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।
वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता...
तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।
"हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं" द्रोपदी...
और, हमें
"अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना
बहुत ज़रूरी होता है"...
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं... अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।
संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है...
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है...
इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे, .
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।
क्योंकि महाभारत हमारे अंदर ही छिपा हुआ है ।
🌸🙏🏻जय श्रीकृष्ण*🙏🏻🌸
👉 हमारे शब्द ही कर्मो के फल होते हैं 🏵️
🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅
18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष ' जैसा कर दिया था ...
शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी,
शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..
पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था ।
अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।
तभी,
श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं ।
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है ...
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं ।
थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।
द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।
कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !
वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है..
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !
तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव भी समाप्त हो गए तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !
द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?
कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।
द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?
कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो...
लेकिन,
तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।
द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?
तुम बहुत कुछ कर सकती थी
कृष्ण:- जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ...
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया...
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।
और
उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया...
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।
वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता...
तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।
"हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं" द्रोपदी...
और, हमें
"अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना
बहुत ज़रूरी होता है"...
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं... अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।
संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है...
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है...
इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे, .
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।
क्योंकि महाभारत हमारे अंदर ही छिपा हुआ है ।
🌸🙏🏻जय श्रीकृष्ण*🙏🏻🌸