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अध्याय–4 : नागरिकता (Citizenship)
(भाग II — अनुच्छेद 5 से 11)
नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच का पूर्ण कानूनी संबंध (Full Legal Relationship) है। यह अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सहभागिता का आधार है। भारत में नागरिकता की संपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भाग II (अनुच्छेद 5–11) में दी गई है
A. संवैधानिक प्रावधान (Articles 5–11)
भारतीय संविधान नागरिकता से जुड़ी दो ही चीजें निर्धारित करता है—
संविधान ने यह नहीं बताया कि 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता कैसे मिलेगी—यह कार्य संसद को सौंपा गया है।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारम्भ पर नागरिकता
यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसमें “Domicile + Birth/Parentage/Residence” का संयुक्त आधार मिलता है।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (Refugees/Migrants)
जो व्यक्ति पाकिस्तान से भारत आए (Migrated) थे—
• यदि वे 19 जुलाई 1948 से पहले आए, तो स्वतः नागरिक।
• अगर 19 जुलाई 1948 के बाद आए, तो भारत सरकार के पास पंजीकरण कराकर नागरिकता प्राप्त करनी होगी।
यह प्रावधान विभाजन (Partition) के समय आए हिंदू, सिख आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए, फिर लौटे व्यक्तियों की नागरिकता
अनुच्छेद 8 — विदेश में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO)
अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है—
• उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
• भारत दोहरी नागरिकता नहीं देता।
यह अनुच्छेद Citizenship Act, 1955 के साथ मिलकर लागू होता है।
अनुच्छेद 10 — नागरिकता जारी रहने का अधिकार
जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून का उल्लंघन न किया जाए—
• सभी भारतीय नागरिक अपने नागरिकता अधिकार बनाए रखते हैं।
अनुच्छेद 11 — संसद की पूर्ण शक्ति
C. नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955)
यह नागरिकता से जुड़े सभी नियमों का मुख्य कानून है। इसमें बार–बार संशोधन हुए—विशेष रूप से वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
I. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके (Acquisition of Citizenship)
1. जन्म से (By Birth)
1950–1987 :
• भारत में जन्मा हर व्यक्ति नागरिक — माता-पिता कौन हैं इससे फर्क नहीं।
1987 संशोधन के बाद :
2. वंश के आधार पर (By Descent)
1950–1992 :
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(भाग II — अनुच्छेद 5 से 11)
नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच का पूर्ण कानूनी संबंध (Full Legal Relationship) है। यह अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सहभागिता का आधार है। भारत में नागरिकता की संपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था भाग II (अनुच्छेद 5–11) में दी गई है
A. संवैधानिक प्रावधान (Articles 5–11)
भारतीय संविधान नागरिकता से जुड़ी दो ही चीजें निर्धारित करता है—
1. 26 जनवरी 1950 को कौन भारतीय नागरिक बना (Articles 5–8
2. नागरिकता पर कानून बनाने की शक्ति किसके पास है (Article 11)
संविधान ने यह नहीं बताया कि 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता कैसे मिलेगी—यह कार्य संसद को सौंपा गया है।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारम्भ पर नागरिकता
26 जनवरी 1950 को वह व्यक्ति भारत का नागरिक माना गया जो—
• भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवासित (Domicile) था, और
• या तो भारत में जन्मा था,
• या उसके माता-पिता में से कोई भारत में जन्मा था,
• या वह व्यक्ति संविधान लागू होने के ठीक पहले कम से कम 5 वर्ष से भारत में सामान्य रूप से रह रहा हो।
यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसमें “Domicile + Birth/Parentage/Residence” का संयुक्त आधार मिलता है।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (Refugees/Migrants)
जो व्यक्ति पाकिस्तान से भारत आए (Migrated) थे—
• यदि वे 19 जुलाई 1948 से पहले आए, तो स्वतः नागरिक।
• अगर 19 जुलाई 1948 के बाद आए, तो भारत सरकार के पास पंजीकरण कराकर नागरिकता प्राप्त करनी होगी।
यह प्रावधान विभाजन (Partition) के समय आए हिंदू, सिख आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए, फिर लौटे व्यक्तियों की नागरिकता
जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चले गए थे और बाद में वापस भारत लौटे—
• उन्हें “Evacuee Property Law” के अधीन माना गया।
• ऐसे व्यक्तियों को नागरिकता पाने हेतु भारतीय सरकार के सामने कम से कम 6 माह का निवास + पंजीकरण आवश्यक था।
यह प्रावधान उन लोगों के लिए था जो विभाजन के बाद दोनों तरफ जाते रहे।
अनुच्छेद 8 — विदेश में रह रहे भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO)
