*प्रभु श्रीराम जी के अवतरण(प्राक्टय) दिवस के पर्व राम नवमी की सभी को हार्दिक बधाई,,!!*
*जय राम रमा शमनम्,,*
*भव ताप भयाकुल पांहीजनम्,,*
*अवधेश सुरेश मंहेश विभो,,*
*शरणागत मांगत पांही प्रभो,,*
*गुन शील कृपापरमा यतनम्,,*
*प्रणमामी सदा श्री रमनम्,,!!*
*══❀(("ॐ"))❀══*
*प्रभु श्री राम आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें और सभी के जीवन को खुशहाल करे,,!!*
*जय श्री राम*
*जय राम रमा शमनम्,,*
*भव ताप भयाकुल पांहीजनम्,,*
*अवधेश सुरेश मंहेश विभो,,*
*शरणागत मांगत पांही प्रभो,,*
*गुन शील कृपापरमा यतनम्,,*
*प्रणमामी सदा श्री रमनम्,,!!*
*══❀(("ॐ"))❀══*
*प्रभु श्री राम आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें और सभी के जीवन को खुशहाल करे,,!!*
*जय श्री राम*
❤6
रक्तदंतिका मंदिर
51 शक्तिपीठों में रक्तदंतिका का नाम भी शामिल है. यह जालौन के जिला मुख्यालय उरई से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सैदनगर के स्फटिक पहाड़ों के बीच में स्थित है, जिसके नीचे से बेतवा नदी बहती है.
रक्तदंतिका मंदिर जोकि
जालौन के सैदनगर में स्फटिक पहाड़ों पर स्थित है
मंदिर नौ दिन तक चलने वाले नवरात्रि में देवी मां के मंदिरों की महत्वता बढ़ जाती है. भक्तों द्वारा सिद्ध पीठ मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना की जाती है, जिससे उनकी मनोकामना पूरी हो सके. जालौन में भी बेतवा नदी किनारे पहाड़ों पर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जिसको लेकर मान्यता है कि ये मंदिर पृथ्वी के आरंभ में स्थापित हुआ था. यहां पर मां सती के दांत गिरने से इस स्थान को रक्तदंतिका के मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर सैदनगर में स्थित है, इसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती के श्लोकों में भी किया गया है.
मंदिर की खास विशेषता यह है कि जो भी भक्त अपने सच्चे मन से मनोकामना लेकर मंदिर आता है, उसकी इच्छा पूरी हो जाती है. इस मंदिर की खास बात यह रही है कि कोई भी भक्त साधक मंदिर में रात नहीं गुजार पाता था. इस मंदिर के गर्भ गृह में दो दंत शिलाएं स्थापित हैं, मान्यता है कि रक्त शिलाओं पर पानी डालने से उनसे रक्त निकलने लगता है.
जालौन के सैदनगर में स्फटिक पहाड़ों पर स्थित है मंदिर
51 शक्तिपीठों में रक्तदंतिका का नाम भी शामिल है. यह जालौन के जिला मुख्यालय उरई से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सैदनगर के स्फटिक पहाड़ों के बीच में स्थित है, जिसके नीचे से बेतवा नदी बहती है. सैदनगर के शक्ति पीठ रक्तदंतिक का वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के दो श्लोकों में मिलता है.
पहाड़ पर विराजमान देवी रक्तदंतिका का यह मंदिर सदियों पुराना है, यह शक्तिपीठ तंत्र मंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था, यहां पर बलि भी दी जाती थी. यहां कोई भी साधक रात में मंदिर परिसर में नहीं रुक सकता था, बताते है जो भी इस मंदिर परिसर में रुका उसके साथ कोई न कोई अनहोनी जरूर हुई.
लंका महाराज की तपस्या के बाद रुकने शुरू हुए भक्त
मंदिर के बारे में पुजारी श्री श्री 1008 भगवान दास जी फलाहारी और सैदनगर गांव के रहने वाले ग्रामीण राहुल मिश्रा, शैलेंद्र पटेरिया, पंकज द्विवेदी भुआ ने बताया कि पहले इस मंदिर में कोई भी साधक रुक नहीं पता था, लेकिन कई वर्षों पहले यहां एक साधु सन्यासी लंका महाराज आकर रुके, जिन्हें कई लोगों ने इस स्थान पर रुकने से मना किया. मगर उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया और न ही किसी से कुछ बोले और यहां रहकर अपनी साधना करने में लगे रहे, जिसके बाद ऐसा चमत्कार हुआ कि उसकी साधना के बाद नवरात्र के दिनों में कुछ साधक देवी भक्त मंदिर में रुकने लगे और आज मंदिर में दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं. वो यहां बने आश्रय स्थल में रुकते भी हैं.
सृष्टि के आरंभ का बताया जाता है मंदिर
इस मंदिर को सृष्टि के आरंभ का बताया जाता है, मंदिर के बारे में मान्यता है कि जब मां सती के पिता राजा दक्ष ने भगवान शंकर का अपमान किया था, उसी आवेश में आकर उन्होंने उसी हवन कुंड में अपनी आहुति दे दी थी. तब भगवान शंकर ने सती के शरीर को अपने कंधों पर ले जाकर तांडव किया था. भगवान शिव के क्रोध को देखते हुए सभी देवी देवता घबराए हुए थे. तब भगवान विष्णु ने मां सती के शरीर को टुकड़ों में विभाजित कर दिया था, जिसमें उनके दांत बेतवा नदी किनारे स्थित इस स्फटिक पहाड़ पर गिरे थे और यहां पर मां रक्तदंतिका की उत्पत्ति हुई थी.
आज भी मां रक्तदातिंका के दातों की दो शिलाएं स्थापित हैं, यह शिलाएं रक्तिम हैं. शिलाओं के बारे में मान्यता है कि अगर शिलाओं को पानी से धो दिया जाए तो कुछ ही देर में यह शिलाएं फिर से रक्तिम हो जाएंगी. इन शिलाओं के बीच में दुर्गा मां की प्रतिमा की स्थापना कर दी गई है. वास्तिवक पूजा दंत शिलाओं की ही होती है. देवी रक्तदंतिका स्फटिक के पहाड़ पर विराजमान हैं. यह शक्तिपीठ तंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था, फिलहाल अब इस पर रोक लगा दी गई है.
चढ़ाई जाती थी बलि, मगर लगा दी रोक
मां रक्तदंतिका शक्ति पीठ पर बलि चढ़ाने का प्रचलन था, जहां पर भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती थी, भक्त यहां पर बलि चढ़ाते थे, मगर समय के साथ इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. मां रक्तदंतिका शक्ति पीठ पर दोनों नवरात्र पर विशाल मेला लगता है, यहां पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, बिहार से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, कई श्रद्धालु ऐसे हैं, जो हर माह देवी मां के दर्शन करने के लिए दूर-दराज के इलाकों से मंदिर आते हैं और यहां पर रात रुककर भंडारे का आयोजन करते हैं.
51 शक्तिपीठों में रक्तदंतिका का नाम भी शामिल है. यह जालौन के जिला मुख्यालय उरई से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सैदनगर के स्फटिक पहाड़ों के बीच में स्थित है, जिसके नीचे से बेतवा नदी बहती है.
रक्तदंतिका मंदिर जोकि
जालौन के सैदनगर में स्फटिक पहाड़ों पर स्थित है
मंदिर नौ दिन तक चलने वाले नवरात्रि में देवी मां के मंदिरों की महत्वता बढ़ जाती है. भक्तों द्वारा सिद्ध पीठ मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना की जाती है, जिससे उनकी मनोकामना पूरी हो सके. जालौन में भी बेतवा नदी किनारे पहाड़ों पर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जिसको लेकर मान्यता है कि ये मंदिर पृथ्वी के आरंभ में स्थापित हुआ था. यहां पर मां सती के दांत गिरने से इस स्थान को रक्तदंतिका के मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर सैदनगर में स्थित है, इसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती के श्लोकों में भी किया गया है.
मंदिर की खास विशेषता यह है कि जो भी भक्त अपने सच्चे मन से मनोकामना लेकर मंदिर आता है, उसकी इच्छा पूरी हो जाती है. इस मंदिर की खास बात यह रही है कि कोई भी भक्त साधक मंदिर में रात नहीं गुजार पाता था. इस मंदिर के गर्भ गृह में दो दंत शिलाएं स्थापित हैं, मान्यता है कि रक्त शिलाओं पर पानी डालने से उनसे रक्त निकलने लगता है.
जालौन के सैदनगर में स्फटिक पहाड़ों पर स्थित है मंदिर
51 शक्तिपीठों में रक्तदंतिका का नाम भी शामिल है. यह जालौन के जिला मुख्यालय उरई से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सैदनगर के स्फटिक पहाड़ों के बीच में स्थित है, जिसके नीचे से बेतवा नदी बहती है. सैदनगर के शक्ति पीठ रक्तदंतिक का वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के दो श्लोकों में मिलता है.
पहाड़ पर विराजमान देवी रक्तदंतिका का यह मंदिर सदियों पुराना है, यह शक्तिपीठ तंत्र मंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था, यहां पर बलि भी दी जाती थी. यहां कोई भी साधक रात में मंदिर परिसर में नहीं रुक सकता था, बताते है जो भी इस मंदिर परिसर में रुका उसके साथ कोई न कोई अनहोनी जरूर हुई.
लंका महाराज की तपस्या के बाद रुकने शुरू हुए भक्त
मंदिर के बारे में पुजारी श्री श्री 1008 भगवान दास जी फलाहारी और सैदनगर गांव के रहने वाले ग्रामीण राहुल मिश्रा, शैलेंद्र पटेरिया, पंकज द्विवेदी भुआ ने बताया कि पहले इस मंदिर में कोई भी साधक रुक नहीं पता था, लेकिन कई वर्षों पहले यहां एक साधु सन्यासी लंका महाराज आकर रुके, जिन्हें कई लोगों ने इस स्थान पर रुकने से मना किया. मगर उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया और न ही किसी से कुछ बोले और यहां रहकर अपनी साधना करने में लगे रहे, जिसके बाद ऐसा चमत्कार हुआ कि उसकी साधना के बाद नवरात्र के दिनों में कुछ साधक देवी भक्त मंदिर में रुकने लगे और आज मंदिर में दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं. वो यहां बने आश्रय स्थल में रुकते भी हैं.
सृष्टि के आरंभ का बताया जाता है मंदिर
इस मंदिर को सृष्टि के आरंभ का बताया जाता है, मंदिर के बारे में मान्यता है कि जब मां सती के पिता राजा दक्ष ने भगवान शंकर का अपमान किया था, उसी आवेश में आकर उन्होंने उसी हवन कुंड में अपनी आहुति दे दी थी. तब भगवान शंकर ने सती के शरीर को अपने कंधों पर ले जाकर तांडव किया था. भगवान शिव के क्रोध को देखते हुए सभी देवी देवता घबराए हुए थे. तब भगवान विष्णु ने मां सती के शरीर को टुकड़ों में विभाजित कर दिया था, जिसमें उनके दांत बेतवा नदी किनारे स्थित इस स्फटिक पहाड़ पर गिरे थे और यहां पर मां रक्तदंतिका की उत्पत्ति हुई थी.
आज भी मां रक्तदातिंका के दातों की दो शिलाएं स्थापित हैं, यह शिलाएं रक्तिम हैं. शिलाओं के बारे में मान्यता है कि अगर शिलाओं को पानी से धो दिया जाए तो कुछ ही देर में यह शिलाएं फिर से रक्तिम हो जाएंगी. इन शिलाओं के बीच में दुर्गा मां की प्रतिमा की स्थापना कर दी गई है. वास्तिवक पूजा दंत शिलाओं की ही होती है. देवी रक्तदंतिका स्फटिक के पहाड़ पर विराजमान हैं. यह शक्तिपीठ तंत्र साधना का केंद्र हुआ करता था, फिलहाल अब इस पर रोक लगा दी गई है.
चढ़ाई जाती थी बलि, मगर लगा दी रोक
मां रक्तदंतिका शक्ति पीठ पर बलि चढ़ाने का प्रचलन था, जहां पर भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती थी, भक्त यहां पर बलि चढ़ाते थे, मगर समय के साथ इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. मां रक्तदंतिका शक्ति पीठ पर दोनों नवरात्र पर विशाल मेला लगता है, यहां पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, बिहार से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, कई श्रद्धालु ऐसे हैं, जो हर माह देवी मां के दर्शन करने के लिए दूर-दराज के इलाकों से मंदिर आते हैं और यहां पर रात रुककर भंडारे का आयोजन करते हैं.
