।। जय शंकरसुवन केशरीनन्दन महावीर हनुमान ।।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी भगवान शिव का अवतार हैं, जिन्होंने भगवान राम की सेवा के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी को कई अन्य देवताओं से भी विशेष वरदान मिले, जैसे इन्द्र ने उन्हें किसी भी शस्त्र से अछूते रहने का वरदान दिया। हनुमान जी की रामभक्ति की मिसाल और उनके अद्वितीय साहस ने उन्हें श्रीराम की सेना का प्रमुख योद्धा बना दिया।
रामायण में हनुमान जी का किरदार बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है। ये एक ऐसा अवतार हैं, जिन्होंने आम जन के लिए कई प्रेरणादायक किस्से और चरित्र स्थापित किये हैं। हनुमान जी को जितना समझा जाए, उतना कम है। एक सरल भक्त, एक चंचल मस्तिष्क, एक वीर योद्धा और एक समर्पित सेवक और न जाने क्या-क्या।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी या तो शिव का अंश हैं या फिर वो शिव का अवतार। लेकिन शिवजी तो महादेव हैं। फिर उन्होंने भगवान विष्णु का सेवक होना क्यों चुना-
पौराणिक मान्यताओं की मानें, तो भगवान विष्णु जब राम अवतार में पृथ्वी पर आए, तो उन्हें एक ऐसे परमभक्त और सहयोगी की आवश्यकता थी जो हर परिस्थिति में उनकी सहायता कर सके। चूँकि शिवजी स्वयं श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, इसलिए उन्होंने यह निश्चय किया कि वे हनुमान के रूप में जन्म लेंगे और श्रीराम की सेवा करेंगे।
हनुमान जी ने रामभक्ति की सर्वोच्च मिसाल पेश की और श्रीराम की सेना के प्रमुख योद्धा बनकर लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई मान्यताओं में ये भी कहा जाता है कि शिवजी त्रिकालदर्शी हैं और उन्होंने ये देख लिया था कि भगवान राम को पृथ्वी का कल्याण करने के लिए एक सहायक की आवश्यकता पड़ने वाली है। इसलिए, उन्होंने अपने रुद्रावातारों में से ग्यारहवां रुद्र अवतार यानि हनुमान के रूप में अवतार लेने का फैसला किया।
शिव पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने शिवजी से पूछा कि "प्रभु!आप श्रीराम के इतने बड़े भक्त हैं, तो क्या कभी आपको उनकी सेवा का अवसर मिलेगा?" तब शिवजी ने उत्तर दिया "राम अवतार में, मैं भी एक विशेष रूप में प्रकट होकर उनकी सेवा करूँगा।" यही कारण था कि जब भगवान राम का जन्म हुआ, तब शिवजी ने हनुमान जी के रूप में अवतार लिया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी को अमरता का वरदान भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता सीता और स्वयं श्रीराम सहित कई देवताओं से प्राप्त हुआ था। ब्रह्मा जी ने हनुमान जी को अजेयता (किसी से पराजित न होने) और मृत्यु से मुक्ति का वरदान दिया। हनुमान जी भगवान शिव के ही अवतार माने जाते हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें चिरंजीवी (अमर) होने का आशीर्वाद दिया।
जब श्रीराम जी का पृथ्वी से प्रस्थान करने का समय आया, तब उन्होंने हनुमान जी को कलियुग तक धरती पर रहने और अपने भक्तों की सहायता करने का आशीर्वाद दिया। जब हनुमान जी माता सीता की तलाश में लंका गए थे, तो उन्हें बहुत तलाश करने पर भी माता सीता नहीं मिली थी। उन्हें लगा कि माता सीता शायद जीवित नहीं। लेकिन जब उन्होंने एक बार फिर से प्रभु राम का नाम लेकर माता सीता को तलाशना शुरू किया, तो वो उन्हें अशोक वाटिका में मिल गयी। लेकिन तब तक हनुमान जी भूख-प्यासे उन्हें तलाशते रहे थे। इसी कारण माता सीता ने हनुमान जी को कभी भूख-प्यास न लगने और अजेय रहने का वरदान दिया। यमराज ने भी हनुमान जी को मृत्यु से अजेयता प्रदान की।
अमरता के अलावा भी हनुमान जी को कई अन्य देवताओं से भी कई वरदान मिले थे। जैसे कि, इन्द्र ने वज्र से प्रहार के बाद हनुमान जी को किसी भी शस्त्र से अछूते रहने का वरदान दिया था, वहीं वरुणदेव ने जल में न डूबने का आशीर्वाद दिया था और अग्निदेव ने हनुमान जी को अग्नि से न जलने का वरदान दिया।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी भगवान शिव का अवतार हैं, जिन्होंने भगवान राम की सेवा के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी को कई अन्य देवताओं से भी विशेष वरदान मिले, जैसे इन्द्र ने उन्हें किसी भी शस्त्र से अछूते रहने का वरदान दिया। हनुमान जी की रामभक्ति की मिसाल और उनके अद्वितीय साहस ने उन्हें श्रीराम की सेना का प्रमुख योद्धा बना दिया।
रामायण में हनुमान जी का किरदार बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है। ये एक ऐसा अवतार हैं, जिन्होंने आम जन के लिए कई प्रेरणादायक किस्से और चरित्र स्थापित किये हैं। हनुमान जी को जितना समझा जाए, उतना कम है। एक सरल भक्त, एक चंचल मस्तिष्क, एक वीर योद्धा और एक समर्पित सेवक और न जाने क्या-क्या।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी या तो शिव का अंश हैं या फिर वो शिव का अवतार। लेकिन शिवजी तो महादेव हैं। फिर उन्होंने भगवान विष्णु का सेवक होना क्यों चुना-
पौराणिक मान्यताओं की मानें, तो भगवान विष्णु जब राम अवतार में पृथ्वी पर आए, तो उन्हें एक ऐसे परमभक्त और सहयोगी की आवश्यकता थी जो हर परिस्थिति में उनकी सहायता कर सके। चूँकि शिवजी स्वयं श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, इसलिए उन्होंने यह निश्चय किया कि वे हनुमान के रूप में जन्म लेंगे और श्रीराम की सेवा करेंगे।
हनुमान जी ने रामभक्ति की सर्वोच्च मिसाल पेश की और श्रीराम की सेना के प्रमुख योद्धा बनकर लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई मान्यताओं में ये भी कहा जाता है कि शिवजी त्रिकालदर्शी हैं और उन्होंने ये देख लिया था कि भगवान राम को पृथ्वी का कल्याण करने के लिए एक सहायक की आवश्यकता पड़ने वाली है। इसलिए, उन्होंने अपने रुद्रावातारों में से ग्यारहवां रुद्र अवतार यानि हनुमान के रूप में अवतार लेने का फैसला किया।
शिव पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने शिवजी से पूछा कि "प्रभु!आप श्रीराम के इतने बड़े भक्त हैं, तो क्या कभी आपको उनकी सेवा का अवसर मिलेगा?" तब शिवजी ने उत्तर दिया "राम अवतार में, मैं भी एक विशेष रूप में प्रकट होकर उनकी सेवा करूँगा।" यही कारण था कि जब भगवान राम का जन्म हुआ, तब शिवजी ने हनुमान जी के रूप में अवतार लिया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी को अमरता का वरदान भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता सीता और स्वयं श्रीराम सहित कई देवताओं से प्राप्त हुआ था। ब्रह्मा जी ने हनुमान जी को अजेयता (किसी से पराजित न होने) और मृत्यु से मुक्ति का वरदान दिया। हनुमान जी भगवान शिव के ही अवतार माने जाते हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें चिरंजीवी (अमर) होने का आशीर्वाद दिया।
जब श्रीराम जी का पृथ्वी से प्रस्थान करने का समय आया, तब उन्होंने हनुमान जी को कलियुग तक धरती पर रहने और अपने भक्तों की सहायता करने का आशीर्वाद दिया। जब हनुमान जी माता सीता की तलाश में लंका गए थे, तो उन्हें बहुत तलाश करने पर भी माता सीता नहीं मिली थी। उन्हें लगा कि माता सीता शायद जीवित नहीं। लेकिन जब उन्होंने एक बार फिर से प्रभु राम का नाम लेकर माता सीता को तलाशना शुरू किया, तो वो उन्हें अशोक वाटिका में मिल गयी। लेकिन तब तक हनुमान जी भूख-प्यासे उन्हें तलाशते रहे थे। इसी कारण माता सीता ने हनुमान जी को कभी भूख-प्यास न लगने और अजेय रहने का वरदान दिया। यमराज ने भी हनुमान जी को मृत्यु से अजेयता प्रदान की।
अमरता के अलावा भी हनुमान जी को कई अन्य देवताओं से भी कई वरदान मिले थे। जैसे कि, इन्द्र ने वज्र से प्रहार के बाद हनुमान जी को किसी भी शस्त्र से अछूते रहने का वरदान दिया था, वहीं वरुणदेव ने जल में न डूबने का आशीर्वाद दिया था और अग्निदेव ने हनुमान जी को अग्नि से न जलने का वरदान दिया।
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अब यह अनिवार्य हो गया है कि मनुष्य अपनी दिशा बदले। उसे अब चिरंतन चेतना का ध्यान करना होगा, उस अनादि-ज्योति का स्मरण करना होगा जो हर हृदय की वेदना में निहित है। यह ध्यान केवल किसी आसन पर बैठकर आँखों को बंद कर लेना नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवता के लिए एक शुभ संकल्प है। एक ऐसा संकल्प, जिसमें व्यक्ति स्वयं के सुख की चिंता छोड़कर दूसरों के दुःख की परवाह करे। यही सच्चा ध्यान है, जहाँ हमारी चेतना व्यक्तिगत सीमाओं से मुक्त होकर सार्वभौमिक कल्याण से जुड़ती है।
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दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्रम् - हिन्दी अर्थ सहित
🍁विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकान्तिधवळाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥१॥
जो विश्व के स्वामी हैं,
जो नरकरूपी संसारसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो कानों से श्रवण करने में अमृत के समान नाम वाले हैं, जो अपने भाल पर चन्द्रमा को आभूषणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो कर्पूर की कांति के समान धवल वर्ण वाले जटाधारी हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁गौरिप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय ।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥२॥
जो माता गौरी के अत्यंत प्रिय हैं, जो रजनीश्वर (चन्द्रमा) की कला को धारण करने वाले हैं,
जो काल के भी अन्तक (यम) रूप हैं,
जो नागराज को कंकणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो अपने मस्तक पर गंगा को धारण करने वाले हैं,
जो गजराज का विमर्दन करने वाले हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁भक्तिप्रियाय भयरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥३॥
जो भक्तिप्रिय, संसाररूपी रोग एवं भय का नाश करने वाले हैं,
जो संहार के समय उग्ररूपधारी हैं,
जो दुर्गम भवसागर से पार कराने वाले हैं, जो ज्योतिस्वरूप, अपने गुण और नाम के अनुसार सुन्दर नृत्य करने वाले हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁चर्मांबराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।
मञ्जीरपादयुगळाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥४॥
जो बाघ के चर्म को धारण करने वाले हैं, जो चिताभस्म को लगाने वाले हैं, जो भाल में तीसरा नेत्र धारण करने वाले हैं, जो मणियों के कुण्डल से सुशोभित हैं, जो अपने चरणों में नूपुर धारण करने वाले जटाधारी हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥५॥
जो पांच मुख वाले नागराज रूपी आभूषण से सुसज्जित हैं, जो सुवर्ण के समान किरणवाले हैं, जो आनंदभूमि (काशी) को वर प्रदान करने वाले हैं, जो सृष्टि के संहार के लिए तमोगुनाविष्ट होने वाले हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥६॥
जो सूर्य को अत्यंत प्रिय हैं,
