सब्बो झन आघू बढ़त हे
तय काबर पछुवाय हच रे भैय्या
कब तक तय इसहने रहिबे
काम घलो तय कब करबे ?
उमर निकल गे देखत देखत
दाई थक गे रद्दा ताकत ताकत
कब तय अपन नाव करबे रे भैय्या ?
कब तय परीक्षा पास करबे रे भैय्या ?
- देवेंद्र
(संगी हो जल्दी जल्दी पढ़व
जल्दी परीक्षा पास करव
अउ ए परीक्षा के तैयारी दलदल ले बाहर निकलव )
काबर कि एक अच्छा जीवन तोला अगोरत हे
अहु ला तोर इंतज़ार हे
नियति ल घलो मंजूर हे
तय कब सपना हकीकत करबे एला बता ?
आजेच ready हो ध्यान मंजिल म लगा
कइसे लगिस कमेंट करव 👇
तय काबर पछुवाय हच रे भैय्या
कब तक तय इसहने रहिबे
काम घलो तय कब करबे ?
उमर निकल गे देखत देखत
दाई थक गे रद्दा ताकत ताकत
कब तय अपन नाव करबे रे भैय्या ?
कब तय परीक्षा पास करबे रे भैय्या ?
- देवेंद्र
(संगी हो जल्दी जल्दी पढ़व
जल्दी परीक्षा पास करव
अउ ए परीक्षा के तैयारी दलदल ले बाहर निकलव )
काबर कि एक अच्छा जीवन तोला अगोरत हे
अहु ला तोर इंतज़ार हे
नियति ल घलो मंजूर हे
तय कब सपना हकीकत करबे एला बता ?
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छत्तीसगढ़ से सम्बंधित निबंध की शुरुआत इन पंक्तियों से कर सकते हैं
“कोई जो पूछे शौर्य का पर्याय,
तो तुम वीर नारायण-गुण्डाधुर की तलवार लिख देना
कोई जो पूछे समानता का पर्याय,
तो तुम गुरु घासीदास महान लिख देना
कोई जो पूछे राम-राम का पर्याय,
तो तुम छत्तीसगढ़ी में जय जोहार लिख देना, और
कोई जो पूछे चारों धाम का पर्याय
तो तुम मेरे छत्तीसगढ़ का नाम लिख देना”
@cgpscraceacademy
“कोई जो पूछे शौर्य का पर्याय,
तो तुम वीर नारायण-गुण्डाधुर की तलवार लिख देना
कोई जो पूछे समानता का पर्याय,
तो तुम गुरु घासीदास महान लिख देना
कोई जो पूछे राम-राम का पर्याय,
तो तुम छत्तीसगढ़ी में जय जोहार लिख देना, और
कोई जो पूछे चारों धाम का पर्याय
तो तुम मेरे छत्तीसगढ़ का नाम लिख देना”
@cgpscraceacademy
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ये मंजिल का रास्ता है.....
थक जाओ सो जाना लेकिन ज़ब उठना
तो फिर से उस रास्ते पर निकल जाना 🔥
ये रास्ता मंज़िल की ओर जाता है
अगर भटकेगा
तो रास्ता लम्बा हो जाएगा 🎯
जो एग्जाम 1 साल की तैयारी मे पास हो सकता था उसमे 5 साल लग जायेगा 👎
और फिर भी नहीं सुधरा तो इससे ज्यादा साल भी लग जाएगा 👎
वक़्त अभी भी हैं सम्हल जा
मंजिल की ओर देख 🥳
और उसी ओर निकल जा 🤗
वही पुस्तके हैं वही बेसिक चीजे हैं तैयारी का तरीका भी वही हैं चाहे दुनिया कितनी भी आधुनिक और तकनीक से लैस हो जाए
वही लिख के नोट्स बनाना हैं
वही बोल बोल के याद करना हैं
हां प्रतिस्पर्धा बढ़ी हैं कंटेंट किताबें ज्यादा हैं लेकिन मानव बुद्धि को आज तक कौन Replace कर पाया हैं ??
