बालाघाट में 10 साल तक सरकारी नौकरी करता रहा फर्जी डिग्री वाला डॉक्टर
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से फर्जी डिग्री के सहारे सरकारी नौकरी करने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बिरसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात रहे डॉ. सुनील सिंह की एमबीबीएस डिग्री फर्जी पाई गई है। उन्होंने अपनी डिग्री रीवा के अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से प्राप्त होने का दावा किया था। स्वास्थ्य विभाग की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद आरोपी डॉक्टर के खिलाफ बिरसा थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। 9 अक्टूबर को इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश जारी हुए थे। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघन सिंह दाहिया की पुष्टि के बाद बीएमओ ने मामला दर्ज कराया। एसपी आदित्य मिश्रा ने भी इसकी पुष्टि की है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब बिरसा क्षेत्र में 32 बच्चों की मौत का मामला पहले से चर्चा में है। इस प्रकरण में हाईकोर्ट में याचिका दायर है और सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है।
#BalaghatNews #FakeDoctor #MadhyaPradesh #MedicalFraud #MPNews
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से फर्जी डिग्री के सहारे सरकारी नौकरी करने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बिरसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात रहे डॉ. सुनील सिंह की एमबीबीएस डिग्री फर्जी पाई गई है। उन्होंने अपनी डिग्री रीवा के अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से प्राप्त होने का दावा किया था। स्वास्थ्य विभाग की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद आरोपी डॉक्टर के खिलाफ बिरसा थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। 9 अक्टूबर को इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश जारी हुए थे। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघन सिंह दाहिया की पुष्टि के बाद बीएमओ ने मामला दर्ज कराया। एसपी आदित्य मिश्रा ने भी इसकी पुष्टि की है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब बिरसा क्षेत्र में 32 बच्चों की मौत का मामला पहले से चर्चा में है। इस प्रकरण में हाईकोर्ट में याचिका दायर है और सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है।
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सिंधिया के शाही महल में कहीं जीरो तो कहीं सिर्फ 2 यूनिट बिजली की खपत, द सूत्र का बड़ा खुलासा!
#JaiVilasPalace #JyotiradityaScindia #ElectricityBill
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The Vaccine 💉💉War - नाना पाटेकर |
नाना पाटेकर फिट थे, हट्टा-कट्टा, उम्र चाहे 75 थी लेकिन एकदम फिट..फ़िर भी उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट से हुई क्यूंकि उन्होंने कोविड वैक्सीन की 2💉💉 ली थी!
गिलोय के फायदे को जाने विस्तार से 👇👇
नाना पाटेकर फिट थे, हट्टा-कट्टा, उम्र चाहे 75 थी लेकिन एकदम फिट..फ़िर भी उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट से हुई क्यूंकि उन्होंने कोविड वैक्सीन की 2💉💉 ली थी!
गिलोय के फायदे को जाने विस्तार से 👇👇
गिलोय (वैज्ञानिक नाम: टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया, जिसे गुडुची या अमृता भी कहा जाता है) एक बेहद गुणकारी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है।
गिलोय के प्रमुख फायदे
रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाना: गिलोय एंटी-ऑक्सीडेंट और पॉलीसेकेराइड्स से भरपूर होती है, जो शरीर की इम्युनिटी को मजबूत करती है।
बुखार में फायदेमंद: इसमें प्राकृतिक ज्वरनाशक (Antipyretic) गुण होते हैं। यह डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार के दौरान शरीर का तापमान नियंत्रित रखने में मदद करती है।
पाचन तंत्र में सुधार: यह पाचन क्रिया को दुरुस्त रखती है और कब्ज, गैस, एसिडिटी तथा पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत दिलाती है।
डायबीटीज़ (मधुमेह) में सहायक: गिलोय रक्त शर्करा (Blood Sugar) के स्तर को नियंत्रित करने में मददगार मानी जाती है।
सूजन और गठिया में राहत: इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-अर्थराइटिक गुण होते हैं, जो जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों की सूजन को कम करते हैं।
सांस और लिवर के लिए गुणकारी: यह लिवर को डिटॉक्स करने, खांसी-जुकाम जैसी श्वसन समस्याओं और शरीर की कमजोरी को दूर करने में उपयोगी है।
मनोज कुमार
गिलोय के प्रमुख फायदे
रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाना: गिलोय एंटी-ऑक्सीडेंट और पॉलीसेकेराइड्स से भरपूर होती है, जो शरीर की इम्युनिटी को मजबूत करती है।
बुखार में फायदेमंद: इसमें प्राकृतिक ज्वरनाशक (Antipyretic) गुण होते हैं। यह डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार के दौरान शरीर का तापमान नियंत्रित रखने में मदद करती है।
पाचन तंत्र में सुधार: यह पाचन क्रिया को दुरुस्त रखती है और कब्ज, गैस, एसिडिटी तथा पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत दिलाती है।
डायबीटीज़ (मधुमेह) में सहायक: गिलोय रक्त शर्करा (Blood Sugar) के स्तर को नियंत्रित करने में मददगार मानी जाती है।
सूजन और गठिया में राहत: इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-अर्थराइटिक गुण होते हैं, जो जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों की सूजन को कम करते हैं।
सांस और लिवर के लिए गुणकारी: यह लिवर को डिटॉक्स करने, खांसी-जुकाम जैसी श्वसन समस्याओं और शरीर की कमजोरी को दूर करने में उपयोगी है।
मनोज कुमार
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🧩 अब सोचिए...
