UPSSSC, LOWER PCS, PET ,UPSI, CTET, SUPER TET, UPTET ,TGT ,PGT , TEACHING , Other Exam.
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देख रहा है विनोद 2027 के चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है

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हमरा भाग्य कब बदलेगा रे माधव😂😂😂
🤣6❤3
हे पार्थ अब अपना रथ शिक्षक भर्ती की तरह मोड़ो,उधर से सफलता की चिंगारी दिख रही है
😁3👍1🙏1
📕हिंदी व्याकरण 'काल' (Tense)

👉​काल (Tense): परिभाषा

​क्रिया के जिस रूप से कार्य के होने के समय और उसकी पूर्णता या अपूर्णता का बोध हो, उसे काल कहते हैं।

📕भेद कुल 6

​1. वर्तमान काल (Present Tense)
​जो समय अभी चल रहा है। इसके मुख्य 5 भेद माने जाते हैं:

1-​सामान्य वर्तमान: क्रिया का वर्तमान में होना (जैसे- वह पढ़ता है)।

२- ​तत्कालिक (अपूर्ण) वर्तमान: क्रिया अभी चल रही है (जैसे- वह पढ़ रहा है)।

3-​पूर्ण वर्तमान: कार्य अभी-अभी पूरा हुआ है (जैसे- उसने पुस्तक पढ़ी है)।

4- ​संदिग्ध वर्तमान: क्रिया के होने में संदेह हो (जैसे- वह पढ़ता होगा)।

5- ​संभाव्य वर्तमान: कार्य के होने की संभावना हो (जैसे- वह आया हो, वह पढ़ता हो)।


📕 भविष्यत काल (Future Tense)

इसके मुख्य 3 भेद हैं:

१-सामान्य भविष्यत: भविष्य में सामान्य रूप से होना (जैसे- हम कल स्कूल जाएंगे)।

2-संभाव्य भविष्यत: होने की संभावना (जैसे- शायद आज वर्षा हो)।

3-हेतु-हेतुमद भविष्यत:

एक कार्य का होना दूसरे पर निर्भर करे (जैसे- वह आए तो मैं जाऊं)।


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📕​भूतकाल के मुख्य 6 भेद होते हैं:


​1. सामान्य भूतकाल (Simple Past)
​जब क्रिया के समाप्त होने के विशेष समय का बोध न हो, बल्कि यह पता चले कि काम बीते समय में हुआ है।

👉​पहचान: वाक्य के अंत में आ, ई, ए, या, यी, ये आता है।

👉​उदाहरण: * राम ने पत्र लिखा।
​बच्चे स्कूल गए।

​2. आसन्न भूतकाल (Immediate Past)
​
इससे यह पता चलता है कि क्रिया अभी-अभी या निकट भूतकाल में समाप्त हुई है।
👉​पहचान: सामान्य भूतकाल के क्रिया रूप के साथ 'है/हैं' जुड़ा होता है।

👉​उदाहरण: * मैंने खाना खाया है।
​वह अभी आई है।

​3. पूर्ण भूतकाल (Past Perfect)
​क्रिया के उस रूप को पूर्ण भूतकाल कहते हैं जिससे यह स्पष्ट हो कि कार्य बहुत समय पहले समाप्त हो चुका था।

👉​पहचान: क्रिया के अंत में था, थी, थे आता है।

👉​उदाहरण: * अंग्रेजों ने भारत पर राज किया था।
​उसने अपनी पुस्तक पढ़ ली थी।

​4. अपूर्ण भूतकाल (Past Continuous)
​
इससे यह पता चलता है कि क्रिया भूतकाल में हो रही थी, किंतु उसकी समाप्ति का पता नहीं चलता।

​पहचान: 👉वाक्य के अंत में रहा था, रही थी, रहे थे आता है।

​उदाहरण: 👉* बच्चे मैदान में खेल रहे थे।
​सीता गाना गा रही थी।


​5. संदिग्ध भूतकाल (Doubtful Past)
​जहाँ भूतकाल की क्रिया के होने में संदेह (Doubt) हो कि कार्य पूरा हुआ या नहीं।

​पहचान:👉 क्रिया के अंत में होगा, होगी, होंगे आता है।

​उदाहरण: 👉 बस छूट गई होगी।
👉​उसने खाना खा लिया होगा।

​6. हेतुहेतुमद् भूतकाल (Conditional Past)

​जहाँ भूतकाल की एक क्रिया दूसरी क्रिया पर निर्भर हो। इसमें कार्य होने वाला था, पर किसी कारणवश नहीं हो सका।

