जो लोग
ने कभी ध्यान नहीं किया...जो निंद्रा में जीते है, वैसे लोग...
ऐसे लोग हमेशा या तो अतीत में होते हैं या भविष्य के सपने में होते हैं लेकिन वर्तमान में कभी नहीं होते हैं.
ऐसे लोग हमेशा विचार से ग्रसित रहते है...( Associated thinking ) से जीवन जीते हैं या हमेशा दिन में सपने देखने वाले (Day-dreamer ) होते हैं.
ऐसे लोग दूसरों के ध्यानाकर्षण ( Attentions) के बिना जीवन नहीं जी सकते हैं. अगर उन्हें दूसरों का ध्यान नहीं मिलता है, तो वे घुटन सि महसूस करते हैं. उन्हें हमेशा दूसरों की हाजरी की जरूरत होती है . वे दूसरों के बिना जी नहीं सकते , अकेला रहेना उनकी बस की बात नहीं है .
वे हमेशा किसी काल्पनिक भय (Immaginary Fear) में जीते हैं.
ऐसे लोग हमेशा कुछ और बनने की कोशिश में रहते है.. जो कुछ वे हैं, उसमें वे खुश नहीं हैं.
वे सबके साथ, आदमी हो या वस्तु हो उनके प्रभाव में जीते है.... और फिर उनके बिना जीना उनके लिए कठिन हो जाता है. करीब करीब सब लोग दूसरे के प्रभाव में ही अपनी जिन्दगी पूरी कर देते है .
ने कभी ध्यान नहीं किया...जो निंद्रा में जीते है, वैसे लोग...
ऐसे लोग हमेशा या तो अतीत में होते हैं या भविष्य के सपने में होते हैं लेकिन वर्तमान में कभी नहीं होते हैं.
ऐसे लोग हमेशा विचार से ग्रसित रहते है...( Associated thinking ) से जीवन जीते हैं या हमेशा दिन में सपने देखने वाले (Day-dreamer ) होते हैं.
ऐसे लोग दूसरों के ध्यानाकर्षण ( Attentions) के बिना जीवन नहीं जी सकते हैं. अगर उन्हें दूसरों का ध्यान नहीं मिलता है, तो वे घुटन सि महसूस करते हैं. उन्हें हमेशा दूसरों की हाजरी की जरूरत होती है . वे दूसरों के बिना जी नहीं सकते , अकेला रहेना उनकी बस की बात नहीं है .
वे हमेशा किसी काल्पनिक भय (Immaginary Fear) में जीते हैं.
ऐसे लोग हमेशा कुछ और बनने की कोशिश में रहते है.. जो कुछ वे हैं, उसमें वे खुश नहीं हैं.
वे सबके साथ, आदमी हो या वस्तु हो उनके प्रभाव में जीते है.... और फिर उनके बिना जीना उनके लिए कठिन हो जाता है. करीब करीब सब लोग दूसरे के प्रभाव में ही अपनी जिन्दगी पूरी कर देते है .
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*मनको विशुद्ध करो*
यदि सुख और शान्ति पाना चाहते हो तो पहले मनमें सुख और शान्तिकी मूर्तियाँ स्थापन करनेकी चेष्टा करो। अपने मनके विचारके अनुसार वस्तु तुम्हें प्राप्त होगी और तुम भी वैसे ही बन जाओगे। तुम यदि निश्चय कर लो कि पाप-ताप न तो तुम्हारे अन्दर हैं और न कभी तुम्हारे समीप आ सकते हैं तो निश्चय समझो कि पाप-ताप तुम्हारे पाससे भाग जायँगे—इतना ही नहीं, तुम जहाँ भी जाओगे वहाँ दूसरोंके पाप-तापोंको भी भगा सकोगे।
यदि सुख और शान्ति पाना चाहते हो तो पहले मनमें सुख और शान्तिकी मूर्तियाँ स्थापन करनेकी चेष्टा करो। अपने मनके विचारके अनुसार वस्तु तुम्हें प्राप्त होगी और तुम भी वैसे ही बन जाओगे। तुम यदि निश्चय कर लो कि पाप-ताप न तो तुम्हारे अन्दर हैं और न कभी तुम्हारे समीप आ सकते हैं तो निश्चय समझो कि पाप-ताप तुम्हारे पाससे भाग जायँगे—इतना ही नहीं, तुम जहाँ भी जाओगे वहाँ दूसरोंके पाप-तापोंको भी भगा सकोगे।
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शास्त्रों में परमात्मा के तीन स्वरुप बताये गये हैं "सत, चित, आनन्द" सत प्रगट रुप से सर्वत्र है चित मौन तथा आनन्द अप्रगट है।
जड़ वस्तुओं में सत तथा चित है परन्तु आनन्द नहीं है जीव में सत और चित प्रगटता है परन्तु आनन्द अप्रगट रहता है अर्थात अप्रगट रुप से रहता है, अव्यक्तरुप से है वैसे आनन्द अपने ही अन्दर ही फिर भी आनन्द को हम बाहर खोजते हैं।
हम देह , धनसंपत्ति आदि में आनन्द खोजते हैं किन्तु आनन्द तो हमारे अन्दर ही है, जैसे दूध में मक्खन रहता है फिर भी दिखायी नहीं देता किन्तु दूध से दही बनाकर मंथन करने पर मक्खन दिखायी पड़ता है ठीक वैसे ही हमें भी मनोमंथन करके आनन्द को प्रकट करना है।
जीव है तो ईश्वर का ही तो भी ईश्वर को पहचानने का यत्न नहीं करता, इसी कारण आनन्द नहीं मिलता है।
आनन्द के दो रुप है - "साधनजन्य एवं स्वयंसिद्ध" साधनजन्य आनन्द अर्थात विषयजन्य आनन्द , जो साधन या विषय के नाश होने पर उस आनन्द का भी नाश होता है और होगा, योगियों के पास कुछ भी साधन या विषय नहीं होता फिर भी उनको आनन्द है अर्थात सदा आनन्द से रहते हैं , इससे सिद्ध होता है आनन्द अन्दर ही है, सत चित आनन्द ईश्वर में परिपूर्ण है।
परमात्मा परिपूर्ण सतरुप , परिपूर्ण चितरुप , परिपूर्णरुप आनन्दरुप हैं, परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्ण आनन्द स्वरुप हैं, बिना ईश्वर के संसार अपूर्ण है, ईश्वर का अंश जीवात्मा भी अपूर्ण है।
जीव में चिद् अंश है फिर भी परिपूर्ण नहीं है, जीव को यदि आनन्द रुप होना हो तो उसे सच्चिदानन्द का आश्रय लेना होगा, जीव जब तक परिपूर्ण नहीं होता तब तक उसे शान्ति नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता, संसार का प्रत्येक पदार्थ परिणाम में विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं है, जीव जब ईश्वर से मिलता है तभी वह परिपूर्ण होता है।
