गौर फरमाइए –
सफलता के उद्घोष पर असफलता की चुप्पी भारी होती है । बधाई देने के लिए सफल लोगों का मोबाइल नंबर ढूंढने के क्रम में परिणाम के पीडीएफ में नॉट मैच वाले रोल नंबर के अंक अपना अस्तित्व खो देते हैं । आखिर सफलता की दीवानी दुनिया के पास समय ही कहां कि वो टूटे हुए सपनों पर भी जरा सा गौर फरमा दे।
सफलता क्षणिक है और असफलता शास्वत , क्योंकि बड़ी से बड़ी सफलता भी किसी के सापेक्षित बौनी सिद्ध हो सकती है । कहां - कहां सफल हो सकते हैं आप, यह कैनवास बहुत छोटा है । आज सफल होने वालों के अनुक्रमांक विगत कई दफा नॉट फाउंड हो चुके होते हैं । प्रतियोगी जीवन की यह यात्रा अपने मूल स्वभाव में ही सुख से अधिक दुख देने वाली है । लाखों के सापेक्ष सैकड़ों के चयन की प्रणाली इसका स्वयमेव प्रमाण है । जहां प्रयास और परिश्रम के साथ लाट और ललाट की भूमिका इसे और दुरूह बना देती है ।
आज की निराशा में कल की आशा बीज रोपे जाते हैं। प्रतिदिन जय भी नहीं होती , हां एक दिन अवश्य होती है
और वह दिन कब आएगा ? यह सवाल सफलता के एक क्षण पहले तक अपने उत्तर को खोजता फिरता है । उसी एक घड़ी की प्रत्याशा में अपना हर क्षण न्यौछावर करने को तैयार रहने वाले का नाम
है ' प्रतियोगी ' ।
सफलता का अंधानुकरण होता है और असफलता पापों का हिसाब मांगती है । कभी न मिलने वाले चार लोग स्वयं का अपराधी बनने तक को विवश कर देते हैं । निराशा के दौर में वे भी समीक्षक हो जाते हैं , जिन्हें आयोग का फुल फार्म तक नहीं पता होता । आत्मावलोकन तक ठीक है , किन्तु खुद के प्रति अनावश्यक अपराध का भाव मानव होने के अस्तित्व के विरुद्ध है ।
जीवन की यात्रा में हर असफलता एक ठहराव के सिवा कुछ नहीं है । थोड़ा रुक भी जाना चाहिए, क्योंकि अगले ही दिन फिर वह क्रम शुरू होने वाला है ; जो किसी एक तारीख में अपनी मुकम्मल जगह तक जरूर पहुंचाएगा । कल एक और परिणाम आयेगा , जहां आंसू फिर बहेंगें ; लेकिन इस बार वो खुशियों के होंगे
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@LearningwithRL
सफलता के उद्घोष पर असफलता की चुप्पी भारी होती है । बधाई देने के लिए सफल लोगों का मोबाइल नंबर ढूंढने के क्रम में परिणाम के पीडीएफ में नॉट मैच वाले रोल नंबर के अंक अपना अस्तित्व खो देते हैं । आखिर सफलता की दीवानी दुनिया के पास समय ही कहां कि वो टूटे हुए सपनों पर भी जरा सा गौर फरमा दे।
सफलता क्षणिक है और असफलता शास्वत , क्योंकि बड़ी से बड़ी सफलता भी किसी के सापेक्षित बौनी सिद्ध हो सकती है । कहां - कहां सफल हो सकते हैं आप, यह कैनवास बहुत छोटा है । आज सफल होने वालों के अनुक्रमांक विगत कई दफा नॉट फाउंड हो चुके होते हैं । प्रतियोगी जीवन की यह यात्रा अपने मूल स्वभाव में ही सुख से अधिक दुख देने वाली है । लाखों के सापेक्ष सैकड़ों के चयन की प्रणाली इसका स्वयमेव प्रमाण है । जहां प्रयास और परिश्रम के साथ लाट और ललाट की भूमिका इसे और दुरूह बना देती है ।
आज की निराशा में कल की आशा बीज रोपे जाते हैं। प्रतिदिन जय भी नहीं होती , हां एक दिन अवश्य होती है
और वह दिन कब आएगा ? यह सवाल सफलता के एक क्षण पहले तक अपने उत्तर को खोजता फिरता है । उसी एक घड़ी की प्रत्याशा में अपना हर क्षण न्यौछावर करने को तैयार रहने वाले का नाम
है ' प्रतियोगी ' ।
सफलता का अंधानुकरण होता है और असफलता पापों का हिसाब मांगती है । कभी न मिलने वाले चार लोग स्वयं का अपराधी बनने तक को विवश कर देते हैं । निराशा के दौर में वे भी समीक्षक हो जाते हैं , जिन्हें आयोग का फुल फार्म तक नहीं पता होता । आत्मावलोकन तक ठीक है , किन्तु खुद के प्रति अनावश्यक अपराध का भाव मानव होने के अस्तित्व के विरुद्ध है ।
जीवन की यात्रा में हर असफलता एक ठहराव के सिवा कुछ नहीं है । थोड़ा रुक भी जाना चाहिए, क्योंकि अगले ही दिन फिर वह क्रम शुरू होने वाला है ; जो किसी एक तारीख में अपनी मुकम्मल जगह तक जरूर पहुंचाएगा । कल एक और परिणाम आयेगा , जहां आंसू फिर बहेंगें ; लेकिन इस बार वो खुशियों के होंगे
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"अगर तुम्हारे पास एक सच्चा दोस्त है तो तुम सच में भाग्यशाली हो..."
