4. सम्प्रेषण की आवश्यकता एवं महत्त्व
शिक्षण प्रक्रिया में सम्प्रेषण का विशेष महत्त्व है।
इसके प्रमुख कार्य हैं:
विद्यार्थियों तक ज्ञान एवं सूचनाएँ पहुँचाना।
नए विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
विद्यार्थियों का ध्यान केंद्रित करना।
शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच अंतःक्रिया स्थापित करना।
विषयवस्तु को सरल एवं रोचक बनाना।
विद्यार्थियों की कठिनाइयों को पहचानना।
विद्यार्थियों की समझ का पता लगाना।
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना।
कक्षा में सहभागिता बढ़ाना।
शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करना।
उदाहरण
यदि शिक्षक केवल बोलते रहें और विद्यार्थी कुछ समझ न पाएँ, तो शिक्षण प्रभावी नहीं होगा।
लेकिन यदि शिक्षक उदाहरण दें, प्रश्न पूछें, विद्यार्थियों के उत्तर सुनें और आवश्यकतानुसार दोबारा समझाएँ, तो सम्प्रेषण अधिक प्रभावी हो सकता है।
याद रखें: प्रभावी सम्प्रेषण शिक्षण को प्रभावी बनाने में सहायता करता है।
शिक्षण प्रक्रिया में सम्प्रेषण का विशेष महत्त्व है।
इसके प्रमुख कार्य हैं:
विद्यार्थियों तक ज्ञान एवं सूचनाएँ पहुँचाना।
नए विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
विद्यार्थियों का ध्यान केंद्रित करना।
शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच अंतःक्रिया स्थापित करना।
विषयवस्तु को सरल एवं रोचक बनाना।
विद्यार्थियों की कठिनाइयों को पहचानना।
विद्यार्थियों की समझ का पता लगाना।
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना।
कक्षा में सहभागिता बढ़ाना।
शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करना।
उदाहरण
यदि शिक्षक केवल बोलते रहें और विद्यार्थी कुछ समझ न पाएँ, तो शिक्षण प्रभावी नहीं होगा।
लेकिन यदि शिक्षक उदाहरण दें, प्रश्न पूछें, विद्यार्थियों के उत्तर सुनें और आवश्यकतानुसार दोबारा समझाएँ, तो सम्प्रेषण अधिक प्रभावी हो सकता है।
याद रखें: प्रभावी सम्प्रेषण शिक्षण को प्रभावी बनाने में सहायता करता है।
5. सम्प्रेषण के घटक (Factors of Communication)
यह अध्याय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग है।
आपकी पुस्तक के पृष्ठ 14–16 में सम्प्रेषण के प्रमुख घटकों का वर्णन किया गया है। पुस्तक के चित्र में प्रेषक, संदेश, माध्यम, ग्राही, प्रतिपुष्टि और प्रतिक्रिया को दर्शाया गया है। (D.El.Ed. Sem1) शिक्षण अधिगम के सिद्धांत.pdf
इन्हें क्रम से समझिए।
घटक 1: प्रेषक (Sender/Communicator)
जो व्यक्ति संदेश भेजता है, उसे प्रेषक कहते हैं।
उदाहरण: कक्षा में पढ़ाने वाला शिक्षक।
प्रेषक की जिम्मेदारियाँ:
संदेश को स्पष्ट रखना।
उपयुक्त भाषा का प्रयोग करना।
विद्यार्थियों के स्तर को ध्यान में रखना।
उचित माध्यम चुनना।
शिक्षण उद्देश्यों को समझना।
घटक 2: संदेश (Message)
प्रेषक जो सूचना, विचार या ज्ञान दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना चाहता है, वह संदेश है।
उदाहरण: शिक्षक द्वारा प्रकाश संश्लेषण समझाना।
संदेश पाठ्यवस्तु, सूचना, निर्देश या विचार के रूप में हो सकता है।
घटक 3: माध्यम (Media/Channel)
जिस साधन से संदेश प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है, उसे माध्यम कहते हैं।
उदाहरण:
मौखिक भाषा।
लिखित भाषा।
रेडियो।
टेलीविजन।
प्रोजेक्टर।
चित्र और चार्ट।
उदाहरण: शिक्षक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर पढ़ाना।
घटक 4: ग्राही (Receiver)
जो व्यक्ति संदेश प्राप्त करता है, उसे ग्राही कहते हैं।
उदाहरण: शिक्षक की बात सुनने और समझने वाले विद्यार्थी।
ग्राही को संदेश का अर्थ समझना आवश्यक है।
घटक 5: प्रतिपुष्टि (Feedback)
प्राप्तकर्ता की ओर से मिलने वाली ऐसी सूचना, जिससे पता चले कि संदेश समझा गया है या नहीं, प्रतिपुष्टि कहलाती है।
उदाहरण: शिक्षक पूछता है, “क्या आप सभी को यह सवाल समझ में आया?” विद्यार्थी अपना उत्तर देते हैं।
प्रतिपुष्टि से शिक्षक को अपनी शिक्षण प्रक्रिया में आवश्यक सुधार करने में सहायता मिलती है।
घटक 6: प्रतिक्रिया (Response)
संदेश प्राप्त करने के बाद ग्राही द्वारा दी गई प्रतिक्रिया को प्रतिक्रिया कहते हैं।
उदाहरण: शिक्षक के प्रश्न का विद्यार्थी द्वारा उत्तर देना।
यह अध्याय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग है।
आपकी पुस्तक के पृष्ठ 14–16 में सम्प्रेषण के प्रमुख घटकों का वर्णन किया गया है। पुस्तक के चित्र में प्रेषक, संदेश, माध्यम, ग्राही, प्रतिपुष्टि और प्रतिक्रिया को दर्शाया गया है। (D.El.Ed. Sem1) शिक्षण अधिगम के सिद्धांत.pdf
इन्हें क्रम से समझिए।
घटक 1: प्रेषक (Sender/Communicator)
जो व्यक्ति संदेश भेजता है, उसे प्रेषक कहते हैं।
उदाहरण: कक्षा में पढ़ाने वाला शिक्षक।
प्रेषक की जिम्मेदारियाँ:
संदेश को स्पष्ट रखना।
उपयुक्त भाषा का प्रयोग करना।
विद्यार्थियों के स्तर को ध्यान में रखना।
उचित माध्यम चुनना।
शिक्षण उद्देश्यों को समझना।
घटक 2: संदेश (Message)
प्रेषक जो सूचना, विचार या ज्ञान दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना चाहता है, वह संदेश है।
उदाहरण: शिक्षक द्वारा प्रकाश संश्लेषण समझाना।
संदेश पाठ्यवस्तु, सूचना, निर्देश या विचार के रूप में हो सकता है।
घटक 3: माध्यम (Media/Channel)
जिस साधन से संदेश प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है, उसे माध्यम कहते हैं।
उदाहरण:
मौखिक भाषा।
लिखित भाषा।
रेडियो।
टेलीविजन।
प्रोजेक्टर।
चित्र और चार्ट।
उदाहरण: शिक्षक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर पढ़ाना।
घटक 4: ग्राही (Receiver)
जो व्यक्ति संदेश प्राप्त करता है, उसे ग्राही कहते हैं।
उदाहरण: शिक्षक की बात सुनने और समझने वाले विद्यार्थी।
ग्राही को संदेश का अर्थ समझना आवश्यक है।
घटक 5: प्रतिपुष्टि (Feedback)
प्राप्तकर्ता की ओर से मिलने वाली ऐसी सूचना, जिससे पता चले कि संदेश समझा गया है या नहीं, प्रतिपुष्टि कहलाती है।
उदाहरण: शिक्षक पूछता है, “क्या आप सभी को यह सवाल समझ में आया?” विद्यार्थी अपना उत्तर देते हैं।
प्रतिपुष्टि से शिक्षक को अपनी शिक्षण प्रक्रिया में आवश्यक सुधार करने में सहायता मिलती है।
घटक 6: प्रतिक्रिया (Response)
संदेश प्राप्त करने के बाद ग्राही द्वारा दी गई प्रतिक्रिया को प्रतिक्रिया कहते हैं।
उदाहरण: शिक्षक के प्रश्न का विद्यार्थी द्वारा उत्तर देना।
ध्यान दें: वास्तविक सम्प्रेषण में प्रतिक्रिया और प्रतिपुष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं।
सम्प्रेषण के घटकों को याद करने की ट्रिक
प्रे–सं–मा–ग्रा–प्रति–प्रति
प्रे = प्रेषक
सं = संदेश
मा = माध्यम
ग्रा = ग्राही
प्रति = प्रतिपुष्टि
प्रति = प्रतिक्रिया
एक शिक्षक द्वारा पढ़ाए गए पाठ को याद कीजिए: शिक्षक प्रेषक है, पाठ संदेश है, भाषा या चार्ट माध्यम है, विद्यार्थी ग्राही हैं और उनके उत्तर प्रतिक्रिया एवं प्रतिपुष्टि का आधार बनते हैं।
सम्प्रेषण के घटकों को याद करने की ट्रिक
प्रे–सं–मा–ग्रा–प्रति–प्रति
प्रे = प्रेषक
सं = संदेश
मा = माध्यम
ग्रा = ग्राही
प्रति = प्रतिपुष्टि
प्रति = प्रतिक्रिया
एक शिक्षक द्वारा पढ़ाए गए पाठ को याद कीजिए: शिक्षक प्रेषक है, पाठ संदेश है, भाषा या चार्ट माध्यम है, विद्यार्थी ग्राही हैं और उनके उत्तर प्रतिक्रिया एवं प्रतिपुष्टि का आधार बनते हैं।
6. सम्प्रेषण के प्रकार (Kinds of Communication)
