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📕सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की कार्य एवं शक्तियां

अनुच्छेद 129 - अभिलेख/रिकार्डड न्यायलय/अवमानना का दण्ड देने की शक्ति ।

👉अनुच्छेद 131 - प्रराम्भिक क्षेत्राधिकरण की शक्ति।

एक या एक से अधिक राज्यों या एक राज्य व राज्यों व भारत सरकार के मध्य कोई विवाद पर फैसला एस. सी. करेगी

👉अनुच्छेद 132 - अपीलय क्षेत्राधिकार।

👉अनुच्छेद 133 - दीवानी मामलों में अपील का अधिकार।

👉अनुच्छेद 134 - फौजदारी मामलों में अपील का अधिकार

👉अनुच्छेद 135 - सैन्य मामलों में अपील का अधिकार।

👉अनुच्छेद 136 - विशेष अपीळेल का अधिकार।

👉अनुच्छेद 137 - न्यायिक पूनावलोकन की शक्ति।

👉अनुच्छेद 141 - सुप्रिम कोट के सभी निर्णय सम्पुर्ण भारत में मान्य होंगे।

👉अनुच्छेद - 143 राष्ट्रपति का सुप्रिम कोट से परामर्श लेने का अधिकार।

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📔 संविधान की अनुसूचियां

◽️पहली अनुसूची – राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची
  ◽️दूसरी अनुसूची –वेतन, भत्ते और पेंशन।
  ◽️तीसरी अनुसूची– शपथ संबंधित उल्लेख।
  ◽️चौथी अनुसूची –राज्यसभा की सीटों का उल्लेख।
  ◽️पांचवी अनुसूची –अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन का उल्लेख।
  ◽️छठी अनुसूची –असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम का जनजातीय प्रशासन।
  ◽️सातवीं अनुसूची –केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का बंटवारा।
  ◽️आठवीं अनुसूची– भाषाएं
  ◽️नौवीं अनुसूची –भूमि सुधार संबंधित।
  ◽️दसवीं अनुसूची –दल बदल संबंधित प्रावधान।(52वां संशोधन–1985)
  ◽️ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायतों का प्रावधान।(73वां संशोधन–1992)
  ◽️बारहवीं अनुसूची – नगर निकायों का प्रावधान।(74वां संशोधन–1992)

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📕 स्वतंत्रता पश्चात भारत में भूमि सुधार

स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि व्यवस्था अत्यंत शोषणकारी थी। बिचौलियों (ज़मींदारों) का वर्चस्व था और किसान मात्र बटाईदार बनकर रह गए थे।

भूमि सुधारों को चार मुख्य स्तंभों में विभाजित किया जा सकता है।

​1. बिचौलियों का उन्मूलन (Abolition of Intermediaries)

​यह भूमि सुधार का पहला और सबसे सफल चरण था। इसका मुख्य उद्देश्य ज़मींदारी प्रथा को समाप्त कर भूमि का स्वामित्व वास्तविक काश्तकारों (किसानों) को देना था।

​प्रमुख अधिनियम: उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (UP Zamindari Abolition and Land Reforms Act - UPZALR)।
​
परिणाम: इस अधिनियम के माध्यम से लगभग 2 करोड़ काश्तकारों का सीधा संबंध राज्य से स्थापित हुआ। बिचौलियों को हटाकर भूमि का मालिकाना हक किसानों को दिया गया।


​2. काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms)

​जो किसान दूसरों की ज़मीन पर खेती करते थे, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए तीन स्तरों पर काम किया गया:

​लगान का विनियमन: लगान की दर को फसल के मूल्य के 1/4 या 1/5 भाग तक सीमित किया गया।

​पट्टे की सुरक्षा: किसानों को मनमाने ढंग से बेदखल करने पर रोक लगाई गई

।

​
स्वामित्व का अधिकार: लंबे समय से खेती कर रहे काश्तकारों को ज़मीन खरीदने या स्वामित्व प्राप्त करने का अधिकार दिया गया

।

​3. जोत की सीमा निर्धारण (Ceiling on Land Holdings)

​सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक परिवार के पास अधिकतम भूमि रखने की सीमा तय की गई। अतिरिक्त भूमि (Surplus Land) को भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों में वितरित करना इसका लक्ष्य था।


​अधिनियम: उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 (UP Imposition of Ceiling on Land Holdings Act)।

​संशोधन: 1972-73 में इस सीमा को और कम किया गया ताकि अधिक अधिशेष भूमि प्राप्त की जा सके।

​चुनौती: बेनामी संपत्ति और पारिवारिक बँटवारे के कानूनी दांवपेच के कारण यह चरण पूर्णतः सफल नहीं रहा।


​4. चकबंदी (Consolidation of Holdings)