जड़ वस्तुओं में सत तथा चित है परन्तु आनन्द नहीं है जीव में सत और चित प्रगटता है परन्तु आनन्द अप्रगट रहता है अर्थात अप्रगट रुप से रहता है, अव्यक्तरुप से है वैसे आनन्द अपने ही अन्दर ही फिर भी आनन्द को हम बाहर खोजते हैं।
हम देह , धनसंपत्ति आदि में आनन्द खोजते हैं किन्तु आनन्द तो हमारे अन्दर ही है, जैसे दूध में मक्खन रहता है फिर भी दिखायी नहीं देता किन्तु दूध से दही बनाकर मंथन करने पर मक्खन दिखायी पड़ता है ठीक वैसे ही हमें भी मनोमंथन करके आनन्द को प्रकट करना है।
जीव है तो ईश्वर का ही तो भी ईश्वर को पहचानने का यत्न नहीं करता, इसी कारण आनन्द नहीं मिलता है।
आनन्द के दो रुप है - "साधनजन्य एवं स्वयंसिद्ध" साधनजन्य आनन्द अर्थात विषयजन्य आनन्द , जो साधन या विषय के नाश होने पर उस आनन्द का भी नाश होता है और होगा, योगियों के पास कुछ भी साधन या विषय नहीं होता फिर भी उनको आनन्द है अर्थात सदा आनन्द से रहते हैं , इससे सिद्ध होता है आनन्द अन्दर ही है, सत चित आनन्द ईश्वर में परिपूर्ण है।
परमात्मा परिपूर्ण सतरुप , परिपूर्ण चितरुप , परिपूर्णरुप आनन्दरुप हैं, परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्ण आनन्द स्वरुप हैं, बिना ईश्वर के संसार अपूर्ण है, ईश्वर का अंश जीवात्मा भी अपूर्ण है।
जीव में चिद् अंश है फिर भी परिपूर्ण नहीं है, जीव को यदि आनन्द रुप होना हो तो उसे सच्चिदानन्द का आश्रय लेना होगा, जीव जब तक परिपूर्ण नहीं होता तब तक उसे शान्ति नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता, संसार का प्रत्येक पदार्थ परिणाम में विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं है, जीव जब ईश्वर से मिलता है तभी वह परिपूर्ण होता है।
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।। पुरुषोत्तम स्तोत्रम ।।
नमस्ते भगवान देव, लोकनाथ जगतपते।
क्षीरोदवासिनं देवं शेषभोगानुशायिनम्।।
हे भगवान देव, हे जगत के स्वामी, हे क्षीर समुद्र में वास करने वाले, हे शेषनाग के आराम करने वाले,
वरं वरेण्यं वरदं कर्तारं अकृतं प्रभुं।
विश्वेश्वरं आजं विष्णुं सर्वज्ञं अपराजितम्।।
जो सबसे श्रेष्ठ हैं, जिसे श्रेष्ठ गुणों से युक्त माना गया है, जो वरदान देने वाला है, जो सृष्टि कर्ता है, जो विश्वेश्वर है, जो सदा विष्णु रूप में उपस्थित है, जो सब जानने वाला है, जो पराजयी नहीं हो सकता,
नीलोत्पलदलश्यामं पुंडरीकनिबेक्षणम्।
सर्वज्ञं निर्गुणं शान्तं जगद्दातारव्ययम्।।
जो नीलकंठ के समान नीले और उत्पल के पत्तों वाला है, जिसकी आंखें पुंडरीक फूल की तरह हैं, जो सब जानने वाला है, जो निर्गुण है, जो शांत है, जो संसार के पालक और अविनाशी है,
सर्वलोकविदातारं सर्वलोकसुखावहम्।
पुराणं पुरुषं वेद्यं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।।
जो सब लोकों के ज्ञाता हैं, सब लोकों को सुख प्रदान करने वाला है, पुराण हैं, पुरुष हैं, जो ज्ञात होने योग्य हैं, जो व्यक्त और अव्यक्त हैं, जो सनातन हैं,
परवरानां सृष्टारां लोकनाथं जगद्गुरुम्।
श्रीवत्सोरस्कसंयुक्तं वनमाला विभूषितम्।।
जो सब ऊँचा हैं, जो सब सृष्टियों के पालक हैं, जगद्गुरु हैं, जो श्रीवत्स मार्क और वनमाला से सुशोभित हैं,
पितवस्त्रं चतुर्बाहुं शंखचक्रगदाधरम्।
हारक्रीयूरसंयुक्तं मुक्तांगदधारिणम्।।
जो पितामह के वस्त्र को धारण करते हैं, चार हाथों वाले हैं, शंख, चक्र, गदा और पुरुषोत्तम सेतु को संयुक्त रूप में धारण करते हैं, मुक्तांगद धारी हुए हैं,
सर्वलक्षणसम्पूर्णं सर्वेन्द्रियविवर्जीतम्।
कूटस्थं अचलं सूक्ष्मं ज्योतिरूपं सनातनम्।।
जो सभी लक्षणों से सम्पूर्ण हैं, सभी इंद्रियों से रहित हैं, कूटस्थ हैं, अचल हैं, सूक्ष्म हैं, ज्योति के समान हैं, सनातन हैं,
भावाभावं विनिर्मुक्तं व्यापिनं प्रकृतेः परम्।
नमस्यामि जगन्नाथम् ईश्वरं सुखदं प्रभुम्।।
जो भावों और अभावों से मुक्त हैं, प्रकृति के परे व्याप्त हैं, जगन्नाथ जी को नमस्कार करते हैं, जो ईश्वर हैं, सुखदायी हैं, प्रभु हैं।
इत्येवं धर्मराजस्तु पुरन्याक्रोध सन्निधौ।
स्तुत्वा नाना विधैः स्तोत्रैः प्रणामं अकरोद तदा।।
इस प्रकार, यमराज ने पुरंयाक्रोध के समीप में भगवान की प्रशंसा करते हुए विभिन्न प्रकार के स्तोत्रों द्वारा प्रणाम किया।
नमस्ते भगवान देव, लोकनाथ जगतपते।
क्षीरोदवासिनं देवं शेषभोगानुशायिनम्।।
हे भगवान देव, हे जगत के स्वामी, हे क्षीर समुद्र में वास करने वाले, हे शेषनाग के आराम करने वाले,
वरं वरेण्यं वरदं कर्तारं अकृतं प्रभुं।
विश्वेश्वरं आजं विष्णुं सर्वज्ञं अपराजितम्।।
जो सबसे श्रेष्ठ हैं, जिसे श्रेष्ठ गुणों से युक्त माना गया है, जो वरदान देने वाला है, जो सृष्टि कर्ता है, जो विश्वेश्वर है, जो सदा विष्णु रूप में उपस्थित है, जो सब जानने वाला है, जो पराजयी नहीं हो सकता,
नीलोत्पलदलश्यामं पुंडरीकनिबेक्षणम्।
सर्वज्ञं निर्गुणं शान्तं जगद्दातारव्ययम्।।
जो नीलकंठ के समान नीले और उत्पल के पत्तों वाला है, जिसकी आंखें पुंडरीक फूल की तरह हैं, जो सब जानने वाला है, जो निर्गुण है, जो शांत है, जो संसार के पालक और अविनाशी है,
