📕अध्याय 3: संघ और उसका क्षेत्र (Part I – अनुच्छेद 1-4)
1. भाग I का दायरा (Scope of Part I)
संविधान का Part I (अनुच्छेद 1-4) राज्यों और भारत के क्षेत्रों का ढाँचा तय करता है: यह निर्धारित करता है कि भारत एक “Union of States” कैसे है, राज्यों की सीमाओं का निर्धारण कैसे किया जाए और आवश्यकतानुसार सीमाएं/नाम कैसे बदले जाएँ।
यह भाग यह भी तय करता है कि ऐसे परिवर्तनों के लिए संसद को क्या शक्तियाँ हैं और संशोधन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
2. अनुच्छेद 1 — “भारत = Union of States” का अर्थ
संविधान कहते हैं: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” — यानी भारत और भारत (Bharat) दोनों नाम संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं।
“Union of States” का मतलब यह है कि भारत का संघ राज्यों का एक संगठन है, पर यह राज्यों के बीच सिर्फ समझौता नहीं है — यह भारत के लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक इकाई है।
संविधान निर्माता (जैसे Dr. B. R. अम्बेडकर) का तर्क था कि राज्यों का अलग होना कठिन या असंभव बनाया जाए ताकि संघ की अखंडता बनी रहे।
संघीय स्वरूप होने के बावजूद, भारत में केन्द्रीय झुकाव (unitary bias) है: केंद्र को बहुत शक्तियाँ दी गई हैं और संसद के पास राज्य सीमाओं को बदलने का अंतिम अधिकार है।
“Union of States” और “Territory of India” अलग हैं: पहला राजनीतिक संघ बताता है, और दूसरा क्षेत्रीय सीमाओं को — जिसका विवरण पहली अनुसूची (First Schedule) में है
3. अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का गठन / सम्मिलन (Admission & Establishment)
अनुच्छेद 2 संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य को भारत में शामिल करे या नया राज्य बनाए।
इसके लिए संसद को सिर्फ साधारण कानून (Simple Act) पास करना होता है; यह कोई संवैधानिक संशोधन (Amendment) नहीं है।
इस प्रावधान का प्रयोग बाद में कई राज्यों के निर्माण में हुआ है।
4. अनुच्छेद 3 — राज्य सीमाओं, नाम, विभाजन, एकीकरण
अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि वह:
1. किसी राज्य को विभाजित (बांटना) करे,
2. दो या अधिक राज्यों को एकीकृत (मिलाए),
3. नया राज्य बनाए,
4. किसी राज्य की सीमा बढ़ा या घटा सके,
5. राज्य का नाम बदल सके।
प्रक्रिया इस प्रकार होती है: राष्ट्रपति उस बिल को पारित करने की सिफारिश करता है → राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधायिका से राय मांगते हैं → राज्य अपनी राय देता है (लेकिन सहमति देना अनिवार्य नहीं है) → संसद इसे साधारण बहुमत से पास करती है।
चूंकि यह संशोधन नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती; ये परिवर्तन साधारण विधेयक (Law) द्वारा होते हैं।
इस व्यवस्था से राज्यों की सीमाओं और नामों में लचीलापन और व्यवस्था सुनिश्चित होती है।
5. अनुच्छेद 4 — सूचियों (Schedules) में बदलाव
अनुच्छेद 4 कहता है कि यदि अनुच्छेद 2 या 3 के अंतर्गत कोई अधिनियम (Act) बना है, तो वह प्रथम अनुसूची (First Schedule — राज्यों / UTs की सूची) और चौथी अनुसूची (Fourth Schedule — राज्यसभा में सीटों का आवंटन) को बदल सकता है।
ऐसे संशोधन को संविधान संशोधन (Amendment) नहीं माना जाएगा; यह साधारण अधिनियम माना जाता है।
इसलिए, पुनर्गठन करते समय संसद को कठिन संशोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
6. राज्य पुनर्गठन — आयोग, रिपोर्ट और सिफारिशें
State Reorganisation Commission (SRC) की स्थापना दिसंबर 1953 में हुई थी। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति Fazl Ali ने की, अन्य सदस्य K. M. Panikkar और H. N. Kunzru थे।
SRC ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
SRC की प्रमुख सिफारिशें थीं:
1. भाषा-आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, लेकिन “एक भाषा = एक राज्य” का सख्त सिद्धांत न अपनाना;
2. राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा, प्रशासनिक और आर्थिक दक्षता को प्राथमिकता देना।
3. चार-प्रकार की (Part A, B, C, D) राज्यों की श्रेणीकरण को खत्म करना।
4. सीमाओं के निर्धारण में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर ध्यान देना।
5. कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक उपबंध देने की सिफारिश।
इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने States Reorganisation Act, 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।