हम सबकी ज़िंदगी ऊपर से भले ही सजी-संवरी लगे,
लेकिन अंदर कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होता है
जो हमें हर रोज़ थोड़ा तोड़ता है।
कुछ डर, कुछ चिंता, कुछ अधूरे सवाल...
जो हर दिन हमारे साथ चलते हैं – चुपचाप ।
इन सबके बीच ज़रूरत होती है
किसी ऐसे शख्स की,
जो सिर्फ 'सुन' नहीं रहा होता,
बल्कि 'महसूस' कर रहा होता है
जिसे बताने में डर न लगे,
कि "आज टूट रहा हूँ..."
और वह कहे, "तू टूट सकता है, लेकिन मैं तुझे बिखरने नहीं दूँगा।"
सच्चा दोस्त वह जो तुझसे ना तो प्रतिस्पर्धा करता है,
ना तुझसे आगे निकलने की होड़ रखता है,
बस इतना चाहता है कि "तू ठीक रहे, तू मुस्कराता रहे..."
आज के दौर में ऐसे दोस्त कम होते जा रहे हैं।
दिखावे की दोस्ती बढ़ गई है,
पर दुख में कंधा देने वाले और तू बोल मैं खड़ा हूँ कहने वाले दोस्त,
अब धुंध में खोते जा रहे हैं।
अगर तुम्हारे पास ऐसा कोई है तो उसे खोने मत देना, क्योंकि वह तुम्हारी सबसे बड़ी दौलत है। मेरे पास ऐसे दोस्त है।
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दोस्त कम रखिए पर चुनिंदा रखिए।
Quality, Not Quantity.
हम सबकी ज़िंदगी ऊपर से भले ही सजी-संवरी लगे,
लेकिन अंदर कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होता है
जो हमें हर रोज़ थोड़ा तोड़ता है।
कुछ डर, कुछ चिंता, कुछ अधूरे सवाल...
जो हर दिन हमारे साथ चलते हैं – चुपचाप ।
इन सबके बीच ज़रूरत होती है
किसी ऐसे शख्स की,
जो सिर्फ 'सुन' नहीं रहा होता,
बल्कि 'महसूस' कर रहा होता है
जिसे बताने में डर न लगे,
कि "आज टूट रहा हूँ..."
और वह कहे, "तू टूट सकता है, लेकिन मैं तुझे बिखरने नहीं दूँगा।"
सच्चा दोस्त वह जो तुझसे ना तो प्रतिस्पर्धा करता है,
ना तुझसे आगे निकलने की होड़ रखता है,
बस इतना चाहता है कि "तू ठीक रहे, तू मुस्कराता रहे..."
आज के दौर में ऐसे दोस्त कम होते जा रहे हैं।
दिखावे की दोस्ती बढ़ गई है,
पर दुख में कंधा देने वाले और तू बोल मैं खड़ा हूँ कहने वाले दोस्त,
अब धुंध में खोते जा रहे हैं।
अगर तुम्हारे पास ऐसा कोई है तो उसे खोने मत देना, क्योंकि वह तुम्हारी सबसे बड़ी दौलत है। मेरे पास ऐसे दोस्त है।
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दोस्त कम रखिए पर चुनिंदा रखिए।
Quality, Not Quantity.