सर्वलोकविदातारं सर्वलोकसुखावहम्।
पुराणं पुरुषं वेद्यं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।।
जो सब लोकों के ज्ञाता हैं, सब लोकों को सुख प्रदान करने वाला है, पुराण हैं, पुरुष हैं, जो ज्ञात होने योग्य हैं, जो व्यक्त और अव्यक्त हैं, जो सनातन हैं,
परवरानां सृष्टारां लोकनाथं जगद्गुरुम्।
श्रीवत्सोरस्कसंयुक्तं वनमाला विभूषितम्।।
जो सब ऊँचा हैं, जो सब सृष्टियों के पालक हैं, जगद्गुरु हैं, जो श्रीवत्स मार्क और वनमाला से सुशोभित हैं,
पितवस्त्रं चतुर्बाहुं शंखचक्रगदाधरम्।
हारक्रीयूरसंयुक्तं मुक्तांगदधारिणम्।।
जो पितामह के वस्त्र को धारण करते हैं, चार हाथों वाले हैं, शंख, चक्र, गदा और पुरुषोत्तम सेतु को संयुक्त रूप में धारण करते हैं, मुक्तांगद धारी हुए हैं,
सर्वलक्षणसम्पूर्णं सर्वेन्द्रियविवर्जीतम्।
कूटस्थं अचलं सूक्ष्मं ज्योतिरूपं सनातनम्।।
जो सभी लक्षणों से सम्पूर्ण हैं, सभी इंद्रियों से रहित हैं, कूटस्थ हैं, अचल हैं, सूक्ष्म हैं, ज्योति के समान हैं, सनातन हैं,
भावाभावं विनिर्मुक्तं व्यापिनं प्रकृतेः परम्।
नमस्यामि जगन्नाथम् ईश्वरं सुखदं प्रभुम्।।
जो भावों और अभावों से मुक्त हैं, प्रकृति के परे व्याप्त हैं, जगन्नाथ जी को नमस्कार करते हैं, जो ईश्वर हैं, सुखदायी हैं, प्रभु हैं।
इत्येवं धर्मराजस्तु पुरन्याक्रोध सन्निधौ।
स्तुत्वा नाना विधैः स्तोत्रैः प्रणामं अकरोद तदा।।
इस प्रकार, यमराज ने पुरंयाक्रोध के समीप में भगवान की प्रशंसा करते हुए विभिन्न प्रकार के स्तोत्रों द्वारा प्रणाम किया।
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बार-बार नहिं पाइये मनुष-जनम की मौज
“प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये ।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥“
सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्माको तथा संत-महापुरुषोंको सादर अभिवादन करके कुछ बातें कहनेकी चेष्टा करता हूँ । इन बातोंमें जो आपको अच्छी लगें, सुन्दर दीखें, उन बातोंको तो संत-महात्माओंकी, शास्त्रोंकी और भगवान्की माननी चाहिये तथा जो त्रुटियाँ हों, उन्हें मेरी । त्रुटियोंकी ओर ध्यान न देकर अच्छी बातोंकी ओर ध्यान दें, कारण, जो महापुरुषोंके और भगवान्के वचन हैं, वे मेरे और आपके लिये परम हित करनेवाले हैं, उन वचनोंके अनुसार आचरण करनेसे निश्चित कल्याण होता है । आप आचरण करेंगे तो आपका हित और कल्याण है तथा मैं करूँगा तो मेरा कल्याण है ।
सबसे पहली एक विशेष ध्यान देनेकी बात यह है कि यह मानव-जीवनका समय बहुत ही दुर्लभ है और बड़ा भारी कीमती है, श्रीमद्भागवतमें बताया है‒
“दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ॥“
‘दुर्लभो मानुषो देहः’‒यह मनुष्यसम्बन्धी देह‒यह मानव-शरीर अत्यन्त दुर्लभ है । इसकी प्राप्तिके लिये बड़े-बड़े देवता भी ललचाते रहते हैं; क्योंकि इससे बड़ी-से-बड़ी उन्नति हो सकती है । परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है जीवका कल्याण हो सकता है और सदाके लिये उसे परम शान्तिकी प्राप्ति हो सकती है । ऐसे दुर्लभ शरीरको प्राप्त करके जो इसे व्यर्थ ही खो देता है, उसे फिर बड़ा पश्चात्ताप करना पड़ता है; क्योंकि यह सर्वथा अलभ्य, अमूल्य है । अतः इस मनुष्य-जीवनके एक-एक क्षणको ऊँचे-से-ऊँचे काममें बितानेकी चेष्टा करनी चाहिये । समयके समान कोई अमूल्य वस्तु नहीं है । संसारमें लोग पैसोंको बड़ा कीमती समझते हैं, आवश्यक समझते हैं, किंतु विचार कीजिये, जीवनका समय देनेसे तो ‘पैसे’ मिल जाते हैं, पर पैसे देनेसे यह ‘समय’ नहीं मिलता है हमारे जीवनके लिये हमारे पास हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये रहनेपर भी यदि हमारी आयु नहीं है तो हमें मरना पड़ता है, किंतु यदि हमारी आयु बाकी हो और हमारे पास एक भी कौड़ी न हो, तो भी हम जी सकते हैं।
नारायण ! नारायण !!
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अपनी बुराई देखनेका ज्ञान अपनेमें है, पर असावधानीके कारण उसका उपयोग हम दूसरोंकी बुराई देखनेमें करते रहते हैं, जिसका बहुत बड़ा भाग अपनी कल्पना ही होती है, वास्तविक नहीं |
वास्तविक बुराईका ज्ञान तो अपने सम्बन्धमें ही सम्भव है और उसीसे साधक सदाके लिये बुराईरहित होकर सभीके लिये उपयोगी हो जाता है |
बुराई-रहित होना सत्संगसे साध्य है और भला हो जाना दैवी विधान है | भलाई सीखी नहीं जाती, सिखायी नहीं जाती | बुराई-रहित होनेसे भलाई स्वतः अभिव्यक्त होती है | बुराई-रहित होनेसे भलाई व्यापक होती है |
हरिःशरणम् ! हरिःशरणम् !! हरिःशरणम् !!!
वास्तविक बुराईका ज्ञान तो अपने सम्बन्धमें ही सम्भव है और उसीसे साधक सदाके लिये बुराईरहित होकर सभीके लिये उपयोगी हो जाता है |
बुराई-रहित होना सत्संगसे साध्य है और भला हो जाना दैवी विधान है | भलाई सीखी नहीं जाती, सिखायी नहीं जाती | बुराई-रहित होनेसे भलाई स्वतः अभिव्यक्त होती है | बुराई-रहित होनेसे भलाई व्यापक होती है |
हरिःशरणम् ! हरिःशरणम् !! हरिःशरणम् !!!