🗳️ जब वोटर लिस्ट में ही लाखों नाम ऐसे जुड़ जाएँ, जिनका कोई ठिकाना नहीं — तो चुनाव किसका होता है?
🏛️ जब जनता सड़कों पर एक मुद्दे के लिए लड़ रही हो, तब पर्दे के पीछे सत्ता का गणित बदला जा रहा हो — तो लोकतंत्र किसका है?
📊 16.18 लाख — यह सिर्फ आंकड़ा नहीं। यह वह संख्या है, जो किसी भी सरकार को बना या बिगाड़ सकती है।
🕵️ नाम झूठे, पते झूठे, ठिकाने झूठे — लेकिन वोट असली। यही सबसे बड़ा सवाल है।
---
⚡ असली चिंता
🧠 जब जनता को प्रोटेस्ट में उलझाया जाता है, तब व्यवस्था चुपचाप अपना खेल पूरा कर लेती है।
📢 आवाज़ उठाना ज़रूरी है — लेकिन आँखें बंद करके नहीं। क्योंकि जिस दिन वोटर लिस्ट ही बदल जाए, उस दिन जनता की आवाज़ का कोई मतलब नहीं रहता।
🔍 सवाल पूछिए, लिस्ट जाँचिए, और अपने वोट का हिसाब रखिए — क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक है, भीड़ नहीं।
---
"जब तक जनता सड़क पर लड़ती रहे, तब तक व्यवस्था कागज़ों पर खेल खेलती रहती है — और यही सबसे बड़ा खतरा है।" 🖤
🗳️ जब वोटर लिस्ट में ही लाखों नाम ऐसे जुड़ जाएँ, जिनका कोई ठिकाना नहीं — तो चुनाव किसका होता है?
🏛️ जब जनता सड़कों पर एक मुद्दे के लिए लड़ रही हो, तब पर्दे के पीछे सत्ता का गणित बदला जा रहा हो — तो लोकतंत्र किसका है?
📊 16.18 लाख — यह सिर्फ आंकड़ा नहीं। यह वह संख्या है, जो किसी भी सरकार को बना या बिगाड़ सकती है।
🕵️ नाम झूठे, पते झूठे, ठिकाने झूठे — लेकिन वोट असली। यही सबसे बड़ा सवाल है।
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⚡ असली चिंता
🧠 जब जनता को प्रोटेस्ट में उलझाया जाता है, तब व्यवस्था चुपचाप अपना खेल पूरा कर लेती है।
📢 आवाज़ उठाना ज़रूरी है — लेकिन आँखें बंद करके नहीं। क्योंकि जिस दिन वोटर लिस्ट ही बदल जाए, उस दिन जनता की आवाज़ का कोई मतलब नहीं रहता।
🔍 सवाल पूछिए, लिस्ट जाँचिए, और अपने वोट का हिसाब रखिए — क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक है, भीड़ नहीं।
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"जब तक जनता सड़क पर लड़ती रहे, तब तक व्यवस्था कागज़ों पर खेल खेलती रहती है — और यही सबसे बड़ा खतरा है।" 🖤
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✦ बीमारी की इंडस्ट्री और कैंसर की परतों के भीतर ✦
हम एक बार फिर बड़ी फार्मा कंपनियों की “बीमारी की इंडस्ट्री” के धोखे को बेनकाब करेंगे। कैंसर कोई बीमारी नहीं है, बल्कि पोषण की कमी, जीवनशैली और EMF रेडिएशन से होने वाला एक मेटाबोलिक लक्षण है। यह शरीर का नैचुरल बचाव तंत्र है, जो तब सक्रिय होता है जब शरीर तनाव, प्रदूषण, केमिकल, भारी धातुओं और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के जहर से घिर जाता है।
कैंसर के पारंपरिक इलाज—कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी—अरबों डॉलर की इंडस्ट्री हैं। अगर लोग जान जाएँ कि खुबानी की गुठली (विटामिन B17 / एमिग्डालिन) से काम चल सकता है, तो फार्मा की कमाई का मुख्य स्रोत सूख जाएगा। प्रकृति से मिलने वाली चीज़ों पर पेटेंट नहीं हो सकता, इसलिए कंपनियाँ सिंथेटिक मॉलिक्यूल को ही “दवा” मानने का कार्टेल चलाती हैं।
✦ विटामिन B17 और पेटेंट की दीवार ✦
विटामिन B17 नैचुरल कंपाउंड है। रिसर्च फंडिंग, यूनिवर्सिटी ग्रांट और मेडिकल सिलेबस पर फार्मा का नियंत्रण है। युवा डॉक्टरों को यही सिखाया जाता है कि इलाज केवल आक्रामक केमिकल और सर्जरी से ही संभव है। नैचुरल तरीकों को गलत बताकर खारिज कर दिया जाता है।
✦ कैंसर—लक्षण या दुश्मन ✦
कैंसर लंबे समय तक विषाक्त पदार्थों, उच्च शुगर और अनसुलझे मानसिक आघात का परिणाम है। ट्यूमर शरीर का बचाव है—विषाक्त पदार्थों को घेरकर महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करना। कैंसर दुश्मन नहीं, असंतुलन का संकेत है। इलाज उन कारणों को हटाने में है जो शरीर को नुकसान पहुँचा रहे हैं—उपवास और सही पोषण।
✦ कीमोथेरेपी की उत्पत्ति ✦