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पूरा पढ़े ध्यान से पढ़े –
स्टेटस पर लिखा था - नो डिस्टर्ब स्टडी टाइम।
लेकिन सच कुछ अलग होता है।
आजकल बहुत से छात्र मेहनत नहीं करते, दिखावा करते हैं।
सुबह 10 बजे लाइब्रेरी की फोटो।
कॉफी, हाईलाइटर, 5 रंग के नोट्स।
पर सच में चैटिंग और स्क्रीन स्क्रोलिंग।
कोचिंग में सबसे आगे बैठना, सवाल सबसे ज्यादा पूछना।
पर घर आकर दिखाना की बहुत थक गया हूं। और परिणाम के समय न्यूनतम उत्तीर्णांक भी प्राप्त नहीं कर पाना। लेकिन यह दर्द और ज्यादा तब होता है जब अंदर से पता होता है कि "मैं कर सकता था"।
इस समय याद आता है क्लास में नोट्स फोटो खिंचवाने के लिए बनाए थे, याद करने के लिए नहीं। टेस्ट दिया था मार्क्स के लिए, सीखने के लिए नहीं। मां-बाप को बताया था "पढ़ रहा हूं", खुद को नहीं समझाया था। इस झूठे दिखावे के झांसे में नहीं आते वास्तव में दिखावा एक झूठ है जो पहले दूसरों से, फिर खुद से बोला जाता है। और एक दिन रिजल्ट वाला सच उस झूठ की दीवार गिरा देता है। तब न स्टेटस काम आता है, न बहाने। सिर्फ खाली पेपर और पछतावा रह जाता है।
मैं ताना नहीं मार रहा
आईना दिखा रहा हूं।
अगर आज आप भी लाइब्रेरी जाकर 2 घंटे फोन चलाते हैं, अगर मॉक टेस्ट में नंबर कम आए तो "पेपर टफ था" कह देते हैं, अगर पढ़ने का नाटक करके खुद को ही धोखा दे रहे हैं...
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तो रुक जाइए।
मेहनत शोर नहीं करती। वो रात 2 बजे वाली खामोशी में होती है। उसमें फोटो नहीं होती, सिर्फ पन्ने पलटने की आवाज होती है। उसमें 100% गारंटी नहीं होती, पर पछतावा नहीं होता।कट-ऑफ पार करनी है तो दिखावा बंद करना पड़ेगा। क्योंकि एग्जाम हॉल में सिर्फ आपकी मेहनत बैठती है, आपका दिखावा नहीं।
आज से एक वादा - कम दिखावा, ज्यादा पढ़ाई। क्योंकि दो नंबर से फेल होना दर्द देता है, पर "काश मेहनत कर ली होती" वाला दर्द उम्र भर साथ रहता है।
उठो। फोन रखो। किताब खोलो। इस बार रिजल्ट खुद बोलेगा।दिखावे की लाइब्रेरी और अधूरी मेहनत को राम राम कीजिए।
स्टेटस पर लिखा था - नो डिस्टर्ब स्टडी टाइम।
लेकिन सच कुछ अलग होता है।
आजकल बहुत से छात्र मेहनत नहीं करते, दिखावा करते हैं।
सुबह 10 बजे लाइब्रेरी की फोटो।
कॉफी, हाईलाइटर, 5 रंग के नोट्स।
पर सच में चैटिंग और स्क्रीन स्क्रोलिंग।
कोचिंग में सबसे आगे बैठना, सवाल सबसे ज्यादा पूछना।
पर घर आकर दिखाना की बहुत थक गया हूं। और परिणाम के समय न्यूनतम उत्तीर्णांक भी प्राप्त नहीं कर पाना। लेकिन यह दर्द और ज्यादा तब होता है जब अंदर से पता होता है कि "मैं कर सकता था"।
इस समय याद आता है क्लास में नोट्स फोटो खिंचवाने के लिए बनाए थे, याद करने के लिए नहीं। टेस्ट दिया था मार्क्स के लिए, सीखने के लिए नहीं। मां-बाप को बताया था "पढ़ रहा हूं", खुद को नहीं समझाया था। इस झूठे दिखावे के झांसे में नहीं आते वास्तव में दिखावा एक झूठ है जो पहले दूसरों से, फिर खुद से बोला जाता है। और एक दिन रिजल्ट वाला सच उस झूठ की दीवार गिरा देता है। तब न स्टेटस काम आता है, न बहाने। सिर्फ खाली पेपर और पछतावा रह जाता है।
मैं ताना नहीं मार रहा
आईना दिखा रहा हूं।
अगर आज आप भी लाइब्रेरी जाकर 2 घंटे फोन चलाते हैं, अगर मॉक टेस्ट में नंबर कम आए तो "पेपर टफ था" कह देते हैं, अगर पढ़ने का नाटक करके खुद को ही धोखा दे रहे हैं...
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तो रुक जाइए।
मेहनत शोर नहीं करती। वो रात 2 बजे वाली खामोशी में होती है। उसमें फोटो नहीं होती, सिर्फ पन्ने पलटने की आवाज होती है। उसमें 100% गारंटी नहीं होती, पर पछतावा नहीं होता।कट-ऑफ पार करनी है तो दिखावा बंद करना पड़ेगा। क्योंकि एग्जाम हॉल में सिर्फ आपकी मेहनत बैठती है, आपका दिखावा नहीं।
आज से एक वादा - कम दिखावा, ज्यादा पढ़ाई। क्योंकि दो नंबर से फेल होना दर्द देता है, पर "काश मेहनत कर ली होती" वाला दर्द उम्र भर साथ रहता है।
उठो। फोन रखो। किताब खोलो। इस बार रिजल्ट खुद बोलेगा।दिखावे की लाइब्रेरी और अधूरी मेहनत को राम राम कीजिए।
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