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संथारा प्रथा :- जीवन में सभी काम पूर्ण हो जाने पर ईश्वर की शरण में मोक्ष प्राप्ति के लिए अन्न-जल छोड़कर शनैः-शनैः देह त्यागना ही संथारा है। यह जैनों में प्रचलित है जैन धर्म में संथारा को 'महाप्रस्थान का मार्ग' कहा गया है।
#important ❤️👆
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समेला/मधुपर्क :- दुल्हा-दुल्हन के घर पहुँचने पर दुल्हन का पिता अपने सम्बंधियों के साथ वर-पक्ष का स्वागत करता है, इसे समेला कहते हैं। बरातियों को सम्मान देकर बैठाया जाता है। इसे ठूमावा / आगवानी भी कहते हैं।
#important ❤️👍
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हम्मीर हठ..... चन्द्र शेखर
हम्मीर रासो... जोधराज
हम्मीररायण.... भढ़ाऊं व्यास
हम्मीर महाकाव्य... नयनचंद्र सूरी
#important ❤️👍
हम्मीर रासो... जोधराज
हम्मीररायण.... भढ़ाऊं व्यास
हम्मीर महाकाव्य... नयनचंद्र सूरी
#important ❤️👍
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महत्वपूर्ण फैक्ट...❤️👆
हम्मीर महाकाव्य... नयनचंद्र सूरी
पृथ्वीराज रासो.... चंद बरदाई
पृथ्वीराज विजय.... जयानक
प्रबंध चिंतामणि... मेरुतंग
#important ❤️👍
हम्मीर महाकाव्य... नयनचंद्र सूरी
पृथ्वीराज रासो.... चंद बरदाई
पृथ्वीराज विजय.... जयानक
प्रबंध चिंतामणि... मेरुतंग
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दादू पंथ की पांच शाखाएँ है:-
1.खालसा : मुख्यपीठ नरैना से सम्बन्धित है, जिसके संस्थापक दादू जी के पुत्र 'गरीबदास' थे।
2. नागा : इस शाखा के संस्थापक दादू जी के शिष्य सुन्दरदास थे। ये हाथ में हथियार रखते थे तथा जयपुर राज्य में 'दाखिली सैनिक' के रुप में कार्य करते थे।
3.उतरादे/स्थानधारी : दादू जी के शिष्य, जो उतर दिशा में चले गए, जिसके संस्थापक 'बनवारीदास' थे। (रतिया, हरियाणा)
4. विरक्ते : घुमते-फिरते साधु, जो गृहस्थियों को उपदेश देते थे।
5. खाकी : शरीर पर भस्म लगाते तथा जटाए रखते थे
#important ❤️☘
1.खालसा : मुख्यपीठ नरैना से सम्बन्धित है, जिसके संस्थापक दादू जी के पुत्र 'गरीबदास' थे।
2. नागा : इस शाखा के संस्थापक दादू जी के शिष्य सुन्दरदास थे। ये हाथ में हथियार रखते थे तथा जयपुर राज्य में 'दाखिली सैनिक' के रुप में कार्य करते थे।
3.उतरादे/स्थानधारी : दादू जी के शिष्य, जो उतर दिशा में चले गए, जिसके संस्थापक 'बनवारीदास' थे। (रतिया, हरियाणा)
4. विरक्ते : घुमते-फिरते साधु, जो गृहस्थियों को उपदेश देते थे।
5. खाकी : शरीर पर भस्म लगाते तथा जटाए रखते थे
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1907 ई. में स्वामी गोपालदास ने पं. कन्हैयालाल तथा पं. श्रीराम मास्टर के सहयोग से चुरू में सर्वहितकारिणी सभा की स्थापना की गई। इसे राजनैतिक कार्यों के कारण चुरू की कांग्रेस भी कहा गया। इस सभा ने नारी शिक्षा हेतु चुरू में 'सर्वहितकारणी पुत्री पाठशाला' तथा हरिजनों की शिक्षा के लिए 'कबीर पाठशाला' की स्थापना की!!