👍7
*जीवन में जो कुछ भी मिले उसे खुशी से स्वीकार कीजिए,*
*अगर आप खुश नहीं भी होंगे तो भी वो तो मिलेगा ही*
* * * *कोई हमारी गलतियां निकालता है तो हमें खुश होना चाहिए...क्योंकि...कोई तो है जो हमें पूर्ण पवित्र बनाने के लिए अपना दिमाग़ और समय दे रहा है......*
* * * *संतुष्ट जीवन सफल जीवन से सदैव श्रेष्ठ होता है...क्योंकि...सफलता सदैव दूसरों के द्वारा..आंकलित होती है..जबकि..संतुष्टि स्वयं के मन और मस्तिष्क द्वारा......*
*बहुत तेज दिमाग चाहिए अपनी गलतियां निकालने के लिए ,लेकिन एक सुंदर मन होना चाहिए अपनी गलतियां स्वीकार करने के लिए......*
*जीवन में ऊंचा उठने के लिए निन्दा की जरूरत होती है क्योंकि इसी की मदद से हम अपनी गलतियों को समझ पाते हैं।
*जो इंसान अपनी निन्दा सुन लेने के बाद भी शान्त रहता है, वह सारे संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है.....*
* 🍀 *शुभ प्रभात* 🍀
*आपका दिन मंगलमय हो*
👏*Good Morning*
🌹 Jai Shri Krishna🌹
*अगर आप खुश नहीं भी होंगे तो भी वो तो मिलेगा ही*
* * * *कोई हमारी गलतियां निकालता है तो हमें खुश होना चाहिए...क्योंकि...कोई तो है जो हमें पूर्ण पवित्र बनाने के लिए अपना दिमाग़ और समय दे रहा है......*
* * * *संतुष्ट जीवन सफल जीवन से सदैव श्रेष्ठ होता है...क्योंकि...सफलता सदैव दूसरों के द्वारा..आंकलित होती है..जबकि..संतुष्टि स्वयं के मन और मस्तिष्क द्वारा......*
*बहुत तेज दिमाग चाहिए अपनी गलतियां निकालने के लिए ,लेकिन एक सुंदर मन होना चाहिए अपनी गलतियां स्वीकार करने के लिए......*
*जीवन में ऊंचा उठने के लिए निन्दा की जरूरत होती है क्योंकि इसी की मदद से हम अपनी गलतियों को समझ पाते हैं।
*जो इंसान अपनी निन्दा सुन लेने के बाद भी शान्त रहता है, वह सारे संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है.....*
* 🍀 *शुभ प्रभात* 🍀
*आपका दिन मंगलमय हो*
👏*Good Morning*
🌹 Jai Shri Krishna🌹
👍6❤1
#भुवनश्वरी_रहस्यम्
यह अनाहत चक्र की देवी है कथा है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति महेश्वरी क्रोध रात्रि के नाम से उत्पन्न हुई इसकी योनि में संपूर्ण विश्व में विद्यमान था पर ले कार में यह विश्व इसी योनि में समाहित हो जाता है इसी देवी के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है इसके मंत्र भी अलग अलग है यह सृष्टि के मध्य योनि है इसमें योनि के मध्य के केंद्र बिंदु पर चतुर्भुज स्वरूप से विष्णु का निवास है हम इसे अर्धनारीश्वर या शिव भी कह सकते हैं इसी लोनीकंद में ब्रह्मांड प्रकृति विकसित हुई है अतः सारे जगत का बीज इसी योनि में ही समाहित है।
भुवनेश्वरी देवी पाश लज्जा और अंकुश बीजों से बना हुआ इस देवी के मंत्र तीन अक्षरों वाला है इस मंत्र की महिमा का वर्णन कर पाना देवताओं के लिए भी संभव नहीं है संदूरी आभा से रक्तिम विग्रह वाली यह देवी तीन नेत्रों से युक्त है इसके मस्तिष्क पर अर्धचंद्र है और यह चंद्रमुखी सदा मुस्कुराती रहती है बड़े बड़े स्तनों और नितंबों वाली है देवी समस्त अलंकारों से अलंकृत है मणि एवं रत्नों से सुसज्जित वस्त्रों को धारण किए हुए हैं यह रत्न जड़ित कुंभ के ऊपर बाएं पैर को रखे हुए हैं हाथों में रतंजलि पांनपात्र लाल कमल लिए हुए हैं।
सा जगदीश की सिद्धि को प्राप्त करके साधक संपूर्ण चराचर जगत के बारे में सभी कुछ जान जाता है वह अतीत और भविष्य को भी जान लेता है और वर्तमान की वास्तविक अर्थों में प्रत्यक्ष करता है सूर्य के समान तेजस्वी इस व्यक्ति के दर्शन मात्र से ही पिशाच यक्ष राक्षस और दसों दिशाओं में पलायन कर जाते हैं साधक जिस जिस स्त्री की कामना करता है उसे आकृष्ट करके अपने पास बुला लेता है यदि यह राजा की पत्नी या प्रिया भी हो तो वह शीघ्र ही साधक के पास आ जाती है।
गृह ,नगर ,ग्राम, पर्वत, नदी संगम , उपवन ,तीर्थ, महापीठ, सागर, सिद्धवृक्ष की जड़ के पास कुवृक्ष के मूल में श्मशान गुहाप्रदेश गुफा मातृग्रह पुण्य क्षेत्र अथवा महानंदी के स्थल पर अथवा हिमालय या घर में मंत्र की सिद्धि के लिए यथास्थान बैठकर कुर्मचक्र में सिद्धिप्रद दीपन स्थान सुनिश्चित करें और वहां बैठकर साधना कर्म करें इसमें दीप नामक क्षेत्रपाल अवस्थित होते हैं साधक इसी स्थान पर बैठे इस स्थान पर बैठकर निर्भय होकर साधक को तीन लाख मंत्रों का जाप करना चाहिए जब समाप्त होने पर दशांश आहुति देने से देवी संतुष्ट होकर सिद्धि देती है।
रविवार के दिन मधु दूध और शालि चावल से पिष्टी बनाकर बारह अंगुल का लंबी पुतली का निर्माण करके उसका भुनेश्वरी मंत्रों के द्वारा देवीरुप प्रतिष्ठा करके उसे हाथ में लेकर एक सौ आठ मंत्र से सिद्ध करके मंत्र जप करते हुए दाहिने पैर के अंगूठे से प्रारंभ कर के बाएं पैर के अंगूठे तक खा जाने से वह व्यक्ति समस्त निधियों सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
यह प्रयोग अभी पूर्ण प्रचलन में है शालि चावल लाल चावल को कहते हैं जो गर्म में ही फलता है और वही पक जाता है बिहार बंगाल में से गम्भरी कहा जाता है बहुत से शालि चावल का अर्थ शमा से लेते हैं यह घास होती है इसकी खेती बहुत ही कम की जाती है पहले चक्र बनाया जाता है कर्णिका में तांबे की प्लेट के मध्य में स्थापित शालि पिष्टि की पिंडी को रखकर उसकी पूजा करके देवी का ध्यान लगाकर रविवार मंगलवार से प्रारंभ करके बुधवार तक रात भर जप किया जाता है
जप में पिंडी में सजीव छवि की कल्पना करके सजीव समझकर उसे उसमें उन्हें देखा जाता है बृहस्पति की रात को भैरवी के साथ पूजा अर्चना करके सूर्य से संबंधित फल मधु गुड खीर पूरी आदि से हवन के बाद अर्पण किया जाता है अवैध सामग्री ही हवन में प्रयुक्त की जाती है सुमीदा आंक और चिड़चिड़ी की होती है वही फिर वही प्रसाद पाकर भैरवी की पूजा की जाती है और भैरवी साधक को पिष्टी खिलाती है।
शरीर धर्म को साधने का सबसे पहला साधन है यह सुत्र अपने आप मे अति महत्वपुर्ण है लेकिन इस परम वचन को बिना उसका मर्म समझे उन लोगो ने अपना लिया है जो केवल शरीर को महत्व देते है शरीर कोस्वस्थ और मजबुत बनाने के प्रयास मे रहते है जो कसरत करते व्यायाम करते है और करते है पहलवानी धर्म साधना के प्रथम चरण की तरह नही
ध्यान व योग के प्रचलित रूप भी शरीर की उपेक्षा करना सिखाते है अष्टांग योग केवल आसन और प्राणायाम की कुछ क्रियाओं मे ही सिमट कर रह गया है योगासनों का उपयोग लोग स्वास्थ्य का लाभ के लिये ही करते है देह के रहस्य को जानने समझने के लिए नही वेशरीर मन का गुलाम बनाकर प्रसन्न होते है उनके लिये योग का अर्थ है इन्द्रियो का दमन कर शरीर को अपने वश मे करना योग का लोकप्रिय रूप त्याग पर आधारित है योग पर नही
यह अनाहत चक्र की देवी है कथा है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति महेश्वरी क्रोध रात्रि के नाम से उत्पन्न हुई इसकी योनि में संपूर्ण विश्व में विद्यमान था पर ले कार में यह विश्व इसी योनि में समाहित हो जाता है इसी देवी के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है इसके मंत्र भी अलग अलग है यह सृष्टि के मध्य योनि है इसमें योनि के मध्य के केंद्र बिंदु पर चतुर्भुज स्वरूप से विष्णु का निवास है हम इसे अर्धनारीश्वर या शिव भी कह सकते हैं इसी लोनीकंद में ब्रह्मांड प्रकृति विकसित हुई है अतः सारे जगत का बीज इसी योनि में ही समाहित है।
भुवनेश्वरी देवी पाश लज्जा और अंकुश बीजों से बना हुआ इस देवी के मंत्र तीन अक्षरों वाला है इस मंत्र की महिमा का वर्णन कर पाना देवताओं के लिए भी संभव नहीं है संदूरी आभा से रक्तिम विग्रह वाली यह देवी तीन नेत्रों से युक्त है इसके मस्तिष्क पर अर्धचंद्र है और यह चंद्रमुखी सदा मुस्कुराती रहती है बड़े बड़े स्तनों और नितंबों वाली है देवी समस्त अलंकारों से अलंकृत है मणि एवं रत्नों से सुसज्जित वस्त्रों को धारण किए हुए हैं यह रत्न जड़ित कुंभ के ऊपर बाएं पैर को रखे हुए हैं हाथों में रतंजलि पांनपात्र लाल कमल लिए हुए हैं।
सा जगदीश की सिद्धि को प्राप्त करके साधक संपूर्ण चराचर जगत के बारे में सभी कुछ जान जाता है वह अतीत और भविष्य को भी जान लेता है और वर्तमान की वास्तविक अर्थों में प्रत्यक्ष करता है सूर्य के समान तेजस्वी इस व्यक्ति के दर्शन मात्र से ही पिशाच यक्ष राक्षस और दसों दिशाओं में पलायन कर जाते हैं साधक जिस जिस स्त्री की कामना करता है उसे आकृष्ट करके अपने पास बुला लेता है यदि यह राजा की पत्नी या प्रिया भी हो तो वह शीघ्र ही साधक के पास आ जाती है।
गृह ,नगर ,ग्राम, पर्वत, नदी संगम , उपवन ,तीर्थ, महापीठ, सागर, सिद्धवृक्ष की जड़ के पास कुवृक्ष के मूल में श्मशान गुहाप्रदेश गुफा मातृग्रह पुण्य क्षेत्र अथवा महानंदी के स्थल पर अथवा हिमालय या घर में मंत्र की सिद्धि के लिए यथास्थान बैठकर कुर्मचक्र में सिद्धिप्रद दीपन स्थान सुनिश्चित करें और वहां बैठकर साधना कर्म करें इसमें दीप नामक क्षेत्रपाल अवस्थित होते हैं साधक इसी स्थान पर बैठे इस स्थान पर बैठकर निर्भय होकर साधक को तीन लाख मंत्रों का जाप करना चाहिए जब समाप्त होने पर दशांश आहुति देने से देवी संतुष्ट होकर सिद्धि देती है।
रविवार के दिन मधु दूध और शालि चावल से पिष्टी बनाकर बारह अंगुल का लंबी पुतली का निर्माण करके उसका भुनेश्वरी मंत्रों के द्वारा देवीरुप प्रतिष्ठा करके उसे हाथ में लेकर एक सौ आठ मंत्र से सिद्ध करके मंत्र जप करते हुए दाहिने पैर के अंगूठे से प्रारंभ कर के बाएं पैर के अंगूठे तक खा जाने से वह व्यक्ति समस्त निधियों सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
यह प्रयोग अभी पूर्ण प्रचलन में है शालि चावल लाल चावल को कहते हैं जो गर्म में ही फलता है और वही पक जाता है बिहार बंगाल में से गम्भरी कहा जाता है बहुत से शालि चावल का अर्थ शमा से लेते हैं यह घास होती है इसकी खेती बहुत ही कम की जाती है पहले चक्र बनाया जाता है कर्णिका में तांबे की प्लेट के मध्य में स्थापित शालि पिष्टि की पिंडी को रखकर उसकी पूजा करके देवी का ध्यान लगाकर रविवार मंगलवार से प्रारंभ करके बुधवार तक रात भर जप किया जाता है
जप में पिंडी में सजीव छवि की कल्पना करके सजीव समझकर उसे उसमें उन्हें देखा जाता है बृहस्पति की रात को भैरवी के साथ पूजा अर्चना करके सूर्य से संबंधित फल मधु गुड खीर पूरी आदि से हवन के बाद अर्पण किया जाता है अवैध सामग्री ही हवन में प्रयुक्त की जाती है सुमीदा आंक और चिड़चिड़ी की होती है वही फिर वही प्रसाद पाकर भैरवी की पूजा की जाती है और भैरवी साधक को पिष्टी खिलाती है।
शरीर धर्म को साधने का सबसे पहला साधन है यह सुत्र अपने आप मे अति महत्वपुर्ण है लेकिन इस परम वचन को बिना उसका मर्म समझे उन लोगो ने अपना लिया है जो केवल शरीर को महत्व देते है शरीर कोस्वस्थ और मजबुत बनाने के प्रयास मे रहते है जो कसरत करते व्यायाम करते है और करते है पहलवानी धर्म साधना के प्रथम चरण की तरह नही
ध्यान व योग के प्रचलित रूप भी शरीर की उपेक्षा करना सिखाते है अष्टांग योग केवल आसन और प्राणायाम की कुछ क्रियाओं मे ही सिमट कर रह गया है योगासनों का उपयोग लोग स्वास्थ्य का लाभ के लिये ही करते है देह के रहस्य को जानने समझने के लिए नही वेशरीर मन का गुलाम बनाकर प्रसन्न होते है उनके लिये योग का अर्थ है इन्द्रियो का दमन कर शरीर को अपने वश मे करना योग का लोकप्रिय रूप त्याग पर आधारित है योग पर नही
👍3
एकमात्र तंत्र ही एक एसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञानकी दृष्टि से देखता है
मनऔर तन के संघर्ष में तन को जीतने दे तन को मन पर हावी होने दे तन बहुत अनुभवी है उसकी प्रज्ञा लाखो वर्ष पुरानी है तन सीधे प्रकृति से जुडा है इस विश्व को चलाने वाला जो नियम है उसी को धाराएं शरीर के भीतर भी स्पन्दित होती रहती है इतना भर जान ले कि जहाँ शरीर है वहाँ जीवन है और कहीं नही और कहीं है भी तो वह भोग जीवन है
ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे
१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है
काली पञ्च वाण
बहुत लोग आज रोजगार की वजह से परेशान है उनके लिए ये बहुत ही अच्छा मन्त्र है अगर किसी को अपने व्यसाय में भी कुछ परेशानी आ रही हो तो वो भी खत्म हो जायेगी । बस विस्वास और श्रद्धा से जाप करे ।
मन्त्र प्रथम वाण
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई ! द्वितीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू
पान मिठाई !तृतीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
चतुर्थ वाण ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई !
पंचम वाण ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई !
विधि इस मन्त्र को सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है ! यह मन्त्र स्वयं सिद्ध है केवल माँ काली के सामने अगरबती जलाकर 11 बार सुबह और 11 बार शाम को जप कर ले ! मन्त्र एक दम शुद्ध है भाषा के नाम पर हेर फेर न करे।
मनऔर तन के संघर्ष में तन को जीतने दे तन को मन पर हावी होने दे तन बहुत अनुभवी है उसकी प्रज्ञा लाखो वर्ष पुरानी है तन सीधे प्रकृति से जुडा है इस विश्व को चलाने वाला जो नियम है उसी को धाराएं शरीर के भीतर भी स्पन्दित होती रहती है इतना भर जान ले कि जहाँ शरीर है वहाँ जीवन है और कहीं नही और कहीं है भी तो वह भोग जीवन है
ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे
१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है
काली पञ्च वाण
बहुत लोग आज रोजगार की वजह से परेशान है उनके लिए ये बहुत ही अच्छा मन्त्र है अगर किसी को अपने व्यसाय में भी कुछ परेशानी आ रही हो तो वो भी खत्म हो जायेगी । बस विस्वास और श्रद्धा से जाप करे ।
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई ! द्वितीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू
पान मिठाई !तृतीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
चतुर्थ वाण ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई !
पंचम वाण ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई !
👍6❤1
मंगल और शनि ग्रह के युति, और इसका जातक पर प्रभाव
=============================
कुंडली में शनि मंगल का योग करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है। करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही करियर में सफलता मिलती है शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचनतंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।
मंगल ग्रह युवा, चुस्त, बलिष्ठ, छोटे कद वाला, रक्त-गौर वर्ण, पित्त प्रकृति, शूरवीर, उग्र, रक्त नेत्र वाला, और गौरवशाली ग्रह है। इसके विपरीत शनि दुर्बल, लंबा शरीर, रूखे बाल, मोटे दांत और नाखून वाला, दुष्ट, क्रोधी, आलसी और वायु प्रकृति वाला ग्रह है। कुंडली में बलवान शनि सुखकारी तथा निर्बल या पीड़ित शनि कष्टकारक और दुखदायी होता है। इन विपरीत स्वभाव वाले ग्रहों का योग स्वभावतः भाव स्थिति संबंधी उथल-पुथल पैदा करता है। सभी ज्योतिष ग्रंथों ने इस योग का फल बुरा ही बताया है। कुछ आचार्यों ने इसे ‘द्वंद्व योग’ की संज्ञा दी है। ‘द्वंद्व’ का अर्थ है लड़ाई। यह योग लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर मंगल दोष को अधिक अमंगलकारी बनाता है जिसके फलस्वरूप जातक के जीवन में विवाह संबंधी कठिनाइयां आती हैं। विवाह के रिश्ते टूटते हैं, विवाह देर से होता है, विवाहोत्तर जीवन अशांत रहता है, तथा विवाह विच्छेद तक की स्थिति पैदा हो जाती है।
फलदीपिका’ ग्रंथ (अ. 18.3) के अनुसार: दुःखार्तोऽसत्य संधः ससवितृ तनये भूिमजे निन्दिश्च। अर्थात् ‘‘मंगल-शनि साथ हों तो व्यक्ति दुःखी, झूठ बोलने वाला, अपने वचन से फिर जाने वाला और निंदित होता है।’’ ‘सारावली’ ग्रंथ (अ. 15.6) के अनुसार: धात्विन्द्रजाल कुशल प्रवन्चक स्तेय कर्म कुशलश्च। कुजसौरयोर्विधर्मः शस्त्रविषघ्नः कलिरूचिः स्यात्।। अर्थात, ‘‘ कुंडली में मंगल और शनि एक साथ होने पर जातक धातुविशेषज्ञ, धोखेबाज, लड़ाकू, चोर, शस्त्राघाती तथा विष संबंधी ज्ञान रखता है। ‘जातक भरणम्’ (द्विग्रह योगाध्याय, श्लोक-15) के अनुसार: शस्त्रास्त्र वित्संगर कर्मकर्ता स्तेयानृतप्रीतिकरः प्रकामम्। सौरव्येन हीनो नितरां नरः स्याद्ध रासुते मन्दयुतेऽतिनिन्द्यः।। अर्थात्, ‘‘जिसके जन्म समय मंगल और शनि का योग हो, वह अस्त्र-शस्त्र चलाने वाला, चोरी में तत्पर, मिथ्या बोलने वाला और सुख हीन होता है।
‘मानसागरी’ ग्रंथ (द्विग्रहयोग शनि-मंगल द्वंद्व योग फल) अनुसार: वाग्मीन्द्रजालदक्षश्च विधर्मी कलहप्रियः। विषमद्य प्रपंचाढ्यो मंदमंगल संगमे।। अर्थात्, ‘‘मंगल-शनि के योग से व्यक्ति वक्ता तथा इंद्रजाल विद्या में निपुण, धर्महीन, झगड़ालू, विष तथा मदिरा के प्रपंच से युक्त होता है।
‘होरासार’ ग्रंथ (अ. 23.19) के अनुसार: कुजमन्दयास्तु योगे नित्यार्तो वातपित्त रोगाभ्याम्। उपचय भवने नैव नृपतुल्यो लोक संपतः स्यात्ः।। अर्थात्, ‘‘मंगल और शनि की एक भाव में युति वात (गठिया) और पित्त रोग देती है। परंतु उपचय (3, 6, 10,11) भाव में यह युति जातक को सर्वमान्य बनाती है और राज सम्मान देती है। ज्ञातव्य है कि पापी ग्रह उपचय भाव में शुभ फल देते हैं।
‘संकेतनिधि’ ग्रंथ (संकेत IV.66) के अनुसार। द्यूने यमेऽसृजि तदीक्षणतश्च वातार्ता। चंचला सरूधिरा कटि चिन्ह युक्ता।। अर्थात् ‘‘यदि शनि-मंगल सातवें भाव में हों या वहां दृष्टिपात करें तब पत्नी अस्थिर बुद्धि और वात रोग से ग्रस्त होती है। उसको रूधिर की अधिकता होती है और उसके कटि प्रदेश में चिह्न होता है।
ज्योतिष का हर जानकार शनि ग्रह को धरती पर होने वाली सभी बुरी घटनाओ का प्रतीक व कारक मानता हैं संसार मे होने वाले कष्ट , दुख , संताप , मृत्यु , अपंगता, विकलता , दुष्टता ,पतन , युद्ध , क्रूरता भरे कार्य , अव्यवस्था, विद्रोह इत्यादि का कारक ग्रह यह शनि ही माना जाता हैं किसी की भी कुंडली मे इसकी स्थिति बहुत महत्व रखती हैं जैसे यह कहा जा सकता हैं की दूसरे भाव मे शनि वैवाहिक जीवन व धन हेतु अशुभ होता हैं जबकि चतुर्थ भाव मे यह कष्टपूर्ण बचपन का प्रतीक बनता हैं इसी प्रकार दशम भाव का शनि पाप प्रभाव मे होने से अपनी दशा मे जातक को ऊंचाई से गिराता हैं अथवा ऊंचे पद से धरातल मे ले आता हैं | इस शनि का सूर्य चन्द्र से सप्तम मे होना हमेशा बुरे परिणाम देता हैं वही गुरु के साथ होने पर यह शनि गुरु दशा मे परेशानी अवश्य प्रदान करता हैं।
=============================
कुंडली में शनि मंगल का योग करियर के लिए संघर्ष देने वाला होता है। करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही करियर में सफलता मिलती है शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है, शनि मंगल का योग यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचनतंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।
मंगल ग्रह युवा, चुस्त, बलिष्ठ, छोटे कद वाला, रक्त-गौर वर्ण, पित्त प्रकृति, शूरवीर, उग्र, रक्त नेत्र वाला, और गौरवशाली ग्रह है। इसके विपरीत शनि दुर्बल, लंबा शरीर, रूखे बाल, मोटे दांत और नाखून वाला, दुष्ट, क्रोधी, आलसी और वायु प्रकृति वाला ग्रह है। कुंडली में बलवान शनि सुखकारी तथा निर्बल या पीड़ित शनि कष्टकारक और दुखदायी होता है। इन विपरीत स्वभाव वाले ग्रहों का योग स्वभावतः भाव स्थिति संबंधी उथल-पुथल पैदा करता है। सभी ज्योतिष ग्रंथों ने इस योग का फल बुरा ही बताया है। कुछ आचार्यों ने इसे ‘द्वंद्व योग’ की संज्ञा दी है। ‘द्वंद्व’ का अर्थ है लड़ाई। यह योग लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर मंगल दोष को अधिक अमंगलकारी बनाता है जिसके फलस्वरूप जातक के जीवन में विवाह संबंधी कठिनाइयां आती हैं। विवाह के रिश्ते टूटते हैं, विवाह देर से होता है, विवाहोत्तर जीवन अशांत रहता है, तथा विवाह विच्छेद तक की स्थिति पैदा हो जाती है।
फलदीपिका’ ग्रंथ (अ. 18.3) के अनुसार: दुःखार्तोऽसत्य संधः ससवितृ तनये भूिमजे निन्दिश्च। अर्थात् ‘‘मंगल-शनि साथ हों तो व्यक्ति दुःखी, झूठ बोलने वाला, अपने वचन से फिर जाने वाला और निंदित होता है।’’ ‘सारावली’ ग्रंथ (अ. 15.6) के अनुसार: धात्विन्द्रजाल कुशल प्रवन्चक स्तेय कर्म कुशलश्च। कुजसौरयोर्विधर्मः शस्त्रविषघ्नः कलिरूचिः स्यात्।। अर्थात, ‘‘ कुंडली में मंगल और शनि एक साथ होने पर जातक धातुविशेषज्ञ, धोखेबाज, लड़ाकू, चोर, शस्त्राघाती तथा विष संबंधी ज्ञान रखता है। ‘जातक भरणम्’ (द्विग्रह योगाध्याय, श्लोक-15) के अनुसार: शस्त्रास्त्र वित्संगर कर्मकर्ता स्तेयानृतप्रीतिकरः प्रकामम्। सौरव्येन हीनो नितरां नरः स्याद्ध रासुते मन्दयुतेऽतिनिन्द्यः।। अर्थात्, ‘‘जिसके जन्म समय मंगल और शनि का योग हो, वह अस्त्र-शस्त्र चलाने वाला, चोरी में तत्पर, मिथ्या बोलने वाला और सुख हीन होता है।
‘मानसागरी’ ग्रंथ (द्विग्रहयोग शनि-मंगल द्वंद्व योग फल) अनुसार: वाग्मीन्द्रजालदक्षश्च विधर्मी कलहप्रियः। विषमद्य प्रपंचाढ्यो मंदमंगल संगमे।। अर्थात्, ‘‘मंगल-शनि के योग से व्यक्ति वक्ता तथा इंद्रजाल विद्या में निपुण, धर्महीन, झगड़ालू, विष तथा मदिरा के प्रपंच से युक्त होता है।
‘होरासार’ ग्रंथ (अ. 23.19) के अनुसार: कुजमन्दयास्तु योगे नित्यार्तो वातपित्त रोगाभ्याम्। उपचय भवने नैव नृपतुल्यो लोक संपतः स्यात्ः।। अर्थात्, ‘‘मंगल और शनि की एक भाव में युति वात (गठिया) और पित्त रोग देती है। परंतु उपचय (3, 6, 10,11) भाव में यह युति जातक को सर्वमान्य बनाती है और राज सम्मान देती है। ज्ञातव्य है कि पापी ग्रह उपचय भाव में शुभ फल देते हैं।
‘संकेतनिधि’ ग्रंथ (संकेत IV.66) के अनुसार। द्यूने यमेऽसृजि तदीक्षणतश्च वातार्ता। चंचला सरूधिरा कटि चिन्ह युक्ता।। अर्थात् ‘‘यदि शनि-मंगल सातवें भाव में हों या वहां दृष्टिपात करें तब पत्नी अस्थिर बुद्धि और वात रोग से ग्रस्त होती है। उसको रूधिर की अधिकता होती है और उसके कटि प्रदेश में चिह्न होता है।
ज्योतिष का हर जानकार शनि ग्रह को धरती पर होने वाली सभी बुरी घटनाओ का प्रतीक व कारक मानता हैं संसार मे होने वाले कष्ट , दुख , संताप , मृत्यु , अपंगता, विकलता , दुष्टता ,पतन , युद्ध , क्रूरता भरे कार्य , अव्यवस्था, विद्रोह इत्यादि का कारक ग्रह यह शनि ही माना जाता हैं किसी की भी कुंडली मे इसकी स्थिति बहुत महत्व रखती हैं जैसे यह कहा जा सकता हैं की दूसरे भाव मे शनि वैवाहिक जीवन व धन हेतु अशुभ होता हैं जबकि चतुर्थ भाव मे यह कष्टपूर्ण बचपन का प्रतीक बनता हैं इसी प्रकार दशम भाव का शनि पाप प्रभाव मे होने से अपनी दशा मे जातक को ऊंचाई से गिराता हैं अथवा ऊंचे पद से धरातल मे ले आता हैं | इस शनि का सूर्य चन्द्र से सप्तम मे होना हमेशा बुरे परिणाम देता हैं वही गुरु के साथ होने पर यह शनि गुरु दशा मे परेशानी अवश्य प्रदान करता हैं।
इसी प्रकार मंगल ग्रह को धरती पर होने वाले विस्फोटो , हमलो , अग्निकांडों , युद्धो , भूकंपो इत्यादि का कारक माना जाता हैं जातक विशेष की पत्रिका मे यह मंगल दोष के अतिरिक्त कुछ अन्य भावो मे भी हानी ही करता हैं जैसे तृतीय भाव मे यह भात्र सुख मे कमी प्रदान कर अत्यधिक साहसी प्रवृति देता हैं तथा पंचम भाव मे यह तुरंत निर्णय लेने की घातक सोच प्रदान करता हैं।
हमारे ज्योतिष शास्त्रो मे शनि मंगल के संबंध वाले जातक के विषय निम्न बातें कही गयी हैं “ऐसा जातक वक्ता , जादू जानने वाला, धैर्यहीन, झगड़ालू , विष व मदिरा बनाने वाला, अन्याय से द्रव प्राप्ति करने वाला, कलहप्रिय , सुख रहित , दुखी निंदित ,झूठी प्रतिज्ञा करने वाला अर्थात झूठा होता हैं | हमने अपने अध्ययन मे काफी हद तक यह बातें सही पायी हैं इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य बातें हमें अपने इस अध्ययन के दौरान प्राप्त हुयी।