साथ ही, संविधान में Seventh Amendment Act, 1956 लाई गई, जिससे पुनर्गठन अधिनियम और अनुसूचियों (Schedules) में बदलाव संभव हो पाया।
7. राज्यों का गठन-वर्ष (State Formation Years) — कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण
यहाँ प्रमुख राज्यों के गठन या पुनर्गठन के वर्ष दिए गए हैं ताकि UPSI-लेवल तैयारी में मदद हो:
आंध्र प्रदेश: 1 नवम्बर 1956, States Reorganisation Act, 1956 के तहत (SRC की रिपोर्ट के बाद)
मिसोर (अब कर्नाटक): 1 नवम्बर 1956, SRC पुनर्गठन के बाद
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1. भाग I का दायरा (Scope of Part I)
संविधान का Part I (अनुच्छेद 1-4) राज्यों और भारत के क्षेत्रों का ढाँचा तय करता है: यह निर्धारित करता है कि भारत एक “Union of States” कैसे है, राज्यों की सीमाओं का निर्धारण कैसे किया जाए और आवश्यकतानुसार सीमाएं/नाम कैसे बदले जाएँ।
यह भाग यह भी तय करता है कि ऐसे परिवर्तनों के लिए संसद को क्या शक्तियाँ हैं और संशोधन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
2. अनुच्छेद 1 — “भारत = Union of States” का अर्थ
संविधान कहते हैं: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” — यानी भारत और भारत (Bharat) दोनों नाम संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं।
“Union of States” का मतलब यह है कि भारत का संघ राज्यों का एक संगठन है, पर यह राज्यों के बीच सिर्फ समझौता नहीं है — यह भारत के लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक इकाई है।
संविधान निर्माता (जैसे Dr. B. R. अम्बेडकर) का तर्क था कि राज्यों का अलग होना कठिन या असंभव बनाया जाए ताकि संघ की अखंडता बनी रहे।
संघीय स्वरूप होने के बावजूद, भारत में केन्द्रीय झुकाव (unitary bias) है: केंद्र को बहुत शक्तियाँ दी गई हैं और संसद के पास राज्य सीमाओं को बदलने का अंतिम अधिकार है।
“Union of States” और “Territory of India” अलग हैं: पहला राजनीतिक संघ बताता है, और दूसरा क्षेत्रीय सीमाओं को — जिसका विवरण पहली अनुसूची (First Schedule) में है
3. अनुच्छेद 2 — नए राज्यों का गठन / सम्मिलन (Admission & Establishment)
अनुच्छेद 2 संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य को भारत में शामिल करे या नया राज्य बनाए।
इसके लिए संसद को सिर्फ साधारण कानून (Simple Act) पास करना होता है; यह कोई संवैधानिक संशोधन (Amendment) नहीं है।
इस प्रावधान का प्रयोग बाद में कई राज्यों के निर्माण में हुआ है।
4. अनुच्छेद 3 — राज्य सीमाओं, नाम, विभाजन, एकीकरण
अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि वह:
1. किसी राज्य को विभाजित (बांटना) करे,
2. दो या अधिक राज्यों को एकीकृत (मिलाए),
3. नया राज्य बनाए,
4. किसी राज्य की सीमा बढ़ा या घटा सके,
5. राज्य का नाम बदल सके।
प्रक्रिया इस प्रकार होती है: राष्ट्रपति उस बिल को पारित करने की सिफारिश करता है → राष्ट्रपति संबंधित राज्य की विधायिका से राय मांगते हैं → राज्य अपनी राय देता है (लेकिन सहमति देना अनिवार्य नहीं है) → संसद इसे साधारण बहुमत से पास करती है।
चूंकि यह संशोधन नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती; ये परिवर्तन साधारण विधेयक (Law) द्वारा होते हैं।
इस व्यवस्था से राज्यों की सीमाओं और नामों में लचीलापन और व्यवस्था सुनिश्चित होती है।
5. अनुच्छेद 4 — सूचियों (Schedules) में बदलाव
अनुच्छेद 4 कहता है कि यदि अनुच्छेद 2 या 3 के अंतर्गत कोई अधिनियम (Act) बना है, तो वह प्रथम अनुसूची (First Schedule — राज्यों / UTs की सूची) और चौथी अनुसूची (Fourth Schedule — राज्यसभा में सीटों का आवंटन) को बदल सकता है।
ऐसे संशोधन को संविधान संशोधन (Amendment) नहीं माना जाएगा; यह साधारण अधिनियम माना जाता है।
इसलिए, पुनर्गठन करते समय संसद को कठिन संशोधन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
6. राज्य पुनर्गठन — आयोग, रिपोर्ट और सिफारिशें
State Reorganisation Commission (SRC) की स्थापना दिसंबर 1953 में हुई थी। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति Fazl Ali ने की, अन्य सदस्य K. M. Panikkar और H. N. Kunzru थे।
SRC ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
SRC की प्रमुख सिफारिशें थीं:
1. भाषा-आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, लेकिन “एक भाषा = एक राज्य” का सख्त सिद्धांत न अपनाना;
2. राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा, प्रशासनिक और आर्थिक दक्षता को प्राथमिकता देना।
3. चार-प्रकार की (Part A, B, C, D) राज्यों की श्रेणीकरण को खत्म करना।
4. सीमाओं के निर्धारण में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर ध्यान देना।
5. कुछ क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक उपबंध देने की सिफारिश।
इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने States Reorganisation Act, 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।
साथ ही, संविधान में Seventh Amendment Act, 1956 लाई गई, जिससे पुनर्गठन अधिनियम और अनुसूचियों (Schedules) में बदलाव संभव हो पाया।
7. राज्यों का गठन-वर्ष (State Formation Years) — कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण
यहाँ प्रमुख राज्यों के गठन या पुनर्गठन के वर्ष दिए गए हैं ताकि UPSI-लेवल तैयारी में मदद हो:
आंध्र प्रदेश: 1 नवम्बर 1956, States Reorganisation Act, 1956 के तहत (SRC की रिपोर्ट के बाद)
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अध्याय–4 : नागरिकता (Citizenship)
(भाग II — अनुच्छेद 5 से 11)
नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच का पूर्ण कानूनी संबंध (Full Legal Relationship) है। यह अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सहभागिता का आधार है। भारत में नागरिकता की संपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भाग II (अनुच्छेद 5–11) में दी गई है
A. संवैधानिक प्रावधान (Articles 5–11)
भारतीय संविधान नागरिकता से जुड़ी दो ही चीजें निर्धारित करता है—
संविधान ने यह नहीं बताया कि 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता कैसे मिलेगी—यह कार्य संसद को सौंपा गया है।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारम्भ पर नागरिकता
यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसमें “Domicile + Birth/Parentage/Residence” का संयुक्त आधार मिलता है।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (Refugees/Migrants)
जो व्यक्ति पाकिस्तान से भारत आए (Migrated) थे—
• यदि वे 19 जुलाई 1948 से पहले आए, तो स्वतः नागरिक।
• अगर 19 जुलाई 1948 के बाद आए, तो भारत सरकार के पास पंजीकरण कराकर नागरिकता प्राप्त करनी होगी।
यह प्रावधान विभाजन (Partition) के समय आए हिंदू, सिख आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए, फिर लौटे व्यक्तियों की नागरिकता
अनुच्छेद 8 — विदेश में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO)
अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है—
• उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
• भारत दोहरी नागरिकता नहीं देता।
यह अनुच्छेद Citizenship Act, 1955 के साथ मिलकर लागू होता है।
अनुच्छेद 10 — नागरिकता जारी रहने का अधिकार
जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून का उल्लंघन न किया जाए—
• सभी भारतीय नागरिक अपने नागरिकता अधिकार बनाए रखते हैं।
अनुच्छेद 11 — संसद की पूर्ण शक्ति
C. नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955)
यह नागरिकता से जुड़े सभी नियमों का मुख्य कानून है। इसमें बार–बार संशोधन हुए—विशेष रूप से वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
I. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके (Acquisition of Citizenship)
1. जन्म से (By Birth)
1950–1987 :
• भारत में जन्मा हर व्यक्ति नागरिक — माता-पिता कौन हैं इससे फर्क नहीं।
1987 संशोधन के बाद :
2. वंश के आधार पर (By Descent)
1950–1992 :
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(भाग II — अनुच्छेद 5 से 11)
नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच का पूर्ण कानूनी संबंध (Full Legal Relationship) है। यह अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सहभागिता का आधार है। भारत में नागरिकता की संपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भाग II (अनुच्छेद 5–11) में दी गई है
A. संवैधानिक प्रावधान (Articles 5–11)
भारतीय संविधान नागरिकता से जुड़ी दो ही चीजें निर्धारित करता है—
1. 26 जनवरी 1950 को कौन भारतीय नागरिक बना (Articles 5–8
2. नागरिकता पर कानून बनाने की शक्ति किसके पास है (Article 11)
