UPSC NOTES
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इंडिया गेट –

1. परिचय
इंडिया गेट भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित एक ऐतिहासिक युद्ध स्मारक (War Memorial) है। यह स्मारक उन भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और तीसरे अफ़ग़ान युद्ध (1919) में ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में बलिदान दिया।

2. निर्माण का इतिहास
निर्माण की शुरुआत: 1921
उद्घाटन: 12 फ़रवरी 1931
उद्घाटनकर्ता: वायसराय लॉर्ड इरविन
वास्तुकार (Architect): सर एडविन लुटियन्स (Sir Edwin Lutyens)
लुटियन्स वही वास्तुकार हैं जिन्होंने नई दिल्ली की कई प्रमुख इमारतों (राष्ट्रपति भवन आदि) की रूपरेखा तैयार की।

3. स्थापत्य (Architecture)
शैली: रोमन विजय मेहराब (Triumphal Arch) से प्रेरित
ऊँचाई: लगभग 42 मीटर
निर्माण सामग्री: लाल और पीला बलुआ पत्थर
डिज़ाइन में सादगी, गंभीरता और वीरता का भाव दिखाई देता है।

4. शहीदों के नाम
इंडिया गेट की दीवारों पर 13,000 से अधिक भारतीय सैनिकों के नाम अंकित हैं।
इन सैनिकों में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी समुदायों के नाम शामिल हैं, जो भारतीय सेना की विविधता को दर्शाते हैं।

5. अमर जवान ज्योति
स्थापना: 1972
कारण: 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद सैनिकों की स्मृति में
इसमें:
काली संगमरमर की चौकी
उलटी रखी राइफल
सैनिक की टोपी
लगातार जलती हुई लौ
2022 में अमर जवान ज्योति की लौ को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) में विलय कर दिया गया।

6. औपनिवेशिक संदर्भ (Colonial Context)
इंडिया गेट ब्रिटिश शासन द्वारा बनाया गया था,
लेकिन आज यह औपनिवेशिक स्मारक से आगे बढ़कर भारतीय राष्ट्रीय स्मृति का प्रतीक बन चुका है।
यह दिखाता है कि कैसे उपनिवेशकालीन संरचनाएँ स्वतंत्र भारत में नए अर्थ ग्रहण करती हैं।

7. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Exam Points)
इंडिया गेट = युद्ध स्मारक
प्रथम विश्व युद्ध + तीसरा अफ़ग़ान युद्ध
वास्तुकार: एडविन लुटियन्स
उद्घाटन: 1931
अमर जवान ज्योति: 1972

8. निष्कर्ष
इंडिया गेट केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह
भारतीय सैनिकों के बलिदान, औपनिवेशिक इतिहास और राष्ट्रनिर्माण की स्मृति का जीवंत प्रतीक है।
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कांग्रेस विदेश विभाग –
1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का दिल्ली अधिवेशन भारत के वैदेशिक मामलों के संबंध में मील का पत्थर माना जा सकता है। 1928 में कांग्रेस दल द्वारा विदेश विभाग की स्थापना करने का फैसला लिया गया। यह कांग्रेस द्वारा 1925 के प्रस्ताव को क्रियान्वित करने हेतु हुआ।
इस विभाग का अध्यक्ष जवाहरलाल को बनाया गया परंतु 1930-1934 तक जन आंदोलनों में व्यस्तता तथा नेताओं के जेल जाने के कारण विदेश विभाग की कोई विशेष उपलब्धियां नहीं रही। 1936 में लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू द्वारा पुनः अध्यक्ष पद संभालने के बाद इस और ध्यान दिया गया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यालय में समाजवादी दल के राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1936 में विदेश विभाग की स्थापना की गई। इस विभाग की स्थापना के 6 माह उपरांत तक लगभग 400 व्यक्तियों व संस्थाओं से कांग्रेस ने संपर्क स्थापित किया।कांग्रेस की इस विस्तृत व्यवस्था का ही परिणाम था कि आजादी से पूर्व देश के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने 7 सितंबर 1946 के अपने रेडियो भाषण में भारत की विदेश नीति के सभी आयामों का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया।
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संविधान को ताकत देने वाली 15 महिलाएं –

✓ दक्षयनी वेलायुधन - संविधान सभा में एकमात्र दलित महिला सदस्य

✓ बेगम एजाज रसूल - संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य

✓ एनी मास्करीन - देशी रियासतों से महिला प्रतिनिधि

✓ विजय लक्ष्मी पंडित - संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष भी रही।

✓ राजकुमारी अमृत कौर - पहली महिला केबिनेट मंत्री बनी।

✓ सरोजनी नायडू - स्वतंत्र भारत की पहली महिला उत्तरप्रदेश राज्यपाल

✓ सुचेता कृपलानी - भारत में पहली महिला मुख्यमंत्री ( उत्तरप्रदेश ) बनी।

✓ मालती चौधरी - देश की पहली महिला मार्क्सवादी नेता

• संविधान सभा की प्रथम बैठक में 10 महिला सदस्य शामिल हुई।
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अकबर द्वारा चन्द्रसेन के विरुद्ध भेजे गए अभियान:
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1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)