पुस्तक में सम्प्रेषण के प्रकारों के अंतर्गत विशेष रूप से शाब्दिक, अशाब्दिक, व्यक्तिगत और सामूहिक सम्प्रेषण का वर्णन मिलता है।
A. शाब्दिक सम्प्रेषण (Verbal Communication)
जब शब्दों के माध्यम से संदेश दिया जाता है, तो उसे शाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं।
इसके दो प्रमुख रूप हैं:
1. मौखिक सम्प्रेषण (Oral Communication)
जब बोलकर संदेश दिया जाता है।
उदाहरण:
शिक्षक का व्याख्यान।
प्रश्नोत्तर।
बातचीत।
भाषण।
2. लिखित सम्प्रेषण (Written Communication)
जब लिखकर संदेश दिया जाता है।
उदाहरण:
पत्र।
लिखित निर्देश।
नोटिस।
ब्लैकबोर्ड पर लिखी जानकारी।
पुस्तक में सम्प्रेषण के प्रकारों के अंतर्गत विशेष रूप से शाब्दिक, अशाब्दिक, व्यक्तिगत और सामूहिक सम्प्रेषण का वर्णन मिलता है।
A. शाब्दिक सम्प्रेषण (Verbal Communication)
जब शब्दों के माध्यम से संदेश दिया जाता है, तो उसे शाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं।
इसके दो प्रमुख रूप हैं:
1. मौखिक सम्प्रेषण (Oral Communication)
जब बोलकर संदेश दिया जाता है।
उदाहरण:
शिक्षक का व्याख्यान।
प्रश्नोत्तर।
बातचीत।
भाषण।
2. लिखित सम्प्रेषण (Written Communication)
जब लिखकर संदेश दिया जाता है।
उदाहरण:
पत्र।
लिखित निर्देश।
नोटिस।
ब्लैकबोर्ड पर लिखी जानकारी।
B. अशाब्दिक सम्प्रेषण (Non-verbal Communication)
जब संदेश शब्दों के बजाय संकेतों, हाव-भाव या शारीरिक गतिविधियों से दिया जाता है, तो उसे अशाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं।
उदाहरण:
सिर हिलाकर सहमति देना।
हाथ से इशारा करना।
चेहरे के भाव।
शरीर की मुद्रा।
कक्षा का उदाहरण: शिक्षक बिना कुछ बोले हाथ उठाकर विद्यार्थियों को शांत रहने का संकेत देता है।
यह अशाब्दिक सम्प्रेषण है।
जब संदेश शब्दों के बजाय संकेतों, हाव-भाव या शारीरिक गतिविधियों से दिया जाता है, तो उसे अशाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं।
उदाहरण:
सिर हिलाकर सहमति देना।
हाथ से इशारा करना।
चेहरे के भाव।
शरीर की मुद्रा।
कक्षा का उदाहरण: शिक्षक बिना कुछ बोले हाथ उठाकर विद्यार्थियों को शांत रहने का संकेत देता है।
यह अशाब्दिक सम्प्रेषण है।
7. व्यक्तिगत सम्प्रेषण (Individual Communication)
जब शिक्षक किसी एक विद्यार्थी की आवश्यकताओं, कठिनाइयों या सीखने की गति को ध्यान में रखकर उससे सम्प्रेषण करता है, तो इसे व्यक्तिगत सम्प्रेषण के रूप में समझा जा सकता है।
उदाहरण
एक विद्यार्थी को भिन्न का सवाल समझ नहीं आ रहा है। शिक्षक उसे अलग से उदाहरण देकर समझाता है।
विशेषताएँ
विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जा सकता है।
उसकी कठिनाइयों को समझना आसान होता है।
व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार मार्गदर्शन दिया जा सकता है।
विद्यार्थी को प्रश्न पूछने का अवसर मिलता है।
शिक्षक विद्यार्थी की प्रगति पर ध्यान दे सकता है।
लाभ
व्यक्तिगत कठिनाइयों का समाधान।
सीखने में सहायता।
विद्यार्थी की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बेहतर संपर्क।
सीमाएँ
प्रत्येक विद्यार्थी पर अलग-अलग ध्यान देने में अधिक समय लगता है।
अधिक विद्यार्थियों वाली कक्षा में इसे लागू करना कठिन हो सकता है।
पुस्तक में व्यक्तिगत सम्प्रेषण की कुछ सीमाओं के रूप में अधिक खर्च और सामाजिक गुणों के विकास के सीमित अवसरों का उल्लेख भी किया गया है।
जब शिक्षक किसी एक विद्यार्थी की आवश्यकताओं, कठिनाइयों या सीखने की गति को ध्यान में रखकर उससे सम्प्रेषण करता है, तो इसे व्यक्तिगत सम्प्रेषण के रूप में समझा जा सकता है।
उदाहरण
एक विद्यार्थी को भिन्न का सवाल समझ नहीं आ रहा है। शिक्षक उसे अलग से उदाहरण देकर समझाता है।
विशेषताएँ
विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जा सकता है।
उसकी कठिनाइयों को समझना आसान होता है।
व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार मार्गदर्शन दिया जा सकता है।
विद्यार्थी को प्रश्न पूछने का अवसर मिलता है।
शिक्षक विद्यार्थी की प्रगति पर ध्यान दे सकता है।
लाभ
व्यक्तिगत कठिनाइयों का समाधान।
सीखने में सहायता।
विद्यार्थी की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बेहतर संपर्क।
सीमाएँ
प्रत्येक विद्यार्थी पर अलग-अलग ध्यान देने में अधिक समय लगता है।
अधिक विद्यार्थियों वाली कक्षा में इसे लागू करना कठिन हो सकता है।
पुस्तक में व्यक्तिगत सम्प्रेषण की कुछ सीमाओं के रूप में अधिक खर्च और सामाजिक गुणों के विकास के सीमित अवसरों का उल्लेख भी किया गया है।
8. सामूहिक सम्प्रेषण (Collective Communication)
जब शिक्षक एक साथ कई विद्यार्थियों तक संदेश पहुँचाता है, तो उसे सामूहिक सम्प्रेषण कहते हैं।
उदाहरण
शिक्षक पूरी कक्षा को जल संरक्षण का पाठ पढ़ाता है।
विशेषताएँ
एक साथ अनेक विद्यार्थियों तक संदेश पहुँचता है।
समय की बचत होती है।
पूरी कक्षा को एक विषय समझाया जा सकता है।
समूह चर्चा और सहयोगात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जा सकती हैं।
लाभ
कम समय में अधिक विद्यार्थियों तक जानकारी पहुँचाना।
सामूहिक गतिविधियों के अवसर।
सहयोग और सामाजिकता का विकास करने में सहायता।
एक ही विषय पर सामूहिक चर्चा।
सीमाएँ
प्रत्येक विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान देना कठिन हो सकता है।
कुछ विद्यार्थियों की कठिनाइयाँ छूट सकती हैं।
सभी विद्यार्थी समान गति से नहीं सीखते।
कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
जब शिक्षक एक साथ कई विद्यार्थियों तक संदेश पहुँचाता है, तो उसे सामूहिक सम्प्रेषण कहते हैं।
उदाहरण
शिक्षक पूरी कक्षा को जल संरक्षण का पाठ पढ़ाता है।
विशेषताएँ
एक साथ अनेक विद्यार्थियों तक संदेश पहुँचता है।
समय की बचत होती है।
पूरी कक्षा को एक विषय समझाया जा सकता है।
समूह चर्चा और सहयोगात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जा सकती हैं।
लाभ
कम समय में अधिक विद्यार्थियों तक जानकारी पहुँचाना।
सामूहिक गतिविधियों के अवसर।
सहयोग और सामाजिकता का विकास करने में सहायता।
एक ही विषय पर सामूहिक चर्चा।
सीमाएँ
प्रत्येक विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान देना कठिन हो सकता है।
कुछ विद्यार्थियों की कठिनाइयाँ छूट सकती हैं।
सभी विद्यार्थी समान गति से नहीं सीखते।
कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
परीक्षा में सावधानी: व्यक्तिगत और सामूहिक सम्प्रेषण में से कौन अधिक उपयोगी है, इसका उत्तर परिस्थिति और शिक्षण उद्देश्य पर निर्भर करता है। एक ही प्रकार को हर स्थिति में सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जा सकता।
9. प्रभावी सम्प्रेषण के तरीके
Methods of Effective Communication
पुस्तक के पृष्ठ 19 के आसपास प्रभावी सम्प्रेषण के तरीकों का वर्णन शुरू होता है।
प्रभावी सम्प्रेषण का अर्थ है कि संदेश सही ढंग से पहुँचे, प्राप्तकर्ता उसे समझे और आवश्यक प्रतिक्रिया प्राप्त हो।
इसके लिए शिक्षक को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
1. उद्देश्यपूर्ण होना
शिक्षण के उद्देश्य स्पष्ट होने चाहिए।
2. निर्देशात्मक होना, आदेशात्मक नहीं
शिक्षक को विद्यार्थियों को समझने और सीखने के लिए उचित दिशा देनी चाहिए।
3. प्रेरणास्पद होना
शिक्षक का व्यवहार विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा जगाने वाला होना चाहिए।
4. सरल एवं स्पष्ट भाषा
