Forwarded from RAJASTHAN ALL EXAM STUDY📚
▪️सियार उल मुत्खैरीन – पुस्तक से प्लासी युद्ध का वर्णन मिलता है.
इसके लेखक गुलाम हुसैन।।
▪️ब्लैक होल ट्रेजडी घटना का वर्णन जॉन जैड. हाॅलवेल ने अपने Alive the wonder पेपर में दिया है ।।
ब्लैक होल घटना (Black Hole Tragedy) 1756 की ऐतिहासिक घटना को संदर्भित करती है, जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता (अब कोलकाता) पर कब्जा करने के बाद 146 ब्रिटिश कैदियों को एक छोटे से कालकोठरी में बंद कर दिया, जहां गर्मी और दम घुटने से 123 की मौत हो गयी ।और केवल 23 जीवित बचे।। —(हालवेल )
इतिहासकार इस आंकड़े को संदिग्ध बताते है ....
स्टेनले रिपोर्ट के अनुसार 64 कैदी थे.
D. प्रियर 43 कैदी बताते हैं।।
कुछ इतिहासकार जैसे अक्षयकुमार मैत्रेय (Akshay Kumar Maitreya) ने अपनी पुस्तक Sirajuddaula / सिराजुद्दीन में इस घटना को अतिशयोक्तिपूर्ण या मनगढ़ंत बताते हुए सिराजुद्दौला की छवि को साफ किया, यह दावा करते हुए कि समकालीन स्रोतों में इसका कोई प्रमाणिक उल्लेख नहीं है। यह विवाद ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास लेखन का हिस्सा रहा।।
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इतिहासकार इस आंकड़े को संदिग्ध बताते है ....
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D. प्रियर 43 कैदी बताते हैं।।
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▪️श्वेत विद्रोह लॉर्ड रिपन के शासनकाल (1880-1884) से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जो इल्बर्ट बिल (Ilbert Bill) के विरोध में अंग्रेजों (श्वेत समुदाय) द्वारा किया गया सामूहिक विरोध था। यह बिल 1883 में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे सुनने का अधिकार देना था। जिसके विरुद्ध अंग्रजों ने विरोध किया।।
🔸 श्वेत विद्रोह (1766): लार्ड क्लाइव के समय ( बंगाल )
सेना के तीन दस्ते बनाये - मुंगेर, बांकीपुर व इलाहबाद में स्थापित किए।
सैन्य अधिकारियों के दोहरे भत्ते बन्द कर दिये, तब फ्लेचर के नेतृत्व में सैन्य अधिकारियों ने इस्तीफे
दे दिये, इसे श्वेत विद्रोह कहते हैं। बाद में सैन्य अधिकारियों में फूट पड़ गयी तथा विद्रोह शान्त भी हो गया। 💐💐
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📅 शनिवार, 8 फ़रवरी
⏰ सुबह 10:30 बजे
📍 Utkarsh Classes, गोपालपुरा बायपास रोड, जयपुर
सेमिनार में मिलेगी निःशुल्क अध्ययन सामग्री और तैयारी को मज़बूत बनाने का सटीक रोडमैप।
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1787
ब्रिटिशों की पहली दंड बस्ती
📍 बेनकूलेन (सुमात्रा, इंडोनेशिया)
• केंद्र: फोर्ट मार्लबोरो
उद्देश्य–
अपराधियों को दूर रखना
निशुल्क श्रम (forced labour) प्राप्त करना
1789
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंडमान द्वीप समूह का सर्वेक्षण शुरू किया
📍 लेफ्टिनेंट आर्किबाल्ड ब्लेयर
कैदी बस्ती की सिफारिश →
👉 ब्लेयर के नाम पर “पोर्ट ब्लेयर”
प्रशासनिक व दमनकारी ढाँचा
– वाइपर द्वीप में पहली जेल और फांसीघर (1864–67)
– डॉ. जेम्स पैट्रिक वॉकर जैसे अधिकारियों की निगरानी
– एक ही दिन में 80+ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी
10 मार्च 1858 को अंडमान के चैथम द्वीप पर 733 स्वतंत्रता सेनानियों का पहला जत्था पहुँचा।
इस जत्थे में अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक खैराबादी, मौलाना लियाकत अली जैसे प्रमुख नेता भी शामिल थे। कई नेताओं ने कैद के दौरान ही दम तोड़ दिया।
1860 के बाद महिला अपराधियों को भी अंडमान भेजा जाने लगा।
1872 में अंडमान भेजे गए एक वहाबी अपराधी ने
वाइसराय लॉर्ड मेयो की चाकू घोंपकर हत्या कर दी।
1874– सुधारात्मक दंड नीति (Reformative Penal System)
• अच्छे व्यवहार पर
• 20–25 वर्ष बाद रिहाई
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10 मार्च 1858 को अंडमान के चैथम द्वीप पर 733 स्वतंत्रता सेनानियों का पहला जत्था पहुँचा।
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चाकण का युद्ध (1660 ई.)