​किसानों की भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी हुई थी, जिससे वैज्ञानिक खेती संभव नहीं थी। बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर एकत्रित करने की प्रक्रिया 'चकबंदी' कहलाई।


​अधिनियम: उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 (UP Consolidation of Holdings Act)।

​लाभ: सिंचाई और प्रबंधन में आसानी।
​मुकदमेबाजी में कमी।
​कृषि उत्पादकता में वृद्धि।

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उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों की दिशा में 'उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006' (UP Revenue Code, 2006) एक मील का पत्थर है। इसने स्वतंत्रता के बाद के दर्जनों जटिल कानूनों (जैसे UPZALR Act 1950) को समाहित कर एक सरल व्यवस्था दी है। इसे 11 फरवरी 2016 से प्रभावी रूप से लागू किया गया।


​1. जोतदारों (Tenure Holders) का सरलीकरण

​इस संहिता के तहत भूमि धारकों को मुख्यतः चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

​संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर (Bhumidhar with Transferable Rights):

इन्हें भूमि पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है। ये भूमि बेच सकते हैं, उपहार में दे सकते हैं या बंधक रख सकते हैं।

​असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर

(Bhumidhar with Non-Transferable Rights): इन्हें खेती का अधिकार है, लेकिन ये भूमि बेच नहीं सकते। हालांकि, 5 वर्ष की अवधि के बाद इन्हें संक्रमणीय अधिकार मिल सकते हैं।

​असामी (Asami): ये आमतौर पर पट्टेदार होते हैं जिन्हें विशिष्ट अवधि के लिए भूमि दी जाती है।

​सरकारी पट्टेदार: जिन्हें सरकार द्वारा विशेष उद्देश्यों के लिए भूमि आवंटित की जाती है।

​2. भूमि उपयोग का परिवर्तन (धारा 80)
​
पुराने कानूनों में कृषि भूमि को गैर-कृषि (आवासीय या औद्योगिक) घोषित कराना बहुत कठिन था।

​प्रावधान: अब कृषि भूमि का उपयोग गैर-कृषि कार्य के लिए करने हेतु एसडीएम (SDM) से अनुमति लेने की प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बना दिया गया है।
​3. दलितों और पिछड़ों की भूमि का संरक्षण

​भूमिहीनों और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं:

​धारा 98: अनुसूचित जाति (SC) का व्यक्ति अपनी भूमि गैर-SC व्यक्ति को जिलाधिकारी (DM) की पूर्व अनुमति के बिना नहीं बेच सकता।

​शर्त: अनुमति तभी मिलती है जब विक्रेता के पास बिक्री के बाद कम से कम 1.26 हेक्टेयर भूमि शेष बच रही हो, या कोई गंभीर आपात स्थिति (बीमारी, शिक्षा) हो।

​4. पट्टेदारी (Leasing) में ढील

​पुराने कानूनों में भूमि को पट्टे पर देना (बटाई पर देना) कानूनी रूप से प्रतिबंधित था, जिससे भू-स्वामी को भूमि छिन जाने का डर रहता था।

​नया प्रावधान: अब कोई भी भू-स्वामी अपनी भूमि को खेती के लिए कानूनी रूप से पट्टे पर दे सकता है। इससे 'बटाई' व्यवस्था को कानूनी मान्यता मिली है और भूमि मालिक का स्वामित्व सुरक्षित रहता है।

​5. स्वामित्व और उत्तराधिकार के नियम
​वसीयत:
संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर अपनी भूमि की वसीयत कर सकता है।

​उत्तराधिकार: यदि किसी किसान की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो उत्तराधिकार की एक स्पष्ट वरीयता सूची (Order of Succession) दी गई है, जिसमें अब बेटियों और विधवाओं के अधिकारों को अधिक स्पष्टता दी गई है।

​6. विवादों का निपटारा और डिजिटल रिकॉर्ड

​राजस्व न्यायालय: मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित किया गया है।

​सीमा विवाद (धारा 24): मेड़ या सीमा संबंधी विवादों के लिए SDM को त्वरित पैमाइश कराने का अधिकार दिया गया है।

​डिजिटलीकरण: खतौनी और खसरा का कंप्यूटरीकरण अनिवार्य किया गया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।



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📕 लेखपाल (Lekhpal) मुख्य कार्य


​1. भू-अभिलेखों का रखरखाव (Maintenance of Land Records)
​
लेखपाल का प्राथमिक कार्य अपने क्षेत्र (हलके) के भूमि रिकॉर्ड को अपडेट रखना है।

​खसरा और खतौनी: भूमि के मालिकाना हक और उपयोग का विवरण तैयार करना।

​नक्शा: गांव के नक्शे में बदलावों को दर्ज करना।


​2. सर्वेक्षण और निरीक्षण (Survey and Inspection)
​
पड़ताल: साल में तीन बार (रबी, खरीफ और जायद की फसल के समय) खेतों का निरीक्षण करना।
​फसल का ब्यौरा: यह दर्ज करना कि किस खेत में कौन सी फसल बोई गई है और उसका स्वास्थ्य कैसा है।