संविधान ने यह नहीं बताया कि 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता कैसे मिलेगी—यह कार्य संसद को सौंपा गया है।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारम्भ पर नागरिकता
26 जनवरी 1950 को वह व्यक्ति भारत का नागरिक माना गया जो—
• भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवासित (Domicile) था, और
• या तो भारत में जन्मा था,
• या उसके माता-पिता में से कोई भारत में जन्मा था,
• या वह व्यक्ति संविधान लागू होने के ठीक पहले कम से कम 5 वर्ष से भारत में सामान्य रूप से रह रहा हो।
यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसमें “Domicile + Birth/Parentage/Residence” का संयुक्त आधार मिलता है।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (Refugees/Migrants)
जो व्यक्ति पाकिस्तान से भारत आए (Migrated) थे—
• यदि वे 19 जुलाई 1948 से पहले आए, तो स्वतः नागरिक।
• अगर 19 जुलाई 1948 के बाद आए, तो भारत सरकार के पास पंजीकरण कराकर नागरिकता प्राप्त करनी होगी।
यह प्रावधान विभाजन (Partition) के समय आए हिंदू, सिख आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए, फिर लौटे व्यक्तियों की नागरिकता
जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चले गए थे और बाद में वापस भारत लौटे—
• उन्हें “Evacuee Property Law” के अधीन माना गया।
• ऐसे व्यक्तियों को नागरिकता पाने हेतु भारतीय सरकार के सामने कम से कम 6 माह का निवास + पंजीकरण आवश्यक था।
यह प्रावधान उन लोगों के लिए था जो विभाजन के बाद दोनों तरफ जाते रहे।
अनुच्छेद 8 — विदेश में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO)
भारत में जन्मे माता/पिता/दादा/दादी के वंशज, जो विदेश में रहते थे, भारतीय नागरिकता ले सकते थे—
• भारत के दूतावास या कौंसुलर (Consular) कार्यालय में पंजीकरण कराकर।
यह प्रावधान भारतीय वंश के विदेशियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है।
अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है—
• उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
• भारत दोहरी नागरिकता नहीं देता।
यह अनुच्छेद Citizenship Act, 1955 के साथ मिलकर लागू होता है।
अनुच्छेद 10 — नागरिकता जारी रहने का अधिकार
जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून का उल्लंघन न किया जाए—
• सभी भारतीय नागरिक अपने नागरिकता अधिकार बनाए रखते हैं।
अनुच्छेद 11 — संसद की पूर्ण शक्ति
संसद को अधिकार है कि वह नागरिकता से संबंधित—
• अधिग्रहण (Acquisition),
• समाप्ति (Termination),
• विनियमन (Regulation)
पर कोई भी कानून बनाए।
इसी शक्ति के अंतर्गत नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act 1955) बनाया गया।
B. भारत में नागरिकता की प्रकृति (Nature of Citizenship)
भारत में—
• एकल नागरिकता (Single Citizenship) होती है, जैसे ब्रिटेन में।
• व्यक्ति केवल “भारत” का नागरिक होता है, किसी “राज्य” का नहीं।
• भारत संघीय होते हुए भी USA की तरह “Dual Citizenship” (Union + State) नहीं देता।
यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के लिए उपयुक्त मानी गई।
C. नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955)
यह नागरिकता से जुड़े सभी नियमों का मुख्य कानून है। इसमें बार–बार संशोधन हुए—विशेष रूप से वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
I. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके (Acquisition of Citizenship)
1. जन्म से (By Birth)
1950–1987 :
• भारत में जन्मा हर व्यक्ति नागरिक — माता-पिता कौन हैं इससे फर्क नहीं।
1987 संशोधन के बाद :
• माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होना चाहिए।2004 संशोधन के बाद :
• दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों,
या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा “अवैध प्रवासी” (Illegal Migrant) न हो।
➤ विदेशी राजनयिक (Diplomat) के बच्चों को नागरिकता नहीं मिलती।
➤ शरणार्थियों के जन्में बच्चों को स्वतः नागरिकता नहीं।
2. वंश के आधार पर (By Descent)
1950–1992 :
• विदेश में जन्मा व्यक्ति नागरिक तभी, जब पिता भारतीय नागरिक हो।
1992 के बाद :
• माता या पिता में से कोई भी भारतीय नागरिक हो।
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📕अध्याय 6 : राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (Directive Principles of State Policy – DPSP)