कीमोथेरेपी की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध की मस्टर्ड गैस में हैं। लुई गुडमैन और अल्फ्रेड गिलमैन ने रासायनिक युद्ध एजेंट से इसे विकसित किया। जिनेवा प्रोटोकॉल के बाद हथियार “उपचार” बन गया। कीमोथेरेपी केवल कैंसर कोशिकाओं को नहीं, अस्थि मज्जा, इम्यूनिटी, बाल और प्रजनन क्षमता को भी नष्ट करती है। औसत मरीज पर एक लाख डॉलर से अधिक खर्च। उद्योग हर साल 600 बिलियन डॉलर से ऊपर का है।
✦ रॉकफेलर, फ्लेक्सनर और सैकलर ✦
1910 की फ्लेक्सनर रिपोर्ट (रॉकफेलर-कार्नेगी वित्त पोषित) ने सैकड़ों प्राकृतिक चिकित्सा स्कूल बंद करा दिए। केवल दवा-आधारित इलाज वैध रह गया। 1913 में अमेरिकन कैंसर सोसायटी बनी। 1937 में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट। 1971 में नेशनल कैंसर एक्ट। कैंसर आय का स्रोत बन गया।
आर्थर सैकलर ने डॉक्टरों को सीधे दवा बेचने की मार्केटिंग शुरू की। कीमोथेरेपी को लोकप्रिय बनाया, लिब्रियम-वैलियम का विस्तार किया और बाद में पर्ड्यू फार्मा के जरिए ऑक्सीकॉन्टिन संकट में भूमिका निभाई। डर को फायदे में, स्वास्थ्य को आजीवन उपचार में बदलने का मॉडल खड़ा किया।
✦ सच्चाई की परत ✦
कैंसर असंतुलन का लक्षण है। शरीर खुद को बचाने और ठीक करने की कोशिश कर रहा है। उद्योग इसे प्रबंधित करता है, ठीक नहीं करता। गुलाबी रिबन और जागरूकता अभियान इलाज से ज्यादा प्रबंधन और मुनाफे की कहानी हैं। शरीर बुद्धिमान है। वह अनुकूलन करता है और ठीक होता है—अगर मौका दिया जाए। परतों को पढ़ने वाले ही असली दिशा देख सकते हैं।
हम एक बार फिर बड़ी फार्मा कंपनियों की “बीमारी की इंडस्ट्री” के धोखे को बेनकाब करेंगे। कैंसर कोई बीमारी नहीं है, बल्कि पोषण की कमी, जीवनशैली और EMF रेडिएशन से होने वाला एक मेटाबोलिक लक्षण है। यह शरीर का नैचुरल बचाव तंत्र है, जो तब सक्रिय होता है जब शरीर तनाव, प्रदूषण, केमिकल, भारी धातुओं और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के जहर से घिर जाता है।
कैंसर के पारंपरिक इलाज—कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी—अरबों डॉलर की इंडस्ट्री हैं। अगर लोग जान जाएँ कि खुबानी की गुठली (विटामिन B17 / एमिग्डालिन) से काम चल सकता है, तो फार्मा की कमाई का मुख्य स्रोत सूख जाएगा। प्रकृति से मिलने वाली चीज़ों पर पेटेंट नहीं हो सकता, इसलिए कंपनियाँ सिंथेटिक मॉलिक्यूल को ही “दवा” मानने का कार्टेल चलाती हैं।
✦ विटामिन B17 और पेटेंट की दीवार ✦
विटामिन B17 नैचुरल कंपाउंड है। रिसर्च फंडिंग, यूनिवर्सिटी ग्रांट और मेडिकल सिलेबस पर फार्मा का नियंत्रण है। युवा डॉक्टरों को यही सिखाया जाता है कि इलाज केवल आक्रामक केमिकल और सर्जरी से ही संभव है। नैचुरल तरीकों को गलत बताकर खारिज कर दिया जाता है।
✦ कैंसर—लक्षण या दुश्मन ✦
कैंसर लंबे समय तक विषाक्त पदार्थों, उच्च शुगर और अनसुलझे मानसिक आघात का परिणाम है। ट्यूमर शरीर का बचाव है—विषाक्त पदार्थों को घेरकर महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करना। कैंसर दुश्मन नहीं, असंतुलन का संकेत है। इलाज उन कारणों को हटाने में है जो शरीर को नुकसान पहुँचा रहे हैं—उपवास और सही पोषण।
✦ कीमोथेरेपी की उत्पत्ति ✦
कीमोथेरेपी की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध की मस्टर्ड गैस में हैं। लुई गुडमैन और अल्फ्रेड गिलमैन ने रासायनिक युद्ध एजेंट से इसे विकसित किया। जिनेवा प्रोटोकॉल के बाद हथियार “उपचार” बन गया। कीमोथेरेपी केवल कैंसर कोशिकाओं को नहीं, अस्थि मज्जा, इम्यूनिटी, बाल और प्रजनन क्षमता को भी नष्ट करती है। औसत मरीज पर एक लाख डॉलर से अधिक खर्च। उद्योग हर साल 600 बिलियन डॉलर से ऊपर का है।
✦ रॉकफेलर, फ्लेक्सनर और सैकलर ✦
1910 की फ्लेक्सनर रिपोर्ट (रॉकफेलर-कार्नेगी वित्त पोषित) ने सैकड़ों प्राकृतिक चिकित्सा स्कूल बंद करा दिए। केवल दवा-आधारित इलाज वैध रह गया। 1913 में अमेरिकन कैंसर सोसायटी बनी। 1937 में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट। 1971 में नेशनल कैंसर एक्ट। कैंसर आय का स्रोत बन गया।