1660 ईस्वी में हुआ चाकण का युद्ध मुगल सेनाओं और मराठों के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व दक्कन के सूबेदार शाइस्ता ख़ान कर रहे थे, जबकि मराठा पक्ष से फिरंगोजी नरसाला ने चाकण के किले की रक्षा की।
1660 में शाइस्ता ख़ान ने पुणे पर आक्रमण किया और नगर पर अधिकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप शिवाजी महाराज के उत्तरी क्षेत्रों का एक बड़ा भाग मुगलों के कब्ज़े में चला गया और वहाँ मुगल छावनियाँ स्थापित कर दी गईं। शाइस्ता ख़ान मुगल सम्राट औरंगज़ेब का मामा था।
चाकण का किला मराठा सरदार फिरंगोजी नरसाला के अधीन था। शाइस्ता ख़ान अपने राजपूत सेनापतियों—राय सिंह सिसोदिया, अन्वित सिंह हाड़ा और भाऊ सिंह हाड़ा—के साथ चाकण की ओर बढ़ा और किले की चार महीनों तक घेराबंदी की। मुगलों ने बारूद की सुरंग (माइन) विस्फोट द्वारा किले की दीवार का एक हिस्सा ध्वस्त कर दिया। इसके बाद दो दिनों तक भीषण आक्रमण हुआ, जिसमें किले की अधिकांश मराठा सेना मारी गई और अंततः फिरंगोजी नरसाला ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार चाकण का किला मुगलों के अधीन चला गया।
शिवभारत में इस अभियान का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
“शाइस्ता ख़ान भीमा नदी के तट पर पहुँचा, जो शत्रु प्रदेश की सीमा थी। मुस्लिम सेना ने मंदिरों को तोड़ा, मठों को ध्वस्त किया, प्रमुख लोगों के घरों को ज़मीन से मिला दिया, बाग़ों के वृक्ष काट डाले और अनेक प्राचीन गाँवों व नगरों को उजाड़ दिया। इस प्रकार पूरा देश ऐसे प्रतीत हो रहा था मानो चंद्रमा को पूर्ण ग्रहण लग गया हो।”
स्रोत:
सरदेसाई, जी. एस., New History of the Marathas, खंड 1, पृष्ठ 137।
ऐतिहासिक तथ्यों और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित ऐसी और जानकारियों के लिए जुड़ें 👇📖
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1660 ईस्वी में हुआ चाकण का युद्ध मुगल सेनाओं और मराठों के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व दक्कन के सूबेदार शाइस्ता ख़ान कर रहे थे, जबकि मराठा पक्ष से फिरंगोजी नरसाला ने चाकण के किले की रक्षा की।
1660 में शाइस्ता ख़ान ने पुणे पर आक्रमण किया और नगर पर अधिकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप शिवाजी महाराज के उत्तरी क्षेत्रों का एक बड़ा भाग मुगलों के कब्ज़े में चला गया और वहाँ मुगल छावनियाँ स्थापित कर दी गईं। शाइस्ता ख़ान मुगल सम्राट औरंगज़ेब का मामा था।
चाकण का किला मराठा सरदार फिरंगोजी नरसाला के अधीन था। शाइस्ता ख़ान अपने राजपूत सेनापतियों—राय सिंह सिसोदिया, अन्वित सिंह हाड़ा और भाऊ सिंह हाड़ा—के साथ चाकण की ओर बढ़ा और किले की चार महीनों तक घेराबंदी की। मुगलों ने बारूद की सुरंग (माइन) विस्फोट द्वारा किले की दीवार का एक हिस्सा ध्वस्त कर दिया। इसके बाद दो दिनों तक भीषण आक्रमण हुआ, जिसमें किले की अधिकांश मराठा सेना मारी गई और अंततः फिरंगोजी नरसाला ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार चाकण का किला मुगलों के अधीन चला गया।
शिवभारत में इस अभियान का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
“शाइस्ता ख़ान भीमा नदी के तट पर पहुँचा, जो शत्रु प्रदेश की सीमा थी। मुस्लिम सेना ने मंदिरों को तोड़ा, मठों को ध्वस्त किया, प्रमुख लोगों के घरों को ज़मीन से मिला दिया, बाग़ों के वृक्ष काट डाले और अनेक प्राचीन गाँवों व नगरों को उजाड़ दिया। इस प्रकार पूरा देश ऐसे प्रतीत हो रहा था मानो चंद्रमा को पूर्ण ग्रहण लग गया हो।”
स्रोत:
सरदेसाई, जी. एस., New History of the Marathas, खंड 1, पृष्ठ 137।
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इंडिया गेट –
1. परिचय
इंडिया गेट भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित एक ऐतिहासिक युद्ध स्मारक (War Memorial) है। यह स्मारक उन भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और तीसरे अफ़ग़ान युद्ध (1919) में ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में बलिदान दिया।
