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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य ही जीवन
१९.वीर्य रक्षा के अनूठे नियम
१५. उपवास
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१९.वीर्य रक्षा के अनूठे नियम
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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हमारे देखने मै आया है की जो युवा को ब्रम्हचर्य जैसे अमृत (आज के काल मै) मिला है और उससे वो अध्यात्मिक एव भौवतिक उन्नती करने तो काफी हद तक सफल हो रहा है ।
पर साथ ही साथ अगर तुम किसी दूसरेको जिन्हे ये अमृत अभी मिला नहीं उनकी निंदा करते दिखाई देते है जो की बिल्कुल गलत है हमे तो उन जैसे युवा को ब्रम्हचर्य का ज्ञान देना चाहिए ।
ब्रम्हचर्य का ज्ञान आप तक सिमित मत रखिए दूसरो से भी साझा जरूर करे ❕
पर साथ ही साथ अगर तुम किसी दूसरेको जिन्हे ये अमृत अभी मिला नहीं उनकी निंदा करते दिखाई देते है जो की बिल्कुल गलत है हमे तो उन जैसे युवा को ब्रम्हचर्य का ज्ञान देना चाहिए ।
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ) pinned «❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇🔹❇ #hastag #celibacybookssummary #Chanakyaniti #Mondayspecial #bramhachryamotivation #meditation #memesonnofap #Celibacy #celibacyquestionanswer Use above☝ hastag to find out post related. आप को जिस विषय पर पोस्ट पढ़नी वो…»
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य ही जीवन
१९.वीर्य रक्षा के अनूठे नियम
१६. दृढ़-प्रतिज्ञा
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हमारे ब्रम्हचारी युवा और युवती हम अपने ब्रम्हचर्य की जानकारी को जादा लोगो से साझा करने हेतू, उन तक पोहोचने के हेतू काम कर रहे हैं ऊसी दौरान हमको cross promotion करना पड रहा है......
आप सभी हम पर विश्वास कीजिये.......
हम सिर्फ ब्रम्हचर्य का प्रसार करने मैं जुटे हुए है और आगे भी पुरे भारतवर्ष मैं ब्रम्हचर्य का ही प्रसार करेंगे !
धन्यवाद🙏
@bramachrya01
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🔰आखिर वीर्यनाश करने से दुर्बलता कैसे आती है ?
अप्राकृतिक माध्यम अतार्थ हस्तमैथून द्वारा वीर्यनाश करने से तो दुर्बलता आती ही है लेकिन प्राकृतिक माध्यम अतार्थ संभोग द्वारा वीर्यनाश करने पर भी दुर्बलता आती है । इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है :
वास्तव में जब जब हमारे मन में काम उत्तेजना होती है तब तब हमारे शरीर को ये लगता है कि अब इस शरीर से प्रजनन होने वाली है या यूं कहे की एक नए इंसान की उत्तपत्ति होने वाली है । इसलिए शरीर वीर्य को बाहर निकालता है । तो वीर्य वास्तव में इसलिए बनता है ताकि उससे एक नए इंसान की उत्तपत्ति ( प्रजनन ) हो सके । इसके शुक्राणुओं में DNA होती है जिसके द्वारा पिता के शारीरिक गुण बच्चो में जाते है । इसमें विभिन प्रकार के प्रोटीन होती है जो वीर्य को बाकी कोशिकाओं से अलग बनाती है ।
वीर्य एक ऐसी कोशिकाओं का समूह है जो कहने को तो बाकी कोशिकाओं के तरह हर समय बनते बिगड़ते रहता है लेकिन वास्तव में इसे पुरी तरह से विकसित होने में लगभग 72 दिन लगता है । तब जाके ये प्रजनन प्रक्रिया के लिए उत्कृष्ट हो पाता है । वीर्य युही नही बनता क्योंकि हमारे शरीर की पहली प्राथमिकता प्रजनन है इसलिए शरीर द्वारा वीर्य की उत्तपत्ति करने में कोई लापरवाही नही बरती जाती । भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लंबी है । जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पांच दिन बाद रक्त से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, अस्थि, मज्जा और अंत में शुक्र बनता है। इस प्रकार आहार से शुक्र बनने में करीब एक महीना लग जाता है।