भाग IV — अनुच्छेद 36 से 51
DPSP वे सिद्धांत हैं जो भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social & Economic Democracy) स्थापित करने के लिए सरकार को दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाना है।
A. DPSP की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ
• DPSP का स्रोत आयरलैंड का संविधान है, और आयरलैंड ने इन्हें स्पेन से लिया था।
• इनका मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक व आर्थिक न्याय की स्थापना कर एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
• ये सिद्धांत गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं — अर्थात् अदालत इनके उल्लंघन पर इन्हें लागू नहीं करवा सकती।
• डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इन्हें भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता (Novel Features) कहा है।
• के. टी. शाह ने DPSP को “ऐसा चेक बताया जो बैंक अपने मन से भुना सके”, अर्थात् सरकार जब चाहे, तब इन्हें लागू करे।
• DPSP केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए नैतिक एवं संवैधानिक दिशा-निर्देश हैं।
B. निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण
हालाँकि संविधान में कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है, परंतु इनमें सम्मिलित विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें तीन समूहों में बांटा गया है:
1. समाजवादी सिद्धांत
2. गांधीवादी सिद्धांत
3. उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual) सिद्धांत
1. समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)
यह सिद्धांत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर जोर देते हैं।
अनुच्छेद 38
▪️ राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा।
• यह राज्य के दायित्व है कि वह आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करे।
• 44वें संशोधन द्वारा इसके दायरे को बढ़ाया गया (38(2))।
अनुच्छेद 39
राज्य निम्नलिखित नीतियों को लागू करने का प्रयास करेगा—
• प्रत्येक नागरिक को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
• समुदाय के संसाधनों का समान वितरण हो।
• धन एवं उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोकना।
• पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना।
• श्रमिकों का स्वास्थ्य, शक्ति और बच्चों के विकास की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 39A (42वाँ संशोधन, 1976)
• गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) प्रदान करना।
अनुच्छेद 41
• बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में कार्य करने, शिक्षा पाने तथा सार्वजनिक सहायता का अधिकार देना।
अनुच्छेद 42
• मानवीय कार्य दशाएँ एवं मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना।
अनुच्छेद 43
• सभी श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage), सभ्य जीवन स्तर और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर देना।
अनुच्छेद 43A (42वाँ संशोधन)
• उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
2. गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)
ये सिद्धांत महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वावलंबन और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं।
अनुच्छेद 40
• ग्राम पंचायतों का संगठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।
▪️अनुच्छेद 43B (97वाँ संशोधन, 2011)
▪️अनुच्छेद 46
▪️अनुच्छेद 47
▪️अनुच्छेद 48
3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal–Intellectual Principles)
▪️अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता (UCC)
▪️अनुच्छेद 45 (86वाँ संशोधन द्वारा संशोधित)
▪️अनुच्छेद 48A (42वाँ संशोधन)
▪️अनुच्छेद 49
▪️अनुच्छेद 50
भाग IV — अनुच्छेद 36 से 51
DPSP वे सिद्धांत हैं जो भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social & Economic Democracy) स्थापित करने के लिए सरकार को दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाना है।
A. DPSP की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ
• DPSP का स्रोत आयरलैंड का संविधान है, और आयरलैंड ने इन्हें स्पेन से लिया था।