आर्थर सैकलर ने डॉक्टरों को सीधे दवा बेचने की मार्केटिंग शुरू की। कीमोथेरेपी को लोकप्रिय बनाया, लिब्रियम-वैलियम का विस्तार किया और बाद में पर्ड्यू फार्मा के जरिए ऑक्सीकॉन्टिन संकट में भूमिका निभाई। डर को फायदे में, स्वास्थ्य को आजीवन उपचार में बदलने का मॉडल खड़ा किया।
✦ सच्चाई की परत ✦
कैंसर असंतुलन का लक्षण है। शरीर खुद को बचाने और ठीक करने की कोशिश कर रहा है। उद्योग इसे प्रबंधित करता है, ठीक नहीं करता। गुलाबी रिबन और जागरूकता अभियान इलाज से ज्यादा प्रबंधन और मुनाफे की कहानी हैं। शरीर बुद्धिमान है। वह अनुकूलन करता है और ठीक होता है—अगर मौका दिया जाए। परतों को पढ़ने वाले ही असली दिशा देख सकते हैं।
रॉकफेलर, फ्लेक्सनर रिपोर्ट और अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन: अमेरिका में पारंपरिक चिकित्सा और होम्योपैथी के बीच विवादास्पद संबंध
https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC12318542/
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रॉकफेलर चाहता है लोग सबसे ज्यादा बीमार हो? - देवेंद्र बल्हारा
MBBS एमबीबीएस - बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी (Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery) अंग्रेजी दवा का सिलेबस रॉकफेलर फाउंडेशन ने बनाया है!
MBBS एमबीबीएस - बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी (Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery) अंग्रेजी दवा का सिलेबस रॉकफेलर फाउंडेशन ने बनाया है!
अखंड भारत 🇮🇳🇮🇳
रॉकफेलर चाहता है लोग सबसे ज्यादा बीमार हो? - देवेंद्र बल्हारा MBBS एमबीबीएस - बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी (Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery) अंग्रेजी दवा का सिलेबस रॉकफेलर फाउंडेशन ने बनाया है!
आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और इसके पाठ्यक्रम (Curriculum) को बदलने में जॉन डी. रॉकफेलर (John D. Rockefeller) और उनके परिवार के परोपकारी योगदान तथा 1910 की फ्लेक्सनर रिपोर्ट (Flexner Report) की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन एमबीबीएस का पाठ्यक्रम सीधे रॉकफेलर ने अकेले नहीं बनाया था।
इतिहास और तथ्यों के अनुसार मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
फ्लेक्सनर रिपोर्ट और रॉकफेलर की भूमिका (1910)
फ्लेक्सनर रिपोर्ट: वर्ष 1910 में अब्राहम फ्लेक्सनर (Abraham Flexner) ने कारनेगी फाउंडेशन के लिए अमेरिका और कनाडा के मेडिकल कॉलेजों पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की थी।
विज्ञान-आधारित मॉडल: इस रिपोर्ट में प्रयोगशाला (Laboratory) और वैज्ञानिक शोध पर आधारित पाठ्यक्रम को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई थी।
रॉकफेलर का वित्तपोषण: यद्यपि यह रिपोर्ट कार्नेगी फाउंडेशन द्वारा कमीशन की गई थी, लेकिन इसकी सिफारिशों को लागू करने और आधुनिक मेडिकल स्कूलों (जैसे जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय) को भारी वित्तीय सहायता देने का काम रॉकफेलर फाउंडेशन और रॉकफेलर परिवार ने किया था।
परिवर्तन: इसके बाद मेडिकल की पढ़ाई को मानकीकृत (Standardized) किया गया, जिसमें पहले विज्ञान/प्रयोगशाला की पढ़ाई और बाद में अस्पतालों में क्लिनिकल प्रशिक्षण का मॉडल अपनाया गया।
इतिहास और तथ्यों के अनुसार मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
फ्लेक्सनर रिपोर्ट और रॉकफेलर की भूमिका (1910)
फ्लेक्सनर रिपोर्ट: वर्ष 1910 में अब्राहम फ्लेक्सनर (Abraham Flexner) ने कारनेगी फाउंडेशन के लिए अमेरिका और कनाडा के मेडिकल कॉलेजों पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की थी।
विज्ञान-आधारित मॉडल: इस रिपोर्ट में प्रयोगशाला (Laboratory) और वैज्ञानिक शोध पर आधारित पाठ्यक्रम को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई थी।