भारत में जन्मे माता/पिता/दादा/दादी के वंशज, जो विदेश में रहते थे, भारतीय नागरिकता ले सकते थे—
• भारत के दूतावास या कौंसुलर (Consular) कार्यालय में पंजीकरण कराकर।
यह प्रावधान भारतीय वंश के विदेशियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है।
अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता समाप्त
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है—
• उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
• भारत दोहरी नागरिकता नहीं देता।
यह अनुच्छेद Citizenship Act, 1955 के साथ मिलकर लागू होता है।
अनुच्छेद 10 — नागरिकता जारी रहने का अधिकार
जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून का उल्लंघन न किया जाए—
• सभी भारतीय नागरिक अपने नागरिकता अधिकार बनाए रखते हैं।
अनुच्छेद 11 — संसद की पूर्ण शक्ति
संसद को अधिकार है कि वह नागरिकता से संबंधित—
• अधिग्रहण (Acquisition),
• समाप्ति (Termination),
• विनियमन (Regulation)
पर कोई भी कानून बनाए।
इसी शक्ति के अंतर्गत नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act 1955) बनाया गया।
B. भारत में नागरिकता की प्रकृति (Nature of Citizenship)
भारत में—
• एकल नागरिकता (Single Citizenship) होती है, जैसे ब्रिटेन में।
• व्यक्ति केवल “भारत” का नागरिक होता है, किसी “राज्य” का नहीं।
• भारत संघीय होते हुए भी USA की तरह “Dual Citizenship” (Union + State) नहीं देता।
यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के लिए उपयुक्त मानी गई।
C. नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955)
यह नागरिकता से जुड़े सभी नियमों का मुख्य कानून है। इसमें बार–बार संशोधन हुए—विशेष रूप से वर्ष 1986, 1992, 2003, 2005 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
I. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके (Acquisition of Citizenship)
1. जन्म से (By Birth)
1950–1987 :
• भारत में जन्मा हर व्यक्ति नागरिक — माता-पिता कौन हैं इससे फर्क नहीं।
1987 संशोधन के बाद :
• माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होना चाहिए।2004 संशोधन के बाद :
• दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों,
या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा “अवैध प्रवासी” (Illegal Migrant) न हो।
➤ विदेशी राजनयिक (Diplomat) के बच्चों को नागरिकता नहीं मिलती।
➤ शरणार्थियों के जन्में बच्चों को स्वतः नागरिकता नहीं।
2. वंश के आधार पर (By Descent)
1950–1992 :
• विदेश में जन्मा व्यक्ति नागरिक तभी, जब पिता भारतीय नागरिक हो।
1992 के बाद :
• माता या पिता में से कोई भी भारतीय नागरिक हो।
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📕अध्याय 6 : राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (Directive Principles of State Policy – DPSP)
भाग IV — अनुच्छेद 36 से 51
DPSP वे सिद्धांत हैं जो भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social & Economic Democracy) स्थापित करने के लिए सरकार को दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाना है।
A. DPSP की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ
• DPSP का स्रोत आयरलैंड का संविधान है, और आयरलैंड ने इन्हें स्पेन से लिया था।
• इनका मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक व आर्थिक न्याय की स्थापना कर एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
• ये सिद्धांत गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं — अर्थात् अदालत इनके उल्लंघन पर इन्हें लागू नहीं करवा सकती।
• डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इन्हें भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता (Novel Features) कहा है।
• के. टी. शाह ने DPSP को “ऐसा चेक बताया जो बैंक अपने मन से भुना सके”, अर्थात् सरकार जब चाहे, तब इन्हें लागू करे।
• DPSP केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए नैतिक एवं संवैधानिक दिशा-निर्देश हैं।
B. निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण
हालाँकि संविधान में कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है, परंतु इनमें सम्मिलित विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें तीन समूहों में बांटा गया है:
1. समाजवादी सिद्धांत
2. गांधीवादी सिद्धांत
3. उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual) सिद्धांत
1. समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)
यह सिद्धांत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर जोर देते हैं।
अनुच्छेद 38
▪️ राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा।
• यह राज्य के दायित्व है कि वह आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करे।
• 44वें संशोधन द्वारा इसके दायरे को बढ़ाया गया (38(2))।