ऐसी भाषा का उपयोग करना चाहिए जिसे विद्यार्थी आसानी से समझ सकें।
5. विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान का उपयोग
नए विषय को बच्चों के पुराने अनुभवों से जोड़ना चाहिए।
6. उपयुक्त शिक्षण सामग्री का उपयोग
आवश्यकतानुसार चित्र, चार्ट, मॉडल और अन्य सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
7. प्रश्नोत्तर का उपयोग
प्रश्न पूछने से विद्यार्थियों की जिज्ञासा और समझ का पता चलता है।
8. प्रतिपुष्टि प्राप्त करना
विद्यार्थियों के उत्तरों और प्रतिक्रियाओं से यह जाँचना चाहिए कि संदेश सही ढंग से समझा गया है या नहीं।
9. लोकतांत्रिक कक्षा वातावरण
विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। उन्हें बिना भय के अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए।
10. उचित योजना
शिक्षक को विषयवस्तु, समय, शिक्षण विधि और सामग्री की योजना बनानी चाहिए।
Methods of Effective Communication
पुस्तक के पृष्ठ 19 के आसपास प्रभावी सम्प्रेषण के तरीकों का वर्णन शुरू होता है।
प्रभावी सम्प्रेषण का अर्थ है कि संदेश सही ढंग से पहुँचे, प्राप्तकर्ता उसे समझे और आवश्यक प्रतिक्रिया प्राप्त हो।
इसके लिए शिक्षक को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
1. उद्देश्यपूर्ण होना
शिक्षण के उद्देश्य स्पष्ट होने चाहिए।
2. निर्देशात्मक होना, आदेशात्मक नहीं
शिक्षक को विद्यार्थियों को समझने और सीखने के लिए उचित दिशा देनी चाहिए।
3. प्रेरणास्पद होना
शिक्षक का व्यवहार विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा जगाने वाला होना चाहिए।
4. सरल एवं स्पष्ट भाषा
ऐसी भाषा का उपयोग करना चाहिए जिसे विद्यार्थी आसानी से समझ सकें।
5. विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान का उपयोग
नए विषय को बच्चों के पुराने अनुभवों से जोड़ना चाहिए।
6. उपयुक्त शिक्षण सामग्री का उपयोग
आवश्यकतानुसार चित्र, चार्ट, मॉडल और अन्य सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
7. प्रश्नोत्तर का उपयोग
प्रश्न पूछने से विद्यार्थियों की जिज्ञासा और समझ का पता चलता है।
8. प्रतिपुष्टि प्राप्त करना
विद्यार्थियों के उत्तरों और प्रतिक्रियाओं से यह जाँचना चाहिए कि संदेश सही ढंग से समझा गया है या नहीं।
9. लोकतांत्रिक कक्षा वातावरण
विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। उन्हें बिना भय के अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए।
10. उचित योजना
शिक्षक को विषयवस्तु, समय, शिक्षण विधि और सामग्री की योजना बनानी चाहिए।
प्रश्न 1. सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
A. केवल संदेश भेजना
B. संदेश को सही अर्थ में समझाना और समझना
C. केवल बोलना
D. केवल लिखना
प्रश्न 2. शिक्षक सम्प्रेषण प्रक्रिया में सामान्यतः किसकी भूमिका निभाता है?
A. ग्राही
B. प्रेषक
C. केवल माध्यम
D. केवल प्रतिपुष्टि
प्रश्न 3. शिक्षक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर समझाना किसका उदाहरण है?
A. केवल व्यक्तिगत सम्प्रेषण
B. माध्यम के रूप में शिक्षण सामग्री का उपयोग
C. केवल अशाब्दिक सम्प्रेषण
D. सम्प्रेषण का अभाव
प्रश्न 4. विद्यार्थी द्वारा शिक्षक के प्रश्न का उत्तर देना किसका उदाहरण है?
A. प्रतिक्रिया
B. पाठ्यक्रम
C. प्रेषक
D. संदेश
प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सा अशाब्दिक सम्प्रेषण है?
A. पत्र लिखना
B. व्याख्यान देना
C. सिर हिलाकर सहमति देना
D. प्रश्न लिखना
प्रश्न 6. लिखित सम्प्रेषण का उदाहरण कौन-सा है?
A. भाषण
B. बातचीत
C. चेहरे का भाव
D. लिखित सूचना
प्रश्न 7. व्यक्तिगत सम्प्रेषण का प्रमुख लाभ क्या है?
A. प्रत्येक विद्यार्थी को एक साथ पढ़ाना
B. व्यक्तिगत कठिनाइयों पर ध्यान देना
C. शिक्षक की भूमिका समाप्त करना
D. सभी विद्यार्थियों को समान गति से सीखने के लिए बाध्य करना
प्रश्न 8. सामूहिक सम्प्रेषण की एक सीमा क्या है?
A. एक साथ कई विद्यार्थियों तक संदेश नहीं पहुँच सकता।
B. इसमें शिक्षक की आवश्यकता नहीं होती।
C. प्रत्येक विद्यार्थी की व्यक्तिगत कठिनाई पहचानना कठिन हो सकता है।
D. इसमें किसी विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती।
प्रश्न 9. प्रभावी सम्प्रेषण में प्रतिपुष्टि का क्या महत्त्व है?
A. यह शिक्षक को विद्यार्थियों की समझ का पता लगाने में सहायता करती है।
B. यह संदेश को हमेशा समाप्त कर देती है।
C. इसका शिक्षण से कोई संबंध नहीं है।
D. इससे विद्यार्थी निष्क्रिय हो जाते हैं।
प्रश्न 10. सम्प्रेषण की प्रक्रिया में माध्यम का कार्य क्या है?
A. संदेश भेजने वाले को चुनना
B. संदेश पहुँचाने में सहायता करना
C. विद्यार्थियों का मूल्यांकन करना
D. शिक्षण के उद्देश्य बदलना
प्रश्न 11. प्रभावी सम्प्रेषण के लिए शिक्षक को किसका ध्यान रखना चाहिए?
A. केवल अपनी सुविधा का
B. केवल पाठ्यपुस्तक की भाषा का
C. विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान और आवश्यकताओं का
D. विद्यार्थियों के प्रश्नों को रोकने का
प्रश्न 12. कक्षा में लोकतांत्रिक वातावरण का सबसे उपयुक्त उदाहरण कौन-सा है?
A. केवल शिक्षक को बोलने देना
B. विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और विचार व्यक्त करने का अवसर देना
C. गलत उत्तर पर विद्यार्थी का अपमान करना
D. सभी विद्यार्थियों को चुप रखना
प्रश्न 13. सम्प्रेषण के प्रकारों में कौन-सा युग्म सही है?
A. शाब्दिक — मौखिक एवं लिखित
B. अशाब्दिक — केवल लिखित
C. मौखिक — केवल संकेत
D. लिखित — केवल चेहरे के भाव
प्रश्न 14. शिक्षक बच्चों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर अपनी व्याख्या में सुधार करता है। यह किसका उदाहरण है?
A. प्रतिपुष्टि का उपयोग
B. संदेश की उपेक्षा
C. निष्क्रिय शिक्षण
D. सम्प्रेषण में बाधा
प्रश्न 15. प्रभावी सम्प्रेषण का सबसे उपयुक्त वर्णन कौन-सा है?
A. शिक्षक जितना अधिक बोले, सम्प्रेषण उतना ही प्रभावी होगा।
B. संदेश कठिन भाषा में होना चाहिए।
C. संदेश स्पष्ट हो, प्राप्तकर्ता समझे और उचित प्रतिक्रिया प्राप्त हो।
D. सम्प्रेषण में विद्यार्थियों की भागीदारी आवश्यक नहीं है।
A. केवल संदेश भेजना
B. संदेश को सही अर्थ में समझाना और समझना
C. केवल बोलना
D. केवल लिखना
प्रश्न 2. शिक्षक सम्प्रेषण प्रक्रिया में सामान्यतः किसकी भूमिका निभाता है?
A. ग्राही
B. प्रेषक
C. केवल माध्यम
D. केवल प्रतिपुष्टि
प्रश्न 3. शिक्षक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर समझाना किसका उदाहरण है?
A. केवल व्यक्तिगत सम्प्रेषण
B. माध्यम के रूप में शिक्षण सामग्री का उपयोग
C. केवल अशाब्दिक सम्प्रेषण
D. सम्प्रेषण का अभाव
प्रश्न 4. विद्यार्थी द्वारा शिक्षक के प्रश्न का उत्तर देना किसका उदाहरण है?
A. प्रतिक्रिया
B. पाठ्यक्रम
C. प्रेषक
D. संदेश
प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सा अशाब्दिक सम्प्रेषण है?
A. पत्र लिखना
B. व्याख्यान देना
C. सिर हिलाकर सहमति देना
D. प्रश्न लिखना
प्रश्न 6. लिखित सम्प्रेषण का उदाहरण कौन-सा है?
A. भाषण
B. बातचीत
C. चेहरे का भाव
D. लिखित सूचना
प्रश्न 7. व्यक्तिगत सम्प्रेषण का प्रमुख लाभ क्या है?
A. प्रत्येक विद्यार्थी को एक साथ पढ़ाना
B. व्यक्तिगत कठिनाइयों पर ध्यान देना
C. शिक्षक की भूमिका समाप्त करना
D. सभी विद्यार्थियों को समान गति से सीखने के लिए बाध्य करना
प्रश्न 8. सामूहिक सम्प्रेषण की एक सीमा क्या है?
