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मौलाना अबुल कलाम आजाद के द्वारा लिखी गई पुस्तकें
1. इंडिया विन्स फ्रीडम
2. गुब्बार ए खातिर
3. दास्तान ए कर्बला
अबुल कलाम आजाद की पत्रकारिता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
1912 में इनके द्वारा उर्दू साप्ताहिक पत्रिका अल हिलाल का कोलकाता से प्रकाशन किया था
यह समाचार पत्र 1914 में बंद कर दिया गया था तब 1915 में अल बिलाग समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था
1. इंडिया विन्स फ्रीडम
2. गुब्बार ए खातिर
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अबुल कलाम आजाद की पत्रकारिता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
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यह समाचार पत्र 1914 में बंद कर दिया गया था तब 1915 में अल बिलाग समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था
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टामस पैन की रचनाएं
1. राइट ओफ मैन
2. अमेरिकन क्राइसिस
3. अमेरिकन वार ओफ इंडीपेंडेंस
1. राइट ओफ मैन
2. अमेरिकन क्राइसिस
3. अमेरिकन वार ओफ इंडीपेंडेंस
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सारिपुत्र प्रकरण की रचना अश्वघोष ने की।
मुद्राराक्षस व देवी चंद्रगुप्तम की रचना विशाखदत्त ने की थी।
मुद्रा राक्षस एकमात्र नाटक है जिसमें नायिका के पात्र का अभाव है।
शूद्रक ने मृच्छकटिकम की रचना की थी जिसमें उज्जैनी की गणिका बसंत सेना तथा एक ब्राह्मण व्यापारी चारुदत्त का उल्लेख है ।
वासवदत्ता की रचना सुबंधु ने की
मुद्राराक्षस व देवी चंद्रगुप्तम की रचना विशाखदत्त ने की थी।
मुद्रा राक्षस एकमात्र नाटक है जिसमें नायिका के पात्र का अभाव है।
शूद्रक ने मृच्छकटिकम की रचना की थी जिसमें उज्जैनी की गणिका बसंत सेना तथा एक ब्राह्मण व्यापारी चारुदत्त का उल्लेख है ।
वासवदत्ता की रचना सुबंधु ने की
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कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी के म्बंध में महत्वपूर्ण तथ्य
अशोक के उत्तराधिकारी जालौक को शैव समर्थक बताया गया है
खूय नामक इंजीनियर का उल्लेख है
इसमें कनिष्क का उल्लेख किया गया है
राजतरंगिणी को भारत की प्रथम ऐतिहासिक पुस्तक एवं कल्हण को भारत का प्रथम इतिहासकार कहा जाता है ।
इसमें कुल 8 तरंग तथा 8000 श्लोक हैं ।
यह संस्कृत भाषा में है ।
महाभारत की अलंकृत शैली के आधार पर कश्मीर में लिखी गई थी।
कल्हण कश्मीर के शासक हर्ष के आश्रित कवि थे ।
कल्हण ने अपने से पहले के 11 इतिहासकारों का उल्लेख किया है।
इसमें 64 उपजातियों तथा राजपूतों के 36 वंशो का उल्लेख है ।
उनके अनुसार कश्मीर में प्रथम सती रानी वाक्पुष्टा थी ।
इस पुस्तक में सिकंदर के आक्रमण ,चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, स्कंद गुप्त, पुलकेशिन, नागभट्ट व शंकराचार्य का उल्लेख नहीं है
अशोक के उत्तराधिकारी जालौक को शैव समर्थक बताया गया है
खूय नामक इंजीनियर का उल्लेख है
इसमें कनिष्क का उल्लेख किया गया है
राजतरंगिणी को भारत की प्रथम ऐतिहासिक पुस्तक एवं कल्हण को भारत का प्रथम इतिहासकार कहा जाता है ।
इसमें कुल 8 तरंग तथा 8000 श्लोक हैं ।
यह संस्कृत भाषा में है ।
महाभारत की अलंकृत शैली के आधार पर कश्मीर में लिखी गई थी।
कल्हण कश्मीर के शासक हर्ष के आश्रित कवि थे ।
कल्हण ने अपने से पहले के 11 इतिहासकारों का उल्लेख किया है।
इसमें 64 उपजातियों तथा राजपूतों के 36 वंशो का उल्लेख है ।
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▪️सियार उल मुत्खैरीन – पुस्तक से प्लासी युद्ध का वर्णन मिलता है.