रॉकफेलर का वित्तपोषण: यद्यपि यह रिपोर्ट कार्नेगी फाउंडेशन द्वारा कमीशन की गई थी, लेकिन इसकी सिफारिशों को लागू करने और आधुनिक मेडिकल स्कूलों (जैसे जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय) को भारी वित्तीय सहायता देने का काम रॉकफेलर फाउंडेशन और रॉकफेलर परिवार ने किया था।
परिवर्तन: इसके बाद मेडिकल की पढ़ाई को मानकीकृत (Standardized) किया गया, जिसमें पहले विज्ञान/प्रयोगशाला की पढ़ाई और बाद में अस्पतालों में क्लिनिकल प्रशिक्षण का मॉडल अपनाया गया।
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मेरा शरीर मेरा अधिकार - My Body My Choice - 💊💊💊💉💉💉❌❌❌❌❌
जन्म से लगाने वाले कोई भी 💊💊 दवा या 💉💉वैक्सीन अपने बच्चों को कभी ना दे! 🙏🙏
प्रश्न - बच्चों मे Autism - मंदबुद्धि बीमारी आई कहां से ?
वैक्सीन 💉💉ही करती है बच्चों में Autism/ADHD ❓
जवाब - आप जन्म से जो वैक्सीन 💉💉 और दवा अपने बच्चों को देते हो और माँ गर्भ धारण करने के बाद जो दवा लगातार लेते रहती है जिसके कारण गर्भ के अंदर बच्चों की ब्रेन की विकसित सिस्टम मे रुकावट और (Autism - मंदबुद्धि) होने का सबसे बड़ा कारण है
https://t.me/akhandbharat510/84509
वैक्सीन मे क्या - क्या डाले जाते है सुने - डॉ. कमलप्रीत सिंह जी👆👆
जन्म से लगाने वाले कोई भी 💊💊 दवा या 💉💉वैक्सीन अपने बच्चों को कभी ना दे! 🙏🙏
प्रश्न - बच्चों मे Autism - मंदबुद्धि बीमारी आई कहां से ?
वैक्सीन 💉💉ही करती है बच्चों में Autism/ADHD ❓
जवाब - आप जन्म से जो वैक्सीन 💉💉 और दवा अपने बच्चों को देते हो और माँ गर्भ धारण करने के बाद जो दवा लगातार लेते रहती है जिसके कारण गर्भ के अंदर बच्चों की ब्रेन की विकसित सिस्टम मे रुकावट और (Autism - मंदबुद्धि) होने का सबसे बड़ा कारण है
https://t.me/akhandbharat510/84509
वैक्सीन मे क्या - क्या डाले जाते है सुने - डॉ. कमलप्रीत सिंह जी👆👆
अखंड भारत 🇮🇳🇮🇳
मेरा शरीर मेरा अधिकार - My Body My Choice - 💊💊💊💉💉💉❌❌❌❌❌ जन्म से लगाने वाले कोई भी 💊💊 दवा या 💉💉वैक्सीन अपने बच्चों को कभी ना दे! 🙏🙏 प्रश्न - बच्चों मे Autism - मंदबुद्धि बीमारी आई कहां से ? वैक्सीन 💉💉ही करती है बच्चों में Autism/ADHD ❓ जवाब - आप जन्म से…
माता-पिता की स्वायत्तता (Parental Autonomy) एक कानूनी और नैतिक सिद्धांत है, जो यह निर्धारित करता है कि माता-पिता को अपने बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, सुरक्षा एवं स्वास्थ्य देखभाल और नैतिक मार्गदर्शन के संबंध में निर्णय लेने का मौलिक अधिकार है! माता-पिता को अपने बच्चे के जीवन को आकार देने की स्वतंत्रता देता है।
मुख्य बिंदु:
निर्णय लेने का अधिकार: इसमें यह तय करना शामिल है कि बच्चा किस स्कूल में जाएगा, उसे कौन सी चिकित्सा सुविधा मिलेगी, और वह किस धर्म या मूल्यों को सीखेगा।
गोपनीयता का अधिकार: परिवार के आंतरिक मामलों में राज्य (सरकार) तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक कि बच्चे की सुरक्षा, जानलेवा और भविष्य मे उस चिकित्सा, वैक्सीन 💉💉एवं दवा 💊💊 से बच्चें के स्वास्थ्य के ऊपर कोई जोखिम और खतरा न हो।❌❌
स्वाभाविक अभिभावक: आमतौर पर यह माना जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के सबसे बड़े हितैषी होते हैं। वे अपने बच्चे की शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक स्थितियों को किसी भी बाहरी व्यवस्था या सरकार से बेहतर समझते हैं।
व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता: कई परिवारों के अपने व्यक्तिगत सिद्धांत, सांस्कृतिक मूल्य या धार्मिक विश्वास होते हैं। उनका मानना है कि सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का मेडिकल हस्तक्षेप अनिवार्य करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
जवाबदेही: यदि किसी दवा 💊💊 या वैक्सीन 💉💉 का कोई दुर्लभ साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) होता है, तो उसका सामना बच्चे और उसके परिवार को ही करना पड़ता है, सरकार को नहीं। इसलिए, निर्णय लेने का अंतिम अधिकार भी परिवार के पास होना चाहिए।
मनोज कुमार
मुख्य बिंदु:
निर्णय लेने का अधिकार: इसमें यह तय करना शामिल है कि बच्चा किस स्कूल में जाएगा, उसे कौन सी चिकित्सा सुविधा मिलेगी, और वह किस धर्म या मूल्यों को सीखेगा।
गोपनीयता का अधिकार: परिवार के आंतरिक मामलों में राज्य (सरकार) तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक कि बच्चे की सुरक्षा, जानलेवा और भविष्य मे उस चिकित्सा, वैक्सीन 💉💉एवं दवा 💊💊 से बच्चें के स्वास्थ्य के ऊपर कोई जोखिम और खतरा न हो।❌❌
स्वाभाविक अभिभावक: आमतौर पर यह माना जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के सबसे बड़े हितैषी होते हैं। वे अपने बच्चे की शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक स्थितियों को किसी भी बाहरी व्यवस्था या सरकार से बेहतर समझते हैं।
व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता: कई परिवारों के अपने व्यक्तिगत सिद्धांत, सांस्कृतिक मूल्य या धार्मिक विश्वास होते हैं। उनका मानना है कि सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का मेडिकल हस्तक्षेप अनिवार्य करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
जवाबदेही: यदि किसी दवा 💊💊 या वैक्सीन 💉💉 का कोई दुर्लभ साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) होता है, तो उसका सामना बच्चे और उसके परिवार को ही करना पड़ता है, सरकार को नहीं। इसलिए, निर्णय लेने का अंतिम अधिकार भी परिवार के पास होना चाहिए।
मनोज कुमार
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एक था शक्तिमान जब समाज और देश मे कुछ भी गलत होता था और दुनिया मे जब अँधेरे कायम कर लेती थी तब उस बुरी शक्ति से लड़ने और लोगो को बचाने के लिए - शक्तिमान आ जाता था... अब वो शक्तिमान कहाँ गया ❓
सत्ताधारियों से जनता का सवाल - गलतीमान
सत्ताधारियों से जनता का सवाल - गलतीमान
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भोपाल, मध्यप्रदेश में दर्द की गोली खाने के तीस सेकंड के भीतर हुई 40 वर्षीय युवक की मौत.
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भोपाल के लक्ष्मी टॉकीज के पास एक कपड़े की दुकान में शैलेंद्र मालवीय (उम्र करीब 40 वर्ष) की सीने में दर्द होने के बाद दवा खाने से अचानक मौत हो गई।
घटना से जुड़ी मुख्य बातें:
स्थान: लक्ष्मी टॉकीज के पास एक कपड़े की दुकान (हनुमानगंज थाना क्षेत्र), भोपाल।
तारीख: सोमवार रात (अक्टूबर 2026)।
घटना का विवरण: शैलेंद्र मालवीय अपने दोस्त को कपड़े दिलवाने के लिए दुकान पर गए थे। वहां अचानक उनके सीने में दर्द और बेचैनी हुई।
दवा और मौत: उन्होंने कुर्सी पर बैठकर कोई दवा खाई और पानी पिया, जिसके कुछ ही सेकंड (करीब 20 से 30 सेकंड) के भीतर वे कुर्सी से नीचे गिर पड़े।
अस्पताल: दोस्त और दुकान के कर्मचारी तुरंत उन्हें अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
कारण: पुलिस और शुरुआती रिपोर्ट्स के अनुसार मौत का कारण हार्ट अटैक (दिल का दौरा) माना जा रहा है, हालांकि सही वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट होगी। पूरी घटना दुकान में लगे CCTV कैमरे में कैद हो गई है।
घटना से जुड़ी मुख्य बातें:
स्थान: लक्ष्मी टॉकीज के पास एक कपड़े की दुकान (हनुमानगंज थाना क्षेत्र), भोपाल।
तारीख: सोमवार रात (अक्टूबर 2026)।
घटना का विवरण: शैलेंद्र मालवीय अपने दोस्त को कपड़े दिलवाने के लिए दुकान पर गए थे। वहां अचानक उनके सीने में दर्द और बेचैनी हुई।
दवा और मौत: उन्होंने कुर्सी पर बैठकर कोई दवा खाई और पानी पिया, जिसके कुछ ही सेकंड (करीब 20 से 30 सेकंड) के भीतर वे कुर्सी से नीचे गिर पड़े।
अस्पताल: दोस्त और दुकान के कर्मचारी तुरंत उन्हें अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
कारण: पुलिस और शुरुआती रिपोर्ट्स के अनुसार मौत का कारण हार्ट अटैक (दिल का दौरा) माना जा रहा है, हालांकि सही वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट होगी। पूरी घटना दुकान में लगे CCTV कैमरे में कैद हो गई है।
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"गांव की औरतों को अनपढ़, गवार और देहाती कहने वालों ध्यान से सुनो"!