सीखने का तरीका आज भी वही हैं इंसान की बुद्धि आज भी वैसे ही काम करती हैं
हां लेकिन आज का इंसान भटका हुआ ज्यादा हैं बस अंतर इतना है 😊
- देवेंद्र 🙏
@cgpscraceacademy
थक जाओ सो जाना लेकिन ज़ब उठना
तो फिर से उस रास्ते पर निकल जाना 🔥
ये रास्ता मंज़िल की ओर जाता है
अगर भटकेगा
तो रास्ता लम्बा हो जाएगा 🎯
जो एग्जाम 1 साल की तैयारी मे पास हो सकता था उसमे 5 साल लग जायेगा 👎
और फिर भी नहीं सुधरा तो इससे ज्यादा साल भी लग जाएगा 👎
वक़्त अभी भी हैं सम्हल जा
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और उसी ओर निकल जा 🤗
वही पुस्तके हैं वही बेसिक चीजे हैं तैयारी का तरीका भी वही हैं चाहे दुनिया कितनी भी आधुनिक और तकनीक से लैस हो जाए
वही लिख के नोट्स बनाना हैं
वही बोल बोल के याद करना हैं
हां प्रतिस्पर्धा बढ़ी हैं कंटेंट किताबें ज्यादा हैं लेकिन मानव बुद्धि को आज तक कौन Replace कर पाया हैं ??
सीखने का तरीका आज भी वही हैं इंसान की बुद्धि आज भी वैसे ही काम करती हैं
हां लेकिन आज का इंसान भटका हुआ ज्यादा हैं बस अंतर इतना है 😊
- देवेंद्र 🙏
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आप इस साल 2025 के बारे से क्या सोचते है क्या आप इस साल अपनी ज़िंदगी बदल लेंगे ? क्या इस साल तैयारी के कुचक्र से आजाद हो सकेंगे
Anonymous Poll
75%
हा इसके लिए मैं समर्पित हो लगा हुआ हूं कि इस साल मुझे जॉब लेना है
21%
करना तो चाहता हु लेकिन उतना कुछ खास तैयारी नही
4%
क्या पता , इतना आत्म विश्वास नही कि मैं कुछ ऐसा सोच पाऊ
👍4
प्राचीन भारत में आए चीनी पर्यटकों (यात्रियों) ने भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म और शिक्षा प्रणाली के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इन यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत आज भी ऐतिहासिक स्रोत के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। प्रमुख चीनी यात्रियों में फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नीचे इन यात्रियों के भारत आगमन, उद्देश्य, यात्राओं और उनके योगदान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है:
1. फाह्यान (Fa-Hien या Faxian) – 5वीं शताब्दी ईस्वी
काल: 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत यात्रा की
राजा का काल: गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का शासनकाल
उद्देश्य: बौद्ध धर्मग्रंथों को इकट्ठा करना और बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: गांधार, मथुरा, कन्नौज, कपिलवस्तु, कुशीनगर, पाटलिपुत्र, वाराणसी, नालंदा, गया आदि
मुख्य विशेषताएँ:
फाह्यान ने पाटलिपुत्र में एक सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था देखी।
उन्होंने लिखा कि भारत में लोग अहिंसक और धार्मिक थे, और चोरी तथा हत्या जैसे अपराध बहुत कम होते थे।
उन्होंने वर्ण व्यवस्था का भी उल्लेख किया है और ‘चांडालों’ की स्थिति को अत्यंत दयनीय बताया।
उन्होंने बौद्ध धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों – हीनयान और महायान – का उल्लेख किया।
ग्रंथ: 'फो-गुओ-जी' (Fo-Kuo-Ki) यानी 'बौद्ध देशों की यात्रा'।
2. ह्वेनसांग (Xuanzang) – 7वीं शताब्दी ईस्वी
काल: 630 ईस्वी से 645 ईस्वी तक भारत यात्रा
राजा का काल: सम्राट हर्षवर्धन (हर्ष)
उद्देश्य: बौद्ध धर्म का अध्ययन और तक्षशिला, नालंदा आदि विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: लाहौर, मथुरा, कन्नौज, प्रयाग, नालंदा, वाराणसी, कुशीनगर, बोधगया, श्रावस्ती आदि
मुख्य विशेषताएँ:
ह्वेनसांग ने भारत की शिक्षा प्रणाली, नालंदा विश्वविद्यालय और विभिन्न बौद्ध मठों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने हर्षवर्धन के शासन की प्रशंसा की – शांति, न्याय, धर्म और प्रशासनिक कुशलता को सराहा।
ह्वेनसांग ने हिन्दू और बौद्ध धर्म के सहअस्तित्व का वर्णन किया।
उन्होंने भारत में समाजिक व्यवस्था, भोजन, रहन-सहन, धार्मिक रीतियों का उल्लेख किया।
ग्रंथ: 'सी-यू-की' (Si-Yu-Ki) यानी 'पश्चिमी देशों की यात्रा'।