A. एक साथ कई विद्यार्थियों तक संदेश नहीं पहुँच सकता।
B. इसमें शिक्षक की आवश्यकता नहीं होती।
C. प्रत्येक विद्यार्थी की व्यक्तिगत कठिनाई पहचानना कठिन हो सकता है।
D. इसमें किसी विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती।
प्रश्न 9. प्रभावी सम्प्रेषण में प्रतिपुष्टि का क्या महत्त्व है?
A. यह शिक्षक को विद्यार्थियों की समझ का पता लगाने में सहायता करती है।
B. यह संदेश को हमेशा समाप्त कर देती है।
C. इसका शिक्षण से कोई संबंध नहीं है।
D. इससे विद्यार्थी निष्क्रिय हो जाते हैं।
प्रश्न 10. सम्प्रेषण की प्रक्रिया में माध्यम का कार्य क्या है?
A. संदेश भेजने वाले को चुनना
B. संदेश पहुँचाने में सहायता करना
C. विद्यार्थियों का मूल्यांकन करना
D. शिक्षण के उद्देश्य बदलना
प्रश्न 11. प्रभावी सम्प्रेषण के लिए शिक्षक को किसका ध्यान रखना चाहिए?
A. केवल अपनी सुविधा का
B. केवल पाठ्यपुस्तक की भाषा का
C. विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान और आवश्यकताओं का
D. विद्यार्थियों के प्रश्नों को रोकने का
प्रश्न 12. कक्षा में लोकतांत्रिक वातावरण का सबसे उपयुक्त उदाहरण कौन-सा है?
A. केवल शिक्षक को बोलने देना
B. विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और विचार व्यक्त करने का अवसर देना
C. गलत उत्तर पर विद्यार्थी का अपमान करना
D. सभी विद्यार्थियों को चुप रखना
प्रश्न 13. सम्प्रेषण के प्रकारों में कौन-सा युग्म सही है?
A. शाब्दिक — मौखिक एवं लिखित
B. अशाब्दिक — केवल लिखित
C. मौखिक — केवल संकेत
D. लिखित — केवल चेहरे के भाव
प्रश्न 14. शिक्षक बच्चों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर अपनी व्याख्या में सुधार करता है। यह किसका उदाहरण है?
A. प्रतिपुष्टि का उपयोग
B. संदेश की उपेक्षा
C. निष्क्रिय शिक्षण
D. सम्प्रेषण में बाधा
प्रश्न 15. प्रभावी सम्प्रेषण का सबसे उपयुक्त वर्णन कौन-सा है?
A. शिक्षक जितना अधिक बोले, सम्प्रेषण उतना ही प्रभावी होगा।
B. संदेश कठिन भाषा में होना चाहिए।
C. संदेश स्पष्ट हो, प्राप्तकर्ता समझे और उचित प्रतिक्रिया प्राप्त हो।
D. सम्प्रेषण में विद्यार्थियों की भागीदारी आवश्यक नहीं है।
1-B 2-B 3-B 4-A 5-C 6-D 7-B 8-C 9-A 10-B 11-C 12-B 13-A 14-A 15-C
अध्याय–3: शिक्षण के सिद्धांत (Principles of Teaching)
UP SUPER TET के लिए पुस्तक के अनुसार विस्तृत तैयारी
पिछले दो अध्याय पूरे हो चुके हैं। अब हम तीसरा अध्याय शुरू करते हैं। इसे इस तरह समझेंगे कि आपको अर्थ, उदाहरण, परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य और MCQ याद रहें।
1. शिक्षण के सिद्धांत का अर्थ
शिक्षण के सिद्धांत वे आधारभूत मान्यताएँ हैं, जिनका पालन करके शिक्षक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाता है।
सरल भाषा में: बच्चों को अच्छी तरह पढ़ाने के लिए शिक्षक जिन नियमों और बातों का ध्यान रखता है, उन्हें शिक्षण के सिद्धांत कहते हैं।
उदाहरण: यदि शिक्षक गणित में भिन्न पढ़ा रहा है, तो वह पहले आधा और चौथाई रोटी दिखाकर समझाए, फिर संख्याओं के रूप में भिन्न लिखे। इससे बच्चों को विषय समझने में आसानी होगी।
इस अध्याय में पुस्तक के अनुसार प्रमुख सिद्धांत
क्रियाशीलता का सिद्धांत
प्रेरणा का सिद्धांत
रुचि का सिद्धांत
निश्चित उद्देश्य का सिद्धांत
नियोजन का सिद्धांत
चयन का सिद्धांत
व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धांत
लोकतांत्रिक व्यवहार का सिद्धांत
जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धांत
आवृत्ति का सिद्धांत
निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत
विभाजन अथवा लघु सोपानों का सिद्धांत
अब एक-एक करके समझते हैं।
2. क्रियाशीलता का सिद्धांत (Principle of Activity)
अर्थ
इस सिद्धांत का अर्थ है—करके सीखना (Learning by Doing)।
बच्चा केवल सुनकर या पढ़कर ही नहीं, बल्कि स्वयं गतिविधियाँ करके भी सीखता है। पुस्तक के अनुसार सीखने की प्रक्रिया में विद्यार्थी का सक्रिय रहना आवश्यक है।
उदाहरण
मान लीजिए, बच्चे को साइकिल चलाना सीखना है।
केवल साइकिल चलाने के बारे में सुनने से वह पूरी तरह नहीं सीख पाएगा।
उसे स्वयं साइकिल चलाने का अभ्यास करना होगा।
शुरुआत में गलतियाँ होंगी, लेकिन अभ्यास से वह सीख जाएगा।
इसी प्रकार विज्ञान में पौधे के विकास को समझाने के लिए बच्चों से बीज बोने, पानी देने और पौधे में होने वाले बदलावों को देखने की गतिविधि कराई जा सकती है।
इस सिद्धांत के लाभ
सीखने में रुचि बढ़ती है।
एकाग्रता बढ़ती है।
आत्मविश्वास विकसित होता है।
सीखा हुआ ज्ञान अधिक स्थायी हो सकता है।
विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी बढ़ती है।
पुस्तक में दिए गए उदाहरण
पुस्तक में मॉन्टेसरी, किंडरगार्टन, डाल्टन पद्धति, गांधीजी की बुनियादी शिक्षा तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा–2005 को करके सीखने पर जोर देने वाले उदाहरणों के रूप में बताया गया है।
SUPER TET में याद रखें:
क्रियाशीलता का सिद्धांत = करके सीखना।
3. प्रेरणा का सिद्धांत (Principle of Motivation)
अर्थ
प्रेरणा वह प्रक्रिया है जो सीखने की शुरुआत करने, उसे जारी रखने और लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करती है।
जब विद्यार्थी को किसी काम को करने की इच्छा या प्रोत्साहन मिलता है, तो वह अधिक मन लगाकर सीखने का प्रयास कर सकता है।
उदाहरण
दो विद्यार्थियों ने परीक्षा दी।
पहले विद्यार्थी को अच्छे अंक मिलने पर शिक्षक ने उसकी मेहनत की प्रशंसा की।
दूसरे विद्यार्थी को बिना कारण डाँटा गया।
प्रशंसा से पहले विद्यार्थी को आगे और अच्छा करने की प्रेरणा मिल सकती है।
प्रेरणा के तरीके
पुस्तक में प्रेरणा के दो तरीके बताए गए हैं:
(क) शाब्दिक प्रेरणा
शाबाशी देना
प्रशंसा करना
अच्छे कार्य के लिए प्रोत्साहित करना
(ख) अशाब्दिक प्रेरणा पुस्तक में पुरस्कार और दंड को इस संदर्भ में उदाहरण के रूप में दिया गया है।
ध्यान रखें कि शिक्षण में सकारात्मक प्रोत्साहन और उचित मार्गदर्शन उपयोगी होते हैं। दंड देने के बजाय विद्यार्थी को गलती सुधारने का अवसर देना बेहतर शिक्षण व्यवहार है।
प्रेरणा क्यों जरूरी है?
सीखने की इच्छा बढ़ाने के लिए।
विद्यार्थी को प्रयास जारी रखने के लिए।
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए।
SUPER TET ट्रिक:
प्रेरणा = सीखने की शुरुआत + निरंतरता + लक्ष्य तक पहुँचना।
4. रुचि का सिद्धांत (Principle of Interest)
अर्थ
शिक्षण ऐसा होना चाहिए कि विद्यार्थी की विषय में रुचि बनी रहे और वह मन लगाकर सीख सके।
उदाहरण
शिक्षक को जल चक्र पढ़ाना है।
पहला तरीका: केवल परिभाषा लिखवाकर याद कराना।
दूसरा तरीका: चित्र, मॉडल और उदाहरणों के माध्यम से वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा समझाना।
दूसरे तरीके से विद्यार्थी की रुचि बढ़ सकती है और विषय समझना आसान हो सकता है।
शिक्षक को क्या करना चाहिए?