जो भवसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो काल के लिए भी महाकालस्वरूप, और जिनकी कमलासन (ब्रम्हा) पूजा करते हैं, जो तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं, जो शुभ लक्षणों से युक्त हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णव तारणाय ।
पुण्येषु पुण्य़भरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥७॥
जो राम को अत्यंत प्रिय, रघुनाथजी को वर देने वाले हैं, जो सर्पों के अतिप्रिय हैं, जो भवसागररूपी नरक से तारने वाले हैं, जो पुण्यवालों में अत्यंत पुण्य वाले हैं, जिनकी समस्त देवतापूजा करते हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥८॥
जो मुक्तजनों के स्वामीस्वरूप हैं,
जो चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले हैं,
जिन्हें गीत प्रिय हैं और नंदी जिनका वाहन है,
गजचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले हैं, महेश्वर हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम् ।
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥९॥
जो व्यक्ति महर्षि वसिष्ठ कृत इस स्तोत्र का पाठ करने से
सर्वरोगनाशक शीघ्र सर्व संपत्ति देने वाला पुत्र पौत्र धनधान्य बढ़ाने वाला है।
जो त्रिसंध्या काल में इसका पाठ करता है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
🍁विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकान्तिधवळाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥१॥
जो विश्व के स्वामी हैं,
जो नरकरूपी संसारसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो कानों से श्रवण करने में अमृत के समान नाम वाले हैं, जो अपने भाल पर चन्द्रमा को आभूषणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो कर्पूर की कांति के समान धवल वर्ण वाले जटाधारी हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁गौरिप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय ।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥२॥
जो माता गौरी के अत्यंत प्रिय हैं, जो रजनीश्वर (चन्द्रमा) की कला को धारण करने वाले हैं,
जो काल के भी अन्तक (यम) रूप हैं,
जो नागराज को कंकणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो अपने मस्तक पर गंगा को धारण करने वाले हैं,
जो गजराज का विमर्दन करने वाले हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁भक्तिप्रियाय भयरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥३॥
जो भक्तिप्रिय, संसाररूपी रोग एवं भय का नाश करने वाले हैं,
जो संहार के समय उग्ररूपधारी हैं,
जो दुर्गम भवसागर से पार कराने वाले हैं, जो ज्योतिस्वरूप, अपने गुण और नाम के अनुसार सुन्दर नृत्य करने वाले हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁चर्मांबराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।
मञ्जीरपादयुगळाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥४॥
जो बाघ के चर्म को धारण करने वाले हैं, जो चिताभस्म को लगाने वाले हैं, जो भाल में तीसरा नेत्र धारण करने वाले हैं, जो मणियों के कुण्डल से सुशोभित हैं, जो अपने चरणों में नूपुर धारण करने वाले जटाधारी हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥५॥
जो पांच मुख वाले नागराज रूपी आभूषण से सुसज्जित हैं, जो सुवर्ण के समान किरणवाले हैं, जो आनंदभूमि (काशी) को वर प्रदान करने वाले हैं, जो सृष्टि के संहार के लिए तमोगुनाविष्ट होने वाले हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥६॥
जो सूर्य को अत्यंत प्रिय हैं,
जो भवसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो काल के लिए भी महाकालस्वरूप, और जिनकी कमलासन (ब्रम्हा) पूजा करते हैं, जो तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं, जो शुभ लक्षणों से युक्त हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णव तारणाय ।
पुण्येषु पुण्य़भरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥७॥
जो राम को अत्यंत प्रिय, रघुनाथजी को वर देने वाले हैं, जो सर्पों के अतिप्रिय हैं, जो भवसागररूपी नरक से तारने वाले हैं, जो पुण्यवालों में अत्यंत पुण्य वाले हैं, जिनकी समस्त देवतापूजा करते हैं, दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥८॥
जो मुक्तजनों के स्वामीस्वरूप हैं,
जो चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले हैं,
जिन्हें गीत प्रिय हैं और नंदी जिनका वाहन है,
गजचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले हैं, महेश्वर हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है।
🍁वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम् ।
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥९॥
जो व्यक्ति महर्षि वसिष्ठ कृत इस स्तोत्र का पाठ करने से
सर्वरोगनाशक शीघ्र सर्व संपत्ति देने वाला पुत्र पौत्र धनधान्य बढ़ाने वाला है।
जो त्रिसंध्या काल में इसका पाठ करता है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
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*मानव मन की नकारात्मक ऊर्जा, जैसे क्रोध और ईर्ष्या, समस्याओं और रोगों का मूल कारण है। धर्म हमें इन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने और सकारात्मक कर्म करने का संदेश देते हैं। सकारात्मक विचार प्रगति लाते हैं, जबकि नकारात्मक विचार पतन की ओर ले जाते हैं। संतुलित जीवन के लिए आंतरिक ऊर्जा को सही दिशा देना आवश्यक है।*
मानव मन में उत्पन्न होने वाली ऋणात्मक ऊर्जा ही अधिकतर समस्याओं और रोगों की मूल जड़ है। यह नकारात्मक ऊर्जा जैसे क्रोध, अत्यधिक महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, अहंकार, दंभ, हिंसा, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने की प्रवृत्ति हमारे ही विनाश का कारण बनती है। सभी धर्मों का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपनी ऋणात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखे और जीवन में अधिक से अधिक सकारात्मक यानी धनात्मक कर्मों को अपनाए। अनुभवों से परिपक्व हर व्यक्ति यही कहेगा कि सकारात्मक विचार और कार्य आपको प्रगतिशील और सफल बनाएंगे, जबकि नकारात्मक प्रवृत्तियां धीरे-धीरे आपको पतन के रास्ते पर ले जाएंगी।
अगर जीवन को संतुलित, सुखद और समृद्ध बनाना है तो स्वयं के भीतर की ऊर्जा को पहचान कर उसे सही दिशा देना ही सबसे बड़ा धर्म है। मनुष्य के अंदर मानसिक विकारों के आने पर या मानसिक स्थिति संतुलित न होने पर उसके शरीर पर विभिन्न प्रकार के विकारों के लक्षण उत्पन्न हो जाते है। मनुष्य जैसा सोचता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही प्रभाव उसके शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ता है। अगर मनुष्य के कार्य एवं मानसिक स्थिति धनात्मक हो तो शरीर के अंदर रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है और जीवन शक्ति लंबे समय तक ऊर्जावान बनी रहती है। स्वस्थ मानसिकता के अभाव में हम चाहें कितना भी अच्छा भोजन करें, कितना भी व्यायाम और शरीर की देखभाल करें हम रोग मुक्त नहीं हो सकते।
धनात्मक ऊर्जा का तात्पर्य मनुष्य के अंदर उठने वाले अच्छे भावों से है। जैसे कि दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम, आचार-व्यवहार में सीधापन, सत्य बोलने की आदत, जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण, व्यर्थ का घमंड न होना, हंसमुख होना इत्यादि। ऐसा देखा गया है कि अत्यधिक क्रोध और हिंसक विचारों वाले व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार की गंभीर समस्याएं आ घेरती हैं जैसे कि अत्यधिक अम्ल बनना, रक्त का दबाव बढ़ जाना, किडनी संबंधी समस्याएं, कब्ज, यकृत में दोष आ जाना, अनिद्रा इत्यादि। व्यवसाय को लेकर अत्यधिक चिंतित रहना, जुआ, सट्टा खेलना, गलत तरीके से अर्थ कमाना इत्यादि कार्यों के कारण ब्लड-प्रेशर, त्वचा रोग, हार्ट अटैक जैसे रोग हो सकते हैं। अत्यधिक भोग और विलासितापूर्ण जीवन जीना, कर्मेन्द्रियों का इस्तेमाल न करना, सदैव आलस्यमय रहना, गरिष्ठ और विलासितापूर्ण भोजन करने से मधुमेह जैसे रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
मानव मन में उत्पन्न होने वाली ऋणात्मक ऊर्जा ही अधिकतर समस्याओं और रोगों की मूल जड़ है। यह नकारात्मक ऊर्जा जैसे क्रोध, अत्यधिक महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, अहंकार, दंभ, हिंसा, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने की प्रवृत्ति हमारे ही विनाश का कारण बनती है। सभी धर्मों का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपनी ऋणात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखे और जीवन में अधिक से अधिक सकारात्मक यानी धनात्मक कर्मों को अपनाए। अनुभवों से परिपक्व हर व्यक्ति यही कहेगा कि सकारात्मक विचार और कार्य आपको प्रगतिशील और सफल बनाएंगे, जबकि नकारात्मक प्रवृत्तियां धीरे-धीरे आपको पतन के रास्ते पर ले जाएंगी।
अगर जीवन को संतुलित, सुखद और समृद्ध बनाना है तो स्वयं के भीतर की ऊर्जा को पहचान कर उसे सही दिशा देना ही सबसे बड़ा धर्म है। मनुष्य के अंदर मानसिक विकारों के आने पर या मानसिक स्थिति संतुलित न होने पर उसके शरीर पर विभिन्न प्रकार के विकारों के लक्षण उत्पन्न हो जाते है। मनुष्य जैसा सोचता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही प्रभाव उसके शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ता है। अगर मनुष्य के कार्य एवं मानसिक स्थिति धनात्मक हो तो शरीर के अंदर रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है और जीवन शक्ति लंबे समय तक ऊर्जावान बनी रहती है। स्वस्थ मानसिकता के अभाव में हम चाहें कितना भी अच्छा भोजन करें, कितना भी व्यायाम और शरीर की देखभाल करें हम रोग मुक्त नहीं हो सकते।
धनात्मक ऊर्जा का तात्पर्य मनुष्य के अंदर उठने वाले अच्छे भावों से है। जैसे कि दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम, आचार-व्यवहार में सीधापन, सत्य बोलने की आदत, जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण, व्यर्थ का घमंड न होना, हंसमुख होना इत्यादि। ऐसा देखा गया है कि अत्यधिक क्रोध और हिंसक विचारों वाले व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार की गंभीर समस्याएं आ घेरती हैं जैसे कि अत्यधिक अम्ल बनना, रक्त का दबाव बढ़ जाना, किडनी संबंधी समस्याएं, कब्ज, यकृत में दोष आ जाना, अनिद्रा इत्यादि। व्यवसाय को लेकर अत्यधिक चिंतित रहना, जुआ, सट्टा खेलना, गलत तरीके से अर्थ कमाना इत्यादि कार्यों के कारण ब्लड-प्रेशर, त्वचा रोग, हार्ट अटैक जैसे रोग हो सकते हैं। अत्यधिक भोग और विलासितापूर्ण जीवन जीना, कर्मेन्द्रियों का इस्तेमाल न करना, सदैव आलस्यमय रहना, गरिष्ठ और विलासितापूर्ण भोजन करने से मधुमेह जैसे रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
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संसार में कौन धन्य है?
* सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत
भावार्थ:-हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों
सदा भगवान के कार्य में जो अपनी देह को कष्ट देता है। मुख से अखंड राम-नाम का उच्चारण करता है। स्वधर्मपालन में बिल्कुल तत्पर है।
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रीजी का ऐसा दास इस संसार में धन्य है। (वह) जैसा कहता है। वैसा ही करता है। नाना रूपों में एक ईश्वर (रूप) को ही देवता है और जिसे सगुण-भजन में जरा भी संदेह नहीं वहीं मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रीजी का सेवक इस संसार में धन्य है।
*नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
भावार्थ:-जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम् बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर ह
जिसने मद, मत्सर और स्वार्थ का त्याग कर दिया है। जिसके सांसारिक उपाधि नहीं है और जिसकी वाणी सदैव नम्र और मधुर होती है। ऐसा सर्वोत्तम श्रीरामचंद्रजी का सेवक इस संसार में धन्य है। जो अखिल संसार में सदा-सर्वदा सरल, प्रिय, सत्यवादी और विवेकी होता है तथा निश्चयपूर्वक कभी भी मिथ्या-भाषण नहीं करता, वह सर्वोत्तम श्रीरामचंद्रजी का सेवक इस संसार में धन्य है।
जो दीनों पर दया करने वाला, मन का कोमल, स्ग्धि-हृदय, कृपाशील और रामजी के सेवकगणों की रक्षा करने वाला है। ऐसे दास के मन में क्रोध और चिडि़चिड़ाहट कहां से आयेगी! सर्वोत्तम रामचंद्रजी का ऐसा दास संसार में धन्य है। रे मन! तू अपने अंदर दुःख को तथा शोक और चिंता को कहीं स्थान ने दे। देह-गेहादि की आसक्ति विवेक करके छोड़ दे और उसी विदेही अवस्था में मुक्ति-सुख का उपभोग कर
* धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
भावार्थ:-वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥
रे मन! राधव के अतिरिक्त तू (दूसरी) कोई बात न कर। जनता में वृथा बोलने से सुख नहीं होता। काल घड़ी-घड़ी आयु को हरण कर रहा है। देहावसान के समय तुझे छुड़ाने वाला (बिना श्रीरामचंद्रजी के) और कौन है? अपने (बुरे) आचरण में सोच-विचार करके परिवर्तन कर। अति आदर के साथ शुध्द आचरण कर। लोगों के सामने जैसा कह, वैसा कर। (और) मन! कल्पना और संसार के दुःख को छोड़ दे।
रे मन! क्रोध की उत्पति मत होने दे। सत्संग में बुध्दि का निवास हो। दुष्ट-संग छोड़ दे। (इस प्रकार) मोक्ष का अधिकारी बन।
जो सोच-विचारकर बोलता है और विवेकपूर्ण आचारण करता है। उसकी संगति से अत्यंत त्रस्त लोगों को भी शांति मिलती है। अतः हित की खोज किये बिना कुछ मत बोल और लोगों में संयमित और शुध्द आचरण कर।
रे मन! सभी आसक्ति छोड़ और अत्यादरपूर्वक सज्जनों की संगति कर। उनकी संगति से संसार का महान दुःख दूर हो जाता है और बिना किसी अन्य साधना के संसार में सन्मार्ग की प्राप्ति होती है
रे मन! सत्संग सर्व (संसार के) संगों से छुड़ाने वाला है। उससे तुरंत मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह संग साधक को भवसागर से शीघ्र पार करता है। सत्संग द्वैत-भावना का समूल नाश करता है।
* सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
भावार्थ:-वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥4॥
(धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है
जो बिना आचरण किये हुए नाना प्रकार की (ब्रह्मज्ञान की) बातें करता है। तुरंत जिसका पानी मन में उसे मन ही मन धिक्कारता है। जिसके मन में कल्पनाओं की मनमानी दौड़ चलती है। ऐसे मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी।
* सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत
भावार्थ:-हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों
सदा भगवान के कार्य में जो अपनी देह को कष्ट देता है। मुख से अखंड राम-नाम का उच्चारण करता है। स्वधर्मपालन में बिल्कुल तत्पर है।
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रीजी का ऐसा दास इस संसार में धन्य है। (वह) जैसा कहता है। वैसा ही करता है। नाना रूपों में एक ईश्वर (रूप) को ही देवता है और जिसे सगुण-भजन में जरा भी संदेह नहीं वहीं मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रीजी का सेवक इस संसार में धन्य है।
*नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
भावार्थ:-जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम् बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर ह
जिसने मद, मत्सर और स्वार्थ का त्याग कर दिया है। जिसके सांसारिक उपाधि नहीं है और जिसकी वाणी सदैव नम्र और मधुर होती है। ऐसा सर्वोत्तम श्रीरामचंद्रजी का सेवक इस संसार में धन्य है। जो अखिल संसार में सदा-सर्वदा सरल, प्रिय, सत्यवादी और विवेकी होता है तथा निश्चयपूर्वक कभी भी मिथ्या-भाषण नहीं करता, वह सर्वोत्तम श्रीरामचंद्रजी का सेवक इस संसार में धन्य है।
जो दीनों पर दया करने वाला, मन का कोमल, स्ग्धि-हृदय, कृपाशील और रामजी के सेवकगणों की रक्षा करने वाला है। ऐसे दास के मन में क्रोध और चिडि़चिड़ाहट कहां से आयेगी! सर्वोत्तम रामचंद्रजी का ऐसा दास संसार में धन्य है। रे मन! तू अपने अंदर दुःख को तथा शोक और चिंता को कहीं स्थान ने दे। देह-गेहादि की आसक्ति विवेक करके छोड़ दे और उसी विदेही अवस्था में मुक्ति-सुख का उपभोग कर
* धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
भावार्थ:-वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥
रे मन! राधव के अतिरिक्त तू (दूसरी) कोई बात न कर। जनता में वृथा बोलने से सुख नहीं होता। काल घड़ी-घड़ी आयु को हरण कर रहा है। देहावसान के समय तुझे छुड़ाने वाला (बिना श्रीरामचंद्रजी के) और कौन है? अपने (बुरे) आचरण में सोच-विचार करके परिवर्तन कर। अति आदर के साथ शुध्द आचरण कर। लोगों के सामने जैसा कह, वैसा कर। (और) मन! कल्पना और संसार के दुःख को छोड़ दे।
रे मन! क्रोध की उत्पति मत होने दे। सत्संग में बुध्दि का निवास हो। दुष्ट-संग छोड़ दे। (इस प्रकार) मोक्ष का अधिकारी बन।
जो सोच-विचारकर बोलता है और विवेकपूर्ण आचारण करता है। उसकी संगति से अत्यंत त्रस्त लोगों को भी शांति मिलती है। अतः हित की खोज किये बिना कुछ मत बोल और लोगों में संयमित और शुध्द आचरण कर।
रे मन! सभी आसक्ति छोड़ और अत्यादरपूर्वक सज्जनों की संगति कर। उनकी संगति से संसार का महान दुःख दूर हो जाता है और बिना किसी अन्य साधना के संसार में सन्मार्ग की प्राप्ति होती है
रे मन! सत्संग सर्व (संसार के) संगों से छुड़ाने वाला है। उससे तुरंत मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह संग साधक को भवसागर से शीघ्र पार करता है। सत्संग द्वैत-भावना का समूल नाश करता है।
* सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
भावार्थ:-वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥4॥
(धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है
जो बिना आचरण किये हुए नाना प्रकार की (ब्रह्मज्ञान की) बातें करता है। तुरंत जिसका पानी मन में उसे मन ही मन धिक्कारता है। जिसके मन में कल्पनाओं की मनमानी दौड़ चलती है। ऐसे मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी।
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क्रन्दन्निशाचरकुलां ज्वलनावलीढैः
साक्षाद्गृहैरिव बहिः परिदेवमानाम् |
स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नकृपीटयोनि-
दन्दह्यमाननगरीं परिगाहमानाम् ||
* उनकी तनी हुई पूँछके किनारे अग्नि लगी थी, उससे समस्त लङ्का नगरी अत्यन्त वेगसे जल रही थी, बाहर निशाचरकुलका करुणक्रन्दन मचा हुआ था, उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निज्वालासे झुलसे हुए घर ही बाहर निकलकर रो रहे हैं, ऐसी लङ्कामें चारों ओर दौड़ते हुए हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ |
साक्षाद्गृहैरिव बहिः परिदेवमानाम् |
स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नकृपीटयोनि-
दन्दह्यमाननगरीं परिगाहमानाम् ||
* उनकी तनी हुई पूँछके किनारे अग्नि लगी थी, उससे समस्त लङ्का नगरी अत्यन्त वेगसे जल रही थी, बाहर निशाचरकुलका करुणक्रन्दन मचा हुआ था, उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निज्वालासे झुलसे हुए घर ही बाहर निकलकर रो रहे हैं, ऐसी लङ्कामें चारों ओर दौड़ते हुए हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ |
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दान का रहस्य
दान में महत्व है त्याग का, वस्तु के मूल्य या संख्या का नहीं | ऐसी त्याग बुद्धि से जो सुपात्र को यानी जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उसमे किसी प्रकार की कामना न रखना उतम दान है | निष्कामभाव से किसी भूखे को भोजन और प्यासे को जल देना सात्विक दान है | संत श्रीएकनाथजी की कथा आती है कि एक समय प्रयाग से काँवर पर जल लेकर श्रीरामेशवरम चढाने के लिये जा रहे थे | रास्ते में जब उन्होंने एक जगह देखा कि एक गदाह प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है, उसे देखकर उन्हें दया आ गयी और उन्होंने उसे थोड़ा-सा जल पिलाया, इससे उसे कुछ चेत-सा हुआ | फिर उन्होंने थोड़ा-थोड़ा करके सब जल उसे पिला दिया | वह गदाह उठकर चला गया | साथियों ने सोचा कि त्रिवेणी का जल व्यर्थ ही गया और यात्रा भी निष्फल हो गयी | तब एकनाथजी ने हँसकर कहा – ‘भाइयो, बार-बार सुनते हो, भगवान् सब प्राणियों के अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावलेपन की बात सोचते हो ! मेरी पूजा तो यहीं से श्रीरामेश्वरम को पहुँच गयी | श्रीशंकर जी ने मेरे जल को स्वीकार कर लिया |’
दान में महत्व है त्याग का, वस्तु के मूल्य या संख्या का नहीं | ऐसी त्याग बुद्धि से जो सुपात्र को यानी जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उसमे किसी प्रकार की कामना न रखना उतम दान है | निष्कामभाव से किसी भूखे को भोजन और प्यासे को जल देना सात्विक दान है | संत श्रीएकनाथजी की कथा आती है कि एक समय प्रयाग से काँवर पर जल लेकर श्रीरामेशवरम चढाने के लिये जा रहे थे | रास्ते में जब उन्होंने एक जगह देखा कि एक गदाह प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है, उसे देखकर उन्हें दया आ गयी और उन्होंने उसे थोड़ा-सा जल पिलाया, इससे उसे कुछ चेत-सा हुआ | फिर उन्होंने थोड़ा-थोड़ा करके सब जल उसे पिला दिया | वह गदाह उठकर चला गया | साथियों ने सोचा कि त्रिवेणी का जल व्यर्थ ही गया और यात्रा भी निष्फल हो गयी | तब एकनाथजी ने हँसकर कहा – ‘भाइयो, बार-बार सुनते हो, भगवान् सब प्राणियों के अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावलेपन की बात सोचते हो ! मेरी पूजा तो यहीं से श्रीरामेश्वरम को पहुँच गयी | श्रीशंकर जी ने मेरे जल को स्वीकार कर लिया |’
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कहानी का समय
चुभन
*पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती एक सम्पन्न घर की महिला ने अंततः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया . "नहीं दीदी ! बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा ." बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा .*
*अरे भैया ! एक एक बार की पहनी हुई तो हैं.. ! बिल्कुल नये जैसी . एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं , मैं तो फिर भी दे रही हूँ . नहीं नहीं , तीन से कम में तो नहीं हो पायेगा ." वह फिर बोला .*
*एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की इस प्रक्रिया के दौरान गृह स्वामिनी को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती अर्द्ध विक्षिप्त महिला ने वहाँ आकर खाना माँगा...*
*आदतन हिकारत से उठी महिला की नजरें उस महिला के कपडों पर गयी.... अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके युवा शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी....*
*एकबारगी उस महिला ने मुँह बिचकाया . पर सुबह सुबह का याचक है सोचकर अंदर से रात की बची रोटियाँ मँगवायी . उसे रोटी देकर पलटते हुए उसने बर्तन वाले से कहा -*
*तो भैय्या ! क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ ! "बर्तन वाले ने उसे इस बार चुपचाप टब पकड़ाया और दोनों पुरानी साड़ियाँ अपने गठ्ठर में बाँध कर बाहर निकला...*
*अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई महिला दरवाजा बंद करने को उठी तो सामने नजर गयी... गली के मुहाने पर बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई दोनों साड़ियों में से एक साड़ी उस अर्ध विक्षिप्त महिला को तन ढँकने के लिए दे रहा था ! !!*
*हाथ में पकड़ा हुआ टब अब उसे चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था....! बर्तन वाले के आगे अब वो खुद को हीन महसूस कर रही थी . कुछ हैसियत न होने के बावजूद बर्तन वाले ने उसे परास्त कर दिया था ! !! वह अब अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बिना झिकझिक किये उसने मात्र दो ही साड़ियों में टब क्यों दे दिया था .*
*कुछ देने के लिए आदमी की हैसियत नहीं , दिल बड़ा होना चाहिए....!! आपके पास क्या है ? और कितना है ? यह कोई मायने नहीं रखता ! आपकी सोच व नियत सर्वोपरि होना आवश्यक है .*
*और ये वही समझता है जो इन परिस्थितियों से गुजरा हो.....*
चुभन
*पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती एक सम्पन्न घर की महिला ने अंततः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया . "नहीं दीदी ! बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा ." बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा .*
*अरे भैया ! एक एक बार की पहनी हुई तो हैं.. ! बिल्कुल नये जैसी . एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं , मैं तो फिर भी दे रही हूँ . नहीं नहीं , तीन से कम में तो नहीं हो पायेगा ." वह फिर बोला .*
*एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की इस प्रक्रिया के दौरान गृह स्वामिनी को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती अर्द्ध विक्षिप्त महिला ने वहाँ आकर खाना माँगा...*
*आदतन हिकारत से उठी महिला की नजरें उस महिला के कपडों पर गयी.... अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके युवा शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी....*
*एकबारगी उस महिला ने मुँह बिचकाया . पर सुबह सुबह का याचक है सोचकर अंदर से रात की बची रोटियाँ मँगवायी . उसे रोटी देकर पलटते हुए उसने बर्तन वाले से कहा -*
*तो भैय्या ! क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ ! "बर्तन वाले ने उसे इस बार चुपचाप टब पकड़ाया और दोनों पुरानी साड़ियाँ अपने गठ्ठर में बाँध कर बाहर निकला...*
*अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई महिला दरवाजा बंद करने को उठी तो सामने नजर गयी... गली के मुहाने पर बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई दोनों साड़ियों में से एक साड़ी उस अर्ध विक्षिप्त महिला को तन ढँकने के लिए दे रहा था ! !!*
*हाथ में पकड़ा हुआ टब अब उसे चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था....! बर्तन वाले के आगे अब वो खुद को हीन महसूस कर रही थी . कुछ हैसियत न होने के बावजूद बर्तन वाले ने उसे परास्त कर दिया था ! !! वह अब अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बिना झिकझिक किये उसने मात्र दो ही साड़ियों में टब क्यों दे दिया था .*
*कुछ देने के लिए आदमी की हैसियत नहीं , दिल बड़ा होना चाहिए....!! आपके पास क्या है ? और कितना है ? यह कोई मायने नहीं रखता ! आपकी सोच व नियत सर्वोपरि होना आवश्यक है .*
*और ये वही समझता है जो इन परिस्थितियों से गुजरा हो.....*
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अहंकार तथा स्वार्थ का
त्याग ही सार है |
स्वार्थबुध्दि श्रध्दा और प्रेम दोनों का नाश कर देती है | परमात्मा की प्राप्ति में विलम्ब के प्रधान कारण संसार के पदार्थों में आसक्ति, ममता, देह में अहंकार और स्वार्थबुध्दि ये चारों हैं | इन चारों में से एक होने पर भी पतन हो जाता है | कई लोग संसार में प्रचार करना चाहते हैं पर ये चारों बातें प्रचार में बाधक होती हैं | अधिकाँश लोग तो भगवान् के नाम-रूप को निमित बनाकर अपने ही नाम-रूप का प्रचार करते हैं, इसलिये ठीक प्रचार नहीं होता | जो मनुष्य जितनी मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा चाहता है उतनी ही उसमे अहंकार की अधिक मात्रा है | अहंकार इस सबकी जड है | इसके कारण ही मान, बड़ाई की इच्छा होगी, आराम और मान चाहेगा |
अहंकार को त्यागकर निर्मम होकर विचरना चाहिये | यही भक्ति और ज्ञान के सिध्दान्त में देखिये | जो अपने को जितना नीचा समझता है वह उतना उठता है और जो ऊँचा समझता है वह उतना ही गिरता है | निरहंकारता सबसे बढकर है |
ज्ञान के सिध्दान्त में भी यही बात है | जब तक देह का अभिमान रहता है तब तक ज्ञान के मार्ग में नहीं चल सकता |
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित वाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है, क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है | (गीता १२/५) |
वहां भी देह के अभिमान का त्याग ही बतलाया है | संसार में जो भी अपना कल्याण चाहता है उसे देहाभिमान निकाल देना चाहिये | प्रचारक के मन में जब अभिमान आ जाता है तभी प्रचार रुक जाता है | देवताओं को अभिमान हुआ तो भगवान् ने यक्ष का रूप धारण कर उनके अभिमान को दूर किया | अग्नि, वायु को ज्ञान हो गया कि हममे हमारी शक्ति नहीं है, अपितु भगवान् की है |
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान | (गीता १०/४१) |
त्याग ही सार है |
स्वार्थबुध्दि श्रध्दा और प्रेम दोनों का नाश कर देती है | परमात्मा की प्राप्ति में विलम्ब के प्रधान कारण संसार के पदार्थों में आसक्ति, ममता, देह में अहंकार और स्वार्थबुध्दि ये चारों हैं | इन चारों में से एक होने पर भी पतन हो जाता है | कई लोग संसार में प्रचार करना चाहते हैं पर ये चारों बातें प्रचार में बाधक होती हैं | अधिकाँश लोग तो भगवान् के नाम-रूप को निमित बनाकर अपने ही नाम-रूप का प्रचार करते हैं, इसलिये ठीक प्रचार नहीं होता | जो मनुष्य जितनी मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा चाहता है उतनी ही उसमे अहंकार की अधिक मात्रा है | अहंकार इस सबकी जड है | इसके कारण ही मान, बड़ाई की इच्छा होगी, आराम और मान चाहेगा |
अहंकार को त्यागकर निर्मम होकर विचरना चाहिये | यही भक्ति और ज्ञान के सिध्दान्त में देखिये | जो अपने को जितना नीचा समझता है वह उतना उठता है और जो ऊँचा समझता है वह उतना ही गिरता है | निरहंकारता सबसे बढकर है |
ज्ञान के सिध्दान्त में भी यही बात है | जब तक देह का अभिमान रहता है तब तक ज्ञान के मार्ग में नहीं चल सकता |
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित वाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है, क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है | (गीता १२/५) |
वहां भी देह के अभिमान का त्याग ही बतलाया है | संसार में जो भी अपना कल्याण चाहता है उसे देहाभिमान निकाल देना चाहिये | प्रचारक के मन में जब अभिमान आ जाता है तभी प्रचार रुक जाता है | देवताओं को अभिमान हुआ तो भगवान् ने यक्ष का रूप धारण कर उनके अभिमान को दूर किया | अग्नि, वायु को ज्ञान हो गया कि हममे हमारी शक्ति नहीं है, अपितु भगवान् की है |
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान | (गीता १०/४१) |
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।।श्रीहरिः।।
संत सूरदास
*जिहिं तन हरि भजन न कियौ ।*
*सो तन सुकर-स्वान-मीन ज्यौं,इहिं सुख कहा जियौ।।*
*जो जगदीस ईस सबहिनि कौ, ताहि न चित्त दियौ।*
*प्रगट जानि जदुनाथ बिसारयौ आसा-मद जु पियौ।।*
*चारि पदारथ के प्रभु दाता, तिन्हैं न मिल्यौं हियौ।*
*"सूरदास " रसना बस अपनै, टैरि न नाम लियौ।।*
*जिस शरीर से श्रीहरि का भजन नहीं किया गया,वह शरीर तो सुअर, कुत्ते और मछली के समान निन्दित है, उसके जीवित रहने क्या लाभ हुआ?जो जगदीश्वर सभी के स्वामी हैं,उनमें चित्त नहीं लगाया भगवान श्रीकृष्ण को सबमें आत्म रूप में प्रकट देखकर भी भुला दिया और आशा का नशा पीकर उन्मत्त हो गया अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष चारों ही पुरुषार्थों को देने वाले प्रभु हैं,उनमें अनुराग नहीं हुआ श्री सूरदास जी कहते हैं जीभ अपने वश में है,फिर भी श्रीभगवान का नाम जोर जोर से पुकारकर नहीं लिया, ऐसा जीवन पशुओं के समान निन्दित ही है।।*
संत सूरदास
*जिहिं तन हरि भजन न कियौ ।*
*सो तन सुकर-स्वान-मीन ज्यौं,इहिं सुख कहा जियौ।।*
*जो जगदीस ईस सबहिनि कौ, ताहि न चित्त दियौ।*
*प्रगट जानि जदुनाथ बिसारयौ आसा-मद जु पियौ।।*
*चारि पदारथ के प्रभु दाता, तिन्हैं न मिल्यौं हियौ।*
*"सूरदास " रसना बस अपनै, टैरि न नाम लियौ।।*
*जिस शरीर से श्रीहरि का भजन नहीं किया गया,वह शरीर तो सुअर, कुत्ते और मछली के समान निन्दित है, उसके जीवित रहने क्या लाभ हुआ?जो जगदीश्वर सभी के स्वामी हैं,उनमें चित्त नहीं लगाया भगवान श्रीकृष्ण को सबमें आत्म रूप में प्रकट देखकर भी भुला दिया और आशा का नशा पीकर उन्मत्त हो गया अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष चारों ही पुरुषार्थों को देने वाले प्रभु हैं,उनमें अनुराग नहीं हुआ श्री सूरदास जी कहते हैं जीभ अपने वश में है,फिर भी श्रीभगवान का नाम जोर जोर से पुकारकर नहीं लिया, ऐसा जीवन पशुओं के समान निन्दित ही है।।*
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हनुमान जी, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवता हैं, जो महाकाव्य रामायण में विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये भक्त हैं और भगवान श्रीराम के प्रमुख सेवक रहे हैं। हनुमान जी को पवनपुत्र हनुमान, मारुति, अंजनीपुत्र, वायुपुत्र भी कहा जाता है। वे वानर रूप में होते हैं, लेकिन उनकी दिव्य शक्तियाँ उन्हें अन्य सभी देवताओं से भिन्न बनाती हैं।
हनुमान जी का प्रमुख कार्य भगवान श्रीराम की सेवा करना था। उन्होंने अपनी अद्वितीय भक्ति, वीरता, और सेवाभाव के माध्यम से भगवान श्रीराम की सहायता की और उनकी अनगिनत कठिनाइयों को आसानी से पार किया। हनुमान जी की भक्ति और सेवाभावना अद्वितीय हैं।
उनका हृदय पूरी तरह से भगवान श्रीराम में समर्पित है। वे भक्तों को भगवान के प्रति प्रेम और आस्था की शक्ति प्रदान करते हैं। हनुमान जी की कहानी वानर सेना के महान सेनानायक के रूप में रामायण में प्रस्तुत है। उन्होंने अशोकवाटिका में सीता माता को ढूंढने के लिए अपने अद्वितीय बल और वीरता का प्रदर्शन किया। हनुमान जी को अनगिनत शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे कि अमरत्व, व्योमकाय, अनिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्तिगम्य, इन्द्रिया-संग्राहक, इत्यादि।
