UPSSSC, LOWER PCS, PET ,UPSI, CTET, SUPER TET, UPTET ,TGT ,PGT , TEACHING , Other Exam.
2.55K subscribers
4.98K photos
36 videos
475 files
5.09K links
Way to Success
🟢 Amogh classess में आप सभी का स्वागत है
🔴 ONLYPCS ONE ऐप से जुड़ने - https://play.google.com/store/apps/details?id=com.onlypcs.one
🟠 YouTube चैनल से जुड़े https://www.youtube.com/@amoghclasses95
Download Telegram
  पंजाब

✍️रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर, 1780 को सुकरचकिया मिसल के मुखिया महासिंह के घर हुआ था।

✍️महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच 25 अप्रैल, 1809 को अमृतसर की संधि हुई।

✍️उसने 1818 ई. में मुल्तान, 1819 ई. में कश्मीर और 1834 ई. में पेशावर को जीत लिया।

✍️1798 ई. में अफगानिस्तान के शासक जमान शाह ने पंजाब पर आक्रमण किया।

✍️वापस जाते समय उसकी तोपें चिनाब नदी में गिर गईं।

✍️ रणजीत सिंह ने उन्हें निकलवा कर वापस भिजवा दिया।

✍️ उस सेवा के बदले जमान शाह ने उसे लाहौर पर अधिकार करने की अनुमति दे दी।

✍️1799 ई. में रणजीत सिंह ने तत्काल लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया; जमान शाह ने उन्हें राजा की उपाधि दी और लाहौर का अपना सूबेदार मान लिया।।

✍️उसने 1805 ई. में अमृतसर को भी भंगी मिसल से छीन लिया।

✍️तत्पश्चात पंजाब की राजनैतिक राजधानी लाहौर और धार्मिक राजधानी अमृतसर दोनों ही उसके अधीन आ गईं।

✍️रणजीत सिंह एक योग्य शासक था।

✍️उन्होंने कहा था "ईश्वर की इच्छा थी कि मैं सब धर्मों को एक निगाह से देखें, इसीलिए उसने दूसरी आंख की रोशनी ले ली।" अफगान अमीर शाहशुजा ने रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा प्रदान किया था।

✍️1839 ई. में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र खड्ग सिंह सिंहासन पर बैठा।

✍️इसे अफीम खाने की आदत थी।

✍️ इसके शासनकाल के दौरान शीघ्र ही दरबार में दो विरोधी दलों संधावालिया सरदार-चैतसिंह, अतर सिंह, लहना सिंह तथा उनके भतीजे अजीत सिंह और डोगरा बंधुओं-ध्यान सिंह, गुलाब सिंह और सुचेत सिंह की प्रतिद्वंद्विता के कारण पंजाब में अराजकता फैल गई।

✍️चिलियांवाला का युद्ध 13 जनवरी, 1849 को लड़ा गया।

✍️ इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लॉर्ड गफ ने किया तथा सिख सेना शेरसिंह के नेतृत्व में लड़ी। यह युद्ध अनिर्णीत समाप्त हुआ।

✍️इस युद्ध के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी था।

✍️ महाराजा दलीप सिंह सिख साम्राज्य के अंतिम शासक थे।

✍️उन्होंने 1843 से 1849 ई. तक शासन किया।

✍️दलीप सिंह ने सिख धर्म छोड़कर ईसाई धर्म को अपनाया था, इन्होंने रूस की यात्रा भी की थी।

✍️इनका निधन अक्टूबर, 1893 में पेरिस (फ्रांस) में हो गया था।

✍️इनकी अंत्येष्टि इंग्लैंड में हुई थी।

✍️1849 ई. में द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों द्वारा पंजाब का विलय कर लिया गया तथा दलीप सिंह को पेंशन देकर बाद में ब्रिटेन भेज दिया गया।

✍️पंजाब के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय के बाद लॉर्ड डलहौजी ने 1849 ई. में पंजाब पर शासन करने के लिए तीन लोगों की एक परिषद का गठन किया था, जिसमें सर हेनरी लॉरेंस को अध्यक्ष तथा जॉन लॉरेंस और चार्ल्स ग्रेनविले मानसेले को सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
👍1
👉ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां

👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।

👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।

👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।

✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।

✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।

✍️ दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था

✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।

👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।

✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।

✍️महालवाड़ी पद्धति

👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।

✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।

✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।

👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
👍1
     उच्च न्यायालय



✍️भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।

✍️ भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु भाग 6 के अध्याय 5 के तहत अनुच्छेद 214 से 231 तक में प्रावधान किया गया है।

