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आज इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, बॉम्बे की नौवीं मंज़िल से यह तस्वीर ली। ज़रा बाहर की अफ़रातफ़री और कैंपस के भीतर के नज़ारे का अंतर देखिए।
पीली लाइन के ऊपर—शहरी अराजकता।
लाइन के नीचे—आईआईटी बॉम्बे का हरियाली से भरा कैंपस।
इस #green cover के नीचे घर हैं, सड़कें हैं, गाड़ियाँ हैं, परिवार हैं… ज़िंदगी पूरी रफ़्तार से चल रही है।
कभी 1960 के आसपास यह पूरा इलाका वीरान था, इक्का‑दुक्का पेड़ ही दिखते थे। आज यह एक छोटा‑सा जंगल बन गया है—यहाँ रहने वाले लोगों की सजग कोशिशों की वजह से।
इंसान चाहें तो चमत्कार कर सकते हैं, नई ऊँचाइयाँ हासिल कर सकते हैं।
पिछले 40–50 साल में हमने कमाल किए हैं, पर शायद मंज़िल नज़र से ओझल हो गई है—हम असल में कहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारा मूल उद्देश्य क्या है?
रोटी‑कपड़ा‑मकान के बाद हमारी अगली चाहतें होती हैं मान‑सम्मान‑सत्ता, और फिर उससे आगे होती हैं प्रेम‑शांति‑आनंद।
कहीं न कहीं हम उस बीच वाले पड़ाव पर अटक गए हैं और सबसे ऊँचे पड़ाव—प्रेम, शांति, आनंद—तक नहीं पहुँच पाए। क्या आप सहमत हैं?
अगर हम वहाँ पहुँचें, तो मेरा मानना है कि हमारी ज़िंदगी अपने‑आप #nature के साथ तालमेल में आ जाएगी।
तब हमारी तरक्की से हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषित नहीं होंगे, जलवायु नहीं बदलेगी, और धरती नहीं तपेगी।
तो आइए, और ऊँचा आकांक्षा करें। आइए #FiniteLiving शुरू करें इस सीमित ग्रह पर। #TheFiniteEarth
आइए हर पल प्रेम, आनंद और भीतर से शांतिपूर्ण जीवन जिएँ।
क्या आपको लगता है कि यह तस्वीर दिखाती है कि हम किस राह पर हैं और कहाँ पहुँचना चाहते हैं?
आज इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, बॉम्बे की नौवीं मंज़िल से यह तस्वीर ली। ज़रा बाहर की अफ़रातफ़री और कैंपस के भीतर के नज़ारे का अंतर देखिए।
पीली लाइन के ऊपर—शहरी अराजकता।
लाइन के नीचे—आईआईटी बॉम्बे का हरियाली से भरा कैंपस।
इस #green cover के नीचे घर हैं, सड़कें हैं, गाड़ियाँ हैं, परिवार हैं… ज़िंदगी पूरी रफ़्तार से चल रही है।
कभी 1960 के आसपास यह पूरा इलाका वीरान था, इक्का‑दुक्का पेड़ ही दिखते थे। आज यह एक छोटा‑सा जंगल बन गया है—यहाँ रहने वाले लोगों की सजग कोशिशों की वजह से।
इंसान चाहें तो चमत्कार कर सकते हैं, नई ऊँचाइयाँ हासिल कर सकते हैं।
पिछले 40–50 साल में हमने कमाल किए हैं, पर शायद मंज़िल नज़र से ओझल हो गई है—हम असल में कहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारा मूल उद्देश्य क्या है?
रोटी‑कपड़ा‑मकान के बाद हमारी अगली चाहतें होती हैं मान‑सम्मान‑सत्ता, और फिर उससे आगे होती हैं प्रेम‑शांति‑आनंद।
कहीं न कहीं हम उस बीच वाले पड़ाव पर अटक गए हैं और सबसे ऊँचे पड़ाव—प्रेम, शांति, आनंद—तक नहीं पहुँच पाए। क्या आप सहमत हैं?
अगर हम वहाँ पहुँचें, तो मेरा मानना है कि हमारी ज़िंदगी अपने‑आप #nature के साथ तालमेल में आ जाएगी।
तब हमारी तरक्की से हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषित नहीं होंगे, जलवायु नहीं बदलेगी, और धरती नहीं तपेगी।
तो आइए, और ऊँचा आकांक्षा करें। आइए #FiniteLiving शुरू करें इस सीमित ग्रह पर। #TheFiniteEarth
आइए हर पल प्रेम, आनंद और भीतर से शांतिपूर्ण जीवन जिएँ।
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