• इनका मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक व आर्थिक न्याय की स्थापना कर एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
• ये सिद्धांत गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं — अर्थात् अदालत इनके उल्लंघन पर इन्हें लागू नहीं करवा सकती।
• डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इन्हें भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता (Novel Features) कहा है।
• के. टी. शाह ने DPSP को “ऐसा चेक बताया जो बैंक अपने मन से भुना सके”, अर्थात् सरकार जब चाहे, तब इन्हें लागू करे।
• DPSP केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए नैतिक एवं संवैधानिक दिशा-निर्देश हैं।
B. निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण
हालाँकि संविधान में कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है, परंतु इनमें सम्मिलित विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें तीन समूहों में बांटा गया है:
1. समाजवादी सिद्धांत
2. गांधीवादी सिद्धांत
3. उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual) सिद्धांत
1. समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)
यह सिद्धांत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर जोर देते हैं।
अनुच्छेद 38
▪️ राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा।
• यह राज्य के दायित्व है कि वह आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करे।
• 44वें संशोधन द्वारा इसके दायरे को बढ़ाया गया (38(2))।
अनुच्छेद 39
राज्य निम्नलिखित नीतियों को लागू करने का प्रयास करेगा—
• प्रत्येक नागरिक को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
• समुदाय के संसाधनों का समान वितरण हो।
• धन एवं उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोकना।
• पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना।
• श्रमिकों का स्वास्थ्य, शक्ति और बच्चों के विकास की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 39A (42वाँ संशोधन, 1976)
• गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) प्रदान करना।
अनुच्छेद 41
• बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में कार्य करने, शिक्षा पाने तथा सार्वजनिक सहायता का अधिकार देना।
अनुच्छेद 42
• मानवीय कार्य दशाएँ एवं मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना।
अनुच्छेद 43
• सभी श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage), सभ्य जीवन स्तर और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर देना।
अनुच्छेद 43A (42वाँ संशोधन)
• उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
2. गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)
ये सिद्धांत महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वावलंबन और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं।
अनुच्छेद 40
• ग्राम पंचायतों का संगठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।
▪️अनुच्छेद 43B (97वाँ संशोधन, 2011)
सहकारी समितियों (Co-operative Societies) को बढ़ावा देना तथा लोकतांत्रिक प्रबंधन सुनिश्चित करना।
▪️अनुच्छेद 46
SC, ST और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों का संवर्धन।
• विशेष ध्यान: सामाजिक अन्याय तथा शोषण से इनकी सुरक्षा।
▪️अनुच्छेद 47
पोषण सुधारना, जीवन स्तर ऊँचा करना और जन स्वास्थ्य में सुधार करना।
• शराब और नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाने का प्रयास
▪️अनुच्छेद 48
गाय, बछड़ों एवं अन्य दुधारू-पाशवों के वध पर रोक तथा उनके संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाना।
3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal–Intellectual Principles)
ये सिद्धांत आधुनिक, प्रगतिशील, वैज्ञानिक और मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित करते हैं।
▪️अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता (UCC)
• पूरे भारत के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास।
• तथ्य: वर्तमान में केवल गोवा में UCC लागू है।
▪️अनुच्छेद 45 (86वाँ संशोधन द्वारा संशोधित)
• 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्य देखभाल और शिक्षा (ECCE) का प्रावधान।
पहले 14 वर्ष तक शिक्षा का प्रावधान था, जिसे अनुच्छेद 21A में स्थानांतरित किया गया।
▪️अनुच्छेद 48A (42वाँ संशोधन)
