ाणा ।।16।।
(17) आबाहन ।
मकरस्थं पाशहस्तं स्वर्ग सम्पत्तिमीश्गरम् । आवाहयेत्प्रतीचीषे वरुणं यादसां पतिम् ।। ऊँ तत्वायाकि ब्राह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमान्नो हविर्विः । अहेडमानोवरुणेहवोध्यरुश समानआयुः प्रमोषीः कलशेबरुणेसाग्डंसपरिवाकं सायुधं सशक्तिकं आवाहयमि स्थापयामि ऊँ अपाम्पतये वरुणाय नमः ।
।। अथ गंगाद्यावाहनम् ।।
पश्चात गन्धादि से पचोंपतार कलस की पूजा कर गग्डांदि नदियों का आबाहन करना चाहिऐ
कला कलाङि देवानां दानवानंहि कला कला । सगृंह्य निर्मितो येन कलशस्तेन कथ्यते ।। 1 ।। कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः । मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मतृगणः स्मृताः ।।2।। कुक्षौतु सागरः सप्ताः सप्तद्वोपा च मेदिनी । अर्जुनी गोमती चैव चन्द्रभागा सरस्वती ।।3।। काबेरी पृष्ण वेणी च गग्डां चैव महानदी । ताप्ती गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा ।।4।। नद्याम्च विविधा जाता नद्यःसर्वास्तथा पराः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि कलशस्थानि तानि वै ।।5।। सर्वे समुद्रा स्सरितः तीर्थानि जलदानदाः । आयान्तु मम शान्त्यर्थ दुरितक्षय कारकाः ।।6।। ऋग्वेदोथयजुर्वेदः सामवनेदो ह्यथर्वणः । अग्डंश्चै सहिता सर्वे कलशस्तु समाश्रितः।।7।। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पिष्टिकरी तथा । आयान्तु मम शार्न्त्थ दुरित क्षयकारकाः ।।8।।
फिर अक्षत हाथ मे लेकर
ऊँ मनोजूतिर्जूषता माज्यस्य बृहस्पतिर्य मिमंतनो त्वारिष्ट यज्ञ समिमं दधातु । विश्वेदेवा स इहमादयन्ता मों 3 प्रतिष्ठा वरुणद्यावाहित देवताः सुप्रतिष्ठा वरदो भवन्तु ।। ऊँ वरुणद्यावाहित अथ च विष्णावाद्यः वाहित देवाताभ्यो नमः।।
गन्धादि से यथोपचार पूजन कर जल लेकर
अनया पूजया वरुणावहितदेवः प्रीयन्ताम् नमः
अथ कलशा प्रार्थना
यह पढकर समर्पण करना चाहिए।
देव दानव मध्यमाने महोदधौ । उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृता विष्णुना स्वयम् ।। 1 ।। त्वत्तोये सर्व तीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः । त्वयि तिष्ठन्ति त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिता ।।2।। शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे देवाः सपैतृका ।।3।।
।। अथ वरुण प्रार्थना ।।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेपि यतः कामफल प्रदाः। त्वत्प्रसादादिमां पूजां कुर्त्तुमीहे जलोदभव ।।4।। सान्निध्यं कुरु में देव प्रसनो भव सर्वदा । विश्वकर्मार्तने यज्ञे कृपां कुरु विशेषतः। मनो नमस्ते स्फटिक नमो सुश्वेत हौराय सुमंगलाय सुपाशहस्ताय झषासनायजलाधिनाथाय नमो नमस्ते ।।5।।
।। अथशालिग्राम पूजनम् ।।
वग प्रान्त में प्रयः सब प्रजाओ में श्री नारायण की प्रधानता रहती है इसलिए सर्व साधारण के लाभ के लिये यहाँ पर श्री शालिग्राम स्वरुप नारायण का पूजन दे दिया गया है । जहां पर शालिप्राम देव का पूजन करना हो वो वहां निम्नलिखित क्रम से पूजन करना चाहिए शुद्धपात्र म् चन्दन से अष्टदल कमल बनाकर तुलसी पुष्प रखकर श्री शालिग्रम देवशिला को स्थापित कर ध्यान करना चाहिए ।
ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रय समन्वितं । लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभारणे हरिम् ।। शुक्लवर्ण पीतवस्त्रं श्रीवत्सपद भूषितम् । गोविन्दं गोकुलानन्दं ब्रह्माद्यैरमि पूजितम् ।। ऊँ सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्र पात् । स भूमि सर्वतस्पृत्वातिष्ट द्दशांगुलम् ।।1।। ध्यानम् समर्पयामि सत्यस्वरुपाय श्री शालिग्राम देवाय नमः ।
आसन- ऊँ पुरुष ऐवेद सर्व अदभूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्ये शानो यदन्नेनातिरोहति ।।2।।
पुष्पासनं सम
ऊँ एतावानस्य महिमतो ज्यायांश्च पूरुषः। पोदोस्य विश्वभूतानि त्रिपादस्यामृंत दिवि ।।3।।
पादयो पाद्यं समर्पयामि ।
अर्थ: ऊँ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहा भवत्पुनः । ततो विष्वड् व्याक्रानत्साशनान शने अभि। हस्ते अर्ध्यम् स0 ।।4।। चमनीय जलम् – ऊँ तो विराड्जायत विराजो अधिपुरुषः । सजातो अत्यरिच्यत पश्चादभूमिमथोपुरः मुखे आचमनीयम् सम0 ।।5।।
स्नान: ऊँ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सभृतं पृषदाज्यम् . पशुस्तांश्चक्रेवायव्यानार ण्याग्रम्याश्च ये ।। स्नानं सम0 ।।6।।
पश्चामृत स्नान तत्रादौ पयस्नान:
ऊँ पयः पृथिव्या पयओषधीषुयोतिव्यन्तरिक्षेपयोधाः पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ।। पयस्नानं सम0 ।।
शुदधोदक स्नान:
ऊँ शुद्धबालः सर्वशद्धः बासो मणिवालस्तग्राश्विनाश्येतः श्येताक्षारुणास्ते रुद्रायपशुपतये कर्ण्णायामाअवलोप्तारौद्रानमो रुपाः पार्जन्याः पथ स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं सम0 । दधि स्नान- ऊँ दधिक्राव्णोअकारिषं जिष्णोरश्वस्यवाजिनः । सुरभिना मुखाकरत्प्रणग्राय षितारिषत् ।। दधिस्नानं सम0 ।।8।।
शुदधोदक स्नान:
देवस्यत्वासवितुः प्रसनेश्विमीर्बाहुभ्याम् पूष्णो हस्ताभ्ग्राम् शुद्धोदक स्नानं सम0 ।।
बृत स्नान:
ऊँ घृतघृतपालनः पिवत वसां वसा वसाणवनः पिवतान्तरिक्षस्यहविरसि स्वाहा ।। दिशःप्रदिशआदिशोब्बिदिशउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा0 ।।
शुदधोदक स्नान:
ऊँ आपोहिष्ठामयोभुवस्तानऊर्ज्जेदधातन महेरण चक्षसे। योवः शिवतमोरसस्तस्य भाजयते हनः उशतोरि
(17) आबाहन ।
मकरस्थं पाशहस्तं स्वर्ग सम्पत्तिमीश्गरम् । आवाहयेत्प्रतीचीषे वरुणं यादसां पतिम् ।। ऊँ तत्वायाकि ब्राह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमान्नो हविर्विः । अहेडमानोवरुणेहवोध्यरुश समानआयुः प्रमोषीः कलशेबरुणेसाग्डंसपरिवाकं सायुधं सशक्तिकं आवाहयमि स्थापयामि ऊँ अपाम्पतये वरुणाय नमः ।
।। अथ गंगाद्यावाहनम् ।।
पश्चात गन्धादि से पचोंपतार कलस की पूजा कर गग्डांदि नदियों का आबाहन करना चाहिऐ
कला कलाङि देवानां दानवानंहि कला कला । सगृंह्य निर्मितो येन कलशस्तेन कथ्यते ।। 1 ।। कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः । मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मतृगणः स्मृताः ।।2।। कुक्षौतु सागरः सप्ताः सप्तद्वोपा च मेदिनी । अर्जुनी गोमती चैव चन्द्रभागा सरस्वती ।।3।। काबेरी पृष्ण वेणी च गग्डां चैव महानदी । ताप्ती गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा ।।4।। नद्याम्च विविधा जाता नद्यःसर्वास्तथा पराः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि कलशस्थानि तानि वै ।।5।। सर्वे समुद्रा स्सरितः तीर्थानि जलदानदाः । आयान्तु मम शान्त्यर्थ दुरितक्षय कारकाः ।।6।। ऋग्वेदोथयजुर्वेदः सामवनेदो ह्यथर्वणः । अग्डंश्चै सहिता सर्वे कलशस्तु समाश्रितः।।7।। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पिष्टिकरी तथा । आयान्तु मम शार्न्त्थ दुरित क्षयकारकाः ।।8।।
फिर अक्षत हाथ मे लेकर
ऊँ मनोजूतिर्जूषता माज्यस्य बृहस्पतिर्य मिमंतनो त्वारिष्ट यज्ञ समिमं दधातु । विश्वेदेवा स इहमादयन्ता मों 3 प्रतिष्ठा वरुणद्यावाहित देवताः सुप्रतिष्ठा वरदो भवन्तु ।। ऊँ वरुणद्यावाहित अथ च विष्णावाद्यः वाहित देवाताभ्यो नमः।।
गन्धादि से यथोपचार पूजन कर जल लेकर
अनया पूजया वरुणावहितदेवः प्रीयन्ताम् नमः
अथ कलशा प्रार्थना
यह पढकर समर्पण करना चाहिए।
देव दानव मध्यमाने महोदधौ । उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृता विष्णुना स्वयम् ।। 1 ।। त्वत्तोये सर्व तीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः । त्वयि तिष्ठन्ति त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिता ।।2।। शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे देवाः सपैतृका ।।3।।
।। अथ वरुण प्रार्थना ।।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेपि यतः कामफल प्रदाः। त्वत्प्रसादादिमां पूजां कुर्त्तुमीहे जलोदभव ।।4।। सान्निध्यं कुरु में देव प्रसनो भव सर्वदा । विश्वकर्मार्तने यज्ञे कृपां कुरु विशेषतः। मनो नमस्ते स्फटिक नमो सुश्वेत हौराय सुमंगलाय सुपाशहस्ताय झषासनायजलाधिनाथाय नमो नमस्ते ।।5।।
।। अथशालिग्राम पूजनम् ।।
वग प्रान्त में प्रयः सब प्रजाओ में श्री नारायण की प्रधानता रहती है इसलिए सर्व साधारण के लाभ के लिये यहाँ पर श्री शालिग्राम स्वरुप नारायण का पूजन दे दिया गया है । जहां पर शालिप्राम देव का पूजन करना हो वो वहां निम्नलिखित क्रम से पूजन करना चाहिए शुद्धपात्र म् चन्दन से अष्टदल कमल बनाकर तुलसी पुष्प रखकर श्री शालिग्रम देवशिला को स्थापित कर ध्यान करना चाहिए ।
ध्यायेत् सत्यं गुणातीतं गुणत्रय समन्वितं । लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभारणे हरिम् ।। शुक्लवर्ण पीतवस्त्रं श्रीवत्सपद भूषितम् । गोविन्दं गोकुलानन्दं ब्रह्माद्यैरमि पूजितम् ।। ऊँ सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्र पात् । स भूमि सर्वतस्पृत्वातिष्ट द्दशांगुलम् ।।1।। ध्यानम् समर्पयामि सत्यस्वरुपाय श्री शालिग्राम देवाय नमः ।
आसन- ऊँ पुरुष ऐवेद सर्व अदभूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्ये शानो यदन्नेनातिरोहति ।।2।।
पुष्पासनं सम
ऊँ एतावानस्य महिमतो ज्यायांश्च पूरुषः। पोदोस्य विश्वभूतानि त्रिपादस्यामृंत दिवि ।।3।।
पादयो पाद्यं समर्पयामि ।
अर्थ: ऊँ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहा भवत्पुनः । ततो विष्वड् व्याक्रानत्साशनान शने अभि। हस्ते अर्ध्यम् स0 ।।4।। चमनीय जलम् – ऊँ तो विराड्जायत विराजो अधिपुरुषः । सजातो अत्यरिच्यत पश्चादभूमिमथोपुरः मुखे आचमनीयम् सम0 ।।5।।
स्नान: ऊँ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सभृतं पृषदाज्यम् . पशुस्तांश्चक्रेवायव्यानार ण्याग्रम्याश्च ये ।। स्नानं सम0 ।।6।।
पश्चामृत स्नान तत्रादौ पयस्नान:
ऊँ पयः पृथिव्या पयओषधीषुयोतिव्यन्तरिक्षेपयोधाः पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ।। पयस्नानं सम0 ।।
शुदधोदक स्नान:
ऊँ शुद्धबालः सर्वशद्धः बासो मणिवालस्तग्राश्विनाश्येतः श्येताक्षारुणास्ते रुद्रायपशुपतये कर्ण्णायामाअवलोप्तारौद्रानमो रुपाः पार्जन्याः पथ स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं सम0 । दधि स्नान- ऊँ दधिक्राव्णोअकारिषं जिष्णोरश्वस्यवाजिनः । सुरभिना मुखाकरत्प्रणग्राय षितारिषत् ।। दधिस्नानं सम0 ।।8।।
शुदधोदक स्नान:
देवस्यत्वासवितुः प्रसनेश्विमीर्बाहुभ्याम् पूष्णो हस्ताभ्ग्राम् शुद्धोदक स्नानं सम0 ।।
बृत स्नान:
ऊँ घृतघृतपालनः पिवत वसां वसा वसाणवनः पिवतान्तरिक्षस्यहविरसि स्वाहा ।। दिशःप्रदिशआदिशोब्बिदिशउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा0 ।।
शुदधोदक स्नान:
ऊँ आपोहिष्ठामयोभुवस्तानऊर्ज्जेदधातन महेरण चक्षसे। योवः शिवतमोरसस्तस्य भाजयते हनः उशतोरि
श्री विश्वकर्मा कथा
पहला अध्याय
एक समय अनेक ऋषिगण धर्मक्षेत्र में एकत्र हुए और वहां धर्म के तत्व जानने वाले सूत जी से ऋषि कहने लगें - हे पुराण के मर्मज्ञ, महात्मने, आप हमारे ऊपर अत्यंत कृपा करके हमारे इस अचानक उत्पन्न हुए सशंय का नाश किजीए। हमने सर्व व्यापक विष्णु के अनेक रूप सुने है, उनमे से कौन सा रूप सर्वश्रेष्ठ है, यह हमे बताइयें। हे महात्मा, मुनियो, तुमने संसार के कल्याण के लिए यह सर्व शुभ काम करने वाला बडां प्रश्न किया है, जो तुमने यह संसार के हित के लिए प्रश्न किया है, अतएव मै तुम्हारे लिए सब जगत् पालक परम पूज्य भगवान विष्णु के महाअद्भुत रूप का वर्णन करूगां। हे तपस्वियो, उस परमात्मा के अनन्त रूप है, उनमे जो अनन्तं श्रेष्ठ है, उस रूप को अदंर से सुनो। उस दिव्य रूप के स्मरणमात्र से महापातकी मनुष्य भी पाप से छुट जाते है, इसमे सशंय नही है। इस ही प्रश्न को संसार के कल्याण के लिए क्षीरसमुद्रं में लक्ष्मी न् भगवान विष्णु से एक बार पूछा था ।
लक्ष्मी कहने लगी - हे जगन्नाथ। आपके महान् अनेक रूपो को भक्तमनुष्य भक्तियुक्त होकर पृथ्वी पर पूजते रहते है। हे प्रिय। क्या वे रूप सब समान ही हैं या उनमें गौण और मुख्य किसी प्रकार का भेद है। विष्णु भगवान बोले – हे प्रिय, जब मैं समस्त ब्रह्माण्ड को आत्मा में सहंत करके स्वानुभव रूप से योगमाया के स्थित होता हूँ, तब मैं एक ही बहुरूप धारण करू, इस प्रकार इच्छा करता हुआ अपनी माया के वश में हुआ। जीवों को कर्मभोग के लिए क्षणमात्र मे असंख्य ब्रह्मलोकादि लोकों को जिस रूप से रचता हूँ, हे देवी, उस रूप को मैं तुझसे कहता हूँ, तू ध्यान से सुन।
हे देवी, मैं यंहा अद्भुत सब ओर तेज से व्याप्त अनेक सूर्यो की चमक से अधिक चमकने वाले विश्वकर्मा रूप को धारण करता हूँ, और उनके अनन्तर मनुष्य सृष्टि करने की कामना करता हुआ सर्व प्रथम पुण्यात्मा तपस्वी ब्रह्म को रचता हूँ। उस ब्रह्मा की स्तुति यज्ञ और गान के प्रतिपादन करने वाले ऋग, यजुः और सम की अच्छी प्रकार उपदेश देता हूँ। इसी प्रकार शिल्प विद्या प्रतिपादक अतर्ववेद भी ब्रह्मा को प्रदान करता हूँ। यह वही वेद है जिससे शिल्पी लोगों ने शिल्प निकाल कर अनेक वस्तुओं की रचना की है। हे देवी, मेरे अनेक रूपों में यह विश्वकर्मा रूप मुख्य है। यही रूप है जिससे सारी सृष्टि क्षणमात्र में उत्पन्न होती है। इस विश्वकर्मा रूप परमात्मा के अद्भुत रूप का जो क्षणमात्र भी ध्यान करता है, उसके समस्त विध्न नष्ट हो जाते हैं। जो शिल्पी श्री विश्वकर्मा के प्रोज्जवल दिव्य रूप का ध्यान से चिंतन करता है, उसके समस्त दुःख विशीर्ण हो जाते हैं।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा माहात्म्य का पहला अध्याय समाप्त।
दूसरा अध्याय
सूत जी कहने लगे कि हे ऋषियों, इस प्रकार लक्ष्मी जी को अपने दिव्य रुप का वर्णन करके त्रिलोक्य पति भगवान विष्णु चुप हो गये। ऋषि लोग बोले-सर्व धर्म के जानने वाले, महाराज सूत जी, आपने यह दिव्य लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दिव्य संवाद कैसे जाना। यह भगवान विष्णु को दिव्य विश्वकर्मा रूप किस प्रकार संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ और कैसे संसार ने इस रूप को जाना। सूत जी बोले, हे मुनियो, सुनो – जिस प्रकार मनुष्यों को कामना का देने वाला, यह समाचार मेरे कर्णगोचर है। एक महर्षि अंगिरा नाम वाले हुए है, जिन्होनें हिमालय पर्वत के समीप गंगा तट पर बडां भारी तप किया था। बर्षा ऋतु में तो आवरण रहित स्थान में, शीतकाल में शीतल जल में ग्रीष्म काल में धूप में बैठकर वह अंगिरा मुनि तप करने लगे। तप करते करते भी उन ऋषि का मन सुखी नहीं था और इधर उधर इस प्रकार दौडता था कि जैसे मृग इधर उधर भागता है।
तभी उस समय अचानक आकाशवाणी हुई कि हे तपोधन, तू वृथा श्रम करता है, लक्ष्य से च्युस हुआ वाण कैसे अपने लक्ष्य को बेध सकता है, वही तेरी गति हो गई है और तू लोक में उपवास को प्राप्त हो रहा है। उत्पत्ति स्थिति सहांर का करने वाला सबको अभीष्ट का सिद्धकर्ता, महातेजस्वी विश्वकर्मा संसार में प्रसिद्ध है। उसका पञचमुख और दशबाहु वाला, महादिव्य रूप सरस्वती और लक्ष्मी से पूजित है। उसका तू दिन रात ध्यान कर। इस रुप का स्वंय हरि ने क्षीर समुद्र में उपदेश दिया है। आज भी उनके ध्यान से मेरे रोमांच खडे होते है।
अमावस्या के दिन सब कामों को छोडकर व्रत का आचरण कर और उसी दिन विधि पूर्वक विश्वकर्मा जी की पूजा कर। इस प्रकार आकाश को गूँजा देने वाली वाणी को सुनकर अंगिरा मुनि बडें विस्मय को प्राप्त हुआ और भगवान का ध्यान करने लगे। श्री विश्वकर्मा जी का ध्यान करते समय उनके चित्त में शिल्पज्ञान का धारक, अर्थ सहित अथर्ववेद प्रविष्ट हुआ। उन तत्वज्ञ अंगिरा मुनि ने विमान रचना आदि की अनेक शिल्प विद्याओं का रस अथर्ववेद के ज्ञा न से आविर्भाव किया। यह संसार श्रई विश्वकर्मा भगवान की कृपा से ही सुखी है, क्योकिं उनके बताये ज्ञान से ही आवश्यक यान
पहला अध्याय
एक समय अनेक ऋषिगण धर्मक्षेत्र में एकत्र हुए और वहां धर्म के तत्व जानने वाले सूत जी से ऋषि कहने लगें - हे पुराण के मर्मज्ञ, महात्मने, आप हमारे ऊपर अत्यंत कृपा करके हमारे इस अचानक उत्पन्न हुए सशंय का नाश किजीए। हमने सर्व व्यापक विष्णु के अनेक रूप सुने है, उनमे से कौन सा रूप सर्वश्रेष्ठ है, यह हमे बताइयें। हे महात्मा, मुनियो, तुमने संसार के कल्याण के लिए यह सर्व शुभ काम करने वाला बडां प्रश्न किया है, जो तुमने यह संसार के हित के लिए प्रश्न किया है, अतएव मै तुम्हारे लिए सब जगत् पालक परम पूज्य भगवान विष्णु के महाअद्भुत रूप का वर्णन करूगां। हे तपस्वियो, उस परमात्मा के अनन्त रूप है, उनमे जो अनन्तं श्रेष्ठ है, उस रूप को अदंर से सुनो। उस दिव्य रूप के स्मरणमात्र से महापातकी मनुष्य भी पाप से छुट जाते है, इसमे सशंय नही है। इस ही प्रश्न को संसार के कल्याण के लिए क्षीरसमुद्रं में लक्ष्मी न् भगवान विष्णु से एक बार पूछा था ।
लक्ष्मी कहने लगी - हे जगन्नाथ। आपके महान् अनेक रूपो को भक्तमनुष्य भक्तियुक्त होकर पृथ्वी पर पूजते रहते है। हे प्रिय। क्या वे रूप सब समान ही हैं या उनमें गौण और मुख्य किसी प्रकार का भेद है। विष्णु भगवान बोले – हे प्रिय, जब मैं समस्त ब्रह्माण्ड को आत्मा में सहंत करके स्वानुभव रूप से योगमाया के स्थित होता हूँ, तब मैं एक ही बहुरूप धारण करू, इस प्रकार इच्छा करता हुआ अपनी माया के वश में हुआ। जीवों को कर्मभोग के लिए क्षणमात्र मे असंख्य ब्रह्मलोकादि लोकों को जिस रूप से रचता हूँ, हे देवी, उस रूप को मैं तुझसे कहता हूँ, तू ध्यान से सुन।
हे देवी, मैं यंहा अद्भुत सब ओर तेज से व्याप्त अनेक सूर्यो की चमक से अधिक चमकने वाले विश्वकर्मा रूप को धारण करता हूँ, और उनके अनन्तर मनुष्य सृष्टि करने की कामना करता हुआ सर्व प्रथम पुण्यात्मा तपस्वी ब्रह्म को रचता हूँ। उस ब्रह्मा की स्तुति यज्ञ और गान के प्रतिपादन करने वाले ऋग, यजुः और सम की अच्छी प्रकार उपदेश देता हूँ। इसी प्रकार शिल्प विद्या प्रतिपादक अतर्ववेद भी ब्रह्मा को प्रदान करता हूँ। यह वही वेद है जिससे शिल्पी लोगों ने शिल्प निकाल कर अनेक वस्तुओं की रचना की है। हे देवी, मेरे अनेक रूपों में यह विश्वकर्मा रूप मुख्य है। यही रूप है जिससे सारी सृष्टि क्षणमात्र में उत्पन्न होती है। इस विश्वकर्मा रूप परमात्मा के अद्भुत रूप का जो क्षणमात्र भी ध्यान करता है, उसके समस्त विध्न नष्ट हो जाते हैं। जो शिल्पी श्री विश्वकर्मा के प्रोज्जवल दिव्य रूप का ध्यान से चिंतन करता है, उसके समस्त दुःख विशीर्ण हो जाते हैं।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा माहात्म्य का पहला अध्याय समाप्त।
दूसरा अध्याय