इसके लेखक गुलाम हुसैन।।
▪️ब्लैक होल ट्रेजडी घटना का वर्णन जॉन जैड. हाॅलवेल ने अपने Alive the wonder पेपर में दिया है ।।
ब्लैक होल घटना (Black Hole Tragedy) 1756 की ऐतिहासिक घटना को संदर्भित करती है, जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता (अब कोलकाता) पर कब्जा करने के बाद 146 ब्रिटिश कैदियों को एक छोटे से कालकोठरी में बंद कर दिया, जहां गर्मी और दम घुटने से 123 की मौत हो गयी ।और केवल 23 जीवित बचे।। —(हालवेल )
इतिहासकार इस आंकड़े को संदिग्ध बताते है ....
स्टेनले रिपोर्ट के अनुसार 64 कैदी थे.
D. प्रियर 43 कैदी बताते हैं।।
कुछ इतिहासकार जैसे अक्षयकुमार मैत्रेय (Akshay Kumar Maitreya) ने अपनी पुस्तक Sirajuddaula / सिराजुद्दीन में इस घटना को अतिशयोक्तिपूर्ण या मनगढ़ंत बताते हुए सिराजुद्दौला की छवि को साफ किया, यह दावा करते हुए कि समकालीन स्रोतों में इसका कोई प्रमाणिक उल्लेख नहीं है। यह विवाद ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास लेखन का हिस्सा रहा।।
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▪️श्वेत विद्रोह लॉर्ड रिपन के शासनकाल (1880-1884) से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जो इल्बर्ट बिल (Ilbert Bill) के विरोध में अंग्रेजों (श्वेत समुदाय) द्वारा किया गया सामूहिक विरोध था। यह बिल 1883 में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे सुनने का अधिकार देना था। जिसके विरुद्ध अंग्रजों ने विरोध किया।।
🔸 श्वेत विद्रोह (1766): लार्ड क्लाइव के समय ( बंगाल )
सेना के तीन दस्ते बनाये - मुंगेर, बांकीपुर व इलाहबाद में स्थापित किए।
सैन्य अधिकारियों के दोहरे भत्ते बन्द कर दिये, तब फ्लेचर के नेतृत्व में सैन्य अधिकारियों ने इस्तीफे
दे दिये, इसे श्वेत विद्रोह कहते हैं। बाद में सैन्य अधिकारियों में फूट पड़ गयी तथा विद्रोह शान्त भी हो गया। 💐💐
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📅 शनिवार, 8 फ़रवरी
⏰ सुबह 10:30 बजे
📍 Utkarsh Classes, गोपालपुरा बायपास रोड, जयपुर
सेमिनार में मिलेगी निःशुल्क अध्ययन सामग्री और तैयारी को मज़बूत बनाने का सटीक रोडमैप।
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1787
ब्रिटिशों की पहली दंड बस्ती
📍 बेनकूलेन (सुमात्रा, इंडोनेशिया)
• केंद्र: फोर्ट मार्लबोरो
उद्देश्य–
अपराधियों को दूर रखना
निशुल्क श्रम (forced labour) प्राप्त करना
1789
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंडमान द्वीप समूह का सर्वेक्षण शुरू किया
📍 लेफ्टिनेंट आर्किबाल्ड ब्लेयर
कैदी बस्ती की सिफारिश →
👉 ब्लेयर के नाम पर “पोर्ट ब्लेयर”
प्रशासनिक व दमनकारी ढाँचा
– वाइपर द्वीप में पहली जेल और फांसीघर (1864–67)
– डॉ. जेम्स पैट्रिक वॉकर जैसे अधिकारियों की निगरानी
– एक ही दिन में 80+ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी
10 मार्च 1858 को अंडमान के चैथम द्वीप पर 733 स्वतंत्रता सेनानियों का पहला जत्था पहुँचा।
इस जत्थे में अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक खैराबादी, मौलाना लियाकत अली जैसे प्रमुख नेता भी शामिल थे। कई नेताओं ने कैद के दौरान ही दम तोड़ दिया।
1860 के बाद महिला अपराधियों को भी अंडमान भेजा जाने लगा।
1872 में अंडमान भेजे गए एक वहाबी अपराधी ने
वाइसराय लॉर्ड मेयो की चाकू घोंपकर हत्या कर दी।
1874– सुधारात्मक दंड नीति (Reformative Penal System)
• अच्छे व्यवहार पर
• 20–25 वर्ष बाद रिहाई
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– एक ही दिन में 80+ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी
10 मार्च 1858 को अंडमान के चैथम द्वीप पर 733 स्वतंत्रता सेनानियों का पहला जत्था पहुँचा।
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चाकण का युद्ध (1660 ई.)