​3. आपदा और राहत कार्य (Disaster Relief)

​बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि या आगजनी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय नुकसान का आकलन करना।

​प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजा दिलाने के लिए रिपोर्ट तैयार कर तहसील में जमा करना।

​4. प्रमाण पत्र जारी करने में सहायता
​विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए आवश्यक दस्तावेजों की जांच करना:

​आय प्रमाण पत्र (Income Certificate)

​जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate)

​निवास प्रमाण पत्र (Domicile Certificate

)
​5. भूमि विवाद और सीमांकन
​गाँव में भूमि संबंधी छोटे-मोटे विवादों को सुलझाना।

​भूमि की पैमाइश (नाप-जोख) में कानूनगो और तहसीलदार की मदद करना।

​अवैध कब्जों की सूचना उच्च अधिकारियों को देना।

​6. अन्य सरकारी कार्य

​जनगणना: पशु गणना या कृषि गणना में भाग लेना।

​चुनाव: चुनाव के दौरान बीएलओ (BLO) या अन्य प्रशासनिक ड्यूटी निभाना।

​सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन: पेंशन, किसान सम्मान निधि और अन्य योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान करना।
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📕भूमि मापन इकाइयां (Land Measurement Units)

​यूपी में भूमि मापन की पारंपरिक इकाइयां अक्सर पूछी जाती हैं:

​1 बीघा = 20 बिस्वा
​1 बिस्वा = 20 बिस्वांसी
​1 लाठा = 99 इंच या 8 फीट 3 इंच
​1 एकड़ = 4840 वर्ग गज
​1 हेक्टेयर = 2.47 एकड़ (लगभग)


1. छोटे पैमाने (इकाई)

1 लाठा (Latha): 99 इंच या 8 फीट 3 इंच
1 उनवांसी (Unwansi): 24.5025 वर्ग इंच
1 कचवांसी (Kachwansi): 20 उनवांसी
1 बिसवांसी (Biswansi): 20 कचवांसी (या 1 वर्ग लाठा)


2. बिसवा और बीघा (सबसे प्रचलित)

उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में "बीघा" का माप थोड़ा बदल सकता है, लेकिन मानक माप इस प्रकार हैं:

1 बिसवा (Biswa): 20 बिसवांसी (लगभग 125 वर्ग मीटर या 1350 वर्ग फुट)
1 कच्चा बीघा (Kachcha Bigha): 6.66 बिसवा (यह पक्के बीघे का एक-तिहाई होता है)
1 पक्का बीघा (Pakka Bigha): 20 बिसवा


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UPPSC APO मुख्य परीक्षा कार्यक्रम जारी
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“याद रखिए —
यह संकट किसी एक देश का नहीं, पूरी दुनिया का है।युद्ध जब सीमाओं पर होता है, असर पूरी दुनिया की रसोई और जेब पर पड़ता है।”

अमेरिका–इज़रायल–ईरान तनाव के कारण
तेल सप्लाई, समुद्री रास्ते और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुए।इसी वजह से दुनिया के बड़े-बड़े देश भी सख्त कदम उठाने पर मजबूर हुए।

🇩🇪 जर्मनी
जिस देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे मजबूत मानी जाती है,
वहाँ सरकार ने लोगों से गैस और बिजली बचाने की अपील की।सड़क और सार्वजनिक जगहों की लाइटिंग कम की गई,हीटिंग सिस्टम सीमित किए गए,और उद्योगों में ऊर्जा खपत नियंत्रित करनी पड़ी।

🇺🇸 अमेरिका
अमेरिका को अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) तक खोलने पड़े
ताकि पेट्रोल-डीजल की कीमतों को काबू में रखा जा सके।
कई जगह ईंधन बचाने और अनावश्यक यात्रा कम करने की सलाह दी गई।

🇫🇷 फ्रांस
फ्रांस ने सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक भवनों में बिजली उपयोग कम किया,
रात की लाइटिंग सीमित की
और लोगों से “Energy Discipline” अपनाने की अपील की।

🇬🇧 ब्रिटेन
ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई और ऊर्जा संकट के कारण सरकार को जनता को राहत पैकेज देने पड़े।बिजली बिल नियंत्रित करने के लिए विशेषयोजनाएँ लागू करनी पड़ीं।

अब भारत को देखिए…140 करोड़ आबादी वाला देश।अगर इतनी बड़ी आबादी सिर्फ सरकार के भरोसे बैठ जाए,तो कोई भी व्यवस्था दबाव में आ सकती है।

