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🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

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✅स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आंदोलन एवं वर्ष

♜ बंग-भंग आंदोलन(स्वदेशी आंदोलन)
➜ 1905 ई.

♜ मुस्लिम लीग की स्थापना
➜ 1906 ई.

♜ कांग्रेस का बंटवारा
➜ 1907 ई.

♜ होमरूल आंदोलन
➜ 1916 ई.

♜ लखनऊ पैक्ट
➜ दिसंबर 1916 ई.

♜ मांटेग्यू घोषणा
➜ 20 अगस्त 1917 ई.

♜ रौलेट एक्ट
➜ 19 मार्च 1919 ई.

♜ जालियांवाला बाग हत्याकांड
➜ 13 अप्रैल 1919 ई.

♜ खिलाफत आंदोलन
➜ 1919 ई.

♜ हंटर कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित
➜ 18 मई 1920 ई.

♜ कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1920 ई.

♜ असहयोग आंदोलन की शुरुआत
➜ 1 अगस्त 1920 ई.

♜ चौरी-चौरा कांड
➜ 5 फरवरी 1922 ई.

♜ स्वराज्य पार्टी की स्थापना
➜ 1 जनवरी 1923 ई.

♜ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
➜ अक्टूबर 1924 ई.

♜ साइमन कमीशन की नियुक्ति
➜ 8 नवंबर 1927 ई.

♜ साइमन कमीशन का भारत आगमन
➜ 3 फरवरी 1928 ई.

♜ नेहरू रिपोर्ट
➜ अगस्त 1928 ई.

♜ बारदौली सत्याग्रह
➜ अक्टूबर 1928 ई.

♜ लाहौर पड्यंत्र केस
➜ 8 अप्रैल 1929 ई.

♜ कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1929 ई.

♜ स्वाधीनता दिवस की घोषणा
➜ 2 जनवरी 1930 ई.

♜ नमक सत्याग्रह
➜ 12 मार्च 1930 ई. से 5 अप्रैल 1930 ई. तक

♜ सविनय अवज्ञा आंदोलन
➜ 6 अप्रैल 1930 ई.

♜ प्रथम गोलमेज आंदोलन
➜ 12 नवंबर 1930 ई.

♜ गांधी-इरविन समझौता
➜ 8 मार्च 1931 ई.

♜ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 7 सितंबर 1931 ई.

♜ कम्युनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)
➜ 16 अगस्त 1932 ई.

♜ पूना पैक्ट
➜ सितंबर 1932 ई.

♜ तृतीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 17 नवंबर 1932 ई.

♜ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन
➜ मई 1934 ई.

♜ फॉरवर्ड ब्लाक का गठन
➜ 1 मई 1939 ई.

♜ मुक्ति दिवस
➜ 22 दिसंबर 1939 ई.

♜ पाकिस्तान की मांग
➜ 24 मार्च 1940 ई.

♜ अगस्त प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1940 ई.

♜ क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव
➜ मार्च 1942 ई.

♜ भारत छोड़ो प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1942 ई.

♜ शिमला सम्मेलन
➜ 25 जून 1945 ई.

♜ नौसेना का विद्रोह
➜ 19 फरवरी 1946 ई.

♜ प्रधानमंत्री एटली की घोषण
➜ 15 मार्च 1946 ई.

♜ कैबिनेट मिशन का आगमन
➜ 24 मार्च 1946 ई.

♜ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
➜ 16 अगस्त 1946 ई.

♜ अंतरिम सरकार की स्थापना
➜ 2 सितंबर 1946 ई.

♜ माउंटबेटन योजना
➜ 3 जून 1947 ई.

♜ स्वतंत्रता मिली➜ 15 अगस्त 1947 ई.

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👉
केंद्र- राज्य संबंध से संबंधित अनुच्छेद

👉केंद्र राज्यों का संबंध संविधान के भाग 11(अनुच्छेद 245-263) में दिया गया है

👉अनुच्छेद 245
संसद देश में कानून बना सकती है।
विधानमंडल राज्य में कानून बना सकती है।

👉अनुच्छेद 246
संघ सूची ,राज्य सूची व समवर्ती सूची के विषयों का उल्लेख।

👉अनुच्छेद 247
अतिरिक्त न्यायालय बनाया जा सकता है।

👉अनुच्छेद 248
अवशिष्ट सूची।
जो विषय बाद में जुड़े जाएंगे वह केंद्र सरकार के विषय में जोड़े जाएंगे। ex-इसरो, डीआरडीओ, साइबर क्राइम आदि।