सूत जी कहने लगे कि हे ऋषियों, इस प्रकार लक्ष्मी जी को अपने दिव्य रुप का वर्णन करके त्रिलोक्य पति भगवान विष्णु चुप हो गये। ऋषि लोग बोले-सर्व धर्म के जानने वाले, महाराज सूत जी, आपने यह दिव्य लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दिव्य संवाद कैसे जाना। यह भगवान विष्णु को दिव्य विश्वकर्मा रूप किस प्रकार संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ और कैसे संसार ने इस रूप को जाना। सूत जी बोले, हे मुनियो, सुनो – जिस प्रकार मनुष्यों को कामना का देने वाला, यह समाचार मेरे कर्णगोचर है। एक महर्षि अंगिरा नाम वाले हुए है, जिन्होनें हिमालय पर्वत के समीप गंगा तट पर बडां भारी तप किया था। बर्षा ऋतु में तो आवरण रहित स्थान में, शीतकाल में शीतल जल में ग्रीष्म काल में धूप में बैठकर वह अंगिरा मुनि तप करने लगे। तप करते करते भी उन ऋषि का मन सुखी नहीं था और इधर उधर इस प्रकार दौडता था कि जैसे मृग इधर उधर भागता है।
तभी उस समय अचानक आकाशवाणी हुई कि हे तपोधन, तू वृथा श्रम करता है, लक्ष्य से च्युस हुआ वाण कैसे अपने लक्ष्य को बेध सकता है, वही तेरी गति हो गई है और तू लोक में उपवास को प्राप्त हो रहा है। उत्पत्ति स्थिति सहांर का करने वाला सबको अभीष्ट का सिद्धकर्ता, महातेजस्वी विश्वकर्मा संसार में प्रसिद्ध है। उसका पञचमुख और दशबाहु वाला, महादिव्य रूप सरस्वती और लक्ष्मी से पूजित है। उसका तू दिन रात ध्यान कर। इस रुप का स्वंय हरि ने क्षीर समुद्र में उपदेश दिया है। आज भी उनके ध्यान से मेरे रोमांच खडे होते है।
अमावस्या के दिन सब कामों को छोडकर व्रत का आचरण कर और उसी दिन विधि पूर्वक विश्वकर्मा जी की पूजा कर। इस प्रकार आकाश को गूँजा देने वाली वाणी को सुनकर अंगिरा मुनि बडें विस्मय को प्राप्त हुआ और भगवान का ध्यान करने लगे। श्री विश्वकर्मा जी का ध्यान करते समय उनके चित्त में शिल्पज्ञान का धारक, अर्थ सहित अथर्ववेद प्रविष्ट हुआ। उन तत्वज्ञ अंगिरा मुनि ने विमान रचना आदि की अनेक शिल्प विद्याओं का रस अथर्ववेद के ज्ञा न से आविर्भाव किया। यह संसार श्रई विश्वकर्मा भगवान की कृपा से ही सुखी है, क्योकिं उनके बताये ज्ञान से ही आवश्यक यान
ादि जगत् बनाता है। तभी से श्री विश्वकर्मा जी का महारूप संसार में प्रसिद्ध हुआ है। परम्परा से आये हुए इस कथानक ने मेरे कानों को भी पवित्र किया है। हे ऋषियों, इस परम रहस्य को जो मनुष्य श्रवण करेंगे, उनकें लिए श्रवणमात्र से ही ज्ञान प्राप्ति हो जायेगी। यह महाज्योतिः रूप है जो संसार का उपकारक है, वह मनुष्य कृतघ्न और पापी है जो इस रूप का ध्यान नही करता है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का दूसरा अध्याय समाप्त।
तीसरा अध्याय
हे महाराज - आपसे कहे हुए श्री विश्वकर्मा के चरित्र को श्रवण करते हुए हमारे चित्त की तृप्ति नहीं होती है, जैसे अमृत के पान करने से देवताओं की तृप्ति नहीं होती है। अब भी श्री विश्वकर्मा जी के सच्चरित्र के श्रवण की इच्छा अस प्रकार बढती जा रही है जैसे हवा से बार बार अग्नि बढती है। सूत जी कहने लगे - है मुनि श्रेष्ठों, एकाग्र मन से तुम जगत्पूज्य, सच्चिदानन्दस्वरूप, श्री विश्वकर्मा जी का दिव्य आख्यान सुनों।
प्राचीन काल में एक प्रमंगद नाम का राजा हुआ, जो अपनी प्रजा को संतान से समान पालता था औऱ सब धर्म के कामों में बिल्कुल प्रमाद नही किया करता था। वह अपनी प्रजा का स्नेह से शासन करता था और कभी भी दण्ड से प्रजा का दमन नही करता था। दरिद्रता से आकांत हुए मनुष्य मेरा शासन मानेंगे, यह उसकी नीति नहीं थी, अतएव वह राजा सदा प्रजा की वृद्धि के ल्ए यत्न करता था, उसका राज्य कृतघ्न और दुष्टों के अभाव के कारण सुखी था। उस राजा की कमल के समान नेत्र वाली, साक्षात सती के समान सती, विदुषी, धर्म, कर्म, व्रत परायण कमला नाम भार्या थी। कभी दैवयोग से उस राजा के शरीर में दारूण कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया। बार-बार चिकित्सा किया हुआ भी वह रोग स्वरूप भी शांत न हुआ। उस रोग की पीडा से पीडित राजा बडा व्याकुल होने लगा।
ऋषि कहने लगे हे - सुदर्शन। सूत। यह पाप रोग धर्म से पृथ्वी पालन करने वाले महात्मा को कैसे हुआ। यदि इस प्रकार धर्मात्माओं को भी रोग उत्पन्न हो जाता है, तो फिर धर्म-कर्म में कोन विश्वास करेगा। सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों। उस राजा ने पूर्वजन्म में स्वार्थान्ध होकर यह उपदेश दिया था कि यह संसार अनादि हैं, इसका कर्त्ता कोई विश्वकर्मा नहीं है यह इस कारण लोंगों की वंचता करता फिरता था और नास्तिक मत का प्रचारक था । आप जानते हो यदि- कर्मो के फल का देने वाला विश्वकर्मा परमात्मा म हो तो उपकार का कर्ता उपकृत मनुष्य द्वारा मृत्यु के अनन्तर दिये आर्शीवादों से उत्पन्न पुण्य फल को कैसे प्राप्त कर सकता है । जब परोपकारी को अपने पुण्य का फल मिल ही न सकेगा तो क्यों कोई किसी का उपकार करेगा और जब कोई किसी का उपकार हीं नही करेगां तो संसार का उच्छेद (नाश) हो जाएगां। इसलिए नास्तिक पाखण्डी की दुर्दशा अवश्य होती है। अनेक जन्मों के पाप-पुण्य कर्म एक जन्म में ही उसका फल नहीं देतें है, अतः उस जन्म मे यह फल प्राप्त हुआ इसमें कोई आश्चर्य नही है। अब मैं तुमसे आगे की कथा कहता हूँ ध्यान से सुनों।
कभी उस राजा को अधिक व्याकुल दोखकर, उसके दुःख से दुःखी हुई पतिव्रता बेचारी रानी बोली - हे राजन्, बडा तेजस्वी हमारा कुल पुरोहित अचानक अक्षि रोग से व्याप्त हुआ और बिल्कुल अन्धा हो गया। उसे उपमन्यु पुरोहित ने अपने अतीन्द्रिय ज्ञान से देखा तो यही प्रतीत हुआ कि उसे अमावस्या को व्रत कर और श्री विश्वकर्मा जी का पूजन करना चाहिए। तब से ही उस पुरोहित ने सब कामों को छोडकर विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के दिन ब्रह्मचारी रहता और फलहार (या एक बार अन्नाहार) करता तथा धर्म चर्चा में लीन रहा करता था। उस व्रत प्रभाव के कारण पुरोहित को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई और बुढापें मे भी उसको देखने की दृष्टि नष्ट नहीं हुई। हे महाराज, मैं दीनता के साथ प्रार्थना करती हूँ कि आप भी दीनपालक श्री विश्वकर्मा की शऱण में जाइए जिससे इस दुःख से छुटकारा मिले।
राजा बोले – हे प्रिये, तुमने ठीक कहाँ है, इसको सुनकर मेरा चित्त बडां प्रफुल्लित हो रहा है और मुझे निश्चय सा हो रहा है कि भगवान श्री विश्वकर्मा के व्रत से रोग की अवश्य निवृत्ति होगी क्योकिं किसी भी कार्य की सिद्धि को चित्तोत्साह प्रथम ही कह दिया करता है। सूत जी कहने लगे कि उस दिन से लेकर वह राजा प्रतिदिन श्री विश्वकर्मा जी का पूजन और बदंन करके भोजन करने लगा। अमावस्या के दिन सब कामों को छोडकर व्रत विश्वकर्मा जी का पुजन और व्रत कराना चाहिए।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का तीसरा अध्याय समाप्त।
चौथा अध्याय
सूतजी कहने लगे – हे मुनियों, मैने तुमको श्री विश्वकर्मा जी के अद्भुत चरितामृत का पान कराया है। अब आगे जगत को विस्मय करने वाले चरित का वर्णन करता हूँ। जगत् में धर्म के व्यवहार से चलने वाले, सतोंषी कोई स्थकार और उसकी पत्नी वाराणसी पुरी में रहतें थे। अपने कर्म में कुशल, बुद्धिमान वह स्थकार बडां व्याकुल हुआ। अपने प
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का दूसरा अध्याय समाप्त।
तीसरा अध्याय
हे महाराज - आपसे कहे हुए श्री विश्वकर्मा के चरित्र को श्रवण करते हुए हमारे चित्त की तृप्ति नहीं होती है, जैसे अमृत के पान करने से देवताओं की तृप्ति नहीं होती है। अब भी श्री विश्वकर्मा जी के सच्चरित्र के श्रवण की इच्छा अस प्रकार बढती जा रही है जैसे हवा से बार बार अग्नि बढती है। सूत जी कहने लगे - है मुनि श्रेष्ठों, एकाग्र मन से तुम जगत्पूज्य, सच्चिदानन्दस्वरूप, श्री विश्वकर्मा जी का दिव्य आख्यान सुनों।
प्राचीन काल में एक प्रमंगद नाम का राजा हुआ, जो अपनी प्रजा को संतान से समान पालता था औऱ सब धर्म के कामों में बिल्कुल प्रमाद नही किया करता था। वह अपनी प्रजा का स्नेह से शासन करता था और कभी भी दण्ड से प्रजा का दमन नही करता था। दरिद्रता से आकांत हुए मनुष्य मेरा शासन मानेंगे, यह उसकी नीति नहीं थी, अतएव वह राजा सदा प्रजा की वृद्धि के ल्ए यत्न करता था, उसका राज्य कृतघ्न और दुष्टों के अभाव के कारण सुखी था। उस राजा की कमल के समान नेत्र वाली, साक्षात सती के समान सती, विदुषी, धर्म, कर्म, व्रत परायण कमला नाम भार्या थी। कभी दैवयोग से उस राजा के शरीर में दारूण कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया। बार-बार चिकित्सा किया हुआ भी वह रोग स्वरूप भी शांत न हुआ। उस रोग की पीडा से पीडित राजा बडा व्याकुल होने लगा।
ऋषि कहने लगे हे - सुदर्शन। सूत। यह पाप रोग धर्म से पृथ्वी पालन करने वाले महात्मा को कैसे हुआ। यदि इस प्रकार धर्मात्माओं को भी रोग उत्पन्न हो जाता है, तो फिर धर्म-कर्म में कोन विश्वास करेगा। सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों। उस राजा ने पूर्वजन्म में स्वार्थान्ध होकर यह उपदेश दिया था कि यह संसार अनादि हैं, इसका कर्त्ता कोई विश्वकर्मा नहीं है यह इस कारण लोंगों की वंचता करता फिरता था और नास्तिक मत का प्रचारक था । आप जानते हो यदि- कर्मो के फल का देने वाला विश्वकर्मा परमात्मा म हो तो उपकार का कर्ता उपकृत मनुष्य द्वारा मृत्यु के अनन्तर दिये आर्शीवादों से उत्पन्न पुण्य फल को कैसे प्राप्त कर सकता है । जब परोपकारी को अपने पुण्य का फल मिल ही न सकेगा तो क्यों कोई किसी का उपकार करेगा और जब कोई किसी का उपकार हीं नही करेगां तो संसार का उच्छेद (नाश) हो जाएगां। इसलिए नास्तिक पाखण्डी की दुर्दशा अवश्य होती है। अनेक जन्मों के पाप-पुण्य कर्म एक जन्म में ही उसका फल नहीं देतें है, अतः उस जन्म मे यह फल प्राप्त हुआ इसमें कोई आश्चर्य नही है। अब मैं तुमसे आगे की कथा कहता हूँ ध्यान से सुनों।
कभी उस राजा को अधिक व्याकुल दोखकर, उसके दुःख से दुःखी हुई पतिव्रता बेचारी रानी बोली - हे राजन्, बडा तेजस्वी हमारा कुल पुरोहित अचानक अक्षि रोग से व्याप्त हुआ और बिल्कुल अन्धा हो गया। उसे उपमन्यु पुरोहित ने अपने अतीन्द्रिय ज्ञान से देखा तो यही प्रतीत हुआ कि उसे अमावस्या को व्रत कर और श्री विश्वकर्मा जी का पूजन करना चाहिए। तब से ही उस पुरोहित ने सब कामों को छोडकर विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के दिन ब्रह्मचारी रहता और फलहार (या एक बार अन्नाहार) करता तथा धर्म चर्चा में लीन रहा करता था। उस व्रत प्रभाव के कारण पुरोहित को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई और बुढापें मे भी उसको देखने की दृष्टि नष्ट नहीं हुई। हे महाराज, मैं दीनता के साथ प्रार्थना करती हूँ कि आप भी दीनपालक श्री विश्वकर्मा की शऱण में जाइए जिससे इस दुःख से छुटकारा मिले।
राजा बोले – हे प्रिये, तुमने ठीक कहाँ है, इसको सुनकर मेरा चित्त बडां प्रफुल्लित हो रहा है और मुझे निश्चय सा हो रहा है कि भगवान श्री विश्वकर्मा के व्रत से रोग की अवश्य निवृत्ति होगी क्योकिं किसी भी कार्य की सिद्धि को चित्तोत्साह प्रथम ही कह दिया करता है। सूत जी कहने लगे कि उस दिन से लेकर वह राजा प्रतिदिन श्री विश्वकर्मा जी का पूजन और बदंन करके भोजन करने लगा। अमावस्या के दिन सब कामों को छोडकर व्रत विश्वकर्मा जी का पुजन और व्रत कराना चाहिए।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का तीसरा अध्याय समाप्त।
चौथा अध्याय
सूतजी कहने लगे – हे मुनियों, मैने तुमको श्री विश्वकर्मा जी के अद्भुत चरितामृत का पान कराया है। अब आगे जगत को विस्मय करने वाले चरित का वर्णन करता हूँ। जगत् में धर्म के व्यवहार से चलने वाले, सतोंषी कोई स्थकार और उसकी पत्नी वाराणसी पुरी में रहतें थे। अपने कर्म में कुशल, बुद्धिमान वह स्थकार बडां व्याकुल हुआ। अपने प
बढाने वाला चिरंजीवी पुत्र होगा। देवों के देवेश भगवान् विश्वकर्मा का पूजन करों, उनके प्रसन्न होने पर अवश्य पल सिद्धि होगी, उनकी पूजा के आगे अन्य देवों की पूजा से क्या? तब राजा ने धर्म से दृढ होकर अपनी पत्नी सहित भगवान् विश्वकर्मा का पूजन किया। वस्त्र आभूषणों से ब्रह्मणों को सनतुष्टं किया। तब भगवान् विश्वकर्मा के प्रसन्न होने पर उसकी स्त्री ने गर्भ धारण किया और दसवें महीनें में सुन्दर से पुत्र को जन्म दिया। तबी से वह विश्वकर्मा का महीने-महीने मे पूजन करने लगा अन्त मे वैकुण्ठ को गया। मृतवत्सा को शक्ति के लिए चित का भ्रम होने पर विश्वकर्मा प्रभु का अर्चन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की इच्छायें पूर्ण होती है दरिद्रता का नाश बाल पीडा और दुःस्वप्न का भय नहीं होता।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का सातवां अध्याय समाप्त।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का सातवां अध्याय समाप्त।
अपना ग्रास बना लेते है। इस प्रकार यज्ञों को नष्ट करतें हुए वह राक्षस लोग नर मासँ भक्षक करते है। मातंग मुनि कहने लगे कि हमारे पुज्य पुरोहित उपमन्यु जो ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रह कर और कन्द मूल खाकर सदा धर्म कार्यों में सलग्नं रहते है, तथा जो प्रतिदीन सारे कामों को छोडं परमात्मा का ध्यान करते रहते है, तथा वह भी राक्षसों को नष्ट करने में समर्थ हो सकते है। (इसलिए अब हमे उनके कुकृत्यों से बचने का कोई उपाय अवश्य करना चाहिए।)
सूत जी बोले - हे ऋषयों, इस प्रकार ऋषइ मुनियों के वचन सुनकर वरिष्ठ मुनि जी कहने लगे कि एक बार पहले भी ऋषि मुनियों पर इस प्रकार का कष्ट आ पडां था। उस समय वह सब मिलकर स्वर्ग में ब्रह्मा जी के पास गये। चतुर्भज ब्रह्मा ने पद्मासन लगाये हुए शान्त भाव से ध्यानवस्थित मे उन्होने ऋषि मुनियों को देखा जो दुख से छुटकार देने वाले शिव रूप भगवान का ध्यान कर रहे थे। उन प्रभु जो सब का पिता है यह सब बात आदि से अन्त तक जान ली और ऋषि मुनियों को दुःख से छुटकारा पाने के लिए विश्वकर्मा भगवान की कथा का उपदेश दिया।
सूत जी बोले - हे ऋषियों, इस प्रकार उनके वचन सुलकर विश्वामित्र मुनि को बडा आश्चर्य हुआ और वह जरा निकट आ गए। तब ब्रह्मा के बताये हुए और पक्के सुख के उपाय को सुनकर विश्वामित्र मुनि मन को प्रसन्न करने वाले वचन कहने लगे। विश्वकर्मा मुनि बोले कि मुनि लोगो। आप लोग वरिष्ठ जी के कथन को सुनो। वस्तुतः यह बात निश्चित ही है कि ब्रह्मा ही सब दुखों का उपाय है, इसलिए हमें इसके लिए कुछ अधिक सोच विचार की आवश्यकता नही। सारे पापों को दूर करन् वाला और दुःखो को हटाने वाला एक ही ब्रह्मा है।
सूत जी बोले - ऋषि लोंगों ने ध्यानपूर्वक सुना और गद्गद वाणी से कहने लगे कि विश्वकर्मा मुनि ने ठीक ही कहा है कि ब्रह्मा की ही शरण जाना उपसुक्त है। ऐसा सुन सब ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया वह राक्षसों से हुई अपनी दुर्दशा ब्रह्मा को सुना सकें। मुनियों के इस प्रकार कष्ट को सुनकर ब्रह्मा जी को बडां आश्चर्य हुआ, उसी समय ब्रह्मा तेज से प्रकाशित अपनी आखों को मूंदकर विचारमग्न हुए। इस प्रकार राक्षसों द्वारा की गई सारी दुर्दशा को समझ ब्रह्मा जी जो बडे तेजस्वी थे मन को आनन्द देने वाले वचन कहने लगे। ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे मुनियों। राक्षसों से तो स्वर्ग मे रहनें वाले देवता को भी भय लगता रहता है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या जो बुढापे और मृत्यु के दुखों में लिप्त रहतें हैं। सुनों । उन राक्षसों को नष्ट करन् में महातेजस्वी विश्वकर्मा ही है जो सब प्रकार के बलों से युक्त और सारे विश्व में प्रसिद्ध है। उसी की पूजा से तुम लोग राक्षसों को नष्ट करने मे समर्थ हो सकते हो । इस वास्ते उसी दयालु विश्वकर्मा की शरण में जाओ। देवताओं को हवि के पहुचानें वाला अग्नि नामक देवता संसार में प्रसिद्ध है उसी का पुत्र यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित होता हैं। अगिरा उसका नाम है और सब मुनियों में श्रेष्ठ है। वही आपकों दुखों से पार कर देगा इसमें कोई सदेंह नही है। इसलिए हे मुनियों। आप उन्हीं मुनि श्रेष्ठ के चरण कमलों को छुआ और उन्ही से अपने को कष्टों से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करो।
सूत जी बोलें कि ब्रह्मा जी के कथन के अनुसार ऋषियों नें सब यज्ञ अनुष्ठान आदि किए और अंगिरा ऋषि के वचनों को सुनने के लिए उत्सुक हुए। अगिंरा ऋषि कहनें लगे कि हे मुनियों। तुम लोग क्यों इधर-उधर मारे-मारे फिरते हो? दुखों को काटने मे विश्वकर्मा के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नही, इसलिए तुम्हें चाहिए कि जितेन्द्रियं रहते हुए अमावस्या के दिन अपने साधारण कर्मों को रोक कर भक्ति पूर्वक विश्वकर्मा की कथा सुनों । जिसके सुनने मात्र से जन्म जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते है। मुनि लोग ब्रह्माचर्य व्रत में स्थित हो विश्वकर्मा देव की पूजा द्वारा ध्यान करते हुए सब प्रकार के सुखों को प्राप्त करतें हैं। सूत जी कहने लगे कि मुनि लोग इस प्रकार महर्षि अगिंरा के वचनों को सुनकर अपने-अपने आश्रामों को चले गये और यज्ञ में विश्वकर्मा देव का पूजन किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उसकी पूजा से सारे राक्षस भस्म हो गए। यज्ञ विघ्नों से रहित हो गए तथा नाना प्रकार के सुखों से सम्पन्न हो गए। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक विश्वकर्मा को चिन्तन करता है वह सुखों को प्राप्त करता हुआ संसार में बडें पद को प्राप्त करता है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का पांचवां अध्याय समाप्त।
छटावां अध्याय
सूत जी बोले - हे मुनियों, मैं आपसे सब लोकों में विख्यात श्री विश्वकर्मा का माहात्म्य फिर कहता हूँ तुम ध्यान से सुनों। उज्जैन नगरी में एक सर्वश्रेष्ठ धर्म तत्पर, उदार, धनंजय नामक सेठ था। उस सेठ का कोष (खजाना) लाल मोती हीरे जवाहरातों से ऐसा भरा था जैसा कुबेर का भण्डार भरा हो। विवाह, व्यवहार, अभियोग रोग संकट में प्रत्येक मनुष्य उसके धन का उपयोग किया क
सूत जी बोले - हे ऋषयों, इस प्रकार ऋषइ मुनियों के वचन सुनकर वरिष्ठ मुनि जी कहने लगे कि एक बार पहले भी ऋषि मुनियों पर इस प्रकार का कष्ट आ पडां था। उस समय वह सब मिलकर स्वर्ग में ब्रह्मा जी के पास गये। चतुर्भज ब्रह्मा ने पद्मासन लगाये हुए शान्त भाव से ध्यानवस्थित मे उन्होने ऋषि मुनियों को देखा जो दुख से छुटकार देने वाले शिव रूप भगवान का ध्यान कर रहे थे। उन प्रभु जो सब का पिता है यह सब बात आदि से अन्त तक जान ली और ऋषि मुनियों को दुःख से छुटकारा पाने के लिए विश्वकर्मा भगवान की कथा का उपदेश दिया।
सूत जी बोले - हे ऋषियों, इस प्रकार उनके वचन सुलकर विश्वामित्र मुनि को बडा आश्चर्य हुआ और वह जरा निकट आ गए। तब ब्रह्मा के बताये हुए और पक्के सुख के उपाय को सुनकर विश्वामित्र मुनि मन को प्रसन्न करने वाले वचन कहने लगे। विश्वकर्मा मुनि बोले कि मुनि लोगो। आप लोग वरिष्ठ जी के कथन को सुनो। वस्तुतः यह बात निश्चित ही है कि ब्रह्मा ही सब दुखों का उपाय है, इसलिए हमें इसके लिए कुछ अधिक सोच विचार की आवश्यकता नही। सारे पापों को दूर करन् वाला और दुःखो को हटाने वाला एक ही ब्रह्मा है।