अगर भारत की आबादी जर्मनी जितनी होती,
तो सरकार आराम से कुछ निकम्मों (यहां निकम्मा कुछ चूतियां इन्फ्लूएंसर, लुटियन पत्रकार, सो कॉल्ड बुद्धिजीवी ) को बैठाकर भी खिला देती।
लेकिन यहाँ 140 करोड़ लोगों का देश है —
यहाँ हर नागरिक की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

इसलिए समय की मांग है —
देश को कमजोर करने वाली बहस नहीं,
बल्कि जिम्मेदारी निभाने वाली सोच।


✔️ ईंधन बचाइए
✔️ काम और पढ़ाई कोऑनलाइन प्राथमिकता दीजिए
✔️ अफवाह नहीं, अनुशासन फैलाइए
✔️ क्योंकि यह सामान्य समय नहीं, वैश्विक संकट का दौर है।

भारत हर संकट से निकला है,
और इस बार भी निकलेगा —
अगर युवा जिम्मेदारी समझेंगे। 🇮🇳

जय हिंद जय भारत 🇮🇳🙏
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इनकी रियल्टी ये है कि ये बाजार से टमाटर और आलू नहीं खरीद सकते, ,चले है वैश्विक संकट के समय लाभ बनाने
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किसी राजनेता को क्यों लगता है, सत्ता उसकी बाप की बपौती है

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जनता को समझना होगा ,ये लोग केवल अपनी सत्ता के लिए मर रहे है इनको आपके लाभ या हानि का मतलब नहीं ही , राजनीति में नए लोगों को आने की आवश्यकता है,

हमें परम्परागत राजनेताओं का पिछलग्गू होना छोड़ना होगा, और बल्कि खुद आगे बढ़कर नेतृत्व करना होगा
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📕  परीक्षा दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण

👉 निंदा प्रस्ताव

◼️ लोकसभा में इसे स्वीकारने का कारण बताना अनिवार्य है
◼️ यह किसी एक मंत्री या मंत्रियों के समूह है या पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है
◼️ यह मंत्री परिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है
◼️ यदि यह लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्री परिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है

📕 अविश्वास प्रस्ताव

◼️ लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना आवश्यक नहीं है
◼️ यह सिर्फ पूरे मंत्री परिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है
◼️ यह मंत्री परिषद में लोकसभा के विश्वास के निर्धारण हेतु लाया जाता है
◼️ यदि लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्री परिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है
◼️ इस प्रस्ताव के समर्थन में 50 सदस्यों की सहमति अनिवार्य है

📕 विश्वास प्रस्ताव
◼️ त्रिशंकु दल,अल्पमत सरकार या गठबंधन सरकार आदि परिस्थितियों से निपटने के लिए इस विश्वास प्रस्ताव का प्रावधान किया गया है
◼️ इसे सरकार को सदन में बहुमत सिद्ध करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किया जाता है
◼️ यदि विश्वास प्रस्ताव गिर जाता है तब सरकार भी गिर जाती है



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उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियाँ

👉उत्तर प्रदेश भारत में सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में से एक है और कई आदिवासी समुदायों का घर भी है। राज्य में कुछ मुख्य जनजातियाँ बैगा, अगरिया, बुक्सा, कोल और अधिक हैं और उनमें से कुछ को भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है।

👉उत्तर प्रदेश की जनजातीय आबादी ज्यादातर उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों से आती है और पूरे राज्य में सबसे कमजोर समुदायों में से एक है।
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👉जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल जनजातियों की संख्या 11,34,273 है।
संविधान के अनुच्छेद 342 में जनजातियां उल्लेखित हैं।
👉सबसे ज्यादा जनसंख्या थारू जनजाति की है।
👉उत्तर प्रदेश में कुल 12 जनजातियां हैं।
सबसे पुरानी जनजाति थारू तथा बुक्सा है।
सबसे ज्यादा जनजाति सोनभद्र जनपद में तथा सबसे कम जनजाति बागपत में हैं।
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✅थारू जनजाति उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति है|
थारू जनजाति के लोग उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के तराई भाग में निवास करते है
✅थारू जनजाति के लोग किरात वंश से सम्बंधित है
थारुओ द्वारा बजहर नामक त्यौहार मनाया जाता है दीपावली को ये शोक पर्व के रूप में मनाते है , थारू जनजाति द्वारा होली के मौके पर खिचड़ी नृत्य किया जाता है
✅थारू जनजाती के लोगो में बदला विवाह प्रथा तथा तीन टिकठी विवाह प्रथा प्रचलित है , थारुओ में दोनों पक्षो से विवाह तय हो जाने को पक्की पोड़ी कहा जाता है
उत्तर प्रदेश में 2 अक्टूबर 1980 को थारू विकास परियोजना का प्रारंभ किया गया
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