#important ❤️☘
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अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण संघ' की स्थापना 30 सितम्बर, 1932 को दिल्ली में की गई। संस्थापक महात्मा गांधी, अध्यक्ष – घनश्याम दास बिड़ला, सचिव अमृतलाल ठक्कर।
• 13 सितम्बर, 1933 को इस संघ का नाम बदलकर 'हरिजन सेवा संघ' कर दिया।
#important ❤️☘
• 13 सितम्बर, 1933 को इस संघ का नाम बदलकर 'हरिजन सेवा संघ' कर दिया।
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निम्नलिखित में से कौन" निर्गुण उपासना" का अनुयायी था?
[CET(10+2) Level Exam-24.10.2024 (Shift-I)]❤️
[CET(10+2) Level Exam-24.10.2024 (Shift-I)]❤️
व्याख्या:
1.सगुण भक्ति : इसमें ईश्वर के मूर्ति रुप
की पूजा अर्थात ईश्वर को साकार रुप में पूजा जाता है।
2 .निर्गुण भक्ति : ईश्वर की निराकर रुप में पूजा अर्थात मूर्ति पूजा का विरोध ।
सगुण भक्ति:
रामानुज/सामानंदी, वल्लभ, गौड़ीय, निम्बार्क, नाथ, पाशुपात, मीरादासी, गवरी बाई, भक्त कवि दुर्लभ
निर्गुण भक्ति:
जांभोजी, जसनाथ जी, दादू, रामस्नेही, परनामी, कबीर पंथी, लालदासी, दरियाव जी, हरिराम जी, रामदास जी, पीपा जी, धन्ना जी, संत रैदास, बखना जी, सुंदरदास, रज्जब जी, नवलदास जी, लालगिरी जी, परनामी सम्प्रदाय
#important #फैक्ट ❤️👍🏼
1.सगुण भक्ति : इसमें ईश्वर के मूर्ति रुप
की पूजा अर्थात ईश्वर को साकार रुप में पूजा जाता है।
2 .निर्गुण भक्ति : ईश्वर की निराकर रुप में पूजा अर्थात मूर्ति पूजा का विरोध ।
सगुण भक्ति:
रामानुज/सामानंदी, वल्लभ, गौड़ीय, निम्बार्क, नाथ, पाशुपात, मीरादासी, गवरी बाई, भक्त कवि दुर्लभ
निर्गुण भक्ति:
जांभोजी, जसनाथ जी, दादू, रामस्नेही, परनामी, कबीर पंथी, लालदासी, दरियाव जी, हरिराम जी, रामदास जी, पीपा जी, धन्ना जी, संत रैदास, बखना जी, सुंदरदास, रज्जब जी, नवलदास जी, लालगिरी जी, परनामी सम्प्रदाय
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अकबर द्वारा चन्द्रसेन के विरुद्ध भेजे गए अभियान:
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1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में
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1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में
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जेन्टलमेन एग्रीमेन्ट'- 17 सितम्बर 1942 में हीरालाल शास्त्री
(प्रजामण्डल का अध्यक्ष) तथा मिर्जा इस्माइल (जयपुर के प्रधानमंत्री) ने मिलकर आधुनिक जयपुर का निर्माण किया।
• इस समझौते के कारण जयपुर प्रजामण्डल ने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग नहीं लिया।
• आजाद मोर्चा- जेन्टलमेन एग्रीमेन्ट से असन्तुष्ट कार्यकर्त्ताओं ने बाबा हरिशचन्द के नेतृत्व में आजाद मोर्चा का गठन किया तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया।