इन दोनों ग्रहो का एक अजीब सा रिश्ता हैं मंगल जहां शनि के घर मे ऊंच का होता हैं वही शनि मंगल के घर मे नीच का हो जाता हैं यह दोनों एक मात्र ऐसे ग्रह हैं जो समसप्तक हुये बिना भी एक दूसरे से दृस्टी संबंध बना सकते हैं | ऐसे मे इन दोनों ग्रहो की युति अथवा दृस्टी जातक विशेष की कुंडली मे क्या परिणाम देती हैं आइए कुछ कुंडलियो द्वारा जानने का प्रयास करते हैं।
👉 यह संबंध जातक विशेष को आत्महत्या करने पर मजबूर करता हैं | उदाहरण के लिए निम्न कुण्डलिया देखी जा सकती हैं।
👉 श्री राम जी की कर्क लग्न की पत्रिका मे शनि और मंगल (सप्तमेश-अष्टमेश व पंचमेश-कर्मेश ) की लग्न व दशम भाव पर दृस्टी हैं जिनके मिले जुले प्रभावों से सभी जानते हैं की श्री राम ने जलसमाधि ली ।
👉 29/4/1837 को मिथुन लग्न मे जन्मे इस ने जातक फ्रांसीसी सेना मे जनरल के पद पर रहते हुये फ्रांस के युद्धो मे बहुत नाम कमाया था 1889 मे इन्हे शत्रुतापूर्ण कारवाई के चलते पद से हटा दिया गया 1890 मे इनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी जिससे निराश होकर इन्होने 30/9/1891 मे आत्महत्या कर ली थी | इनकी पत्रिका मे भी मंगल शनि का दृस्टी संबंध हैं।
👉 हिटलर (20/4/1889) तुला लग्न की इस पत्रिका मे शनि मंगल का दृस्टी संबंध हैं जो सप्तमेश चतुर्थेश का संबंध हैं जिससे हिटलर को सिंहासन व पद प्राप्ति की अदम्य असंतुष्टि की भावना प्राप्त हुई और वह अपनी तानाशाही प्रवृति की और उन्मुख होकर विश्व मे विवादित व्यक्ति के रूप मे जाना गया इन्ही ग्रहो के लग्न पर प्रभाव ने उसे आत्महत्या करने को मजबूर किया।
इन सभी उदाहरणो से यह स्पष्ट हो जाता हैं की शनि मंगल का संबंध सच मे ही एक विध्वंशक संबंध हैं जो कुंडली मे जातक विशेष के अतिरिक्त धरती पर भी अपना विध्वंशक प्रभाव ही देता हैं।
शनि को कार्य के लिये और मंगल को तकनीक के लिये माना जाता है। शनि का रंग काला है तो मंगल का रंग लाल है,दोनो को मिलाने पर कत्थई रंग का निर्माण होजाता है। कत्थई रंग से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुयें व्यक्ति स्थान पदार्थ सभी शनि मंगल की युति में जोडे जाते है। शनि जमा हुआ ठंडा पदार्थ है तो मंगल गर्म तीखा पदार्थ है,दोनो को मिलाने पर शनि अपने रूप में नही रह पाता है जितना तेज मंगल के अन्दर होता है उतना ही शनि ढीला हो जाता है।
इस बात को रोजाना की जिन्दगी में समझने के लिये घर मे बनने वाली आलू की सब्जी के लिये सोचिये,आलू की सिफ़्त शनि में जोडी जाती है कारण जमीन के अन्दर से यह सब्जी उगती है जड के रूप में इसका आस्तित्व है,जब निकाला जाता है तो जमा हुआ पानी और अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है। यह सूर्य की गर्मी से सड जाता है इसके लिये इसे कोड स्टोरेज में रखा जाता है और समय पर निकाल कर इसे प्रयोग में लाया जाता है,सब्जी बनाते वक्त इसे छिलके को निकाल कर मिर्च मशाले आदि के साथ सब्जी के रूप में पकाया जाता है जितनी गर्मी इसे दी जायेगी उतना ही पतला यह पक जायेगा,लेकिन अपने अन्दर के पानी के अनुसार ही यह ढीला या कडक बनेगा,भोजन के समय इसे प्रयोग करने पर अपने रूप परिवर्तन से आराम से खाया जा सकता है। अगर इसे गर्म नही किया जाये तो यह पकेगा नही और कसैला स्वाद देगा और खाया भी नही जायेगा। सीधे आग में डालने पर यह जल जायेगा,फ़्लेम वाली आग में यह पकेगा नही,जितनी मन्दी आग से इसे पकाया जायेगा उतना ही स्वादिष्ट बनेगा।
दूसरा उदाहरण मंगल की भोजन में प्रयोग की जाने वाली मिर्च से भी लिया जाता है,जब मिर्च अधिक हो जाती है तो शरीर के अन्दर जमा हुआ कफ़ जो शनि के द्वारा पैदा किया जाता है पिघलना शुरु हो जाता है,जितनी अधिक मिर्च खायी जाती है उतना अधिक कफ़ शरीर से पिघलना शुरु हो जाता है,यहां तक कि अगर अधिक मिर्ची खायी जाये तो शरीर में जलन पैदा हो जाती है,शरीर में वसा के रूप में जमा शनि का पदार्थ पिघल कर आन्सू की रूप में कफ़ के रूप में नाक के रूप में पेशाब के समय चर्बी के रूप में मल को पतला करने के बाद दस्त के रूप में निकल जायेगा,अधिक मिर्च के प्रयोग करने पर
हमारे ज्योतिष शास्त्रो मे शनि मंगल के संबंध वाले जातक के विषय निम्न बातें कही गयी हैं “ऐसा जातक वक्ता , जादू जानने वाला, धैर्यहीन, झगड़ालू , विष व मदिरा बनाने वाला, अन्याय से द्रव प्राप्ति करने वाला, कलहप्रिय , सुख रहित , दुखी निंदित ,झूठी प्रतिज्ञा करने वाला अर्थात झूठा होता हैं | हमने अपने अध्ययन मे काफी हद तक यह बातें सही पायी हैं इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य बातें हमें अपने इस अध्ययन के दौरान प्राप्त हुयी।
इन दोनों ग्रहो का एक अजीब सा रिश्ता हैं मंगल जहां शनि के घर मे ऊंच का होता हैं वही शनि मंगल के घर मे नीच का हो जाता हैं यह दोनों एक मात्र ऐसे ग्रह हैं जो समसप्तक हुये बिना भी एक दूसरे से दृस्टी संबंध बना सकते हैं | ऐसे मे इन दोनों ग्रहो की युति अथवा दृस्टी जातक विशेष की कुंडली मे क्या परिणाम देती हैं आइए कुछ कुंडलियो द्वारा जानने का प्रयास करते हैं।
👉 यह संबंध जातक विशेष को आत्महत्या करने पर मजबूर करता हैं | उदाहरण के लिए निम्न कुण्डलिया देखी जा सकती हैं।
👉 श्री राम जी की कर्क लग्न की पत्रिका मे शनि और मंगल (सप्तमेश-अष्टमेश व पंचमेश-कर्मेश ) की लग्न व दशम भाव पर दृस्टी हैं जिनके मिले जुले प्रभावों से सभी जानते हैं की श्री राम ने जलसमाधि ली ।
👉 29/4/1837 को मिथुन लग्न मे जन्मे इस ने जातक फ्रांसीसी सेना मे जनरल के पद पर रहते हुये फ्रांस के युद्धो मे बहुत नाम कमाया था 1889 मे इन्हे शत्रुतापूर्ण कारवाई के चलते पद से हटा दिया गया 1890 मे इनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी जिससे निराश होकर इन्होने 30/9/1891 मे आत्महत्या कर ली थी | इनकी पत्रिका मे भी मंगल शनि का दृस्टी संबंध हैं।
👉 हिटलर (20/4/1889) तुला लग्न की इस पत्रिका मे शनि मंगल का दृस्टी संबंध हैं जो सप्तमेश चतुर्थेश का संबंध हैं जिससे हिटलर को सिंहासन व पद प्राप्ति की अदम्य असंतुष्टि की भावना प्राप्त हुई और वह अपनी तानाशाही प्रवृति की और उन्मुख होकर विश्व मे विवादित व्यक्ति के रूप मे जाना गया इन्ही ग्रहो के लग्न पर प्रभाव ने उसे आत्महत्या करने को मजबूर किया।
इन सभी उदाहरणो से यह स्पष्ट हो जाता हैं की शनि मंगल का संबंध सच मे ही एक विध्वंशक संबंध हैं जो कुंडली मे जातक विशेष के अतिरिक्त धरती पर भी अपना विध्वंशक प्रभाव ही देता हैं।
शनि को कार्य के लिये और मंगल को तकनीक के लिये माना जाता है। शनि का रंग काला है तो मंगल का रंग लाल है,दोनो को मिलाने पर कत्थई रंग का निर्माण होजाता है। कत्थई रंग से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुयें व्यक्ति स्थान पदार्थ सभी शनि मंगल की युति में जोडे जाते है। शनि जमा हुआ ठंडा पदार्थ है तो मंगल गर्म तीखा पदार्थ है,दोनो को मिलाने पर शनि अपने रूप में नही रह पाता है जितना तेज मंगल के अन्दर होता है उतना ही शनि ढीला हो जाता है।
इस बात को रोजाना की जिन्दगी में समझने के लिये घर मे बनने वाली आलू की सब्जी के लिये सोचिये,आलू की सिफ़्त शनि में जोडी जाती है कारण जमीन के अन्दर से यह सब्जी उगती है जड के रूप में इसका आस्तित्व है,जब निकाला जाता है तो जमा हुआ पानी और अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है। यह सूर्य की गर्मी से सड जाता है इसके लिये इसे कोड स्टोरेज में रखा जाता है और समय पर निकाल कर इसे प्रयोग में लाया जाता है,सब्जी बनाते वक्त इसे छिलके को निकाल कर मिर्च मशाले आदि के साथ सब्जी के रूप में पकाया जाता है जितनी गर्मी इसे दी जायेगी उतना ही पतला यह पक जायेगा,लेकिन अपने अन्दर के पानी के अनुसार ही यह ढीला या कडक बनेगा,भोजन के समय इसे प्रयोग करने पर अपने रूप परिवर्तन से आराम से खाया जा सकता है। अगर इसे गर्म नही किया जाये तो यह पकेगा नही और कसैला स्वाद देगा और खाया भी नही जायेगा। सीधे आग में डालने पर यह जल जायेगा,फ़्लेम वाली आग में यह पकेगा नही,जितनी मन्दी आग से इसे पकाया जायेगा उतना ही स्वादिष्ट बनेगा।
दूसरा उदाहरण मंगल की भोजन में प्रयोग की जाने वाली मिर्च से भी लिया जाता है,जब मिर्च अधिक हो जाती है तो शरीर के अन्दर जमा हुआ कफ़ जो शनि के द्वारा पैदा किया जाता है पिघलना शुरु हो जाता है,जितनी अधिक मिर्च खायी जाती है उतना अधिक कफ़ शरीर से पिघलना शुरु हो जाता है,यहां तक कि अगर अधिक मिर्ची खायी जाये तो शरीर में जलन पैदा हो जाती है,शरीर में वसा के रूप में जमा शनि का पदार्थ पिघल कर आन्सू की रूप में कफ़ के रूप में नाक के रूप में पेशाब के समय चर्बी के रूप में मल को पतला करने के बाद दस्त के रूप में निकल जायेगा,अधिक मिर्च के प्रयोग करने पर
👍2
यह शरीर की रक्षा के रूप में उपस्थित और सर्दी गर्मी से शरीर को बचाने वाले पदार्थ को शरीर से निकाल कर बाहर कर देगी। उसी प्रकार से धीमी आंच पर रखा हुआ पानी भी भाप की शक्ल में बर्तन से विलीन हो जायेगा। यह मंगल की सिफ़्त है। एक बात और भी मानी जाती है कि शनि का स्थान गन्दी जगह पर होता है और मंगल का स्थान गर्म जगह पर होता है,जिन जातकों की कुंडली में शनि मंगल की युति होती है उनका खून किसी न किसी प्रकार के इन्फ़ेक्सन से युक्त होता है।
शनि के अन्दर एक बात और देखी जाती है कि वह जड है उसे कोई भान नही है,जैसे सूर्य देखने की क्षमता रखता है चन्द्र सोचने की क्षमता को रखता है मंगल हिम्मत को दिखाने की क्षमता को रखता है बुध गन्द को सूंघने की क्षमता को रखता है,गुरु सुनने और काम शक्ति के विकास की क्षमता को रखता है शुक्र स्पर्श से समझने की क्षमता का रूप होता है,राहु आकस्मिक घटना को देने की ताकत को रखता है तो केतु स्वभाव से ही सहायता के लिये सामने होता है,लेकिन शनि जड है उसे जैसा साधनों से बनाया जाता है वैसा ही वह बन जाता है। मंगल के साथ तकनीकी कारण से शनि जमे हुये कार्य को पिघलाने का काम करता है। शनि पत्थर है और उसे लाल रंग से रंग दिया जाये तो वह धर्म के रूप में बन जायेगा,शनि चोर है तो मंगल सिपाही है। शनि पत्थर है तो मंगल लोहा है,इसलिये ही शनि के लिये लोहे का छल्ला पहिना जाता है। रिस्तो मे देखा जाये तो शनि कर्म है मंगल भाई है,शनि दुख है तो मंगल भाई का दुख है,शनि खेती का काम है तो मंगल मशीनरी है,शनि जेल है तो मंगल उसका प्रहरी है,शनि विदेशी है तो मंगल उसे कन्ट्रोल करने वाला है,शनि कोयला है तो मंगल तपती हुई आग है,शनि कमजोर है तो मंगल उसके अन्दर शक्ति को देने वाला है,शनि डाकू है तो मंगल उसकी उसकी साहस की सीमा है,शनि बुजुर्ग दार्शनिक है तो मंगल उसके तामसिक विचार है,शनि कब्रिस्तान है तो मंगल जलती हुई आग है,शनि खंडहर है तो मंगल उसके अन्दर तपती हुयी रेत है,शनि बाल है तो मंगल उसे काटने वाला नाई है,शनि लकवा है तो मंगल गर्म सेंक है,शनि फ़ोडा है तो मंगल आपरेशन है,शनि कर्म है तो मंगल रसोई है,शनि मधुमक्खी है तो मंगल उसके अन्दर का जहर है,शनि आलू का पकौडा है तो मंगल उसके अन्दर मीठी चटनी है। शनि काम करने वाले कर्मचारी है तो मंगल कार्य स्थल की रखवाली करने वाला गार्ड है। शनि घर है तो मंगल उसका दरवाजा है। मंगल खून चोट चेचक अपेन्डिक्स हार्निया देता है तो शनि वात लकवा ह्रदय की बीमारी ट्यूमर ब्रांकाइटिस की बीमारी देता है।