​पहचान:👉 यदि... तो... (वाक्य में शर्त होती है)।

​उदाहरण: 👉 यदि वर्षा होती, तो फसल अच्छी होती।
​यदि तुम पढ़ते, तो पास हो जाते।


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📕आपदा प्रबंधन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौते और संधियाँ

​1. सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework 2015-2030)

​यह वर्तमान में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के लिए सबसे प्रमुख वैश्विक ढांचा है। इसे मार्च 2015 में जापान के सेंडाई में आयोजित तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन में अपनाया गया था।

​उद्देश्य: 2030 तक आपदाओं से होने वाले नुकसान (जीवन, स्वास्थ्य और आर्थिक) में महत्वपूर्ण कमी लाना।

​सात लक्ष्य: इसमें सात विशिष्ट वैश्विक लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
​चार प्राथमिकताएं:

​आपदा जोखिम को समझना।
​आपदा जोखिम के प्रबंधन के लिए शासन (Governance) को मजबूत करना।
​लचीलेपन (Resilience) के लिए आपदा न्यूनीकरण में निवेश करना।

​प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए तैयारी बढ़ाना और पुनर्प्राप्ति में "Build Back Better" (बेहतर पुनर्निर्माण) को अपनाना।


​2. ह्योगो फ्रेमवर्क फॉर एक्शन (Hyogo Framework for Action - HFA 2005-2015)

​सेंडाई फ्रेमवर्क से पहले यह समझौता लागू था। इसे 2005 में जापान के कोबे (ह्योगो प्रांत) में अपनाया गया था।

​महत्व: यह आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए देशों और समुदायों की क्षमता निर्माण पर केंद्रित था।

​विरासत: इसने आपदा प्रबंधन को केवल 'राहत और प्रतिक्रिया' से हटाकर 'पूर्व-तैयारी और रोकथाम' की ओर मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।

​3. योकोहामा रणनीति (Yokohama Strategy, 1994)

​यह आपदा न्यूनीकरण पर पहला महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज था।

​केंद्र: इसमें यह स्वीकार किया गया कि विकासशील देश और गरीब समुदाय आपदाओं के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। इसने आपदाओं के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया।


​4. पेरिस जलवायु समझौता (Paris Agreement, 2015)

​हालांकि यह मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन से संबंधित है, लेकिन इसका आपदा प्रबंधन से सीधा संबंध है।

​जुड़ाव: जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवात, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। पेरिस समझौता इन चरम मौसम की घटनाओं के अनुकूलन (Adaptation) और उनके प्रभाव को कम करने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता की बात करता है।


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📕भारत में आपदा प्रबंधन "प्रतिक्रिया-केंद्रित" (Response-centric) दृष्टिकोण से हटकर "निवारण और तैयारी" (Prevention and Preparedness) के मॉडल को अपनाया है।
​
​1. विधायी प्रावधान: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005

​यह भारत में आपदा प्रबंधन के लिए कानूनी आधार प्रदान करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कानून है।

​परिभाषा: यह अधिनियम आपदा को एक "तबाही या दुर्घटना" के रूप में परिभाषित करता है जो मानवीय या प्राकृतिक कारणों से होती है।
​शक्तियाँ:
यह केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं को अनिवार्य बनाता है।

​दंड का प्रावधान:

इसमें आपदा के समय राहत सामग्री के दुरुपयोग या बाधा डालने पर दंड और जुर्माने की व्यवस्था है।


​2. संस्थागत ढांचा (Institutional Framework)

​भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक त्रि-स्तरीय (Three-tier) संरचना अपनाई गई है:

​A. राष्ट्रीय स्तर (National Level)
​राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA):

यह भारत की शीर्ष संस्था है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। यह नीतियां और दिशानिर्देश तैयार करता है।


​राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF):
यह आपदा के समय तत्काल कार्रवाई करने वाला विशेषज्ञ बल है।

​राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM):
यह प्रशिक्षण, शोध और क्षमता निर्माण का कार्य करता है।
​राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC): यह NDMA को सहायता प्रदान करती है और मंत्रालयों के बीच समन्वय करती है।

​B. राज्य स्तर (State Level)
​राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA):
इसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। यह राज्य की आपदा योजना बनाता है और राष्ट्रीय दिशानिर्देशों को लागू करता है।

​C. जिला स्तर (District Level)
​जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA):