विद्यार्थियों की रुचियों को समझना चाहिए।
चित्रों, मॉडलों और शिक्षण-सहायक सामग्री का उचित प्रयोग करना चाहिए।
कक्षा में विद्यार्थियों को सक्रिय रखना चाहिए।
UP SUPER TET के लिए पुस्तक के अनुसार विस्तृत तैयारी
पिछले दो अध्याय पूरे हो चुके हैं। अब हम तीसरा अध्याय शुरू करते हैं। इसे इस तरह समझेंगे कि आपको अर्थ, उदाहरण, परीक्षा में पूछे जाने वाले तथ्य और MCQ याद रहें।
1. शिक्षण के सिद्धांत का अर्थ
शिक्षण के सिद्धांत वे आधारभूत मान्यताएँ हैं, जिनका पालन करके शिक्षक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाता है।
सरल भाषा में: बच्चों को अच्छी तरह पढ़ाने के लिए शिक्षक जिन नियमों और बातों का ध्यान रखता है, उन्हें शिक्षण के सिद्धांत कहते हैं।
उदाहरण: यदि शिक्षक गणित में भिन्न पढ़ा रहा है, तो वह पहले आधा और चौथाई रोटी दिखाकर समझाए, फिर संख्याओं के रूप में भिन्न लिखे। इससे बच्चों को विषय समझने में आसानी होगी।
इस अध्याय में पुस्तक के अनुसार प्रमुख सिद्धांत
क्रियाशीलता का सिद्धांत
प्रेरणा का सिद्धांत
रुचि का सिद्धांत
निश्चित उद्देश्य का सिद्धांत
नियोजन का सिद्धांत
चयन का सिद्धांत
व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धांत
लोकतांत्रिक व्यवहार का सिद्धांत
जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धांत
आवृत्ति का सिद्धांत
निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत
विभाजन अथवा लघु सोपानों का सिद्धांत
अब एक-एक करके समझते हैं।
2. क्रियाशीलता का सिद्धांत (Principle of Activity)
अर्थ
इस सिद्धांत का अर्थ है—करके सीखना (Learning by Doing)।
बच्चा केवल सुनकर या पढ़कर ही नहीं, बल्कि स्वयं गतिविधियाँ करके भी सीखता है। पुस्तक के अनुसार सीखने की प्रक्रिया में विद्यार्थी का सक्रिय रहना आवश्यक है।
उदाहरण
मान लीजिए, बच्चे को साइकिल चलाना सीखना है।
केवल साइकिल चलाने के बारे में सुनने से वह पूरी तरह नहीं सीख पाएगा।
उसे स्वयं साइकिल चलाने का अभ्यास करना होगा।
शुरुआत में गलतियाँ होंगी, लेकिन अभ्यास से वह सीख जाएगा।
इसी प्रकार विज्ञान में पौधे के विकास को समझाने के लिए बच्चों से बीज बोने, पानी देने और पौधे में होने वाले बदलावों को देखने की गतिविधि कराई जा सकती है।
इस सिद्धांत के लाभ
सीखने में रुचि बढ़ती है।
एकाग्रता बढ़ती है।
आत्मविश्वास विकसित होता है।
सीखा हुआ ज्ञान अधिक स्थायी हो सकता है।
विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी बढ़ती है।
पुस्तक में दिए गए उदाहरण
पुस्तक में मॉन्टेसरी, किंडरगार्टन, डाल्टन पद्धति, गांधीजी की बुनियादी शिक्षा तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा–2005 को करके सीखने पर जोर देने वाले उदाहरणों के रूप में बताया गया है।
SUPER TET में याद रखें:
क्रियाशीलता का सिद्धांत = करके सीखना।
3. प्रेरणा का सिद्धांत (Principle of Motivation)
अर्थ
प्रेरणा वह प्रक्रिया है जो सीखने की शुरुआत करने, उसे जारी रखने और लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करती है।
जब विद्यार्थी को किसी काम को करने की इच्छा या प्रोत्साहन मिलता है, तो वह अधिक मन लगाकर सीखने का प्रयास कर सकता है।
उदाहरण
दो विद्यार्थियों ने परीक्षा दी।
पहले विद्यार्थी को अच्छे अंक मिलने पर शिक्षक ने उसकी मेहनत की प्रशंसा की।
दूसरे विद्यार्थी को बिना कारण डाँटा गया।
प्रशंसा से पहले विद्यार्थी को आगे और अच्छा करने की प्रेरणा मिल सकती है।
प्रेरणा के तरीके
पुस्तक में प्रेरणा के दो तरीके बताए गए हैं:
(क) शाब्दिक प्रेरणा
शाबाशी देना
प्रशंसा करना
अच्छे कार्य के लिए प्रोत्साहित करना
(ख) अशाब्दिक प्रेरणा पुस्तक में पुरस्कार और दंड को इस संदर्भ में उदाहरण के रूप में दिया गया है।
ध्यान रखें कि शिक्षण में सकारात्मक प्रोत्साहन और उचित मार्गदर्शन उपयोगी होते हैं। दंड देने के बजाय विद्यार्थी को गलती सुधारने का अवसर देना बेहतर शिक्षण व्यवहार है।
प्रेरणा क्यों जरूरी है?
सीखने की इच्छा बढ़ाने के लिए।
विद्यार्थी को प्रयास जारी रखने के लिए।
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए।
SUPER TET ट्रिक:
प्रेरणा = सीखने की शुरुआत + निरंतरता + लक्ष्य तक पहुँचना।
4. रुचि का सिद्धांत (Principle of Interest)
अर्थ
शिक्षण ऐसा होना चाहिए कि विद्यार्थी की विषय में रुचि बनी रहे और वह मन लगाकर सीख सके।
उदाहरण
शिक्षक को जल चक्र पढ़ाना है।
पहला तरीका: केवल परिभाषा लिखवाकर याद कराना।
दूसरा तरीका: चित्र, मॉडल और उदाहरणों के माध्यम से वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा समझाना।
दूसरे तरीके से विद्यार्थी की रुचि बढ़ सकती है और विषय समझना आसान हो सकता है।
शिक्षक को क्या करना चाहिए?
विद्यार्थियों की रुचियों को समझना चाहिए।
चित्रों, मॉडलों और शिक्षण-सहायक सामग्री का उचित प्रयोग करना चाहिए।
कक्षा में विद्यार्थियों को सक्रिय रखना चाहिए।
विषय को रोचक और समझने योग्य बनाना चाहिए।
महत्त्वपूर्ण अंतर:
क्रियाशीलता: विद्यार्थी करके सीखता है।
रुचि: विद्यार्थी मन लगाकर सीखता है।
प्रेरणा: विद्यार्थी को सीखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
5. निश्चित उद्देश्य का सिद्धांत (Principle of Definite Aim)
अर्थ
शिक्षण शुरू करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि विद्यार्थियों को क्या सिखाना है और पाठ के अंत तक उनसे क्या सीखने की अपेक्षा है।
उदाहरण
यदि शिक्षक हिंदी में संधि पढ़ा रहा है, तो पाठ के उद्देश्य हो सकते हैं:
विद्यार्थी संधि का अर्थ समझें।
विद्यार्थी संधि के उदाहरण पहचानें।
विद्यार्थी दिए गए शब्दों में संधि-विच्छेद कर सकें।
यदि शिक्षक बिना उद्देश्य के पढ़ाता रहेगा, तो समय का उचित उपयोग नहीं हो पाएगा।
मुख्य बातें
प्रत्येक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
शिक्षण गतिविधियाँ उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
मूल्यांकन से जाँचना चाहिए कि उद्देश्य प्राप्त हुआ या नहीं।
SUPER TET में याद रखें:
निश्चित उद्देश्य = शिक्षण की स्पष्ट दिशा और लक्ष्य।
6. नियोजन का सिद्धांत (Principle of Planning)
अर्थ
शिक्षण को व्यवस्थित ढंग से पूरा करने के लिए पहले से योजना बनाना नियोजन कहलाता है।
उदाहरण
शिक्षक को 40 मिनट में एक पाठ पढ़ाना है। वह पहले से तय करता है:
5 मिनट—पिछले ज्ञान की पुनरावृत्ति
15 मिनट—नए विषय की व्याख्या
10 मिनट—गतिविधि और उदाहरण
5 मिनट—प्रश्नोत्तर
5 मिनट—मूल्यांकन
यह शिक्षण नियोजन का उदाहरण है।
नियोजन के लाभ
समय और श्रम की बचत होती है।
शिक्षण क्रमबद्ध होता है।
पाठ का उद्देश्य पूरा करने में सहायता मिलती है।
शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को दिशा मिलती है।
याद रखें: नियोजन का अर्थ है—पहले से योजना बनाकर काम करना।
7. चयन का सिद्धांत (Principle of Selection)
अर्थ
शिक्षक को शिक्षण के दौरान विषय-वस्तु, उदाहरण, शिक्षण-सामग्री और गतिविधियों का उचित चयन करना चाहिए।
उदाहरण
कक्षा 2 के बच्चों को जोड़ सिखाने के लिए शिक्षक खिलौने, कंकड़ या चित्रों का प्रयोग कर सकता है। लेकिन बहुत जटिल गणितीय सूत्रों से शुरुआत करना उचित नहीं होगा।
शिक्षक को यह भी तय करना होता है कि:
कौन-सा विषय पहले पढ़ाया जाए।
कौन-सा विषय बाद में पढ़ाया जाए।
किस विषय के लिए कौन-सी शिक्षण-सामग्री उपयोगी होगी।
विद्यार्थियों की समस्याओं में किसका समाधान पहले किया जाए।
पुस्तक के अनुसार, शिक्षक की उचित चयन करने की योग्यता उसके शिक्षण की सफलता को प्रभावित करती है।
8. व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धांत (Principle of Individual Differences)
अर्थ
प्रत्येक विद्यार्थी दूसरे विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में अलग होता है। उनकी बुद्धि, रुचि, योग्यता, सीखने की गति और समझने के तरीके में अंतर हो सकता है।
उदाहरण
एक ही कक्षा में शिक्षक ने गणित का प्रश्न समझाया।
विद्यार्थी A ने तुरंत समझ लिया।
विद्यार्थी B को दोबारा समझाने की जरूरत पड़ी।
विद्यार्थी C को चित्र और उदाहरण से समझ आया।
इसका अर्थ यह नहीं कि कोई विद्यार्थी सीख नहीं सकता। हो सकता है कि उसे अलग तरीके या अधिक समय की आवश्यकता हो।
शिक्षक को क्या करना चाहिए?