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भक्त निर्भर होकर बस, एक ही काम करता है, वह है प्रभु का अखंड चिंतन। क्या, क्यों, कब--इनसब बातोंकी स्मृति करने वाला चित्त रहही नहींजाता। चित्त एकमात्र हरि में रमता रहताहै। जहांतक निर्भरता नहींहोती,वहींतक अकर्मण्यता रहती है। पाप से छूटना, अमुक कार्य न करना-इनसब बातों की भी उसे परवाह नहीं होती। छोटा शिशु यह नहीं जानता कि वह सांप है अथवा मखमल की कोई चीज, आग है या चमकीली और कोई वस्तु। परंतु उसकी रक्षा का पूरा - पूरा भार माता पर रहता है; क्योंकि वह मां पर निर्भर है। इसलिए जिस कर्मसे भगवान बालक की हानि हो सकती है, वह ऐसे प्रत्येक कर्म से उसे बचाती है।मां इस बात का बराबर ध्यान रखती है इसे किसी प्रकार कष्ट न हो, कोई दुःख न हो।उसी प्रकार यदि हम एकांत-भाव से भगवान् पर निर्भर हो जाएं तो स्वयं भगवान ही अपने ऊपर हमारे समस्त योग क्षेम का भार लिए रहते हैं।_*
जय श्रीराधेय!
जय श्रीराधेय!
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कहानी का समय
बुरी स्मृतियाँ
दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़े भाई कोई वस्तु लाते तो भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाते, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।
पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था ? दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया। उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।
वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।
पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लगा जाए इधर विवाह के भी बहित ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।
किसी ने कहा-उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है। छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि ''आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यही आने के लिए तैयार कर दे।''
दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा क्यों तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है ? तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो ?
बड़ा भाई बोला- "मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।'' संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।'' सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा, उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया था ?
बडा भाई मौन ? कहा कुछ याद नहीं पडता़ कौन सा विषय था ?
संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।
पर प्रयत्न करने पर उसे वह विषय याद न आया।
संत बोले 'देखो! मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रहीं और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे है। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्सग में आने का लाभ ही क्या रहा? अतः कल से यहाँ मत आया करो।''
अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।
उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।''
बुरी स्मृतियाँ
दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़े भाई कोई वस्तु लाते तो भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाते, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।
पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था ? दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया। उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।
वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।
पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लगा जाए इधर विवाह के भी बहित ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।
किसी ने कहा-उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है। छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि ''आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यही आने के लिए तैयार कर दे।''
दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा क्यों तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है ? तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो ?
बड़ा भाई बोला- "मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।'' संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।'' सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा, उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया था ?
बडा भाई मौन ? कहा कुछ याद नहीं पडता़ कौन सा विषय था ?
संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।
पर प्रयत्न करने पर उसे वह विषय याद न आया।
संत बोले 'देखो! मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रहीं और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे है। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्सग में आने का लाभ ही क्या रहा? अतः कल से यहाँ मत आया करो।''
अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।
उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।''
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*अपने अनुभव का आदर*
शरीर के साथ अपना सम्बन्ध मानने के कारण हम शरीर के सुख से अपने को सुखी मानते हैं | शरीर का मान होने से हम अपना मान मानते हैं | शरीर की बड़ाई होने से हम अपनी बड़ाई मानते हैं | शरीर के निरादर से हम अपना निरादर मानते हैं | शरीर के अपमान से हम अपना अपमान मानते हैं | वास्तव में शरीर को कोई पीस डाले, तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ता | एक दिन इस शरीर को लोग जला ही देंगे, पर हमारा बाल भी बाँका नहीं होगा | हमारे स्वरूप का किंचिन्मात्र भी हिस्सा नहीं जलेगा, नष्ट नहीं होगा | अत: संसार हमारा निरादर कर दे, अपमान कर दे, निन्दा कर दे, दुःख दे दे, शरीर का टुकड़ा-टुकड़ा कर दे तो क्या हो जायगा ? गीता ने कहा है – ‘यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते’ (६/२२) अर्थात परमात्मस्वरूप आत्यन्तिक सुख में स्थित मनुष्य बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं किया जा सकता | किसी कारण से शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ, तो भी वह अपने स्वरूप से विचलित नहीं होता, महान आनन्द से इधर-उधर नहीं होता | हाँ, शरीर को पीड़ा हो सकती है, मूर्च्छा आ सकती है, पर दुःख नहीं हो सकता | इतना आनन्द सांसारिक वस्तुओं से कभी नहीं हो सकता | परंतु अपने मैं और शरीर दो हैं – इस बात का अनादर कर दिया और शरीर के साथ एक होकर उसके दुःख में दुःख और सुख में सुख मान लिया; इसको कृपा करके न मानें |
शरीर के साथ अपना सम्बन्ध मानने के कारण हम शरीर के सुख से अपने को सुखी मानते हैं | शरीर का मान होने से हम अपना मान मानते हैं | शरीर की बड़ाई होने से हम अपनी बड़ाई मानते हैं | शरीर के निरादर से हम अपना निरादर मानते हैं | शरीर के अपमान से हम अपना अपमान मानते हैं | वास्तव में शरीर को कोई पीस डाले, तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ता | एक दिन इस शरीर को लोग जला ही देंगे, पर हमारा बाल भी बाँका नहीं होगा | हमारे स्वरूप का किंचिन्मात्र भी हिस्सा नहीं जलेगा, नष्ट नहीं होगा | अत: संसार हमारा निरादर कर दे, अपमान कर दे, निन्दा कर दे, दुःख दे दे, शरीर का टुकड़ा-टुकड़ा कर दे तो क्या हो जायगा ? गीता ने कहा है – ‘यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते’ (६/२२) अर्थात परमात्मस्वरूप आत्यन्तिक सुख में स्थित मनुष्य बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं किया जा सकता | किसी कारण से शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ, तो भी वह अपने स्वरूप से विचलित नहीं होता, महान आनन्द से इधर-उधर नहीं होता | हाँ, शरीर को पीड़ा हो सकती है, मूर्च्छा आ सकती है, पर दुःख नहीं हो सकता | इतना आनन्द सांसारिक वस्तुओं से कभी नहीं हो सकता | परंतु अपने मैं और शरीर दो हैं – इस बात का अनादर कर दिया और शरीर के साथ एक होकर उसके दुःख में दुःख और सुख में सुख मान लिया; इसको कृपा करके न मानें |
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स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित )
हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। इसके लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं... पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।
श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है, तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है।