अनुच्छेद 39
राज्य निम्नलिखित नीतियों को लागू करने का प्रयास करेगा—
• प्रत्येक नागरिक को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
• समुदाय के संसाधनों का समान वितरण हो।
• धन एवं उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोकना।
• पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना।
• श्रमिकों का स्वास्थ्य, शक्ति और बच्चों के विकास की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 39A (42वाँ संशोधन, 1976)
• गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) प्रदान करना।
अनुच्छेद 41
• बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में कार्य करने, शिक्षा पाने तथा सार्वजनिक सहायता का अधिकार देना।
अनुच्छेद 42
• मानवीय कार्य दशाएँ एवं मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना।
अनुच्छेद 43
• सभी श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage), सभ्य जीवन स्तर और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर देना।
अनुच्छेद 43A (42वाँ संशोधन)
• उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
2. गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)
ये सिद्धांत महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वावलंबन और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं।
अनुच्छेद 40
• ग्राम पंचायतों का संगठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।
▪️अनुच्छेद 43B (97वाँ संशोधन, 2011)
▪️अनुच्छेद 46
▪️अनुच्छेद 47
▪️अनुच्छेद 48
3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal–Intellectual Principles)
▪️अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता (UCC)
▪️अनुच्छेद 45 (86वाँ संशोधन द्वारा संशोधित)
▪️अनुच्छेद 48A (42वाँ संशोधन)
▪️अनुच्छेद 49
▪️अनुच्छेद 50
भाग IV — अनुच्छेद 36 से 51
DPSP वे सिद्धांत हैं जो भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social & Economic Democracy) स्थापित करने के लिए सरकार को दिशा प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाना है।
A. DPSP की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ
• DPSP का स्रोत आयरलैंड का संविधान है, और आयरलैंड ने इन्हें स्पेन से लिया था।
• इनका मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक व आर्थिक न्याय की स्थापना कर एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
• ये सिद्धांत गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं — अर्थात् अदालत इनके उल्लंघन पर इन्हें लागू नहीं करवा सकती।
• डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इन्हें भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता (Novel Features) कहा है।
• के. टी. शाह ने DPSP को “ऐसा चेक बताया जो बैंक अपने मन से भुना सके”, अर्थात् सरकार जब चाहे, तब इन्हें लागू करे।
• DPSP केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए नैतिक एवं संवैधानिक दिशा-निर्देश हैं।
B. निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण
हालाँकि संविधान में कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं है, परंतु इनमें सम्मिलित विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें तीन समूहों में बांटा गया है:
1. समाजवादी सिद्धांत
2. गांधीवादी सिद्धांत
3. उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual) सिद्धांत
1. समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles)
यह सिद्धांत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर जोर देते हैं।
अनुच्छेद 38
▪️ राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा।
• यह राज्य के दायित्व है कि वह आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करे।
• 44वें संशोधन द्वारा इसके दायरे को बढ़ाया गया (38(2))।
अनुच्छेद 39
राज्य निम्नलिखित नीतियों को लागू करने का प्रयास करेगा—
• प्रत्येक नागरिक को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
• समुदाय के संसाधनों का समान वितरण हो।
• धन एवं उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोकना।
• पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना।
• श्रमिकों का स्वास्थ्य, शक्ति और बच्चों के विकास की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
अनुच्छेद 39A (42वाँ संशोधन, 1976)
• गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) प्रदान करना।
अनुच्छेद 41
• बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में कार्य करने, शिक्षा पाने तथा सार्वजनिक सहायता का अधिकार देना।
अनुच्छेद 42
• मानवीय कार्य दशाएँ एवं मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना।
अनुच्छेद 43
• सभी श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage), सभ्य जीवन स्तर और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर देना।