सभी विद्यार्थियों को सीखने का अवसर देना चाहिए।
जरूरत के अनुसार अलग-अलग उदाहरण देने चाहिए।
कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता देनी चाहिए।
किसी विद्यार्थी की तुलना अनुचित ढंग से दूसरे से नहीं करनी चाहिए।
SUPER TET में याद रखें:
व्यक्तिगत भिन्नताएँ = विद्यार्थियों की क्षमताओं, रुचियों और सीखने की गति में अंतर।
9. लोकतांत्रिक व्यवहार का सिद्धांत (Principle of Democratic Behaviour)
अर्थ
शिक्षक को सभी विद्यार्थियों के साथ समानता, निष्पक्षता और सहयोग का व्यवहार करना चाहिए।
उदाहरण
कक्षा में कुछ विद्यार्थी शिक्षक के प्रिय हैं और कुछ कम बोलते हैं। यदि शिक्षक केवल अपने प्रिय विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और उत्तर देने का अवसर देता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं है।
लोकतांत्रिक कक्षा में:
सभी विद्यार्थियों को अवसर मिलता है।
विद्यार्थियों की बात सुनी जाती है।
शिक्षक निष्पक्ष रहता है।
सहयोग और सहभागिता को बढ़ावा दिया जाता है।
पुस्तक का मुख्य विचार: लोकतांत्रिक व्यवहार का आधार समानता और सहभागिता है।
10. जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धांत
अर्थ
शिक्षण में नए ज्ञान को विद्यार्थी के वास्तविक जीवन और अनुभवों से जोड़ना चाहिए।
उदाहरण
यदि शिक्षक पर्यावरण संरक्षण पढ़ा रहा है, तो वह विद्यार्थियों से पूछ सकता है कि वे अपने घर और आसपास सफाई कैसे बनाए रखते हैं।
इससे विद्यार्थी विषय को केवल किताब तक सीमित नहीं रखता, बल्कि जीवन में उसका उपयोग करना भी सीखता है।
महत्त्वपूर्ण अंतर:
क्रियाशीलता: विद्यार्थी करके सीखता है।
रुचि: विद्यार्थी मन लगाकर सीखता है।
प्रेरणा: विद्यार्थी को सीखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
5. निश्चित उद्देश्य का सिद्धांत (Principle of Definite Aim)
अर्थ
शिक्षण शुरू करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि विद्यार्थियों को क्या सिखाना है और पाठ के अंत तक उनसे क्या सीखने की अपेक्षा है।
उदाहरण
यदि शिक्षक हिंदी में संधि पढ़ा रहा है, तो पाठ के उद्देश्य हो सकते हैं:
विद्यार्थी संधि का अर्थ समझें।
विद्यार्थी संधि के उदाहरण पहचानें।
विद्यार्थी दिए गए शब्दों में संधि-विच्छेद कर सकें।
यदि शिक्षक बिना उद्देश्य के पढ़ाता रहेगा, तो समय का उचित उपयोग नहीं हो पाएगा।
मुख्य बातें
प्रत्येक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
शिक्षण गतिविधियाँ उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
मूल्यांकन से जाँचना चाहिए कि उद्देश्य प्राप्त हुआ या नहीं।
SUPER TET में याद रखें:
निश्चित उद्देश्य = शिक्षण की स्पष्ट दिशा और लक्ष्य।
6. नियोजन का सिद्धांत (Principle of Planning)
अर्थ
शिक्षण को व्यवस्थित ढंग से पूरा करने के लिए पहले से योजना बनाना नियोजन कहलाता है।
उदाहरण
शिक्षक को 40 मिनट में एक पाठ पढ़ाना है। वह पहले से तय करता है:
5 मिनट—पिछले ज्ञान की पुनरावृत्ति
15 मिनट—नए विषय की व्याख्या
10 मिनट—गतिविधि और उदाहरण
5 मिनट—प्रश्नोत्तर
5 मिनट—मूल्यांकन
यह शिक्षण नियोजन का उदाहरण है।
नियोजन के लाभ
समय और श्रम की बचत होती है।
शिक्षण क्रमबद्ध होता है।
पाठ का उद्देश्य पूरा करने में सहायता मिलती है।
शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को दिशा मिलती है।
याद रखें: नियोजन का अर्थ है—पहले से योजना बनाकर काम करना।
7. चयन का सिद्धांत (Principle of Selection)
अर्थ
शिक्षक को शिक्षण के दौरान विषय-वस्तु, उदाहरण, शिक्षण-सामग्री और गतिविधियों का उचित चयन करना चाहिए।
उदाहरण
कक्षा 2 के बच्चों को जोड़ सिखाने के लिए शिक्षक खिलौने, कंकड़ या चित्रों का प्रयोग कर सकता है। लेकिन बहुत जटिल गणितीय सूत्रों से शुरुआत करना उचित नहीं होगा।
शिक्षक को यह भी तय करना होता है कि:
कौन-सा विषय पहले पढ़ाया जाए।
कौन-सा विषय बाद में पढ़ाया जाए।
किस विषय के लिए कौन-सी शिक्षण-सामग्री उपयोगी होगी।
विद्यार्थियों की समस्याओं में किसका समाधान पहले किया जाए।
पुस्तक के अनुसार, शिक्षक की उचित चयन करने की योग्यता उसके शिक्षण की सफलता को प्रभावित करती है।
8. व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धांत (Principle of Individual Differences)
अर्थ
प्रत्येक विद्यार्थी दूसरे विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में अलग होता है। उनकी बुद्धि, रुचि, योग्यता, सीखने की गति और समझने के तरीके में अंतर हो सकता है।
उदाहरण
एक ही कक्षा में शिक्षक ने गणित का प्रश्न समझाया।
विद्यार्थी A ने तुरंत समझ लिया।
विद्यार्थी B को दोबारा समझाने की जरूरत पड़ी।
विद्यार्थी C को चित्र और उदाहरण से समझ आया।
इसका अर्थ यह नहीं कि कोई विद्यार्थी सीख नहीं सकता। हो सकता है कि उसे अलग तरीके या अधिक समय की आवश्यकता हो।
शिक्षक को क्या करना चाहिए?
सभी विद्यार्थियों को सीखने का अवसर देना चाहिए।
जरूरत के अनुसार अलग-अलग उदाहरण देने चाहिए।
कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता देनी चाहिए।
किसी विद्यार्थी की तुलना अनुचित ढंग से दूसरे से नहीं करनी चाहिए।
SUPER TET में याद रखें:
व्यक्तिगत भिन्नताएँ = विद्यार्थियों की क्षमताओं, रुचियों और सीखने की गति में अंतर।
9. लोकतांत्रिक व्यवहार का सिद्धांत (Principle of Democratic Behaviour)
अर्थ
शिक्षक को सभी विद्यार्थियों के साथ समानता, निष्पक्षता और सहयोग का व्यवहार करना चाहिए।
उदाहरण
कक्षा में कुछ विद्यार्थी शिक्षक के प्रिय हैं और कुछ कम बोलते हैं। यदि शिक्षक केवल अपने प्रिय विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और उत्तर देने का अवसर देता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं है।
लोकतांत्रिक कक्षा में:
सभी विद्यार्थियों को अवसर मिलता है।
विद्यार्थियों की बात सुनी जाती है।
शिक्षक निष्पक्ष रहता है।
सहयोग और सहभागिता को बढ़ावा दिया जाता है।
पुस्तक का मुख्य विचार: लोकतांत्रिक व्यवहार का आधार समानता और सहभागिता है।
10. जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धांत
अर्थ
शिक्षण में नए ज्ञान को विद्यार्थी के वास्तविक जीवन और अनुभवों से जोड़ना चाहिए।
उदाहरण
यदि शिक्षक पर्यावरण संरक्षण पढ़ा रहा है, तो वह विद्यार्थियों से पूछ सकता है कि वे अपने घर और आसपास सफाई कैसे बनाए रखते हैं।
इससे विद्यार्थी विषय को केवल किताब तक सीमित नहीं रखता, बल्कि जीवन में उसका उपयोग करना भी सीखता है।
लाभ
ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग समझ में आता है।
विद्यार्थी के पूर्व अनुभवों से नए ज्ञान का संबंध बनता है।
सीखा हुआ ज्ञान वास्तविक परिस्थितियों में उपयोगी होता है।
पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा–2005 के संदर्भ में शिक्षा को जीवन से जोड़ने पर जोर दिया गया है।
11. आवृत्ति का सिद्धांत (Principle of Repetition)
अर्थ
सीखी हुई विषय-वस्तु का बार-बार अभ्यास या पुनरावृत्ति करने से उसे याद रखने और समझने में सहायता मिलती है।
उदाहरण
विद्यार्थी ने गणित का एक सूत्र सीखा। यदि वह अलग-अलग प्रश्नों में उस सूत्र का अभ्यास करता है, तो उसे सूत्र का प्रयोग करना अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकता है।
आवृत्ति के तरीके
पुस्तक में उदाहरण के रूप में बताया गया है:
गृहकार्य
मासिक परीक्षा
विद्यार्थियों से पाठ को समझाने के लिए कहना
