Bhagwat Geeta
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जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति में अभेद सम्बन्ध है वैसे ही पुरुष और प्रकृतिका भी अभेद सम्बन्ध समझ लेना चाहिये।
इसीलिये ही भगवान् श्रीकृष्णजी भी प्रकृति और पुरुष को अनादि ही कहते है

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।

प्रकृति और पुरुष - इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे उत्पन्न जान।
इसीलिये ही

सर्वं खल्वमिदं ब्रह्म

कहा जाता है।

वैसे भी एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है।
भगवान् तत्त्वज्ञान आदि और अन्तमें कहते हैं कि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत् को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हू

इससे भी अद्वैत ही सिद्ध होता है,
लेकिन प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।

प्रकृतिमें स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है

क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको निरन्तर भजते हैं,

सत्त्वगुणके संगसे देवयोनिमें एवं रजोगुणके संगसे मनुष्य योनिमें और तमोगुणके संगसे पशु, पक्षी आदि नीच योनियोंमें जन्म होता है
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुष का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।'

कोई-कोई इस श्लोक का सर्वथा सकाम और निवृत्तिपरक अर्थ करते हैं और संसार यात्रा की कुछ भी चिन्ता न कर केवल भगवान् पर निर्भर रहते हुए भजन करना ही उचित मानते हैं।
एक ईश्वर भक्त गीताभ्यासी निवृत्ति प्रिय ब्राह्मण थे। वे अर्थ को समझते हुए समस्त गीता का बार-बार पाठ करने एवं भगवान् के नामका जप तथा उनके स्वरूप का ध्यान करने में ही अपना सारा समय व्यतीत करते थे। वे एकमात्र भगवान् पर ही निर्भर थे।
जीविका की कौन कहे, वे अपने खाने-पीने की भी परवाह नहीं करते थे।

उनके माता-पिता परलोक सिधार चुके थे। वे तीन भाई थे।
तीनों ही विवाहित थे। वे सबसे बड़े थे और दो भाई छोटे थे। दोनों छोटे भाई ही पुरोहित वृत्ति के द्वारा गृहस्थी का सारा काम चलाया करते थे।
एक दिन की बात है, दोनों छोटे भाइयों ने बड़े भाई से कहा-'आप कुछ समय जीविका के लिये भी निकाला करें तो अच्छा रहे।
बड़े भाई बोले-'जब सबका भरण-पोषण करने वाले विश्वम्भर भगवान् सर्वत्र सब समय मौजूद हैं तब अपनी जीविका की चिन्ता करना तो निरा बालकपन है।

भगवान् ने गीता के नवम श्लोक में स्वयं योगक्षेम के वहन का जिम्मा लिया है..:)
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥


यज्ञ तथा तप और दानरूप क्रिया में जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी ‘सत्’— ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी ‘सत्’— ऐसा कहा जाता है..


Steadfastness in sacrifice, austerity and gift, is also called Sat, and also action in connection with these (or for the sake of the Supreme) is called Sat...😊🌹🙏
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूध्न्र्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ १२॥

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ १३॥

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके  योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्मका (मानसिक) उच्चारण (और) मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोडक़र जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।

Having controlled all the senses, and firmly holding the mind in the heart, and then drawing the life-breath to the head, and thus remaining steadfast in Yogic concentration on God, he who
leaves the body and departs uttering the one Indestructible Brahma, OM, and dwelling on Me in My absolute aspect, reaches the supreme goal. (8:12-13)
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥ १४॥

हे पृथानन्दन! अनन्य  चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य- निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।

Arjuna, whosoever always and constantly thinks of Me with undivided mind, to that Yogi ever
absorbed in Me I am easily attainable. (8:14)
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:॥ १५॥

महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दु:खालय अर्थात् दु:खोंके घर (और) अशाश्वत अर्थात् निरन्तर बदलने-वाले पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; (क्योंकि वे) परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।

Great souls, who have attained the highest perfection, having come to Me, are no more subject to rebirth, which is the abode of sorrow, and transient by nature. (8:15)
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ १६॥

हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्तीवाले हैं अर्थात् वहाँ जानेपर पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।

Arjuna, all the worlds from Brahmaloka (the heavenly realm of the Creator, Brahma) downwards are liable to birth and rebirth. But, O son of Kunti, on attaining Me there is no rebirth (For, while I am beyond Time, regions like Brahmaloka, being conditioned by time, are transitory). (8:16)
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना:॥ १७॥