शहर के लोगो का इस तरह अपमानजनक सोच की वास्तविकता:
किसी को उसकी शिक्षा, रहन-सहन या आर्थिक स्थिति के आधार पर 'अनपढ़' या 'गंवार' कहकर अपमानित करना किसी की बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि उसकी संकीर्ण सोच और मानसिकता को दर्शाता है।
श्रम और अन्न पैदा करने वाले हाथों का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि उनके बिना शहरी जीवन और बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस गाँव की बहन से मेरा हाथ जोड़कर 🙏🙏 निवेदन है की बहन आप जहाँ है और जो कर रही है वही असली धन है प्रकृति से जुड़ना... बाकि शहर के लोग तो बुद्धू, नालायक, अज्ञानता और गुलाम बने हुए है ये सोशल मीडिया, ऑनलाइन, इंटरनेट सब गुलामी की जंजीरे, पिंजड़े और जेलखाना है... आप आज़ाद हो और हमेशा आज़ाद रहोगे.... आप इस गुलामी की पिंजड़े से दूर रहिये 🥲🥲🙏🙏
मनोज कुमार
नीचे की पोस्ट ध्यान से पढ़े 👇👇🙏🙏
शहर के लोगो का इस तरह अपमानजनक सोच की वास्तविकता:
किसी को उसकी शिक्षा, रहन-सहन या आर्थिक स्थिति के आधार पर 'अनपढ़' या 'गंवार' कहकर अपमानित करना किसी की बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि उसकी संकीर्ण सोच और मानसिकता को दर्शाता है।
श्रम और अन्न पैदा करने वाले हाथों का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि उनके बिना शहरी जीवन और बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस गाँव की बहन से मेरा हाथ जोड़कर 🙏🙏 निवेदन है की बहन आप जहाँ है और जो कर रही है वही असली धन है प्रकृति से जुड़ना... बाकि शहर के लोग तो बुद्धू, नालायक, अज्ञानता और गुलाम बने हुए है ये सोशल मीडिया, ऑनलाइन, इंटरनेट सब गुलामी की जंजीरे, पिंजड़े और जेलखाना है... आप आज़ाद हो और हमेशा आज़ाद रहोगे.... आप इस गुलामी की पिंजड़े से दूर रहिये 🥲🥲🙏🙏
मनोज कुमार
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अखंड भारत 🇮🇳🇮🇳
"गांव की औरतों को अनपढ़, गवार और देहाती कहने वालों ध्यान से सुनो"! शहर के लोगो का इस तरह अपमानजनक सोच की वास्तविकता: किसी को उसकी शिक्षा, रहन-सहन या आर्थिक स्थिति के आधार पर 'अनपढ़' या 'गंवार' कहकर अपमानित करना किसी की बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि उसकी संकीर्ण…
गाँव की महिलाओं और पुरुषों की कड़ी मेहनत, खेती-किसानी और उनके पारंपरिक हुनर के बिना शहर की चकाचौंध और अर्थव्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ग्रामीण महिलाओं का महत्व
भोजन और कृषि: खेतों में फसल बोने, उसकी देखभाल करने और खाद्यान्न को घरों और बाजारों तक पहुंचाने में ग्रामीण महिलाओं की बहुत बड़ी और अहम भूमिका होती है।
हस्तशिल्प और संस्कृति: देश की पारंपरिक कला, दस्तकारी, हथकरघा और लोक संस्कृति को जीवित रखने में गाँव की महिलाओं का हुनर सबसे आगे है।
अर्थव्यवस्था की नींव: देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन की रीढ़ महिलाएं ही हैं, जिन पर शहर और देश दोनों की बहुत हद तक निर्भरता है।
समाज में इस सच्चाई और योगदान को रेखांकित करने के लिए कुछ मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:
🌾 देश का अन्नदाता: कृषि में महिलाओं का योगदान
भोजन का आधार: शहर के लोग जो भी अनाज, फल, सब्जियां या डेयरी उत्पाद इस्तेमाल करते हैं, वे सब गाँव के खेतों से आते हैं। इन खेतों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, और कई बार उनसे भी ज्यादा, महिलाएं दिन-रात मेहनत करती हैं।
रीढ़ की हड्डी: भारतीय कृषि व्यवस्था में बुवाई, रोपाई, कटाई और पशुपालन जैसे सबसे कठिन कामों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा होती है।
🎨 संस्कृति और हुनर की पहचान
पारंपरिक हस्तशिल्प: मिट्टी के बर्तन, हस्तशिल्प (Handicrafts), बुनाई, कढ़ाई, और जैविक उत्पाद (Organic products) जैसे बेहतरीन हुनर ग्रामीण महिलाओं के पास ही हैं। आज शहरों और विदेशों में 'हैंडमेड' और 'ऑर्गेनिक' के नाम पर जो चीजें महंगे दामों में बिकती हैं, वे इन्हीं महिलाओं की कला का नतीजा हैं।