1660 ईस्वी में हुआ चाकण का युद्ध मुगल सेनाओं और मराठों के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व दक्कन के सूबेदार शाइस्ता ख़ान कर रहे थे, जबकि मराठा पक्ष से फिरंगोजी नरसाला ने चाकण के किले की रक्षा की।
1660 में शाइस्ता ख़ान ने पुणे पर आक्रमण किया और नगर पर अधिकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप शिवाजी महाराज के उत्तरी क्षेत्रों का एक बड़ा भाग मुगलों के कब्ज़े में चला गया और वहाँ मुगल छावनियाँ स्थापित कर दी गईं। शाइस्ता ख़ान मुगल सम्राट औरंगज़ेब का मामा था।
चाकण का किला मराठा सरदार फिरंगोजी नरसाला के अधीन था। शाइस्ता ख़ान अपने राजपूत सेनापतियों—राय सिंह सिसोदिया, अन्वित सिंह हाड़ा और भाऊ सिंह हाड़ा—के साथ चाकण की ओर बढ़ा और किले की चार महीनों तक घेराबंदी की। मुगलों ने बारूद की सुरंग (माइन) विस्फोट द्वारा किले की दीवार का एक हिस्सा ध्वस्त कर दिया। इसके बाद दो दिनों तक भीषण आक्रमण हुआ, जिसमें किले की अधिकांश मराठा सेना मारी गई और अंततः फिरंगोजी नरसाला ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार चाकण का किला मुगलों के अधीन चला गया।
शिवभारत में इस अभियान का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
“शाइस्ता ख़ान भीमा नदी के तट पर पहुँचा, जो शत्रु प्रदेश की सीमा थी। मुस्लिम सेना ने मंदिरों को तोड़ा, मठों को ध्वस्त किया, प्रमुख लोगों के घरों को ज़मीन से मिला दिया, बाग़ों के वृक्ष काट डाले और अनेक प्राचीन गाँवों व नगरों को उजाड़ दिया। इस प्रकार पूरा देश ऐसे प्रतीत हो रहा था मानो चंद्रमा को पूर्ण ग्रहण लग गया हो।”
स्रोत:
सरदेसाई, जी. एस., New History of the Marathas, खंड 1, पृष्ठ 137।
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1660 ईस्वी में हुआ चाकण का युद्ध मुगल सेनाओं और मराठों के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व दक्कन के सूबेदार शाइस्ता ख़ान कर रहे थे, जबकि मराठा पक्ष से फिरंगोजी नरसाला ने चाकण के किले की रक्षा की।
1660 में शाइस्ता ख़ान ने पुणे पर आक्रमण किया और नगर पर अधिकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप शिवाजी महाराज के उत्तरी क्षेत्रों का एक बड़ा भाग मुगलों के कब्ज़े में चला गया और वहाँ मुगल छावनियाँ स्थापित कर दी गईं। शाइस्ता ख़ान मुगल सम्राट औरंगज़ेब का मामा था।
चाकण का किला मराठा सरदार फिरंगोजी नरसाला के अधीन था। शाइस्ता ख़ान अपने राजपूत सेनापतियों—राय सिंह सिसोदिया, अन्वित सिंह हाड़ा और भाऊ सिंह हाड़ा—के साथ चाकण की ओर बढ़ा और किले की चार महीनों तक घेराबंदी की। मुगलों ने बारूद की सुरंग (माइन) विस्फोट द्वारा किले की दीवार का एक हिस्सा ध्वस्त कर दिया। इसके बाद दो दिनों तक भीषण आक्रमण हुआ, जिसमें किले की अधिकांश मराठा सेना मारी गई और अंततः फिरंगोजी नरसाला ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार चाकण का किला मुगलों के अधीन चला गया।
शिवभारत में इस अभियान का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
“शाइस्ता ख़ान भीमा नदी के तट पर पहुँचा, जो शत्रु प्रदेश की सीमा थी। मुस्लिम सेना ने मंदिरों को तोड़ा, मठों को ध्वस्त किया, प्रमुख लोगों के घरों को ज़मीन से मिला दिया, बाग़ों के वृक्ष काट डाले और अनेक प्राचीन गाँवों व नगरों को उजाड़ दिया। इस प्रकार पूरा देश ऐसे प्रतीत हो रहा था मानो चंद्रमा को पूर्ण ग्रहण लग गया हो।”
स्रोत:
सरदेसाई, जी. एस., New History of the Marathas, खंड 1, पृष्ठ 137।
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