✍️प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को अनुच्छेद 231 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।

✍️अनुच्छेद 230 के तहत संसद विधि द्वारा किसी - संघ राज्यक्षेत्र पर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार कर सकेगी या किसी संघ राज्यक्षेत्र से किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन कर सकेगी।

✍️अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।

✍️ अनुच्छेद 215 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।

✍️ अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य है कि उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे तथा उसको अपने अवमान के लिए दंड देने सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी।

✍️अनु. 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।

✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।

✍️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को  अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकते हैं।

Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
✍️प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध 1767-69 ई. में हुआ। इस युद्ध में हैदर अली विजयी हुआ।

✍️ इस दौरान अंग्रेज गवर्नर वेरेल्स्ट था।

✍️युद्ध 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि द्वारा समाप्त हुआ।

✍️द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.) के दौरान, हैदर अली ने निजाम तथा मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक मोर्चा बनाया।

✍️जुलाई, 1780 में हैदर अली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया तथा कर्नल बेली (Col. Baillie) के अधीन अंग्रेजी सेना को हराकर अर्काट पर अधिकार कर लिया। इसी दौरान टीपू ने हेक्टर मुनरो की सेना को पोल्लीलुर नामक स्थान पर हरा दिया।

✍️1781 ई. में हैदर अली का सामना अंग्रेज जनरल आयरकूट से हुआ, जिसने पोर्टो नोवो (1 जुलाई, 1781), पोल्लीलुर तथा शोलिंगुर में हैदर अली को परास्त किया। दिसंबर, 1782 ई. में हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा तथा अंततः मंगलौर की संधि (1784 ई.) से द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का समापन हुआ।

✍️टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम को अपनी राजधानी बनाया एवं यहां जैकोबिन क्लब की स्थापना की और उसका सदस्य बना, साथ ही उसने अपनी राजधानी में फ्रांस और मैसूर की मैत्री का प्रतीक स्वतंत्रता का वृक्ष रोपा।

✍️टीपू सुल्तान ने अपने समकालीन विदेशी राज्यों से मैत्री संबंध बनाने तथा अंग्रेजों के विरुद्ध उनकी सहायता प्राप्त करने के लिए ईरान, कुस्तुंतुनिया /(आधुनिक इस्तांबुल), अफगानिस्तान और फ्रांस आदि को दूतमंडल भेजे और आधुनिक रीति पर दूतावासों की स्थापना की।

✍️तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92 ई.)

का अवसान श्रीरंगपट्टनम की संधि (मार्च, 1792) द्वारा हुआ।

✍️ इस संधि में अंग्रेजों की ओर से कार्नवालिस तथा मैसूर से टीपू सुल्तान शामिल थे।

✍️ टीपू सुल्तान चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.) के दौरान अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गये।

✍️ इसके कुल के सदस्यों को वेल्लौर में कैद कर दिया गया। इस युद्ध के समय अंग्रेजी सेना को वेलेजली और स्टुअर्ट ने अपना नेतृत्व प्रदान किया।

✍️मैसूर को जीतने की खुशी में आयरलैंड के लॉर्ड समाज ने वेलेजली को 'मार्विवस' की उपाधि प्रदान की।

✍️युद्ध के बाद अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर पुनः अड्यार वंश के एक बालक कृष्णराज को बिठा दिया तथा कनारा, कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम को अपने राज्य में मिला लिया।

✍️बेगम समरु (1750-1836 ई.) ने एक अति प्रसिद्ध चर्च का निर्माण मेरठ के निकट सरधना में कराया था।

✍️बेगम समरु के पति एक यूरोपीय वाल्टर रेनहार्ट साम्ब्रे थे, जिन्होंने कई रियासतों को सैन्य सेवाएं प्रदान की थी।

✍️साम्ब्रे को बंगाल के नवाब नजब खां ने सहारनपुर के रूहेला सरदार जाब्ता खां को हराने में प्रमुख भूमिका के कारण सरधना की जागीर प्रदान की थी। अपने पति की मृत्यु के बाद बेगम समरु सरधना की शासिका बनी थीं।

Join👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
👍2
🔰सिक्ख संप्रदाय के 10 गुरू