प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहन विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बिना जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों पृष्टभूमि में विज्ञान निहित है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है।
मन्त्र-1👉 आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥
अर्थ 👉 हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।
मन्त्र-2👉 देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥
अर्थ 👉 यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
मन्त्र-3👉 तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।
अर्थ 👉 हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।
मन्त्र-4👉 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः ।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
अर्थ 👉 वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
मन्त्र-5👉 तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
अर्थ 👉 हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।
मन्त्र-6👉 स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
अर्थ 👉 महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
मन्त्र-7👉 पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
अर्थ 👉 चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।
हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। इसके लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं... पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।
श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है, तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है।
प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। यह एक गहन विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बिना जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों पृष्टभूमि में विज्ञान निहित है। हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है।
मन्त्र-1👉 आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥
अर्थ 👉 हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।
मन्त्र-2👉 देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥
अर्थ 👉 यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
मन्त्र-3👉 तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।
अर्थ 👉 हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।
मन्त्र-4👉 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः ।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
अर्थ 👉 वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
मन्त्र-5👉 तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
अर्थ 👉 हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।
मन्त्र-6👉 स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
अर्थ 👉 महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
मन्त्र-7👉 पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
अर्थ 👉 चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।
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मन्त्र-8👉 भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
अर्थ 👉 हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।
मन्त्र-9👉 शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥
अर्थ 👉 हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र, पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।
मन्त्र-10👉 अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥
अर्थ 👉 अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
मन्त्र-11👉 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थ 👉 द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
अर्थ 👉 हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।
मन्त्र-9👉 शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥
अर्थ 👉 हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र, पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।
मन्त्र-10👉 अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥
अर्थ 👉 अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
मन्त्र-11👉 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थ 👉 द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।
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*बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं ।*
*गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥*
*जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं ।*
*नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥*
भावार्थ
*आप अपरिमित बलवाले हैं , अनादि , अजन्मा , अव्यक्त ( निराकार ) , एक अगोचर ( अलक्ष्य ) , गोविंद ( वेद वाक्यों द्वारा जानने योग्य ) , इंद्रियों से अतीत , ( जन्म - मरण , सुख - दुःख , हर्ष-शोकादि ) द्वंद्वों को हरने वाले , विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार हैं तथा जो संत राम मंत्र को जपते हैं , उन अनन्त सेवकों के मन को आनंद देने वाले हैं । उन निष्कामप्रिय ( निष्कामजनों के प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय ) तथा काम आदि दुष्टों ( दुष्ट वृत्तियों ) के दल का दलन करने वाले श्री रामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ।
जय श्रीराम
*गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥*
*जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं ।*
*नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥*
भावार्थ
*आप अपरिमित बलवाले हैं , अनादि , अजन्मा , अव्यक्त ( निराकार ) , एक अगोचर ( अलक्ष्य ) , गोविंद ( वेद वाक्यों द्वारा जानने योग्य ) , इंद्रियों से अतीत , ( जन्म - मरण , सुख - दुःख , हर्ष-शोकादि ) द्वंद्वों को हरने वाले , विज्ञान की घनमूर्ति और पृथ्वी के आधार हैं तथा जो संत राम मंत्र को जपते हैं , उन अनन्त सेवकों के मन को आनंद देने वाले हैं । उन निष्कामप्रिय ( निष्कामजनों के प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय ) तथा काम आदि दुष्टों ( दुष्ट वृत्तियों ) के दल का दलन करने वाले श्री रामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ।
जय श्रीराम
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जीवन की हर स्वाँस में ईश्वर का ही रंग भरा है, कहीं सूर्य की ताजी लालिमा कही किरणों के संग सज़ा है। कहीं मधुर-मधुर अनगित रंगो में खुद को पिरोया है तितलियाँ में, तो कहीं मेघों के बीच से कौंधती कड़कती काली बिजलियों में, कहीं सघन अविराम शान्ति चेतन राग समेटे निस्तब्ध निशा में, तो कहीं उदित है अविरल विराट नित् व्योम में, कही खेतों में लहलहाती फसलों के हरे सुनहरे रंगो में, कही सरसों और सूरजमुखी की पीली-पीली रंग अंकिया में। हर ओर ही हर रंग में बस ईश्वर का ही रंग दिखा है।
ईश्वर ने वरदान स्वरुप ही ये परम दिव्य जीवन रचा है। परम आभारी है ये संपूर्ण जीव जगत प्रभु तेरा ! तू सब का है, सब में है, सभी तुझ में ही हैं, तू ही सब है और सभी तेरे हैं।
।। श्री परमात्मने नमः ।।
ईश्वर ने वरदान स्वरुप ही ये परम दिव्य जीवन रचा है। परम आभारी है ये संपूर्ण जीव जगत प्रभु तेरा ! तू सब का है, सब में है, सभी तुझ में ही हैं, तू ही सब है और सभी तेरे हैं।
।। श्री परमात्मने नमः ।।