अलग अलग चिकित्सा शास्त्रों के इस सन्द्रव में कुछ एक सा ही कहना है की एक वीर्य कोशिका बनने में लगभग 100 रक्त कोशिकाओं का छय होता है । सायद इसलिए वीर्यनाशी का चेहरा रक्त के कमी के कारण पिला पड़ा रहता है । आयुर्वेद की मानें तो केवल 15 मिलीलीटर वीर्य बनने में ही लगभग 40 दिनों का समय लग जाता है । और ये प्रक्रिया 7 चारणों में होती है इसलिए वीर्य को सातवाँ धातु भी कहा जाता है ।
जिस प्रकार एक अच्छी उपज के लिए अच्छे बीज का होना ज़रूरी है, उसी प्रकार स्वस्थ संतान के लिए शुद्ध और दोषरहित वीर्य का होना अनिवार्य है। वीर्य एक जैविक तरल पदार्थ है, जिसमें सामान्यतः शुक्राणु होते हैं। शुक्राशय ग्रंथि, पौरुष ग्रंथि तथा मूत्रप्रसेकीय ग्रंथियों से होने वाले स्राव का मिश्रण शुक्र यानि वीर्य है। वीर्य को ‘‘शुक्र‘‘ भी कहते हैं।
रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र....ये सात धातुएं शरीर को धारण करती हैं। ये क्रमशः पुष्ट होती हैं और हमारा आहार अंत में सातवीं धातु शुक्र के रूप में परिवर्तित होती है। सातों धातुओं के पुष्ट और सबल होने पर ही हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। इन सात धातुओं में सातवीं धातु शुक्र परम श्रेष्ठ होती है। शुद्ध और दोषरहित वीर्य गाढ़ा, चिकना, सफेद, मलाई जैसा मधुर, जलनरहित और कांच जैसा चिकना होता है। जबकि पतला, मैला, पीला, पतले दूध जैसा, बदबूदार, झागदार और पानी की तरह टपकने वाला वीर्य दूषित, कमज़ोर और विकारयुक्त होता है।
🔰दोषपूर्ण वीर्य के कारण
अत्यधिक मैथुन,शक्ति से अधिक श्रम,पोषक तत्वों की कमी,अप्राकृतिक तरीकों से वीर्यपात
प्रकृति विरुद्ध पदार्थों का सेवन,रोगग्रस्त व्यक्ति के साथ यौन संबंध
मिर्च-मसालेदार / खटाई / मादक पदार्थों का सेवन
चिंता/ शोक/ भय/मानसिक तनाव
गुप्त रोग /क्षय रोग /वृद्धावस्था
🔰कैसे बनाएं इसे बेहतर
ब्रह्मचर्य नींद और उत्तम आहार - ये तीन चीज़े शरीर की मूलभूत आवश्यकता होती है । अच्छा आहार अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। यदि आहार अच्छा नहीं है व पाचन प्रक्रिया सही नहीं है तो रक्त कम बनेगा और रक्त कम बनने से अन्य धातुओं के साथ वीर्य भी गुण व मात्रा के रूप में कम बनता है। इसके साथ ही किसी भी तरह का रोग वीर्य बनने की प्रक्रिया को बाधित कर देता है या शरीर में संक्रमण होने से वीर्य की गुणवत्ता पर्न प्रभाव रहता है।
वीर्य कम होने पर काम शक्ति और कामेच्छा भी कम हो जाती है। इसीलिए आयुर्वेद में विशेष आहार और औषधीय वनस्पतियां बताई गई हैं जिनका सेवन सम्पूर्ण स्वास्थ्य विशेष रूप से ओज व प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है।
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वास्तव में जब जब हमारे मन में काम उत्तेजना होती है तब तब हमारे शरीर को ये लगता है कि अब इस शरीर से प्रजनन होने वाली है या यूं कहे की एक नए इंसान की उत्तपत्ति होने वाली है । इसलिए शरीर वीर्य को बाहर निकालता है । तो वीर्य वास्तव में इसलिए बनता है ताकि उससे एक नए इंसान की उत्तपत्ति ( प्रजनन ) हो सके । इसके शुक्राणुओं में DNA होती है जिसके द्वारा पिता के शारीरिक गुण बच्चो में जाते है । इसमें विभिन प्रकार के प्रोटीन होती है जो वीर्य को बाकी कोशिकाओं से अलग बनाती है ।