👉गुरू नानक - सिक्ख धर्म के संस्थापक

👉गुरू अंगद - गुरूमुखी लिपि के जनक

👉गुरु अमरदास - गुरु प्रसाद हेतु 22 गद्दियों का निर्माण

👉गुरू रामदास - अमृतसर के संस्थापक

👉गुरू अर्जुनदास - गुरू ग्रंथ साहिब का संकलन, स्वर्ण मंदिर निर्माण,जहांगीर ने फांसी दी

👉गुरू हरगोविन्द - अकाल तख्त की स्थापना

👉गुरू हरराय - मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध में भाग लिया

👉गुरु हरिकृष्ण - अल्प वयस्क अवस्था में मृत्यु

👉गुरु तेग बहादुर - औरंगजेब ने फांसी दी

👉गुरू गोविन्द सिंह - खालसा सेना का गठन


join👉https://t.me/Amoghclasses
#PrelimsBoosterfact
#roaro #pcs2025
🔰महासागरीय गर्त


👉महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं, इनकी स्थिति प्रायः तट के सहारे पर्वतीय मेखलाओं के सामने मिलती है।

👉द्वीपों के सहारे भी गहरी गर्त देखने को मिलती है।

👉विश्व की सबसे गहरी गर्त मैरियाना ट्रेंच है।

👉मैरियाना गर्त प्रशांत महासागर में मैरियाना द्वीप के पूर्वी भाग पर चाप आकार में फैली है।

👉 इसका सर्वाधिक गहरा बिंदु चैलेंजर डीपहै।

👉इसकी उत्पत्ति प्लेटों के क्षेपण से हुई है।

👉इस गर्त की खोज वर्ष 1948 में HMS चैलेंजर II नामक जलयान द्वारा की गई। इसकी अनुमानित गहराई लगभग 11,033 मी. है।

👉उत्तर प्रशांत महासागर के प्रमुख गर्तों में मैरियाना खाई, क्यूराइल खाई, एल्यूशियन खाई तथा जापान खाई हैं।

👉दक्षिण प्रशांत महासागर के प्रमुख गर्तों में टोंगा खाई, कमडिक खाई, अटाकामा खाई तथा करमेडेक खाई हैं।

👉अटलांटिक महासागर के प्रमुख गर्तों में- पोर्टोरिको गर्त (उ. अटलांटिक महासागर), रोमांचे गर्त (विषुवतीय अटलांटिक महासगर) तथा सैंडविच गर्त (द. अटलांटिक महासागर) हैं।

👉हिंद महासागर के प्रमुख गर्त, सुण्डा गर्त एवं डायामेंटिना परिखा हैं।

👉हिंद महासागर स्थित सबसे गहरा गर्त जावा गर्त है।

#pcs2025 #roaro
🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
#roaro #uppcs #bpsc #mppcs #ras #ssccgl #sscgd #ntpc #upp #upssscpet #ssc #Lekhpal
👉 राष्ट्रपति की क्षमादान करने की शक्ति


👉संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के पास अपराध के लिये दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति की सजा को माफ करने, राहत देने, छूट देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति होगी. जहाँ दंड मौत की सजा के रूप में है।

👉राष्ट्रपति सरकार से स्वतंत्र होकर अपनी क्षमादान की शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया है कि राष्ट्रपति को दया याचिका पर फैसला करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना होता है।

👉अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से अधिक व्यापक है क्यूंकि राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालयों के मामले और मृत्यु दंड की सजा भी समाप्त करने का अधिकार है जबकि राज्यपाल के पास ये अधिकार नही है। राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों में निम्नलिखित बात शामिल है-

👉क्षमा में दंड और बंदीकरण दोनों को हटा दिया जाता है तथा दोषी की सजा को दंड, दंडादेशों एवं निर्हर्ताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।

👉लघुकरण में दंड के स्वरुप में परिवर्तन करना शामिल है, उदाहरण के लिये मृत्युदंड को आजीवन कारावास और कठोर कारावास को साधारण कारावास में बदलना।

👉परिहार में दंड की अवधि को कम करना शामिल है, उदाहरण के लिये दो वर्ष के कारावास को एक वर्ष के कारावास में परिवर्तित करना।

👉 विराम के अंतर्गत किसी दोषी को प्राप्त मूल सजा के प्रावधान को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बदलना शामिल है। उदाहरण के लिये महिला की गर्भावस्था की अवधि के कारण सजा को परिवर्तित करना।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
#roaro #uppcs #bpsc #mppcs #ras #ssccgl #sscgd #ntpc #upp #upssscpet #ssc #Lekhpal
📕 खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 (7वाँ संस्करण):