मंगल शनि की युति में कार्य तकनीकी होते है मशीन के कार्य भी होते है,व्यापारिक राशि तुला में अगर युति है तो मारकेटिंग की क्षमता भी होती है,एम बी ए आदि करने के बाद बाजार का तकनीकी ज्ञान भी होता है। शनि कार्य होता है तो मंगल कार्य में संघर्ष भी देता है,एक भाई को कष्ट जरूर होता है,मंगल युवा होता है और शनि उसे बुजुर्ग जैसे कष्ट भी देता है,शनि कार्य है तो मंगल उत्तेजना में उसे बदलने का रूप भी बन जाता है। शत्रु अधिक होते है और किसी प्रकार से चन्द्रमा सामने हो तो नाक पर गुस्सा करने वाला व्यक्ति भी होता है। मंगल शनि के साथ वक्री हो तो उत्साह में कमी होती है,काम शक्ति निर्बल होती है,शनि मंगल के साथ वक्री हो तो अधिकार को प्राप्त करने की जल्दबाजी होती है और वह अधिकार भले ही खास आदमी की मौत करनी पडे लेकिन अधिकार जल्दी से लेने में दिक्कत नही होती है।
मंगल शनि की दशा में तीन महिना पहले से और तीन महिना बाद तक तथा बीच के एक महिना में घोर कष्ट भुगतने पडते है। शनि में मंगल की दशा में उन्नीस महिने का घोर कष्ट होता है। शनि मंगल के साथ होने पर जातक को बहुत मेहनत के बाद ही सफ़लता मिलती है,हर काम में असन्तोष होता है,वह अपने तकनीकी कारणॊ से ऊंची पदवी वाले लोगो से अनबन ही रखता है,साथ ही गलतफ़हमी का शिकार भी होता रहता है,कार्य भी अक्सर चलते हुये अपने आप बन्द हो जाते है अगर जातक नौकरी करता है तो इन्ही कारणो से उसे बार बार कार्य बदलने पडते है,किसी के कार्य से उसे सन्तोष होता ही नही है। यह युति अगर तीन सात या ग्यारह में चन्द्रमा के साथ होती है तो जातक को नौकरी में परेशानी होती है जीवन साथी की नाक पर गुस्सा होता है और इसी कारण से वैवाहिक जीवन और नौकरी दोनो ही परेशानी में होती है,जीवन साथी को बीमारियों की बजह से और नौकरी को तकनीकी कमियों से परेशान होने के लिये भी जाना जाता है। धन हानि भी होती है,नौकरी करने में परेशानी भी होती है,व्यापार आदि में कठिनायी भी होती है। अगर यह युति ग्यारहवे भाव में है और राहु छठे भाव में है तो जातक को कार्य के अन्दर बहाने बनाने की आदत होती है साथ ही वह आंख बचाकर काम करने वाला होता है,छठे से छठा कर घर कार्य में चोरी की आदत भी देता है और जातक को किसी न किसी बात पर अचानक धन का मुआवजा देने या पुलिस आदि में रिपोर्ट होने तथा परेशान होने की बात भी मिलती है।
शनि के अन्दर एक बात और देखी जाती है कि वह जड है उसे कोई भान नही है,जैसे सूर्य देखने की क्षमता रखता है चन्द्र सोचने की क्षमता को रखता है मंगल हिम्मत को दिखाने की क्षमता को रखता है बुध गन्द को सूंघने की क्षमता को रखता है,गुरु सुनने और काम शक्ति के विकास की क्षमता को रखता है शुक्र स्पर्श से समझने की क्षमता का रूप होता है,राहु आकस्मिक घटना को देने की ताकत को रखता है तो केतु स्वभाव से ही सहायता के लिये सामने होता है,लेकिन शनि जड है उसे जैसा साधनों से बनाया जाता है वैसा ही वह बन जाता है। मंगल के साथ तकनीकी कारण से शनि जमे हुये कार्य को पिघलाने का काम करता है। शनि पत्थर है और उसे लाल रंग से रंग दिया जाये तो वह धर्म के रूप में बन जायेगा,शनि चोर है तो मंगल सिपाही है। शनि पत्थर है तो मंगल लोहा है,इसलिये ही शनि के लिये लोहे का छल्ला पहिना जाता है। रिस्तो मे देखा जाये तो शनि कर्म है मंगल भाई है,शनि दुख है तो मंगल भाई का दुख है,शनि खेती का काम है तो मंगल मशीनरी है,शनि जेल है तो मंगल उसका प्रहरी है,शनि विदेशी है तो मंगल उसे कन्ट्रोल करने वाला है,शनि कोयला है तो मंगल तपती हुई आग है,शनि कमजोर है तो मंगल उसके अन्दर शक्ति को देने वाला है,शनि डाकू है तो मंगल उसकी उसकी साहस की सीमा है,शनि बुजुर्ग दार्शनिक है तो मंगल उसके तामसिक विचार है,शनि कब्रिस्तान है तो मंगल जलती हुई आग है,शनि खंडहर है तो मंगल उसके अन्दर तपती हुयी रेत है,शनि बाल है तो मंगल उसे काटने वाला नाई है,शनि लकवा है तो मंगल गर्म सेंक है,शनि फ़ोडा है तो मंगल आपरेशन है,शनि कर्म है तो मंगल रसोई है,शनि मधुमक्खी है तो मंगल उसके अन्दर का जहर है,शनि आलू का पकौडा है तो मंगल उसके अन्दर मीठी चटनी है। शनि काम करने वाले कर्मचारी है तो मंगल कार्य स्थल की रखवाली करने वाला गार्ड है। शनि घर है तो मंगल उसका दरवाजा है। मंगल खून चोट चेचक अपेन्डिक्स हार्निया देता है तो शनि वात लकवा ह्रदय की बीमारी ट्यूमर ब्रांकाइटिस की बीमारी देता है।
मंगल शनि की युति में कार्य तकनीकी होते है मशीन के कार्य भी होते है,व्यापारिक राशि तुला में अगर युति है तो मारकेटिंग की क्षमता भी होती है,एम बी ए आदि करने के बाद बाजार का तकनीकी ज्ञान भी होता है। शनि कार्य होता है तो मंगल कार्य में संघर्ष भी देता है,एक भाई को कष्ट जरूर होता है,मंगल युवा होता है और शनि उसे बुजुर्ग जैसे कष्ट भी देता है,शनि कार्य है तो मंगल उत्तेजना में उसे बदलने का रूप भी बन जाता है। शत्रु अधिक होते है और किसी प्रकार से चन्द्रमा सामने हो तो नाक पर गुस्सा करने वाला व्यक्ति भी होता है। मंगल शनि के साथ वक्री हो तो उत्साह में कमी होती है,काम शक्ति निर्बल होती है,शनि मंगल के साथ वक्री हो तो अधिकार को प्राप्त करने की जल्दबाजी होती है और वह अधिकार भले ही खास आदमी की मौत करनी पडे लेकिन अधिकार जल्दी से लेने में दिक्कत नही होती है।
मंगल शनि की दशा में तीन महिना पहले से और तीन महिना बाद तक तथा बीच के एक महिना में घोर कष्ट भुगतने पडते है। शनि में मंगल की दशा में उन्नीस महिने का घोर कष्ट होता है। शनि मंगल के साथ होने पर जातक को बहुत मेहनत के बाद ही सफ़लता मिलती है,हर काम में असन्तोष होता है,वह अपने तकनीकी कारणॊ से ऊंची पदवी वाले लोगो से अनबन ही रखता है,साथ ही गलतफ़हमी का शिकार भी होता रहता है,कार्य भी अक्सर चलते हुये अपने आप बन्द हो जाते है अगर जातक नौकरी करता है तो इन्ही कारणो से उसे बार बार कार्य बदलने पडते है,किसी के कार्य से उसे सन्तोष होता ही नही है। यह युति अगर तीन सात या ग्यारह में चन्द्रमा के साथ होती है तो जातक को नौकरी में परेशानी होती है जीवन साथी की नाक पर गुस्सा होता है और इसी कारण से वैवाहिक जीवन और नौकरी दोनो ही परेशानी में होती है,जीवन साथी को बीमारियों की बजह से और नौकरी को तकनीकी कमियों से परेशान होने के लिये भी जाना जाता है। धन हानि भी होती है,नौकरी करने में परेशानी भी होती है,व्यापार आदि में कठिनायी भी होती है। अगर यह युति ग्यारहवे भाव में है और राहु छठे भाव में है तो जातक को कार्य के अन्दर बहाने बनाने की आदत होती है साथ ही वह आंख बचाकर काम करने वाला होता है,छठे से छठा कर घर कार्य में चोरी की आदत भी देता है और जातक को किसी न किसी बात पर अचानक धन का मुआवजा देने या पुलिस आदि में रिपोर्ट होने तथा परेशान होने की बात भी मिलती है।
👍2
उपाय --
यदि कुंडली के किसी भी भाव में शनि मंगल एक साथ हों तो सबसे पहले ये देखना चाहिए कि दोनों में से शुभ कौन है तथा अशुभ कौन। इसे सरल बनाने के लिए ऐसे पता करें।
यदि शनि अपनी मित्र राशियों- वृषभ, मिथुन, कन्या में हो या अपनी स्वः राशी मकर/कुम्भ में हो या अपनी उच्च राशि तुला में हो तब शनि शुभ होगा तथा मंगल अशुभ। इस स्थिति में मंगल के उपाय करने चाहियें।
इसी प्रकार यदि मंगल अपनी मित्र राशियों- सिंह, धनु, मीन में हो या अपनी स्वः राशियों मेष/वृश्चिक में हो या अपनी उच्च राशी मकर में हो तब यहां शनि के उपाय करने चाहिए।
यहां भी 2 प्रकार का भेद होता है। मकर शनि की स्वः राशि है तथा मंगल की उच्च राशी। यदि यह योग मकर राशि में कुंडली के छठे आठवें या बाहरनवे भाव में बन रहा हो तब शनि मंगल दोनों की वस्तुओं का दान करना चाहिए अन्यथा नहीं। क्योंकि कुंडली के अन्य भावों में यह योग शुभफल दाई होता है। और जो योग या ग्रह शुभ फल दाई हों उनका दान करने से उनकी शुभता में कमी आती है।।
यदि कुंडली के किसी भी भाव में शनि मंगल एक साथ हों तो सबसे पहले ये देखना चाहिए कि दोनों में से शुभ कौन है तथा अशुभ कौन। इसे सरल बनाने के लिए ऐसे पता करें।
यदि शनि अपनी मित्र राशियों- वृषभ, मिथुन, कन्या में हो या अपनी स्वः राशी मकर/कुम्भ में हो या अपनी उच्च राशि तुला में हो तब शनि शुभ होगा तथा मंगल अशुभ। इस स्थिति में मंगल के उपाय करने चाहियें।
इसी प्रकार यदि मंगल अपनी मित्र राशियों- सिंह, धनु, मीन में हो या अपनी स्वः राशियों मेष/वृश्चिक में हो या अपनी उच्च राशी मकर में हो तब यहां शनि के उपाय करने चाहिए।
यहां भी 2 प्रकार का भेद होता है। मकर शनि की स्वः राशि है तथा मंगल की उच्च राशी। यदि यह योग मकर राशि में कुंडली के छठे आठवें या बाहरनवे भाव में बन रहा हो तब शनि मंगल दोनों की वस्तुओं का दान करना चाहिए अन्यथा नहीं। क्योंकि कुंडली के अन्य भावों में यह योग शुभफल दाई होता है। और जो योग या ग्रह शुभ फल दाई हों उनका दान करने से उनकी शुभता में कमी आती है।।
सफल विवाह ।।
वैवाहिक जीवन अच्छा रहेगा
1)सप्तम शुभ हो= 33%
2) सप्तमेश शुभ हो= 33%
3)कारक(शुक्र)शुभ हो= + 33%
____
99%
👍सप्तम भाव = सप्तम भाव मे शुभ राशि हो ।
👍सप्तमेश सप्तमेश = सप्तमेश सप्तम में हो या सप्तम भाव को देख रहा हो
👍सप्तम में शुभ ग्रह स्थित हो ।
👍सप्तमेश केंद्र त्रिकोण में हो और शुभ ग्रहों से युति कर रहा हो ।
👍सप्तमेश के कारक( शुक्र) शुभ स्थिति में हो अथवा केंद्र त्रिकोण में हो।
👍सप्तम में उच्च के ग्रह स्थित हो ।
👍सप्तम में शनि ,सूर्य ,राहु ,केतु ,मंगल व पापी गुरु ना स्थित हो ।
वैवाहिक जीवन अच्छा रहेगा
1)सप्तम शुभ हो= 33%
2) सप्तमेश शुभ हो= 33%
3)कारक(शुक्र)शुभ हो= + 33%
____
99%
👍सप्तम भाव = सप्तम भाव मे शुभ राशि हो ।
👍सप्तमेश सप्तमेश = सप्तमेश सप्तम में हो या सप्तम भाव को देख रहा हो
👍सप्तम में शुभ ग्रह स्थित हो ।
👍सप्तमेश केंद्र त्रिकोण में हो और शुभ ग्रहों से युति कर रहा हो ।
👍सप्तमेश के कारक( शुक्र) शुभ स्थिति में हो अथवा केंद्र त्रिकोण में हो।
👍सप्तम में उच्च के ग्रह स्थित हो ।
👍सप्तम में शनि ,सूर्य ,राहु ,केतु ,मंगल व पापी गुरु ना स्थित हो ।
❤2👍2
*जीवन में परिवर्तन के सूत्र*
====
*उचित शयन कक्ष का चयन आपके जीवन ,व्यवसाय ,व्यापार और समृद्धि को पूरे तौर पर प्रभावित कर सकता है :-*
" विदेश यात्रा या विदेश में पढ़ाई करना चाहते अपने शयन कक्ष के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] में क्रिस्टल ग्लोब रखें "
👉 वास्तु शास्त्र के अनुसार वायव्य कोण से यात्रा देखा जाता है ।
👉 वास्तुशास्त्र के अनुसार घर का वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सबसे ज्यादा अस्थिरता होता है।क्योंकि इस कोण का तत्व वायु होता है जो कि चलायमान होता है ।
( *वास्तु प्रवास :-*
👉 वायव्य कोण का स्वामी चन्द्रमा होता है जिसकी प्रवृति चंचल मानी गयी है । इसलिए वायव्य को सबसे अस्थिर कोना माना गया है ।
👉 इसलिए वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सोने से घर से जल्दी से जल्दी बाहर जाने की सम्भावना बनती है !!
👉इसलिए आप घर के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सोना शुरू कर दें !!