इसके अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर होते हैं। यह आपदा प्रबंधन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है जो स्थानीय स्तर पर योजनाओं का कार्यान्वयन सुनिश्चित करती है।

​3. वित्तीय प्रावधान (Financial Provisions)

​आपदाओं से निपटने के लिए दो विशेष निधियों का प्रावधान किया गया है:

​आपदा मोचन निधि (DRF):

यह आपातकालीन प्रतिक्रिया और राहत कार्यों के लिए है (NDRF और SDRF)।

​आपदा शमन निधि (DMF):

यह आपदा के जोखिम को कम करने और दीर्घकालिक रोकथाम परियोजनाओं के लिए है (NDMF और SDMF)।

​4. प्रमुख राष्ट्रीय योजनाएं और नीतियां
​राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति (2009):

यह नीति "सुरक्षित और आपदा-प्रतिरोधी भारत" के निर्माण पर केंद्रित है।

​राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP):

इसे 2016 में जारी किया गया था। यह सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) के लक्ष्यों के अनुरूप भारत की पहली राष्ट्रीय योजना है।


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📕 स्वतंत्रता पश्चात भारत में भूमि सुधार

स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि व्यवस्था अत्यंत शोषणकारी थी। बिचौलियों (ज़मींदारों) का वर्चस्व था और किसान मात्र बटाईदार बनकर रह गए थे।

भूमि सुधारों को चार मुख्य स्तंभों में विभाजित किया जा सकता है।

​1. बिचौलियों का उन्मूलन (Abolition of Intermediaries)

​यह भूमि सुधार का पहला और सबसे सफल चरण था। इसका मुख्य उद्देश्य ज़मींदारी प्रथा को समाप्त कर भूमि का स्वामित्व वास्तविक काश्तकारों (किसानों) को देना था।

​प्रमुख अधिनियम: उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (UP Zamindari Abolition and Land Reforms Act - UPZALR)।
​
परिणाम: इस अधिनियम के माध्यम से लगभग 2 करोड़ काश्तकारों का सीधा संबंध राज्य से स्थापित हुआ। बिचौलियों को हटाकर भूमि का मालिकाना हक किसानों को दिया गया।


​2. काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms)

​जो किसान दूसरों की ज़मीन पर खेती करते थे, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए तीन स्तरों पर काम किया गया:

​लगान का विनियमन: लगान की दर को फसल के मूल्य के 1/4 या 1/5 भाग तक सीमित किया गया।

​पट्टे की सुरक्षा: किसानों को मनमाने ढंग से बेदखल करने पर रोक लगाई गई

।

​
स्वामित्व का अधिकार: लंबे समय से खेती कर रहे काश्तकारों को ज़मीन खरीदने या स्वामित्व प्राप्त करने का अधिकार दिया गया

।

​3. जोत की सीमा निर्धारण (Ceiling on Land Holdings)

​सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक परिवार के पास अधिकतम भूमि रखने की सीमा तय की गई। अतिरिक्त भूमि (Surplus Land) को भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों में वितरित करना इसका लक्ष्य था।


​अधिनियम: उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 (UP Imposition of Ceiling on Land Holdings Act)।

​संशोधन: 1972-73 में इस सीमा को और कम किया गया ताकि अधिक अधिशेष भूमि प्राप्त की जा सके।

​चुनौती: बेनामी संपत्ति और पारिवारिक बँटवारे के कानूनी दांवपेच के कारण यह चरण पूर्णतः सफल नहीं रहा।


​4. चकबंदी (Consolidation of Holdings)

​किसानों की भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी हुई थी, जिससे वैज्ञानिक खेती संभव नहीं थी। बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर एकत्रित करने की प्रक्रिया 'चकबंदी' कहलाई।


​अधिनियम: उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 (UP Consolidation of Holdings Act)।

​लाभ: सिंचाई और प्रबंधन में आसानी।
​मुकदमेबाजी में कमी।
​कृषि उत्पादकता में वृद्धि।

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उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों की दिशा में 'उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006' (UP Revenue Code, 2006) एक मील का पत्थर है। इसने स्वतंत्रता के बाद के दर्जनों जटिल कानूनों (जैसे UPZALR Act 1950) को समाहित कर एक सरल व्यवस्था दी है। इसे 11 फरवरी 2016 से प्रभावी रूप से लागू किया गया।


​1. जोतदारों (Tenure Holders) का सरलीकरण

​इस संहिता के तहत भूमि धारकों को मुख्यतः चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

​संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर (Bhumidhar with Transferable Rights):