• आजाद मोर्चा के अन्य सदस्य- रामकरण जोशी, दोलतमल भण्डारी तथा गुलाब चन्द कासली वाल आदि थे।
#important ❤️☘
(प्रजामण्डल का अध्यक्ष) तथा मिर्जा इस्माइल (जयपुर के प्रधानमंत्री) ने मिलकर आधुनिक जयपुर का निर्माण किया।
• इस समझौते के कारण जयपुर प्रजामण्डल ने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग नहीं लिया।
• आजाद मोर्चा- जेन्टलमेन एग्रीमेन्ट से असन्तुष्ट कार्यकर्त्ताओं ने बाबा हरिशचन्द के नेतृत्व में आजाद मोर्चा का गठन किया तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया।
• आजाद मोर्चा के अन्य सदस्य- रामकरण जोशी, दोलतमल भण्डारी तथा गुलाब चन्द कासली वाल आदि थे।
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वसंतगढ़ दुर्ग - सिरोही
विजयमंदिर का किला- बयाना (भरतपुर)
शेरगढ़ (कोषवर्धन) का किला-बारां
शेरगढ़ का किला-धौलपुर
आमेर का किला - जयपुर
सोजत दुर्ग-पाली
सज्जनगढ़ दुर्ग - उदयपुर
भाद्राजूण का किला-जालौर
खंडार का किला-सवाईमाधोपुर
कांकोड़ किला-टोंक
मंडरायल दुर्ग - करौली
मचान दुर्ग-सिरोही
तवनगढ़ / त्रिभुवनगढ़ / तिमनगढ़ किला-करौली
कुचामन किला-डीडवाना-कुचामन
कांकवाड़ी किला - सरिस्का अभ्यारण्य (अलवर)
बाला दुर्ग (कुंवारा किला) / अलवर का किला- अलवर
#important #फैक्ट #दुर्ग ❤️☘
विजयमंदिर का किला- बयाना (भरतपुर)
शेरगढ़ (कोषवर्धन) का किला-बारां
शेरगढ़ का किला-धौलपुर
आमेर का किला - जयपुर
सोजत दुर्ग-पाली
सज्जनगढ़ दुर्ग - उदयपुर
भाद्राजूण का किला-जालौर
खंडार का किला-सवाईमाधोपुर
कांकोड़ किला-टोंक
मंडरायल दुर्ग - करौली
मचान दुर्ग-सिरोही
तवनगढ़ / त्रिभुवनगढ़ / तिमनगढ़ किला-करौली
कुचामन किला-डीडवाना-कुचामन
कांकवाड़ी किला - सरिस्का अभ्यारण्य (अलवर)
बाला दुर्ग (कुंवारा किला) / अलवर का किला- अलवर
#important #फैक्ट #दुर्ग ❤️☘
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निरंजनी सम्प्रदाय:_संत हरिदासजी (कलियुग का वाल्मिकी)
ग्रंथ- मंत्रराज प्रकाश, हरि पुरूष जी की वाणी, साखी, भक्त विरदावली, श्री हरिपुरूष भर्तहरि संवाद, नाम निरूपण, जोग, टोडरमल जोग
#फैक्ट #important #3rd Grade ❤️👍🏼
ग्रंथ- मंत्रराज प्रकाश, हरि पुरूष जी की वाणी, साखी, भक्त विरदावली, श्री हरिपुरूष भर्तहरि संवाद, नाम निरूपण, जोग, टोडरमल जोग
#फैक्ट #important #3rd Grade ❤️👍🏼
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1907 ई. में स्वामी गोपालदास ने पं. कन्हैयालाल तथा पं. श्रीराम मास्टर के सहयोग से चुरू में सर्वहितकारिणी सभा की स्थापना की गई। इसे राजनैतिक कार्यों के कारण चुरू की कांग्रेस भी कहा गया। इस सभा ने नारी शिक्षा हेतु चुरू में 'सर्वहितकारणी पुत्री पाठशाला' तथा हरिजनों की शिक्षा के लिए 'कबीर पाठशाला' की स्थापना की!!