👉 *अगर आप किसी देश की यात्रा करना चाहते हैं तो :-* अपने शयन कक्ष के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में एक क्रिस्टल ग्लोब लगाएं और जिस देश में आपको जाना है उसे अपनी ओर रखें ।
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से फेक्ट्री के *फिनिश प्रोडक्ट* ( तैयार माल ) को वायव्य में रखने का विधान है ।
( *वास्तु प्रवास :-*
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से ही *अतिथि* को घर के वायव्य कोण में सुलाने का विधान है । वायव्य कोण में सोने से अतिथि शीघ्र वापस अपने घर को चला जाता है ।
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से ही *शादी करने योग्य लड़कियों* को वायव्य कोण के कमरे में पश्चिम में सिर रखकर सुलाने का विधान है ।
👉 *वायव्य कोण* की अस्थिरता की वजह से हमेशा यात्रा में रहने वाले , वास्तु सलाहकार ,मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव ,वसूली के लिए रोज निकलने वाले व्यवसायियों या कर्मचारियों को वायव्य कोण में सुलाने का विधान है ।
====
*उचित शयन कक्ष का चयन आपके जीवन ,व्यवसाय ,व्यापार और समृद्धि को पूरे तौर पर प्रभावित कर सकता है :-*
" विदेश यात्रा या विदेश में पढ़ाई करना चाहते अपने शयन कक्ष के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] में क्रिस्टल ग्लोब रखें "
👉 वास्तु शास्त्र के अनुसार वायव्य कोण से यात्रा देखा जाता है ।
👉 वास्तुशास्त्र के अनुसार घर का वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सबसे ज्यादा अस्थिरता होता है।क्योंकि इस कोण का तत्व वायु होता है जो कि चलायमान होता है ।
( *वास्तु प्रवास :-*
👉 वायव्य कोण का स्वामी चन्द्रमा होता है जिसकी प्रवृति चंचल मानी गयी है । इसलिए वायव्य को सबसे अस्थिर कोना माना गया है ।
👉 इसलिए वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सोने से घर से जल्दी से जल्दी बाहर जाने की सम्भावना बनती है !!
👉इसलिए आप घर के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में सोना शुरू कर दें !!
👉 *अगर आप किसी देश की यात्रा करना चाहते हैं तो :-* अपने शयन कक्ष के वायव्य कोण [उत्तर-पश्चिम] कोण में एक क्रिस्टल ग्लोब लगाएं और जिस देश में आपको जाना है उसे अपनी ओर रखें ।
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से फेक्ट्री के *फिनिश प्रोडक्ट* ( तैयार माल ) को वायव्य में रखने का विधान है ।
( *वास्तु प्रवास :-*
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से ही *अतिथि* को घर के वायव्य कोण में सुलाने का विधान है । वायव्य कोण में सोने से अतिथि शीघ्र वापस अपने घर को चला जाता है ।
👉 वायव्य कोण की अस्थिरता की वजह से ही *शादी करने योग्य लड़कियों* को वायव्य कोण के कमरे में पश्चिम में सिर रखकर सुलाने का विधान है ।
👉 *वायव्य कोण* की अस्थिरता की वजह से हमेशा यात्रा में रहने वाले , वास्तु सलाहकार ,मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव ,वसूली के लिए रोज निकलने वाले व्यवसायियों या कर्मचारियों को वायव्य कोण में सुलाने का विधान है ।
👍6
ज्योतिष के सिद्धांतानुसार जानते हैं की पति-पत्नी के बीच कैसा सम्बन्ध होगा
यदि लग्न या चंद्र से सप्तम भाव में नवमेश या राशि स्वामी या अन्य कारक ग्रह हों या उस पर उनकी दृष्टि हो तो शादी से सुख प्राप्त होगा व जीवनसाथी भाग्यशाली होगा।
यदि द्वितीयेश, सप्तमेश व द्वादशेश केंद्र या त्रिकोण में हो व बृहस्पति से दृष्ट हों, तो सुखमय वैवाहिक जीवन रहेगा।
यदि सप्तमेश व शुक्र समराशि में हों, सातवां भाव भी सम राशि हो व पंचमेश और सप्तमेश सूर्य के निकट न हों या अन्य प्रकार से कमजोर न हों, तो सुयोग्य संतति प्राप्त होती है। यदि गुरु सप्तम भाव में हो, तो जातक जीवनसाथी से बहुत प्रेम करता है।
सप्तमेश यदि व्यय भाव में हो, तो पहली जीवनसाथी के होते हुए भी जातक दूसरा संबंध बनाता है। इस योग के कारण पति या पत्नी की मृत्यु भी हो सकती है।
यदि सप्तमेश पंचम या पंचमेश सप्तम भाव में हो, तो जातक शादी से संतुष्ट नहीं रहता।
स्त्री की कुंडली में सप्तम भाव में चंद्र व शनि के स्थित होने पर दूसरी शादी की संभावना रहती है जबकि पुरुष की कुंडली में ऐसा योग होने पर शादी या संतति नहीं होती है।
लग्न में बुध या केतु हो, तो पत्नी बीमार रहती है।
सातवें भाव में शनि और बुध स्थित हों, तो वैधव्य या विधुर योग बनता है।
यदि सातवें भाव में मारक राशि और नवांश में चंद्र हो, तो पत्नी दुष्ट होती है।
अब बात करते हैं विवाहेत्तर संबंध की
यदि सूर्य राहु से पीड़ित हो, तो जातक को अन्य व्यक्ति के साथ प्रणय के कारण बदनामी उठानी पड़ती है।
सूर्य मंगल से पीड़ित हो, तो वैवाहिक जीवन कष्टमय होता है। यदि शुक्र व मंगल नवांश में स्थान परिवर्तन योग में हों, तो जातक विवाहेतर संबंध बनाता है।
जातक के सप्तम भाव में यदि शुक्र, मंगल और चंद्र हों, तो वह अपने जीवनसाथी की स्वीकृति से विवाहेतर संबंध बनाता है जैसे की मेट्रो सिटी में #पार्टनर_स्वैपिंग आम चलन हो चुका है।
मंगल आवेश में वृद्धि करता है व शुक्र सम्मोहक पहलुओं से जोड़ता है।
शुक्र रोमांस व सम्मोहक पहलुओं का द्योतक है। यह लैंगिक सौहार्द, अनुरक्ति, विवाह, वंशवृद्धि, शारीरिक सौंदर्य और प्रेम का कारक है।
मंगल बल, ऊर्जा, आक्रामकता का द्योतक है। जब शुक्र के साथ मंगल की युति हो, तो #विषय_वासना की प्रचुरता रहती है।
मंगल यदि सातवें घर में हो तो जातक विवाहेतर संबंध स्थापित करता है, जिससे उसका वैवाहिक जीवन तनावयुक्त होता है।
मंगल यदि आठवें घर में हो तो जातक जीवनसाथी के साथ #धोखा करता है।
शुक्र व बुध यदि चौथे घर में हों तो जातक के विवाहेतर संबंध बनते हैं।
शुक्र यदि चौथे, आठवें या 12वें राशि में हो और मंगल से प्रभावित हो तो भी जातक के अन्यों के साथ संबंध होते हैं।
लग्नेश यदि दूसरे घर में अथवा दूसरे घर का स्वामी सातवें या दसवें घर में हो, तो भी जातक के किसी न किसी प्रकार से विवाहेतर संबंध बनते हैं।
शुक्र व मंगल व्यक्ति को भौतिकवादी, मनोरंजनप्रिय, शौकीन, आडंबरी और विषयी बनाते हैं।
यदि ये दोनों विपरीत दृष्टि दे रहे हों, तो विषय संबंधी कठिनाई और वैवाहिक जीवन में समस्या आती है। शुक्र यदि मंगल व राहु से युति कर रहा हो, तो वह जातक को व्यभिचारी बना देता है।
यदि अंर्त ग्रस्त क्षेत्र, गुरु, बुध या चंद्र न हो, तो जातक में कामुकता प्रबल होती है। शुक्र पुरुष की कुंडली और गुरु स्त्री की कुंडली में दांपत्य का कारक है।
यदि लग्न या चंद्र से सप्तम भाव में नवमेश या राशि स्वामी या अन्य कारक ग्रह हों या उस पर उनकी दृष्टि हो तो शादी से सुख प्राप्त होगा व जीवनसाथी भाग्यशाली होगा।
यदि द्वितीयेश, सप्तमेश व द्वादशेश केंद्र या त्रिकोण में हो व बृहस्पति से दृष्ट हों, तो सुखमय वैवाहिक जीवन रहेगा।
यदि सप्तमेश व शुक्र समराशि में हों, सातवां भाव भी सम राशि हो व पंचमेश और सप्तमेश सूर्य के निकट न हों या अन्य प्रकार से कमजोर न हों, तो सुयोग्य संतति प्राप्त होती है। यदि गुरु सप्तम भाव में हो, तो जातक जीवनसाथी से बहुत प्रेम करता है।
सप्तमेश यदि व्यय भाव में हो, तो पहली जीवनसाथी के होते हुए भी जातक दूसरा संबंध बनाता है। इस योग के कारण पति या पत्नी की मृत्यु भी हो सकती है।
यदि सप्तमेश पंचम या पंचमेश सप्तम भाव में हो, तो जातक शादी से संतुष्ट नहीं रहता।
स्त्री की कुंडली में सप्तम भाव में चंद्र व शनि के स्थित होने पर दूसरी शादी की संभावना रहती है जबकि पुरुष की कुंडली में ऐसा योग होने पर शादी या संतति नहीं होती है।
लग्न में बुध या केतु हो, तो पत्नी बीमार रहती है।
सातवें भाव में शनि और बुध स्थित हों, तो वैधव्य या विधुर योग बनता है।
यदि सातवें भाव में मारक राशि और नवांश में चंद्र हो, तो पत्नी दुष्ट होती है।
अब बात करते हैं विवाहेत्तर संबंध की
यदि सूर्य राहु से पीड़ित हो, तो जातक को अन्य व्यक्ति के साथ प्रणय के कारण बदनामी उठानी पड़ती है।
सूर्य मंगल से पीड़ित हो, तो वैवाहिक जीवन कष्टमय होता है। यदि शुक्र व मंगल नवांश में स्थान परिवर्तन योग में हों, तो जातक विवाहेतर संबंध बनाता है।
जातक के सप्तम भाव में यदि शुक्र, मंगल और चंद्र हों, तो वह अपने जीवनसाथी की स्वीकृति से विवाहेतर संबंध बनाता है जैसे की मेट्रो सिटी में #पार्टनर_स्वैपिंग आम चलन हो चुका है।
मंगल आवेश में वृद्धि करता है व शुक्र सम्मोहक पहलुओं से जोड़ता है।
शुक्र रोमांस व सम्मोहक पहलुओं का द्योतक है। यह लैंगिक सौहार्द, अनुरक्ति, विवाह, वंशवृद्धि, शारीरिक सौंदर्य और प्रेम का कारक है।
मंगल बल, ऊर्जा, आक्रामकता का द्योतक है। जब शुक्र के साथ मंगल की युति हो, तो #विषय_वासना की प्रचुरता रहती है।
मंगल यदि सातवें घर में हो तो जातक विवाहेतर संबंध स्थापित करता है, जिससे उसका वैवाहिक जीवन तनावयुक्त होता है।
मंगल यदि आठवें घर में हो तो जातक जीवनसाथी के साथ #धोखा करता है।
शुक्र व बुध यदि चौथे घर में हों तो जातक के विवाहेतर संबंध बनते हैं।
शुक्र यदि चौथे, आठवें या 12वें राशि में हो और मंगल से प्रभावित हो तो भी जातक के अन्यों के साथ संबंध होते हैं।
लग्नेश यदि दूसरे घर में अथवा दूसरे घर का स्वामी सातवें या दसवें घर में हो, तो भी जातक के किसी न किसी प्रकार से विवाहेतर संबंध बनते हैं।
शुक्र व मंगल व्यक्ति को भौतिकवादी, मनोरंजनप्रिय, शौकीन, आडंबरी और विषयी बनाते हैं।
यदि ये दोनों विपरीत दृष्टि दे रहे हों, तो विषय संबंधी कठिनाई और वैवाहिक जीवन में समस्या आती है। शुक्र यदि मंगल व राहु से युति कर रहा हो, तो वह जातक को व्यभिचारी बना देता है।
यदि अंर्त ग्रस्त क्षेत्र, गुरु, बुध या चंद्र न हो, तो जातक में कामुकता प्रबल होती है। शुक्र पुरुष की कुंडली और गुरु स्त्री की कुंडली में दांपत्य का कारक है।
👍7
दुनिया का यह एकमात्र अदभुत शिवलिंग: दो भागों का 'महाशिवरात्रि' पर होता है 'मिलन ..!!