वीर्य एक ऐसी कोशिकाओं का समूह है जो कहने को तो बाकी कोशिकाओं के तरह हर समय बनते बिगड़ते रहता है लेकिन वास्तव में इसे पुरी तरह से विकसित होने में लगभग 72 दिन लगता है । तब जाके ये प्रजनन प्रक्रिया के लिए उत्कृष्ट हो पाता है । वीर्य युही नही बनता क्योंकि हमारे शरीर की पहली प्राथमिकता प्रजनन है इसलिए शरीर द्वारा वीर्य की उत्तपत्ति करने में कोई लापरवाही नही बरती जाती । भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लंबी है । जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पांच दिन बाद रक्त से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, अस्थि, मज्जा और अंत में शुक्र बनता है। इस प्रकार आहार से शुक्र बनने में करीब एक महीना लग जाता है।
अलग अलग चिकित्सा शास्त्रों के इस सन्द्रव में कुछ एक सा ही कहना है की एक वीर्य कोशिका बनने में लगभग 100 रक्त कोशिकाओं का छय होता है । सायद इसलिए वीर्यनाशी का चेहरा रक्त के कमी के कारण पिला पड़ा रहता है । आयुर्वेद की मानें तो केवल 15 मिलीलीटर वीर्य बनने में ही लगभग 40 दिनों का समय लग जाता है । और ये प्रक्रिया 7 चारणों में होती है इसलिए वीर्य को सातवाँ धातु भी कहा जाता है ।
जिस प्रकार एक अच्छी उपज के लिए अच्छे बीज का होना ज़रूरी है, उसी प्रकार स्वस्थ संतान के लिए शुद्ध और दोषरहित वीर्य का होना अनिवार्य है। वीर्य एक जैविक तरल पदार्थ है, जिसमें सामान्यतः शुक्राणु होते हैं। शुक्राशय ग्रंथि, पौरुष ग्रंथि तथा मूत्रप्रसेकीय ग्रंथियों से होने वाले स्राव का मिश्रण शुक्र यानि वीर्य है। वीर्य को ‘‘शुक्र‘‘ भी कहते हैं।
रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र....ये सात धातुएं शरीर को धारण करती हैं। ये क्रमशः पुष्ट होती हैं और हमारा आहार अंत में सातवीं धातु शुक्र के रूप में परिवर्तित होती है। सातों धातुओं के पुष्ट और सबल होने पर ही हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। इन सात धातुओं में सातवीं धातु शुक्र परम श्रेष्ठ होती है। शुद्ध और दोषरहित वीर्य गाढ़ा, चिकना, सफेद, मलाई जैसा मधुर, जलनरहित और कांच जैसा चिकना होता है। जबकि पतला, मैला, पीला, पतले दूध जैसा, बदबूदार, झागदार और पानी की तरह टपकने वाला वीर्य दूषित, कमज़ोर और विकारयुक्त होता है।
🔰दोषपूर्ण वीर्य के कारण
अत्यधिक मैथुन,शक्ति से अधिक श्रम,पोषक तत्वों की कमी,अप्राकृतिक तरीकों से वीर्यपात
प्रकृति विरुद्ध पदार्थों का सेवन,रोगग्रस्त व्यक्ति के साथ यौन संबंध
मिर्च-मसालेदार / खटाई / मादक पदार्थों का सेवन
चिंता/ शोक/ भय/मानसिक तनाव
गुप्त रोग /क्षय रोग /वृद्धावस्था
🔰कैसे बनाएं इसे बेहतर
ब्रह्मचर्य नींद और उत्तम आहार - ये तीन चीज़े शरीर की मूलभूत आवश्यकता होती है । अच्छा आहार अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। यदि आहार अच्छा नहीं है व पाचन प्रक्रिया सही नहीं है तो रक्त कम बनेगा और रक्त कम बनने से अन्य धातुओं के साथ वीर्य भी गुण व मात्रा के रूप में कम बनता है। इसके साथ ही किसी भी तरह का रोग वीर्य बनने की प्रक्रिया को बाधित कर देता है या शरीर में संक्रमण होने से वीर्य की गुणवत्ता पर्न प्रभाव रहता है।
वीर्य कम होने पर काम शक्ति और कामेच्छा भी कम हो जाती है। इसीलिए आयुर्वेद में विशेष आहार और औषधीय वनस्पतियां बताई गई हैं जिनका सेवन सम्पूर्ण स्वास्थ्य विशेष रूप से ओज व प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है।
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