इन्हें भूमि पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है। ये भूमि बेच सकते हैं, उपहार में दे सकते हैं या बंधक रख सकते हैं।

​असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर

(Bhumidhar with Non-Transferable Rights): इन्हें खेती का अधिकार है, लेकिन ये भूमि बेच नहीं सकते। हालांकि, 5 वर्ष की अवधि के बाद इन्हें संक्रमणीय अधिकार मिल सकते हैं।

​असामी (Asami): ये आमतौर पर पट्टेदार होते हैं जिन्हें विशिष्ट अवधि के लिए भूमि दी जाती है।

​सरकारी पट्टेदार: जिन्हें सरकार द्वारा विशेष उद्देश्यों के लिए भूमि आवंटित की जाती है।

​2. भूमि उपयोग का परिवर्तन (धारा 80)
​
पुराने कानूनों में कृषि भूमि को गैर-कृषि (आवासीय या औद्योगिक) घोषित कराना बहुत कठिन था।

​प्रावधान: अब कृषि भूमि का उपयोग गैर-कृषि कार्य के लिए करने हेतु एसडीएम (SDM) से अनुमति लेने की प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बना दिया गया है।
​3. दलितों और पिछड़ों की भूमि का संरक्षण

​भूमिहीनों और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं:

​धारा 98: अनुसूचित जाति (SC) का व्यक्ति अपनी भूमि गैर-SC व्यक्ति को जिलाधिकारी (DM) की पूर्व अनुमति के बिना नहीं बेच सकता।

​शर्त: अनुमति तभी मिलती है जब विक्रेता के पास बिक्री के बाद कम से कम 1.26 हेक्टेयर भूमि शेष बच रही हो, या कोई गंभीर आपात स्थिति (बीमारी, शिक्षा) हो।

​4. पट्टेदारी (Leasing) में ढील

​पुराने कानूनों में भूमि को पट्टे पर देना (बटाई पर देना) कानूनी रूप से प्रतिबंधित था, जिससे भू-स्वामी को भूमि छिन जाने का डर रहता था।

​नया प्रावधान: अब कोई भी भू-स्वामी अपनी भूमि को खेती के लिए कानूनी रूप से पट्टे पर दे सकता है। इससे 'बटाई' व्यवस्था को कानूनी मान्यता मिली है और भूमि मालिक का स्वामित्व सुरक्षित रहता है।

​5. स्वामित्व और उत्तराधिकार के नियम
​वसीयत:
संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर अपनी भूमि की वसीयत कर सकता है।

​उत्तराधिकार: यदि किसी किसान की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो उत्तराधिकार की एक स्पष्ट वरीयता सूची (Order of Succession) दी गई है, जिसमें अब बेटियों और विधवाओं के अधिकारों को अधिक स्पष्टता दी गई है।

​6. विवादों का निपटारा और डिजिटल रिकॉर्ड

​राजस्व न्यायालय: मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित किया गया है।

​सीमा विवाद (धारा 24): मेड़ या सीमा संबंधी विवादों के लिए SDM को त्वरित पैमाइश कराने का अधिकार दिया गया है।

​डिजिटलीकरण: खतौनी और खसरा का कंप्यूटरीकरण अनिवार्य किया गया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।



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🔰अवध के नवाब -क्रम‌

👉सफदरजंग (1739-54 ई.)

👉शुजाउद्दौला (1754-75 ई.)

👉आसफ उद्दौला (1775-97 ई.)

👉वजीर अली (1797-98 ई.)

👉सआदत अली खाँ (1798-1814 ई.)

👉गाजीउद्दीन हैदरअली खाँ (1814-27 ई.)

👉नासिरुद्दीन मुहम्मद अली (1827-42 ई.)

👉अमजद अली (1842-47 ई.)

👉वाजिद अली शाह (1847-56 ई.)