हनुमान जी का आराधना का विशेष महत्व है, और हनुमान चालीसा, हनुमान आरती, और रामायण का पाठ करने से उनकी कृपा मिलती है। हनुमान जी एक अद्भुत देवता हैं, जो विश्व में भक्तों को शक्ति, साहस, और भगवान की प्रेम भावना से युक्त करते हैं।
भगवान शिव से हनुमान जी को आशीर्वाद मिलने का कारण विशेष है, जो हिन्दू धर्म में भक्ति और श्रद्धा से जुड़े हैं। हनुमान जी भगवान शिव के एक गुणी भक्त थे, उन्होंने अपनी पूरी भक्ति और सेवा के माध्यम से भगवान शिव को प्रसन्न किया था। इससे हनुमान जी को शिव भगवान के कृपादृष्टि का अद्भुत आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
हनुमान जी ब्रह्मचारी थे और उन्होंने अपनी आत्मा को भगवान की सेवा में समर्पित किया। उनकी अद्वितीय तपस्या और वीरता ने उन्हें भगवान शिव के प्रति अद्वितीय आसक्ति की प्राप्ति में सहायक बनाया।
हनुमान जी भगवान राम के प्रमुख भक्त थे और उनकी अद्वितीय राम भक्ति ने उन्हें अद्वितीय आत्मा के साथ भगवान शिव के साक्षात्कार की अनुभूति कराई। इससे उन्हें शिव भगवान के आशीर्वाद की पूर्णता मिली।
हनुमान जी भगवान शिव के प्रति अत्यंत प्रेम और विनम्रता के साथ रहते थे। उनकी शिव भगवान के प्रति अनबंधित प्रेम ने उन्हें भगवान के कृपादृष्टि में लाने में सहायक बनाया।
रामायण में वर्णित है कि भगवान शिव और पार्वती ने हनुमान को अपने आशीर्वाद से सम्पन्न किया। उन्होंने हनुमान को अद्वितीय बुद्धि, वीरता, और भगवान राम के सेवा में समर्पित रहने की शक्ति दी।
इस प्रकार, हनुमान जी ने अपनी पूरी भक्ति, सेवा, और प्रेम भावना के साथ भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया जो उन्हें अद्वितीय गुणों से सम्पन्न बना दिया।
हनुमान जी का प्रमुख कार्य भगवान श्रीराम की सेवा करना था। उन्होंने अपनी अद्वितीय भक्ति, वीरता, और सेवाभाव के माध्यम से भगवान श्रीराम की सहायता की और उनकी अनगिनत कठिनाइयों को आसानी से पार किया। हनुमान जी की भक्ति और सेवाभावना अद्वितीय हैं।
उनका हृदय पूरी तरह से भगवान श्रीराम में समर्पित है। वे भक्तों को भगवान के प्रति प्रेम और आस्था की शक्ति प्रदान करते हैं। हनुमान जी की कहानी वानर सेना के महान सेनानायक के रूप में रामायण में प्रस्तुत है। उन्होंने अशोकवाटिका में सीता माता को ढूंढने के लिए अपने अद्वितीय बल और वीरता का प्रदर्शन किया। हनुमान जी को अनगिनत शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे कि अमरत्व, व्योमकाय, अनिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्तिगम्य, इन्द्रिया-संग्राहक, इत्यादि।
हनुमान जी का आराधना का विशेष महत्व है, और हनुमान चालीसा, हनुमान आरती, और रामायण का पाठ करने से उनकी कृपा मिलती है। हनुमान जी एक अद्भुत देवता हैं, जो विश्व में भक्तों को शक्ति, साहस, और भगवान की प्रेम भावना से युक्त करते हैं।
भगवान शिव से हनुमान जी को आशीर्वाद मिलने का कारण विशेष है, जो हिन्दू धर्म में भक्ति और श्रद्धा से जुड़े हैं। हनुमान जी भगवान शिव के एक गुणी भक्त थे, उन्होंने अपनी पूरी भक्ति और सेवा के माध्यम से भगवान शिव को प्रसन्न किया था। इससे हनुमान जी को शिव भगवान के कृपादृष्टि का अद्भुत आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
हनुमान जी ब्रह्मचारी थे और उन्होंने अपनी आत्मा को भगवान की सेवा में समर्पित किया। उनकी अद्वितीय तपस्या और वीरता ने उन्हें भगवान शिव के प्रति अद्वितीय आसक्ति की प्राप्ति में सहायक बनाया।
हनुमान जी भगवान राम के प्रमुख भक्त थे और उनकी अद्वितीय राम भक्ति ने उन्हें अद्वितीय आत्मा के साथ भगवान शिव के साक्षात्कार की अनुभूति कराई। इससे उन्हें शिव भगवान के आशीर्वाद की पूर्णता मिली।
हनुमान जी भगवान शिव के प्रति अत्यंत प्रेम और विनम्रता के साथ रहते थे। उनकी शिव भगवान के प्रति अनबंधित प्रेम ने उन्हें भगवान के कृपादृष्टि में लाने में सहायक बनाया।
रामायण में वर्णित है कि भगवान शिव और पार्वती ने हनुमान को अपने आशीर्वाद से सम्पन्न किया। उन्होंने हनुमान को अद्वितीय बुद्धि, वीरता, और भगवान राम के सेवा में समर्पित रहने की शक्ति दी।
इस प्रकार, हनुमान जी ने अपनी पूरी भक्ति, सेवा, और प्रेम भावना के साथ भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया जो उन्हें अद्वितीय गुणों से सम्पन्न बना दिया।
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"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च"
जो प्राणी जन्म ग्रहण करता है, उसे समय आने पर मरना भी पड़ता है और जो मरता है उसे जन्म लेना पड़ता है , पुर्नजन्म का यह सिद्धांत सनातन धर्म की अपनी विशेषता है, जीवन की परिसमाप्ति मृत्यु से होती है, इस ध्रुव सत्य को सभी ने स्वीकार किया है और यह प्रत्यक्ष भी दिखाई पड़ता है , इसीलिए कालमृत्यु से आक्रान्त मनुष्य की रक्षा करने मे औषधि, तपश्चर्या ,दान और माता -पिता एवं बन्धु -बान्धव कोई भी समर्थ नहीं है ---
"नौषधं न तपो दानं न माता न च बान्धवाः।
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीड़ितम्।।" (पद्म पुराण २/६६/१२७)
जीवात्मा इतना सूक्ष्म होता है कि जब शरीर से निकलता है, उस समय कोई भी मनुष्य उसे अपनी चर्मचक्षुओं से देख नहीं सकता और यही जीवात्मा अपने कर्मों के भोगों को भोगने के लिए एक अंगुष्ठ पर्व परिमित अतिवाहिक सूक्ष्म(अतीन्द्रिय) शरीर धारण करता है --
"तत्क्षणात् सो$थ गृहणाति शारीरं चातिवाहिकम्। अंगुष्ठपर्वमात्रं तु स्वप्राणैरेव निर्मितम्।।"(स्कन्द पुराण १/२/५०/६२)।।
जो माता-पिता के शुक्र-शोणित द्वारा बनने वाले शरीर से भिन्न होता है --
"वाय्वग्रसारी तद्रूप देहमन्यत् प्रपद्ये।
तत्कर्मयातनार्थे च न मातृपितृसम्भवम् ।।(ब्रह्म पुराण २१४/४६)
इस अतीन्द्रिय शरीर से ही जीवात्मा अपने द्वारा किए हुए धर्म और अर्धम के परिणाम स्वरूप सुख -दु:ख को भोगता है तथा इसी सूक्ष्म शरीर से पाप करने वाले मनुष्य याम्यमार्ग की यातनाएं भोगते हुए यमराज के पास पहुँचते हैं एवं धार्मिक जन प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग करते हुए धर्मराज के पास जाते हैं, साथ ही यह बात ध्यान देने योग्य है कि केवल मनुष्य ही मृत्यु के पश्चात 'आतिवाहिक' सूक्ष्म (अतीन्द्रिय) शरीर धारण करते हैं, और उसी शरीर को यमपुरूषों के द्वारा याम्यपथ से यमराज के पास ले जाया जाता है, अन्य प्राणियों को नहीं ; क्योंकि अन्य प्राणियों को यह सूक्ष्म शरीर प्राप्त ही नहीं होता वे तो तत्काल दूसरी योनियों में जन्म पा जाते हैं।
पशु पक्षी आदि नाना तिर्यक-योनियों के प्राणी मृत्यु के बाद वायु रूप में विचरण करते हुए पुनः किसी योनि विशेष में जन्म- ग्रहण हेतु उस योनि के गर्भ में आ जाते हैं, केवल मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का अच्छा -बुरा परिणाम इहलोक और में भोगना पड़ता है ---
मनुष्याः प्रतिपद्यन्ते स्वर्गं नरकमेव वा।
नैवान्ये प्राणिनः केचित् सर्वं ते फलभोगिनः।।
शुभानामशुभानां वा कर्मणां भृगुनन्दन ।
सञ्चयः क्रियते लोके मनुष्यैरेव केवलम्।।
तस्मान् मनुष्यस्तु मृतो यमलोकं प्रपद्ये ।
नान्य: प्राणी महाभाग फलयोनौ व्यवस्थित:।।
अपने कर्मों के फलस्वरूप मृत्यु के पश्चात जीवात्मा सूक्ष्म शरीर धारण करके स्वर्ग या नरक भोगता है और तत्पश्चात उसका पुनर्जन्म होता है या उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जो प्राणी जन्म ग्रहण करता है, उसे समय आने पर मरना भी पड़ता है और जो मरता है उसे जन्म लेना पड़ता है , पुर्नजन्म का यह सिद्धांत सनातन धर्म की अपनी विशेषता है, जीवन की परिसमाप्ति मृत्यु से होती है, इस ध्रुव सत्य को सभी ने स्वीकार किया है और यह प्रत्यक्ष भी दिखाई पड़ता है , इसीलिए कालमृत्यु से आक्रान्त मनुष्य की रक्षा करने मे औषधि, तपश्चर्या ,दान और माता -पिता एवं बन्धु -बान्धव कोई भी समर्थ नहीं है ---
"नौषधं न तपो दानं न माता न च बान्धवाः।
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीड़ितम्।।" (पद्म पुराण २/६६/१२७)
जीवात्मा इतना सूक्ष्म होता है कि जब शरीर से निकलता है, उस समय कोई भी मनुष्य उसे अपनी चर्मचक्षुओं से देख नहीं सकता और यही जीवात्मा अपने कर्मों के भोगों को भोगने के लिए एक अंगुष्ठ पर्व परिमित अतिवाहिक सूक्ष्म(अतीन्द्रिय) शरीर धारण करता है --
"तत्क्षणात् सो$थ गृहणाति शारीरं चातिवाहिकम्। अंगुष्ठपर्वमात्रं तु स्वप्राणैरेव निर्मितम्।।"(स्कन्द पुराण १/२/५०/६२)।।
जो माता-पिता के शुक्र-शोणित द्वारा बनने वाले शरीर से भिन्न होता है --
"वाय्वग्रसारी तद्रूप देहमन्यत् प्रपद्ये।
तत्कर्मयातनार्थे च न मातृपितृसम्भवम् ।।(ब्रह्म पुराण २१४/४६)
इस अतीन्द्रिय शरीर से ही जीवात्मा अपने द्वारा किए हुए धर्म और अर्धम के परिणाम स्वरूप सुख -दु:ख को भोगता है तथा इसी सूक्ष्म शरीर से पाप करने वाले मनुष्य याम्यमार्ग की यातनाएं भोगते हुए यमराज के पास पहुँचते हैं एवं धार्मिक जन प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग करते हुए धर्मराज के पास जाते हैं, साथ ही यह बात ध्यान देने योग्य है कि केवल मनुष्य ही मृत्यु के पश्चात 'आतिवाहिक' सूक्ष्म (अतीन्द्रिय) शरीर धारण करते हैं, और उसी शरीर को यमपुरूषों के द्वारा याम्यपथ से यमराज के पास ले जाया जाता है, अन्य प्राणियों को नहीं ; क्योंकि अन्य प्राणियों को यह सूक्ष्म शरीर प्राप्त ही नहीं होता वे तो तत्काल दूसरी योनियों में जन्म पा जाते हैं।
पशु पक्षी आदि नाना तिर्यक-योनियों के प्राणी मृत्यु के बाद वायु रूप में विचरण करते हुए पुनः किसी योनि विशेष में जन्म- ग्रहण हेतु उस योनि के गर्भ में आ जाते हैं, केवल मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का अच्छा -बुरा परिणाम इहलोक और में भोगना पड़ता है ---
मनुष्याः प्रतिपद्यन्ते स्वर्गं नरकमेव वा।
नैवान्ये प्राणिनः केचित् सर्वं ते फलभोगिनः।।
शुभानामशुभानां वा कर्मणां भृगुनन्दन ।
सञ्चयः क्रियते लोके मनुष्यैरेव केवलम्।।
तस्मान् मनुष्यस्तु मृतो यमलोकं प्रपद्ये ।
नान्य: प्राणी महाभाग फलयोनौ व्यवस्थित:।।
अपने कर्मों के फलस्वरूप मृत्यु के पश्चात जीवात्मा सूक्ष्म शरीर धारण करके स्वर्ग या नरक भोगता है और तत्पश्चात उसका पुनर्जन्म होता है या उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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करुणावरुणालय श्रीमद्राघवेन्द्र सरकार महाप्रभु अप्राकृत और सच्चिदानन्दघन हैं। उनके नाम भी अप्राकृत और सच्चिदानन्द-स्वरूप हैं। भगवान् श्रीराम सर्वथा पूर्ण, शुद्ध, नित्यमुक्त और रसस्वरूप एवं रससिद्ध हैं। उनका नाम भी रसात्मक और त्रयताप-विनाशक है। संत रज्जब कहते हैं-
राम रस पीजिये रे, पीये सब सुख होय।
पीवत ही पातक कटै सब संतनि दिसि जोय।।
निसिदिन सुमिरण कीजिये तन-मन-प्राण समोय।
जनम सुफल साईं मिलै, सोइ जपि साधहु दोय।।
श्रीरामनाम का निरन्तर उच्चारण अथवा जप उस आध्यात्मिक लोक का मार्ग है, जहाँ सच्चे तत्त्व का अस्तित्व है। सत्य की सिद्धि के लिये प्रधान आवश्यकता इस बात की है कि निष्ठापूर्वक निरन्तर भगवन्नाम का जप किया जाय।
भगवन्नामोच्चार के समय हृदय द्रवित हो उठे, नेत्रों में प्रेमाश्रु छलक आयें, शरीर पुलकायमान हो उठे तो समझो नाम की सिद्धि हो गयी। गोस्वामीजीने कहा है कि-
हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम।
द्रवहिं स्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत नाम।।
और भगवान् राम ने कहा है-
मम गुन गावत पुलक सरीरा।
गदगद गिरा नयन बह नीरा।।