लाभ
अभ्यास से दक्षता बढ़ती है।
सीखी हुई सामग्री को याद रखने में सहायता मिलती है।
गलतियों को पहचानकर सुधारने का अवसर मिलता है।
SUPER TET ट्रिक:
आवृत्ति = बार-बार अभ्यास और पुनरावृत्ति।
12. निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत
अर्थ
शिक्षण में विद्यार्थियों की रचनात्मक गतिविधियों और मनोरंजक तरीकों को शामिल करना चाहिए, ताकि सीखना रोचक बने और विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग लें।
उदाहरण
पहाड़े याद कराने के लिए शिक्षक लय या कविता का उपयोग करता है। इसी प्रकार भाषा पढ़ाते समय कहानी, नाटक या चित्रों का उपयोग किया जा सकता है।
लाभ
पुस्तक में इस सिद्धांत से जुड़े लाभ बताए गए हैं:
स्व-अध्ययन का विकास।
चिंतन और मनन का विकास।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अंतःक्रिया के अवसर।
पाठ को रुचिपूर्ण बनाना।
याद रखें: निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत = रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से रोचक शिक्षण।
13. विभाजन का सिद्धांत (Principle of Division / छोटे सोपानों का सिद्धांत)
अर्थ
कठिन या विस्तृत विषय को छोटे-छोटे, क्रमबद्ध और सरल भागों में बाँटकर पढ़ाना चाहिए।
उदाहरण
बच्चों को भाषा का ज्ञान देने के लिए शिक्षक यह क्रम अपना सकता है:
अक्षर → शब्द → वाक्य → व्याकरणिक प्रयोग
इस क्रम में विद्यार्थी पहले सरल इकाई सीखता है, फिर धीरे-धीरे कठिन स्तर पर पहुँचता है।
मुख्य बातें
सरल से कठिन की ओर बढ़ना चाहिए।
विषय-वस्तु को क्रमबद्ध रखना चाहिए।
एक चरण की समझ बनने के बाद अगले चरण पर जाना चाहिए।
इससे विषय को समझना आसान हो सकता है।
SUPER TET में याद रखें:
विभाजन का सिद्धांत = बड़े विषय को छोटे-छोटे सोपानों में बाँटकर पढ़ाना।
ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग समझ में आता है।
विद्यार्थी के पूर्व अनुभवों से नए ज्ञान का संबंध बनता है।
सीखा हुआ ज्ञान वास्तविक परिस्थितियों में उपयोगी होता है।
पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा–2005 के संदर्भ में शिक्षा को जीवन से जोड़ने पर जोर दिया गया है।
11. आवृत्ति का सिद्धांत (Principle of Repetition)
अर्थ
सीखी हुई विषय-वस्तु का बार-बार अभ्यास या पुनरावृत्ति करने से उसे याद रखने और समझने में सहायता मिलती है।
उदाहरण
विद्यार्थी ने गणित का एक सूत्र सीखा। यदि वह अलग-अलग प्रश्नों में उस सूत्र का अभ्यास करता है, तो उसे सूत्र का प्रयोग करना अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकता है।
आवृत्ति के तरीके
पुस्तक में उदाहरण के रूप में बताया गया है:
गृहकार्य
मासिक परीक्षा
विद्यार्थियों से पाठ को समझाने के लिए कहना
लाभ
अभ्यास से दक्षता बढ़ती है।
सीखी हुई सामग्री को याद रखने में सहायता मिलती है।
गलतियों को पहचानकर सुधारने का अवसर मिलता है।
SUPER TET ट्रिक:
आवृत्ति = बार-बार अभ्यास और पुनरावृत्ति।
12. निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत
अर्थ
शिक्षण में विद्यार्थियों की रचनात्मक गतिविधियों और मनोरंजक तरीकों को शामिल करना चाहिए, ताकि सीखना रोचक बने और विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग लें।
उदाहरण
पहाड़े याद कराने के लिए शिक्षक लय या कविता का उपयोग करता है। इसी प्रकार भाषा पढ़ाते समय कहानी, नाटक या चित्रों का उपयोग किया जा सकता है।
लाभ
पुस्तक में इस सिद्धांत से जुड़े लाभ बताए गए हैं:
स्व-अध्ययन का विकास।
चिंतन और मनन का विकास।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अंतःक्रिया के अवसर।
पाठ को रुचिपूर्ण बनाना।
याद रखें: निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धांत = रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से रोचक शिक्षण।
13. विभाजन का सिद्धांत (Principle of Division / छोटे सोपानों का सिद्धांत)
अर्थ
कठिन या विस्तृत विषय को छोटे-छोटे, क्रमबद्ध और सरल भागों में बाँटकर पढ़ाना चाहिए।
उदाहरण
बच्चों को भाषा का ज्ञान देने के लिए शिक्षक यह क्रम अपना सकता है:
अक्षर → शब्द → वाक्य → व्याकरणिक प्रयोग
इस क्रम में विद्यार्थी पहले सरल इकाई सीखता है, फिर धीरे-धीरे कठिन स्तर पर पहुँचता है।
मुख्य बातें
सरल से कठिन की ओर बढ़ना चाहिए।
विषय-वस्तु को क्रमबद्ध रखना चाहिए।
एक चरण की समझ बनने के बाद अगले चरण पर जाना चाहिए।
इससे विषय को समझना आसान हो सकता है।
SUPER TET में याद रखें:
विभाजन का सिद्धांत = बड़े विषय को छोटे-छोटे सोपानों में बाँटकर पढ़ाना।
अब UP SUPER TET के लिए 15 महत्त्वपूर्ण MCQ
पहले स्वयं हल करने का प्रयास करें। उत्तर अभी नहीं दिए गए हैं, ताकि आपकी तैयारी की जाँच हो सके।
1. क्रियाशीलता का सिद्धांत किस विचार पर आधारित है?
A. सुनकर सीखना
B. करके सीखना
C. रटकर सीखना
D. केवल लिखकर सीखना
2. पुस्तक के अनुसार मॉन्टेसरी और डाल्टन पद्धति किस सिद्धांत पर जोर देती हैं?
A. आवृत्ति
B. चयन
C. क्रियाशीलता
D. निश्चित उद्देश्य
3. सीखने की शुरुआत से लेकर लक्ष्य प्राप्ति तक सहायता करने वाली प्रक्रिया कौन-सी है?
A. चयन
B. प्रेरणा
C. विभाजन
D. आवृत्ति
4. चित्र, मॉडल और कहानी के माध्यम से पढ़ाना मुख्य रूप से किस सिद्धांत से संबंधित है?
A. रुचि
B. चयन
C. आवृत्ति
D. नियोजन
5. प्रत्येक पाठ का लक्ष्य पहले से स्पष्ट रखना किस सिद्धांत का भाग है?
A. लोकतांत्रिक व्यवहार
B. निश्चित उद्देश्य
C. व्यक्तिगत भिन्नता
D. निर्माण एवं मनोरंजन
6. पाठ पढ़ाने से पहले समय और गतिविधियों की योजना बनाना कहलाता है—
A. आवृत्ति
B. चयन
C. नियोजन
D. प्रेरणा
7. विद्यार्थियों की सीखने की गति के अनुसार शिक्षण में बदलाव करना किस सिद्धांत से संबंधित है?
A. विभाजन
B. व्यक्तिगत भिन्नताएँ
C. आवृत्ति
D. निश्चित उद्देश्य
8. कक्षा के सभी विद्यार्थियों को समान अवसर देना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. प्रेरणा
B. चयन
C. लोकतांत्रिक व्यवहार
D. आवृत्ति
9. पर्यावरण संरक्षण को घर और आसपास की सफाई से जोड़कर पढ़ाना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. जीवन से संबंध
B. विभाजन
C. नियोजन
D. आवृत्ति
10. गृहकार्य और मासिक परीक्षा को पुस्तक किस सिद्धांत के तरीकों में शामिल करती है?
A. रुचि
B. आवृत्ति
C. चयन
D. प्रेरणा
11. पहाड़े को कविता या लय के माध्यम से सिखाना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. व्यक्तिगत भिन्नताएँ
B. चयन
C. निर्माण एवं मनोरंजन
D. नियोजन
12. किसी विषय को छोटे-छोटे क्रमबद्ध चरणों में पढ़ाना कहलाता है—
A. विभाजन का सिद्धांत
B. प्रेरणा का सिद्धांत
C. रुचि का सिद्धांत
D. लोकतांत्रिक व्यवहार
13. शिक्षक द्वारा केवल कुछ पसंदीदा विद्यार्थियों को अवसर देना किस सिद्धांत के विरुद्ध है?
A. आवृत्ति
B. लोकतांत्रिक व्यवहार
C. विभाजन
D. नियोजन
14. किसी विषय में विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए?
A. केवल रटवाना
B. बिना उद्देश्य पढ़ाना
C. उपयुक्त चित्र, मॉडल और गतिविधियाँ इस्तेमाल करना
D. सभी विद्यार्थियों को एक ही गति से पढ़ाना
15. सही क्रम कौन-सा है?
A. वाक्य → शब्द → अक्षर
B. शब्द → अक्षर → वाक्य
C. अक्षर → शब्द → वाक्य
D. वाक्य → अक्षर → शब्द
पहले स्वयं हल करने का प्रयास करें। उत्तर अभी नहीं दिए गए हैं, ताकि आपकी तैयारी की जाँच हो सके।
1. क्रियाशीलता का सिद्धांत किस विचार पर आधारित है?