पर्यावरण की सुरक्षा एवं सुधार, वन और वन्यजीव संरक्षण।
▪️अनुच्छेद 49
राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, वस्तुओं और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा।
▪️अनुच्छेद 50
न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना — Separation of Judiciary from Executive।
❤1
📕नीति निर्देशक सिद्धांत के संदर्भ में विद्वानों/ संविधान निर्माताओं के विचार।
1. डॉ० बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
2. के.टी. शाह (K.T. Shah)
4. के. संथानम (K. Santhanam)
5. के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare)
6. सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings)
7. ग्रनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
8. बी.एन. राव (B.N. Rao)
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1. डॉ० बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
"निदेशक तत्व विधायिका और कार्यपालिका के लिए अनुदेश हैं।"
→ ये तत्व सरकार को समाज के कल्याण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
2. के.टी. शाह (K.T. Shah)
"राज्य का नीति निर्देशक तत्व एक ऐसा चेक है जो बैंक की सुविधानुसार अदा की जाएगी।"3. टी.टी. कृष्णमचारी (T.T. Krishnamachari)
→ उनका मत था कि ये केवल सिफारिशें हैं, जिनका पालन सरकार की आर्थिक और व्यावहारिक स्थिति पर निर्भर करता है।
"भावनाओं का स्थाई कूड़ाघर"
→ उन्होंने इसे केवल आदर्शवादी भावनाओं और आकांक्षाओं का संग्रह कहा, जो व्यवहार में पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकते।
4. के. संथानम (K. Santhanam)
"इन तत्त्वों से केंद्र और राज्य के मध्य संवैधानिक टकराव होगा।"
→ नीति निर्देशक तत्त्वों के कारण संघीय ढांचे में विवाद की संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
5. के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare)
"लक्ष्य एवं आकांक्षाओं का घोषणपत्र"
→ ये तत्त्व राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों का प्रतिपादन करते हैं।
6. सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings)
"इन तत्वों का कोई नियमित प्रतिमान दर्शन नहीं है", "ये तत्व समाजवाद के बिना फेबियन समाजवाद हैं"
→ उन्होंने इसे एक आदर्शवादी लेकिन लचीला मार्गदर्शन माना, जो समाजवादी विचारों को बिना कठोर रूप से लागू किए प्रकट करता है।
7. ग्रनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
"सविधान की आत्मा, निदेशक तत्व और अधिकार संविधान की मूल आत्मा हैं"
→ उनके अनुसार ये तत्त्व संविधान की मूल भावना और उद्देश्य को प्रकट करते हैं।
8. बी.एन. राव (B.N. Rao)
"निदेशक तत्व राज्य प्राधिकारियों के लिए आवश्यकता, नैतिक आवश्यकता और शैक्षिक मूल्य हैं"
→ वे इसे प्रशासनिक, नैतिक और शैक्षिक दृष्टि से आवश्यक मानते हैं।
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✅स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आंदोलन एवं वर्ष
♜ बंग-भंग आंदोलन(स्वदेशी आंदोलन)
➜ 1905 ई.
♜ मुस्लिम लीग की स्थापना
➜ 1906 ई.
♜ कांग्रेस का बंटवारा
➜ 1907 ई.
♜ होमरूल आंदोलन
➜ 1916 ई.
♜ लखनऊ पैक्ट
➜ दिसंबर 1916 ई.
♜ मांटेग्यू घोषणा
➜ 20 अगस्त 1917 ई.
♜ रौलेट एक्ट
➜ 19 मार्च 1919 ई.
♜ जालियांवाला बाग हत्याकांड
➜ 13 अप्रैल 1919 ई.
♜ खिलाफत आंदोलन
➜ 1919 ई.
♜ हंटर कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित
➜ 18 मई 1920 ई.
♜ कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1920 ई.
♜ असहयोग आंदोलन की शुरुआत
➜ 1 अगस्त 1920 ई.
♜ चौरी-चौरा कांड
➜ 5 फरवरी 1922 ई.
♜ स्वराज्य पार्टी की स्थापना
➜ 1 जनवरी 1923 ई.
♜ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
➜ अक्टूबर 1924 ई.
♜ साइमन कमीशन की नियुक्ति
➜ 8 नवंबर 1927 ई.
♜ साइमन कमीशन का भारत आगमन
➜ 3 फरवरी 1928 ई.
♜ नेहरू रिपोर्ट
➜ अगस्त 1928 ई.
♜ बारदौली सत्याग्रह
➜ अक्टूबर 1928 ई.
♜ लाहौर पड्यंत्र केस
➜ 8 अप्रैल 1929 ई.
♜ कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1929 ई.
♜ स्वाधीनता दिवस की घोषणा
➜ 2 जनवरी 1930 ई.
♜ नमक सत्याग्रह
➜ 12 मार्च 1930 ई. से 5 अप्रैल 1930 ई. तक
♜ सविनय अवज्ञा आंदोलन
➜ 6 अप्रैल 1930 ई.
♜ प्रथम गोलमेज आंदोलन
➜ 12 नवंबर 1930 ई.
♜ गांधी-इरविन समझौता
➜ 8 मार्च 1931 ई.
♜ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 7 सितंबर 1931 ई.