#important ❤️☘
#important ❤️☘
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अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण संघ' की स्थापना 30 सितम्बर, 1932 को दिल्ली में की गई। संस्थापक महात्मा गांधी, अध्यक्ष – घनश्याम दास बिड़ला, सचिव अमृतलाल ठक्कर।
• 13 सितम्बर, 1933 को इस संघ का नाम बदलकर 'हरिजन सेवा संघ' कर दिया।
#important ❤️☘
• 13 सितम्बर, 1933 को इस संघ का नाम बदलकर 'हरिजन सेवा संघ' कर दिया।
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अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण संघ' की स्थापना 30 सितम्बर, 1932 को दिल्ली में की गई। संस्थापक महात्मा गांधी, अध्यक्ष – घनश्याम दास बिड़ला, सचिव अमृतलाल ठक्कर। • 13 सितम्बर, 1933 को इस संघ का नाम बदलकर 'हरिजन सेवा संघ' कर दिया। #important ❤️☘
राजस्थान हरिजन सेवा संघ' (हरिजन सेवा संघ की शाखा) की स्थापना - 1934 ई. में अजमेर में हुई, जहाँ हरिजन सेवा संघ की इस राजपूताने शाखा का अध्यक्ष हरविलास शारदा को मनोनीत किया गया
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विजय स्तम्भ की प्रमुख मूर्तियां-
विजय स्तम्भ के द्वार में प्रवेश करते ही जनार्दन की मूर्ति जबकि प्रथम मंजिल पर अंनत, ब्रहमा, रुद्र की मूर्तियां, दूसरी मंजिल पर अर्द्ध नारीश्वर एवं हरिहर की मूर्तियां, तीसरी मंजिल पर विरंचि, जयन्त, नारायण और पितामह की मूर्तियां, चौथी मंजिल पर त्रिखण्डा, तोत्रला, हरिसिद्ध, पार्वती, हिंगलाज, गंगा, यमुना, सरस्वती, गंधर्व, कार्तिकेय की मूर्तियां है। पांचवी मंजिल में युग्म मूर्तियां लक्ष्मीनारायण, उमा-महेश्वर, सावित्री-ब्रहमा की मूर्तियां है। छठी मंजिल पर महा सरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली की मूतियां, सातवीं मंजिल पर वराह, नृसिंह, रामचन्द्र, बलदेव एवं बुद्ध की मूर्तियां है। आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं है। नौवीं मंजिल पर हम्मीर से लेकर मोकल तक का इतिहास शिलाओं पर अंकित हैं जिसे कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति कहते है
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विजय स्तम्भ के द्वार में प्रवेश करते ही जनार्दन की मूर्ति जबकि प्रथम मंजिल पर अंनत, ब्रहमा, रुद्र की मूर्तियां, दूसरी मंजिल पर अर्द्ध नारीश्वर एवं हरिहर की मूर्तियां, तीसरी मंजिल पर विरंचि, जयन्त, नारायण और पितामह की मूर्तियां, चौथी मंजिल पर त्रिखण्डा, तोत्रला, हरिसिद्ध, पार्वती, हिंगलाज, गंगा, यमुना, सरस्वती, गंधर्व, कार्तिकेय की मूर्तियां है। पांचवी मंजिल में युग्म मूर्तियां लक्ष्मीनारायण, उमा-महेश्वर, सावित्री-ब्रहमा की मूर्तियां है। छठी मंजिल पर महा सरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली की मूतियां, सातवीं मंजिल पर वराह, नृसिंह, रामचन्द्र, बलदेव एवं बुद्ध की मूर्तियां है। आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं है। नौवीं मंजिल पर हम्मीर से लेकर मोकल तक का इतिहास शिलाओं पर अंकित हैं जिसे कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति कहते है
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अकबर द्वारा चन्द्रसेन के विरुद्ध भेजे गए अभियान:
1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में
#important ❤️☘
याद रखने योग्य सवाल ❤️👆
1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में
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याद रखने योग्य सवाल ❤️👆
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राली लाग : प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बनाकर देता था जो जागीरदारे या उसके कर्मचारियों के काम आती थी।
दस्तूर : भू-राजस्व कर्मचारी पटेल, पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार एवं चौधरी जो अवैध रकम किसानो से वसूल करते थे उसे 'दस्तूर' कहा जाता था।
नजराना : यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार एवं पटेल वसूल करते थे। जागीरदार राजा को एवं पटेल तहसीलदार को नजराना देता था। जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी।
न्यौता-लाग : यह लाग जागीरदार, पटेल एवं चौधरी अपने लड़के-लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे।
चंवरी-लाग : किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से पच्चीस रुपए तक चंवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे।
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दस्तूर : भू-राजस्व कर्मचारी पटेल, पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार एवं चौधरी जो अवैध रकम किसानो से वसूल करते थे उसे 'दस्तूर' कहा जाता था।
नजराना : यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार एवं पटेल वसूल करते थे। जागीरदार राजा को एवं पटेल तहसीलदार को नजराना देता था। जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी।
न्यौता-लाग : यह लाग जागीरदार, पटेल एवं चौधरी अपने लड़के-लड़की की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे।
चंवरी-लाग : किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से पच्चीस रुपए तक चंवरी लाग के नाम पर लिए जाते थे।
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