2. निर्माण का इतिहास
निर्माण की शुरुआत: 1921
उद्घाटन: 12 फ़रवरी 1931
उद्घाटनकर्ता: वायसराय लॉर्ड इरविन
वास्तुकार (Architect): सर एडविन लुटियन्स (Sir Edwin Lutyens)
लुटियन्स वही वास्तुकार हैं जिन्होंने नई दिल्ली की कई प्रमुख इमारतों (राष्ट्रपति भवन आदि) की रूपरेखा तैयार की।
3. स्थापत्य (Architecture)
शैली: रोमन विजय मेहराब (Triumphal Arch) से प्रेरित
ऊँचाई: लगभग 42 मीटर
निर्माण सामग्री: लाल और पीला बलुआ पत्थर
डिज़ाइन में सादगी, गंभीरता और वीरता का भाव दिखाई देता है।
4. शहीदों के नाम
इंडिया गेट की दीवारों पर 13,000 से अधिक भारतीय सैनिकों के नाम अंकित हैं।
इन सैनिकों में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी समुदायों के नाम शामिल हैं, जो भारतीय सेना की विविधता को दर्शाते हैं।
5. अमर जवान ज्योति
स्थापना: 1972
कारण: 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद सैनिकों की स्मृति में
इसमें:
काली संगमरमर की चौकी
उलटी रखी राइफल
सैनिक की टोपी
लगातार जलती हुई लौ
2022 में अमर जवान ज्योति की लौ को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) में विलय कर दिया गया।
6. औपनिवेशिक संदर्भ (Colonial Context)
इंडिया गेट ब्रिटिश शासन द्वारा बनाया गया था,
लेकिन आज यह औपनिवेशिक स्मारक से आगे बढ़कर भारतीय राष्ट्रीय स्मृति का प्रतीक बन चुका है।
यह दिखाता है कि कैसे उपनिवेशकालीन संरचनाएँ स्वतंत्र भारत में नए अर्थ ग्रहण करती हैं।
7. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Exam Points)
इंडिया गेट = युद्ध स्मारक
प्रथम विश्व युद्ध + तीसरा अफ़ग़ान युद्ध
वास्तुकार: एडविन लुटियन्स
उद्घाटन: 1931
अमर जवान ज्योति: 1972
8. निष्कर्ष
इंडिया गेट केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह
भारतीय सैनिकों के बलिदान, औपनिवेशिक इतिहास और राष्ट्रनिर्माण की स्मृति का जीवंत प्रतीक है।
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1. परिचय
इंडिया गेट भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित एक ऐतिहासिक युद्ध स्मारक (War Memorial) है। यह स्मारक उन भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और तीसरे अफ़ग़ान युद्ध (1919) में ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में बलिदान दिया।
2. निर्माण का इतिहास
निर्माण की शुरुआत: 1921
उद्घाटन: 12 फ़रवरी 1931
उद्घाटनकर्ता: वायसराय लॉर्ड इरविन
वास्तुकार (Architect): सर एडविन लुटियन्स (Sir Edwin Lutyens)
लुटियन्स वही वास्तुकार हैं जिन्होंने नई दिल्ली की कई प्रमुख इमारतों (राष्ट्रपति भवन आदि) की रूपरेखा तैयार की।
3. स्थापत्य (Architecture)
शैली: रोमन विजय मेहराब (Triumphal Arch) से प्रेरित
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4. शहीदों के नाम
इंडिया गेट की दीवारों पर 13,000 से अधिक भारतीय सैनिकों के नाम अंकित हैं।
इन सैनिकों में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी समुदायों के नाम शामिल हैं, जो भारतीय सेना की विविधता को दर्शाते हैं।
5. अमर जवान ज्योति
स्थापना: 1972
कारण: 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद सैनिकों की स्मृति में
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6. औपनिवेशिक संदर्भ (Colonial Context)
इंडिया गेट ब्रिटिश शासन द्वारा बनाया गया था,
लेकिन आज यह औपनिवेशिक स्मारक से आगे बढ़कर भारतीय राष्ट्रीय स्मृति का प्रतीक बन चुका है।
यह दिखाता है कि कैसे उपनिवेशकालीन संरचनाएँ स्वतंत्र भारत में नए अर्थ ग्रहण करती हैं।
7. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Exam Points)
इंडिया गेट = युद्ध स्मारक
प्रथम विश्व युद्ध + तीसरा अफ़ग़ान युद्ध
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उद्घाटन: 1931
अमर जवान ज्योति: 1972
8. निष्कर्ष
इंडिया गेट केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह
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🚨 स्कूल व्याख्याता परीक्षा की तैयारी का सबसे अहम पड़ाव!