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*यह कथन सत्य से परिपूर्ण है कि- "ईश्वर उसकी मदद करता है जो अपनी मदद आप करता है।"* इस कथन के पीछे सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक के समय का मनुष्य जाति का गहरा अनुभव है। *जो अपने पैरों पर खड़ा हुआ उसने उन्नति की और जो हताश होकर बैठ गया उसने अस्तित्व गंवा दिया।* संसार में अनेक व्यक्तियों ने लघुता में से उठकर अपने-अपने उद्योग द्वारा महत्ता प्राप्त की है। *तमिल भाषा के अमर काव्य 'चिक्कुरल' के रचयिता कवि "तिरुवल्लुवर" परिया नाम की अछूत जाति में पैदा हुए। थे। संत कबीर जुलाहे, रैदास चमार, नामदेव दर्जी और कृष्णदास शूद्र थे। उस जमाने में अछूतों और छोटी श्रेणी के लोगों के लिए उन्नति करना बहुत कठिन था, तो भी इन महापुरुषों ने अपने प्रयत्न से ज्ञान उपार्जन किया और नररत्न कहलाए।* संसार के अद्वितीय *कूटनीतिज्ञ महापुरुष चाणक्य बड़ी गरीबी का जीवन व्यतीत करते थे ।* एक बार वे राजा नंद की राज्य सभा में गए, तो फटे-टूटे कपड़ों को देखकर दरबारियों ने बड़ा उपहास किया था। *इतनी दरिद्रता रहते हुए भी वे महत ज्ञान का संपादन करते रहे।* अस्त्र-शस्त्र विद्या के धुरंधर *द्रोणाचार्य इतने गरीब थे कि अपने बच्चे अश्वत्थामा को दूध तक न पिला सकते थे और चावल का पानी देकर उसकी दूध की बालहठ शांत करते थे ।* संत सूरदास, तुलसीदास और चैतन्य महाप्रभु की दरिद्रता प्रसिद्ध है। *संस्कृत और बंगला के धुरंधर विद्वान ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जब विद्या अध्ययन करते थे, तो उनके पास इतना पैसा भी न था कि रात को पढ़ने के लिए तेल तक जुटा सकें। अतः उन्हें सड़क पर लगी रहने वाली बत्तियों की सहायता से पुस्तकें पढ़नी पढ़ती थीं।* मद्रास हाईकोर्ट के जज सर ध्रुवस्वामी अय्यर ऐसे गरीब घर के थे कि बारह वर्ष की उम्र में ही एक रुपया मासिक की नौकरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। *अकबर के दरबारी बीरबल और टोडरमल बहुत गरीब-दरिद्र के घर में जन्मे थे।* पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह का प्रधान सरदार फूलसिंह आधी उम्र तक पेट भरने की चिंता में डूबा रहा। यह लोग यद्यपि ऐसे घरों में जन्मे थे, जहाँ उन्नति करने योग्य साधनों का करीब-करीब सर्वथा अभाव था, *तो भी उनकी उद्योगशीलता और महत्त्वाकांक्षाओं ने उन्हें ऊँचे स्थानों तक पहुँचा ही दिया।* जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, श्री गोपाल कृष्ण गोखले, पं० मदनमोहन मालवीय, दादा भाई नौरोजी, महात्मा गांधी सरीखे महापुरुष मध्यम श्रेणी के घरानों में पैदा हुए, उनका ही परिश्रम था जिसने उन्हें साधारण से महान बनाया ।
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चित्त और वित्त की स्थिति लगभग एक जैसी है। चित्त अर्थात मन को काबू में रखना असम्भव सा है वैसे ही धन को भी मुट्ठी में बंद कर नहीं रखा जा सकता। हमारा मन वहीं ज्यादा जाता है जहाँ हम इसे रोकना चाहते हैं। इसीलिए ही कहा गया है कि मन के लिए निषेध ही निमंत्रण का काम करता है। जहाँ से हटाना चाहोगे यह उसी तरफ भागेगा।*
*ठीक ऐसे ही धन जब आता है तो शांति भी बाहर की ओर भागने लगती है। धन के साथ-साथ स्वयं की शांति और परिवार का सद्भाव बना रहे, यह थोड़ा मुश्किल काम है।*
*चित्त और वित्त दोनों चंचल हैं, दोनों जायेंगे ही, इसलिए दोनों को जाने भी दो मगर कहाँ ? जहाँ सत्संग हो, परोपकार हो, जहाँ प्रभु का द्वार हो और जहाँ से हमारा उद्धार हो।*
*!!!...अर्थ के उपयोग पर धर्म का नियंत्रण न हो तो अर्थ अनर्थ करेगा-...!!!*
*🙏ओम शांति 🙏*
*ठीक ऐसे ही धन जब आता है तो शांति भी बाहर की ओर भागने लगती है। धन के साथ-साथ स्वयं की शांति और परिवार का सद्भाव बना रहे, यह थोड़ा मुश्किल काम है।*
*चित्त और वित्त दोनों चंचल हैं, दोनों जायेंगे ही, इसलिए दोनों को जाने भी दो मगर कहाँ ? जहाँ सत्संग हो, परोपकार हो, जहाँ प्रभु का द्वार हो और जहाँ से हमारा उद्धार हो।*
*!!!...अर्थ के उपयोग पर धर्म का नियंत्रण न हो तो अर्थ अनर्थ करेगा-...!!!*
*🙏ओम शांति 🙏*
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संसारमें वस्तुतः वही मनुष्य धन्य है जिसे सम भावकी प्राप्ति हो गयी है। व्यवहारमें समताके भावकी बड़ी आवश्यकता है। इस भावको कार्यरूपमें परिणत करना ही गौरवकी बात है। मनुष्यका अपने शरीरके सभी अंगोंमें आत्मीयता और प्रेमका भाव समानरूपसे रहता है। सिर, हाथ-पैर आदि शरीरके किसी भी अवयव के दुःखका अनुभव मनुष्यको समानरूपसे होता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य सबके सुख-दुःखोंका अनुभव अपने ही सुख-दुःखोंकी भाँति करने लगे तो उसमें समताका भाव माना जा सकता है। भगवान् श्रीकृष्णने यही बात गीतामें कही है-
*आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।*
*सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥*
(६ । ३२) 'हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।'
वास्तवमें महात्मा वही है जो ब्रह्माण्डभरमें अपने आत्माको व्यापक देखता है। एक देशमें-अर्थात् केवल शरीरमें ही आत्माको सीमित समझनेवाला महात्मा नहीं - अल्पात्मा है। वह महात्माकी भाँति समस्त प्राणियोंके सुख-दुःखोंका अनुभव नहीं कर सकता।
उसमें सहानुभूति और समवेदनाका बड़ा अभाव रहता है। समदर्शी भगवत-भक्तों की स्थितिका ज्ञान दृष्टिसे वर्णन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।*
*ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥*
(गीता ६ । २९) 'सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।'
*यह समदर्शिताकी स्थिति - यह समताका भाव ॐ आनन्दमय भगवान् की सच्ची प्रेम भक्ति के दैनिक पाठ की कृपासे प्राप्त हो सकता है। इसलिये भगवान्को याद रखते हुए ऐसा भाव प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।*
जब सच्ची प्रेम भक्तिके सिद्धान्तसे विचार करते हैं तो समस्त संसारको ईश्वरका रूप समझ लेनेपर समताका भाव प्राप्त हो जाता है। श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है-
*सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।*
*मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥*
वास्तवमें भगवान् का वही अनन्य भक्त है, जो समस्त सचराचर भूतसमुदायको साक्षात् ईश्वरका स्वरूप समझकर सबके साथ समताका व्यवहार करता है। ज्ञानकी दृष्टिसे यह भाव रहता है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरा ही आत्मा है और भक्तिकी दृष्टिसे यह भाव रहता है कि यह सब मेरे स्वामीका ही रूप है और मैं इस समस्त भूतसमुदायका सेवक हूँ ।
दोनों में से किसी एक मार्गसे भी समत्वबुद्धि प्राप्त हो जानेपर मनुष्यमें स्वाभाविक ही दया, विनय और प्रेम आदि उत्तमोत्तम गुणोंका अधिकाधिक विकास हो जाता है और उसके अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। ऐसे राग-द्वेषरहित समदर्शी भगवत भक्तोंके द्वारा जो भी व्यवहार होता है वह लोगोंके लिये आदर्श और कल्याणप्रद ही होता है। अतएव समताका भाव प्राप्त करनेके लिये निरन्तर ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय भगवान्को याद रखनेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिय.
*आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।*
*सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥*
(६ । ३२) 'हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।'
वास्तवमें महात्मा वही है जो ब्रह्माण्डभरमें अपने आत्माको व्यापक देखता है। एक देशमें-अर्थात् केवल शरीरमें ही आत्माको सीमित समझनेवाला महात्मा नहीं - अल्पात्मा है। वह महात्माकी भाँति समस्त प्राणियोंके सुख-दुःखोंका अनुभव नहीं कर सकता।
उसमें सहानुभूति और समवेदनाका बड़ा अभाव रहता है। समदर्शी भगवत-भक्तों की स्थितिका ज्ञान दृष्टिसे वर्णन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।*
*ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥*
(गीता ६ । २९) 'सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।'
*यह समदर्शिताकी स्थिति - यह समताका भाव ॐ आनन्दमय भगवान् की सच्ची प्रेम भक्ति के दैनिक पाठ की कृपासे प्राप्त हो सकता है। इसलिये भगवान्को याद रखते हुए ऐसा भाव प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।*
जब सच्ची प्रेम भक्तिके सिद्धान्तसे विचार करते हैं तो समस्त संसारको ईश्वरका रूप समझ लेनेपर समताका भाव प्राप्त हो जाता है। श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है-
*सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।*
*मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥*
वास्तवमें भगवान् का वही अनन्य भक्त है, जो समस्त सचराचर भूतसमुदायको साक्षात् ईश्वरका स्वरूप समझकर सबके साथ समताका व्यवहार करता है। ज्ञानकी दृष्टिसे यह भाव रहता है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरा ही आत्मा है और भक्तिकी दृष्टिसे यह भाव रहता है कि यह सब मेरे स्वामीका ही रूप है और मैं इस समस्त भूतसमुदायका सेवक हूँ ।
दोनों में से किसी एक मार्गसे भी समत्वबुद्धि प्राप्त हो जानेपर मनुष्यमें स्वाभाविक ही दया, विनय और प्रेम आदि उत्तमोत्तम गुणोंका अधिकाधिक विकास हो जाता है और उसके अन्तःकरणके राग-द्वेष आदि समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। ऐसे राग-द्वेषरहित समदर्शी भगवत भक्तोंके द्वारा जो भी व्यवहार होता है वह लोगोंके लिये आदर्श और कल्याणप्रद ही होता है। अतएव समताका भाव प्राप्त करनेके लिये निरन्तर ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय भगवान्को याद रखनेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिय.