प्रभुपाद-पद्म के अनन्यानुरागी भरतलालजी को यह स्थिति सहज प्राप्त थी। नन्दिग्राम की पर्णकुटी में वास करते समय जो उनकी दशा हो रही थी, वही भक्ति की पराकाष्ठा है-
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू।
जीह नामु जप लोचन नीरू।।
अतः श्री राम नाम की प्राप्ति का मार्ग भक्ति साधना ही है।
राम रस पीजिये रे, पीये सब सुख होय।
पीवत ही पातक कटै सब संतनि दिसि जोय।।
निसिदिन सुमिरण कीजिये तन-मन-प्राण समोय।
जनम सुफल साईं मिलै, सोइ जपि साधहु दोय।।
श्रीरामनाम का निरन्तर उच्चारण अथवा जप उस आध्यात्मिक लोक का मार्ग है, जहाँ सच्चे तत्त्व का अस्तित्व है। सत्य की सिद्धि के लिये प्रधान आवश्यकता इस बात की है कि निष्ठापूर्वक निरन्तर भगवन्नाम का जप किया जाय।
भगवन्नामोच्चार के समय हृदय द्रवित हो उठे, नेत्रों में प्रेमाश्रु छलक आयें, शरीर पुलकायमान हो उठे तो समझो नाम की सिद्धि हो गयी। गोस्वामीजीने कहा है कि-
हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम।
द्रवहिं स्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत नाम।।
और भगवान् राम ने कहा है-
मम गुन गावत पुलक सरीरा।
गदगद गिरा नयन बह नीरा।।
प्रभुपाद-पद्म के अनन्यानुरागी भरतलालजी को यह स्थिति सहज प्राप्त थी। नन्दिग्राम की पर्णकुटी में वास करते समय जो उनकी दशा हो रही थी, वही भक्ति की पराकाष्ठा है-
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू।
जीह नामु जप लोचन नीरू।।
अतः श्री राम नाम की प्राप्ति का मार्ग भक्ति साधना ही है।
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धर्म का स्वाद
चिंतन-मनन द्वारा धर्म की सैद्धांतिक जानकारी कर लेने मात्र से हमारा वास्तविक लाभ नहीं होता। यह जान और समझ लेने मात्र से कि रसगुल्ला मीठा है, हमारा मुँह मीठा नहीं हो सकता। उसके लिए हमें रसगुल्ला जीभ पर धरना ही होता है।
केवल यह जान और समझ लेने से कि दूध पुष्टिकारक है, हमारी देह पुष्ट नहीं हो जाती। उसके लिए तो हमें दूध पीना ही होता है। जानना और समझ लेना हमारे कल्याण की पहली सीढ़ियां हैं। परंतु केवल जान और समझ कर ही रुक जायें और जानी समझी बात को जीवन में न उतारें तो ऐसा जानना समझना व्यर्थ गया। कोरा बुद्धिविलास, कोरी दिमागी कसरत हुई और यही तो हम करते हैं।
धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांतों के ऊहापोह, वाद-विवाद, चर्चा परिचर्चा, बहस-मुबाहिसा, खंडन-मंडन, तर्क-वितर्क, व्यंजना-विश्लेषण, समझने-समझाने, सुनने सुनाने, पढ़ने पढ़ाने, लिखने लिखाने और बोलने बतलाने में ही हम अपना सारा जीवन बिता देते हैं और दुर्भाग्य यह है कि इसी में अपने जीवन की सफलता मानते हैं।
अजीब संतोष होता है हमें अपनी धर्म जिज्ञासा पूरी कर लेने में तथा बौद्धिक स्तर पर जाने हुए उस धर्म-ज्ञान को लच्छेदार भाषा में व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त कर लेने में। इस आत्म संतुष्टि को ही हमने जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया है। सचमुच, कैसा आकर्षक है यह मृगजाल, जिसमें कि हम इतनी आसानी से फंस जाते हैं और फिर इस बंधन को ही आभूषण मान कर गर्व अनुभव करते हैं।
चाख धर्म का स्वाद-
मत कर, मत कर, बावला, मत कर वाद-विवाद।
खाल बाल की बैंच मत, चाख धर्म का स्वाद।।
कितने दिन यूं ही गए, करते बुद्धि-विलास।
धर्म स्वाद चाखा नहीं, बुझी न मन की प्यास।।
चर्चा ही चर्चा करे, धारण करे न कोय।
धर्म बिचारा क्या करे? धारे ही सुख होय।।
यही धर्म का नियम है, यही धर्म की रीत।
धारे ही ही निर्मल बने, पावन बने पुनीत।।
जीवन सारा खो दिया, ग्रंथ पढ़त पढंत।
तोता मैना की तरह, नाम रटंत रटंत।।
मानव जीवन रतन सा, किया व्यर्थ बरबाद।
चर्चा कर ली धर्म की, चाख न पाया स्वाद।।
चिंतन-मनन द्वारा धर्म की सैद्धांतिक जानकारी कर लेने मात्र से हमारा वास्तविक लाभ नहीं होता। यह जान और समझ लेने मात्र से कि रसगुल्ला मीठा है, हमारा मुँह मीठा नहीं हो सकता। उसके लिए हमें रसगुल्ला जीभ पर धरना ही होता है।
केवल यह जान और समझ लेने से कि दूध पुष्टिकारक है, हमारी देह पुष्ट नहीं हो जाती। उसके लिए तो हमें दूध पीना ही होता है। जानना और समझ लेना हमारे कल्याण की पहली सीढ़ियां हैं। परंतु केवल जान और समझ कर ही रुक जायें और जानी समझी बात को जीवन में न उतारें तो ऐसा जानना समझना व्यर्थ गया। कोरा बुद्धिविलास, कोरी दिमागी कसरत हुई और यही तो हम करते हैं।
धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांतों के ऊहापोह, वाद-विवाद, चर्चा परिचर्चा, बहस-मुबाहिसा, खंडन-मंडन, तर्क-वितर्क, व्यंजना-विश्लेषण, समझने-समझाने, सुनने सुनाने, पढ़ने पढ़ाने, लिखने लिखाने और बोलने बतलाने में ही हम अपना सारा जीवन बिता देते हैं और दुर्भाग्य यह है कि इसी में अपने जीवन की सफलता मानते हैं।
अजीब संतोष होता है हमें अपनी धर्म जिज्ञासा पूरी कर लेने में तथा बौद्धिक स्तर पर जाने हुए उस धर्म-ज्ञान को लच्छेदार भाषा में व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त कर लेने में। इस आत्म संतुष्टि को ही हमने जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया है। सचमुच, कैसा आकर्षक है यह मृगजाल, जिसमें कि हम इतनी आसानी से फंस जाते हैं और फिर इस बंधन को ही आभूषण मान कर गर्व अनुभव करते हैं।
चाख धर्म का स्वाद-
मत कर, मत कर, बावला, मत कर वाद-विवाद।
खाल बाल की बैंच मत, चाख धर्म का स्वाद।।
कितने दिन यूं ही गए, करते बुद्धि-विलास।
धर्म स्वाद चाखा नहीं, बुझी न मन की प्यास।।
चर्चा ही चर्चा करे, धारण करे न कोय।
धर्म बिचारा क्या करे? धारे ही सुख होय।।
यही धर्म का नियम है, यही धर्म की रीत।
धारे ही ही निर्मल बने, पावन बने पुनीत।।
जीवन सारा खो दिया, ग्रंथ पढ़त पढंत।
तोता मैना की तरह, नाम रटंत रटंत।।
मानव जीवन रतन सा, किया व्यर्थ बरबाद।
चर्चा कर ली धर्म की, चाख न पाया स्वाद।।
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श्रीभैरवपञ्जरकवचम् ॥
पार्वत्युवाच
देव देव महादेव संसार प्रियकारक ।
पञ्जरं बटुकस्यास्य कथनीयं मम प्रभो ॥१॥
श्रीशिव उवाच -
पूर्वम् भस्मासुरत्रासाद् भय विह्वलतां स्वयम् ।
पठनादेव मे प्राणा रक्षितः परमेश्वरि ॥२॥
सर्वदुष्टविनाशाय सर्वरोगनिवारणम् ।
दुःखशान्तिकरं देवि ह्यल्पमृत्युभयापहम् ॥३॥
राज्ञां वश्यकरं चैव त्रैलोक्य विजयप्रदम् ।
सर्वलोकेषु पूज्यश्च लक्ष्मीस्तस्य गृहे स्थिरा ॥४॥
अनुष्ठानं कृतं देवि पूजनं च दिने दिने ।
विना पञ्जरपाठेन तत्सर्वं निष्फलं भवेत् ॥६॥
अस्य श्रीबटुकभैरवपञ्जरकवचमन्त्रस्य
कालाग्निरुद्रः ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः ।
ॐ बटुकभैरवो देवता । ह्रां बीजं
ॐ भैरवी वल्लभा शक्तिः ।
ॐ दण्डपाणये नमः कीलकम् ।
मम सकलकामनासिद्ध्यर्धे जपे विनियोगः ॥
ॐ ह्रां प्राच्यां डमरुहस्तो रक्तवर्णो महाबलः ।
प्रत्यक्षमहमीशान बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रीं दण्डधारी दक्षिणे च पश्चिमे खड्गधारिणे ।
ॐ ह्रूं घटावादी मूतिरुत्तरस्यां दिशिस्तथा ।
ॐ ह्रैं अग्निरूपो ह्याग्नेय्यां नैरृत्यां च दिगम्बरः ।
ॐ ह्रौं सर्वभूतस्थो वायव्ये भूतानां हितकारकः ॥
ॐ ह्रश्चवाष्टसिद्धिश्च ईशाने सर्वसिद्धिकरः परः ।
प्रत्यक्षमहमीशान बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः स्वाहा ऊर्ध्वं खेचरिणं न्यसेत् ।
रुद्ररूपस्तु पाताले बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रीं बटुकाय मूर्ध्नि ललाटे भीमरूपिणम् ।
आपदुद्धरणं नेत्रे मुखे च बटुकं न्यसेत् ॥१॥
कुरु कुरु सर्वसिद्धिर्देहे गेहे व्यवस्थितः ।
बटुकाय ह्रीं सर्वदेहे विश्वस्य सर्वतो दिशि ॥२॥
आपदुद्धारकः पातु ह्यापादतलमस्तकम् ।
हसक्षमलवरयुं पातु पूर्वे दण्डहस्तस्तु दक्षिणे ॥३॥
हसक्षमलवरयुं नैरृत्ये हसक्षमलवरयुं पश्चिमेऽवतु ।
सर्वभूतस्थो वायव्ये हसक्षमलवरयुं घटावादिन उत्तरे ॥४॥
हंसः सोहं तु ईशाने चाष्टसिद्धिकरः परः ।
शंक्षेत्रपाल ऊर्ध्वे तु पाताले शिव सन्निभः ॥५॥
एवं दशदिशो रक्षेद्बटुकाय नमो नमः ।
इति ते कथितं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सदाऽवतु ॥६॥
ॐ फ्रें हुं फट् च सर्वत्र त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ।
लक्ष्मीं ऐं श्रीं लं पृथिव्यां च आकारो हं ममावतु ॥७॥
स्रौं प्रौं ज्रौं ऊँ यं वायव्यां रं रं रं तेजोरूपिणम् ।
ॐ कं खं गं घं ङं बटुकं चं छं जं झं ञं कपालिनम् ॥८॥
टं ठं डं ढं णं क्षेत्रेशं तं थं दं धं नं उमाप्रियम् ।
पं फं बं भं मं ममरक्ष यं रं लं भैरवोत्तमम् ॥९॥
वं शं षं सं आदिनाथं लं क्षं वै क्षेत्रपालकम् ।
एवं पञ्जरमाख्यातं सर्वसिद्धिकरं भवेत् ॥१०॥
{(फलश्रुतिः)}
दुःखदारिद्र्यशमनं रक्षकः सर्वतो दिशः ।
आवश्यं सर्वतो वक्ष्यं सर्वबीजैश्च सम्पुटम् ॥११॥
सर्वरोगहरं दिव्यं सर्वत्र सुखमाप्नुयात् ।
एवं रहस्यमाख्यातं देवानामपि दुर्लभम् ॥१२॥
वज्रपञ्जरनामेदं ये शृण्वन्ति वरानने ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं कीर्तिलाभः सुखं जयः ॥१३॥
लक्ष्मी मनोरमा बुद्धिस्तेषां गेहे व्यवस्थिता ।
सुशीलाय सुदान्ताय गुरुभक्तिपराय च ॥१४॥
तस्य शीघ्रं च दातव्यमन्यथा न कदाचन ।
गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वगोप्यमयं भवेत् ॥१५॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ।
राज्यं देयं शिरो देयं न देयं भैरवाक्षरम् ॥१६॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं पठते नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो शिवेन सह मोदते ॥१७॥
॥ इति श्रीभैरवपञ्जरकवचं सम्पूर्णम् ॥
पार्वत्युवाच
देव देव महादेव संसार प्रियकारक ।
पञ्जरं बटुकस्यास्य कथनीयं मम प्रभो ॥१॥
श्रीशिव उवाच -
पूर्वम् भस्मासुरत्रासाद् भय विह्वलतां स्वयम् ।
पठनादेव मे प्राणा रक्षितः परमेश्वरि ॥२॥
सर्वदुष्टविनाशाय सर्वरोगनिवारणम् ।
दुःखशान्तिकरं देवि ह्यल्पमृत्युभयापहम् ॥३॥
राज्ञां वश्यकरं चैव त्रैलोक्य विजयप्रदम् ।
सर्वलोकेषु पूज्यश्च लक्ष्मीस्तस्य गृहे स्थिरा ॥४॥
अनुष्ठानं कृतं देवि पूजनं च दिने दिने ।
विना पञ्जरपाठेन तत्सर्वं निष्फलं भवेत् ॥६॥
अस्य श्रीबटुकभैरवपञ्जरकवचमन्त्रस्य
कालाग्निरुद्रः ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः ।
ॐ बटुकभैरवो देवता । ह्रां बीजं
ॐ भैरवी वल्लभा शक्तिः ।
ॐ दण्डपाणये नमः कीलकम् ।
मम सकलकामनासिद्ध्यर्धे जपे विनियोगः ॥
ॐ ह्रां प्राच्यां डमरुहस्तो रक्तवर्णो महाबलः ।
प्रत्यक्षमहमीशान बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रीं दण्डधारी दक्षिणे च पश्चिमे खड्गधारिणे ।
ॐ ह्रूं घटावादी मूतिरुत्तरस्यां दिशिस्तथा ।
ॐ ह्रैं अग्निरूपो ह्याग्नेय्यां नैरृत्यां च दिगम्बरः ।
ॐ ह्रौं सर्वभूतस्थो वायव्ये भूतानां हितकारकः ॥
ॐ ह्रश्चवाष्टसिद्धिश्च ईशाने सर्वसिद्धिकरः परः ।
प्रत्यक्षमहमीशान बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः स्वाहा ऊर्ध्वं खेचरिणं न्यसेत् ।
रुद्ररूपस्तु पाताले बटुकाय नमो नमः ॥
ॐ ह्रीं बटुकाय मूर्ध्नि ललाटे भीमरूपिणम् ।
आपदुद्धरणं नेत्रे मुखे च बटुकं न्यसेत् ॥१॥
कुरु कुरु सर्वसिद्धिर्देहे गेहे व्यवस्थितः ।
बटुकाय ह्रीं सर्वदेहे विश्वस्य सर्वतो दिशि ॥२॥
आपदुद्धारकः पातु ह्यापादतलमस्तकम् ।
हसक्षमलवरयुं पातु पूर्वे दण्डहस्तस्तु दक्षिणे ॥३॥
हसक्षमलवरयुं नैरृत्ये हसक्षमलवरयुं पश्चिमेऽवतु ।
सर्वभूतस्थो वायव्ये हसक्षमलवरयुं घटावादिन उत्तरे ॥४॥
हंसः सोहं तु ईशाने चाष्टसिद्धिकरः परः ।
शंक्षेत्रपाल ऊर्ध्वे तु पाताले शिव सन्निभः ॥५॥
एवं दशदिशो रक्षेद्बटुकाय नमो नमः ।
इति ते कथितं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सदाऽवतु ॥६॥