सूत जी बोले - ऋषि लोंगों ने ध्यानपूर्वक सुना और गद्गद वाणी से कहने लगे कि विश्वकर्मा मुनि ने ठीक ही कहा है कि ब्रह्मा की ही शरण जाना उपसुक्त है। ऐसा सुन सब ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया वह राक्षसों से हुई अपनी दुर्दशा ब्रह्मा को सुना सकें। मुनियों के इस प्रकार कष्ट को सुनकर ब्रह्मा जी को बडां आश्चर्य हुआ, उसी समय ब्रह्मा तेज से प्रकाशित अपनी आखों को मूंदकर विचारमग्न हुए। इस प्रकार राक्षसों द्वारा की गई सारी दुर्दशा को समझ ब्रह्मा जी जो बडे तेजस्वी थे मन को आनन्द देने वाले वचन कहने लगे। ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे मुनियों। राक्षसों से तो स्वर्ग मे रहनें वाले देवता को भी भय लगता रहता है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या जो बुढापे और मृत्यु के दुखों में लिप्त रहतें हैं। सुनों । उन राक्षसों को नष्ट करन् में महातेजस्वी विश्वकर्मा ही है जो सब प्रकार के बलों से युक्त और सारे विश्व में प्रसिद्ध है। उसी की पूजा से तुम लोग राक्षसों को नष्ट करने मे समर्थ हो सकते हो । इस वास्ते उसी दयालु विश्वकर्मा की शरण में जाओ। देवताओं को हवि के पहुचानें वाला अग्नि नामक देवता संसार में प्रसिद्ध है उसी का पुत्र यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित होता हैं। अगिरा उसका नाम है और सब मुनियों में श्रेष्ठ है। वही आपकों दुखों से पार कर देगा इसमें कोई सदेंह नही है। इसलिए हे मुनियों। आप उन्हीं मुनि श्रेष्ठ के चरण कमलों को छुआ और उन्ही से अपने को कष्टों से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करो।
सूत जी बोलें कि ब्रह्मा जी के कथन के अनुसार ऋषियों नें सब यज्ञ अनुष्ठान आदि किए और अंगिरा ऋषि के वचनों को सुनने के लिए उत्सुक हुए। अगिंरा ऋषि कहनें लगे कि हे मुनियों। तुम लोग क्यों इधर-उधर मारे-मारे फिरते हो? दुखों को काटने मे विश्वकर्मा के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नही, इसलिए तुम्हें चाहिए कि जितेन्द्रियं रहते हुए अमावस्या के दिन अपने साधारण कर्मों को रोक कर भक्ति पूर्वक विश्वकर्मा की कथा सुनों । जिसके सुनने मात्र से जन्म जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते है। मुनि लोग ब्रह्माचर्य व्रत में स्थित हो विश्वकर्मा देव की पूजा द्वारा ध्यान करते हुए सब प्रकार के सुखों को प्राप्त करतें हैं। सूत जी कहने लगे कि मुनि लोग इस प्रकार महर्षि अगिंरा के वचनों को सुनकर अपने-अपने आश्रामों को चले गये और यज्ञ में विश्वकर्मा देव का पूजन किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उसकी पूजा से सारे राक्षस भस्म हो गए। यज्ञ विघ्नों से रहित हो गए तथा नाना प्रकार के सुखों से सम्पन्न हो गए। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक विश्वकर्मा को चिन्तन करता है वह सुखों को प्राप्त करता हुआ संसार में बडें पद को प्राप्त करता है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का पांचवां अध्याय समाप्त।
छटावां अध्याय
सूत जी बोले - हे मुनियों, मैं आपसे सब लोकों में विख्यात श्री विश्वकर्मा का माहात्म्य फिर कहता हूँ तुम ध्यान से सुनों। उज्जैन नगरी में एक सर्वश्रेष्ठ धर्म तत्पर, उदार, धनंजय नामक सेठ था। उस सेठ का कोष (खजाना) लाल मोती हीरे जवाहरातों से ऐसा भरा था जैसा कुबेर का भण्डार भरा हो। विवाह, व्यवहार, अभियोग रोग संकट में प्रत्येक मनुष्य उसके धन का उपयोग किया क
र्याप्त निर्वाह के योग्य वृत्ति की खोज में दिन रात लगा रहता था। इस प्रकार लालच में पडा और सतत प्रयत्न करने के बाद भी कठिनाई से भोजन और आच्छादन ही प्राप्त कर सकता था।
उस स्थकार की स्त्री पुत्र न होने के कारण नित्य सोच करती रहती थी, कि मालूम नहीं बुढापे मे कैसे निर्वाह होगा। इस प्रकार चिंतातुर वह स्त्री की इच्छा से मन्दिरों में महन्तों के पास व्याकुल होकर मन्त्र तन्त्रादि से पुत्र के अर्थ घूमने लगीं। दाढी मूंछ जिनके मुख पर बढ रही है, ऐसे ऐसे आडम्बरी म्लेच्छों (फक्कडों) के निकट भी वह दिन रात दौडती फिरती थी, परन्तु उसकी कामना कहीं भी सिद्ध नही होती थी। काश, कुश, यमुना की बालू में जल के भ्रम से दौडती मृगी की तरह उसकी दशा हो रही थी।
कोई कोई ठग मयूरपिच्छों की बनी हुई मोरछल के झाडे से उसको बहकाता था और कौई भोजप्रत्र पर जंतर लिख कर उसको भुलावा देता था। कोई कोई धूर्त उसको कहता था कि मेरी देह में अमुक देवता आता है, वह प्रसन्न हो तेरे लिऐ वर प्रदान करेगा। यह कहकर श्वेत भस्म देकर घर भेज देता था। इस प्रकार शोच्य दशा को प्राप्त हुए नें दोंनो स्त्री पुरूष बडें दुःखी थे। उनको दुःखी देखकर एक पडोंसी ब्राह्मण बोला - हे रथकार, तू क्यों इधर उधर भटकता फिरता है, मेरी बुद्धि में तू सब तरह से मूर्ख प्रतीत होता है। तू वृथा ही शिखा और यज्ञोपवीत को धारण करता है, और तेरी भार्या भी बिल्कुल मूर्ख है। इसमें कोई सदेंह नहीं। इन मिथ्या उपायों से सतांन उत्पन्न नहीं हुआ करती है और न धन मिलता है, और न कुछ भी सुख प्राप्त होता है। यह तो व्यर्थ की भाग दौड है। वे मनुष्य अज्ञानी है, जो इस प्रकार के व्यर्थ उद्योगों से अपने मनोरथ सिद्ध करना चाहतें है। कहीं व्यर्थ उद्योग करने पर भी मनोगथ सिद्ध हुए है।
इन मनुष्यों से अधिक वे मूर्ख है, जो म्लेच्छों की फूकं की अग्नि ज्वाला से अपनी संतान का जीवन होना समझते है। म्लेच्छों की फूकं से दग्ध हुए कुमाता के पुत्रों की फिर धर्मशास्त्र के अमुकूल उत्तम बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती है। इसलिए तू सब वृथा के उपायों कों छोड दे और केवल दयालु श्री विश्वकर्मा की शरण को प्राप्त हो। हे श्रेष्ठ पुरूष, विश्वकर्मा की कृपा से तेरी अवश्य सिद्धी होगी। समस्त दुःखों कें नाश करने में श्री विश्वकर्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भी समर्थ नहीं है।
कर्मों के फलदान देने में वह विश्वकर्मा परमेश्वर स्वतन्त्र है और आगे पीछे करके कर्मो के फल देते रहते है। यदि तेरी यह दुर्दशा अपने बुरे कर्मो के फल से हो रही है तो, वह विश्वकर्मा रूप ईश्वर अन्य योनियों में भी फल दे सकता है, क्योकिं वह सर्व शक्तिमान है। ईश्वर कर्मो के फलस्वरूप सुख दुःख देता है और इस सुख और दुःख के साधन उसके पास बहुत है। उसके पाप केवल दुःख देने के लिए निर्धन या निस्संतान बना देता ही साधन है। इसलिए तू सब कामों को छोंडकर अमावस्या को व्रत कर और जितेन्द्रिय रह कर भक्ति से विश्वकर्मा भगवान का श्रवण किया कर। जितना हो सके उतना दान, अध्ययन परोपकार के कार्य आदि करता रह। इस प्रकार ब्राह्मण के वचनों को सुन कर उस स्थकार के लोचन खुल गए। उस परोपकारी ब्राह्मण के चरणों को देर तक स्पर्श करके वह रथकर श्री विश्वकर्मा जी का ध्यान करता हुआ अपने घर को चला गया।
उस दिन से लेकर वह धर्मात्मा, रथकार श्री विश्वकर्मा जी के चरण कमलों की शक्ति मे लीन रहने लगा। उस रथकार की उत्तम स्त्री भी सब मिथ्या उपायों को छोडकर श्री विश्वकर्मा के उत्तम गुणों में भक्ति करने लगी। अमावस्या के दिन इस दिव्य व्रत के प्रमाण से वह दम्पत्ती धन और पुत्रों से युक्त हुई। उस रथकार का एक दिन भी बिना वृत्ति के नहीं जाता था। उसका पुत्र बडां सुशील गुणवान विद्वान और अपने माता-पिता की सुश्रूषा करने वाला हुआ। इस प्रकार सब देंवो से अतिशायी श्री विश्वकर्मा के प्रभाव से यह गृहस्थ सुख भोगने लगा। इसी प्रकार जो मनुष्य भक्तियुक्त चित से श्री विश्वकर्मा का ध्यान करते हैं वे इस लोक में पुत्र पौत्रादि से युक्त होकर सुखी होते है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का चौथा अध्याय समाप्त।
पांचवां अध्याय
ऋषियों नें कहा - हे सूत जी, विश्वकर्मा भगवान के जिन चरणों की पूजा देवता भी करतें है, आनन्दमयी चरित्र को थोडे से शब्दों मे सुनकर हमारी इच्छा और भी बढ गई। जिस प्रकार हवि से अग्नि प्रचण्ड होती जाती है, ठीक इसी प्रकार ज्यों ज्यों हम विश्वकर्मा भगवान का चरित्र सुनते हैं त्यों त्यों उसके सुनने की इच्छा और भी बढती जाती हैं।
सूत जी बोले - हे मुनि लोगों, आप लोग ने विश्वकर्मा के चरित्र को सुना, जिसके सुनने से देवता भी नहीं अघाये। एक बार नैमिषारण्य में मुनि और सन्यासी लोग एकत्र हुए और अपने अमीष्ट की प्राप्ति के लिए एक सभा की। विश्वमित्र कहने लगे कि हमे लोगों के आश्रमों में दुष्ट कर्मों के करते हुए राक्षस लोग यज्ञ करने वाले मुनियों के आस पास ही बडे बडें मनुष्य को
उस स्थकार की स्त्री पुत्र न होने के कारण नित्य सोच करती रहती थी, कि मालूम नहीं बुढापे मे कैसे निर्वाह होगा। इस प्रकार चिंतातुर वह स्त्री की इच्छा से मन्दिरों में महन्तों के पास व्याकुल होकर मन्त्र तन्त्रादि से पुत्र के अर्थ घूमने लगीं। दाढी मूंछ जिनके मुख पर बढ रही है, ऐसे ऐसे आडम्बरी म्लेच्छों (फक्कडों) के निकट भी वह दिन रात दौडती फिरती थी, परन्तु उसकी कामना कहीं भी सिद्ध नही होती थी। काश, कुश, यमुना की बालू में जल के भ्रम से दौडती मृगी की तरह उसकी दशा हो रही थी।
कोई कोई ठग मयूरपिच्छों की बनी हुई मोरछल के झाडे से उसको बहकाता था और कौई भोजप्रत्र पर जंतर लिख कर उसको भुलावा देता था। कोई कोई धूर्त उसको कहता था कि मेरी देह में अमुक देवता आता है, वह प्रसन्न हो तेरे लिऐ वर प्रदान करेगा। यह कहकर श्वेत भस्म देकर घर भेज देता था। इस प्रकार शोच्य दशा को प्राप्त हुए नें दोंनो स्त्री पुरूष बडें दुःखी थे। उनको दुःखी देखकर एक पडोंसी ब्राह्मण बोला - हे रथकार, तू क्यों इधर उधर भटकता फिरता है, मेरी बुद्धि में तू सब तरह से मूर्ख प्रतीत होता है। तू वृथा ही शिखा और यज्ञोपवीत को धारण करता है, और तेरी भार्या भी बिल्कुल मूर्ख है। इसमें कोई सदेंह नहीं। इन मिथ्या उपायों से सतांन उत्पन्न नहीं हुआ करती है और न धन मिलता है, और न कुछ भी सुख प्राप्त होता है। यह तो व्यर्थ की भाग दौड है। वे मनुष्य अज्ञानी है, जो इस प्रकार के व्यर्थ उद्योगों से अपने मनोरथ सिद्ध करना चाहतें है। कहीं व्यर्थ उद्योग करने पर भी मनोगथ सिद्ध हुए है।
इन मनुष्यों से अधिक वे मूर्ख है, जो म्लेच्छों की फूकं की अग्नि ज्वाला से अपनी संतान का जीवन होना समझते है। म्लेच्छों की फूकं से दग्ध हुए कुमाता के पुत्रों की फिर धर्मशास्त्र के अमुकूल उत्तम बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती है। इसलिए तू सब वृथा के उपायों कों छोड दे और केवल दयालु श्री विश्वकर्मा की शरण को प्राप्त हो। हे श्रेष्ठ पुरूष, विश्वकर्मा की कृपा से तेरी अवश्य सिद्धी होगी। समस्त दुःखों कें नाश करने में श्री विश्वकर्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भी समर्थ नहीं है।
कर्मों के फलदान देने में वह विश्वकर्मा परमेश्वर स्वतन्त्र है और आगे पीछे करके कर्मो के फल देते रहते है। यदि तेरी यह दुर्दशा अपने बुरे कर्मो के फल से हो रही है तो, वह विश्वकर्मा रूप ईश्वर अन्य योनियों में भी फल दे सकता है, क्योकिं वह सर्व शक्तिमान है। ईश्वर कर्मो के फलस्वरूप सुख दुःख देता है और इस सुख और दुःख के साधन उसके पास बहुत है। उसके पाप केवल दुःख देने के लिए निर्धन या निस्संतान बना देता ही साधन है। इसलिए तू सब कामों को छोंडकर अमावस्या को व्रत कर और जितेन्द्रिय रह कर भक्ति से विश्वकर्मा भगवान का श्रवण किया कर। जितना हो सके उतना दान, अध्ययन परोपकार के कार्य आदि करता रह। इस प्रकार ब्राह्मण के वचनों को सुन कर उस स्थकार के लोचन खुल गए। उस परोपकारी ब्राह्मण के चरणों को देर तक स्पर्श करके वह रथकर श्री विश्वकर्मा जी का ध्यान करता हुआ अपने घर को चला गया।
उस दिन से लेकर वह धर्मात्मा, रथकार श्री विश्वकर्मा जी के चरण कमलों की शक्ति मे लीन रहने लगा। उस रथकार की उत्तम स्त्री भी सब मिथ्या उपायों को छोडकर श्री विश्वकर्मा के उत्तम गुणों में भक्ति करने लगी। अमावस्या के दिन इस दिव्य व्रत के प्रमाण से वह दम्पत्ती धन और पुत्रों से युक्त हुई। उस रथकार का एक दिन भी बिना वृत्ति के नहीं जाता था। उसका पुत्र बडां सुशील गुणवान विद्वान और अपने माता-पिता की सुश्रूषा करने वाला हुआ। इस प्रकार सब देंवो से अतिशायी श्री विश्वकर्मा के प्रभाव से यह गृहस्थ सुख भोगने लगा। इसी प्रकार जो मनुष्य भक्तियुक्त चित से श्री विश्वकर्मा का ध्यान करते हैं वे इस लोक में पुत्र पौत्रादि से युक्त होकर सुखी होते है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का चौथा अध्याय समाप्त।
पांचवां अध्याय
ऋषियों नें कहा - हे सूत जी, विश्वकर्मा भगवान के जिन चरणों की पूजा देवता भी करतें है, आनन्दमयी चरित्र को थोडे से शब्दों मे सुनकर हमारी इच्छा और भी बढ गई। जिस प्रकार हवि से अग्नि प्रचण्ड होती जाती है, ठीक इसी प्रकार ज्यों ज्यों हम विश्वकर्मा भगवान का चरित्र सुनते हैं त्यों त्यों उसके सुनने की इच्छा और भी बढती जाती हैं।
सूत जी बोले - हे मुनि लोगों, आप लोग ने विश्वकर्मा के चरित्र को सुना, जिसके सुनने से देवता भी नहीं अघाये। एक बार नैमिषारण्य में मुनि और सन्यासी लोग एकत्र हुए और अपने अमीष्ट की प्राप्ति के लिए एक सभा की। विश्वमित्र कहने लगे कि हमे लोगों के आश्रमों में दुष्ट कर्मों के करते हुए राक्षस लोग यज्ञ करने वाले मुनियों के आस पास ही बडे बडें मनुष्य को
रता था। उपकार में लगें हुए इस सेठ का धन क्षीण हो गया और वह ऐसा दुख पाने लगा जैसा कीचड में फँसा हुआ हाथी दुःखी होता है। उस सेठ की यह प्रबल आशा थी, कि पूर्व उपकार किए मेरे मित्र मेरी अवश्वय सहायता करेगें। परतुं उसकी आशा व्यर्थ हुई और उन कृतघ्न मित्रों मे कोई भी उसके उपकार के लिए समर्थ नहीं हुआ। उसके मित्र क्षण मात्र में शत्रु हो गए और वे उपकृत मित्र ही सर्वप्रथम उस सेठ की निन्दा करने लगे। उसके वे पुराने मित्र अपनी दृष्टियों को छिपा छिपा कर निकल जाते थे, बात तो यह है कि स्वार्थी मित्र विपत्ति में साथी नहीं हुआ करतें है।
इस नीच वृत्ति से उस धनंजय सेठ को एक बारगी ही संसार से विरक्ति और मनुष्यों से घृणा उत्पन्न हो गई। वह अपने नगर को छोडकर और कृतघ्नों के मुख पर थूक कर वन को चला गया। कन्द, मूल, फल आदि से प्रयत्नपूर्वक अपनी वृत्ति करता था और मनुष्य मात्र को देख कर दूर भाग जाता था। एक बार घूमते हुए सेठ ने पर्वत की गुफा पे पद्मासन बाधें शांत, लोगों से व्याप्त, लोमश मुनि को देखा। उस धनंजय ने उस मुनि को कोशों से व्याप्त देख कर पसु समझा और कुतूहल (तमाशा) की इच्छा से उसके पास अच्छी तरह बैठ गया, मुनि ने पास बैठ हुए धनंजय से पूछा - हे महात्मन् कुशल तो हो, कहां से पधारे हो। उस धनंजय ने इस पशु को मनुष्य के समान बोलता देख कर बडा अचम्भा किया और प्रारम्भ से अपना सारा वृतान्त उस ब्रह्मर्षि को दिया।
यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ धनंजय से बोला - यदि तुझे पापी कृतघ्नों से घृणा है, तो तू केसें विश्वकर्मा से विमुख हो रहा है। हे श्रेष्ठिन्, सब सुखों के भोगने की शक्ति वालें तुझ को उसी विश्वकर्मा ने बनाया है। वह विश्वकर्मा को भूल जाने से कैसे सुक मिल सकता है। नास्तिक कृतघ्न उपकार को तब ही भूलता है जब वह प्रथम परमेश्वर को भूल जाता है, इसलिए तू अद्भुत शक्ति वाले विश्वकर्मा की शरण को प्राप्त हो। ऊर्ध्वमूल जगत् के कारण उस विश्वकर्मा के नाना रूप है। कोई रूप द्विबाहु कोई चतुर्बाहु और कोई दसबाहु का है इसी प्रकार एकमुख, चतुर्मुख और पंचमुख के रूप है। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ से विश्वकर्मा के साकार रूप के पुत्र हैं। सेतुबंध के समय श्री रामच्रंद जी ने भी क्षी विश्वकर्मा का पूजन किया है। श्री कृष्णचन्द्र ने द्वारका रचना के समय श्री विश्वकर्मा की पूजा की है इसी से वे भी द्वारका जैसी सुदंर पुरी की रचना कर सकें है।
हे धनंजय, तू भी उसी श्री विश्वकर्मा का पूजन और वंदन कर, इस प्रकार सब दुखों से छुट कर सब सिद्धी प्राप्त करेगा। इस प्रकार उस लोमश ऋषि का उपदेश सुनकर उस श्रेष्ठी को बडां सतोंष हुआ और दिन से ही लेकर वह क् श्री विश्वकर्मा का भक्त हो गया, उन श्री विश्वकर्मा जी के पूजन स् उसके समस्त पाप दग्ध हो गए और अन्त को देवता बन कर सुख स्वर्ग भोगनें लगा। जो मनुष्य भक्ति युक्त चित्त से श्री विश्वकर्मा का ध्यान करता है वह सुखी होकर क्षई विश्वकर्मा जी के चरण कमलों का भक्ति प्राप्त करता है। श्री विश्वकर्मा जी का यश बडा पवित्र है, उसकों जो तत्वज्ञ मनुष्य सुनता है वह पृथ्वी पर सब सुखों को प्राप्त करकें अन्ते में श्री विश्वकर्मां जी के शाश्वत पद को प्राप्त करता है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का छटावां अध्याय समाप्त।
सातवां अध्याय
ऋषि कहने लगे - भगवान विश्वकर्मा की पवित्र कथआ को श्रवणकर हमको बडी श्रद्धा उत्पन्न हुई है अब आगे और सुनना चाहते हैं। चित्त में उद्वेग होने पर क्या करना चाहिए, दरिद्र किस प्रकार नष्ट होता है, मृतव सा अर्थात जिस स्त्री के उत्पन्न होकर बच्चा मर जाता है उसकी शान्ति का क्या उपाय है ? हे तपोधन, पहिले जन्म में किये गये पाप इस जन्म मे फल देते है। रोग, दुर्गति, अमीष्ट वस्तुओं का नाशक और समसेत पीडाओं के हरण करने वाले भगवान विश्वकर्मा के पूजन को कहता हूँ। दूध पीने वाले छोटे बालकों तथा तरूण बालकों का मरना मृतवत्सा स्त्रा का शाल्ति के लिए और चित का वैकल्प दूर करने के लिए भगवान विश्वकर्मा का पूजन करना चाहिए।
प्राचीन काल में रथन्तर कल्प में एक दन्तवाहन नाम का राजा हुआ। वह सूर्य के सामन प्रभावशाली लोकों में प्रसिद्ध था। उसी का कृतवीर्य नाम का एक प्रतापी पुत्र हुआ जो सातों द्वीपों पर्यन्त पृथ्वी की शासन करता था। उस राजा के 11 पुत्र पूर्व जन्म में किये पाप के वश पैदा होते ही नष्ट हो गये, तब तो रानी शोक करती हुई पृथ्वी पर पछाडे खाती हुई रूदन करने लगी और राजा से बोली कि मैं अपने यौवन को नष्ट करके पुत्रहीन कैसे धैर्य धारण करूं। तब राजा अपनी स्त्री को सन्तोंष दिला कर गुरू के घर गया और प्रणाम कर बोला - हे भगवन मेरे पुत्र होकर मर जाते है यह किस देन की मुझसे अवहेलना होती है सो कहिए, क्योकि दिन – रात उत्पन्न हुए पुत्रों को याद करके रानी बहुत रूदन करती हैं और धैर्य धारण नही करती हैं।
गुरू बोले हे - राजन, अब बहुत शोक मत करो, तुम्हारे एक वशं को
इस नीच वृत्ति से उस धनंजय सेठ को एक बारगी ही संसार से विरक्ति और मनुष्यों से घृणा उत्पन्न हो गई। वह अपने नगर को छोडकर और कृतघ्नों के मुख पर थूक कर वन को चला गया। कन्द, मूल, फल आदि से प्रयत्नपूर्वक अपनी वृत्ति करता था और मनुष्य मात्र को देख कर दूर भाग जाता था। एक बार घूमते हुए सेठ ने पर्वत की गुफा पे पद्मासन बाधें शांत, लोगों से व्याप्त, लोमश मुनि को देखा। उस धनंजय ने उस मुनि को कोशों से व्याप्त देख कर पसु समझा और कुतूहल (तमाशा) की इच्छा से उसके पास अच्छी तरह बैठ गया, मुनि ने पास बैठ हुए धनंजय से पूछा - हे महात्मन् कुशल तो हो, कहां से पधारे हो। उस धनंजय ने इस पशु को मनुष्य के समान बोलता देख कर बडा अचम्भा किया और प्रारम्भ से अपना सारा वृतान्त उस ब्रह्मर्षि को दिया।
यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ धनंजय से बोला - यदि तुझे पापी कृतघ्नों से घृणा है, तो तू केसें विश्वकर्मा से विमुख हो रहा है। हे श्रेष्ठिन्, सब सुखों के भोगने की शक्ति वालें तुझ को उसी विश्वकर्मा ने बनाया है। वह विश्वकर्मा को भूल जाने से कैसे सुक मिल सकता है। नास्तिक कृतघ्न उपकार को तब ही भूलता है जब वह प्रथम परमेश्वर को भूल जाता है, इसलिए तू अद्भुत शक्ति वाले विश्वकर्मा की शरण को प्राप्त हो। ऊर्ध्वमूल जगत् के कारण उस विश्वकर्मा के नाना रूप है। कोई रूप द्विबाहु कोई चतुर्बाहु और कोई दसबाहु का है इसी प्रकार एकमुख, चतुर्मुख और पंचमुख के रूप है। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ से विश्वकर्मा के साकार रूप के पुत्र हैं। सेतुबंध के समय श्री रामच्रंद जी ने भी क्षी विश्वकर्मा का पूजन किया है। श्री कृष्णचन्द्र ने द्वारका रचना के समय श्री विश्वकर्मा की पूजा की है इसी से वे भी द्वारका जैसी सुदंर पुरी की रचना कर सकें है।
हे धनंजय, तू भी उसी श्री विश्वकर्मा का पूजन और वंदन कर, इस प्रकार सब दुखों से छुट कर सब सिद्धी प्राप्त करेगा। इस प्रकार उस लोमश ऋषि का उपदेश सुनकर उस श्रेष्ठी को बडां सतोंष हुआ और दिन से ही लेकर वह क् श्री विश्वकर्मा का भक्त हो गया, उन श्री विश्वकर्मा जी के पूजन स् उसके समस्त पाप दग्ध हो गए और अन्त को देवता बन कर सुख स्वर्ग भोगनें लगा। जो मनुष्य भक्ति युक्त चित्त से श्री विश्वकर्मा का ध्यान करता है वह सुखी होकर क्षई विश्वकर्मा जी के चरण कमलों का भक्ति प्राप्त करता है। श्री विश्वकर्मा जी का यश बडा पवित्र है, उसकों जो तत्वज्ञ मनुष्य सुनता है वह पृथ्वी पर सब सुखों को प्राप्त करकें अन्ते में श्री विश्वकर्मां जी के शाश्वत पद को प्राप्त करता है।
श्री विश्वकर्मा सहितान्तर्गत सृष्टिखण्ड विश्वकर्मा महात्मा का छटावां अध्याय समाप्त।
सातवां अध्याय
ऋषि कहने लगे - भगवान विश्वकर्मा की पवित्र कथआ को श्रवणकर हमको बडी श्रद्धा उत्पन्न हुई है अब आगे और सुनना चाहते हैं। चित्त में उद्वेग होने पर क्या करना चाहिए, दरिद्र किस प्रकार नष्ट होता है, मृतव सा अर्थात जिस स्त्री के उत्पन्न होकर बच्चा मर जाता है उसकी शान्ति का क्या उपाय है ? हे तपोधन, पहिले जन्म में किये गये पाप इस जन्म मे फल देते है। रोग, दुर्गति, अमीष्ट वस्तुओं का नाशक और समसेत पीडाओं के हरण करने वाले भगवान विश्वकर्मा के पूजन को कहता हूँ। दूध पीने वाले छोटे बालकों तथा तरूण बालकों का मरना मृतवत्सा स्त्रा का शाल्ति के लिए और चित का वैकल्प दूर करने के लिए भगवान विश्वकर्मा का पूजन करना चाहिए।
प्राचीन काल में रथन्तर कल्प में एक दन्तवाहन नाम का राजा हुआ। वह सूर्य के सामन प्रभावशाली लोकों में प्रसिद्ध था। उसी का कृतवीर्य नाम का एक प्रतापी पुत्र हुआ जो सातों द्वीपों पर्यन्त पृथ्वी की शासन करता था। उस राजा के 11 पुत्र पूर्व जन्म में किये पाप के वश पैदा होते ही नष्ट हो गये, तब तो रानी शोक करती हुई पृथ्वी पर पछाडे खाती हुई रूदन करने लगी और राजा से बोली कि मैं अपने यौवन को नष्ट करके पुत्रहीन कैसे धैर्य धारण करूं। तब राजा अपनी स्त्री को सन्तोंष दिला कर गुरू के घर गया और प्रणाम कर बोला - हे भगवन मेरे पुत्र होकर मर जाते है यह किस देन की मुझसे अवहेलना होती है सो कहिए, क्योकि दिन – रात उत्पन्न हुए पुत्रों को याद करके रानी बहुत रूदन करती हैं और धैर्य धारण नही करती हैं।
गुरू बोले हे - राजन, अब बहुत शोक मत करो, तुम्हारे एक वशं को
श्री विश्वकर्मा प्रार्थना
हे विश्वकर्मा ! परम प्रभु !, इतनी विनय सुन लीजिये । दु:ख दुर्गुणो को दूर कर, सुख सद् गुणों को दीजिये ।। ऐसी दया हो आप की, सब जन सुखी सम्पन्न हों । कल्याण कारी गुण सभी में, नित नये उत्पन्न हों ।। प्रभु विघ्न आये पास ना, ऐसी कृपा हो आपकी । निशिदिन सदा निर्मय रहें, सतांप हो नहि ताप की ।। कल्याण होये विश्व का, अस ज्ञान हमको दीजिये । निशि दिन रहें कर्त्तव्य रल, अस शक्ति हमनें कीजियें ।। तुम भक्त – वत्सल ईश हो,
हे विश्वकर्मा ! परम प्रभु !, इतनी विनय सुन लीजिये । दु:ख दुर्गुणो को दूर कर, सुख सद् गुणों को दीजिये ।। ऐसी दया हो आप की, सब जन सुखी सम्पन्न हों । कल्याण कारी गुण सभी में, नित नये उत्पन्न हों ।। प्रभु विघ्न आये पास ना, ऐसी कृपा हो आपकी । निशिदिन सदा निर्मय रहें, सतांप हो नहि ताप की ।। कल्याण होये विश्व का, अस ज्ञान हमको दीजिये । निशि दिन रहें कर्त्तव्य रल, अस शक्ति हमनें कीजियें ।। तुम भक्त – वत्सल ईश हो,
भौवन तुम्हारा नाम है । सत कोटि कोट्न अहर्निशि, सुचि मन सहित प्रणाम है ।। हो निर्विकार तथा पितुम हो भक्त वत्सल सर्वथा, हो तुम निरिहत तथा पी उदभुत सृष्टी रचते हो सढा । आकार हीन तथा पितुम साकार सन्तत सिध्द हो, सर्वेश होकर भी सदातुम प्रेम वस प्रसिध्द हो । करता तुही भरता तुही हरता तुही हो शृष्टि के, हे ईश बहुत उपकार तुम ने सर्लदा हम पर किये । उपकार प्रति उपकार मे क्या दें तुम्हे इसके लिए, है क्या हमारा शृष्टि में जो दे तुम्हे इसके लिए । जय दीन बन्धु सोक सिधी दैव दैव दया निधे, चारो पदार्थ दया निधे फल है तुम्हारे दृष्टि के ।श्री विश्वकर्मा भगवान की प्रात: कालीन स्तुति
री विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वाधारणम् । शरणागतम् शरणागतम् शरणागतम् सुखाकारणम् ।। कर शंख चक्र गदा मद्दम त्रिशुल दुष्ट संहारणम् । धनुबाण धारे निरखि छवि सुर नाग मुनि जन वारणम् ।। डमरु कमण्डलु पुस्तकम् गज सुन्दरम् प्रभु धारणम् । संसार हित कौशल कला मुख वेद निज उच्चारणम् ।। त्रैताप मेटन हार हे ! कर्तार कष्ट निवारणम् । नमस्तुते जगदीश जगदाधार ईश खरारणम् ।। सर्वज्ञ व्यापक सत्तचित आनंद सिरजनहारणम् । सब करहिं स्तुति शेष शारदा पाहिनाथ पुकारणम् ।। श्री विश्वपति भगवत के जो चरण चित लव लांइ है । करि विनय बहु विधि प्रेम सो सौभाग्य सो नर पाइ है ।। संसार की सुख सम्पदा सब भांति सो नर पाइ है । गहु शरण जाहिल करि कृपा भगवान तोहि अपनाई है ।। प्रभुदित ह्रदय से जो सदा गुणगान प्रभु की गाइ है । संसार सागर से अवति सो नर सुपध को पाइ है ।। हे विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वा धारणम् । शरणागतम् । शरणागतम् । शरणागतम् । शरणागतम् ।। श्री विश्वकर्मा भगवान की मुरति अजब विशाल । भरि निज नैन विलोकिये तजि नाना जंजाल ।। आरती गाऊं जगदीश हरी को । विश्वकर्मा स्वामी परम श्री की । तन मन धन सब अर्पण तेरे । करो वास हिये मेँ प्रभु मेरे । शिव विरंची तुमरे गुण गावें । घनश्याम राम सिया मां ध्यावें । 1 । कलियुग में कर साधन कीन्हां । चतुरानन वेद पढयो मुनि चारा । शिल्प कला शुभ मार्ग दीन्हा । साम यजु ऋग शिल्प भडारा । 2 । विश्वकर्मा नाम सदा अविनाशी । अगम अगोचर घट घट वासी । कल्पतरु पद सब सुख धामा । सत्य सनातन मुद मगंल नामा । 3 । करें अर्चन सुमरण पूजा किसकी । नहीं तुम बिन दूजा करे आसा जिसकी । विषय विकार मिटाओ मन के । दुख व्याधा रोग कटें तब तन के । 4 । माता पिता तुम शरणा गत स्वामी । तुम पूरण प्रभु नित्य अन्तर्यामी । हम पावन पाठ करेंहिं चितलाई । करो संकट नाश सदा सुख दाई । 5 । परम विज्ञानी सत्य लोक निवासी । देव तनु धर आयो ,ख राशी । तुम बिन जग में कौन गोसाँई । विश्वप्रताप की अब जो करे सहाई । 6 ।
री विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वाधारणम् । शरणागतम् शरणागतम् शरणागतम् सुखाकारणम् ।। कर शंख चक्र गदा मद्दम त्रिशुल दुष्ट संहारणम् । धनुबाण धारे निरखि छवि सुर नाग मुनि जन वारणम् ।। डमरु कमण्डलु पुस्तकम् गज सुन्दरम् प्रभु धारणम् । संसार हित कौशल कला मुख वेद निज उच्चारणम् ।। त्रैताप मेटन हार हे ! कर्तार कष्ट निवारणम् । नमस्तुते जगदीश जगदाधार ईश खरारणम् ।। सर्वज्ञ व्यापक सत्तचित आनंद सिरजनहारणम् । सब करहिं स्तुति शेष शारदा पाहिनाथ पुकारणम् ।। श्री विश्वपति भगवत के जो चरण चित लव लांइ है । करि विनय बहु विधि प्रेम सो सौभाग्य सो नर पाइ है ।। संसार की सुख सम्पदा सब भांति सो नर पाइ है । गहु शरण जाहिल करि कृपा भगवान तोहि अपनाई है ।। प्रभुदित ह्रदय से जो सदा गुणगान प्रभु की गाइ है । संसार सागर से अवति सो नर सुपध को पाइ है ।। हे विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वा धारणम् । शरणागतम् । शरणागतम् । शरणागतम् । शरणागतम् ।। श्री विश्वकर्मा भगवान की मुरति अजब विशाल । भरि निज नैन विलोकिये तजि नाना जंजाल ।। आरती गाऊं जगदीश हरी को । विश्वकर्मा स्वामी परम श्री की । तन मन धन सब अर्पण तेरे । करो वास हिये मेँ प्रभु मेरे । शिव विरंची तुमरे गुण गावें । घनश्याम राम सिया मां ध्यावें । 1 । कलियुग में कर साधन कीन्हां । चतुरानन वेद पढयो मुनि चारा । शिल्प कला शुभ मार्ग दीन्हा । साम यजु ऋग शिल्प भडारा । 2 । विश्वकर्मा नाम सदा अविनाशी । अगम अगोचर घट घट वासी । कल्पतरु पद सब सुख धामा । सत्य सनातन मुद मगंल नामा । 3 । करें अर्चन सुमरण पूजा किसकी । नहीं तुम बिन दूजा करे आसा जिसकी । विषय विकार मिटाओ मन के । दुख व्याधा रोग कटें तब तन के । 4 । माता पिता तुम शरणा गत स्वामी । तुम पूरण प्रभु नित्य अन्तर्यामी । हम पावन पाठ करेंहिं चितलाई । करो संकट नाश सदा सुख दाई । 5 । परम विज्ञानी सत्य लोक निवासी । देव तनु धर आयो ,ख राशी । तुम बिन जग में कौन गोसाँई । विश्वप्रताप की अब जो करे सहाई । 6 ।
श्री विश्वकर्मा आरती
आरती पंच मुखी विश्वकर्मा की
ओ3म् जय पंचानन देवा , प्रभु जय पंचानन देवा । ब्रह्मा विष्णु शंकर आदि करते नित्य सेवा ।1। भव मय त्राता जगत विधाता, मुक्ति फल दाता । स्वर्ण सिहासन मुकुट शीश चहूँ, सबके मन भाता ।2। प्रभात पिता भवना (माता) विश्वकर्मा स्वामी । विज्ञान शिल्प पति जग मांहि, आयो अन्तर्यामी ।3। त्रिशुल धनु शंकर को दीन्हा, विश्वकर्मा भवकर्ता । विष्णु महल रचायो तुमने, कृपा करो भर्ता ।4। भान शशि नक्षत्र सारे, तुम से ज्योति पावें । दुर्गा इन्र्द देव मुनि जन, मन देखत हर्षावें ।5। श्रेष्ठ कमण्डल कर चक्तपाणी तुम से त्रिशुल धारी । नाम तुम्हारा सयाराम और भजते कुँज बिहरी ।6। नारद आदि शेष शारदा, नुत्य गावत गुण तेरे । अमृत घट की रक्षा कीन्ही, जब देवों ने टेरे ।7। सिन्धु सेत बनाय राम की पल में करी सहाई । सप्त ऋषि दुख मोचन कीन्हीं, तब शान्ति पाई ।8।(तब) सुर नर किन्नर देव मुनि, गाथा नित्य गाते । परम पवित्र नाम सुमर नर, सुख सम्पति पाते ।9। पीत वसन हंस वाहन स्वानी, सबके मन भावे । सो प्राणी धन भाग पिता, चरण शरण जो आवे ।10। पंचानन विश्वकर्मा की जो कोई आरती गावे । निश्वप्रताप, दुख छीजें सारा सुख सम्पत आवे ।11।
आरती विश्वकर्मा अवतार की
ओ3म् जय पंचानन स्वामी प्रभु पंचानन स्वामी । अजर अमर अविनाशी, नमो अन्तर्यामी । चतुरानन संग सात ऋषि, शरण आपकी आये । अभय दान दे ऋषियन को, सार कष्ट मिटाये ।1। निगम गम पथ दाता हमें शरण पडे तेरी । विषय विकार मिटाओ सारे, मत लाओ देरी ।2। कुण्डल कर्ण गले मे माला इस वाहन सोहे । जति सति सन्यासी जग के, देख ही मोहे ।3। श्रेष्ठ कमण्डल मुकमट शीश पर तुम त्रिशूल धारी । भाल विशा सुलोचन देखत सुख पावँ नरनारी ।4। देख देख कर रुप मुनिजन, मन ही मन रीझै । अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, आनन्द रस पीजै ।5। ऋषि अंगिरा कियो धारे तपस्या, शान्ति नही पाई । चरण कमल का दियो आसय, तब सब बन आई ।6। भक्त की जय कार तुम्हारी विज्ञान शिल्प दाता । जिस पर हो तेरी दया दृष्टि भव सागर तर जाता ।7। ऋषि सिर्फ ज्ञान विधायक जो शरण तुम्हारी आये । विश्वप्रताप दुख रोग मिटे, सुख सम्पत पावे ।8।
आरती विश्वकर्मा हरि की
ओ3म् जय विश्वकर्मा हरे जय विश्वकर्मा हरे । दीना नाथ शरण गत वत्सलभव उध्दार करे ।1। भक्त जनों के समय समय पर दुख संकट हर्ता । विश्वरुप जगत के स्वामी तुम आदि कर्ता ।2। ब्रह्म वशं मे अवतार धरो, निज इच्छा कर स्वामी । प्रभात पिता महतारी भूवना योग सुता नामी ।3। शिवो मनुमय त्वष्टा शिल्पी दैवज सुख दाता । शिल्प कला मे पांच तनय, भये ब्रह्म ज्ञाता ।4। नारद इन्द्रशेष शारदा तव चरणन के तेरे । अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, गावें गुण तेरे ।5। देव मुनि जन ऋषि महात्मा चरण शरण आये । राम सीया और उमा भवानी कर दर्शन हर्षाये ।6। ब्रह्मा विष्णु शंकर स्वमी, करते नित्य सेवा । जगत प्राणी दर्श करन हित, आस करें देवा ।7। हेली नाम विप्र ने मन से तुम्हारा गुण गाया । मिला षिल्प वरदान विप्र को, भक्ति फल पाया ।8। अमृत घट की रक्षा कीन्ही, सुर भय हीन भये । महा यज्ञ हेतु इन्द्र के घर, बन के गुरु गये ।9। पीत वसन कर चक्र सोहे. महा वज्र धारी । वेद ज्ञान की बहे सरिता, सब विध सुखकारी ।10। हम अज्ञान भक्त तेरे तुम सच्चे हितकारी । करो कामना सब की पूर्ण, दर पर खडे भिकारी ।11। विश्वकर्मा सत्गुरु हमारे, कष्ट हरो तन का । विश्वप्रताप शरण सुख राशि दुख विनेश मन का ।12।
आरती विराट विश्वकर्मा भगवान की
ओ3म् जय विश्वकर्मा प्रभु जय विश्वकर्मा । शरण तुम्हारी आये हैं, रक्षक श्रुति धर्मा । उमा भवानी शंकर भोले, शरण तुम्हारी आये । कुंज बिहारी कृष्ण योगी, दर्शन करने धाये ।1। सृष्टि धर्ता पालन कर्ता, ज्ञान विकास किया । धनुष बना छिन माहिं तुमने, शिवाजी हाथ दिया ।2। आठ व्दीप नौ खण्ड स्वामी, चौदह भुवन बनायें । पंचानन करतार जगत के, देख सन्त हर्षाये ।3। शेष शारदा नारद आदि देवन की करी सहाई । दुर्गा इन्द्र सीया राम ने निज मुख गाथा गाई ।4। ब्रह्म विष्णु विश्वकर्मा तूं शक्ति रुपा । जगहितकारी सकंट हारी , तुम जग के भूपा ।5। ज्ञान विज्ञान निधि दाता त्वष्टा भुवन पति । अवतार धार के स्वामी तुमने जग में कियो गति । 6। मनु मय त्वष्टा पाँच तनय, ज्ञान शिल्प दाता । शिल्प विधा का आदि युग में, तुम सम को ज्ञाता ।7। मन भावन पावन रुप स्वामी ऋषियों ने जाना । पीत वसन तन सोहे स्वामी, मुक्ति पद बाना ।8। विश्वकर्मा परम गुरु की जो कोई आरती गावै । विश्वप्रताप सन्ताप मिटै, घर सम्पत आवै ।9।
आरती पंच मुखी विश्वकर्मा की
ओ3म् जय पंचानन देवा , प्रभु जय पंचानन देवा । ब्रह्मा विष्णु शंकर आदि करते नित्य सेवा ।1। भव मय त्राता जगत विधाता, मुक्ति फल दाता । स्वर्ण सिहासन मुकुट शीश चहूँ, सबके मन भाता ।2। प्रभात पिता भवना (माता) विश्वकर्मा स्वामी । विज्ञान शिल्प पति जग मांहि, आयो अन्तर्यामी ।3। त्रिशुल धनु शंकर को दीन्हा, विश्वकर्मा भवकर्ता । विष्णु महल रचायो तुमने, कृपा करो भर्ता ।4। भान शशि नक्षत्र सारे, तुम से ज्योति पावें । दुर्गा इन्र्द देव मुनि जन, मन देखत हर्षावें ।5। श्रेष्ठ कमण्डल कर चक्तपाणी तुम से त्रिशुल धारी । नाम तुम्हारा सयाराम और भजते कुँज बिहरी ।6। नारद आदि शेष शारदा, नुत्य गावत गुण तेरे । अमृत घट की रक्षा कीन्ही, जब देवों ने टेरे ।7। सिन्धु सेत बनाय राम की पल में करी सहाई । सप्त ऋषि दुख मोचन कीन्हीं, तब शान्ति पाई ।8।(तब) सुर नर किन्नर देव मुनि, गाथा नित्य गाते । परम पवित्र नाम सुमर नर, सुख सम्पति पाते ।9। पीत वसन हंस वाहन स्वानी, सबके मन भावे । सो प्राणी धन भाग पिता, चरण शरण जो आवे ।10। पंचानन विश्वकर्मा की जो कोई आरती गावे । निश्वप्रताप, दुख छीजें सारा सुख सम्पत आवे ।11।
आरती विश्वकर्मा अवतार की
ओ3म् जय पंचानन स्वामी प्रभु पंचानन स्वामी । अजर अमर अविनाशी, नमो अन्तर्यामी । चतुरानन संग सात ऋषि, शरण आपकी आये । अभय दान दे ऋषियन को, सार कष्ट मिटाये ।1। निगम गम पथ दाता हमें शरण पडे तेरी । विषय विकार मिटाओ सारे, मत लाओ देरी ।2। कुण्डल कर्ण गले मे माला इस वाहन सोहे । जति सति सन्यासी जग के, देख ही मोहे ।3। श्रेष्ठ कमण्डल मुकमट शीश पर तुम त्रिशूल धारी । भाल विशा सुलोचन देखत सुख पावँ नरनारी ।4। देख देख कर रुप मुनिजन, मन ही मन रीझै । अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, आनन्द रस पीजै ।5। ऋषि अंगिरा कियो धारे तपस्या, शान्ति नही पाई । चरण कमल का दियो आसय, तब सब बन आई ।6। भक्त की जय कार तुम्हारी विज्ञान शिल्प दाता । जिस पर हो तेरी दया दृष्टि भव सागर तर जाता ।7। ऋषि सिर्फ ज्ञान विधायक जो शरण तुम्हारी आये । विश्वप्रताप दुख रोग मिटे, सुख सम्पत पावे ।8।
आरती विश्वकर्मा हरि की
ओ3म् जय विश्वकर्मा हरे जय विश्वकर्मा हरे । दीना नाथ शरण गत वत्सलभव उध्दार करे ।1। भक्त जनों के समय समय पर दुख संकट हर्ता । विश्वरुप जगत के स्वामी तुम आदि कर्ता ।2। ब्रह्म वशं मे अवतार धरो, निज इच्छा कर स्वामी । प्रभात पिता महतारी भूवना योग सुता नामी ।3। शिवो मनुमय त्वष्टा शिल्पी दैवज सुख दाता । शिल्प कला मे पांच तनय, भये ब्रह्म ज्ञाता ।4। नारद इन्द्रशेष शारदा तव चरणन के तेरे । अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, गावें गुण तेरे ।5। देव मुनि जन ऋषि महात्मा चरण शरण आये । राम सीया और उमा भवानी कर दर्शन हर्षाये ।6। ब्रह्मा विष्णु शंकर स्वमी, करते नित्य सेवा । जगत प्राणी दर्श करन हित, आस करें देवा ।7। हेली नाम विप्र ने मन से तुम्हारा गुण गाया । मिला षिल्प वरदान विप्र को, भक्ति फल पाया ।8। अमृत घट की रक्षा कीन्ही, सुर भय हीन भये । महा यज्ञ हेतु इन्द्र के घर, बन के गुरु गये ।9। पीत वसन कर चक्र सोहे. महा वज्र धारी । वेद ज्ञान की बहे सरिता, सब विध सुखकारी ।10। हम अज्ञान भक्त तेरे तुम सच्चे हितकारी । करो कामना सब की पूर्ण, दर पर खडे भिकारी ।11। विश्वकर्मा सत्गुरु हमारे, कष्ट हरो तन का । विश्वप्रताप शरण सुख राशि दुख विनेश मन का ।12।
आरती विराट विश्वकर्मा भगवान की
ओ3म् जय विश्वकर्मा प्रभु जय विश्वकर्मा । शरण तुम्हारी आये हैं, रक्षक श्रुति धर्मा । उमा भवानी शंकर भोले, शरण तुम्हारी आये । कुंज बिहारी कृष्ण योगी, दर्शन करने धाये ।1। सृष्टि धर्ता पालन कर्ता, ज्ञान विकास किया । धनुष बना छिन माहिं तुमने, शिवाजी हाथ दिया ।2। आठ व्दीप नौ खण्ड स्वामी, चौदह भुवन बनायें । पंचानन करतार जगत के, देख सन्त हर्षाये ।3। शेष शारदा नारद आदि देवन की करी सहाई । दुर्गा इन्द्र सीया राम ने निज मुख गाथा गाई ।4। ब्रह्म विष्णु विश्वकर्मा तूं शक्ति रुपा । जगहितकारी सकंट हारी , तुम जग के भूपा ।5। ज्ञान विज्ञान निधि दाता त्वष्टा भुवन पति । अवतार धार के स्वामी तुमने जग में कियो गति । 6। मनु मय त्वष्टा पाँच तनय, ज्ञान शिल्प दाता । शिल्प विधा का आदि युग में, तुम सम को ज्ञाता ।7। मन भावन पावन रुप स्वामी ऋषियों ने जाना । पीत वसन तन सोहे स्वामी, मुक्ति पद बाना ।8। विश्वकर्मा परम गुरु की जो कोई आरती गावै । विश्वप्रताप सन्ताप मिटै, घर सम्पत आवै ।9।
श्री विश्वकर्मा भगवान के 108 नाम
ऊँ विश्वकर्मणे नमः
ऊँ विश्वात्मने नमः
ऊँ विश्वस्माय नमः
ऊँ विश्वधाराय नमः
ऊँ विशवधर्माय नमः