अनुच्छेद 43A (42वाँ संशोधन)
• उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
2. गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)
ये सिद्धांत महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वावलंबन और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं।
अनुच्छेद 40
• ग्राम पंचायतों का संगठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाई बनाना।
▪️अनुच्छेद 43B (97वाँ संशोधन, 2011)
सहकारी समितियों (Co-operative Societies) को बढ़ावा देना तथा लोकतांत्रिक प्रबंधन सुनिश्चित करना।
▪️अनुच्छेद 46
SC, ST और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों का संवर्धन।
• विशेष ध्यान: सामाजिक अन्याय तथा शोषण से इनकी सुरक्षा।
▪️अनुच्छेद 47
पोषण सुधारना, जीवन स्तर ऊँचा करना और जन स्वास्थ्य में सुधार करना।
• शराब और नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाने का प्रयास
▪️अनुच्छेद 48
गाय, बछड़ों एवं अन्य दुधारू-पाशवों के वध पर रोक तथा उनके संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाना।
3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal–Intellectual Principles)
ये सिद्धांत आधुनिक, प्रगतिशील, वैज्ञानिक और मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित करते हैं।
▪️अनुच्छेद 44 — समान नागरिक संहिता (UCC)
• पूरे भारत के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास।
• तथ्य: वर्तमान में केवल गोवा में UCC लागू है।
▪️अनुच्छेद 45 (86वाँ संशोधन द्वारा संशोधित)
• 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्य देखभाल और शिक्षा (ECCE) का प्रावधान।
पहले 14 वर्ष तक शिक्षा का प्रावधान था, जिसे अनुच्छेद 21A में स्थानांतरित किया गया।
▪️अनुच्छेद 48A (42वाँ संशोधन)
पर्यावरण की सुरक्षा एवं सुधार, वन और वन्यजीव संरक्षण।
▪️अनुच्छेद 49
राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, वस्तुओं और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा।
▪️अनुच्छेद 50
न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना — Separation of Judiciary from Executive।
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📕नीति निर्देशक सिद्धांत के संदर्भ में विद्वानों/ संविधान निर्माताओं के विचार।
1. डॉ० बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
2. के.टी. शाह (K.T. Shah)
4. के. संथानम (K. Santhanam)
5. के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare)
6. सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings)
7. ग्रनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
8. बी.एन. राव (B.N. Rao)
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1. डॉ० बी.आर. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
"निदेशक तत्व विधायिका और कार्यपालिका के लिए अनुदेश हैं।"
→ ये तत्व सरकार को समाज के कल्याण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
2. के.टी. शाह (K.T. Shah)
"राज्य का नीति निर्देशक तत्व एक ऐसा चेक है जो बैंक की सुविधानुसार अदा की जाएगी।"3. टी.टी. कृष्णमचारी (T.T. Krishnamachari)
→ उनका मत था कि ये केवल सिफारिशें हैं, जिनका पालन सरकार की आर्थिक और व्यावहारिक स्थिति पर निर्भर करता है।
"भावनाओं का स्थाई कूड़ाघर"
→ उन्होंने इसे केवल आदर्शवादी भावनाओं और आकांक्षाओं का संग्रह कहा, जो व्यवहार में पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकते।
4. के. संथानम (K. Santhanam)
"इन तत्त्वों से केंद्र और राज्य के मध्य संवैधानिक टकराव होगा।"
→ नीति निर्देशक तत्त्वों के कारण संघीय ढांचे में विवाद की संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
5. के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare)
"लक्ष्य एवं आकांक्षाओं का घोषणपत्र"
→ ये तत्त्व राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों का प्रतिपादन करते हैं।
6. सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings)
"इन तत्वों का कोई नियमित प्रतिमान दर्शन नहीं है", "ये तत्व समाजवाद के बिना फेबियन समाजवाद हैं"
→ उन्होंने इसे एक आदर्शवादी लेकिन लचीला मार्गदर्शन माना, जो समाजवादी विचारों को बिना कठोर रूप से लागू किए प्रकट करता है।
7. ग्रनविल ऑस्टिन (Granville Austin)
"सविधान की आत्मा, निदेशक तत्व और अधिकार संविधान की मूल आत्मा हैं"
→ उनके अनुसार ये तत्त्व संविधान की मूल भावना और उद्देश्य को प्रकट करते हैं।
8. बी.एन. राव (B.N. Rao)
"निदेशक तत्व राज्य प्राधिकारियों के लिए आवश्यकता, नैतिक आवश्यकता और शैक्षिक मूल्य हैं"
→ वे इसे प्रशासनिक, नैतिक और शैक्षिक दृष्टि से आवश्यक मानते हैं।
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✅स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आंदोलन एवं वर्ष
♜ बंग-भंग आंदोलन(स्वदेशी आंदोलन)
➜ 1905 ई.
