उच्च न्यायालय
✍️भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।
✍️ भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु भाग 6 के अध्याय 5 के तहत अनुच्छेद 214 से 231 तक में प्रावधान किया गया है।
✍️प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को अनुच्छेद 231 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।
✍️अनुच्छेद 230 के तहत संसद विधि द्वारा किसी - संघ राज्यक्षेत्र पर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार कर सकेगी या किसी संघ राज्यक्षेत्र से किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन कर सकेगी।
✍️अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
✍️ अनुच्छेद 215 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।
✍️ अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य है कि उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे तथा उसको अपने अवमान के लिए दंड देने सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी।
✍️अनु. 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।
✍️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकते हैं।
Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
👉ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां
👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।
👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।
👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।
✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।
✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।
✍️ दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था
✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।
👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।
✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।
✍️महालवाड़ी पद्धति
👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।
✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।
✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।
👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।
Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025