#काठगड़_महादेव_काँगड़ा_हिमाचल 👏
दुनिया का यह एकमात्र शिवलिंग है जो कि मां पार्वती और भगवान शिव का प्रतिरूप माना जाता है। शिवलिंग दो भागों में बंटा हैं। यह गर्मियों में अलग हो जाते हैं तो महाशिवरात्रि के दिन दोनों का अदभुत मिलन होता हैं।
हिमाचल प्रदेश कांगड़ा जिला के इंदौरा में विश्व का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जो कि दो भागों में बंटा हुआ है। यह भगवान शिव और मां पार्वती का रूप माना जाता है। मान्यतानुसार ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के साथ ही शिवलिंग के बीच का अंतर बढ़ता और घटता रहता है।
गर्मियों के मौसम में शिवलिंग अलग होकर दो भागों में बंट जाता है जबकि सर्दियों के मौसम में पुन: एक रूप धारण कर लेता है।
यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है और काले व भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाने वाले शिवलिंग की ऊंचाई 7 से 8 फुट है जबकि मां पार्वती को समर्पित शिवलिंग की ऊंचाई तकरीबन 5 फुट है।
ये हैं काठगढ़ महादेव के प्रगट होने की कथा:
शिव पुराण की विधेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। श्रेष्ठता साबित करने के लिए दोनों दिव्य अस्त्र उठाए और युद्ध के लिए तैयार हो गए। यह देखकर शिव वहां आदिन अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। इससे दोनों देवताओं के दिव्य अस्त्र स्वयं की शांत हो गए।
ब्रह्मा और विष्णु दोनों स्तंभ का के आदि और अंत मूल जानने के लिए चल पड़े। भगवान विष्णु शुक्र का रूप धारण का स्तंभ का आदि जानने के लिए पाताल लोक की ओर चला गए, मगर उसका अंत नहीं तालाश पाए।
वहीं ब्रह्मा आकाश से यह कहकर केतकी फूल लेकर आ गए कि उन्होंने स्तंभ का अंत पा लिया है और यह केतकी का फूल उसके ऊपर लगा था। यह देखकर शिव वहां प्रकट हो गए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब उन्होंने कहा कि तुम दोनों समान हो। तभी से यह अग्नि तुल्य स्तंभ काठगढ़ के रूप में जाना जाने लगा।
काठगढ़ मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें तो ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब सिंकदर जब पंजाब पहुंचा तो उसने अपने करीब पांच हजार सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम करने के लिए कहा। उसने यहां देखा कि एक फकीर शिवलिंग की पूजा में मग्न है। सिंकदर ने फकीर से कहा कि आप मेरे साथ यूनान चलें, मैं तुम्हे ऐश्वर्य प्रदान करूंगा। फकीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और कहा कि आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मुझ तक आने दें।
फकीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टिले पर काठगढ़ मंदिर के निर्माण के लिए भूमि को समतल बनाया और चारदीवारी बनवाई। चारदीवारी के ब्यास नदी की ओर अष्ठकोणीय चबूतरे भी बनवाएं जो कि यहां आज भी हैं।
मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम के भाई भरत जब अपने ननिहाल कैकेयी देश कश्मीर जाते थे तो काठगढ़ शिवलिंग की पूजा किया करते थे।
शिवरात्रि पर्व पर यहां तीन दिनों का मेला लगता है। मान्यता है कि शिव पार्वती के इस अनूठे शिवलिंग के दर्शन करने से भक्तों के पारिवारिक और मानसिक दुखों का अंत होता है।
जय अर्धनारिश्वर महादेव
#काठगड़_महादेव_काँगड़ा_हिमाचल 👏
दुनिया का यह एकमात्र शिवलिंग है जो कि मां पार्वती और भगवान शिव का प्रतिरूप माना जाता है। शिवलिंग दो भागों में बंटा हैं। यह गर्मियों में अलग हो जाते हैं तो महाशिवरात्रि के दिन दोनों का अदभुत मिलन होता हैं।
हिमाचल प्रदेश कांगड़ा जिला के इंदौरा में विश्व का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जो कि दो भागों में बंटा हुआ है। यह भगवान शिव और मां पार्वती का रूप माना जाता है। मान्यतानुसार ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के साथ ही शिवलिंग के बीच का अंतर बढ़ता और घटता रहता है।
गर्मियों के मौसम में शिवलिंग अलग होकर दो भागों में बंट जाता है जबकि सर्दियों के मौसम में पुन: एक रूप धारण कर लेता है।
यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है और काले व भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाने वाले शिवलिंग की ऊंचाई 7 से 8 फुट है जबकि मां पार्वती को समर्पित शिवलिंग की ऊंचाई तकरीबन 5 फुट है।
ये हैं काठगढ़ महादेव के प्रगट होने की कथा:
शिव पुराण की विधेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। श्रेष्ठता साबित करने के लिए दोनों दिव्य अस्त्र उठाए और युद्ध के लिए तैयार हो गए। यह देखकर शिव वहां आदिन अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। इससे दोनों देवताओं के दिव्य अस्त्र स्वयं की शांत हो गए।
ब्रह्मा और विष्णु दोनों स्तंभ का के आदि और अंत मूल जानने के लिए चल पड़े। भगवान विष्णु शुक्र का रूप धारण का स्तंभ का आदि जानने के लिए पाताल लोक की ओर चला गए, मगर उसका अंत नहीं तालाश पाए।
वहीं ब्रह्मा आकाश से यह कहकर केतकी फूल लेकर आ गए कि उन्होंने स्तंभ का अंत पा लिया है और यह केतकी का फूल उसके ऊपर लगा था। यह देखकर शिव वहां प्रकट हो गए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब उन्होंने कहा कि तुम दोनों समान हो। तभी से यह अग्नि तुल्य स्तंभ काठगढ़ के रूप में जाना जाने लगा।
काठगढ़ मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें तो ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब सिंकदर जब पंजाब पहुंचा तो उसने अपने करीब पांच हजार सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम करने के लिए कहा। उसने यहां देखा कि एक फकीर शिवलिंग की पूजा में मग्न है। सिंकदर ने फकीर से कहा कि आप मेरे साथ यूनान चलें, मैं तुम्हे ऐश्वर्य प्रदान करूंगा। फकीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और कहा कि आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मुझ तक आने दें।
फकीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टिले पर काठगढ़ मंदिर के निर्माण के लिए भूमि को समतल बनाया और चारदीवारी बनवाई। चारदीवारी के ब्यास नदी की ओर अष्ठकोणीय चबूतरे भी बनवाएं जो कि यहां आज भी हैं।
मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम के भाई भरत जब अपने ननिहाल कैकेयी देश कश्मीर जाते थे तो काठगढ़ शिवलिंग की पूजा किया करते थे।
शिवरात्रि पर्व पर यहां तीन दिनों का मेला लगता है। मान्यता है कि शिव पार्वती के इस अनूठे शिवलिंग के दर्शन करने से भक्तों के पारिवारिक और मानसिक दुखों का अंत होता है।
जय अर्धनारिश्वर महादेव
👍10
भैरवनाथ के रहस्य एवं साधना
भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
भैरव उत्पत्ति👉 उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव। पुराणों में भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।
लोक देवता👉 लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।
पालिया महाराज👉 सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।
भैरव मंदिर👉 भैरव का प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर उज्जैन और काशी में है। काल भैरव का उज्जैन में और बटुक भैरव का लखनऊ में मंदिर है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।
काल भैरव👉 काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था। यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है।
काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।। ॐ भैरवाय नम:।।
बटुक भैरव👉 'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।'
अर्थात्👉 ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।
भैरव तंत्र(जिसे कुछ विद्वानजन विज्ञान भैरव तंत्र भी कहते हैं)👉 योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।
भैरव आराधना से शनि शांत👉 एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दांत और आंत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवित्रता वर्जित है।
भैरव चरित्र👉 भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।
भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
भैरव उत्पत्ति👉 उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव। पुराणों में भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।
लोक देवता👉 लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।
पालिया महाराज👉 सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।
भैरव मंदिर👉 भैरव का प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर उज्जैन और काशी में है। काल भैरव का उज्जैन में और बटुक भैरव का लखनऊ में मंदिर है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।
काल भैरव👉 काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था। यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है।
काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।। ॐ भैरवाय नम:।।
बटुक भैरव👉 'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।'
अर्थात्👉 ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।
भैरव तंत्र(जिसे कुछ विद्वानजन विज्ञान भैरव तंत्र भी कहते हैं)👉 योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।
भैरव आराधना से शनि शांत👉 एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दांत और आंत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवित्रता वर्जित है।
भैरव चरित्र👉 भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।
👍11👏1
उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है।
श्री भैरव के आठ रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-
1. असितांग भैरव,
2. चंड भैरव,
3. रूरू भैरव,
4. क्रोध भैरव,
5. उन्मत्त भैरव,
6. कपाल भैरव,
7. भीषण भैरव
8. संहार भैरव।
क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।
श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं।
दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है।
शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।
जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (१०८ बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से ४१ दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।
भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में १२ से ३ बजे का माना जाता है।
भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।
भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।
एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे।
मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है।
!! भैरव साधना !!
मंत्र संग्रह पूर्व-पीठिका
मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से !!
पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से !
जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ !!
श्री भैरव के आठ रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-
1. असितांग भैरव,
2. चंड भैरव,
3. रूरू भैरव,
4. क्रोध भैरव,
5. उन्मत्त भैरव,
6. कपाल भैरव,
7. भीषण भैरव
8. संहार भैरव।
क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।
श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं।
दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है।
शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।
जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (१०८ बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से ४१ दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।
भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में १२ से ३ बजे का माना जाता है।
भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।
भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।
एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे।
मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है।
!! भैरव साधना !!
मंत्र संग्रह पूर्व-पीठिका
मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से !!
पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से !
जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ !!
👍1
जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह सुख पाए !
शिव बोले, आपद्-उद्धारक मन्त्र, स्तोत्र मैं बतलाता,
देवि ! पाठ जप कर जिसका, है मानव सदा शान्ति-सुख पाता !!
*!! ध्यान !!*
*सात्विकः-*
बाल-स्वरुप वटुक भैरव-स्फटिकोज्जवल-स्वरुप है जिनका,
घुँघराले केशों से सज्जित-गरिमा-युक्त रुप है जिनका,
दिव्य कलात्मक मणि-मय किंकिणि नूपुर से वे जो शोभित हैं !
भव्य-स्वरुप त्रिलोचन-धारी जिनसे पूर्ण-सृष्टि सुरभित है !
कर-कमलों में शूल-दण्ड-धारी का ध्यान-यजन करता हूँ !
रात्रि-दिवस उन ईश वटुक-भैरव का मैं वन्दन करता हूँ !!
*राजसः-*
नवल उदीयमान-सविता-सम, भैरव का शरीर शोभित है,
रक्त-अंग-रागी, त्रैलोचन हैं जो, जिनका मुख हर्षित है !
नील-वर्ण-ग्रीवा में भूषण, रक्त-माल धारण करते हैं !
शूल, कपाल, अभय, वर-मुद्रा ले साधक का भय हरते हैं !
रक्त-वस्त्र बन्धूक-पुष्प-सा जिनका, जिनसे है जग सुरभित,
ध्यान करुँ उन भैरव का, जिनके केशों पर चन्द्र सुशोभित !!
*तामसः-*
तन की कान्ति नील-पर्वत-सी, मुक्ता-माल, चन्द्र धारण कर,
पिंगल-वर्ण-नेत्रवाले वे ईश दिगम्बर, रुप भयंकर !
डमरु, खड्ग, अभय-मुद्रा, नर-मुण्ड, शुल वे धारण करते,
अंकुश, घण्टा, सर्प हस्त में लेकर साधक का भय हरते !
दिव्य-मणि-जटित किंकिणि, नूपुर आदि भूषणों से जो शोभित,
भीषण सन्त-पंक्ति-धारी भैरव हों मुझसे पूजित, अर्चित !!
!! तांत्रोक्त भैरव कवच !!
〰〰〰〰〰〰〰
ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः !
पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु !!
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा !
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः !!
नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे !
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः !!
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा !
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः !!
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः !
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः !!
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु !
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च !!
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः !
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः !!
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः !
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा !!
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा !
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा !!
!! भैरव वशीकरण मन्त्र !!
〰〰〰〰〰〰〰〰
“ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक- नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ”
“ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा ”
“ॐ नमो काला गोरा भैरुं वीर, पर-नारी सूँ देही सीर ! गुड़ परिदीयी गोरख जाणी, गुद्दी पकड़ दे भैंरु आणी, गुड़, रक्त का धरि ग्रास, कदे न छोड़े मेरा पाश ! जीवत सवै देवरो, मूआ सेवै मसाण ! पकड़ पलना ल्यावे ! काला भैंरु न लावै, तो अक्षर देवी कालिका की आण ! फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा !”
ॐ भैरवाय नम: !!*
ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवायनम:!
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ !!
ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा !!
!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत् !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
विनियोग -
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः !!
अब बाए हाथ मे जल लेकर दाहिने हाथ की उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरीर के स्थानो पर स्पर्श करे !!
!! ऋष्यादिन्यास !!
〰〰〰〰〰〰
श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि !
त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे !
श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान
स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः !
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये !
सः शक्तये नमः पादयोः !
वं कीलकाय नमः नाभौ !
मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं
स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे !
मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे ! अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है !!
!! करन्यास !!
〰〰〰〰
ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः !
ऐं तर्जनीभ्यां नमः !
क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः !
क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः !
क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः !
सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः !
अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरीर के भाग पर स्पर्श करना है !!
!! हृदयादि न्यास !!
〰〰〰〰〰〰
आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः !
अजामल वधाय शिरसे स्वाहा !
लोकेश्वराय शिखायै वषट् !
स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम् !
मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट् !
श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट् !
रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः !!
शिव बोले, आपद्-उद्धारक मन्त्र, स्तोत्र मैं बतलाता,
देवि ! पाठ जप कर जिसका, है मानव सदा शान्ति-सुख पाता !!
*!! ध्यान !!*
*सात्विकः-*
बाल-स्वरुप वटुक भैरव-स्फटिकोज्जवल-स्वरुप है जिनका,
घुँघराले केशों से सज्जित-गरिमा-युक्त रुप है जिनका,
दिव्य कलात्मक मणि-मय किंकिणि नूपुर से वे जो शोभित हैं !
भव्य-स्वरुप त्रिलोचन-धारी जिनसे पूर्ण-सृष्टि सुरभित है !
कर-कमलों में शूल-दण्ड-धारी का ध्यान-यजन करता हूँ !
रात्रि-दिवस उन ईश वटुक-भैरव का मैं वन्दन करता हूँ !!
*राजसः-*
नवल उदीयमान-सविता-सम, भैरव का शरीर शोभित है,
रक्त-अंग-रागी, त्रैलोचन हैं जो, जिनका मुख हर्षित है !
नील-वर्ण-ग्रीवा में भूषण, रक्त-माल धारण करते हैं !
शूल, कपाल, अभय, वर-मुद्रा ले साधक का भय हरते हैं !
रक्त-वस्त्र बन्धूक-पुष्प-सा जिनका, जिनसे है जग सुरभित,
ध्यान करुँ उन भैरव का, जिनके केशों पर चन्द्र सुशोभित !!
*तामसः-*
तन की कान्ति नील-पर्वत-सी, मुक्ता-माल, चन्द्र धारण कर,
पिंगल-वर्ण-नेत्रवाले वे ईश दिगम्बर, रुप भयंकर !
डमरु, खड्ग, अभय-मुद्रा, नर-मुण्ड, शुल वे धारण करते,
अंकुश, घण्टा, सर्प हस्त में लेकर साधक का भय हरते !
दिव्य-मणि-जटित किंकिणि, नूपुर आदि भूषणों से जो शोभित,
भीषण सन्त-पंक्ति-धारी भैरव हों मुझसे पूजित, अर्चित !!
!! तांत्रोक्त भैरव कवच !!
〰〰〰〰〰〰〰
ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः !
पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु !!
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा !
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः !!
नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे !
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः !!
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा !
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः !!
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः !
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः !!
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु !
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च !!
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः !
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः !!
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः !
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा !!
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा !
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा !!
!! भैरव वशीकरण मन्त्र !!