राजस्थान के सभी प्रमुख शहरों में शुरू हो रही है स्कूल व्याख्याता प्रथम प्रश्न-पत्र (GK)
OFFLINE टेस्ट सीरीज़
🗓️ शुरुआत: 8 मार्च 2026
⏰ समय: 11 AM – 12:30 PM
📝 कुल 10 Full Length Tests
🌐 भाषा: Bilingual (Hindi + English)
💰 अब सिर्फ ₹1800 (सीमित समय के लिए)
⚠️ फॉर्म भरने की आख़िरी तारीख़: 4 मार्च 2026
सीटें सीमित हैं — देर की तो मौका हाथ से निकल जाएगा!
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राजस्थान के सभी प्रमुख शहरों में शुरू हो रही है स्कूल व्याख्याता प्रथम प्रश्न-पत्र (GK)
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कांग्रेस विदेश विभाग –
1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का दिल्ली अधिवेशन भारत के वैदेशिक मामलों के संबंध में मील का पत्थर माना जा सकता है। 1928 में कांग्रेस दल द्वारा विदेश विभाग की स्थापना करने का फैसला लिया गया। यह कांग्रेस द्वारा 1925 के प्रस्ताव को क्रियान्वित करने हेतु हुआ।
इस विभाग का अध्यक्ष जवाहरलाल को बनाया गया परंतु 1930-1934 तक जन आंदोलनों में व्यस्तता तथा नेताओं के जेल जाने के कारण विदेश विभाग की कोई विशेष उपलब्धियां नहीं रही। 1936 में लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू द्वारा पुनः अध्यक्ष पद संभालने के बाद इस और ध्यान दिया गया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यालय में समाजवादी दल के राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1936 में विदेश विभाग की स्थापना की गई। इस विभाग की स्थापना के 6 माह उपरांत तक लगभग 400 व्यक्तियों व संस्थाओं से कांग्रेस ने संपर्क स्थापित किया।कांग्रेस की इस विस्तृत व्यवस्था का ही परिणाम था कि आजादी से पूर्व देश के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने 7 सितंबर 1946 के अपने रेडियो भाषण में भारत की विदेश नीति के सभी आयामों का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया।
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❤1
Forwarded from RAJASTHAN ALL EXAM STUDY📚
संविधान को ताकत देने वाली 15 महिलाएं –
✓ दक्षयनी वेलायुधन - संविधान सभा में एकमात्र दलित महिला सदस्य
✓ बेगम एजाज रसूल - संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य
✓ एनी मास्करीन - देशी रियासतों से महिला प्रतिनिधि
✓ विजय लक्ष्मी पंडित - संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष भी रही।
✓ राजकुमारी अमृत कौर - पहली महिला केबिनेट मंत्री बनी।
✓ सरोजनी नायडू - स्वतंत्र भारत की पहली महिला उत्तरप्रदेश राज्यपाल
✓ सुचेता कृपलानी - भारत में पहली महिला मुख्यमंत्री ( उत्तरप्रदेश ) बनी।
✓ मालती चौधरी - देश की पहली महिला मार्क्सवादी नेता
• संविधान सभा की प्रथम बैठक में 10 महिला सदस्य शामिल हुई।
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✓ दक्षयनी वेलायुधन - संविधान सभा में एकमात्र दलित महिला सदस्य
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✓ विजय लक्ष्मी पंडित - संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष भी रही।
✓ राजकुमारी अमृत कौर - पहली महिला केबिनेट मंत्री बनी।
✓ सरोजनी नायडू - स्वतंत्र भारत की पहली महिला उत्तरप्रदेश राज्यपाल
✓ सुचेता कृपलानी - भारत में पहली महिला मुख्यमंत्री ( उत्तरप्रदेश ) बनी।
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अकबर द्वारा चन्द्रसेन के विरुद्ध भेजे गए अभियान:
👇👇👇
1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
5. पाइन्दा खाँ व कासिम खाँ - 1580 ई. में
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1. हुसैन कुली खाँ - (सर्वप्रथम 1564 ई. में भेजा गया)
2. रायसिंह राठौड़ (बीकानेर) - 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक
3. जलाल खाँ - 1573 ई. में (यह मारा गया था)
4. शाहबाज खाँ - सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
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