जो मनुष्य ब्रह्माके एक हजार चतुर्युगीवाले एक दिनको (और) एक हजार चतुर्युगीवाली एक रात्रिको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जानने-वाले हैं।

Those Yogis who know from realization Brahma's day as covering a thousand Mahayugas, and so his night as extending to another thousand Mahayugas know the reality about Time. (8:17)
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥ १८॥

ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त-(ब्रह्मा के सूक्ष्मशरीर-) से सम्पूर्ण शरीर पैदा होते हैं (और) ब्रह्माकी रातके आरम्भकालमें उस अव्यक्त नामवाले-एव(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) में ही (सम्पूर्ण शरीर)लीन हो जाते हैं।

All embodied beings emanate from theUnmanifest (i.e., Brahma's subtle body) at the coming of the cosmic day; at the cosmic nightfallthey merge into the same subtle body of Brahma,
known as the Unmanifest. (8:18)
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ १९॥

हे पार्थ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है (और) ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है।

Arjuna, this multitude of beings, being born again and again, is dissolved under compulsion of its nature at the coming of the cosmic night, and rises again at the commencement of the cosmic day. (8:19)
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ २०॥

परन्तु उस अव्यक्त-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) से अन्य (विलक्षण) अनादि अत्यन्त श्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त (ईश्वर) है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता।

Far beyond even this unmanifest, there is yet another unmanifest Existence, that Supreme Divine Person, who does not perish even though all beings perish. (8:20)
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ २१॥

उसीको अव्यक्त (और) अक्षर— ऐसा कहा गया है (तथा उसीको) परम गति कहा गया है (और) जिसको प्राप्त होनेपर (जीव) फिर लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।

The same unmanifest which has been spoken of as the Indestructible is also called the supreme Goal; that again is My supreme Abode, attaining which they return not to this mortal world. (8:21)
पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ २२॥

हे पृथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं (और) जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्य भक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है।

Arjuna, that eternal unmanifest supreme Purusain whom all beings reside and by whom all thisis pervaded, is attainable only through exclusiveDevotion. (8:22)
Om Namah Shivay!
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिन:।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ २३॥

परन्तु हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोडक़र गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे  लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा।

Arjuna, I shall now tell you the time (path)departing when Yogis do not return, and also the time (path) departing when they do return. (8:23)
अग्निज्र्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना:॥ २४॥

जिस मार्गमें— प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता, (और) छ: महीनोंवाले  उत्तरायणका अधिपति देवता है, उस मार्गसे (शरीर छोडक़र) गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माके साथ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं।

(Of the two paths) the one is that in which are stationed the all-effulgent fire-god and the deities presiding over daylight, the bright fortnight, and the six months of the northward course of the sun respectively; proceeding along it after death Yogis, who have known Brahma, being successively led by the above gods, finally reach Brahma. (8:24)
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ २५॥

जिस मार्गमें— धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छ: महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है, (शरीर छोडक़र) उस मार्गसे गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है।

The other path is that wherein are stationed the gods presiding over smoke, night, the dark fortnight, and the six months of the southward course of the sun; the Yogi (devoted to action with an interested motive) taking to this path after death is led by the above gods, one after another, and attaining the lustre of the moon (and enjoying the fruit of his meritorious deeds in heaven) returns to this mortal world. (8:25)
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुन:॥ २६॥

क्योंकि शुक्ल और कृष्ण— ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्-(प्राणिमात्र-) के साथ (सम्बन्ध रखनेवाली) मानी गयी हैं। (इनमेंसे) एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता (और) दूसरी गतिमें जानेवालेको  पुन: लौटना पड़ता है।

For these two paths of the world, the bright and the dark, are considered to be eternal. Proceeding by one of them, one reaches the supreme state from which there is no return; and proceeding by the other, one returns to the mortal world, i.e., becomes subject to birth and death once more. (8:26)
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।।२७।।

हे पृथानन्दन! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अत: हे अर्जुन! (तू) सब समयमें योगयुक्त (समतामें स्थित) हो जा।

Knowing thus the secret of these two paths, O son of Kunti, no Yogi gets deluded. Therefore, Arjuna, at all times be steadfast in Yoga in the form of equanimity (i.e., strive constantly for My realization). (8:27)
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥ २८॥

योगी (भक्त) इसको (इस अध्यायमें वर्णित विषयको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

The Yogi, realizing this profound truth,
doubtless transcends all the rewards enumerated for the study of the Vedas as well as for the performance of sacrifices, austerities and charities, and attains the supreme and primal state. (8:28)