▪️ खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 का आयोजन बिहार के पाँच ज़िलों ( पटना, राजगीर, बेगूसराय, गया और भागलपुर) में किया गया।
▪️ जबकि तीन प्रमुख स्पर्द्धाएँ- जिमनास्टिक, शूटिंग और साइकिलिंग, नई दिल्ली में आयोजित की गईं थी।
▪️ गजसिम्हा इस बार के खेलों का शुभंकर था।


▪️ सात स्वर्ण समेत कुल 36 पदकों के साथ बिहार 15वें स्थान पर रहा।
▪️पहला स्थान: महाराष्ट्र (158)
▪️दूसरा स्थान: हरियाणा (117)
▪️तीसरा स्थान: राजस्थान (60)

▪️सातवां स्थान : उत्तर प्रदेश
▪️ दसवां स्थान : मध्य प्रदेश (32)
▪️खेलो इंडिया यूथ गेम्स में यूपी ने जीते 52 पदक

📕परीक्षा बिंदु

▪️इनकी शुरुआत वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी।
▪️प्रारंभ में ये खेलो इंडिया स्कूल गेम्स के नाम से जाने गए थे।
▪️वर्ष 2019 में इनका नाम बदलकर खेलो इंडिया यूथ गेम्स कर दिया गयाI 
▪️इनके पिछले 6 संस्करण आयोजित-
दिल्ली, पुणे, गुवाहाटी, पंचकुला भोपाल और तमिलनाडु


#pcs2025 #roaro #bpsc #mppcs #ukpcs #prelimexam
❤2
📕 खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 (7वाँ संस्करण):

▪️ खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 का आयोजन बिहार के पाँच ज़िलों ( पटना, राजगीर, बेगूसराय, गया और भागलपुर) में किया गया।
▪️ जबकि तीन प्रमुख स्पर्द्धाएँ- जिमनास्टिक, शूटिंग और साइकिलिंग, नई दिल्ली में आयोजित की गईं थी।
▪️ गजसिम्हा इस बार के खेलों का शुभंकर था।


▪️ सात स्वर्ण समेत कुल 36 पदकों के साथ बिहार 15वें स्थान पर रहा।
▪️पहला स्थान: महाराष्ट्र (158)
▪️दूसरा स्थान: हरियाणा (117)
▪️तीसरा स्थान: राजस्थान (60)

▪️सातवां स्थान : उत्तर प्रदेश
▪️ दसवां स्थान : मध्य प्रदेश (32)
▪️खेलो इंडिया यूथ गेम्स में यूपी ने जीते 52 पदक

📕परीक्षा बिंदु

▪️इनकी शुरुआत वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी।
▪️प्रारंभ में ये खेलो इंडिया स्कूल गेम्स के नाम से जाने गए थे।
▪️वर्ष 2019 में इनका नाम बदलकर खेलो इंडिया यूथ गेम्स कर दिया गयाI 
▪️इनके पिछले 6 संस्करण आयोजित-
दिल्ली, पुणे, गुवाहाटी, पंचकुला भोपाल और तमिलनाडु


📕ट्रिक👉 महाराष्ट्र के युवा बिहार में खेल के खेलते है
#pcs2025 #roaro #bpsc #mppcs #ukpcs #prelimexam
❤2
📕ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां

👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।

👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।

👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।

✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।

✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।

📕 दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था

✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।

👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।

✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।

📕महालवाड़ी पद्धति

👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।

✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।

✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।

👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
#roaro #uppcs #bpsc #mppcs #ras #ssccgl #sscgd #ntpc #upp #upssscpet #ssc #Lekhpal
🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
#roaro #uppcs #bpsc #mppcs #ras #ssccgl #sscgd #ntpc #upp #upssscpet #ssc #Lekhpal
❤1
     उच्च न्यायालय



✍️भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।

✍️ भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु भाग 6 के अध्याय 5 के तहत अनुच्छेद 214 से 231 तक में प्रावधान किया गया है।

✍️प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को अनुच्छेद 231 के तहत यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।

✍️अनुच्छेद 230 के तहत संसद विधि द्वारा किसी - संघ राज्यक्षेत्र पर किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार कर सकेगी या किसी संघ राज्यक्षेत्र से किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन कर सकेगी।

✍️अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।

✍️ अनुच्छेद 215 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।

✍️ अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य है कि उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे तथा उसको अपने अवमान के लिए दंड देने सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी।