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UPPCS 2024 चयनितों को नियुक्ति पत्र वितरित
5_6077635232171827021.pdf
447.5 KB
UPSSSC एलोपैथिक फार्मासिस्ट शॉर्टलिस्टिंग जारी
​📕ओजोन की अवस्थिति (Location)

👉​वायुमंडल की परत:

ओजोन गैस का लगभग 90% भाग समताप मंडल (Stratosphere) में पाया जाता है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 15 से 35 किमी की ऊँचाई पर स्थित है।


👉​समताप मंडलीय ओजोन (Good Ozone): यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों (UV rays) को रोकती है।

👉​क्षोभमंडलीय ओजोन (Bad Ozone):

पृथ्वी की सतह के पास (Troposphere) यह एक प्रदूषक के रूप में कार्य करती है और स्मॉग (Smog) का हिस्सा बनती है।


📕मापन की इकाई: ओजोन परत की मोटाई डॉबसन यूनिट (Dobson Unit - DU) में मापी जाती है।


👉खोज: ओजोन परत की खोज 1913 में फ्रांसीसी भौतिकविदों चार्ल्स फैब्री और हेनरी बुइसन ने की थी।


📕ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले प्रमुख पदार्थों (ODS) में शामिल हैं:

👉क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर से निकलने वाली गैस।

👉हैलोन (Halons): अग्निशामक यंत्रों में उपयोग।

👉मिथाइल ब्रोमाइड: कीटनाशकों में प्रयुक्त।

👉नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO_x): सुपरसोनिक जेट विमानों से निकलने वाला उत्सर्जन।

📕ओजोन छिद्र (Ozone Hole): सबसे पहले 1985 में जोसेफ फॉरमैन और उनकी टीम द्वारा अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की पुष्टि की गई थी।

📕अंतर्राष्ट्रीय प्रयास एवं सम्मेलन

👉वियना कन्वेंशन (1985):

👉ओजोन परत के संरक्षण के लिए पहला अंतर्राष्ट्रीय ढांचा।


👉मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (16 सितंबर 1987):

यह सबसे सफल वैश्विक पर्यावरण संधि मानी जाती है, जिसका उद्देश्य CFC जैसे ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन पर रोक लगाना है।

नोट: इसी कारण 16 सितंबर को 'विश्व ओजोन दिवस' मनाया जाता है।

👉किगाली संशोधन (2016):

यह मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का एक संशोधन है, जिसका लक्ष्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना है (HFCs ओजोन को नुकसान नहीं पहुँचाते लेकिन ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाते हैं)।


📕 स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव

UV-B किरणों का प्रभाव: ओजोन की कमी से पृथ्वी पर पहुंचने वाली पराबैंगनी किरणें त्वचा कैंसर (Skin Cancer), मोतियाबिंद, और प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) के कमजोर होने का कारण बनती हैं।

👉पारिस्थितिक तंत्र: यह समुद्री प्लवक (Phytoplankton) को नष्ट करती है, जिससे जलीय खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है।


👉सर्वाधिक सांद्रता: 20-30 किमी की ऊँचाई पर।

👉ओजोन क्षरण का मुख्य कारक: क्लोरीन परमाणु (एक क्लोरीन परमाणु ओजोन के 1 लाख अणुओं को नष्ट कर सकता है)।


👉ओजोन परत का सर्वाधिक विनाश ध्रुवों (विशेषकर दक्षिण ध्रुव) पर होता है क्योंकि वहाँ 'ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल' (PSCs) बनते हैं।


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📕 प्रमुख शिक्षा आयोग

👉 मैकाले घोषणा 1835
- भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव तथा शैक्षिक व्यय के लिए धनराशि आवंटित करना

👉 वुड डिस्पैच 1854  -

प्राथमिक ,माध्यमिक ,स्नातक स्तर के शिक्षा के अंग्रेजी माध्यम के सिफारिश
करना

👉 हंटर कमीशन 1882 -
शिक्षा में विकास का अध्ययन

👉 विश्वविद्यालय आयोग 1902
- (थॉमस रेलै) विश्वविद्यालय का सुधार लागू करना



👉 कोलकाता विश्वविद्यालय आयोग -
1917( माइकल सैंडलर)- विश्वविद्यालय की स्थितियों का अध्ययन करना

👉सार्जेंट योजना 1944

जिसे औपचारिक रूप से भारत में युद्धोत्तर शिक्षा विकास पर सार्जेंट आयोग की रिपोर्ट के रूप में जाना जाता है



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भारत की जीडीपी में , उत्तर प्रदेश का 9.1% योगदान hai



उत्तर प्रदेश सरकार ने 2029 तक 1 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा h

📕उत्तर प्रदेश की जीडीपी में क्षेत्र वार योगदान

कृषि 👉25.8%

उद्योग 👉27.2%

सेवा👉 47%
👉भारत की जीडीपी में दूसरा सबसे बड़ा (9.1%) योगदान करता है

👉सर्वाधिक योगदान तमिलनाडु का है
📕भारत की जीडीपी में क्षेत्र वार योगदान


कृषि 👉15.17%

उद्योग 👉29-30%

सेवा 👉53.6%



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