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*"विचार" दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य "आदतों" से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन कई बार तो उसे वे अनुरूप करा लेने के. लिए विवश तक कर देती हैं भले ही परिस्थितियाँ अनुकूल न हों।* नशेबाजी जैसी आदतें इनका उदाहरण हैं। स्वास्थ्य, पैसा, यश आदि की हानियों को समझते हुए भी नशे के आदी मनुष्य नशा करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। छोड़ने की बात सोचते हुए भी वे वैसा कर नहीं पाते। कारण कि *"विचारों" की तुलना में, "आदतों" की सामर्थ्य अत्यधिक होती है।* अनुपयोगी होते हुए भी वे कई बार इतनी प्रबल होती है कि पूरा करने के अतिरिक्त और कोई चारा दिखाई नहीं पड़ता। भले या बुरे जीवन क्रम में जितना योगदान आदतों का होता है उतना और किसी का नहीं।
👉 *"आदतें," आसमान से नहीं उतरतीं।* विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लंबा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाता है और उसे अपनाए रहने में जितना समय बीतता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। *यह परिपक्वता कालांतर में इतनी गहरी जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों।* सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवनक्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।
👉 *"आदतें" बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। ये आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है, क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती है। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं। जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।
जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोडा या बदला जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास आदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनीयताओं से जूझने के तो अनेक उपाय है, पर आंतरिक दुर्बलताओं से एक बार भी गुथ जाना और उन्हें पछाडकर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही संभव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने, आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फँसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन न होने पर उनका दोष जिस तिस पर मढ़ते रहते हैं। किंतु *वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए-सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए-सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं।* जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें *अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हो उन्हें छोड़ने बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए।* स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।
👉 *"आदतें," आसमान से नहीं उतरतीं।* विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लंबा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाता है और उसे अपनाए रहने में जितना समय बीतता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। *यह परिपक्वता कालांतर में इतनी गहरी जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों।* सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवनक्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।
👉 *"आदतें" बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। ये आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है, क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती है। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं। जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।
जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोडा या बदला जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास आदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनीयताओं से जूझने के तो अनेक उपाय है, पर आंतरिक दुर्बलताओं से एक बार भी गुथ जाना और उन्हें पछाडकर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही संभव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने, आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फँसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन न होने पर उनका दोष जिस तिस पर मढ़ते रहते हैं। किंतु *वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए-सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए-सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं।* जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें *अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हो उन्हें छोड़ने बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए।* स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।
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*फाल्गुन मास*
*फाल्गुन मास प्रारंभ:- 13.02.2025,गुरूवार*
*फाल्गुन समाप्तिः- 14.03.2025, शुक्रवार*
*वर्ष 2025 मे फाल्गुन मास के पर्व-त्यौहार*
फाल्गुन के प्रमुख व्रत और त्योहार
16 फरवरी, रविवार - द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
18 फरवरी- मंगलवार- यशोदा जयन्ती
20 फरवरी- गुरूवार - भानु सप्तमी,शबरी जयन्ती, कालाष्टमी।
21 फरवरी-शुक्रवार- जानकी जयंती
24 फरवरी- सोमवार - विजया एकादशी
25 फरवरी- प्रदोष व्रत
26 फरवरी- बुधवार - महाशिवरात्रि
10 फरवरी- गुरूवार - फाल्गुन अमावस्या
1 मार्च- शनिवार- फुलैरा दूज/श्री रामकृष्ण जयन्ती/
3 मार्च, सोमवार - विनायक चतुर्थी
7 मार्च, शुक्रवार - होलाष्टक का प्रारंभ
10 मार्च, सोमवार - आमलकी एकादशी
11 मार्च, मंगलवार - भौम प्रदोष व्रत
13 मार्च, गुरूवार - सत्यनारायण व्रत, होलिका दहन, छोटी होली
14 मार्च, शुक्रवार - होली, वसन्त पूर्णिमा, चन्द्र ग्रहण, लक्ष्मी जयन्ती, चैतन्य महाप्रभु जयन्ती/
मीन संक्रान्ति।
*फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष के कुछ व्रत:-*
*1. संकष्ट चतुर्थी, 16/02/2025:-*
यह व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्थी को किया जाता है। इसमें चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी लेनी चाहिये। यदि वह दो दिन चन्द्रोदय-व्यापिनी हो तो मातृ-विद्धा प्रशस्यते के अनुसार पहले दिन व्रत करे। व्रती को चाहिये कि वह प्रातः स्नानादि के पश्चात् व्रत करने का संकल्प करके दिन भर मौन रहे और सायंकाल में पुनः स्नान करके लाल वस्त्र धारण कर ऋतुकाल के गन्ध-पुष्पादि से गणेशजी का पूजन करे, उसके बाद चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का पूजन करे और अर्घ्य एवं वायन देकर स्वयं भोजन करे तो सुख, सौभाग्य और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।