〰〰〰〰〰〰〰〰
“ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक- नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ”
“ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा ”
“ॐ नमो काला गोरा भैरुं वीर, पर-नारी सूँ देही सीर ! गुड़ परिदीयी गोरख जाणी, गुद्दी पकड़ दे भैंरु आणी, गुड़, रक्त का धरि ग्रास, कदे न छोड़े मेरा पाश ! जीवत सवै देवरो, मूआ सेवै मसाण ! पकड़ पलना ल्यावे ! काला भैंरु न लावै, तो अक्षर देवी कालिका की आण ! फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा !”
ॐ भैरवाय नम: !!*
ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवायनम:!
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ !!
ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा !!
!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत् !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
विनियोग -
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः !!
अब बाए हाथ मे जल लेकर दाहिने हाथ की उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरीर के स्थानो पर स्पर्श करे !!
!! ऋष्यादिन्यास !!
〰〰〰〰〰〰
श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि !
त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे !
श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान
स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः !
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये !
सः शक्तये नमः पादयोः !
वं कीलकाय नमः नाभौ !
मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं
स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे !
मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे ! अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है !!
!! करन्यास !!
〰〰〰〰
ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः !
ऐं तर्जनीभ्यां नमः !
क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः !
क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः !
क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः !
सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः !
अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरीर के भाग पर स्पर्श करना है !!
!! हृदयादि न्यास !!
〰〰〰〰〰〰
आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः !
अजामल वधाय शिरसे स्वाहा !
लोकेश्वराय शिखायै वषट् !
स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम् !
मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट् !
श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट् !
रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः !!
👍3
अब दोनो हाथ जोड़कर ध्यान करे !!
(ध्यान मंत्र का उच्चारण करें !!
जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है ! वैसा ही आप भाव करें )
ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् !
अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम् !!
अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम् !
सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम् !!
मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः !
भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा !!
हिन्दी भावार्थ :- श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार (सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं ! उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं ! उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं ! उनके तीन नेत्र हैं ! चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण - माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है ! वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं ! आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।
मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है !
!! मानसोपचार पूजन !!
〰〰〰〰〰〰〰
लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !!
!! मंत्र !!
〰〰
ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम: !!
मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे !!
!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्त्रोत् !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
!! श्री मार्कण्डेय उवाच !!
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः !!
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं !
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् !!
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !!
!! श्री नन्दिकेश्वर उवाच !!
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये !!
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् !
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् !!
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् !
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् !!
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा !!
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने !
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च !!
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् !
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः !!
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् !!
!! विनियोग !!
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः !!
!! ध्यान !!
मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते !
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः !!
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् !
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः !!
!! स्त्रोत् -पाठ !!
〰〰〰〰〰
ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने !
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने !!
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने !
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः !
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः !!
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः !
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे !!
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने !
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः !!
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने !
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः !!
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः !
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः !!
(ध्यान मंत्र का उच्चारण करें !!
जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है ! वैसा ही आप भाव करें )
ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् !
अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम् !!
अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम् !
सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम् !!
मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः !
भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा !!
हिन्दी भावार्थ :- श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार (सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं ! उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं ! उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं ! उनके तीन नेत्र हैं ! चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण - माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है ! वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं ! आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।
मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है !
!! मानसोपचार पूजन !!
〰〰〰〰〰〰〰
लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !
सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !!
!! मंत्र !!
〰〰
ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम: !!
मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे !!
!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्त्रोत् !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
!! श्री मार्कण्डेय उवाच !!
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः !!
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं !
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् !!
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !!
!! श्री नन्दिकेश्वर उवाच !!
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये !!
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् !
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् !!
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् !
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् !!
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा !!
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने !
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च !!
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् !
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः !!
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् !!
!! विनियोग !!
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः !!
!! ध्यान !!
मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते !
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः !!
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् !
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः !!
!! स्त्रोत् -पाठ !!
〰〰〰〰〰
ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने !
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने !!
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने !
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः !
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः !!
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः !
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे !!
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने !
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः !!
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने !
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः !!
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः !
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः !!
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे !
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः !
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः !
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः !!
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः !
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः !!
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने !
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे !!
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः !
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः !!
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः !
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने !!
रुद्र- लोकेश- पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च !
नमोऽजामल- बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते !!
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने !
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः !!
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते !
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने !!
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः !
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः !!
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः !
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे !!
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः !
नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः !!
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे !
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः !!
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने !
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने !!
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः !
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः !!
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने !
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः !!
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने !
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने !!
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः !
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे !!
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः !
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने !!
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने !
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे !!
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने !
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने !!
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने !
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः !!
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् !
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा !!
!! फल-श्रुति !!
〰〰〰〰
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् !
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् !!
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते !
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् !!
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् !
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः !!
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः !
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः !
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः !
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !!
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् !
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव !!
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् !
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः !!
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः !
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण- कारकः !!
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा !
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं !!
!! श्री भैरव चालीसा !!
!! दोहा !!
〰〰〰〰〰〰〰
श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ !
चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ !!
श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल !
श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल !!
जय जय श्री काली के लाला !
जयति जयति काशी- कुतवाला !!
जयति बटुक भैरव जय हारी !
जयति काल भैरव बलकारी !!
जयति सर्व भैरव विख्याता !
जयति नाथ भैरव सुखदाता !!
भैरव रुप कियो शिव धारण !
भव के भार उतारण कारण !!
भैरव रव सुन है भय दूरी !
सब विधि होय कामना पूरी !!
शेष महेश आदि गुण गायो ! काशी-कोतवाल कहलायो !!
जटाजूट सिर चन्द्र विराजत !
बाला, मुकुट, बिजायठ साजत !!
कटि करधनी घुंघरु बाजत !
दर्शन करत सकल भय भाजत !!
जीवन दान दास को दीन्हो !
कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो !!
वसि रसना बनि सारद-काली !
दीन्यो वर राख्यो मम लाली !!
धन्य धन्य भैरव भय भंजन !
जय मनरंजन खल दल भंजन !!
कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा !
कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा !!
जो भैरव निर्भय गुण गावत !
अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत !!
रुप विशाल कठिन दुख मोचन !
क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन !!
अगणित भूत प्रेत संग डोलत !
बं बं बं शिव बं बं बोतल !!
रुद्रकाय काली के लाला !
महा कालहू के हो काला !!
बटुक नाथ हो काल गंभीरा !
श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा !!
करत तीनहू रुप प्रकाशा !
भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा !!
रत्न जड़ित कंचन सिंहासन !
व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन !!
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः !
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः !
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः !!
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः !
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः !!
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने !
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे !!
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः !
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः !!
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः !
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने !!
रुद्र- लोकेश- पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च !
नमोऽजामल- बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते !!
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने !
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः !!
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते !
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने !!
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः !
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः !!
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः !
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे !!
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः !
नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः !!
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे !
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः !!
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने !
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने !!
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः !
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः !!
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने !
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः !!
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने !
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने !!
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः !
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे !!
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः !
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने !!
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने !
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे !!
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने !
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने !!
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने !
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः !!
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् !
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा !!
!! फल-श्रुति !!
〰〰〰〰
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् !
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् !!
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते !
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् !!
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् !
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः !!
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः !
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः !
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः !
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !!
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् !
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव !!
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् !
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः !!
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः !
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण- कारकः !!
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा !
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं !!
!! श्री भैरव चालीसा !!
!! दोहा !!
〰〰〰〰〰〰〰
श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ !
चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ !!
श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल !
श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल !!
जय जय श्री काली के लाला !
जयति जयति काशी- कुतवाला !!
जयति बटुक भैरव जय हारी !
जयति काल भैरव बलकारी !!
जयति सर्व भैरव विख्याता !
जयति नाथ भैरव सुखदाता !!
भैरव रुप कियो शिव धारण !
भव के भार उतारण कारण !!
भैरव रव सुन है भय दूरी !
सब विधि होय कामना पूरी !!
शेष महेश आदि गुण गायो ! काशी-कोतवाल कहलायो !!
जटाजूट सिर चन्द्र विराजत !
बाला, मुकुट, बिजायठ साजत !!
कटि करधनी घुंघरु बाजत !
दर्शन करत सकल भय भाजत !!
जीवन दान दास को दीन्हो !
कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो !!
वसि रसना बनि सारद-काली !
दीन्यो वर राख्यो मम लाली !!
धन्य धन्य भैरव भय भंजन !
जय मनरंजन खल दल भंजन !!
कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा !
कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा !!
जो भैरव निर्भय गुण गावत !
अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत !!
रुप विशाल कठिन दुख मोचन !
क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन !!
अगणित भूत प्रेत संग डोलत !
बं बं बं शिव बं बं बोतल !!
रुद्रकाय काली के लाला !
महा कालहू के हो काला !!
बटुक नाथ हो काल गंभीरा !
श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा !!
करत तीनहू रुप प्रकाशा !
भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा !!
रत्न जड़ित कंचन सिंहासन !
व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन !!
👍3❤1
तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं !
विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं !!
जय प्रभु संहारक सुनन्द जय !
जय उन्नत हर उमानन्द जय !!
भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय !
बैजनाथ श्री जगतनाथ जय !!
महाभीम भीषण शरीर जय !
रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय !!
अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय !
श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय !!
निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय !
गहत अनाथन नाथ हाथ जय !!
त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय !
क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय !!
श्री वामन नकुलेश चण्ड जय !
कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय !!
रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर !
चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर !!
करि मद पान शम्भु गुणगावत !
चौंसठ योगिन संग नचावत !!
करत कृपा जन पर बहु ढंगा !
काशी कोतवाल अड़बंगा !!
देयं काल भैरव जब सोटा !
नसै पाप मोटा से मोटा !!
जाकर निर्मल होय शरीरा !
मिटै सकल संकट भव पीरा !!
श्री भैरव भूतों के राजा !
बाधा हरत करत शुभ काजा !!
ऐलादी के दुःख निवारयो !
सदा कृपा करि काज सम्हारयो !!
सुन्दरदास सहित अनुरागा !
श्री दुर्वासा निकट प्रयागा !!
श्री भैरव जी की जय लेख्यो !
सकल कामना पूरण देख्यो !!
!! दोहा !!
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार !
कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार !!
जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार !
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार !!
!! आरती श्री भैरव जी की !!
〰〰〰〰〰〰〰〰
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा !
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा !! जय !!
तुम्हीं पाप उद्घारक दुःख सिन्धु तारक !
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक !! जय !!
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी !
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी !! जय !!
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे !
चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे !! जय !!
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषा वलि तेरी !
कृपा करिये भैरव करिए नहीं देरी !! जय !!
पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु जमकावत !
बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत !! जय !!
बटकुनाथ की आरती जो कोई नर गावे !
कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे !! जय !!
!! साधना यंत्र !!
〰〰〰〰〰
श्री बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरव जी के चित्र के समीप रखें ! दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें ! चित्र या यंत्र के सामने माला, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं !!
!! साधना का समय !!
〰〰〰〰〰〰
इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष भैरवाष्टमी के दिन आरम्भ करना चाहिए शाम ७ से १० बजे के बीच नित्य ४१ दिन करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है !!
!! साधना की चेतावनी !!
〰〰〰〰〰〰〰
साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें !!
सहवास से दूर रहें ! वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें !!
यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें !!
!! साधना नियम व सावधानी !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
१ :- यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें !!
२ :- यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है !!
३ :- रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है !!
४ :- भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें !!
५ :- भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए !!
६ :- साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें !!
७ :- हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन- साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें।
विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं !!
जय प्रभु संहारक सुनन्द जय !
जय उन्नत हर उमानन्द जय !!
भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय !
बैजनाथ श्री जगतनाथ जय !!
महाभीम भीषण शरीर जय !
रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय !!
अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय !
श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय !!
निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय !
गहत अनाथन नाथ हाथ जय !!
त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय !
क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय !!
श्री वामन नकुलेश चण्ड जय !
कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय !!
रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर !
चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर !!
करि मद पान शम्भु गुणगावत !
चौंसठ योगिन संग नचावत !!
करत कृपा जन पर बहु ढंगा !
काशी कोतवाल अड़बंगा !!
देयं काल भैरव जब सोटा !
नसै पाप मोटा से मोटा !!
जाकर निर्मल होय शरीरा !
मिटै सकल संकट भव पीरा !!
श्री भैरव भूतों के राजा !
बाधा हरत करत शुभ काजा !!
ऐलादी के दुःख निवारयो !
सदा कृपा करि काज सम्हारयो !!
सुन्दरदास सहित अनुरागा !
श्री दुर्वासा निकट प्रयागा !!
श्री भैरव जी की जय लेख्यो !
सकल कामना पूरण देख्यो !!
!! दोहा !!
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार !
कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार !!
जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार !
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार !!
!! आरती श्री भैरव जी की !!
〰〰〰〰〰〰〰〰
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा !
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा !! जय !!
तुम्हीं पाप उद्घारक दुःख सिन्धु तारक !
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक !! जय !!
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी !
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी !! जय !!
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे !
चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे !! जय !!
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषा वलि तेरी !
कृपा करिये भैरव करिए नहीं देरी !! जय !!
पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु जमकावत !
बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत !! जय !!
बटकुनाथ की आरती जो कोई नर गावे !
कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे !! जय !!
!! साधना यंत्र !!
〰〰〰〰〰
श्री बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरव जी के चित्र के समीप रखें ! दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें ! चित्र या यंत्र के सामने माला, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं !!
!! साधना का समय !!
〰〰〰〰〰〰
इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष भैरवाष्टमी के दिन आरम्भ करना चाहिए शाम ७ से १० बजे के बीच नित्य ४१ दिन करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है !!
!! साधना की चेतावनी !!
〰〰〰〰〰〰〰
साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें !!
सहवास से दूर रहें ! वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें !!
यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें !!
!! साधना नियम व सावधानी !!
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
१ :- यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें !!
२ :- यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है !!
३ :- रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है !!
४ :- भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें !!
५ :- भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए !!
६ :- साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें !!
७ :- हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन- साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें।
👍10❤1