सांस्कृतिक धरोहर: हमारे देश की असली संस्कृति, लोकगीत, लोककला और परंपराएं आज भी गाँवों में इन महिलाओं की वजह से ही जीवित हैं।
🏢 विकास की असली बुनियाद
शहरीकरण की नींव: शहरों में बनने वाली बड़ी-बड़ी इमारतें, सड़कें और फैक्ट्रियां ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले श्रमिकों की मेहनत से ही खड़ी होती हैं।
💡 सोच बदलने की जरूरत
डिग्री बनाम ज्ञान: साक्षर होना (पढ़ा-लिखा होना) और समझदार या हुनरमंद होना दो अलग बातें हैं। भले ही कुछ ग्रामीण महिलाओं को औपचारिक स्कूली शिक्षा न मिली हो, लेकिन उनके पास प्रकृति, खेती, मौसम और जीवन का जो व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) है, वह किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं है।
सम्मान की हकदार: किसी को उनकी आर्थिक स्थिति या पहनावे के आधार पर 'कमतर' आंकना केवल एक संकीर्ण मानसिक सोच को दर्शाता है।
गाँव भारत का दिल हैं, और वहाँ की महिलाएं इस देश की आत्मनिर्भरता और विकास की असली ताकत हैं। उनके इस निस्वार्थ योगदान के लिए पूरा समाज उनका ऋणी है और वे सर्वोच्च सम्मान की हकदार हैं।
मनोज कुमार
ग्रामीण महिलाओं का महत्व
भोजन और कृषि: खेतों में फसल बोने, उसकी देखभाल करने और खाद्यान्न को घरों और बाजारों तक पहुंचाने में ग्रामीण महिलाओं की बहुत बड़ी और अहम भूमिका होती है।
हस्तशिल्प और संस्कृति: देश की पारंपरिक कला, दस्तकारी, हथकरघा और लोक संस्कृति को जीवित रखने में गाँव की महिलाओं का हुनर सबसे आगे है।
अर्थव्यवस्था की नींव: देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन की रीढ़ महिलाएं ही हैं, जिन पर शहर और देश दोनों की बहुत हद तक निर्भरता है।
समाज में इस सच्चाई और योगदान को रेखांकित करने के लिए कुछ मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:
🌾 देश का अन्नदाता: कृषि में महिलाओं का योगदान
भोजन का आधार: शहर के लोग जो भी अनाज, फल, सब्जियां या डेयरी उत्पाद इस्तेमाल करते हैं, वे सब गाँव के खेतों से आते हैं। इन खेतों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, और कई बार उनसे भी ज्यादा, महिलाएं दिन-रात मेहनत करती हैं।
रीढ़ की हड्डी: भारतीय कृषि व्यवस्था में बुवाई, रोपाई, कटाई और पशुपालन जैसे सबसे कठिन कामों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा होती है।
🎨 संस्कृति और हुनर की पहचान
पारंपरिक हस्तशिल्प: मिट्टी के बर्तन, हस्तशिल्प (Handicrafts), बुनाई, कढ़ाई, और जैविक उत्पाद (Organic products) जैसे बेहतरीन हुनर ग्रामीण महिलाओं के पास ही हैं। आज शहरों और विदेशों में 'हैंडमेड' और 'ऑर्गेनिक' के नाम पर जो चीजें महंगे दामों में बिकती हैं, वे इन्हीं महिलाओं की कला का नतीजा हैं।
सांस्कृतिक धरोहर: हमारे देश की असली संस्कृति, लोकगीत, लोककला और परंपराएं आज भी गाँवों में इन महिलाओं की वजह से ही जीवित हैं।
🏢 विकास की असली बुनियाद
शहरीकरण की नींव: शहरों में बनने वाली बड़ी-बड़ी इमारतें, सड़कें और फैक्ट्रियां ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले श्रमिकों की मेहनत से ही खड़ी होती हैं।
💡 सोच बदलने की जरूरत
डिग्री बनाम ज्ञान: साक्षर होना (पढ़ा-लिखा होना) और समझदार या हुनरमंद होना दो अलग बातें हैं। भले ही कुछ ग्रामीण महिलाओं को औपचारिक स्कूली शिक्षा न मिली हो, लेकिन उनके पास प्रकृति, खेती, मौसम और जीवन का जो व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) है, वह किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं है।
सम्मान की हकदार: किसी को उनकी आर्थिक स्थिति या पहनावे के आधार पर 'कमतर' आंकना केवल एक संकीर्ण मानसिक सोच को दर्शाता है।
गाँव भारत का दिल हैं, और वहाँ की महिलाएं इस देश की आत्मनिर्भरता और विकास की असली ताकत हैं। उनके इस निस्वार्थ योगदान के लिए पूरा समाज उनका ऋणी है और वे सर्वोच्च सम्मान की हकदार हैं।
मनोज कुमार
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