♜ मुस्लिम लीग की स्थापना
➜ 1906 ई.
♜ कांग्रेस का बंटवारा
➜ 1907 ई.
♜ होमरूल आंदोलन
➜ 1916 ई.
♜ लखनऊ पैक्ट
➜ दिसंबर 1916 ई.
♜ मांटेग्यू घोषणा
➜ 20 अगस्त 1917 ई.
♜ रौलेट एक्ट
➜ 19 मार्च 1919 ई.
♜ जालियांवाला बाग हत्याकांड
➜ 13 अप्रैल 1919 ई.
♜ खिलाफत आंदोलन
➜ 1919 ई.
♜ हंटर कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित
➜ 18 मई 1920 ई.
♜ कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1920 ई.
♜ असहयोग आंदोलन की शुरुआत
➜ 1 अगस्त 1920 ई.
♜ चौरी-चौरा कांड
➜ 5 फरवरी 1922 ई.
♜ स्वराज्य पार्टी की स्थापना
➜ 1 जनवरी 1923 ई.
♜ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
➜ अक्टूबर 1924 ई.
♜ साइमन कमीशन की नियुक्ति
➜ 8 नवंबर 1927 ई.
♜ साइमन कमीशन का भारत आगमन
➜ 3 फरवरी 1928 ई.
♜ नेहरू रिपोर्ट
➜ अगस्त 1928 ई.
♜ बारदौली सत्याग्रह
➜ अक्टूबर 1928 ई.
♜ लाहौर पड्यंत्र केस
➜ 8 अप्रैल 1929 ई.
♜ कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
➜ दिसंबर 1929 ई.
♜ स्वाधीनता दिवस की घोषणा
➜ 2 जनवरी 1930 ई.
♜ नमक सत्याग्रह
➜ 12 मार्च 1930 ई. से 5 अप्रैल 1930 ई. तक
♜ सविनय अवज्ञा आंदोलन
➜ 6 अप्रैल 1930 ई.
♜ प्रथम गोलमेज आंदोलन
➜ 12 नवंबर 1930 ई.
♜ गांधी-इरविन समझौता
➜ 8 मार्च 1931 ई.
♜ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 7 सितंबर 1931 ई.
♜ कम्युनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)
➜ 16 अगस्त 1932 ई.
♜ पूना पैक्ट
➜ सितंबर 1932 ई.
♜ तृतीय गोलमेज सम्मेलन
➜ 17 नवंबर 1932 ई.
♜ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन
➜ मई 1934 ई.
♜ फॉरवर्ड ब्लाक का गठन
➜ 1 मई 1939 ई.
♜ मुक्ति दिवस
➜ 22 दिसंबर 1939 ई.
♜ पाकिस्तान की मांग
➜ 24 मार्च 1940 ई.
♜ अगस्त प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1940 ई.
♜ क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव
➜ मार्च 1942 ई.
♜ भारत छोड़ो प्रस्ताव
➜ 8 अगस्त 1942 ई.
♜ शिमला सम्मेलन
➜ 25 जून 1945 ई.
♜ नौसेना का विद्रोह
➜ 19 फरवरी 1946 ई.
♜ प्रधानमंत्री एटली की घोषण
➜ 15 मार्च 1946 ई.
♜ कैबिनेट मिशन का आगमन
➜ 24 मार्च 1946 ई.
♜ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
➜ 16 अगस्त 1946 ई.
♜ अंतरिम सरकार की स्थापना
➜ 2 सितंबर 1946 ई.
♜ माउंटबेटन योजना
➜ 3 जून 1947 ई.
♜ स्वतंत्रता मिली➜ 15 अगस्त 1947 ई.
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📕पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा
संवैधानिक दर्जा क्या है?