👉अनुच्छेद 252
दो या दो से अधिक राज्यों की सहमति हो तो संसद राज्य सूची में भी कानून बना सकती है।

👉अनुच्छेद 253
अंतर्राष्ट्रीय करार या समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संसद राज्य सूची में भी कानून बना सकती है।

👉अनुच्छेद 254
विधानमंडल ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगी जो संसद के कानून से असंगत हो या मेल ना खाता हो।

👉अनुच्छेद 263
अन्तर्राजीय परिषद का उल्लेख।
सभी राज्य और यूटी के मुख्यमंत्री की केंद्र सरकार द्वारा वर्ष में तीन बार मीटिंग



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✅ गवर्नर/गवर्नर जनरल/वायसराय द्वारा किए गए प्रमुख कार्य 👇👇

• अंग्रेजी शिक्षा - विलियम बैंटिंक

• सामाजिक सुधार - विलियम बैंटिंक

• ठगों का दमन - कैप्टन स्लीमन

• प्रेस पर प्रतिबंध हटाना - चार्ल्स मेटकॉफ

• सिन्ध का विलय - लॉर्ड एलनबरो

• दास प्रथा का अंत - लॉर्ड एनलबरो

• राज्य अपहरण की नीति - लॉर्ड डलहौजी

• व्यपगत का सिद्धान्त - लॉर्ड डलहौजी

• राज्य हड़प नीति - लॉर्ड डलहौजी

• ड्राक्सिन ऑफ लैप्स - लॉर्ड डलहौजी

• अवध का विलय - लॉर्ड डलहौजी

• चतुराईपूर्ण निष्क्रियता की नीति - जान लॉरेंस

• वर्नाकुलर प्रेस एक्ट - लॉर्ड लिटन

• अग्रफारवर्ड नीति - लॉर्ड रिपन

• स्थानीय स्वशासन - लॉर्ड रिपन


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🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

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52वाँ संशोधन (1985):

संसद और विधान मंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था दी गई और इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए एक नई अनुसूची (दसवीं अनुसूची) को जोड़ा गया।

👉61वाँ संशोधन (1988)

विपक्ष और राज्य विधान सभा के चुनाव में मतदान की आयु 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गई।

👉73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992):

73वाँ संशोधन अधिनियम:
इस संशोधन के माध्यम से अलौकिक राज संस्था को संवैधानिक बनाया गया।

👉इस अधिनियम में भारत के संविधान का एक नया भाग-IX जोड़ा गया है तथा इसमें 243 से 243O तक के जुलूस शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त अधिनियम में संविधान द्वारा एक नई 11वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया है और इसमें परियोजना के 29 संरचनात्मक विषयों को शामिल किया गया है।

👉74वाँ संशोधन अधिनियम:

👉शहरी स्थानीय संस्था 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान 74वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संवैधानिक बनाया गया था। यह 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
इसमें भाग IX-A को जोड़ा गया है और इसमें 243-पी से 243-जेडजी तक के प्रॉजेक्ट को शामिल किया गया है।

👉इसके अलावा इस अधिनियम द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची का भी मिलान किया गया । नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक मद शामिल हैं।


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👉102वां संशोधन अधिनियम, 2018-

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

इस अधिनियम ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पिछड़े वर्गों से संबंधित कार्यों से मुक्त कर दिया।

इसने राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार भी दिया

।

103वां संशोधन अधिनियम, 2019-

राज्य को नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया गया।

ईडब्ल्यूएस श्रेणी का लाभ प्राप्त करने के लिए ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है।

राज्य को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कुछ वर्गों के लिए 10% तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति दी गई थी, जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर निजी शैक्षणिक संस्थान भी शामिल थे, जिन्हें राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त थी। 10% तक का यह अतिरिक्त आरक्षण पहले से किए गए आरक्षण के अतिरिक्त होगा।

104वां संशोधन अधिनियम, 2020-

लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों की समाप्ति की समय-सीमा को 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष करना।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित सीटों को हटाना।

105वां संशोधन अधिनियम, 2020-
इसने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने की राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति को बहाल कर दिया।

यह संशोधन 15 अगस्त, 2021 से प्रभावी हो गया।


106वां संशोधन अधिनियम, 2020-

इसे महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।

यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है।

यह संशोधन सितंबर 2023 में पारित किया गया तथा 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।

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