ऊँ विरजे नमः
ऊँ विश्वेक्ष्वराय नमः
ऊँ विष्णवे नमः
ऊँ विश्वधराय नमः
ऊँ विश्वकराय नमः
ऊँ वास्तोष्पतये नमः
ऊँ विश्वभंराय नमः
ऊँ वर्मिणे नमः
ऊँ वरदाय नमः
ऊँ विश्वेशाधिपतये नमः
ऊँ वितलाय नमः
ऊँ विशभुंजाय नमः
ऊँ विश्वव्यापिने नमः
ऊँ देवाय नमः
ऊँ धार्मिणे नमः
ऊँ धीराय नमः
ऊँ धराय नमः
ऊँ परात्मने नमः
ऊँ पुरुषाय नमः
ऊँ धर्मात्मने नमः
ऊँ श्वेतांगाय नमः
ऊँ श्वेतवस्त्राय नमः
ऊँ हंसवाहनाय नमः
ऊँ त्रिगुणात्मने नमः
ऊँ सत्यात्मने नमः
ऊँ गुणवल्लभाय नमः
ऊँ भूकल्पाय नमः
ऊँ भूलेंकाय नमः
ऊँ भुवलेकाय नमः
ऊँ चतुर्भुजय नमः
ऊँ विश्वरुपाय नमः
ऊँ विश्वव्यापक नमः
ऊँ अनन्ताय नमः
ऊँ अन्ताय नमः
ऊँ आह्माने नमः
ऊँ अतलाय नमः
ऊँ आघ्रात्मने नमः
ऊँ अनन्तमुखाय नमः
ऊँ अनन्तभूजाय नमः
ऊँ अनन्तयक्षुय नमः
ऊँ अनन्तकल्पाय नमः
ऊँ अनन्तशक्तिभूते नमः
ऊँ अतिसूक्ष्माय नमः
ऊँ त्रिनेत्राय नमः
ऊँ कंबीघराय नमः
ऊँ ज्ञानमुद्राय नमः
ऊँ सूत्रात्मने नमः
ऊँ सूत्रधराय नमः
ऊँ महलोकाय नमः
ऊँ जनलोकाय नमः
ऊँ तषोलोकाय नमः
ऊँ सत्यकोकाय नमः
ऊँ सुतलाय नमः
ऊँ सलातलाय नमः
ऊँ महातलाय नमः
ऊँ रसातलाय नमः
ऊँ पातालाय नमः
ऊँ मनुषपिणे नमः
ऊँ त्वष्टे नमः
ऊँ देवज्ञाय नमः
ऊँ पूर्णप्रभाय नमः
ऊँ ह्रदयवासिने नमः
ऊँ दुष्टदमनाथ नमः
ऊँ देवधराय नमः
ऊँ स्थिर कराय नमः
ऊँ वासपात्रे नमः
ऊँ पूर्णानंदाय नमः
ऊँ सानन्दाय नमः
ऊँ सर्वेश्वरांय नमः
ऊँ परमेश्वराय नमः
ऊँ तेजात्मने नमः
ऊँ परमात्मने नमः
ऊँ कृतिपतये नमः
ऊँ बृहद् स्मणय नमः
ऊँ ब्रहमांडाय नमः
ऊँ भुवनपतये नमः
ऊँ त्रिभुवनाथ नमः
ऊँ सतातनाथ नमः
ऊँ सर्वादये नमः
ऊँ कर्षापाय नमः
ऊँ हर्षाय नमः
ऊँ सुखकत्रे नमः
ऊँ दुखहर्त्रे नमः
ऊँ निर्विकल्पाय नमः
ऊँ निर्विधाय नमः
ऊँ निस्माय नमः
ऊँ निराधाराय नमः
ऊँ निकाकाराय नमः
ऊँ महदुर्लभाय नमः
ऊँ निमोहाय नमः
ऊँ शांतिमुर्तय नमः
ऊँ शांतिदात्रे नमः
ऊँ मोक्षदात्रे नमः
ऊँ स्थवीराय नमः
ऊँ सूक्ष्माय नमः
ऊँ निर्मोहय नमः
ऊँ धराधराय नमः
ऊँ स्थूतिस्माय नमः
ऊँ विश्वरक्षकाय नमः
ऊँ दुर्लभाय नमः
ऊँ स्वर्गलोकाय नमः
ऊँ पंचवकत्राय नमः
ऊँ विश्वलल्लभाय नमः
ऊँ विश्वकर्मणे नमः
ऊँ विश्वात्मने नमः
ऊँ विश्वस्माय नमः
ऊँ विश्वधाराय नमः
ऊँ विशवधर्माय नमः
ऊँ विरजे नमः
ऊँ विश्वेक्ष्वराय नमः
ऊँ विष्णवे नमः
ऊँ विश्वधराय नमः
ऊँ विश्वकराय नमः
ऊँ वास्तोष्पतये नमः
ऊँ विश्वभंराय नमः
ऊँ वर्मिणे नमः
ऊँ वरदाय नमः
ऊँ विश्वेशाधिपतये नमः
ऊँ वितलाय नमः
ऊँ विशभुंजाय नमः
ऊँ विश्वव्यापिने नमः
ऊँ देवाय नमः
ऊँ धार्मिणे नमः
ऊँ धीराय नमः
ऊँ धराय नमः
ऊँ परात्मने नमः
ऊँ पुरुषाय नमः
ऊँ धर्मात्मने नमः
ऊँ श्वेतांगाय नमः
ऊँ श्वेतवस्त्राय नमः
ऊँ हंसवाहनाय नमः
ऊँ त्रिगुणात्मने नमः
ऊँ सत्यात्मने नमः
ऊँ गुणवल्लभाय नमः
ऊँ भूकल्पाय नमः
ऊँ भूलेंकाय नमः
ऊँ भुवलेकाय नमः
ऊँ चतुर्भुजय नमः
ऊँ विश्वरुपाय नमः
ऊँ विश्वव्यापक नमः
ऊँ अनन्ताय नमः
ऊँ अन्ताय नमः
ऊँ आह्माने नमः
ऊँ अतलाय नमः
ऊँ आघ्रात्मने नमः
ऊँ अनन्तमुखाय नमः
ऊँ अनन्तभूजाय नमः
ऊँ अनन्तयक्षुय नमः
ऊँ अनन्तकल्पाय नमः
ऊँ अनन्तशक्तिभूते नमः
ऊँ अतिसूक्ष्माय नमः
ऊँ त्रिनेत्राय नमः
ऊँ कंबीघराय नमः
ऊँ ज्ञानमुद्राय नमः
ऊँ सूत्रात्मने नमः
ऊँ सूत्रधराय नमः
ऊँ महलोकाय नमः
ऊँ जनलोकाय नमः
ऊँ तषोलोकाय नमः
ऊँ सत्यकोकाय नमः
ऊँ सुतलाय नमः
ऊँ सलातलाय नमः
ऊँ महातलाय नमः
ऊँ रसातलाय नमः
ऊँ पातालाय नमः
ऊँ मनुषपिणे नमः
ऊँ त्वष्टे नमः
ऊँ देवज्ञाय नमः
ऊँ पूर्णप्रभाय नमः
ऊँ ह्रदयवासिने नमः
ऊँ दुष्टदमनाथ नमः
ऊँ देवधराय नमः
ऊँ स्थिर कराय नमः
ऊँ वासपात्रे नमः
ऊँ पूर्णानंदाय नमः
ऊँ सानन्दाय नमः
ऊँ सर्वेश्वरांय नमः
ऊँ परमेश्वराय नमः
ऊँ तेजात्मने नमः
ऊँ परमात्मने नमः
ऊँ कृतिपतये नमः
ऊँ बृहद् स्मणय नमः
ऊँ ब्रहमांडाय नमः
ऊँ भुवनपतये नमः
ऊँ त्रिभुवनाथ नमः
ऊँ सतातनाथ नमः
ऊँ सर्वादये नमः
ऊँ कर्षापाय नमः
ऊँ हर्षाय नमः
ऊँ सुखकत्रे नमः
ऊँ दुखहर्त्रे नमः
ऊँ निर्विकल्पाय नमः
ऊँ निर्विधाय नमः
ऊँ निस्माय नमः
ऊँ निराधाराय नमः
ऊँ निकाकाराय नमः
ऊँ महदुर्लभाय नमः
ऊँ निमोहाय नमः
ऊँ शांतिमुर्तय नमः
ऊँ शांतिदात्रे नमः
ऊँ मोक्षदात्रे नमः
ऊँ स्थवीराय नमः
ऊँ सूक्ष्माय नमः
ऊँ निर्मोहय नमः
ऊँ धराधराय नमः
ऊँ स्थूतिस्माय नमः
ऊँ विश्वरक्षकाय नमः
ऊँ दुर्लभाय नमः
ऊँ स्वर्गलोकाय नमः
ऊँ पंचवकत्राय नमः
ऊँ विश्वलल्लभाय नमः
सप्त ऋषियों द्वारा विश्वकर्मा जी की पूजा
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के सूक्त 81 व 82 दोनों सूक्त विश्वकर्मा सूक्त है। इनमें प्रत्येक में सात-सात मंत्र है। इन सब मत्रों के ऋषि और देवता भुवनपुत्र विश्वकर्मा ही हैं। ये ही चौदह मत्रं यजुर्वेद अध्याय के 17वें में मत्रं 17 से 32 तक आते हैं, जिसमें से केवल दो मंत्र 24वां और 32वां अधिक महत्वपुर्ण है। प्रत्येक मागंलिक पर्व यज्ञ में गृह प्रवेश करते समय, किसी भी नवीन कार्य के शुभारम्भ पर, विवाह आदि सस्कांरो के समय इनका पाठ अवश्य करना चाहिए।
इतिहास साक्षी है कि विभिन्न अवसरों पर भी ऋषि मुनियों, देवताओं और महापुरूषों पर भी सकंट आया श्री विश्वकर्मा जी ने उनको नाना प्रकार के आयुध प्रदान किये और उऩ का सकंट निवारण किया और उन्होंने विश्व विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना और स्तुति की। श्री कृष्णं एवं भीम सवांद में उल्लेख आया है कि महर्षि मरिच, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलड, ऋतु, वरिष्ठ, आदि सप्तऋषियोंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए विश्वकर्मा जी की प्रार्थना की जो इस प्रकार हैः
अस्माकम् दीयतां शीघ्रं भगवन् यज्ञ शीलताम्।....................कर्माणि तदा मयात्।
अर्थात हे प्रभु। अब आप कृपा कर हमें यज्ञशीलता प्रदान कीजिए। हे महाविभों। यज्ञ करना, यज्ञ कराना, वेद पढना कथा पढाना, दान देना और दान लेना आदि षट्कर्मों का अधिकार दीजिए । महर्षियों के ये शब्द सुनकर श्री विश्वकर्मा जी ने उनको वरदान दिया और षटकंर्माधिकार की आज्ञा दी।
यह वर प्राप्त करके सप्तर्षियों ने शिल्पधिपति देवाधिदेव विश्वकर्मा जी की मुक्त कंठ से स्तुति की जो इस प्रकार हैः "हे शिल्पाचार्य विश्वकर्मन् देव। हम आपके कृतज्ञ हैं। हम पर आपकी कृपा हो, हम आपको बारमबार प्रमाण करते है एवं तत्वज्ञानी शिल्पाचार्य मनु, मय, त्वष्टा, दैवेज्ञ, शिल्पी आपके पुत्रों को भी हम प्रमाण करतें है। इस संदर्भ में सप्तऋषि आगे कहते है- हे देव। आप की कृपा से हमें शुद्ध ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ है। अब हम अपने मार्ग पर जाते है ऐसा कहकर उन ऋषियों ने श्री विश्वकर्मा जी को बारम्बार प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा की इस प्रकार श्री विश्वकर्मा जी सप्तऋषियों के गुरू भी है।"
इन्द्र द्वारा विश्वकर्मा जी की पूजा ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय 47 के राधा-कृष्ण संवाद में उल्लेख आता है कि देवाधिदेव इन्द्र ने भी कलाधिपति विश्वकर्मा जी की आराधना एंव स्तुति की जिसका विवरण इस प्रकार हैः "श्री कृष्ण कहते है कि, हे परम सुदंरी। जिससे सभी प्रकार के पापों का विनाश होता है ऐसे पुण्य वृतान्त को सुन। हे सुन्दरी। जब विश्व रूप की ब्रह्म हत्या से मुक्त होकर इन्द्र पुनः स्वर्ग में आया तो सब देवों को अत्यतं आनंद हुआ। इन्द्र अपनी पुरी में पूरे सौ वर्ष के बाद आये थे उनके सत्कारार्थ विश्वकर्मा जी ने अमरावती नामक पुरी का निर्माण किया था जो कि नौ-नौ प्रकार की मणियों और रत्नों से सुसज्जित थी। इस अत्यंत सुंदर नगरी को देखकर इन्द्र अति प्रसन्न हुए। उन्होंने विश्वकर्मा जी का आदर सत्कार किया, उनकी पूजा की, अराधना की एंव उनकी स्तुति की। इन्द्र ने कहा, हे विश्वकर्मा। मुझे आशीर्वाद दो कि मैं इस पुरी में वास कर सकूं।"
भगवान श्री राम् और श्री विश्वकर्मा जी
इसके अलावा इतिहास साक्षी है वाल्मीकि रामायण के लकां काडं, सर्ग 125 श्लोक 20 अनुसार भगवान राम ने भी विश्वकर्मा जी की अराधना एंव पूजा की। यह बात स्वंय श्री राम ने अपने मुख से कही, जिस समय लंका पर विजय प्राप्त करके महावीर आदि के साथ विमान में सीता सहित श्री राम अयोध्या आ रहें थें तो सीता से कहा किः "हे सीता, जब हम तेरे वियोग में व्याकुल होकर वन-वन घूम रहे थे तो समुद्र तट स्थान पर चातुर्मास किया था और विश्वकर्मा प्रभु की पूजा भी करते थे। उसी विश्वकर्मा की कृपा से हमें साम्रंगी प्राप्त हुई और, उसी की कृपा से यह सेतु हमने बांध कर लकां में प्रवेश किया और रावण का वध किया है।" यहां महाप्रभु विश्वकर्मा को ही महादेव कहा गया है। संत शिरोमणी तुलसी के रामचरितमानस मे भी श्री राम ने विश्वकर्मा पुत्रों नल और नील की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और उनके प्रति अपना आभार प्रकट किया।
द्वापर युग में मंवादी पांचों पुत्रों के सहित विश्वकर्मा की महादेव और द्वारका वासी श्री कृष्ण ने इस प्रकार पूजा की। कलियुग में भी विश्वकर्मा वंशीयों देवऋषि अर्थात शिल्पी ब्राह्मणों की महाजन जनमेजय ने अपनी यज्ञ में यथोक्त पूजा की है। सारांश यह कि शिल्पी ब्राह्मण सर्वदा से ही सबके पूज्य रहे है। अतः यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट है कि देवाधिदेव विश्वकर्मा जी समस्त शास्त्रों के ज्ञान, वेद वेदांग में परंपरागत, तप और स्वाध्याय के प्रेमी, इंद्रियों को जीते हुए, क्षमाशील ब्राह्मण कुमार थे। स्वंय भगवान होते हुए भी वे भगवान का अराधना करतें थे। वे सर्वव्यापी, समर्थ और सर्व शक्तिमान थे। संसार की प्रत्येक वस्तु पर उ
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के सूक्त 81 व 82 दोनों सूक्त विश्वकर्मा सूक्त है। इनमें प्रत्येक में सात-सात मंत्र है। इन सब मत्रों के ऋषि और देवता भुवनपुत्र विश्वकर्मा ही हैं। ये ही चौदह मत्रं यजुर्वेद अध्याय के 17वें में मत्रं 17 से 32 तक आते हैं, जिसमें से केवल दो मंत्र 24वां और 32वां अधिक महत्वपुर्ण है। प्रत्येक मागंलिक पर्व यज्ञ में गृह प्रवेश करते समय, किसी भी नवीन कार्य के शुभारम्भ पर, विवाह आदि सस्कांरो के समय इनका पाठ अवश्य करना चाहिए।
इतिहास साक्षी है कि विभिन्न अवसरों पर भी ऋषि मुनियों, देवताओं और महापुरूषों पर भी सकंट आया श्री विश्वकर्मा जी ने उनको नाना प्रकार के आयुध प्रदान किये और उऩ का सकंट निवारण किया और उन्होंने विश्व विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना और स्तुति की। श्री कृष्णं एवं भीम सवांद में उल्लेख आया है कि महर्षि मरिच, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलड, ऋतु, वरिष्ठ, आदि सप्तऋषियोंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए विश्वकर्मा जी की प्रार्थना की जो इस प्रकार हैः
अस्माकम् दीयतां शीघ्रं भगवन् यज्ञ शीलताम्।....................कर्माणि तदा मयात्।
अर्थात हे प्रभु। अब आप कृपा कर हमें यज्ञशीलता प्रदान कीजिए। हे महाविभों। यज्ञ करना, यज्ञ कराना, वेद पढना कथा पढाना, दान देना और दान लेना आदि षट्कर्मों का अधिकार दीजिए । महर्षियों के ये शब्द सुनकर श्री विश्वकर्मा जी ने उनको वरदान दिया और षटकंर्माधिकार की आज्ञा दी।
यह वर प्राप्त करके सप्तर्षियों ने शिल्पधिपति देवाधिदेव विश्वकर्मा जी की मुक्त कंठ से स्तुति की जो इस प्रकार हैः "हे शिल्पाचार्य विश्वकर्मन् देव। हम आपके कृतज्ञ हैं। हम पर आपकी कृपा हो, हम आपको बारमबार प्रमाण करते है एवं तत्वज्ञानी शिल्पाचार्य मनु, मय, त्वष्टा, दैवेज्ञ, शिल्पी आपके पुत्रों को भी हम प्रमाण करतें है। इस संदर्भ में सप्तऋषि आगे कहते है- हे देव। आप की कृपा से हमें शुद्ध ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ है। अब हम अपने मार्ग पर जाते है ऐसा कहकर उन ऋषियों ने श्री विश्वकर्मा जी को बारम्बार प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा की इस प्रकार श्री विश्वकर्मा जी सप्तऋषियों के गुरू भी है।"
इन्द्र द्वारा विश्वकर्मा जी की पूजा ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म खण्ड के अध्याय 47 के राधा-कृष्ण संवाद में उल्लेख आता है कि देवाधिदेव इन्द्र ने भी कलाधिपति विश्वकर्मा जी की आराधना एंव स्तुति की जिसका विवरण इस प्रकार हैः "श्री कृष्ण कहते है कि, हे परम सुदंरी। जिससे सभी प्रकार के पापों का विनाश होता है ऐसे पुण्य वृतान्त को सुन। हे सुन्दरी। जब विश्व रूप की ब्रह्म हत्या से मुक्त होकर इन्द्र पुनः स्वर्ग में आया तो सब देवों को अत्यतं आनंद हुआ। इन्द्र अपनी पुरी में पूरे सौ वर्ष के बाद आये थे उनके सत्कारार्थ विश्वकर्मा जी ने अमरावती नामक पुरी का निर्माण किया था जो कि नौ-नौ प्रकार की मणियों और रत्नों से सुसज्जित थी। इस अत्यंत सुंदर नगरी को देखकर इन्द्र अति प्रसन्न हुए। उन्होंने विश्वकर्मा जी का आदर सत्कार किया, उनकी पूजा की, अराधना की एंव उनकी स्तुति की। इन्द्र ने कहा, हे विश्वकर्मा। मुझे आशीर्वाद दो कि मैं इस पुरी में वास कर सकूं।"
भगवान श्री राम् और श्री विश्वकर्मा जी
इसके अलावा इतिहास साक्षी है वाल्मीकि रामायण के लकां काडं, सर्ग 125 श्लोक 20 अनुसार भगवान राम ने भी विश्वकर्मा जी की अराधना एंव पूजा की। यह बात स्वंय श्री राम ने अपने मुख से कही, जिस समय लंका पर विजय प्राप्त करके महावीर आदि के साथ विमान में सीता सहित श्री राम अयोध्या आ रहें थें तो सीता से कहा किः "हे सीता, जब हम तेरे वियोग में व्याकुल होकर वन-वन घूम रहे थे तो समुद्र तट स्थान पर चातुर्मास किया था और विश्वकर्मा प्रभु की पूजा भी करते थे। उसी विश्वकर्मा की कृपा से हमें साम्रंगी प्राप्त हुई और, उसी की कृपा से यह सेतु हमने बांध कर लकां में प्रवेश किया और रावण का वध किया है।" यहां महाप्रभु विश्वकर्मा को ही महादेव कहा गया है। संत शिरोमणी तुलसी के रामचरितमानस मे भी श्री राम ने विश्वकर्मा पुत्रों नल और नील की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और उनके प्रति अपना आभार प्रकट किया।
द्वापर युग में मंवादी पांचों पुत्रों के सहित विश्वकर्मा की महादेव और द्वारका वासी श्री कृष्ण ने इस प्रकार पूजा की। कलियुग में भी विश्वकर्मा वंशीयों देवऋषि अर्थात शिल्पी ब्राह्मणों की महाजन जनमेजय ने अपनी यज्ञ में यथोक्त पूजा की है। सारांश यह कि शिल्पी ब्राह्मण सर्वदा से ही सबके पूज्य रहे है। अतः यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट है कि देवाधिदेव विश्वकर्मा जी समस्त शास्त्रों के ज्ञान, वेद वेदांग में परंपरागत, तप और स्वाध्याय के प्रेमी, इंद्रियों को जीते हुए, क्षमाशील ब्राह्मण कुमार थे। स्वंय भगवान होते हुए भी वे भगवान का अराधना करतें थे। वे सर्वव्यापी, समर्थ और सर्व शक्तिमान थे। संसार की प्रत्येक वस्तु पर उ
नका पूर्ण अधिकार था। परतुं किसी भी वस्तु में उनकी आसक्ति, ममता, स्पृहा और कामना नही थी। समय-समय पर उन्होंने सभी देवी देवताओं की सहायता की, अमोध, अस्त्र, शस्त्र, आयुव प्रदान किये, ऐश्वैर्य के साधन उपलब्ध कराए, संसार का लालन-पालन किया। महान, शूरवीर,धीर, दयालु उदार, त्यागशील, निष्पाप, चतुर, द्दढ प्रतिज्ञ, सत्य प्रिय, बुद्धिमान विद्वान, जितेन्द्रीय और ज्ञानी थे। देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, मनुष्य औऱ नागों में कोई भी ऐसा नहीं जो उनकी कला का सामना कर सकें। बल, वीर्य, तेज, शीघ्रता, लघुडस्तता, विशाद-हीनता और धैर्य ये सारे गुण सिवा विश्वकर्मा जी के और किसी में विद्वमान नही थे।
विश्वकर्मा संतति
जिस प्रकार विश्वकर्मा भगवान के अस्तित्व, समय, काल, जन्म, शिक्षा आदि विषयों को लेखकों ने जटिल एवं अस्पष्ट बना दिया है, ऐसे ही विश्वकर्मा जी की संतान के सबंधों के सबंन्ध में विद्वानों के अलग-अलग मत है। विश्वकर्मा जी की संतान के सबंध में जिन प्रश्नो को जानने की जिज्ञासा साधारण व्यक्ति के मन में उत्पन्न होती है। वे कुछ इस प्रकार है, जैसे विश्वकर्मा के कितनें पुत्र थे? उनकी शिक्षा कैसे और कहां हुई? उन्होनें जीवन में क्या-क्या उपलब्धियाँ प्राप्त की? उनके शादी विवाह कौन-कौन से परिवार में हुए? समाज में उनकी क्या प्रतिष्ठा रही होगी? वे क्या-क्या काम करतें थें? आदि बहुत से प्रश्न है, जिनकीबाबत आज का प्रबुद्ध व्याति जानकारी प्राप्त करना चाहेगा। आज के युग में कोई भी पढे लिखा व्यक्ति किसी के कुल और जाति की जानकारी बाद में चाहता है। पहले इस बात को जानना चाहेगा कि अमुक व्यक्ति ने संसार में आकर क्या प्राप्त किया और इस संसार को क्या दिया। अंतः भ्रमं पैदा करने वाले प्रश्नों को छोडं कर हम उपर्युक्त प्रश्नों की ओर अधिक ध्यान देगें।
स्कन्द पुराण में लिखा है किः "विश्वकर्मा जी के पांच पुत्र थे, जिनके नाम मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी तथा दैवेज्ञ थे। विश्वकर्मा जी के पांचों पुत्र सृष्टि के प्रवर्तक थे। विश्वकर्मा जी के उपर्युक्त पाचों पुत्रों का नीचे अलग-अलग विवरण दिया जा रहा है, विवाह आदि का उल्लेख करें। विश्वकर्मा जी के पाचों पुत्र पिता समान प्रत्येक क्षेत्र में पांरगत एवं प्रवीण थे। तप, त्याग, तपस्या के कारण ही इनको महर्षि की उपाधि प्राप्त थी। महाप्रभु विश्वकर्मा ने अपने सद्योत्जातादि पंच मुखों से मनु आदि पांच देवों को उत्पन्न किया। इनके पांच पुत्र थे मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ। दैवेज्ञ को विश्वज्ञ भी कहते है। क्रमशः ये सानग, सनातन, अहभूत, प्रयत्न और सुपर्ण के नाम से भी जाने जाते है।" जिनका विवरण कुछ इस प्रकार है।
विश्वकर्मा संतति
जिस प्रकार विश्वकर्मा भगवान के अस्तित्व, समय, काल, जन्म, शिक्षा आदि विषयों को लेखकों ने जटिल एवं अस्पष्ट बना दिया है, ऐसे ही विश्वकर्मा जी की संतान के सबंधों के सबंन्ध में विद्वानों के अलग-अलग मत है। विश्वकर्मा जी की संतान के सबंध में जिन प्रश्नो को जानने की जिज्ञासा साधारण व्यक्ति के मन में उत्पन्न होती है। वे कुछ इस प्रकार है, जैसे विश्वकर्मा के कितनें पुत्र थे? उनकी शिक्षा कैसे और कहां हुई? उन्होनें जीवन में क्या-क्या उपलब्धियाँ प्राप्त की? उनके शादी विवाह कौन-कौन से परिवार में हुए? समाज में उनकी क्या प्रतिष्ठा रही होगी? वे क्या-क्या काम करतें थें? आदि बहुत से प्रश्न है, जिनकीबाबत आज का प्रबुद्ध व्याति जानकारी प्राप्त करना चाहेगा। आज के युग में कोई भी पढे लिखा व्यक्ति किसी के कुल और जाति की जानकारी बाद में चाहता है। पहले इस बात को जानना चाहेगा कि अमुक व्यक्ति ने संसार में आकर क्या प्राप्त किया और इस संसार को क्या दिया। अंतः भ्रमं पैदा करने वाले प्रश्नों को छोडं कर हम उपर्युक्त प्रश्नों की ओर अधिक ध्यान देगें।