जब किसी संस्था को संविधान में स्थायी दर्जा, अधिकार व दायित्व मिलते हैं, तो उसे संवैधानिक दर्जा कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तिथियाँ:
👉लोकसभा में पारित: 22 दिसंबर 1992
👉राज्यसभा में पारित: 23 दिसंबर 1992
👉राष्ट्रपति की स्वीकृति: 20 अप्रैल 1993
👉प्रभावी तिथि: 24 अप्रैल 1993 (संवैधानिक दर्जा प्रभावी)
👉संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला l
👉प्रधानमंत्री (उस समय): पी. वी. नरसिम्हा राव
✍73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
✍भाग-9 (अनु. 243-क से 243-ण) जोड़ा गया
✍ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषयों का उल्लेख
✍उत्तर प्रदेश में इनमें से 16 विषय पंचायतों को हस्तांतरित l
🍁नीति निदेशक तत्व:
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों की स्थापना हेतु राज्यों को निर्देश
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🔴पहली बार 2010 में मनाया गया
हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है
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संवैधानिक दर्जा क्या है?
जब किसी संस्था को संविधान में स्थायी दर्जा, अधिकार व दायित्व मिलते हैं, तो उसे संवैधानिक दर्जा कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तिथियाँ:
👉लोकसभा में पारित: 22 दिसंबर 1992
👉राज्यसभा में पारित: 23 दिसंबर 1992
👉राष्ट्रपति की स्वीकृति: 20 अप्रैल 1993
👉प्रभावी तिथि: 24 अप्रैल 1993 (संवैधानिक दर्जा प्रभावी)
👉संविधान के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला l
👉प्रधानमंत्री (उस समय): पी. वी. नरसिम्हा राव
👉संविधान संशोधन:
✍73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
✍भाग-9 (अनु. 243-क से 243-ण) जोड़ा गया
✍ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषयों का उल्लेख
✍उत्तर प्रदेश में इनमें से 16 विषय पंचायतों को हस्तांतरित l
🍁नीति निदेशक तत्व:
अनुच्छेद 40 – ग्राम पंचायतों की स्थापना हेतु राज्यों को निर्देश
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राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस:
🔴पहली बार 2010 में मनाया गया
हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है
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📕 पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद एक दृष्टि में
अनुच्छेद विषय - वस्तु
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अनुच्छेद विषय - वस्तु
◾️243 परिभाषाएँ
◾️243 (A) ग्राम सभा
◾️243 (B) पंचायतों का गठन
◾️243 (C) पंचायतों की संरचना
◾️243 (D) स्थानों का आरक्षण
◾️243 (E) पंचायतों की अवधि आदि
◾️243 (F) सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
◾️243 (G) पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
◾️243 (H) पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
◾️243 (I) वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
◾️243 (J) पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
◾️243 (K) पंचायतों के लिए निर्वाचन
◾️243 (L) संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
◾️243 (M) इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना
◾️243 (N) विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना
◾️243 (O) निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न
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आज आधुनिक इतिहास का रिवीजन कराया जाएगा👆👆
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क्रिप्स मिशन
👉मार्च, 1942 में भारत आया।
👉 प्रस्ताव
1. युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन राज्य का दर्जा दिया जाएगा जो किसी बाहरी सत्ता के अधीन नहीं होगा।
2. भारतीयों को अपना संविधान निर्मित करने का अधिकार दिया जाएगा, जिसके लिए युद्ध के बाद एक संविधान निर्मात्री परिषद बनेगी, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों के निर्वाचित सदस्य और देशी रजवाड़ों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
3. ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत यदि नए संविधान को स्वीकार न करना चाहे, तो उसे वर्तमान संवैधानिक स्थिति बनाए रखने का अधिकार होगा। नए संविधान को न स्वीकार करने वाले प्रांतों को अपना अलग संविधान बनाने की आज्ञा होगी।
4. युद्ध के दौरान ब्रिटिश वायसराय की एक नई कार्यकारी परिषद का गठन किया जाएगा, जिसमें भारतीय जनता के प्रमुख वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे लेकिन रक्षा मंत्रालय ब्रिटिश नेतृत्व के पास होगा।
👉महात्मा गांधी ने इसे 'उत्तर तिथीय चेक' (Post-Dated Cheque) की संज्ञा दी।
👉क्रिप्स मिशन के साथ कांग्रेस के आधिकारिक वार्ताकार पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं मौलाना आजाद थे।
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👉12 अगस्त, 1946 को लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के लिए निमंत्रण दिया।
👉24 अगस्त, 1946 को पं. नेहरू के नेतृत्व में भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की घोषणा
👉2 सितंबर, 1946 को इसका गठन हुआ, जिसमें प्रारंभ में मुस्लिम लीग की भागीदारी नहीं थी।
👉 डॉ. राजेंद्र प्रसाद _ खाद्य एवं कृषि मंत्री
👉रक्षा विभाग बलदेव सिंह
👉 विदेश मामले तथा राष्ट्रमंडल _ जवाहरलाल नेहरू
👉 आसफ अली _ रेल और परिवहन विभाग
👉अक्टूबर, 1946 में लीग के पांच सदस्य सरकार में शामिल हो गए।
👉लियाकत अली _ वित्त मंत्री
👉, जिन्होंने नया बजट प्रस्तुत करते समय उद्योगपतियों और व्यापारियों पर अत्यधिक कर लगाए।
👉 अंतरिम सरकार में अबुल कलाम आजाद मंत्री नहीं थे। * इस सरकार में शामिल होने वाले 12 कांग्रेसी मंत्री थे-पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आसफ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरत चंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेव सिंह, सर शफात अहमद खां, जगजीवन राम, सैयद अली जहीर और सी.एच. भाभा ।
👉 हालांकि 2 सितंबर, 1946 को गठित अंतरिम सरकार में लियाकत अली प्रारंभ में शामिल नहीं थे,
👉लियाकत अली सहित लीग के 5 सदस्यों को 26 अक्टूबर, 1946 को सरकार में मंत्री बनाया गया जिसके कारण तीन कांग्रेसी सदस्यों सैयद अली जहीर, शरत चंद्र बोस तथा सर शफात अहमद खां को हटना पड़ा।
👉बंगाल में ए. के. फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी तथा मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार वर्ष 1946 के चुनाव में सत्ता में आई किंतु बाद में मुस्लिम लीग का मंत्रिमंडल गठित हुआ, जो 14 अगस्त, 1947 तक सत्ता में रहा।
👉 इसके प्रधानमंत्री एच. एस. सुहरावर्दी थे।
👉16 अगस्त, 1946 की तिथि मुस्लिम लीग द्वारा "सीधी कार्यवाही दिवस" हेतु सुनिश्चित की गई थी।
👉 इस कार्यवाही में 'नोआखाली' दंगे का प्रमुख केंद्र रहा।
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👉 अंग्रेज-मराठा संघर्ष के अन्तर्गत होने वाली प्रमुख संधियाँ
👉 प्रथम अंगल मराठा युद्ध -
👉 द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध -
👉 तृतीय अंगल मराठा युद्ध -
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सूरत की संधि - 1775
पुरन्दर की संधि -1776
बड़गाँव की संधि-1779
सालाबाई की संधि-1782
बसीन की संधि-1802
देवगाँव की संधि -1803
सुर्जी अर्जुनगाँव की संधि -1803
राजापुर घाट की संधि -1804
नागपुर की संधि -1816
ग्वालियर की संधि -1817
पूना की संधि -1817
मंदसौर की संधि -1818
👉 प्रथम अंगल मराठा युद्ध -
1782 ई. में सालबाई की संधि से समाप्त हुआ
👉 द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध -
1803 से 1805 तक लड़ा गया यह 1803 में देवगांव की संधि से समाप्त हुआ
👉 तृतीय अंगल मराठा युद्ध -
1817 1819 में लड़ा गया और इसके द्वारा मराठा शक्ति और
पेशवा के वंशानुगत पद को खत्म कर दिया गया
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📕 होमरूल लीग (1916)
📕 चंपारण सत्याग्रह (1917)–
👉 अहमदाबाद मिल आंदोलन (1918)–
👉 खेड़ा सत्याग्रह (1918)–
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👉अप्रैल 1916 में पुणे में बाल गंगाधर तिलक द्वारा होमरूल लीग प्रारंभ किया गया।
👉सितंबर 1916 में मद्रास में एनी बेसेंट द्वारा होम रूल आंदोलन प्रारंभ किया गया।
👉इस आंदोलन के मुख्य सहयोगी जॉर्ज अरुडेल , सीपी रामास्वामी अय्यर तथा बीपी वाडिया थे।