3. इत्सिंग (I-tsing या Yijing) – 7वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में
काल: 671 ईस्वी से 695 ईस्वी तक भारत में प्रवास
उद्देश्य: बौद्ध धर्म का अध्ययन और ग्रंथों का अनुवाद करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: समुद्री मार्ग से वह श्रीविजय (सुमात्रा) होते हुए नालंदा पहुँचे
मुख्य विशेषताएँ:
इत्सिंग ने बौद्ध भिक्षुओं की दिनचर्या, शिक्षा पद्धति और धार्मिक परंपराओं को विस्तार से लिखा।
उन्होंने यह भी लिखा कि नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा अत्यंत संगठित थी और वहाँ छात्र अनुशासन का पालन करते थे।
👉निष्कर्ष:
प्राचीन भारत में आए इन चीनी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत से हमें उस समय के:
धार्मिक परिवेश,
शिक्षा संस्थान (विशेष रूप से नालंदा),
समाज व्यवस्था,
प्रशासनिक प्रणाली,
सांस्कृतिक जीवन और
भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इन यात्राओं ने भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी मजबूत किया।
काल: 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत यात्रा की
राजा का काल: गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का शासनकाल
उद्देश्य: बौद्ध धर्मग्रंथों को इकट्ठा करना और बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: गांधार, मथुरा, कन्नौज, कपिलवस्तु, कुशीनगर, पाटलिपुत्र, वाराणसी, नालंदा, गया आदि
मुख्य विशेषताएँ:
फाह्यान ने पाटलिपुत्र में एक सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था देखी।
उन्होंने लिखा कि भारत में लोग अहिंसक और धार्मिक थे, और चोरी तथा हत्या जैसे अपराध बहुत कम होते थे।
उन्होंने वर्ण व्यवस्था का भी उल्लेख किया है और ‘चांडालों’ की स्थिति को अत्यंत दयनीय बताया।
उन्होंने बौद्ध धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों – हीनयान और महायान – का उल्लेख किया।
ग्रंथ: 'फो-गुओ-जी' (Fo-Kuo-Ki) यानी 'बौद्ध देशों की यात्रा'।
2. ह्वेनसांग (Xuanzang) – 7वीं शताब्दी ईस्वी
काल: 630 ईस्वी से 645 ईस्वी तक भारत यात्रा
राजा का काल: सम्राट हर्षवर्धन (हर्ष)
उद्देश्य: बौद्ध धर्म का अध्ययन और तक्षशिला, नालंदा आदि विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: लाहौर, मथुरा, कन्नौज, प्रयाग, नालंदा, वाराणसी, कुशीनगर, बोधगया, श्रावस्ती आदि
मुख्य विशेषताएँ:
ह्वेनसांग ने भारत की शिक्षा प्रणाली, नालंदा विश्वविद्यालय और विभिन्न बौद्ध मठों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने हर्षवर्धन के शासन की प्रशंसा की – शांति, न्याय, धर्म और प्रशासनिक कुशलता को सराहा।
ह्वेनसांग ने हिन्दू और बौद्ध धर्म के सहअस्तित्व का वर्णन किया।
उन्होंने भारत में समाजिक व्यवस्था, भोजन, रहन-सहन, धार्मिक रीतियों का उल्लेख किया।
ग्रंथ: 'सी-यू-की' (Si-Yu-Ki) यानी 'पश्चिमी देशों की यात्रा'।
3. इत्सिंग (I-tsing या Yijing) – 7वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में
काल: 671 ईस्वी से 695 ईस्वी तक भारत में प्रवास
उद्देश्य: बौद्ध धर्म का अध्ययन और ग्रंथों का अनुवाद करना
भारत यात्रा का क्षेत्र: समुद्री मार्ग से वह श्रीविजय (सुमात्रा) होते हुए नालंदा पहुँचे
मुख्य विशेषताएँ:
इत्सिंग ने बौद्ध भिक्षुओं की दिनचर्या, शिक्षा पद्धति और धार्मिक परंपराओं को विस्तार से लिखा।
उन्होंने यह भी लिखा कि नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा अत्यंत संगठित थी और वहाँ छात्र अनुशासन का पालन करते थे।
👉निष्कर्ष:
प्राचीन भारत में आए इन चीनी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत से हमें उस समय के:
धार्मिक परिवेश,
शिक्षा संस्थान (विशेष रूप से नालंदा),
समाज व्यवस्था,
प्रशासनिक प्रणाली,
सांस्कृतिक जीवन और
भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इन यात्राओं ने भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी मजबूत किया।
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