ॐ फ्रें हुं फट् च सर्वत्र त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ।
लक्ष्मीं ऐं श्रीं लं पृथिव्यां च आकारो हं ममावतु ॥७॥
स्रौं प्रौं ज्रौं ऊँ यं वायव्यां रं रं रं तेजोरूपिणम् ।
ॐ कं खं गं घं ङं बटुकं चं छं जं झं ञं कपालिनम् ॥८॥
टं ठं डं ढं णं क्षेत्रेशं तं थं दं धं नं उमाप्रियम् ।
पं फं बं भं मं ममरक्ष यं रं लं भैरवोत्तमम् ॥९॥
वं शं षं सं आदिनाथं लं क्षं वै क्षेत्रपालकम् ।
एवं पञ्जरमाख्यातं सर्वसिद्धिकरं भवेत् ॥१०॥
{(फलश्रुतिः)}
दुःखदारिद्र्यशमनं रक्षकः सर्वतो दिशः ।
आवश्यं सर्वतो वक्ष्यं सर्वबीजैश्च सम्पुटम् ॥११॥
सर्वरोगहरं दिव्यं सर्वत्र सुखमाप्नुयात् ।
एवं रहस्यमाख्यातं देवानामपि दुर्लभम् ॥१२॥
वज्रपञ्जरनामेदं ये शृण्वन्ति वरानने ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं कीर्तिलाभः सुखं जयः ॥१३॥
लक्ष्मी मनोरमा बुद्धिस्तेषां गेहे व्यवस्थिता ।
सुशीलाय सुदान्ताय गुरुभक्तिपराय च ॥१४॥
तस्य शीघ्रं च दातव्यमन्यथा न कदाचन ।
गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वगोप्यमयं भवेत् ॥१५॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ।
राज्यं देयं शिरो देयं न देयं भैरवाक्षरम् ॥१६॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं पठते नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो शिवेन सह मोदते ॥१७॥
॥ इति श्रीभैरवपञ्जरकवचं सम्पूर्णम् ॥
❤7
कहानी का समय
दर्पण
एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए और विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक "दर्पण" दिया...
वह साधारण दर्पण नहीं था ; उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।
शिष्य,गुरू जी के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों ना दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए....
परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुँह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया....
शिष्य को सदमा लग गया क्योंकि दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे हैं....
मेरे आदर्श,मेरे गुरू जी इतने अवगुणों से भरे हैं , यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ और दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही कि जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया.....
उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था, इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता...
उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली सब के हृदय में कोई ना कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया....
जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला,वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए हैं , सब दोहरी मानसिकता वाले लोग हैं , जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं....
इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुँचा....
उसे अपने माता पिता का ध्यान आया उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है और उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते हैं,इनकी परीक्षा की जाए और यह सोचकर उसने उस दर्पण से माता पिता की भी परीक्षा कर ली...उनके हृदय में भी कोई ना कोई दुर्गुण देखा ये भी कि दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त कोई नहीं है संसार सारा मिथ्या है।
अब उस के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी, उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर.....
शीघ्रता से पहुँचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया...
गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे...
शिष्य ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा :-
गुरुदेव,मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह तरह के दोष हैं,कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा...
क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आपमें और मेरे अपने माता पिता में भी मैंने दोषों का भंडार देखा है इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है...
तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया....शिष्य दंग रह गया.....उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे, ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो...
गुरुजी बोले *बेटा,यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था ना कि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए*।
जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो.....अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता... !
श्रीराम कथा कहती हैं कि *जीवन मे दूसरों को सुधारने से पहले खुद को बदलना चाहिए ताकि समाज में बदलाव लाया जा सकें*।
दर्पण
एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए और विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक "दर्पण" दिया...
वह साधारण दर्पण नहीं था ; उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।
शिष्य,गुरू जी के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों ना दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए....
परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुँह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया....
शिष्य को सदमा लग गया क्योंकि दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे हैं....
मेरे आदर्श,मेरे गुरू जी इतने अवगुणों से भरे हैं , यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ और दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही कि जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया.....
उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था, इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता...
उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली सब के हृदय में कोई ना कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया....
जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला,वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए हैं , सब दोहरी मानसिकता वाले लोग हैं , जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं....
इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुँचा....
उसे अपने माता पिता का ध्यान आया उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है और उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते हैं,इनकी परीक्षा की जाए और यह सोचकर उसने उस दर्पण से माता पिता की भी परीक्षा कर ली...उनके हृदय में भी कोई ना कोई दुर्गुण देखा ये भी कि दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त कोई नहीं है संसार सारा मिथ्या है।
अब उस के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी, उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर.....
शीघ्रता से पहुँचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया...
गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे...
शिष्य ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा :-
गुरुदेव,मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह तरह के दोष हैं,कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा...
क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आपमें और मेरे अपने माता पिता में भी मैंने दोषों का भंडार देखा है इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है...
तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया....शिष्य दंग रह गया.....उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे, ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो...
गुरुजी बोले *बेटा,यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था ना कि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए*।
जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो.....अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता... !
श्रीराम कथा कहती हैं कि *जीवन मे दूसरों को सुधारने से पहले खुद को बदलना चाहिए ताकि समाज में बदलाव लाया जा सकें*।
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*सुख* ही सार है ।
गावहि बेद पुरान *सुख* कि लहिअ हरि भगति बिनु ।। ७/८९ (क)
वेद और पुराण कहते हैं कि श्री हरि की भक्ति के बिना क्या *सुख* मिल सकता है ? *सुख* तो हरि भक्ति से ही मिलता है ।
*जीअत रामु, मुए पुनि रामु, सदा रघुनाथहि की गति जेही ।*
*सोई जिऐ जग में , तुलसी नतु डोलत और मुए धरि देही ।।* कवितावली
गोसाई जी कहते हैं -- जिसे जीते हुए भी राम से ही स्नेह है और मरने पर भी राम में ही मिल जाता है , इस प्रकार सदैव जिसे राम का ही भरोसा है , वही संसार में जीता है , नहीं तो सब मरे हुए ही देह धारण किए बोलते हैं ।
*श्रुति राम कथा, मुख राम को नामु, हिए पुनि रामहि को थलु है।*
*सबकी न कहै, तुलसी के मते इतनो जग जीवन को फलु है ।।*
कानों में श्री राम की कथा, मुख में राम का नाम और हृदय में राम जी का ही स्थान है । और सब की बात तो नहीं कहता , परंतु तुलसीदास के मत में तो जगत में जीने का फल यही है ।
*तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ, रसना निसि - बासर रामु रटो।।*
गोसाई जी कहते हैं कि जो सदा *सुख* चाहते हो तो जिभ्हा से रात- दिन राम नाम रखते रहो।।
गावहि बेद पुरान *सुख* कि लहिअ हरि भगति बिनु ।। ७/८९ (क)
वेद और पुराण कहते हैं कि श्री हरि की भक्ति के बिना क्या *सुख* मिल सकता है ? *सुख* तो हरि भक्ति से ही मिलता है ।
*जीअत रामु, मुए पुनि रामु, सदा रघुनाथहि की गति जेही ।*
*सोई जिऐ जग में , तुलसी नतु डोलत और मुए धरि देही ।।* कवितावली
गोसाई जी कहते हैं -- जिसे जीते हुए भी राम से ही स्नेह है और मरने पर भी राम में ही मिल जाता है , इस प्रकार सदैव जिसे राम का ही भरोसा है , वही संसार में जीता है , नहीं तो सब मरे हुए ही देह धारण किए बोलते हैं ।
*श्रुति राम कथा, मुख राम को नामु, हिए पुनि रामहि को थलु है।*
*सबकी न कहै, तुलसी के मते इतनो जग जीवन को फलु है ।।*
कानों में श्री राम की कथा, मुख में राम का नाम और हृदय में राम जी का ही स्थान है । और सब की बात तो नहीं कहता , परंतु तुलसीदास के मत में तो जगत में जीने का फल यही है ।
*तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ, रसना निसि - बासर रामु रटो।।*
गोसाई जी कहते हैं कि जो सदा *सुख* चाहते हो तो जिभ्हा से रात- दिन राम नाम रखते रहो।।
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*काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है। यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।*
*जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।* *हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।*
*अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।*
*गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है।मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।*
*अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।*
*विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।*
*आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी।*