📕 चंपारण सत्याग्रह (1917)–
बिहार के चंपारण में गांधी जी द्वारा सत्याग्रह का पहला प्रयोग 1917 में किया गया।
नील बागान मालिकों द्वारा तिनकाठिया पद्धति से किसानों की स्थिति बहुत दर्दनीय हो गई थी।
किसान राजकुमार शुक्ला ने गांधी जी को इस स्थिति से अवगत कराया।
👉 अहमदाबाद मिल आंदोलन (1918)–
▪️यह आंदोलन मिल मालिकों एवं मजदूरों के बीच प्लेग बोनस को लेकर हुआ।
👉 खेड़ा सत्याग्रह (1918)–
👉खेड़ा में किसानों की अकाल पड़ने के कारण फसल बर्बाद हो गई थी , इसके बावजूद सरकार द्वारा मालगुजारी वसूल की जा रही थी।
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📕 महत्वपूर्ण घटना क्रम
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👉जलियाँवाला बाग हत्याकांड –13 अप्रैल 1919
👉रॉलेट एक्ट–19 मार्च 1919
👉असहयोग आंदोलन की शुरुआत–1 अगस्त 1920
👉असहयोग आंदोलन की समाप्ति–12 फरवरी 1922
👉चौरी चौरा कांड–4 फरवरी 1922
👉स्वराज पार्टी की स्थापना–1 जनवरी 1923
👉साइमन कमीशन का भारत आगमन–3 फरवरी 1928
👉बारदोली सत्याग्रह–1928
👉नमक सत्याग्रह / दांडी मार्च–12 मार्च 1930
👉सविनय अवज्ञा आंदोलन –6 अप्रैल 1930
👉गाँधी-इरविन समझौता –5 मार्च 1931
👉कम्युनल अवार्ड की घोषणा–16 अगस्त 1932
👉पूना पैक्ट–24 सितंबर 1932
👉मुस्लिम लीग द्वारा घोषित मुक्ति दिवस–22 दिसंबर 1939
👉मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग–24 मार्च 1940
👉अगस्त प्रस्ताव–8 अगस्त 1940
👉शिमला सम्मेलन–25 जून 1945
👉नौसेना विद्रोह–फरवरी 1946
👉कैबिनेट मिशन का भारत आगमन–24 मार्च 1946
👉प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस की घोषणा–16 अगस्त 1946
👉अंतरिम सरकार का गठन–2 सितंबर 1946
👉भूदान आंदोलन की शुरुआत–18 अप्रैल 1951
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📕स्वदेशी आंदोलन
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👉7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउनहॉल में आयोजित एक विशाल बैठक में बहिष्कार प्रस्ताव के पारित होने के साथ, स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक घोषणा की गई।
👉क्रोध करने के लि स्वदेशी आंदोलन की जड़ें विभाजन विरोधी आंदोलन में थीं, जो लॉर्ड कर्ज़न के बंगाल प्रांत को विभाजित करने के फैसले का विरोध करने के लिये शुरू किया गया था।
वर्ष 1906 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में कॉन्ग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया, जिसमें स्वशासन या स्वराज को INC के लक्ष्य के रूप में घोषित किया गया।
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🔳 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
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▪️ स्थापना–एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम द्वारा 1885ई.▪️ बंगाल विभाजन ( 1905)–
▪️ पहला अधिवेशन – 28 दिसंबर 1885 को बंबई के "गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज" में किया गया ।
▪️इस समय वायसराय लॉर्ड डफरिन था।
▪️प्रथम अधिवेशन में भाग लेने वाले सदस्यों की संख्या 72 थी।
▪️प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी तथा सचिव ए. ओ. ह्यूम थे।
▪️ प्रथम पारसी अध्यक्ष – दादाभाई नौरोजी(कलकत्ता,1886)
▪️ प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष – बदरुद्दीन तैयबजी(मद्रास,1887)
▪️ प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष – जॉर्ज युले(इलाहाबाद,1888)
▪️ प्रथम महिला अध्यक्ष – एनी बेसेंट (कलकत्ता,1917)
▪️ प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष – श्रीमती सरोजिनी नायडू ( कानपुर,1925)
▪️1907 ईस्वी में कांग्रेस में विभाजन हुआ।
▪️गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन के काल में ।
▪️20 जुलाई,1905 को बंगाल विभाजन की घोषणा हुई।
▪️7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा हुई
▪️16 अक्टूबर 1905 से बंगाल विभाजन की घोषणा लागू हुई।
▪️कांग्रेस के 1905 के बनारस अधिवेशन में स्वदेशी आंदोलन का अनुमोदन किया गया।
▪️इसी दौरान अंग्रेज अधिकारी वैलेंटाइंस शिरोल ने तिलक को भारतीय अशांति का जनक कहा ।
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