A. सुनकर सीखना
B. करके सीखना
C. रटकर सीखना
D. केवल लिखकर सीखना
2. पुस्तक के अनुसार मॉन्टेसरी और डाल्टन पद्धति किस सिद्धांत पर जोर देती हैं?
A. आवृत्ति
B. चयन
C. क्रियाशीलता
D. निश्चित उद्देश्य
3. सीखने की शुरुआत से लेकर लक्ष्य प्राप्ति तक सहायता करने वाली प्रक्रिया कौन-सी है?
A. चयन
B. प्रेरणा
C. विभाजन
D. आवृत्ति
4. चित्र, मॉडल और कहानी के माध्यम से पढ़ाना मुख्य रूप से किस सिद्धांत से संबंधित है?
A. रुचि
B. चयन
C. आवृत्ति
D. नियोजन
5. प्रत्येक पाठ का लक्ष्य पहले से स्पष्ट रखना किस सिद्धांत का भाग है?
A. लोकतांत्रिक व्यवहार
B. निश्चित उद्देश्य
C. व्यक्तिगत भिन्नता
D. निर्माण एवं मनोरंजन
6. पाठ पढ़ाने से पहले समय और गतिविधियों की योजना बनाना कहलाता है—
A. आवृत्ति
B. चयन
C. नियोजन
D. प्रेरणा
7. विद्यार्थियों की सीखने की गति के अनुसार शिक्षण में बदलाव करना किस सिद्धांत से संबंधित है?
A. विभाजन
B. व्यक्तिगत भिन्नताएँ
C. आवृत्ति
D. निश्चित उद्देश्य
8. कक्षा के सभी विद्यार्थियों को समान अवसर देना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. प्रेरणा
B. चयन
C. लोकतांत्रिक व्यवहार
D. आवृत्ति
9. पर्यावरण संरक्षण को घर और आसपास की सफाई से जोड़कर पढ़ाना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. जीवन से संबंध
B. विभाजन
C. नियोजन
D. आवृत्ति
10. गृहकार्य और मासिक परीक्षा को पुस्तक किस सिद्धांत के तरीकों में शामिल करती है?
A. रुचि
B. आवृत्ति
C. चयन
D. प्रेरणा
11. पहाड़े को कविता या लय के माध्यम से सिखाना किस सिद्धांत का उदाहरण है?
A. व्यक्तिगत भिन्नताएँ
B. चयन
C. निर्माण एवं मनोरंजन
D. नियोजन
12. किसी विषय को छोटे-छोटे क्रमबद्ध चरणों में पढ़ाना कहलाता है—
A. विभाजन का सिद्धांत
B. प्रेरणा का सिद्धांत
C. रुचि का सिद्धांत
D. लोकतांत्रिक व्यवहार
13. शिक्षक द्वारा केवल कुछ पसंदीदा विद्यार्थियों को अवसर देना किस सिद्धांत के विरुद्ध है?
A. आवृत्ति
B. लोकतांत्रिक व्यवहार
C. विभाजन
D. नियोजन
14. किसी विषय में विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए?
A. केवल रटवाना
B. बिना उद्देश्य पढ़ाना
C. उपयुक्त चित्र, मॉडल और गतिविधियाँ इस्तेमाल करना
D. सभी विद्यार्थियों को एक ही गति से पढ़ाना
15. सही क्रम कौन-सा है?
A. वाक्य → शब्द → अक्षर
B. शब्द → अक्षर → वाक्य
C. अक्षर → शब्द → वाक्य
D. वाक्य → अक्षर → शब्द
अध्याय 3 — शिक्षण के सिद्धांत की व्याख्या और उसके 15 MCQs के उत्तर पूरे हो गए हैं। ✅
अब हम आपकी पुस्तक के अगले अध्याय पर चलते हैं:
अब हम आपकी पुस्तक के अगले अध्याय पर चलते हैं:
अध्याय 4 — शिक्षण के सूत्र (Maxims of Teaching)
UP SUPER TET परीक्षा के लिए सम्पूर्ण व्याख्या — भाग 1
हम आपकी पुस्तक शिक्षण अधिगम के सिद्धांत के पृष्ठ 33 से आगे दिए गए विषय को क्रम से समझेंगे। पहले अर्थ और सूत्र 1 से 5 पढ़ेंगे, फिर अगले भाग में बाकी सूत्र पढ़ेंगे। (D.El.Ed. Sem1) शिक्षण अधिगम के सिद्धांत.pdf
1. शिक्षण के सूत्र का अर्थ
शिक्षण के सूत्र वे सामान्य नियम या मार्गदर्शक बातें हैं, जिनका उपयोग करके शिक्षक शिक्षण को सरल, रुचिकर और प्रभावशाली बनाता है।
शिक्षक के सामने कुछ प्रश्न होते हैं:
पाठ की शुरुआत कैसे करें?
किस क्रम में पढ़ाएँ?
बच्चों का ध्यान कैसे आकर्षित करें?
कठिन विषय को सरल कैसे बनाएँ?
शिक्षण सामग्री का उपयोग कब और कैसे करें?
इन प्रश्नों के समाधान में शिक्षण के सूत्र सहायता करते हैं।
परीक्षा के लिए याद रखें: शिक्षण के सूत्र बालक की प्रकृति, उसकी रुचि और मानसिक विकास को ध्यान में रखकर शिक्षण करने में मार्गदर्शन देते हैं।
UP SUPER TET परीक्षा के लिए सम्पूर्ण व्याख्या — भाग 1
हम आपकी पुस्तक शिक्षण अधिगम के सिद्धांत के पृष्ठ 33 से आगे दिए गए विषय को क्रम से समझेंगे। पहले अर्थ और सूत्र 1 से 5 पढ़ेंगे, फिर अगले भाग में बाकी सूत्र पढ़ेंगे। (D.El.Ed. Sem1) शिक्षण अधिगम के सिद्धांत.pdf
1. शिक्षण के सूत्र का अर्थ
शिक्षण के सूत्र वे सामान्य नियम या मार्गदर्शक बातें हैं, जिनका उपयोग करके शिक्षक शिक्षण को सरल, रुचिकर और प्रभावशाली बनाता है।
शिक्षक के सामने कुछ प्रश्न होते हैं:
पाठ की शुरुआत कैसे करें?
किस क्रम में पढ़ाएँ?
बच्चों का ध्यान कैसे आकर्षित करें?
कठिन विषय को सरल कैसे बनाएँ?
शिक्षण सामग्री का उपयोग कब और कैसे करें?
इन प्रश्नों के समाधान में शिक्षण के सूत्र सहायता करते हैं।
परीक्षा के लिए याद रखें: शिक्षण के सूत्र बालक की प्रकृति, उसकी रुचि और मानसिक विकास को ध्यान में रखकर शिक्षण करने में मार्गदर्शन देते हैं।
2. शिक्षण के प्रमुख सूत्र
आपकी पुस्तक में निम्नलिखित 10 प्रमुख सूत्रों का उल्लेख है।
सरल से जटिल की ओर
ज्ञात से अज्ञात की ओर
स्थूल से सूक्ष्म की ओर
पूर्ण से अंश की ओर
अनिश्चित से निश्चित की ओर
प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
विशिष्ट से सामान्य की ओर
विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की ओर
अनुभव से युक्तियुक्त की ओर
इसके अतिरिक्त पुस्तक में प्रकृति का अनुसरण भी एक सूत्र के रूप में दिया गया है।
अब इन्हें उदाहरण सहित समझिए।
आपकी पुस्तक में निम्नलिखित 10 प्रमुख सूत्रों का उल्लेख है।
सरल से जटिल की ओर
ज्ञात से अज्ञात की ओर
स्थूल से सूक्ष्म की ओर
पूर्ण से अंश की ओर
अनिश्चित से निश्चित की ओर
प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
विशिष्ट से सामान्य की ओर
विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की ओर
अनुभव से युक्तियुक्त की ओर
इसके अतिरिक्त पुस्तक में प्रकृति का अनुसरण भी एक सूत्र के रूप में दिया गया है।
अब इन्हें उदाहरण सहित समझिए।
सूत्र 1. सरल से जटिल की ओर
From Simple to Complex
अर्थ
शिक्षक को पहले सरल विषय पढ़ाना चाहिए और उसके बाद कठिन विषय की ओर बढ़ना चाहिए।
उदाहरण
गणित में जोड़ सिखाने से पहले बच्चों को गिनती का ज्ञान होना चाहिए। इसके बाद सरल जोड़ और फिर कठिन जोड़ सिखाना चाहिए।
गलत तरीका: बच्चे को शुरुआत में ही कठिन सवाल दे देना।
सही तरीका: गिनती → सरल जोड़ → कठिन जोड़।
ऐसा क्यों?
बच्चों को विषय समझने में आसानी होती है।
उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।
सीखने में रुचि बनी रहती है।
SUPER TET ट्रिक: सरल → जटिल।
From Simple to Complex
अर्थ
शिक्षक को पहले सरल विषय पढ़ाना चाहिए और उसके बाद कठिन विषय की ओर बढ़ना चाहिए।
उदाहरण
गणित में जोड़ सिखाने से पहले बच्चों को गिनती का ज्ञान होना चाहिए। इसके बाद सरल जोड़ और फिर कठिन जोड़ सिखाना चाहिए।
गलत तरीका: बच्चे को शुरुआत में ही कठिन सवाल दे देना।
सही तरीका: गिनती → सरल जोड़ → कठिन जोड़।
ऐसा क्यों?
बच्चों को विषय समझने में आसानी होती है।
उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।
सीखने में रुचि बनी रहती है।
SUPER TET ट्रिक: सरल → जटिल।