*100 शुभ कर्मों की गणना*
*धर्म.और.नैतिकता.के.कर्म.*
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग
*सामाजिक.और.पारिवारिक.कर्म.*
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग
*आध्यात्मिक.और.व्यक्तिगत.कर्म.*
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना
*सेवा.और.दान.के.कर्म.*
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान
*नैतिक.और.मानवीय.कर्म.*
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
*विधि.के.अधीन.6.कर्म.*
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश
*94 कर्म मनुष्य के नियंत्रण में*
*उपरोक्त सूची में 1 से 94 तक के कर्म वे हैं, जो मनुष्य अपने विवेक, इच्छाशक्ति, और प्रयास से कर सकता है। ये कर्म धर्म, सत्य, और नैतिकता पर आधारित हैं, जो जीवन को सार्थक बनाते हैं।*
*6.कर्म.विधि.के.अधीन*
*अंतिम 6 कर्म ( हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश ) मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं। इन्हें भाग्य, प्रकृति, या ईश्वर की इच्छा के अधीन माना जाता है।*
*जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।* *हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।*
*अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।*
*गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है।मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।*
*अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।*
*विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।*
*आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी।*
*100 शुभ कर्मों की गणना*
*धर्म.और.नैतिकता.के.कर्म.*
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग
*सामाजिक.और.पारिवारिक.कर्म.*
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग
*आध्यात्मिक.और.व्यक्तिगत.कर्म.*
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना
*सेवा.और.दान.के.कर्म.*
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान
*नैतिक.और.मानवीय.कर्म.*
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
*विधि.के.अधीन.6.कर्म.*
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश
*94 कर्म मनुष्य के नियंत्रण में*
*उपरोक्त सूची में 1 से 94 तक के कर्म वे हैं, जो मनुष्य अपने विवेक, इच्छाशक्ति, और प्रयास से कर सकता है। ये कर्म धर्म, सत्य, और नैतिकता पर आधारित हैं, जो जीवन को सार्थक बनाते हैं।*
*6.कर्म.विधि.के.अधीन*
*अंतिम 6 कर्म ( हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश ) मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं। इन्हें भाग्य, प्रकृति, या ईश्वर की इच्छा के अधीन माना जाता है।*
❤10🙏5
प्रतिकूलता में प्रसन्नता से भगवत्प्राप्ति
वास्तव में मन की प्रतिकूलता में ही सब दोषों की सृष्टि होती है | मन की प्रतिकूलता में दोषों का कोई ठिकाना नहीं रहता | मन की प्रतिकूलता में सर्वप्रथम क्रोध की सृष्टि होती है, लेकिन मन की अनुकूलता में कभी भी क्रोध नहीं होता | मन की प्रतिकूलता में ही द्वेष-बुद्धि होती है | मन की अनुकूलता में किसी को भी द्वेष नहीं होता | उसमे तो प्रसन्नता होती है | मन की प्रतिकूलता में केवल दवेष ही नहीं उससे और भी आगे वैर भी बँध सकता है | इसके अतिरिक्त मन की प्रतिकूलता में क्रोध भी होता है और दुःख भी होता है | महर्षि पतंजलि कहते हैं – १. अविद्या २. अस्मिता ३. राग ४. द्वेष और ५. अभिनिवेश – ये पाँच क्लेश हैं | इतना ही नहीं प्रतिकूलता में आपस में प्रतिद्वंद्विता भी होती है | जिसके कारण अमर्ष पैदा होता है, इसलिये पूछा जाता है कि प्रतिकूलता में भी अनुकूलता किस प्रकार समझी जाय ? यही विशिष्ट बात है | आप यदि क्रोध करें तो मुझ में ऐसी कोई करामात नहीं है कि मैं जबरदस्ती आपकी प्रतिकूलता को अनुकूलता बना दूँ | भगवान् तो सब कुछ कर सकते हैं, पर जब आप भगवान् को मानें तब न | ध्यान देना चाहिये कि जो भी कुछ मन के प्रतिकूल व्यवधान होता है, वह सब भगवान् की इच्छा से ही होता है | भगवान् की आज्ञा के बिना कुछ नहीं होता | किसी भी वस्तु की प्राप्ति, व्यवस्था या किसी भी काम का बनना या बिगड़ना यह सब कुछ भगवान् की आज्ञा और भगवान् की इच्छा से ही होता है | भगवान् जो भी कुछ करते हैं वे सब कुछ हमारे हित – मंगल यानी कल्याण के लिये ही करते हैं | इस प्रकार से समझकर यदि आप विश्वास कर लें तो फिर आपके मन की प्रतिकूलता ठहर ही नहीं सकती | इतना ही नहीं, ऐसा समझ लेने के बाद साधक सब प्रकार के दोषों से रहित होकर भगवान् की प्राप्ति कर सकता है | भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||
(गीता ४/२२)
अभिप्राय यह है कि ईश्वरेच्छा से जो भी कुछ आकर प्राप्त हो जाय उसी में प्रसन्न, संतुष्ट रहे और ‘द्वन्द्वातीत’ द्वन्द क्या है ? हर्ष-शोक, राह-द्वेष और सुख-दुःख – ये द्वन्द मिट जायँ तो सब मामला समाप्त हो जाता है | जो पुरुष इस प्रकार के दु:खों और सुखों आदि के प्राप्त होने को भगवान् की इच्छा समझकर उसमे आनन्द का अनुभव करता है, वह पुरुष सब प्रकार के द्वन्द्वों से छूटकर द्वन्द्वातीत बन जाता है |
वास्तव में मन की प्रतिकूलता में ही सब दोषों की सृष्टि होती है | मन की प्रतिकूलता में दोषों का कोई ठिकाना नहीं रहता | मन की प्रतिकूलता में सर्वप्रथम क्रोध की सृष्टि होती है, लेकिन मन की अनुकूलता में कभी भी क्रोध नहीं होता | मन की प्रतिकूलता में ही द्वेष-बुद्धि होती है | मन की अनुकूलता में किसी को भी द्वेष नहीं होता | उसमे तो प्रसन्नता होती है | मन की प्रतिकूलता में केवल दवेष ही नहीं उससे और भी आगे वैर भी बँध सकता है | इसके अतिरिक्त मन की प्रतिकूलता में क्रोध भी होता है और दुःख भी होता है | महर्षि पतंजलि कहते हैं – १. अविद्या २. अस्मिता ३. राग ४. द्वेष और ५. अभिनिवेश – ये पाँच क्लेश हैं | इतना ही नहीं प्रतिकूलता में आपस में प्रतिद्वंद्विता भी होती है | जिसके कारण अमर्ष पैदा होता है, इसलिये पूछा जाता है कि प्रतिकूलता में भी अनुकूलता किस प्रकार समझी जाय ? यही विशिष्ट बात है | आप यदि क्रोध करें तो मुझ में ऐसी कोई करामात नहीं है कि मैं जबरदस्ती आपकी प्रतिकूलता को अनुकूलता बना दूँ | भगवान् तो सब कुछ कर सकते हैं, पर जब आप भगवान् को मानें तब न | ध्यान देना चाहिये कि जो भी कुछ मन के प्रतिकूल व्यवधान होता है, वह सब भगवान् की इच्छा से ही होता है | भगवान् की आज्ञा के बिना कुछ नहीं होता | किसी भी वस्तु की प्राप्ति, व्यवस्था या किसी भी काम का बनना या बिगड़ना यह सब कुछ भगवान् की आज्ञा और भगवान् की इच्छा से ही होता है | भगवान् जो भी कुछ करते हैं वे सब कुछ हमारे हित – मंगल यानी कल्याण के लिये ही करते हैं | इस प्रकार से समझकर यदि आप विश्वास कर लें तो फिर आपके मन की प्रतिकूलता ठहर ही नहीं सकती | इतना ही नहीं, ऐसा समझ लेने के बाद साधक सब प्रकार के दोषों से रहित होकर भगवान् की प्राप्ति कर सकता है | भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: |
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||
(गीता ४/२२)
अभिप्राय यह है कि ईश्वरेच्छा से जो भी कुछ आकर प्राप्त हो जाय उसी में प्रसन्न, संतुष्ट रहे और ‘द्वन्द्वातीत’ द्वन्द क्या है ? हर्ष-शोक, राह-द्वेष और सुख-दुःख – ये द्वन्द मिट जायँ तो सब मामला समाप्त हो जाता है | जो पुरुष इस प्रकार के दु:खों और सुखों आदि के प्राप्त होने को भगवान् की इच्छा समझकर उसमे आनन्द का अनुभव करता है, वह पुरुष सब प्रकार के द्वन्द्वों से छूटकर द्वन्द्वातीत बन जाता है |
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शास्त्रों में परमात्मा के तीन स्वरुप सत, चित और आनन्द बताये गये हैं।
सत प्रगट रुप से सर्वत्र है चित मौन तथा आनन्द अप्रगट है, जड़ वस्तुओं में सत तथा चित है परन्तु आनन्द नहीं है जीव में सत और चित प्रगटता है परन्तु आनन्द अप्रगट रहता है अर्थात अप्रगट रुप से रहता है, अव्यक्त रुप से है वैसे आनन्द अपने ही अन्दर है फिर भी आनन्द को हम बाहर खोजते हैं, हम नारी देह , धन संपत्ति आदि में आनन्द खोजते हैं, किन्तु आनन्द तो हमारे अन्दर ही है। जैसे दूध में मक्खन रहता है फिर भी दिखायी नहीं देता किन्तु दूध से दही बनाकर मंथन करने पर मक्खन दिखायी पड़ता है ठीक वैसे ही हमें भी मनोमंथन करके आनन्द को प्रकट करना है।
जीव है तो ईश्वर का ही तो भी ईश्वर को पहचानने का यत्न नहीं करता, इसी कारण आनन्द नहीं मिलता। आनन्द के दो रुप हैं - साधन जन्य एवं स्वयंसिद्ध, साधन जन्य आनन्द अर्थात विषय जन्य आनन्द , जो साधन या विषय के नाश होने पर उस आनन्द का भी नाश होता है और होगा, योंगियो के पास कुछ भी साधन या विषय नहीं होता फिर भी उनको आनन्द है अर्थात सदा आनन्द से रहते हैं , इससे सिद्ध होता है आनन्द अन्दर ही है।
सत चित आनन्द ईश्वर में परिपूर्ण है, परमात्मा परिपूर्ण सतरुप , परिपूर्ण चितरुप , परिपूर्ण आनन्द रुप हैं।
परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्ण आनन्द स्वरुप हैं, बिना ईश्वर के संसार अपूर्ण है, ईश्वर का अंश जीवात्मा भी अपूर्ण है। जीव में चिद् अंश है फिर भी परिपूर्ण नहीं है, जीव को यदि आनन्द रुप होना हो तो उसे सच्चिदानन्द आश्रित होना है, जीव जब तक परिपूर्ण नहीं होता तब तक उसे शान्ति नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता है, संसार का प्रत्येक पदार्थ परिणाम में विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं हैं, जीव जब ईश्वर से मिलता है तभी वह परिपूर्ण होता है।
सत प्रगट रुप से सर्वत्र है चित मौन तथा आनन्द अप्रगट है, जड़ वस्तुओं में सत तथा चित है परन्तु आनन्द नहीं है जीव में सत और चित प्रगटता है परन्तु आनन्द अप्रगट रहता है अर्थात अप्रगट रुप से रहता है, अव्यक्त रुप से है वैसे आनन्द अपने ही अन्दर है फिर भी आनन्द को हम बाहर खोजते हैं, हम नारी देह , धन संपत्ति आदि में आनन्द खोजते हैं, किन्तु आनन्द तो हमारे अन्दर ही है। जैसे दूध में मक्खन रहता है फिर भी दिखायी नहीं देता किन्तु दूध से दही बनाकर मंथन करने पर मक्खन दिखायी पड़ता है ठीक वैसे ही हमें भी मनोमंथन करके आनन्द को प्रकट करना है।
जीव है तो ईश्वर का ही तो भी ईश्वर को पहचानने का यत्न नहीं करता, इसी कारण आनन्द नहीं मिलता। आनन्द के दो रुप हैं - साधन जन्य एवं स्वयंसिद्ध, साधन जन्य आनन्द अर्थात विषय जन्य आनन्द , जो साधन या विषय के नाश होने पर उस आनन्द का भी नाश होता है और होगा, योंगियो के पास कुछ भी साधन या विषय नहीं होता फिर भी उनको आनन्द है अर्थात सदा आनन्द से रहते हैं , इससे सिद्ध होता है आनन्द अन्दर ही है।
सत चित आनन्द ईश्वर में परिपूर्ण है, परमात्मा परिपूर्ण सतरुप , परिपूर्ण चितरुप , परिपूर्ण आनन्द रुप हैं।
परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्ण आनन्द स्वरुप हैं, बिना ईश्वर के संसार अपूर्ण है, ईश्वर का अंश जीवात्मा भी अपूर्ण है। जीव में चिद् अंश है फिर भी परिपूर्ण नहीं है, जीव को यदि आनन्द रुप होना हो तो उसे सच्चिदानन्द आश्रित होना है, जीव जब तक परिपूर्ण नहीं होता तब तक उसे शान्ति नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता है, संसार का प्रत्येक पदार्थ परिणाम में विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं हैं, जीव जब ईश्वर से मिलता है तभी वह परिपूर्ण होता है।
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