इसकी कथा यह है कि सत्ययुग में राजा युवनाश्व के पास सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता ब्रह्मशर्मा नाम के ब्राह्मण थे, जिन के सात पुत्र और सात पुत्र-वधुएँ थीं। ब्रह्मशर्मा जब वृद्ध हुए, तब बड़ी छः बहुओं की अपेक्षा छोटी बहू ने श्वशुर की अधिक सेवा की। तब उन्हों ने संतुष्ट होकर उससे संकष्टहर चतुर्थी का व्रत करवाया, जिस के प्रभाव से वह मरण पर्यन्त सब प्रकार के सुख-साधनों से संयुक्त रही।
*2. जानकी व्रत- 21/02/2025:-*
यह व्रत फाल्गुन कृष्ण अष्टमी को किया जाता है। इसमें जनक नन्दिनी श्रीजानकीजी का पूजन होता है। गुरुवर वसिष्ठजी के कहने पर भगवान् रामचन्द्रजी ने समुद्रतट की तपोमय भूमि पर बैठकर यह व्रत किया था। अतः भक्तो को चाहिये कि वे अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये इस व्रत को अवश्य करें। इसमें सर्व-धान्य (जौ-चावल आदि) के खीर का हवन और मालपूए आदि का नैवेद्य अर्पण किया जाता है।
इसमें व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्णा पूर्वा शुक्लेऽष्टमी परा' के अनुसार पूर्व-विद्धा अष्टमी ली जाती है। अन्य वैष्णव ग्रन्थों के मतानुसार वैशाख शुक्ल नवमी को जानकीजी का जन्म हुआ था, जो जानकी नवमी के नाम से प्रसिद्ध है।
*3. विजया एकादशी-24/02/2025:-*
यह व्रत प्रत्येक मास में किया जाता है। इस एकादशी का नाम' विजया' है। इसके प्रभाव से व्रती का जय होता है। लंका विजय करने की कामना से ' बकदालभ्य 'मुनि के आज्ञानुसार समुद्र के तट पर भगवान् रामचन्द्र ने इसी एकादशी का व्रत किया था, जिस से रावणादि मारे गये और श्रीरामचन्द्र की विजय हुई।
*4. महाशिवरात्रि- 26/02/2025:-*
यह व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को किया जाता है। इस को प्रतिवर्ष करने से यह' नित्य' और किसी कामना पूर्वक करने से' काम्य' होता है।
प्रतिपदादि 3 तिथियों के अग्नि आदि अधिपति होते हैं। जिस तिथि का जो स्वामी हो उसका उस तिथि में अर्चन करना उत्तम होता है।
चतुर्दशी के स्वामी शिव हैं (अथवा शिव की तिथि चतुर्दशी है)। अतः उनकी रात्रि में व्रत किया जाने से इस व्रत का नाम' शिवरात्रि' होना सार्थक हो जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है। और शिवभक्त प्रत्येक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करते ही हैं, किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ (अर्धरात्रि) में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था, इस कारण यह महाशिवरात्रि मानी जाती है।
*फाल्गुन मास प्रारंभ:- 13.02.2025,गुरूवार*
*फाल्गुन समाप्तिः- 14.03.2025, शुक्रवार*
*वर्ष 2025 मे फाल्गुन मास के पर्व-त्यौहार*
फाल्गुन के प्रमुख व्रत और त्योहार
16 फरवरी, रविवार - द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
18 फरवरी- मंगलवार- यशोदा जयन्ती
20 फरवरी- गुरूवार - भानु सप्तमी,शबरी जयन्ती, कालाष्टमी।
21 फरवरी-शुक्रवार- जानकी जयंती
24 फरवरी- सोमवार - विजया एकादशी
25 फरवरी- प्रदोष व्रत
26 फरवरी- बुधवार - महाशिवरात्रि
10 फरवरी- गुरूवार - फाल्गुन अमावस्या
1 मार्च- शनिवार- फुलैरा दूज/श्री रामकृष्ण जयन्ती/
3 मार्च, सोमवार - विनायक चतुर्थी
7 मार्च, शुक्रवार - होलाष्टक का प्रारंभ
10 मार्च, सोमवार - आमलकी एकादशी
11 मार्च, मंगलवार - भौम प्रदोष व्रत
13 मार्च, गुरूवार - सत्यनारायण व्रत, होलिका दहन, छोटी होली
14 मार्च, शुक्रवार - होली, वसन्त पूर्णिमा, चन्द्र ग्रहण, लक्ष्मी जयन्ती, चैतन्य महाप्रभु जयन्ती/
मीन संक्रान्ति।
*फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष के कुछ व्रत:-*
*1. संकष्ट चतुर्थी, 16/02/2025:-*
यह व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्थी को किया जाता है। इसमें चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी लेनी चाहिये। यदि वह दो दिन चन्द्रोदय-व्यापिनी हो तो मातृ-विद्धा प्रशस्यते के अनुसार पहले दिन व्रत करे। व्रती को चाहिये कि वह प्रातः स्नानादि के पश्चात् व्रत करने का संकल्प करके दिन भर मौन रहे और सायंकाल में पुनः स्नान करके लाल वस्त्र धारण कर ऋतुकाल के गन्ध-पुष्पादि से गणेशजी का पूजन करे, उसके बाद चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का पूजन करे और अर्घ्य एवं वायन देकर स्वयं भोजन करे तो सुख, सौभाग्य और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।
इसकी कथा यह है कि सत्ययुग में राजा युवनाश्व के पास सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता ब्रह्मशर्मा नाम के ब्राह्मण थे, जिन के सात पुत्र और सात पुत्र-वधुएँ थीं। ब्रह्मशर्मा जब वृद्ध हुए, तब बड़ी छः बहुओं की अपेक्षा छोटी बहू ने श्वशुर की अधिक सेवा की। तब उन्हों ने संतुष्ट होकर उससे संकष्टहर चतुर्थी का व्रत करवाया, जिस के प्रभाव से वह मरण पर्यन्त सब प्रकार के सुख-साधनों से संयुक्त रही।
*2. जानकी व्रत- 21/02/2025:-*
यह व्रत फाल्गुन कृष्ण अष्टमी को किया जाता है। इसमें जनक नन्दिनी श्रीजानकीजी का पूजन होता है। गुरुवर वसिष्ठजी के कहने पर भगवान् रामचन्द्रजी ने समुद्रतट की तपोमय भूमि पर बैठकर यह व्रत किया था। अतः भक्तो को चाहिये कि वे अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये इस व्रत को अवश्य करें। इसमें सर्व-धान्य (जौ-चावल आदि) के खीर का हवन और मालपूए आदि का नैवेद्य अर्पण किया जाता है।
इसमें व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्णा पूर्वा शुक्लेऽष्टमी परा' के अनुसार पूर्व-विद्धा अष्टमी ली जाती है। अन्य वैष्णव ग्रन्थों के मतानुसार वैशाख शुक्ल नवमी को जानकीजी का जन्म हुआ था, जो जानकी नवमी के नाम से प्रसिद्ध है।
*3. विजया एकादशी-24/02/2025:-*
यह व्रत प्रत्येक मास में किया जाता है। इस एकादशी का नाम' विजया' है। इसके प्रभाव से व्रती का जय होता है। लंका विजय करने की कामना से ' बकदालभ्य 'मुनि के आज्ञानुसार समुद्र के तट पर भगवान् रामचन्द्र ने इसी एकादशी का व्रत किया था, जिस से रावणादि मारे गये और श्रीरामचन्द्र की विजय हुई।
*4. महाशिवरात्रि- 26/02/2025:-*
यह व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को किया जाता है। इस को प्रतिवर्ष करने से यह' नित्य' और किसी कामना पूर्वक करने से' काम्य' होता है।
प्रतिपदादि 3 तिथियों के अग्नि आदि अधिपति होते हैं। जिस तिथि का जो स्वामी हो उसका उस तिथि में अर्चन करना उत्तम होता है।
चतुर्दशी के स्वामी शिव हैं (अथवा शिव की तिथि चतुर्दशी है)। अतः उनकी रात्रि में व्रत किया जाने से इस व्रत का नाम' शिवरात्रि' होना सार्थक हो जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है। और शिवभक्त प्रत्येक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करते ही हैं, किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ (अर्धरात्रि) में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था, इस कारण यह महाशिवरात्रि मानी जाती है।
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