♜ कम्युनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)
➜ 16 अगस्त 1932 ई.
♜ पूना पैक्ट
➜ सितंबर 1932 ई.
♜ तृतीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 17 नवंबर 1932 ई.
♜ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन
➜ मई 1934 ई.
♜ फॉरवर्ड ब्लाक का गठन
➜ 1 मई 1939 ई.
♜ मुक्ति दिवस
➜ 22 दिसंबर 1939 ई.
♜ पाकिस्तान की मांग
➜ 24 मार्च 1940 ई.
♜ अगस्त प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1940 ई.
♜ क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव
➜ मार्च 1942 ई.
♜ भारत छोड़ो प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1942 ई.
♜ शिमला सम्मेलन
➜ 25 जून 1945 ई.
♜ नौसेना का विद्रोह
➜ 19 फरवरी 1946 ई.
♜ प्रधानमंत्री एटली की घोषण
➜ 15 मार्च 1946 ई.
♜ कैबिनेट मिशन का आगमन
➜ 24 मार्च 1946 ई.
♜ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
➜ 16 अगस्त 1946 ई.
♜ अंतरिम सरकार की स्थापना
➜ 2 सितंबर 1946 ई.
♜ माउंटबेटन योजना
➜ 3 जून 1947 ई.
♜ स्वतंत्रता मिली➜ 15 अगस्त 1947 ई.
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📕पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा
संवैधानिक दर्जा क्या है?
जब किसी संस्था को संविधान में स्थायी दर्जा, अधिकार व दायित्व मिलते हैं, तो उसे संवैधानिक दर्जा कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तिथियाँ:
👉लोकसभा में पारित: 22 दिसंबर 1992
👉राज्यसभा में पारित: 23 दिसंबर 1992
👉राष्ट्रपति की स्वीकृति: 20 अप्रैल 1993
👉प्रभावी तिथि: 24 अप्रैल 1993 (संवैधानिक दर्जा प्रभावी)
👉संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला l
👉प्रधानमंत्री (उस समय): पी. वी. नरसिम्हा राव
✍73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
✍भाग-9 (अनु. 243-क से 243-ण) जोड़ा गया
✍ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषयों का उल्लेख
✍उत्तर प्रदेश में इनमें से 16 विषय पंचायतों को हस्तांतरित l
🍁नीति निदेशक तत्व:
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों की स्थापना हेतु राज्यों को निर्देश
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🔴पहली बार 2010 में मनाया गया
हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है
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संवैधानिक दर्जा क्या है?
जब किसी संस्था को संविधान में स्थायी दर्जा, अधिकार व दायित्व मिलते हैं, तो उसे संवैधानिक दर्जा कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तिथियाँ:
👉लोकसभा में पारित: 22 दिसंबर 1992
👉राज्यसभा में पारित: 23 दिसंबर 1992
👉राष्ट्रपति की स्वीकृति: 20 अप्रैल 1993
👉प्रभावी तिथि: 24 अप्रैल 1993 (संवैधानिक दर्जा प्रभावी)
👉संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला l
👉प्रधानमंत्री (उस समय): पी. वी. नरसिम्हा राव
👉संविधान संशोधन:
✍73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
✍भाग-9 (अनु. 243-क से 243-ण) जोड़ा गया
✍ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषयों का उल्लेख
✍उत्तर प्रदेश में इनमें से 16 विषय पंचायतों को हस्तांतरित l
🍁नीति निदेशक तत्व:
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों की स्थापना हेतु राज्यों को निर्देश
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राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस:
🔴पहली बार 2010 में मनाया गया
हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है
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📕 पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद एक दृष्टि में
अनुच्छेद विषय - वस्तु
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अनुच्छेद विषय - वस्तु
◾️243 परिभाषाएँ
◾️243 (A) ग्राम सभा
◾️243 (B) पंचायतों का गठन
◾️243 (C) पंचायतों की संरचना
◾️243 (D) स्थानों का आरक्षण
◾️243 (E) पंचायतों की अवधि आदि
◾️243 (F) सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
◾️243 (G) पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
◾️243 (H) पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
◾️243 (I) वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
◾️243 (J) पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
◾️243 (K) पंचायतों के लिए निर्वाचन
◾️243 (L) संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
◾️243 (M) इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना
◾️243 (N) विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना
◾️243 (O) निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न
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