2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक

3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)

4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।

5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में

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वीर सावरकर ने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें से कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम अंग्रेजी में निम्नलिखित हैं :-

1. _The Indian War of Independence, 1857_ (1909) - यह पुस्तक 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर केंद्रित है।
2. _Life of Shivaji_ (1920) - यह पुस्तक शिवाजी महाराज के जीवन और योगदान पर केंद्रित है।
3. _Hindutva: Who is a Hindu?_ (1923) - यह पुस्तक हिंदुत्व की अवधारणा पर केंद्रित है और हिंदू धर्म की परिभाषा को समझाती है।
4. _Six Glorious Epochs of Indian History_ (1963) - यह पुस्तक भारतीय इतिहास के छह महत्वपूर्ण युगों पर केंद्रित है।
5. _The Barrister-at-Law: A Memoir_ (1920) - यह पुस्तक सावरकर के जीवन के शुरुआती वर्षों और उनके कानूनी प्रशिक्षण पर केंद्रित है।
6. _The Story of My Transportation for Life_ (1927) - यह पुस्तक सावरकर के जीवन के अनुभवों और उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान पर केंद्रित है।
7. _My Defence_ (1920) - यह पुस्तक सावरकर के मुकदमे और उनके बचाव पर केंद्रित है।
8. _The War of Indian Independence of 1857_ (1909) - यह पुस्तक 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर केंद्रित है।
9. _Shivaji's Military and Administrative System_ (1920) - यह पुस्तक शिवाजी महाराज के सैन्य और प्रशासनिक प्रणाली पर केंद्रित है।
10. _Hindu-Pad-Padashahi_ (1925) - यह पुस्तक हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति पर केंद्रित है।
11. _The Indian War of Independence_ (1909) - यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर केंद्रित है।
12. _The Life of Guru Govind Singh_ (1920) - यह पुस्तक गुरु गोविंद सिंह के जीवन और योगदान पर केंद्रित है।
13. _The History of the Sikhs_ (1920) - यह पुस्तक सिख धर्म और सिख इतिहास पर केंद्रित है।
14. _The Life of Rani Lakshmibai of Jhansi_ (1920) - यह पुस्तक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन और योगदान पर केंद्रित है।
15. _The Social and Political Ideals of Shivaji_ (1920) - यह पुस्तक शिवाजी महाराज के सामाजिक और राजनीतिक विचारों पर केंद्रित है। 💐💐
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जब गांधीजी ने स्वयं हिंसा की निंदा करने से इंकार कर दिया








ध्यातव्य है कि 1942 में गांधीजी ने स्वयं हिंसा की निंदा करने से इंकार कर दिया था। इस संदर्भ में 5 अगस्त को गांधीजी ने अपने सम्बोधन में कहा था कि "मैं आपसे अपनी अहिंसा की मांग नहीं कर रहा। आप तय करें कि आपको इस संघर्ष में क्या करना है?" उनके अनुसार साम्राज्यवादी सत्ता की व्यापक हिंसा का जवाब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सत्याग्रहियों की हिंसा से दिया गया।
"हिंसा पर गांधीजी की ज्यादा आपत्ति इसलिये थी





गांधी के द्वारा हिंसा का विरोध न करने के संदर्भ में फ्रांसिस हचिंस का कहना था कि "हिंसा पर गांधीजी की ज्यादा आपत्ति इसलिये थी क्योंकि इससे जन भागीदारी में कमी आती थी, लेकिन 1942 में ऐसा नहीं हुआ था।"
घटना: मोपला विद्रोह, 1921
• 📍 स्थान: मालाबार क्षेत्र, केरल
• 📍 पृष्ठभूमि: खिलाफ़त आंदोलन + धार्मिक कट्टरता

“मोपला विद्रोह (1921) — खिलाफ़त के नाम पर उठा आंदोलन, जो धार्मिक उन्माद, संगठित हिंसा, जबरन धर्मांतरण और हजारों निर्दोष हिंदुओं की त्रासदी में बदल गया; जिसे राष्ट्रीय राजनीति ने लंबे समय तक ‘गलत समझा’ या ‘नज़रअंदाज़’ किया।”

गांधी जी के अनुसार–मोपला मुसलमान “भटके हुए” थे, उनकी हिंसा को धार्मिक उन्माद से अधिक राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए

अंबेडकर का निष्कर्ष:
“नैतिक आदर्श तब अर्थहीन हो जाते हैं, जब वे पीड़ितों के साथ न्याय नहीं कर पाते।”

नायर का आरोप:
“राष्ट्रीय एकता की कहानी गढ़ने के लिए ऐतिहासिक सच्चाई की बलि दी गई।”

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