✍️अनु. 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।

✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

✍️उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।

✍️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को  अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकते हैं।

Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
👍2
👉ब्रिटिश काल में भू राजस्व नीतियां

👉1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली को प्रारंभ किया।

👉इसे इस्तमरारी, जागीरदारी, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है।

👉यह व्यवस्था बंगाल, बिहार उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक के क्षेत्र में लागू थी।

✍️ इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

✍️इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया, जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था।

✍️ स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे।

✍️ दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था

✍️इस व्यवस्था के जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे तथा सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया गया।
✍️ तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक का एक भाग) में लागू की गई।

👉इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जादारी अधिकार दिए गए थे और प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तथा व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे।

✍️ इस व्यवस्था ने कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की। इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था। इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी तथा लगान की दर भी काफी ऊंची थी।

✍️महालवाड़ी पद्धति

👉 भू-राजस्व व्यवस्था कृषक के साथ नहीं, बल्कि प्रत्येक ग्राम अथवा महाल (जागीर का एक भाग) के साथ स्थापित की जाती थी।

✍️ इसके अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समाज इस भूमि को संभाल लेता था।

✍️ यह ग्राम समाज ही सम्मिलित भूमि (शामलात) तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।

👉यह पद्धति उ.प्र., मध्य प्रांत तथा पंजाब में (कुछ परिवर्तनों के साथ) लागू की गई, जिसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 30 प्रतिशत हिस्सा शामिल था।

Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#ro_aro #pcs2025
👍1
    👉उपराष्ट्रपति।                  

✍️'भारत में उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया

✍️ अनुच्छेद 63 _ भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।

✍️ अनुच्छेद 64 _उपराष्ट्रपति राज्य सभा का 'पदेन सभापति' होता है।

✍️ अनु. 65 _राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा तथा अनु. 97 के अधीन सभापति को संदेय वेतन-भत्ते का हकदार नहीं होगा।

✍️भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित औरमनोनीत दोनों सदस्यों द्वारा किया जाता है।

✍️अनु. 66(1) _उपराष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है तथा ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है।

✍️भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के सभापति पद के लिए वर्तमान में 4 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन

✍️उपराष्ट्रपति को, उपराष्ट्रपति पद के लिए वेतन नहीं प्राप्त होता है, बल्कि राज्य सभा के सभापति के रूप में प्राप्त होता है।

✍️अनुच्छेद 66(3) _ उपराष्ट्रपति पद के लिए योग्यता

✍️अनुच्छेद 67_ उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक है।    

✍️अनुच्छेद 67 (क) _ उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।  

✍️अनुच्छेद 67 (ख) _उपराष्ट्रपति राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा, जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है।

✍️उपराष्ट्रपति अनु. 69 में वर्णित प्रारूप में राष्ट्रपति या राष्ट्रपति के द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष पद की शपथ लेता है।


Join 👉https://t.me/Amoghclasses
#RO_ARO #pcs2025
👍1
🔰संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

👉संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।

यह प्रावधान करता है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी उपबंध कापरिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है।

👉हलाकि संसद उन व्यवस्थाओ को संशोधित नही कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे की संरचना से सम्बद्ध हो यह व्यवस्था उच्चतम न्यायलय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में की।

👉अनुछेद 368 के अंतर्गत यह निम्नलिखित तरीके से हो सकती है-

👉 संविधान के संशोधन का आरम्भ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकता है किन्तु राज्य विधान मंडल में नही।

👉 विधेयक को मंत्री या गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पुर्स्थापित किया जा सकता है।

👉विधेयक को दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य है।

👉दोनों ही सदनों में विधेयक अलग अलग पारित होना चाहिए और असहमति या गतिरोध की की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नही है।

👉 विधेयक के संघीय व्यवस्था से सम्बंधित होने पर उसे आधे राज्यों के विधानमंडल से भी सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिए।

👉 राष्ट्रपति विधेयक को सहमती देंगे क्यूंकि वे विधेयक को न तो अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिये भेज सकते है। राष्ट्रपति की सहमति के बाद विधेयक अधिनियम बन जाता है।

join👉https://t.me/Amoghclasses
#roaro #pcs2025
#roaro #uppcs #bpsc #mppcs #ras #ssccgl #sscgd #ntpc #upp #upssscpet #ssc #Lekhpal
👍2