स्कन्द पुराण में लिखा है किः "विश्वकर्मा जी के पांच पुत्र थे, जिनके नाम मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी तथा दैवेज्ञ थे। विश्वकर्मा जी के पांचों पुत्र सृष्टि के प्रवर्तक थे। विश्वकर्मा जी के उपर्युक्त पाचों पुत्रों का नीचे अलग-अलग विवरण दिया जा रहा है, विवाह आदि का उल्लेख करें। विश्वकर्मा जी के पाचों पुत्र पिता समान प्रत्येक क्षेत्र में पांरगत एवं प्रवीण थे। तप, त्याग, तपस्या के कारण ही इनको महर्षि की उपाधि प्राप्त थी। महाप्रभु विश्वकर्मा ने अपने सद्योत्जातादि पंच मुखों से मनु आदि पांच देवों को उत्पन्न किया। इनके पांच पुत्र थे मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ। दैवेज्ञ को विश्वज्ञ भी कहते है। क्रमशः ये सानग, सनातन, अहभूत, प्रयत्न और सुपर्ण के नाम से भी जाने जाते है।" जिनका विवरण कुछ इस प्रकार है।
श्री विश्वकर्मा शतकम्
धीमतो द्दिजवरस्य महर्ष: शिल्पशास्त्र रचनानिपुणस्य । विश्वकर्मविबुधस्य मुदेहि स्वागतां वितनुम: शतकेन ।।1।। शिल्पशास्त्र के रचयिता, धीमान् ब्राह्मण, महर्षि विश्वकर्मा के आविर्भाव का इन 100 संस्कृत श्लोकों द्वारा स्वागत करता हैं। (क) रतोद्धता वृत्तम् प्रक्रियां रचियता रथोद्धतां येन वेदविदुषा विजन्मना । शिल्पतल्यमविकल्पि कल्पितं विश्वकर्मविबुधं तमीड्महे ।।2।। वेद् के विद्वान् जिस ब्राह्मण ने स्थादि निर्माण की प्रक्रिया को रचते हुए असंदिग्ध शिल्पशास्त्र को प्रकट क्या है, उस विश्वकर्मा धीमान् की हम स्तुति करते है। शिल्पिनां प्रियतमेन धीमात् ब्राह्मणेन भुवि विश्वकर्मणा । यन्नृणामुपकृतं ब्रह्त्तम् तं महर्षिननिशं स्तुवीमहं ।।3।। समस्त शिल्पियों के प्यारे धीमान् विश्वकर्मा ने संसार में जो मनुष्यों का बहुत भारी उपकार किया है, उसके लिऐ हम उस महर्षि का हर समय स्तुति करते है। यस्त नाम भुवने महद् यशो भौंवनस्य बहुश: प्रकाशते । तत्प्रशस्ति मधिकृत्य संस्कृतुं विश्वकर्मसतकं निबध्यते ।।4।। जिस भुवन के पुत्र (रक्षक) भौवन विश्वकर्मा का बहुत यशस्वी नाम संसार में प्रकाशित है उसकी प्रशंसा के निमित यह संस्कृत श्लोकों में ‘विश्वकर्मशतकम्’ नामक लघु ग्रथं बनाया जाता है। (उपजाति वृत्तम) ब्रह्माण्डमूलं प्रथमो विघाता स विश्वकर्मा परमेश्वरो स्ति । वेदानुकूलं जगतः स्वशक्तृया सृष्टि स्थिति संह्रतिमातेमानोति ।।5।। प्रथम बाह्मण का मूल, विधान करने वाला विश्वकर्मा परमेश्वर है जो अपनी शक्ति से वेदानुकूल जगत् की उत्पत्ति और प्रलय करता है। उत्पादयामास या आदिशिल्पी वर्णान् यशास्वं गुणकर्मयुक्तान् । विशिष्टलोकव्यवहारहेतूनृ सब्राह्मानृ क्षत्रियवैसश्य शूद्रान ।।6।। जिस आदि शिल्पी ने अपने-अपने गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो को विशेष लोक व्यवहार की सिद्ध के लिए बनाया है। समस्तमेतद् भुवनं स देवः कर्मपधानं रचयन् समन्नात् । चेष्टाभिरिष्टामि स्नल्प शिल्पत्रिया विशौषाहनिह तन्तनोति ।।7।। वह देव इस समस्त विश्व को सब और से कर्म प्रधान बनाता हुआ अपनी चेष्टाओं से बहुत बंडी शिल्प क्रियाओं को फैला रहा है। तपस्विनः संयमिनः पुरा ये ख्यार्ति गताः कर्मणि कौशलेन । तेषा समेषामपि कर्म मुख्यं मतं स्वतो जीवनयापनाय ।।8।। जो पहले तपस्वी सयंमी लोग अपनी कर्म कुशलता से प्रसिद्धि को प्राप्त हुए है, उन सबने भी अपना जीवनयापन करने के लिए कर्म को ही मुख्य माना है। शुभानि कर्माणि सदैव शतं समाः साधु जिजीविषेन्ना । एतद् यजुर्वेद्वचः प्रमाणं मत्वा क्रियाशिल्पविदेह भव्यम् ।।9।। मनुष्य इस संसार में सदा श्राम कर्म करता हुआ ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखें। इस यजुर्वेद के वचन को प्रमाण मानकर शिल्रक्रिया का जानकर होना चाहिए। संसिद्धिमाप्ताः खलु कर्मणैव लोके प्रसिद्धा जानकादयोपि । तस्माद् बुधैः कर्मर्यवित्त्यै स विश्वकर्मा प्रभुरेषणीयः ।।10।। लोक मे प्रसिद्ध जनक आदि राजर्षि भी कर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। इसलिए विद्वान् लोगो को कर्म का रहस्य जानने के लिए उस विश्वकर्मा प्रभु की उपासना करनी चाहिए। ज्येष्ठं परं ब्रह्म विराड् महेशस्त्वष्टा जगद्योनिरचिन्त्यशक्तिः। विश्वस्य धाता भगवान् पुराणः स विश्वकर्मा प्रभुरर्चनीयः।।11।। सबसे बडा, ज्येष्ठ ब्रह्म, विराट् शक्तिसंपन्न, महेश्वर, शिल्प रचना करने वाला, जगत् का कारण, अलैकिक सामर्थ्यशाली, विश्व का धाता, भगवान पुरातन वह विश्वकर्मा प्रभु पूजनीय है। यः शिल्पिमुख्यः प्रमुरीश्वरः स क्वचितृ कदाचिन्न विनाशमेति । सर्वत्रगं ज्योतिरिदं तदीयं, तस्यैव भासा सकलं विभाति ।।12।। जो शिल्पियों में मुख्य प्रभु ईश्वर है वह कहीम पर कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। सर्वत्र उसी की यह ज्योति फैली हुई है। उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होता है। पुरःसरोsसौं समवर्तताग्रे समग्रसंसारमजीनच्च । अनल्पशिल्पेन बुधोन तेन प्रवर्तिता सृष्टिरयं पुराणी ।।13।। वह सबका अग्रणी पहले विद्यमान था। सारे संसार को उसी ने बनाया। बहुत बडे शिल्प वाले उसी विद्वान की चलाई हुई यह पुरातन सृष्टि चल रही है। होता पिता नः स इमान् समस्तांकल्लोकान् गुरूत्वात सतत बिर्भाति। उपाददानो निजशिल्पवित्तं प्रैर्णोन्महिम्ना प्रथमच्छद्न्यान् ।।14।। वह हमारा पालन पिता, हवन करले वाला, पुकारने वाला योग्य, अपने गौरव से उन समस्त लोकों का पालन-पोषण करता है। अपने शिल्प धान को लेकर निजमहिमा से अन्यों को ढक देता है। सबसे सबको ढकने वाला वही देव है। अन्तर्निविष्टो भुवनेषु गूढं से प्रौढि स प्रौढनिविष्टभारः । जगद् विचित्रं तनुते स्वशिल्पचक्रेन विचाल्यमानम् ।।15।। क्योंकि वह देव अन्यों से अशक्य सब दुष्कर शुभकर्मो के करता है इसलिए अर्थातनुकूल ‘विश्वकर्मा’ इस उत्तम सज्ञां को धारण करके शोभित हो रहा है। इंमा स भूमि जनयन् विशालां द्यो चापि सद्यः कृतशिल्पविद्य । आरम्भणे तन्निजमाययैव स्वयं ह
धीमतो द्दिजवरस्य महर्ष: शिल्पशास्त्र रचनानिपुणस्य । विश्वकर्मविबुधस्य मुदेहि स्वागतां वितनुम: शतकेन ।।1।। शिल्पशास्त्र के रचयिता, धीमान् ब्राह्मण, महर्षि विश्वकर्मा के आविर्भाव का इन 100 संस्कृत श्लोकों द्वारा स्वागत करता हैं। (क) रतोद्धता वृत्तम् प्रक्रियां रचियता रथोद्धतां येन वेदविदुषा विजन्मना । शिल्पतल्यमविकल्पि कल्पितं विश्वकर्मविबुधं तमीड्महे ।।2।। वेद् के विद्वान् जिस ब्राह्मण ने स्थादि निर्माण की प्रक्रिया को रचते हुए असंदिग्ध शिल्पशास्त्र को प्रकट क्या है, उस विश्वकर्मा धीमान् की हम स्तुति करते है। शिल्पिनां प्रियतमेन धीमात् ब्राह्मणेन भुवि विश्वकर्मणा । यन्नृणामुपकृतं ब्रह्त्तम् तं महर्षिननिशं स्तुवीमहं ।।3।। समस्त शिल्पियों के प्यारे धीमान् विश्वकर्मा ने संसार में जो मनुष्यों का बहुत भारी उपकार किया है, उसके लिऐ हम उस महर्षि का हर समय स्तुति करते है। यस्त नाम भुवने महद् यशो भौंवनस्य बहुश: प्रकाशते । तत्प्रशस्ति मधिकृत्य संस्कृतुं विश्वकर्मसतकं निबध्यते ।।4।। जिस भुवन के पुत्र (रक्षक) भौवन विश्वकर्मा का बहुत यशस्वी नाम संसार में प्रकाशित है उसकी प्रशंसा के निमित यह संस्कृत श्लोकों में ‘विश्वकर्मशतकम्’ नामक लघु ग्रथं बनाया जाता है। (उपजाति वृत्तम) ब्रह्माण्डमूलं प्रथमो विघाता स विश्वकर्मा परमेश्वरो स्ति । वेदानुकूलं जगतः स्वशक्तृया सृष्टि स्थिति संह्रतिमातेमानोति ।।5।। प्रथम बाह्मण का मूल, विधान करने वाला विश्वकर्मा परमेश्वर है जो अपनी शक्ति से वेदानुकूल जगत् की उत्पत्ति और प्रलय करता है। उत्पादयामास या आदिशिल्पी वर्णान् यशास्वं गुणकर्मयुक्तान् । विशिष्टलोकव्यवहारहेतूनृ सब्राह्मानृ क्षत्रियवैसश्य शूद्रान ।।6।। जिस आदि शिल्पी ने अपने-अपने गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो को विशेष लोक व्यवहार की सिद्ध के लिए बनाया है। समस्तमेतद् भुवनं स देवः कर्मपधानं रचयन् समन्नात् । चेष्टाभिरिष्टामि स्नल्प शिल्पत्रिया विशौषाहनिह तन्तनोति ।।7।। वह देव इस समस्त विश्व को सब और से कर्म प्रधान बनाता हुआ अपनी चेष्टाओं से बहुत बंडी शिल्प क्रियाओं को फैला रहा है। तपस्विनः संयमिनः पुरा ये ख्यार्ति गताः कर्मणि कौशलेन । तेषा समेषामपि कर्म मुख्यं मतं स्वतो जीवनयापनाय ।।8।। जो पहले तपस्वी सयंमी लोग अपनी कर्म कुशलता से प्रसिद्धि को प्राप्त हुए है, उन सबने भी अपना जीवनयापन करने के लिए कर्म को ही मुख्य माना है। शुभानि कर्माणि सदैव शतं समाः साधु जिजीविषेन्ना । एतद् यजुर्वेद्वचः प्रमाणं मत्वा क्रियाशिल्पविदेह भव्यम् ।।9।। मनुष्य इस संसार में सदा श्राम कर्म करता हुआ ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखें। इस यजुर्वेद के वचन को प्रमाण मानकर शिल्रक्रिया का जानकर होना चाहिए। संसिद्धिमाप्ताः खलु कर्मणैव लोके प्रसिद्धा जानकादयोपि । तस्माद् बुधैः कर्मर्यवित्त्यै स विश्वकर्मा प्रभुरेषणीयः ।।10।। लोक मे प्रसिद्ध जनक आदि राजर्षि भी कर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। इसलिए विद्वान् लोगो को कर्म का रहस्य जानने के लिए उस विश्वकर्मा प्रभु की उपासना करनी चाहिए। ज्येष्ठं परं ब्रह्म विराड् महेशस्त्वष्टा जगद्योनिरचिन्त्यशक्तिः। विश्वस्य धाता भगवान् पुराणः स विश्वकर्मा प्रभुरर्चनीयः।।11।। सबसे बडा, ज्येष्ठ ब्रह्म, विराट् शक्तिसंपन्न, महेश्वर, शिल्प रचना करने वाला, जगत् का कारण, अलैकिक सामर्थ्यशाली, विश्व का धाता, भगवान पुरातन वह विश्वकर्मा प्रभु पूजनीय है। यः शिल्पिमुख्यः प्रमुरीश्वरः स क्वचितृ कदाचिन्न विनाशमेति । सर्वत्रगं ज्योतिरिदं तदीयं, तस्यैव भासा सकलं विभाति ।।12।। जो शिल्पियों में मुख्य प्रभु ईश्वर है वह कहीम पर कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। सर्वत्र उसी की यह ज्योति फैली हुई है। उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होता है। पुरःसरोsसौं समवर्तताग्रे समग्रसंसारमजीनच्च । अनल्पशिल्पेन बुधोन तेन प्रवर्तिता सृष्टिरयं पुराणी ।।13।। वह सबका अग्रणी पहले विद्यमान था। सारे संसार को उसी ने बनाया। बहुत बडे शिल्प वाले उसी विद्वान की चलाई हुई यह पुरातन सृष्टि चल रही है। होता पिता नः स इमान् समस्तांकल्लोकान् गुरूत्वात सतत बिर्भाति। उपाददानो निजशिल्पवित्तं प्रैर्णोन्महिम्ना प्रथमच्छद्न्यान् ।।14।। वह हमारा पालन पिता, हवन करले वाला, पुकारने वाला योग्य, अपने गौरव से उन समस्त लोकों का पालन-पोषण करता है। अपने शिल्प धान को लेकर निजमहिमा से अन्यों को ढक देता है। सबसे सबको ढकने वाला वही देव है। अन्तर्निविष्टो भुवनेषु गूढं से प्रौढि स प्रौढनिविष्टभारः । जगद् विचित्रं तनुते स्वशिल्पचक्रेन विचाल्यमानम् ।।15।। क्योंकि वह देव अन्यों से अशक्य सब दुष्कर शुभकर्मो के करता है इसलिए अर्थातनुकूल ‘विश्वकर्मा’ इस उत्तम सज्ञां को धारण करके शोभित हो रहा है। इंमा स भूमि जनयन् विशालां द्यो चापि सद्यः कृतशिल्पविद्य । आरम्भणे तन्निजमाययैव स्वयं ह
्मधिष्ठानमपि न्यामान्त्सीत् ।।16।। स्वंय शीघ्र विद्या का निर्माण करना वाले उस देव ने इस विशाल भूमि और द्युलोक को पैदा किया। उसके आधार तथा निर्माण साधान को भी ऩिज माया से ही उसने बनाया। किं स्वितृ वनं ततजजततृ क्व स वृक्ष आसीद् यतो भुवं द्या त विस्ततक्ष। मनीषिणोsद्यापि विचारयन्ति प्रत्युत्तंर तस्य नचाप्नुवन्ति ।।17।। वह कौन-सा वन तथा उश वन में कहां वह वृक्ष था जिसने उसने द्योलोक भूलोक का निर्माण किया। विचारशील लोग आज भी इस बात का विचार करते है किन्तु उसका जवाह नहीं मिलता । सप्तर्षिमुख्यः स महान महर्षि स्वयं स्वधामान्याखिलानि वेद । मर्धभिषिक्तो रविचन्द्रताराग्रहादिसृष्टयास्ति विचित्रमूर्तिः ।।18।। वह महान् महर्षि सप्तर्षियों में मुख्य है। स्वयं अपने धामो को जानता है। तब का शिरोमणि, सूर्य चन्द्र तारागणदि की सृष्टि से विचित्र मूर्ति वाला है। मुग्धा भवामोsस्य जगद् विसृष्टि मुहुर्लोचनलोभनीयाम् । स एव भूरि प्रथितोsत्र सूरिरस्माकमूरी कुरूतान् प्रशस्तिम् ।।19।। आंखो को लुभाने वाली उस देव की विचित्र सृष्टि को देखकर हम लोग मुग्ध होते हैं। वहीं विद्वान इस संसार मे प्रसिद्ध है । हमारी की हुई भारी प्रशंसा को स्वीकार करें। पुरोsस्य देवस्य दिवस्पृथिव्यो नन्नम्यमाने इव समविभातः। स्तब्धो भयादुद्धिजमानरूपे उभे अतनद्रे निजकर्माणि स्तः ।।20।। इस देव के सामने द्युलोक और झुके हुए से दिखते है। निश्चल भय से मानो कापतें हुए दोंनों अपने काम में जागरूक है। द्रष्टा तटस्थो जडचेतनस्य मधये विराजत्यविलिप्तरूपः। स देव एवेतरदेवनाम्नामाम्नाममुच्चैश्चरितेन धत्ते ।।21।। वह देव तटस्थ द्रष्टा बना हुआ जडं और चेतन के मध्य में अलिप्तरूप से रहता है। अपने ऊचे चरित्र बल से सब अन्य देवताओं के नामों को धारण करता है। सर्वाः समस्या भुवि यस्य पार्श्वे गता अयत्नेन समाहिताः स्युः । प्रकृष्टसंतुष्टिसुखस्य दाता स विश्वकर्मास्तु सदा नमस्यः ।।22।। जिस देव कैंसे इस अद्भुत सृष्टि को बनाता है और कैसे उसका पालन करता है, जिज्ञासु लोग उसको इस महिमा को जताने के लिए ही उससे प्राप्त शिल्प विद्या का विस्तार करतें हैं । कथ स सृष्टिः रचयत्यपूर्वा कथं च तत्पालनमातनोति । जिज्ञासवस्तन्महिमामेते तच्छिल्पिनः शिल्पमनल्पयन्ति ।।23।। वह देव कैसे इस अद्भुत सुष्टि को बनाता है और कैसे उसका पालन करता है, जिज्ञासु लोग उसको इस महिमा को जताने के लिए ही उससे प्राप्त शिल्प विद्या का विस्तार करतें है। सूक्ष्माच्च सूक्ष्मः स परात् परेस्ति विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । सुशिल्पविज्ञाननिधि तमेव श्री विश्वकर्माण स्तवीमि ।।24।। वह देव सूक्ष्म और परे से परे हैं । विश्व भुवन का कर्मा और रक्षक हौं। सुन्दर शिल्पविद्या के निधि उस विश्वकर्मा देव की मैं स्तुति करता हूँ। सम्यड् न, ज्ञातुममी समर्था देवा मनुष्या असुराश्च सर्वे । अन्तःस्थितो यश्व सदा समेषां तं विश्वकर्माणमहं स्तवीमि ।।25।। जिस देव को देव, असुर, मनुष्य में सब ठीक तरह से जानन् में असमर्थ हैं। जो सदा सबके अदंर स्थित हैं बस विश्वकर्मा देव की में स्तुति करता हूँ। अज्ञानिनो ज्ञत्रामिमानवन्तो निरर्गलं वाचमुदीरयन्ति । यं तत्तवते नव विदुस्तन्व श्री विश्वकर्माणमहं स्तवीमि ।।26।। ज्ञाता का अभइमान रखने वाले अज्ञानी लोग जिस देव को यशआवत् नहीं जानते। व्यर्थ वाणी बोलते हैं। उस विश्वकर्मा देव की मैं स्तुति करता हूँ। जना यथार्थप्रविवेकशून्य मुधौ व वाचो ग्लपयन्ति परिमन्। देवं तमन्तः प्रधिधानदृश्यमं श्री विश्वकर्माणमहे स्तवीमि ।।27।। यथार्थ विचार से शून्य लोग जिस देव के विषय में व्यर्थ वाणी का प्रयोग करते हॆ। अन्तःसमाधि से देखने योग्य उस विश्वकर्मा देव को मै स्तुति करता हूँ। यस्तात् पूरा किचनं नैवज्ञातं यः सर्वमेतजनयत्यज्जस्त्रम् । प्रजापतिः स्वप्रजया समेतो ज्योतिस्वयं द्योतयते स एव।।28।। जिस देव से पहले कुछ भी नहीं जिसने यह सब निरतंर प्रवाह से उत्पन्न किया। वह प्रजापति विश्वकर्मा देव अपनी प्रजा के साथ वर्तमान हुआ अग्नि, विद्युत और सूर्य इन तीनों ज्योतियों को चमकाता हैं। प्राणादिमिः वोडशमिः कलाभिर्विभक्तरूपास्य विभाति शक्तिः। अमुं शुभे कर्मणि योजयन्तं श्रीविश्वकर्माणमहं स्तवीमि ।।29।। प्राण श्रद्धा आदि 16 कलाओं में विभक्त जिस देव की शक्ति प्रकट होती है। शुभ कर्म में लगाने वाले उस विश्वकर्मा देव की मैं स्तुति करता हूँ। आकारहीनोsप्यथ निर्विकारो गुणेः समेतापि स निर्गुणोस्ति। कल्याणिनस्तस्य महेश्वरस्य कुर्वे प्रणामान् वहुशोsभिरामान् ।।30।। यह देव निराकार तथा निर्विकार है। सगुण होकर भी निर्गुण है। कल्याणकारी उस महान् ईश्वर विश्वकर्मा को मै. बहुत सुंदर प्रमाण करता हूँ। स जीवमात्राय तदीयकर्म-फलोपभोगं क्रमंशः प्रदास्यन् । सृजन विसृष्टि बहाता विचित्र सम्राट स्वयं राजति विश्वकर्मा ।।31।। वह विश्वकर्मा देव जीवमात्र के उसके कर्माफलानुसार क्रम से भोग देने के लिए इस विचित्र सृष्टि को बना
ता है। इसका स्वंय सम्रांट होकर विराजता है। पर्याप्तकामस्य शिवस्य तस्य प्रेयान स्वभावोsयमिहाविरस्ति । एको बहु स्यामहमित्यमीप्यन् स्वललिया क्रीडति विश्वमध्ये ।।32।। सब कामनाओं से पूर्ण उस शिव देव का यह प्रिय स्वभाव यहां प्रकट होता है कि वह अपनी लीला से एक होता हुआ भी अनेक हो जाऊं यह सोचकर विश्व में क्रीडा करता है। तस्योपचारात् तदपत्यामादौ शरीरधारी कुशलस्तपस्वी । शिल्पक्रियाकाण्डविशेषविज्ञः पुमानपि स्यादिह विश्वकर्मा ।।33।। उस देव के उपलक्षण से उसको आदिम सतांन, कुशल, तपस्वी, शिल्पशास्त्र का विशेष विद्वान, देहधारी पुरूष भी विश्वकर्मा कहाता है। मन्त्रर्थदृश्वा स ऋषिः प्रसिद्धः पवित्रसस्कारविशेषयुक्तः। धीमान् द्विजन्मा भुवि शिल्पिवंशप्रवर्तकः कीर्तिमितो महात्मा ।।34।। पवित्र संस्कारों वाला वह विश्वकर्मा मनुष्य प्रसिद्ध मन्त्रार्थ द्रष्टा ऋषि हुआ है। जो महात्मा धीमान् ब्राह्मण होकर शिल्पियों के वशं का प्रर्वतक माना गया। त्वष्टा सुधन्वा मय आर्यशिल्पी ब्रह्माथ विष्णुः स सदाशिवोस्ति । तस्यैव नामानि शुभानि यानि स्मरामि, पुण्यार्थमंह हि तानि ।।35।। वही विश्वकर्मा त्वष्टा, सुधन्वा, मय, आदि शिल्पी, ब्रह्म,विष्णु, सदाशिव आदि शुभ नाम वाला है, मैं पुण्यार्थ उसके नामों का स्मरण करता हूँ। यद् दृश्यते किंचिदपि त्रिलोक्यांचित्रं विचिंत्र च पदार्थजातम् । विमानयन्त्राचंल वा तद् विश्वकर्मेव ससजं सर्वम् ।।36।। तीनों लोकों में जो कुछ भी विमान यत्रं आदि चल अचल, चित्र, विचित्र पदार्थ नजर आता है वह सब विश्वकर्मा का ही बनाया हुआ है। ततोधित्रज्ञे स्थकास्कर्म यानादिनिर्माणकला च साक्षात् । आयार्यभावे भजमान आस्ते स्थापत्यशिल्पेपि स निर्विकल्पनम् ।।37।। उसी विश्वकर्मा से काष्ठ शिल्पियों का काम उत्पन्न हुआ। यान आदि के बनाने की कला भी साक्षात उसी से पैदा हुई। वहीं असांदिग्धरूप रूप से स्थापत्य एवं गृहनिर्माणदि कला का भी आचार्य है। मतः पुरो देवपुरोहितोsसौ बृहस्पतिः सूर्य उदह्रतश्च। धीमान् महान् वक्तृतमोर्ध्यळआस्त्रेन्यरूपि विश्वस्य च सूत्रधारः ।।38।। वह विश्वकर्मा पहला देवों का पुरोहित है वही बृहस्पति, सूर्यहै। धीमाने अर्थशास्त्र का महान् वक्ता और विश्व का सूत्रधार शिल्पी भी वही है। ऋषिस्वंय सप्तसु मुख्य उक्तः स्वयं वसिष्ठदिषु पुण्यवत्यु । प्रंशंसयामास च शिल्पिवर्ग जगत्प्रभुः सेवकधर्मक्त्वत ।।39।। वह वसिष्ठदि सातों पुण्यवान् ऋषियों में मुख्य है। सेवक धर्म का महत्व देने वाले उसने जगत् में शिल्पियों के कार्य को प्रससिंत बनाया है। दैवज्ञमन्वादिभिरात्मभूतैर्विशुद्धचितैः स्वसुतैरूदातेः। अनारतं लोकहिताय भूप। प्रावीवृतद् वसंमसौ निजाशम् ।।40।। दैवज्ञ, मनु आदि अपने शुद्ध चित्त उदात्त पुत्रों द्वारा उस विश्वकर्मा ने विरतंर लोक हित के लिए अपने वशं को चलाया। तदाननै पन्चभिरेव जाता द्विजातयः पशञ्ञ च सत्नगाद्या । शिल्पक्रियामायां परमप्रवीण गतोघ्हभूनाख्यऋषि प्रसिद्धिम् ।।41।। उस विश्वकर्मा के पांच मुखों से पांच सल्ग आदि द्विज पैदा हुए। जिन्होनें शिल्पक्रिया में अतिनिपुण होकर सब प्रकार से लोकहित किया। लोहस्य कर्माकृत सत्नगस्तु सनातनश्चातत दारूकर्म । स्वर्णादिनिर्माणकलाप्रवीणो गतोघ्हभूनाख्याऋषि प्रसिद्धिम् ।।42।। विश्वकर्मा के पांच पुत्र सनग न लोहें का काम, सनातन ने लकडीं का काम किया। अहभून ऋषि सोने चांदी बनाने की कला में प्रसिद्ध हुए। प्रत्नस्तु विश्वस्य हिते रतोघ्भूत समस्तशिल्पाधिपतिर्मनीषी । सुपर्णसज्ञंश्च महर्षिरासीत् स्वामी किरीटादिविभूषणानाम् ।।43।। विश्वकर्मा के पुत्र प्रत्न ने विश्व कल्याण के लिए सभी शिल्पों को आधिपत्य स्वीकार किया। सुपर्ण ऋर्षि किरीट आदि घडने का स्वामी बना।
श्री विश्वकर्मा वंशावली
जैसे राम् कृष्णा आदि ईश्वर के अनेक अवतार पुराणों में वर्णन किये गये है, वैसे ही विश्वकर्मा भगवान के अवतारों का वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड में महादेव जी ने पार्वती जी से कहा है कि हे पार्वती मैं आप से पाप नाशक कथा कहता हूं। इसी कथा में महादेव जी ने पार्वती जी को विश्वकर्मेश्वर लिगं प्रकट होने की कथा कहते हुए त्वष्टा प्रजापति के पुत्र के संबंध में कहाः
प्रथम अवतार
विश्वकर्माSभवत्पूर्व ब्रह्मण स्त्वपराSतनुः । त्वष्ट्रः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्व कर्मस ।।
अर्थः प्रत्यक्ष आदि ब्रह्मा विश्वकर्मा त्वष्टा प्रजापति का पुत्र पहले उत्पन्न हुआ और वह सब कामों मे निपुण था।
दूसरा अवतार
स्कन्द पुराण प्रभास खंड सोमनाथ माहात्म्य सोम पुत्र संवाद में विश्वकर्मा के दूसरे अवतार का वर्णन इस भातिं मिलता है। ईश्वर उचावः
शिल्पोत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि श्रृणु षण्मुख यत्नतः । विश्वकर्माSभवत्पूर्व शिल्पिनां शिव कर्मणाम् ।।
मदंगेषु च सभूंताः पुत्रा पंच जटाधराः । हस्त कौशल संपूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।
एक समय कैलाश पर्वत पर शिवजी, पार्वती, गणपति आदि सब बैठे थे उस समय स्कन्दजी ने गणपतिजी के रत्नजडित दातों और पार्वती जी के जवाहरात से जडें हुए जेवरों को देखकर प्रश्न किया कि, हे पार्वतीनाथ, आप यह बताने की कृपा करे कि ये हीरे जवाहरात चमकिले पदार्थो किसने निर्मित किये? इसके उत्तर में भोलानाथ शंकर ने कहा कि शिल्पियों के अधिपति श्री विश्वकर्मा की उत्पति सुनो। शिल्प के प्रवर्त्तक विश्वकर्मा पांच मुखों से पांच जटाधरी पुत्र उत्पन्न हुए जिन के नाम मनु, मय, शिल्प,त्वष्टा, दैवेज्ञ थे। यह पांचों पुत्र ब्रह्मा की उपासना में सदा लगें रहतें थे इत्यादि।
तीसरा अवतार
आर्दव वसु प्रभास नामक को अंगिरा की पुत्री बृहस्पति जी की बहिन योगसिद्ध विवाही गई और अष्टम वसु प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम विश्वकर्मा हुआ जो शिल्प प्रजापति कहलाया इसका वर्णन वायुपुराण अ.22 उत्तर भाग में दिया हैः
बृहस्पतेस्तु भगिनो वरस्त्री ब्रह्मचारिणी । योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता चरते सदा ।।
प्रभासस्य तु सा भार्या वसु नामष्ट मस्य तु । विश्वकर्मा सुत स्तस्यां जातः शिल्प प्रजापतिः ।।
मत्स्य पुराण अ.5 में भी लिखा हैः
विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्प प्रजापतिः । प्रसाद भवनोद्यान प्रतिमा भूषणादिषु । तडागा राम कूप्रेषु स्मृतः सोमSवर्धकी ।।
अर्थः प्रभास का पुत्र शिल्प प्रजापति विश्वकर्मा देव, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब, बावडी और कुएं निर्माण करने देव आचार्य थे।
आदित्य पुराण में भी कहा है किः
विश्वकर्मा प्रभासस्य धर्मस्थः पातु स ततः ।।
महाभारत आदि पर्व विष्णु पुराण औरं भागवत में भी इसका उल्लेख किया गया है।
विश्वकर्मा ऋषि
विश्वकर्मा नाम के ऋषि भी हुए है। विद्वानों को इसका पूरा पता है कि ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त दिया हुआ है, और इस सूक्त में 14 ऋचायें है इस सूक्त का देवता विश्वकर्मा है और मंत्र दृष्टा ऋषि विश्वकर्मा है। विश्वकर्मा सूक्त 14 उल्लेख इसी ग्रन्थ विश्वकर्मा-विजय प्रकाश में दिया है। 14 सूक्त मंत्र और अर्थ भावार्थ सब लिखे दिये है। पाठक इसी पुस्तक में देखे लेंवे। य़इमा विश्वा भुवनानि इत्यादि से सूक्त प्रारम्भ होता है यजुर्वेद 4/3/4/3 विश्वकर्मा ते ऋषि इस प्रमाण से विश्वकर्मा को होना सिद्ध है इत्यादि। पाठकगण। वेदों और पुराणों के अनेक प्रमाणों से हम विश्वकर्मा को परमात्मा परमपिता जगतपिर्त्ता, सृष्टि कर चुके तथा विश्वकर्मा के अवतारों को भी पुराणों से बता चुके है। अब भी कोई हटधमीं करें तो हमारे पास उनका इलाज करने का तरीका भी है। इन टकापन्थी भोजन भट्टों ने बहुत धूर्तता की है। विश्वकर्मा देव की अवेहलना करने से ही इस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे है। न इनके पास खुद की उत्पत्ति है यह टकशाली ब्राह्मण यह देख पद्म पुराण के वचनों पर तनिक ध्यान नहीं देते, देखों कितना साफ कहा है। अर्थ विष्णु और विश्वकर्मा में कोई भेद नही।
विश्वकर्मा अनेक नामों से विभूषित
जगतकर्ता विश्वकर्मा भौवन विश्वकर्मा, ऋषि विश्वकर्मा धर्म ग्रंन्थों में अनेक अवतरण आये है। विषय अनेकानेक नामॆ में बटा हुआ है विश्वकर्मा ब्राह्मण कर्म है, अर्थात विश्वकर्मा सन्तान कहने का दावा करने वाले तथा अपने को पांचाल शिल्पी ब्राह्मण बताने वाले खरे ब्राह्मण है। यहां हम धर्मग्रन्थों के प्रमामों को देकर अन्त में ग्रथों के आधार पर भृगु, अंगिरा, मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ आदि की वंशावली भी सप्रमाण दिखायेंगे।
प्राचीन धर्म शास्त्रों में
शिल्पज्ञ, विश्वकर्मा ब्राह्मणों को रथकार वर्धकी, एतब कवि, मोयावी, पाँचाल, रथपति, सुहस्त सौर और परासर आदि शब्दों में सम्बोधित किया गया था। उस समय आजकल के सामान लोहाकारों, काष्ठकारों और स्वर्णकारों आदि सभी के अलग-अलग सहस्त्रों जाति
जैसे राम् कृष्णा आदि ईश्वर के अनेक अवतार पुराणों में वर्णन किये गये है, वैसे ही विश्वकर्मा भगवान के अवतारों का वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड में महादेव जी ने पार्वती जी से कहा है कि हे पार्वती मैं आप से पाप नाशक कथा कहता हूं। इसी कथा में महादेव जी ने पार्वती जी को विश्वकर्मेश्वर लिगं प्रकट होने की कथा कहते हुए त्वष्टा प्रजापति के पुत्र के संबंध में कहाः
प्रथम अवतार
विश्वकर्माSभवत्पूर्व ब्रह्मण स्त्वपराSतनुः । त्वष्ट्रः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्व कर्मस ।।
अर्थः प्रत्यक्ष आदि ब्रह्मा विश्वकर्मा त्वष्टा प्रजापति का पुत्र पहले उत्पन्न हुआ और वह सब कामों मे निपुण था।
दूसरा अवतार
स्कन्द पुराण प्रभास खंड सोमनाथ माहात्म्य सोम पुत्र संवाद में विश्वकर्मा के दूसरे अवतार का वर्णन इस भातिं मिलता है। ईश्वर उचावः
शिल्पोत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि श्रृणु षण्मुख यत्नतः । विश्वकर्माSभवत्पूर्व शिल्पिनां शिव कर्मणाम् ।।
मदंगेषु च सभूंताः पुत्रा पंच जटाधराः । हस्त कौशल संपूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।
एक समय कैलाश पर्वत पर शिवजी, पार्वती, गणपति आदि सब बैठे थे उस समय स्कन्दजी ने गणपतिजी के रत्नजडित दातों और पार्वती जी के जवाहरात से जडें हुए जेवरों को देखकर प्रश्न किया कि, हे पार्वतीनाथ, आप यह बताने की कृपा करे कि ये हीरे जवाहरात चमकिले पदार्थो किसने निर्मित किये? इसके उत्तर में भोलानाथ शंकर ने कहा कि शिल्पियों के अधिपति श्री विश्वकर्मा की उत्पति सुनो। शिल्प के प्रवर्त्तक विश्वकर्मा पांच मुखों से पांच जटाधरी पुत्र उत्पन्न हुए जिन के नाम मनु, मय, शिल्प,त्वष्टा, दैवेज्ञ थे। यह पांचों पुत्र ब्रह्मा की उपासना में सदा लगें रहतें थे इत्यादि।
तीसरा अवतार
आर्दव वसु प्रभास नामक को अंगिरा की पुत्री बृहस्पति जी की बहिन योगसिद्ध विवाही गई और अष्टम वसु प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम विश्वकर्मा हुआ जो शिल्प प्रजापति कहलाया इसका वर्णन वायुपुराण अ.22 उत्तर भाग में दिया हैः
बृहस्पतेस्तु भगिनो वरस्त्री ब्रह्मचारिणी । योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता चरते सदा ।।
प्रभासस्य तु सा भार्या वसु नामष्ट मस्य तु । विश्वकर्मा सुत स्तस्यां जातः शिल्प प्रजापतिः ।।
मत्स्य पुराण अ.5 में भी लिखा हैः
विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्प प्रजापतिः । प्रसाद भवनोद्यान प्रतिमा भूषणादिषु । तडागा राम कूप्रेषु स्मृतः सोमSवर्धकी ।।
अर्थः प्रभास का पुत्र शिल्प प्रजापति विश्वकर्मा देव, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब, बावडी और कुएं निर्माण करने देव आचार्य थे।
आदित्य पुराण में भी कहा है किः
विश्वकर्मा प्रभासस्य धर्मस्थः पातु स ततः ।।
महाभारत आदि पर्व विष्णु पुराण औरं भागवत में भी इसका उल्लेख किया गया है।
विश्वकर्मा ऋषि
विश्वकर्मा नाम के ऋषि भी हुए है। विद्वानों को इसका पूरा पता है कि ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त दिया हुआ है, और इस सूक्त में 14 ऋचायें है इस सूक्त का देवता विश्वकर्मा है और मंत्र दृष्टा ऋषि विश्वकर्मा है। विश्वकर्मा सूक्त 14 उल्लेख इसी ग्रन्थ विश्वकर्मा-विजय प्रकाश में दिया है। 14 सूक्त मंत्र और अर्थ भावार्थ सब लिखे दिये है। पाठक इसी पुस्तक में देखे लेंवे। य़इमा विश्वा भुवनानि इत्यादि से सूक्त प्रारम्भ होता है यजुर्वेद 4/3/4/3 विश्वकर्मा ते ऋषि इस प्रमाण से विश्वकर्मा को होना सिद्ध है इत्यादि। पाठकगण। वेदों और पुराणों के अनेक प्रमाणों से हम विश्वकर्मा को परमात्मा परमपिता जगतपिर्त्ता, सृष्टि कर चुके तथा विश्वकर्मा के अवतारों को भी पुराणों से बता चुके है। अब भी कोई हटधमीं करें तो हमारे पास उनका इलाज करने का तरीका भी है। इन टकापन्थी भोजन भट्टों ने बहुत धूर्तता की है। विश्वकर्मा देव की अवेहलना करने से ही इस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे है। न इनके पास खुद की उत्पत्ति है यह टकशाली ब्राह्मण यह देख पद्म पुराण के वचनों पर तनिक ध्यान नहीं देते, देखों कितना साफ कहा है। अर्थ विष्णु और विश्वकर्मा में कोई भेद नही।
विश्वकर्मा अनेक नामों से विभूषित
जगतकर्ता विश्वकर्मा भौवन विश्वकर्मा, ऋषि विश्वकर्मा धर्म ग्रंन्थों में अनेक अवतरण आये है। विषय अनेकानेक नामॆ में बटा हुआ है विश्वकर्मा ब्राह्मण कर्म है, अर्थात विश्वकर्मा सन्तान कहने का दावा करने वाले तथा अपने को पांचाल शिल्पी ब्राह्मण बताने वाले खरे ब्राह्मण है। यहां हम धर्मग्रन्थों के प्रमामों को देकर अन्त में ग्रथों के आधार पर भृगु, अंगिरा, मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ आदि की वंशावली भी सप्रमाण दिखायेंगे।
प्राचीन धर्म शास्त्रों में
शिल्पज्ञ, विश्वकर्मा ब्राह्मणों को रथकार वर्धकी, एतब कवि, मोयावी, पाँचाल, रथपति, सुहस्त सौर और परासर आदि शब्दों में सम्बोधित किया गया था। उस समय आजकल के सामान लोहाकारों, काष्ठकारों और स्वर्णकारों आदि सभी के अलग-अलग सहस्त्रों जाति
भेद नहीं थे। प्राचीन समय में शिल्प कर्म बहुत उंचा समझा जाता था, क्योंकि धर्मग्रंथों की खोज में हमें पता चलता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों ही वर्ण रथ कर्म अर्थात शिल्प कर्म करतें थे। हम यहां विश्वकर्मा ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्य विषयक कुछ प्रमाण देने से पूर्व यह उचित समझते है कि रथकार, पाचांल, नाराशस इत्यादि शब्दों के विषय में कुछ थोडा समजझा दें। जिससे आगे को जो धर्म शास्त्रों के प्रमाण हम दिखायेंगे उनमें जब इन शब्दों में से कोई आवे तो हमारे पाठकों को समझने में कठिनाई न पडें।
रथकार
यह शब्द प्राचीन धर्मग्रन्थों में अनेक स्थलों पर आया है, और उनकें शिल्पी ब्राह्मण के स्थान में प्रयोग हुआ है। अर्थात लोककार, काष्टकार, स्वर्णकार, सिलावट और ताम्रकार सब ही काम करने वाले कुशल प्रवीण शिल्पी ब्राह्मण का बोध केवल रथकार शब्द से ही कराया गया है, और यही शब्दों वेदों तथा पुराणों में भी शिल्पज्ञ ब्राह्मणों के लिए लिखा गया है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 6 में रथकार शब्द का प्रयोग हुआ हैः
सद्योजाता दि पंचभ्यो मुखेभ्यः पंच निर्भये ।। विश्वकर्मा सुता होते रथ कारास्तु पचं च ।।
तास्मिन् काले महाभागो परमो मय रुप भाक् ।। पाषणदार कंटकं सौ वर्ण दशकं तदा ।।
काष्ठं च नव लोहानि रथ कृद्यों ददौ विभुः ।। रथ कारास्तदा चक्रुः पचं कृत्यानि सर्वदा ।।
षडदशनाद्य नुष्ठानं षट् कर्मनिरताश्च ये ।।
अर्थः शंकर बोले कि हे स्कंन्द, सद्योजात् वामदेव, तत्पुरूष, अधीर और ईशान यह पांच ब्रह्म सज्ञंक विश्वकर्मा के पांच मुखों से पैदा हुए। इन विश्वकर्मा पुत्रों की रथकार सज्ञां है। अनेक रूप धारण करने वाले उस विश्वकर्मा ने अपने पुत्रों को टांकी आदि दस शिल्प आयुध अर्थात दस औजार सोना आदि नौ धातु लोहा, लकडीं आत्यादि दिया। उसके यह षटेकर्म करने वाले रथकार सृष्टि कार्य के पंचनिध पवित्र कर्म करने लगे।
रथकार शब्द क ब्राह्मण सूचक होने के विषय में व्याकरण में भी अष्टाध्यायी पाणिनि सूत्र पाठ सूत्र - शिल्पिनि चा कुत्रः 6/2/76 सज्ञांयांच 6/2/77
सिद्धांत कौमुदी वृतिः- शिल्पि वाचिनि समासे अष्णते ।
परे पूर्व माद्युदात्तं, स चेदण कृत्रः परो न भवति ।
ततुंवायः शिल्पिनि किम- काडंलाव, अकृत्रः किं-कुम्भकारः ।
सज्ञां यांच अणयते परे तंतुवायो नाम कृमिः ।
अकृत्रः इत्येव रथकारों नाम ब्राह्मणः पाणिनिसूत्र 4/1-151 कृर्वादिभ्योण्यः ।
ब्राह्मण जाति सूचक अर्थ को बताने वाले जो गोत्र शब्द गण सूत्र में दियें है, वह यह हैः कुरू, गर्ग, मगुंष, अजमार, ऱथकार, बाबदूक, कवि, मति, काधिजल इत्यादि, कौरव्यां, ब्राह्मणा, मार्ग्य, मांगुयाः आजमार्याः राथकार्याः वावद्क्याः कात्या मात्याः कापिजल्याः ब्राह्मणाः इति सर्वत्र।
तात्पर्य यह है कि व्याकरण शास्त्र में भी रथकार शब्द को आर्य गोत्र, ब्राह्मण जाति बोधक सिद्ध किया हुआ है और उसका उदाहरण भी रथकारों नाम ब्राह्मण दिया है। जिससे सिद्ध किया गया है कि रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है क्योकिं- रथं करोतिं इति रथकारः। अर्थात रथ निर्माण करने वाले ब्राह्मण का बोध प्राचीन ग्रथों में रथकार शब्द से होता है। यहां यह भी लिख देना जरूरी जान पडतां है कि स्मृतियों में रथकार एक संकीर्ण जाति को भी लिखा है, परन्तु जहां पवित्र देव शिल्प आदि का वर्णन आता है।वहां शिल्पी ब्राह्मण संतति रथकार का ही मतलब होता है। आपको रतकार विषय में शास्त्र के मन्त्र और रथकार का प्राचीन समय में जो मान, समान्न प्रतिष्ठा थी उस समय विश्वकर्मा का रथकार रूप विस्तृत था। राजे महाराजा सभी विश्वकर्मा रथकारों को आदर देते थे क्योंकि कलाकार राष्ट्रं के निर्माण करने मे अग्रसर रखतें थे यह ब्राह्मण वर्ग रथकारों में था।
पांचाल
रथकार शब्द के विषय के नमूने के तौर पर ऊपर उदाहरण देकर बता चुके है। अब इसी भातिं एक दो उदाहरण पांचाल शब्द के विषय में भी देकर बतावेंगे कि विश्वकर्मा ब्राह्मणों को प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पांचाल भी कहा गया है। बराह पुराण में कहा हैः
पांचाल ब्राह्मणेति हासः कथं ।। तत्र सुवर्णालंकार वाणिज्यों प जीविनः पांचाल ब्राह्मणा ।।
शैवागम में कहा हैः
पंचालाना च सर्वेषामा चारोSप्य़थ गीयते । षट् कर्म विनिर्मित्यनी पचांलाना स्मुतानिच ।।
रूद्रयामल वास्तु तन्त्र में शिवाजी महाराज ने कहा किः
शिवा मनुमंय स्त्वष्टा तक्षा शिल्पी च पंचमः ।। विश्वकर्मसुता नेतान् विद्धि प्रवर्तकान् ।।
एतेषां पुत्र पौत्राणामप्येते शिल्पिनो भूवि ।। पंचालानां च सर्वेषां शाखास्याच्छौन कायनो ।।
पंचालास्ते सदा पूज्याः प्रतिमा विश्वकर्मणः ।। रूद्रवामल वास्तु तन्त्र व्रत्यादि ।।
उपरोक्त प्रमाणों में पाचांल शब्द का प्रयोग विश्वकर्माके स्थान में किया गया है। अर्थात् रथकार और पांचाल दोनों शब्द विश्वकर्मा ब्राह्मण बोधक ही है।
स्थापत्य
यज्ञ कर्म और देव कर्म संबंधी कर्म में कहीं कहीं विश्वकर्मा पाचांल ब्राह्मण की सज्ञां स्थापत्य भी कही गई है।
रथकार
यह शब्द प्राचीन धर्मग्रन्थों में अनेक स्थलों पर आया है, और उनकें शिल्पी ब्राह्मण के स्थान में प्रयोग हुआ है। अर्थात लोककार, काष्टकार, स्वर्णकार, सिलावट और ताम्रकार सब ही काम करने वाले कुशल प्रवीण शिल्पी ब्राह्मण का बोध केवल रथकार शब्द से ही कराया गया है, और यही शब्दों वेदों तथा पुराणों में भी शिल्पज्ञ ब्राह्मणों के लिए लिखा गया है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 6 में रथकार शब्द का प्रयोग हुआ हैः
सद्योजाता दि पंचभ्यो मुखेभ्यः पंच निर्भये ।। विश्वकर्मा सुता होते रथ कारास्तु पचं च ।।
तास्मिन् काले महाभागो परमो मय रुप भाक् ।। पाषणदार कंटकं सौ वर्ण दशकं तदा ।।
काष्ठं च नव लोहानि रथ कृद्यों ददौ विभुः ।। रथ कारास्तदा चक्रुः पचं कृत्यानि सर्वदा ।।
षडदशनाद्य नुष्ठानं षट् कर्मनिरताश्च ये ।।
अर्थः शंकर बोले कि हे स्कंन्द, सद्योजात् वामदेव, तत्पुरूष, अधीर और ईशान यह पांच ब्रह्म सज्ञंक विश्वकर्मा के पांच मुखों से पैदा हुए। इन विश्वकर्मा पुत्रों की रथकार सज्ञां है। अनेक रूप धारण करने वाले उस विश्वकर्मा ने अपने पुत्रों को टांकी आदि दस शिल्प आयुध अर्थात दस औजार सोना आदि नौ धातु लोहा, लकडीं आत्यादि दिया। उसके यह षटेकर्म करने वाले रथकार सृष्टि कार्य के पंचनिध पवित्र कर्म करने लगे।
रथकार शब्द क ब्राह्मण सूचक होने के विषय में व्याकरण में भी अष्टाध्यायी पाणिनि सूत्र पाठ सूत्र - शिल्पिनि चा कुत्रः 6/2/76 सज्ञांयांच 6/2/77
सिद्धांत कौमुदी वृतिः- शिल्पि वाचिनि समासे अष्णते ।
परे पूर्व माद्युदात्तं, स चेदण कृत्रः परो न भवति ।
ततुंवायः शिल्पिनि किम- काडंलाव, अकृत्रः किं-कुम्भकारः ।
सज्ञां यांच अणयते परे तंतुवायो नाम कृमिः ।
अकृत्रः इत्येव रथकारों नाम ब्राह्मणः पाणिनिसूत्र 4/1-151 कृर्वादिभ्योण्यः ।
ब्राह्मण जाति सूचक अर्थ को बताने वाले जो गोत्र शब्द गण सूत्र में दियें है, वह यह हैः कुरू, गर्ग, मगुंष, अजमार, ऱथकार, बाबदूक, कवि, मति, काधिजल इत्यादि, कौरव्यां, ब्राह्मणा, मार्ग्य, मांगुयाः आजमार्याः राथकार्याः वावद्क्याः कात्या मात्याः कापिजल्याः ब्राह्मणाः इति सर्वत्र।
तात्पर्य यह है कि व्याकरण शास्त्र में भी रथकार शब्द को आर्य गोत्र, ब्राह्मण जाति बोधक सिद्ध किया हुआ है और उसका उदाहरण भी रथकारों नाम ब्राह्मण दिया है। जिससे सिद्ध किया गया है कि रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है क्योकिं- रथं करोतिं इति रथकारः। अर्थात रथ निर्माण करने वाले ब्राह्मण का बोध प्राचीन ग्रथों में रथकार शब्द से होता है। यहां यह भी लिख देना जरूरी जान पडतां है कि स्मृतियों में रथकार एक संकीर्ण जाति को भी लिखा है, परन्तु जहां पवित्र देव शिल्प आदि का वर्णन आता है।वहां शिल्पी ब्राह्मण संतति रथकार का ही मतलब होता है। आपको रतकार विषय में शास्त्र के मन्त्र और रथकार का प्राचीन समय में जो मान, समान्न प्रतिष्ठा थी उस समय विश्वकर्मा का रथकार रूप विस्तृत था। राजे महाराजा सभी विश्वकर्मा रथकारों को आदर देते थे क्योंकि कलाकार राष्ट्रं के निर्माण करने मे अग्रसर रखतें थे यह ब्राह्मण वर्ग रथकारों में था।
पांचाल
रथकार शब्द के विषय के नमूने के तौर पर ऊपर उदाहरण देकर बता चुके है। अब इसी भातिं एक दो उदाहरण पांचाल शब्द के विषय में भी देकर बतावेंगे कि विश्वकर्मा ब्राह्मणों को प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पांचाल भी कहा गया है। बराह पुराण में कहा हैः
पांचाल ब्राह्मणेति हासः कथं ।। तत्र सुवर्णालंकार वाणिज्यों प जीविनः पांचाल ब्राह्मणा ।।
शैवागम में कहा हैः
पंचालाना च सर्वेषामा चारोSप्य़थ गीयते । षट् कर्म विनिर्मित्यनी पचांलाना स्मुतानिच ।।
रूद्रयामल वास्तु तन्त्र में शिवाजी महाराज ने कहा किः
शिवा मनुमंय स्त्वष्टा तक्षा शिल्पी च पंचमः ।। विश्वकर्मसुता नेतान् विद्धि प्रवर्तकान् ।।
एतेषां पुत्र पौत्राणामप्येते शिल्पिनो भूवि ।। पंचालानां च सर्वेषां शाखास्याच्छौन कायनो ।।
पंचालास्ते सदा पूज्याः प्रतिमा विश्वकर्मणः ।। रूद्रवामल वास्तु तन्त्र व्रत्यादि ।।
उपरोक्त प्रमाणों में पाचांल शब्द का प्रयोग विश्वकर्माके स्थान में किया गया है। अर्थात् रथकार और पांचाल दोनों शब्द विश्वकर्मा ब्राह्मण बोधक ही है।
स्थापत्य
यज्ञ कर्म और देव कर्म संबंधी कर्म में कहीं कहीं विश्वकर्मा पाचांल ब्राह्मण की सज्ञां स्थापत्य भी कही गई है।
जैसे भागवत स्कन्द 3 में स्थापत्य विश्वकर्म शास्त्र लिखा है, इसका यही अर्थ है कि यज्ञ सम्बधी और देव संबधी पवित्र शिल्प कर्म करने वाले विश्वकर्मा सन्तान ब्राह्मण है। इसकी पुष्टि अमर कोष के प्रमाण से भी होती है।
देखो - अमर कोष अ. ब्रह्मवर्ग - सगींष्प तोष्टय्या स्थपतिः
अर्थः बृहस्पति सज्ञंक इष्ट अर्थात् बृहस्पति सज्ञां वाले यह कर्म करने वाले बृहस्पति गुरू को कहते है और दूसरे बृहस्पति विश्व-कर्म कुलोत्पन्न शिल्पाचार्य हुए है।
नाराशंस
अंगिरा महर्षि को ऋग्वेद में नाराशंस कहा है इसका प्रमाण ऋग्वेद अ. 8/2/1 मे देखो - नराः अगिंरसः महर्षयः मनुष्य जाता वुत्पन्नत्वात् ते शंस्यते इति नाराशंसः।
बौधायन श्रौत् सूत्र के महा प्रवराध्याय में भी लिखा है - वसिष्ट शुनिकात्रि भृगु कण्व वाघ्रश्चाधूल राजन्य वैश्य इति नाराशंसः ।।
गोत्र प्रवर दर्पण में भी यह शब्द पाया जाता है - भृगु गणे त्वष्टयाः अग्ने नाराशंसान् व्याख्या स्यामः। वशिष्ठ शुनकात्रिभृगु काण्व बाघ्रश्चाधूल इति ।।
नाराशंस शब्द पितर सज्ञां में भी प्रयुक्त हुआ है। देखो ऋग्देव अध्याय 8/1/16/3 - मनोन्वा हुवामुहे नाराशंसेन सोमेने ।।
भाष्य - नरेः शस्यते इति नाराशंसः पितरः ।।
आश्वलायन श्रौत सूत्र में भी नाराशंस का प्रयोग मिलता है। देखो सूत्र 5/6/30 - आप्यायिताश्चिमतान् सादयंति ते नाराशंस भवति ।।
उपरोक्त अनेक प्रमाण हमने रथकार पांचाल, रथापत्य और नाराशंस शब्दों के प्रयोग को जिखाकर यह सिद्ध किया हा कि यह सब जहां कही भी धर्म ग्रन्थों में भी लिखे गये है। वहा वह शिल्पी ब्राह्मणों के बोधक है। अब आगे हम यह सिद्ध करके दिखोयेगें कि विश्वकर्मा वंश के ब्राह्मण होने के और भी अनेक प्रमाण सनातनी धर्म ग्रन्थों मे खोजने से मिले सकते है। उपरोक्त ऱथकार, पांचाल, रथकार, नाराशंस यह सब स्तंभ प्रमाण सग्रंह अर्थात विश्वकर्म - ब्राह्मण - भास्कर से संग्रहीत किए है। यह पुस्कत स्वः जयकृष्ण मणिठिया, शर्मा, गुरूदेव की सग्रंहीत है जिसे विश्वकर्मा-विजय-प्रकाश में कई स्तम्भ संग्रहीत कर प्रकाशित किये है।
भृगु ऋषि कुल
वायु पुराण अध्याय 4 के पढने से यह बात सिद्ध हो जाती है कि वास्तव में विश्वकर्मा सन्तान भृगु ऋषि कुल उत्पन्न है देखों लिखा हैः
भार्ये भृगोर प्रतिमे उत्तमेSभिजाते शुभे ।। हिरण्य कशिपोः कन्या दिव्यनाम्नी परिश्रुता ।।
पुलोम्नश्चापि पौलोमि दुहिता वर वर्णिनी ।। भृगोस्त्वजनयद्विव्या काव्यवेदविंदा वरं ।।
देवा सुराणामाचार्य शुक्रं कविसुंत ग्रहं ।। पितृंणा मानसी कन्या सोमपाना य़शस्विनी ।।
शुक्रस्य भार्यागीराम विजये चतुरः सुतान् ।। ब्राह्मणे मानसी कन्या सोमपाना यशस्विनीः ।।
तस्या मेव तु चत्वार पुत्राः शुक्रस्य जज्ञिर ।। त्वष्टावरूपी द्वावेतौ शण्डामर्कोतु ताबुभो ।।
ते तदादित्य सकाया ब्रह्मकल्पा प्रभावतः ।।
अर्थः हिरण्यकश्यप की बेटी दिव्या और पुलोमी की बेटी पौलीमी उत्तम कुलीन, यह दोनों मृग ऋषि को विवाही गई। दिव्या नाम वाली स्त्री के गर्भ से शुक्राचार्य पैदा हुए। सोम्य पितरों की मानसी कन्या अगीं नाम वाली शुक्राचार्य को विवाही गई। शुक्राचार्य जी के सूर्य के समान ब्रह्म तेज वाले त्वष्टा, वस्त्र, शंड और अर्मक यह पुत्र पैदा हुए, इन चारो मे त्वष्टा ब्रह्म तेज से विशेष सुक्त था । अर्थात त्वष्टा में ब्रह्म तेज अधिक था। पाठक गण इससे स्पष्ट है कि त्वष्टा भृगु कुल मे पैदा हुआ और ब्राह्मण था, ब्राह्म तेज की विशे,ता ब्राह्मणत्व को साफ बता रही है। अब इसी कुल में त्वष्टा से विश्वकर्मा का जन्म सुनों।
त्रिशिरा विश्वरूपस्तु त्वष्टाः पुत्राय भवताम् ।। विस्वरूपानुजश्चापि विश्वकर्मा प्रजापतिः ।।
अर्थः त्वष्टा प्रजापति के त्रिशिरा जिसका नाम विश्वरूप था बडा पराक्रमी औऱ उसका भाई विस्वकर्मा प्रपति यह दो पुत्र इसी विश्वकर्मा प्रजपति के विषय में स्कन्द पुराण रे प्रभास खंड में यह लिखा है।
विश्वकर्म महदभूतं विश्वकर्माणाम् मदंगेषु च सम्भूताः ।। पुत्रा पचं जटाधराः हस्त कौशल सम्पूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।
अर्थः शिल्पियों में विश्वकर्मा बडा महान हुआ, जिसके पांच जटाधारी पुत्र हुए। इन्ही विश्वकर्मा के पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ का वायु पुराण अध्याय, 4 में उल्लेख किया हुआ है इन्हीं पाचं पुत्रों की सतांन जो हुई वह सब भृगु कुलोत्पन्न विश्व-ब्राह्मण या पांचाल ब्राह्मण कहलाई।
पाठकगण ध्यान दें कि उपरोक्त विदित वंश बिलकुल साफ-सुथरा और खरा है। इसमें कोई अण्ड-बण्ड ऐसी उत्पत्ति नहीं है। जैसा कि इस पुस्तक की भूमिका में हम अकसाली ब्राह्मणों की उत्पत्ति जाति भास्कर और ब्राह्मणोंत्पत्ति मार्तण्ड के अधार पर दिखा चुके है। पाठको की जानकारी के लिए हम यहां भृगु कुल में उत्पन्न हुए सब ही ऋषियों का उत्पत्ति क्रमानुसार दिखाते है।
इस कुल में भृगु, च्यवन, दिवोदास और गृत्समद और शौनक यह वेद मत्रं के द्रष्टा हुए है।
भृगुः ब्रह्मदेव का मानस पुत्र
देखो - अमर कोष अ. ब्रह्मवर्ग - सगींष्प तोष्टय्या स्थपतिः
अर्थः बृहस्पति सज्ञंक इष्ट अर्थात् बृहस्पति सज्ञां वाले यह कर्म करने वाले बृहस्पति गुरू को कहते है और दूसरे बृहस्पति विश्व-कर्म कुलोत्पन्न शिल्पाचार्य हुए है।
नाराशंस
अंगिरा महर्षि को ऋग्वेद में नाराशंस कहा है इसका प्रमाण ऋग्वेद अ. 8/2/1 मे देखो - नराः अगिंरसः महर्षयः मनुष्य जाता वुत्पन्नत्वात् ते शंस्यते इति नाराशंसः।
बौधायन श्रौत् सूत्र के महा प्रवराध्याय में भी लिखा है - वसिष्ट शुनिकात्रि भृगु कण्व वाघ्रश्चाधूल राजन्य वैश्य इति नाराशंसः ।।
गोत्र प्रवर दर्पण में भी यह शब्द पाया जाता है - भृगु गणे त्वष्टयाः अग्ने नाराशंसान् व्याख्या स्यामः। वशिष्ठ शुनकात्रिभृगु काण्व बाघ्रश्चाधूल इति ।।
नाराशंस शब्द पितर सज्ञां में भी प्रयुक्त हुआ है। देखो ऋग्देव अध्याय 8/1/16/3 - मनोन्वा हुवामुहे नाराशंसेन सोमेने ।।
भाष्य - नरेः शस्यते इति नाराशंसः पितरः ।।
आश्वलायन श्रौत सूत्र में भी नाराशंस का प्रयोग मिलता है। देखो सूत्र 5/6/30 - आप्यायिताश्चिमतान् सादयंति ते नाराशंस भवति ।।
उपरोक्त अनेक प्रमाण हमने रथकार पांचाल, रथापत्य और नाराशंस शब्दों के प्रयोग को जिखाकर यह सिद्ध किया हा कि यह सब जहां कही भी धर्म ग्रन्थों में भी लिखे गये है। वहा वह शिल्पी ब्राह्मणों के बोधक है। अब आगे हम यह सिद्ध करके दिखोयेगें कि विश्वकर्मा वंश के ब्राह्मण होने के और भी अनेक प्रमाण सनातनी धर्म ग्रन्थों मे खोजने से मिले सकते है। उपरोक्त ऱथकार, पांचाल, रथकार, नाराशंस यह सब स्तंभ प्रमाण सग्रंह अर्थात विश्वकर्म - ब्राह्मण - भास्कर से संग्रहीत किए है। यह पुस्कत स्वः जयकृष्ण मणिठिया, शर्मा, गुरूदेव की सग्रंहीत है जिसे विश्वकर्मा-विजय-प्रकाश में कई स्तम्भ संग्रहीत कर प्रकाशित किये है।
भृगु ऋषि कुल
वायु पुराण अध्याय 4 के पढने से यह बात सिद्ध हो जाती है कि वास्तव में विश्वकर्मा सन्तान भृगु ऋषि कुल उत्पन्न है देखों लिखा हैः
भार्ये भृगोर प्रतिमे उत्तमेSभिजाते शुभे ।। हिरण्य कशिपोः कन्या दिव्यनाम्नी परिश्रुता ।।
पुलोम्नश्चापि पौलोमि दुहिता वर वर्णिनी ।। भृगोस्त्वजनयद्विव्या काव्यवेदविंदा वरं ।।
देवा सुराणामाचार्य शुक्रं कविसुंत ग्रहं ।। पितृंणा मानसी कन्या सोमपाना य़शस्विनी ।।
शुक्रस्य भार्यागीराम विजये चतुरः सुतान् ।। ब्राह्मणे मानसी कन्या सोमपाना यशस्विनीः ।।
तस्या मेव तु चत्वार पुत्राः शुक्रस्य जज्ञिर ।। त्वष्टावरूपी द्वावेतौ शण्डामर्कोतु ताबुभो ।।
ते तदादित्य सकाया ब्रह्मकल्पा प्रभावतः ।।
अर्थः हिरण्यकश्यप की बेटी दिव्या और पुलोमी की बेटी पौलीमी उत्तम कुलीन, यह दोनों मृग ऋषि को विवाही गई। दिव्या नाम वाली स्त्री के गर्भ से शुक्राचार्य पैदा हुए। सोम्य पितरों की मानसी कन्या अगीं नाम वाली शुक्राचार्य को विवाही गई। शुक्राचार्य जी के सूर्य के समान ब्रह्म तेज वाले त्वष्टा, वस्त्र, शंड और अर्मक यह पुत्र पैदा हुए, इन चारो मे त्वष्टा ब्रह्म तेज से विशेष सुक्त था । अर्थात त्वष्टा में ब्रह्म तेज अधिक था। पाठक गण इससे स्पष्ट है कि त्वष्टा भृगु कुल मे पैदा हुआ और ब्राह्मण था, ब्राह्म तेज की विशे,ता ब्राह्मणत्व को साफ बता रही है। अब इसी कुल में त्वष्टा से विश्वकर्मा का जन्म सुनों।
त्रिशिरा विश्वरूपस्तु त्वष्टाः पुत्राय भवताम् ।। विस्वरूपानुजश्चापि विश्वकर्मा प्रजापतिः ।।
अर्थः त्वष्टा प्रजापति के त्रिशिरा जिसका नाम विश्वरूप था बडा पराक्रमी औऱ उसका भाई विस्वकर्मा प्रपति यह दो पुत्र इसी विश्वकर्मा प्रजपति के विषय में स्कन्द पुराण रे प्रभास खंड में यह लिखा है।
विश्वकर्म महदभूतं विश्वकर्माणाम् मदंगेषु च सम्भूताः ।। पुत्रा पचं जटाधराः हस्त कौशल सम्पूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।
अर्थः शिल्पियों में विश्वकर्मा बडा महान हुआ, जिसके पांच जटाधारी पुत्र हुए। इन्ही विश्वकर्मा के पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ का वायु पुराण अध्याय, 4 में उल्लेख किया हुआ है इन्हीं पाचं पुत्रों की सतांन जो हुई वह सब भृगु कुलोत्पन्न विश्व-ब्राह्मण या पांचाल ब्राह्मण कहलाई।
पाठकगण ध्यान दें कि उपरोक्त विदित वंश बिलकुल साफ-सुथरा और खरा है। इसमें कोई अण्ड-बण्ड ऐसी उत्पत्ति नहीं है। जैसा कि इस पुस्तक की भूमिका में हम अकसाली ब्राह्मणों की उत्पत्ति जाति भास्कर और ब्राह्मणोंत्पत्ति मार्तण्ड के अधार पर दिखा चुके है। पाठको की जानकारी के लिए हम यहां भृगु कुल में उत्पन्न हुए सब ही ऋषियों का उत्पत्ति क्रमानुसार दिखाते है।
इस कुल में भृगु, च्यवन, दिवोदास और गृत्समद और शौनक यह वेद मत्रं के द्रष्टा हुए है।
भृगुः ब्रह्मदेव का मानस पुत्र
क् शाप से मर गये तब ब्रह्मदेव ने उनको फिर उत्पन्न किया और वह वरूण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न हुए और वरूण ने इनको अपना पुत्र ग्रहण किया। इसी कारण यह वारूणी भृगु के नाम से प्रसिद्ध हुए। विशेष जिसे देखना हो वायुपुत्र अ. 4 मत्स्य पुराण अ.252 महाभारत अनुशासन पर्व अ.85 निरूक्त दैवज्ञ कांड भाग पृ. 193 औऱ भारत वर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में देख सकतें है।
भार्गवः भृगु ऋषि के पुत्र सुक्राचार्य का ही नाम भार्गव है।यह देवों और दत्यों के दोनों के ही पुरोहित अर्तात् आचार्य थे। इन्होंने शिल्प शास्त्र का ओशनस नामक ग्रंथ भी लिखा है। वायु पुराण और बृहत्संहिता अ.50 में विशेष रूप से देख सकतें हैं।
त्वष्टाः शुक्राचार्य के चार पुत्रों में सें थे। इनमें अधिक ब्रह्मतेज था। विश्वरूप और विश्वकर्माइनके दो पुत्र थे।
शौनकः यह शुनक ऋषि के पुत्र और ऋग्वेद के द्रष्टा ऋषि थे। पांचालो की शौन कायनी शाखा इन्हीं से चली है।
उपरोक्त सब ही ऋषि शिल्प कार्य करते थे। गोत्र प्रवर दीपिका में इस भृगु कुल के गोत्र प्रवर इस प्रकार दिये है।
भृगु ऋषि - भार्गव, च्यवन,, देवो दासेति।
वाध्न्यस्वा - भार्गव, वाध्न्यश्वा, देवो दासेति।
भार्गव - भार्गव, त्वष्टा, विश्वरूपेति।
वाधूल - भार्गव, वैतहव्य,सावेतसेति।
शुनक - शौनक, भार्गव, शौन हौत्र गार्त्समदप्ति।
किसी किसी ग्रन्थकार जैसे बोधयन नामक सूत्रकार ने वरिष्ठ शुनक अत्रि, भृगु, कण्व, वाध्न्यश्वा, वाधूल,यह गोत्र बी नाराशंस पांचालों के आर्षेय गोत्र लिखे है।
केवल आंगिरस कुल के प्रसिद्ध ऋषि
उपरोक्त अगिंरा वशांवली दी गई है, यह प्रमाण-सग्रंह से उधृत है। अगिंरा ऋषि ब्रह्मा, के मुख से उत्पन्न हुय़े। इनका वर्णन वेद, ब्राह्मण ग्रथं, श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत और सभी पुराणों में उल्लेख है। अगिंरा कुल परम श्रेष्ठ कुल है।
अंगिरा
अंगिरा ऋषि के विषय में मत्स्य पुराण, भागवत, वायु पुराण महाभारत और भारतवर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में वर्णन किया गया है। मत्स्य पुराण में अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति अग्नि से कही गई है। भागवत का कथन है कि अंगिरा जी ब्रह्मा के मुख से यज्ञ हेतु उत्पन्न हुए। महाभारत अनु पर्व अध्याय 83 में कहा गया है कि अग्नि से महा यशस्वी अंगिरा भृगु आदि प्रजापति ब्रह्मदेव है। ऋग्वेद 10-14-6 मे कहा है किः
अमगिरासों नः पितरो नवग्वा अर्थर्वाणो भृगबः सोम्यासः। तेषां वयं सुभतौं यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसः स्यामः।।
अर्थः जिसके कुल में भरद्वाज, गौतम और अनेक महापुरूष उत्पन्न हुए ऐसे जो अग्नि के पुत्र महर्षि अंगिरा बडे भारी विद्वान हुए है उनके वशं को सुनों। अंगिरस देव धनुष और बाण धारी थे, उनको ऋषि मारीच की बेटी सुरूपा व कर्दम ऋषि की बेटी स्वराट् और मनु ऋषि कन्या पथ्या यह तीनों विवाही गई। सुरूमा के गर्भ से बृहस्पति, स्वराट् से गौतम, प्रबंध, वामदेव उतथ्य और उशिर यह पांछ पुत्र जन्में, पथ्या के गर्भ से विष्णु संवर्त, विचित, अयास्य असिज, दीर्घतमा, सुधन्वा यह सात पुत्र उत्पन्न हुए। उतथ्य ऋषि से शरद्वान, वामदेव से बृहदुकथ्य उत्पन्न हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र ऱथकार में बडें कुशल देवता थे, तो भी इनकी गणना ऋषियों में की गई है। बृहस्पति का पुत्र महा य़शस्वी भरद्वाज हुआ, यह सब अंगिरा भृगु आदि द्व शिल्प के निर्माण वाले रथकार नाम से प्रसिद्ध हुए। इसमे स्पष्ट सिद्ध हो गया की प्राचीन काल में शिल्पी ब्राह्मणों रथकार भी कहा करते थे और रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है,इस विषय में हम पूर्व पर रथकार शब्द को व्याकरण की कसौटि पर कसकर ब्राह्मण बोधक सिद्ध कर चुके है।
महाभारत अमुसाशन पर्व अध्याय पर्व अध्याय 83 में अंगिरा ऋषि के आठ पुत्रों की आग्नेय सज्ञां होने के विषय में यह उल्लेख हैः
अष्टौ चांगिरसः पुत्राः आग्नेयास्तेSप्युवाह्रताः। बृहस्पतिरूतथ्यश्य पयस्यः शांतिरेवच। धोरो विरूपः संर्वतः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः।
भार्गवः भृगु ऋषि के पुत्र सुक्राचार्य का ही नाम भार्गव है।यह देवों और दत्यों के दोनों के ही पुरोहित अर्तात् आचार्य थे। इन्होंने शिल्प शास्त्र का ओशनस नामक ग्रंथ भी लिखा है। वायु पुराण और बृहत्संहिता अ.50 में विशेष रूप से देख सकतें हैं।
त्वष्टाः शुक्राचार्य के चार पुत्रों में सें थे। इनमें अधिक ब्रह्मतेज था। विश्वरूप और विश्वकर्माइनके दो पुत्र थे।
शौनकः यह शुनक ऋषि के पुत्र और ऋग्वेद के द्रष्टा ऋषि थे। पांचालो की शौन कायनी शाखा इन्हीं से चली है।
उपरोक्त सब ही ऋषि शिल्प कार्य करते थे। गोत्र प्रवर दीपिका में इस भृगु कुल के गोत्र प्रवर इस प्रकार दिये है।
भृगु ऋषि - भार्गव, च्यवन,, देवो दासेति।
वाध्न्यस्वा - भार्गव, वाध्न्यश्वा, देवो दासेति।
भार्गव - भार्गव, त्वष्टा, विश्वरूपेति।
वाधूल - भार्गव, वैतहव्य,सावेतसेति।
शुनक - शौनक, भार्गव, शौन हौत्र गार्त्समदप्ति।
किसी किसी ग्रन्थकार जैसे बोधयन नामक सूत्रकार ने वरिष्ठ शुनक अत्रि, भृगु, कण्व, वाध्न्यश्वा, वाधूल,यह गोत्र बी नाराशंस पांचालों के आर्षेय गोत्र लिखे है।
केवल आंगिरस कुल के प्रसिद्ध ऋषि
उपरोक्त अगिंरा वशांवली दी गई है, यह प्रमाण-सग्रंह से उधृत है। अगिंरा ऋषि ब्रह्मा, के मुख से उत्पन्न हुय़े। इनका वर्णन वेद, ब्राह्मण ग्रथं, श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत और सभी पुराणों में उल्लेख है। अगिंरा कुल परम श्रेष्ठ कुल है।
अंगिरा
अंगिरा ऋषि के विषय में मत्स्य पुराण, भागवत, वायु पुराण महाभारत और भारतवर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में वर्णन किया गया है। मत्स्य पुराण में अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति अग्नि से कही गई है। भागवत का कथन है कि अंगिरा जी ब्रह्मा के मुख से यज्ञ हेतु उत्पन्न हुए। महाभारत अनु पर्व अध्याय 83 में कहा गया है कि अग्नि से महा यशस्वी अंगिरा भृगु आदि प्रजापति ब्रह्मदेव है। ऋग्वेद 10-14-6 मे कहा है किः
अमगिरासों नः पितरो नवग्वा अर्थर्वाणो भृगबः सोम्यासः। तेषां वयं सुभतौं यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसः स्यामः।।
अर्थः जिसके कुल में भरद्वाज, गौतम और अनेक महापुरूष उत्पन्न हुए ऐसे जो अग्नि के पुत्र महर्षि अंगिरा बडे भारी विद्वान हुए है उनके वशं को सुनों। अंगिरस देव धनुष और बाण धारी थे, उनको ऋषि मारीच की बेटी सुरूपा व कर्दम ऋषि की बेटी स्वराट् और मनु ऋषि कन्या पथ्या यह तीनों विवाही गई। सुरूमा के गर्भ से बृहस्पति, स्वराट् से गौतम, प्रबंध, वामदेव उतथ्य और उशिर यह पांछ पुत्र जन्में, पथ्या के गर्भ से विष्णु संवर्त, विचित, अयास्य असिज, दीर्घतमा, सुधन्वा यह सात पुत्र उत्पन्न हुए। उतथ्य ऋषि से शरद्वान, वामदेव से बृहदुकथ्य उत्पन्न हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र ऱथकार में बडें कुशल देवता थे, तो भी इनकी गणना ऋषियों में की गई है। बृहस्पति का पुत्र महा य़शस्वी भरद्वाज हुआ, यह सब अंगिरा भृगु आदि द्व शिल्प के निर्माण वाले रथकार नाम से प्रसिद्ध हुए। इसमे स्पष्ट सिद्ध हो गया की प्राचीन काल में शिल्पी ब्राह्मणों रथकार भी कहा करते थे और रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है,इस विषय में हम पूर्व पर रथकार शब्द को व्याकरण की कसौटि पर कसकर ब्राह्मण बोधक सिद्ध कर चुके है।
महाभारत अमुसाशन पर्व अध्याय पर्व अध्याय 83 में अंगिरा ऋषि के आठ पुत्रों की आग्नेय सज्ञां होने के विषय में यह उल्लेख हैः
अष्टौ चांगिरसः पुत्राः आग्नेयास्तेSप्युवाह्रताः। बृहस्पतिरूतथ्यश्य पयस्यः शांतिरेवच। धोरो विरूपः संर्वतः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः।