✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे इंसान नहीं हैं —
आप एक ऐसी ज्योति के वाहक हैं जो हजारों साल पहले किसी ऋषि ने जलाई थी।

11. आपका गोत्र = आत्मा का पासवर्ड
आज हम वाई-फाई पासवर्ड, नेटफ्लिक्स लॉगिन याद रखते हैं...

पर अपने गोत्र को भूल जाते हैं।

वो एक शब्द — आपके भीतर की

चेतना

आदतें

पूर्व कर्म

आध्यात्मिक शक्तियां

…सब खोल सकता है।

यह लेबल नहीं — यह चाबी है।

12. महिलाएं विवाह के बाद गोत्र “खोती” नहीं हैं
लोग सोचते हैं कि विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल जाता है। पर सनातन धर्म सूक्ष्म है।

श्राद्ध आदि में स्त्री का गोत्र पिता से लिया जाता है।
क्योंकि गोत्र पुरुष रेखा से चलता है (Y-क्रोमोज़ोम से)।
स्त्री ऊर्जा को वहन करती है, लेकिन आनुवंशिक रूप से उसे आगे नहीं बढ़ाती।

इसलिए स्त्री का गोत्र समाप्त नहीं होता — वह उसमें मौन रूप से जीवित रहता है।

13. भगवानों ने भी गोत्र का पालन किया
रामायण में श्रीराम और सीता के विवाह में भी गोत्र जांचा गया:

राम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र

सीता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र
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ध्यान एक ऐसी चीज है जो आप अपने लिए करते हैं। और जब आप रूपांतरित होते हैं, तो पूरा ब्रह्मांड आपके साथ अलग तरह से व्यवहार करता है, क्योंकि ब्रह्मांड और कुछ नहीं बल्कि आपकी प्रतिक्रिया है, चाहे आप कुछ भी हों। यदि आप मौन हैं, तो पूरा ब्रह्मांड हजारों-हजारों तरीकों से आपकी चुप्पी का जवाब देता है। यह आपको दर्शाता है। आपकी चुप्पी असीम रूप से कई गुना बढ़ जाती है। यदि आप आनंदित हैं, तो संपूर्ण ब्रह्मांड आपके आनंद को प्रतिबिम्बित करता है। यदि तुम दुख में हो, तो ऐसा ही होता है। गणित वही रहता है, नियम वही रहता है: ब्रह्मांड तुम्हारे दुखों को बढ़ाता चला जाता है। प्रार्थना नहीं चलेगी। केवल ध्यान ही मदद कर सकता है क्योंकि ध्यान कुछ ऐसा है जो आपको प्रामाणिक रूप से करना है, यह आपकी ओर से किया जाना है।
संभव हो तो मौन ध्यान करें ध्यान करवाएं परिवार के सभी को ध्यान सिखाएं
दिव्य प्रभात
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*इन्द्रिय दमन क्यों जरूरी : दैवीय संपदा*
भगवद्गीता : 16 /1

इन्द्रिय दमन का अर्थ है - इंद्रियों को नियंत्रित करना और उन्हें अपने वश में रखना। यह एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा है जो हमें अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करती है।

इन्द्रिय दमन क्यों जरूरी है
- *मन की शांति*: इंद्रियों को नियंत्रित करने से मन की शांति और स्थिरता मिलती है।
- *आध्यात्मिक विकास*: इन्द्रिय दमन आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है, क्योंकि इससे हम अपने आंतरिक स्वरूप पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
- *विवेक और संयम*: इंद्रियों को नियंत्रित करने से हमें विवेक और संयम प्राप्त होता है, जिससे हम सही निर्णय ले सकते हैं।

इन्द्रिय दमन के लिए उपाय
- *ध्यान और आत्म-चिंतन*: ध्यान और आत्म-चिंतन से इंद्रियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
- *सदाचार और सद्विचार*: सदाचार और सद्विचार का पालन करने से इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
- *वैराग्य और संयम*: वैराग्य और संयम का अभ्यास करने से इंद्रियों को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस प्रकार, इन्द्रिय दमन एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो हमें अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में मदद करती है और आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है।

*अंतःकरण की शुद्धि : दैवीय संपदा* 💕
भगवद्‌गीता : 16/ 1

अंतःकरण की शुद्धि का अर्थ है - मन, बुद्धि, और चित्त की शुद्धि। यह एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा है जो हमें अपने आंतरिक स्वरूप को शुद्ध और पवित्र बनाने में मदद करती है।

अंतःकरण की शुद्धि का महत्व
- *आंतरिक शांति*: अंतःकरण की शुद्धि से हमें आंतरिक शांति और संतुष्टि मिलती है।
- *स्पष्टता और विवेक*: शुद्ध अंतःकरण से हमें स्पष्टता और विवेक प्राप्त होता है, जिससे हम सही निर्णय ले सकते हैं।
- *आध्यात्मिक विकास*: अंतःकरण की शुद्धि आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है।

अंतःकरण की शुद्धि के लिए उपाय
- *ध्यान और आत्म-चिंतन*: ध्यान और आत्म-चिंतन से अंतःकरण को शुद्ध किया जा सकता है।
- *सदाचार और सद्विचार*: सदाचार और सद्विचार का पालन करने से अंतःकरण शुद्ध होता है।
- *निस्वार्थ भावना*: निस्वार्थ भावना से काम करने से अंतःकरण की शुद्धि होती है।

इस प्रकार, अंतःकरण की शुद्धि एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो हमें अपने आंतरिक स्वरूप को शुद्ध और पवित्र बनाने में मदद करती है और आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक है।
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धन की धुंध
धन की धुंध जब गहरी हो तो धर्म दिखलाई नही देता।

धन की धुंध जब आँखों पे छा जाती है,
तो अंतरात्मा की रोशनी भी मद्धम पड़ जाती है।
जिन राहों पर धर्म की गूंज थी कभी,
अब वहाँ लाभ-हानि की गणना बसती है।
धर्म दिखे उसके लिए दृष्टि चाहिए,
पर धन का अंधकार दृष्टि ही हर लेता है।

ध्यान रहे.
धर्म का दीपक जलता है भीतर,
पर लोभ की आँधी उसे बुझा जाती है।
धर्म कभी विलुप्त नहीं होता,
वह हमारे भीतर ही होता है
हम केवल उसे देखना छोड़ देते हैं।
धर्म कोई टोपी नहीं, जो पूजा के समय पहनी जाए।
वह तो हमारे स्वभाव और व्यवहार में होना चाहिए
सौदे में, स्नेह में, और सबसे अधिक निर्णय में।

पर अफ़सोस
जब जीवन का हर प्रश्न ‘क्या मिलेगा’ से शुरू हो
और क्या बचा पर खत्म हो
तो वहाँ धर्म नहीं, केवल गणना होती है।

धन बुरा नहीं है,
पर जब वह केंद्र बन जाए,
तो मनुष्य स्वयं परिधि बन जाता है।

धन की दौड़ में कोई फिनिश लाइन नहीं होती,
बस साँसें छोटी और महत्वाकांक्षाएँ लंबी होती जाती हैं।

हर दिन हम कुछ न कुछ जोड़ रहे होते हैं
जमीन, गहने, लेन-देन, संपर्क, नाम
पर क्या कभी जोड़ा है संतुलन ? मौन? विवेक ?

ध्यान रहे
धर्म को देखने के लिए आँखें नहीं, साधना और ध्यान चाहिए।
और साधना और ध्यान का मूल्य कोई बाज़ार तय नहीं कर सकता।

धर्म की आवाज़ ऊँची नहीं होती,
वह तो अंतरात्मा के कानों में केवल धीरे से फुसफुसाती है।

धन केवल एक साधन है साध्य नहीं।

इसलिए ज़रूरी है
कि हम समृद्धि तो अर्जित करें
पर दृष्टि को गिरवी न रखें..

धन अर्जन में दोष नहीं
दोष तब है जब अंतरात्मा उसका मूल्य चुकाने लगे।

भले धर्म चुप है, पर उसकी चुप्पी कभी मौन नहीं होती..
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👉 *"तृष्णा" आदमी को जरूरत से ज्यादा धन-दौलत और सुविधाओं को इकट्ठा करने के लिए उकसाती रहती है।* सोच यही रहती है कि जितना अधिक ये चीजें रहेंगी, हम उतना ही सुखी और प्रसन्न हो जाएँगे, किंतु यह ख्याल एक धोखा ही सिद्ध होता है।
👉 *इंसान की जरूरतें बहुत थोड़ी सी हैं। उसकी बनावट ऐसी है कि थोड़े में ही उसका गुजारा हो जाता है।* पेट भरने, शरीर को ढकने और परिवार के पालन-पोषण के लिए जरूरी चीजों का इंतजाम कुछ ही घंटों की मेहनत-मशक्कत करके पूरा हो जाता है। बाकी समय का उपयोग अपना सुधार करने, अपनी योग्यता बढ़ाने और भगवान के काम में कर सकता है। *इस तरह की जिंदगी जीने वालों के लिए कोई बड़ी दिक्कत नहीं आती, पर कठिनाई तब होती है, जब "धन्ना सेठ" बनने की और बहुत सारा ठाट-बाट बटोरने की "सनक" दिमाग पर चढ़ी होती है।*
👉 *यह "लालच" आदमी को चैन से बैठने नहीं देती है। ऐसे आदमी के दिमाग में हर घड़ी धन कमाने और उसे कमाकर मौज-मस्ती करने की बात घूमती रहती है। इसके वश में हुए व्यक्ति के लिए "पैसा ही भगवान" बन जाता है और किसी भी तरह उसे जोड़ना उसकी "पूजा" बन जाती है।* सुख की आशा में वह धन-दौलत और ठाट-बाट के ढेर लगाता जाता है, किंतु इसके नतीजे उलटे ही निकलते हैं।
👉 *सबसे पहले तो इसके रख-रखाव की चिंता हर समय परेशान किए रहती है, कि कहीं कोई चोर, डाकू, सेंधबाज आदि इस पर हाथ साफ न कर ले।* फिर ईर्ष्यालु और दुश्मन-बैरी लोग चैन से नहीं बैठने देते। नीचा दिखाने और बदनाम करने की हर कोशिश करते रहते हैं। *चापलूस, ठग आदि भी दोस्त बनकर घात लगाए बैठे रहते हैं। बहुत सारा माल-टाल आदतों को बिगाड़कर तरह-तरह के व्यसनों में उलझा देता है और पता ही नहीं चलता कब शराब, नशा, नाच-रंग, ताश-चौपड़, खर्चीले शौक आदि जिंदगी के अंग बनते चले जाते हैं।* समझदार और सही वारिस न मिलने पर इतनी भाग दौड़ कर इकट्ठा की गई संपदा यूँ ही बरबाद होने का डर अलग से सताता रहता है, जो चैन से मरने भी नहीं देता ।
👉 *धन-वैभव की चाह जितनी पूरी होती जाती है, यह उतनी ही बढ़ती जाती है। इंसान "ईमानदारी" से एक हद तक ही पैसा और ठाट-बाट कमा सकता है, पर जब इच्छा "इंद्र-कुबेर" की तरह ढेरों धन-वैभव पाने की हो, तो एक ही रास्ता बाकी बचता है और वह है "बेईमानी", "भ्रष्टाचार" का रास्ता।* जब लालच के नशे में अक्लमंद आदमी की मति ही मारी जाए, तो फिर उसे गलत रास्ते में जाने से कौन रोके ? *बस "अनीति", "भ्रष्टाचार" के ढलवाँ रास्ते पर उसकी फिसलन शुरु हो जाती है। धन-दौलत और ठाट-बाट जितने बढ़ते जाते हैं, अपना स्वास्थ्य-शक्ति और ईमान-धर्म भी उतने ही खत्म होने लगते हैं, किंतु अपनी सारी शक्ति झोंकने पर भी उसकी इच्छा अधूरी ही रह जाती है।* पूरी हो भी कैसे ? यह खाई तो इतनी गहरी है कि हिरण्यकश्यप, रावण, वृत्रासुर, सिकंदर जैसे महा पराक्रमी अपना पूरा दमखम दाँव पर लगाकर भी इसको भरने में थोड़ा सा भी सफल न हो सके थे, फिर आम आदमी का क्या कहना ? *"तृष्णा" का यह कुचक्र इतना बड़ा, इतना भयानक और इतना अशांतिदायक है कि उसे अपनाकर मौज-मजा का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो पाता।*
👉 *दूसरा "अत्यधिक मोह", अपने प्रिय लोगों के नाम पर ढेरों धन-वैभव और सुविधाओं को विरासत में छोड़ने के लिए मजबूर करता है, किंतु यह मोह हर तरह से अपने वारिसों को तबाह करने वाला ही साबित होता है। "मुफ्त का माल" किसी को भी पचता नहीं।* वारिस लोग इसे पाकर आरामतलब और आलसी ही बनते हैं और विरासत को लेकर लड़ाई-झगड़ा, मार-काट सो अलग। *बैठे-ठाले मौज-मस्ती की सुविधा सामग्री जोड़ना आखिर उनको निकम्मा और बेईमान बनाने वाली एक गलत नीति ही सिद्ध होती है।* किसी के भविष्य से खिलवाड़ करने वाला ऐसा मोह किसी भी तरह से ठीक नहीं है। *इसकी जगह बेहतर हो कि अपने परिवार के लोगों को अपनी "मेहनत" और "ईमानदारी" के साथ अपना निर्वाह करने वाला "आत्मनिर्भर" इंसान बनाया जाए और ऐसे संस्कार-विचार दिए जाएँ, जो उनके जीवन भर काम आएँ।*
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आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की
हार्दिक शुभकामनाएं
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राखी बांधने का कार्य आज 01:23 पीएम से पहले कर लेना
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जीवन मूल्यवान है


👉 *आम आदमी का ज्यादातर समय और शक्ति काम - वासना, धन - दौलत इकट्ठा करने और अपने बड़प्पन के दिखावे की खाई खोदने और इसे भरते रहने में ही नष्ट हो जाती है। इसके बाद इतना समय और शक्ति शेष नहीं रह जाती कि कुछ सोच-विचार अपना सुधार करने, जिंदगी को निखारने, सँवारने और भगवान के काम में हाथ बंटाने का भी किया जाए।* जब विचार ही नहीं उठता तो फिर इस रास्ते पर आगे कदम बढाने की बात ही कैसे बने ?
👉 *जिंदगी का यह "कीमती" अवसर अपनी रोजी-रोटी कमाने, शादी-विवाह करने, परिवार बसाने, बच्चों का पालन-पोषण करने में ही बीत जाता है।* सारा ध्यान खाने-कमाने, लेन-देन, व्यवहार-व्यापार आदि में ही लगा रहता है। जिंदगी शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और राजनीतिक दायरों में ही सिमटी रह जाती है। *बस इसी ढर्रे में मनुष्य जीवन कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है और पहुँचता कहीं भी नहीं।* अंधी भेड़ों के झुंड की तरह एक के पीछे दूसरी के चलने और खाई में गिरकर चोट खाने और चिल्लाने का क्रम ही बाकी रह जाता है। *हैरानी की बात तो यह है कि "अक्लमंद" समझे जाने वाले लोग भी अपनी भलाई की बात नहीं समझ पाते।* अपनी ही जड़ें खोदने में जुटे रहते हैं और मुसीबतें झेलते हैं। जितना बोझ उठता नहीं, उतना लादते फिरते हैं और इसके भार से पिसते फिरते हैं। *जितना पेट हजम नहीं कर पाता, उतना ठूंसते हैं और पेट की पीड़ा से हल्ला मचाते रहते हैं।*
👉 *ऐसी भटकाव भरी स्थिति को बुद्धिभ्रम ही कहेंगे, जो सीधे रास्ते को उलटा और उलटे रास्ते को सीधा मान बैठता है, जैसे कि द्रौपदी के भवन में जाने पर कौरवों को पानी की जगह जमीन और जमीन की जगह पानी दिखाई पड़ा था।* जो भी हो कड़वी सचाई तो यही है, जिसमें अपनी मरजी से या हालात की मजबूरी में अधिकतर लोगों को अपनी जिंदगी का सफर पूरा करते देखा जाता है। *भगवान के अंश होने के नाते अपने सुधार, निर्माण और परमार्थ के जिस रास्ते पर चलना था, वह तो छूट ही जाता है और उस सुख-शांति और आनंद के दर्शन भी नहीं हो पाते, जो इस रास्ते पर चलने से मिलते हैं।*
👉 *मनुष्य यह देखते हुए भी कि यह "नाशवान" शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, बाहरी सुखों के पीछे ही पागलों की तरह घूमता रहता है।* बचपन खेलकूद में बीत जाता है, जवानी के नशे में मौज-मस्ती ही छाई रहती है। जब कुछ होश आने लगता है, तो परिवार बढ़ जाता है और इसी के पालन-पोषण में व्यस्त हो जाता है। जब कुछ समझ आने लगती है तो बुढ़ापा आ धमकता है। *शरीर पर तरह-तरह के रोग हमला करते हैं, बिगड़ी आदतें और संस्कार गहरी जड़ जमा चुके होते हैं और वे अलग परेशान करते रहते हैं।* तन, मन ढीले पड़ने लगते हैं। अब समझ आने पर क्या हो सकता है ? *"समझदारी" तो तब थी जब समय रहते "अच्छी आदतों" को अपनाकर "सद्‌गुणों" को इक‌ट्ठा किया होता और अगली यात्रा संतोष के साथ पूरी करने की तैयारी की होती।*
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वेदादि-शास्त्रों में कुल ८ गायत्री श्री गणेशनारायण भगवान् की प्राप्त होती हैं

१ - श्री कृष्ण यजुर्वेद में :-
"तत्कराटाय विद्महे , हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।"

२ - तैत्तिरीय आरण्यक व श्री लिंग पुराण में :-
"तत्पुरुषाय विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि।तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।"

३ - श्री गणपत्यथर्वशीर्ष में :-
"एकदन्ताय विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।"

४ और ५ दोनों - श्री अग्निपुराण में :-
४ - "लम्बोदराय विद्महे , महोदराय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।"
५ - "महोल्काय विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।"

६ - श्री गरुड़ पुराण में :-
"महाकर्णाय विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।"

७- श्री भविष्य पुराण में :-
"महाकर्णाय विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।"

८ - श्री भविष्य पुराण में ही :-
"महागणपतये विद्महे , वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।"
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कैलासशैलशिखरं प्रतिकम्प्यमानं कैलासशृङ्गसदृशेन दशाननेन।
यः पादपद्मपरिवादनमादधान- स्तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि।।

भावार्थ-
कैलाशपर्वत के शिखर के समान ऊंचे शरीर वाले दशमुख रावण के द्वारा हिलाई जाती हुई कैलासगिरि की चोटी को जिन्होंने अपने चरणकमलों से ताल देकर स्थिर कर दिया,
उन शरणदाता भगवान श्रीशंकर की मैं शरण लेता हूं।

येनासकृद् दितिसुताः समरे निरस्ता विद्याधरोरगगणाश्च वरै: समग्रा:।
संयोजिता मुनिवराः फलमूल भक्षा- स्तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि।।

भावार्थ-
जिन्होंने अनेकों बार दैत्यों को युद्ध में परास्त किया है और विद्याधर, नागगण तथा फल-मूल का आहार करने वाले सम्पूर्ण मुनिवरों को उत्तम वर दिये हैं, उन शरणदाता भगवान श्रीशंकर की मैं शरण लेता हूं।

दग्घ्वाध्वरं च नयने च तथा भगस्य पूष्णस्तथा दशनपंक्तिमपातयच्च।
तस्तम्भ यः कुलिशयुक्तमहेन्द्रहस्तं तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि।।

भावार्थ-
जिन्होंने दक्ष का यज्ञ भस्म करके भग देवता की आंखें फोड़ डाली और पूषा के सारे दांत गिरा दिये तथा वज्रसहित देवराज इंद्र के हाथ को भी स्तम्भित कर दिया (जड़वत निश्चेष्ट बना दिया), उन शरणदाता भगवान श्रीशंकर की मैं शरण लेता हूं।

एनस्कृतोपि विषयेष्वपि सक्तभावा ज्ञानान्वयश्रुतगुणैरपि नैव युक्ता।
यं संश्रिताः सुखभुजः पुरुषा भवन्ति तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि।।

भावार्थ-
जो पापकर्म में निरत और विषयासक्त हैं, जिनमे उत्तम ज्ञान, उत्तम कुल, उत्तम शास्त्र-ज्ञान और उत्तम गुणों का भी अभाव है -- ऐसे पुरूष भी जिनकी शरण में जाने से सुखी हो जाते हैं, उन शरणदाता भगवान श्रीशंकर की मैं शरण लेता हूं।
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भारतीय-दर्शन में सेवाभाव को अत्यधिक महत्व दिया गया है। यह सेवाभाव ही हमें निष्काम कर्म के लिए प्रेरित करता है। अष्ट चिरंजीवियों में शुमार महाबली हनुमान अपने इन्हीं सद्गुणों के कारण देवरूप में पूजे जाते हैं और उनके ऊपर 'राम से अधिक राम के दास' की उक्ति चरितार्थ होती है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं- जब लोक पर कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है, लेकिन जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारण के लिए पवनपुत्र का स्मरण करता हूं।

जरा विचार कीजिए! श्रीराम का कितना अनुग्रह है हनुमान पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन का श्रेय उनको प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान, जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस हनुमानजी के नाम-जप-निष्ठा का बराबर उदाहरण देते थे। भक्तों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था- 'मन के गुण से हनुमानजी समुद्र लांघ गये।

हनुमानजी का सहज विश्वास था, मैं श्रीराम का दास हूं और श्रीराम नाम जपता हूं। अत: मैं क्या नहीं कर सकता?' स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा था- 'देश के कोने-कोने में महाबली श्री हनुमानजी की पूजा प्रचलित होनी चाहिए। दुर्बल लोगों के सामने महावीर का आदर्श उपस्थित करना चाहिए। देह में बल नहीं, हृदय में साहस नहीं, तो फिर क्या होगा इस जड़पिंड को धारण करने से ? मेरी प्रबल आकांक्षा है कि घर-घर में बज्रांग श्री हनुमान की पूजा और उपासना हो।'

युवा शक्ति को हनुमान जी की पूजा से अधिक उनके चरित्र को आत्मसात करने की आवश्यकता है, जिससे भारत को उच्चतम नैतिक मूल्यों वाले देश के साथ-साथ 'कौशल युक्त' भी बनाया जा सके।
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धर्मशास्त्रों में आत्मज्ञान की साधना के लिए तीन गुणों की अनिवार्यता बताई गई है- बल, बुद्धि और विद्या। यदि इनमें से किसी एक गुण की भी कमी हो, तो साधना का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है।

सबसे पहले तो साधना के लिए बल जरूरी है। निर्बल व कायर व्यक्ति साधना का अधिकारी नहीं हो सकता है। दूसरे साधक में बुद्धि और विचार शक्ति होनी चाहिए। इसके बिना साधक पात्रता विकसित नहीं कर पाता है। तीसरा अनिवार्य गुण विद्या है। विद्यावान व्यक्ति ही आत्मज्ञान हासिल कर सकता है।

हनुमान जी के जीवन में इन तीनों गुणों का अद्भुत समन्वय मिलता है। इन्हीं गुणों के बल पर वे जीवन की प्रत्येक कसौटी पर खरे उतरते हैं। रामकथा में हनुमानजी का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शो को मूर्त रूप देने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

हनुमान जी का संवाद कौशल विलक्षण है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण अशोक वाटिका में जब वे पहली बार माता सीता से मिलते हैं तब दिखार्इ देता है। वे अपनी बातचीत से न सिर्फ उन्हें भयमुक्त करते हैं, बल्कि उन्हें यह भी भरोसा दिलाते हैं कि वे श्रीराम के ही दूत हैं-

कपि के वचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिंधु कर दास।।
(रामचरितमानस, सुंदरकांड)

यह कौशल आज के युवा उनसे सीख सकते हैं। इसी तरह समुद्र लांघते वक्त देवताओं के कहने पर जब सुरसा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही, तो उन्होंने अतिशय विनम्रता का परिचय देते हुए उस राक्षसी का भी दिल जीत लिया।

कथा है कि श्री राम की मुद्रिका लेकर महावीर हनुमान जब सीता माता की खोज में लंका की ओर जाने के लिए समुद्र के ऊपर से उड़ रहे थे, तभी सर्पो की माता सुरसा उनके मार्ग में आ गई थीं। उसने कहा कि आज कई दिन बाद उसे इच्छित भोजन प्राप्त हुआ है। इस पर हनुमान जी बोले, 'मां, अभी मैं रामकाज के लिए जा रहा हूं, मुझे समय नहीं है। जब मैं अपना कार्य पूरा कर लूं तब तुम मुझे खा लेना। पर सुरसा नहीं मानी और हनुमानजी को अपना ग्रास बनाने के लिए तरह-तरह के उपक्रम करने लगी।

तब हनुमान जी बोले, 'मां आप तो मुझे खाती ही नहीं है, अब इसमें मेरा क्या दोष?' सुरसा हनुमान का बुद्धि कौशल व विनम्रता देख दंग रह गई और उसने उन्हें कार्य में सफल होने का आशीर्वाद देकर विदा कर दिया। यह प्रसंग सीख देता है कि केवल साम‌र्थ्य से ही जीत नहीं मिलती है, विनम्रता से समस्त कार्य सुगमतापूर्वक पूर्ण किए जा सकते हैं।

महावीर हनुमान ने अपने जीवन में आदर्शों से कोई समझौता नहीं किया। लंका में रावण के उपवन में हनुमान जी और मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध में मेघनाथ ने 'ब्रह्मास्त्र' का प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते तो वे इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे उसका महत्व कम नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का तीव्र आघात सह लिया। तुलसीदास ने हनुमानजी की मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण करते हुए लिखा है-

ब्रह्म अस्त्र तेहि सांधा, कपि मन कीन्ह विचार।
जौ न ब्रहासर मानऊं, महिमा मिटाई अपार।।

हनुमान के जीवन से हम शक्ति व साम‌र्थ्य के अवसर के अनुकूल उचित प्रदर्शन का गुण सीख सकते हैं। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैं-

सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा।

सीता के सामने उन्होंने खुद को लघु रूप में रखा, क्योंकि यहां वह पुत्र की भूमिका में थे, लेकिन संहारक के रूप में वे राक्षसों के लिए काल बन गए।

अवसर के अनुसार खुद को ढाल लेने की हनुमानजी की प्रवृत्ति अद्भुत है। जिस वक्त लक्ष्मण रणभूमि में मूर्छित हो गए, उनके प्राणों की रक्षा के लिए वे पूरे पहाड़ उठा लाए, क्योंकि वे संजीवनी बूटी नहीं पहचानते थे। अपने इस गुण के माध्यम से वे हमें तात्कालिक विषम स्थिति में विवेकानुसार निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं।

हनुमान जी हमें भावनाओं का संतुलन भी सिखाते हैं। लंका दहन के बाद जब वह दोबारा सीता जी का आशीष लेने पहुंचे, तो उन्होंने उनसे कहा कि वे अभी उन्हें वहां से ले जा सकते हैं, लेकिन वे ऐसा करना नहीं चाहते हैं। रावण का वध करने के पश्चात ही यहां से प्रभु श्रीराम आदर सहित आपको ले जाएंगे। इसलिए उन्होंने सीता माता को उचित समय पर आकर ससम्मान वापिस ले जाने को आश्वस्त किया।

उनका व्यक्तित्व आत्ममुग्धता से कोसों दूर है। सीताजी का समाचार लेकर सकुशल वापस पहुंचे श्री हनुमान की हर तरफ प्रशंसा हुई, लेकिन उन्होंने अपने पराक्रम का कोई किस्सा प्रभु राम को नहीं सुनाया। जब श्रीराम ने उनसे पूछा- 'हनुमान ! त्रिभुवनविजयी रावण की लंका को तुमने कैसे जला दिया? तब प्रत्युत्तर में हनुमानजी ने जो कहा उससे भगवान राम भी हनुमानजी के आत्ममुग्धताविहीन व्यक्तित्व के कायल हो गए-

सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।
(रामचरितमानस, सुंदरकांड)
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मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी ।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥ १२॥

*यज्ञोंकी, क्रिया, स्वधाकी भी ईश्वरी समस्त सुधाशनकी ।*

*स्वामिनी त्रिवेदोंकी वाणीकी, न्याय-निरूपति दर्शनकी ।।*

*हे रमेश्वरी, वसुधेश्वरी हे, स्वामिनि प्रमोद-वनकी ललाम ।*

*व्रजकी स्वामिनि, व्रजकी रानी, श्रीराधे ! तुमको है प्रणाम ।।१२।।*

*आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों (ऋक्, यजु और साम) की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप अयोध्या के प्रमोद वन की स्वामिनी अर्थात् सीताजी भी आप ही हैं। हे राधिके ! कब मुझे कृपाकर अपनी शरण में स्वीकार कर पराभक्ति प्रदान करोगी? हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके !*
*आपको मेरा बारम्बार नमन है।*
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कहानी का समय

खाली पीपे

कहानी:- प्राचीनकाल में एक प्रसिद्ध सौदागर था, जिसका व्यापार सुदूर देशों में फैला हुआ था। उसकी नौका दिन-रात समुद्र की उत्ताल लहरों से जूझती हुई, नगर-नगर, द्वीप-द्वीप, बन्दरगाहों पर जाती रहती थी। व्यापार में लाभ तो अत्यंत था, परन्तु यात्राएँ प्राणों की बाज़ी लगाकर करनी पड़ती थीं। उसकी नौका समय की मार झेलते हुए जीर्ण-शीर्ण हो चली थी, किन्तु सौदागर की व्यस्तता ऐसी थी कि वह न तो उसे नवीन कर सका और न ही स्वयं को इस समुद्र के अनंत भय से सुरक्षित कर सका।

उसके मित्रों ने एक दिन उसे सावधान किया— "बंधु! तू निरंतर समुद्र की गोद में जीवन बिताता है। यह समुद्र बड़ा चपल और अचेतन है। तूफान आते हैं, लहरें विकराल रूप धारण कर लेती हैं। तेरी नौका अब पुरानी हो चली है। यदि तूफान आया और तेरी नौका डूब गई, तो क्या तू तैरकर अपने प्राण बचा सकेगा?"

सौदागर हँसा और बोला— "मित्रों! मेरे पास इतना समय कहाँ है कि मैं तैरना सीख सकूँ? तीन दिन भी यदि मैंने ऐसे ही नष्ट कर दिये, तो लाखों स्वर्णमुद्राएँ व्यापार में गँवा बैठूँगा। मैं फुर्सत में हुआ, तो अवश्य तैरना सीख लूँगा।"

मित्रों ने समझाया— "बहुत समय की आवश्यकता नहीं, गांव का गोविन्द तैराक है, जो कहता है कि वह तीन दिन में तैरना सिखा देगा। जीवन-मरण का प्रश्न है।"

किन्तु सौदागर ने पुनः अपनी दलील दी— "वह जो कहता है, ठीक कहता होगा, परन्तु मेरे लिए तो प्रत्येक क्षण अमूल्य है। तीन दिनों में तो मैं स्वर्ण के पर्वत खड़े कर सकता हूँ। कोई ऐसी युक्ति बताओ, जिसमें समय भी न लगे और मेरी सुरक्षा भी हो जाये

मित्रों ने परामर्श दिया— "यदि समय नहीं है, तो कम से कम दो पीपे अपने साथ रख ले। नौका डूबने की स्थिति में उन्हें पकड़कर तू तैर सकता है।"

सौदागर को यह सुझाव सरल और तात्कालिक लाभ का प्रतीत हुआ। उसने दो बड़े खाली पीपे, जिनके मुख बंद करवा दिए थे, अपनी नौका में अपने विश्राम-स्थल के समीप रख लिए। ये पीपे उसके लिये संकट की घड़ी में जीवनरक्षक उपकरण सिद्ध हो सकते थे, ऐसा उसने सोचा।

समय बीतता गया। सौदागर की व्यस्तता और व्यापार दोनों बढ़ते गये। वह स्वर्ण मुद्राओं के ढेर लगाता रहा, किन्तु जीवन की वास्तविक सुरक्षा के लिए वह आज भी उतना ही उदासीन था।

और फिर, एक दिन वह भयावह घड़ी आ पहुँची। समुद्र ने अपने उन्मत्त वेग से आकाश तक सिर उठाया। विकराल तूफान उठा और सौदागर की नौका डगमगाने लगी। समुद्र का गर्जन ऐसा था, मानो साक्षात यमराज ने अपने दूतों को सौदागर का आमंत्रण दे दिया हो। नौका में उपस्थित नाविकों ने स्थिति की भयावहता को समझते हुए समुद्र में कूदकर अपने प्राणों की रक्षा की, क्योंकि वे तैरना जानते थे।

सौदागर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर चिल्लाया— "मेरे पीपे कहाँ हैं?"

नाविकों ने उत्तर दिया— "सेठ जी! वे तो आपके बिस्तर के पास ही रखे हैं।"

सौदागर दौड़कर अपने विश्राम-कक्ष में गया। वहां दो पीपे पड़े थे— एक जो खाली थे, जिनके सहारे तैरने की युक्ति सुझाई गई थी और दूसरे वे, जो स्वर्ण मुद्राओं से भरे थे। यह दृश्य देखकर सौदागर का चित्त विचलित हो गया।



उसकी दृष्टि उन स्वर्ण मुद्राओं पर टिकी रह गई, जिनके लिए उसने जीवन भर परिश्रम किया था। वहीं दूसरी ओर, वे दो खाली पीपे उसे मृत्यु से बचा सकते थे। उसकी बुद्धि में द्वन्द्व मच गया— "क्या मैं इन खाली पीपों को पकड़कर समुद्र में कूद जाऊँ? परन्तु स्वर्णमुद्राओं का क्या होगा? मेरे परिश्रम, मेरे जीवन की कमाई, मेरी प्रतिष्ठा का प्रतीक यह धन, क्या यूँ ही समुद्र में समा जायेगा?"

उसका मन कहता— "खाली पीपों से प्राण बचेगा", परन्तु उसका मोह, उसका अहंकार, उसका संग्रह कहता— "स्वर्ण के बिना जीवन व्यर्थ है।"

अन्ततः उसने वही किया, जो उसका संचित मोह कहता था। उसने स्वर्ण मुद्राओं से भरे पीपे पकड़े और समुद्र में कूद पड़ा। किंतु भारी मुद्राओं का भार उसके शरीर को जल-समाधि की ओर खींच ले गया। वह छटपटाता रहा, किंतु डूबता चला गया। उसकी नौका, उसका स्वर्ण, उसका व्यापार— सब समुद्र की गहराई में लुप्त हो गया।

शिक्षा:- यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में आत्मोन्नति का अभ्यास और आध्यात्मिक साधना ही वास्तविक सुरक्षा हैं। धन, मान और अहंकार के बोझ में फंसा मनुष्य अवसर मिलने पर भी मुक्ति का मार्ग नहीं पकड़ता। जीवनरूपी नौका किसी भी क्षण डूब सकती है, सावधान रहना अनिवार्य है।
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. “मन का आधार”

निकुञ्जलीला का एक बड़ा सुन्दर संस्कृत ग्रन्थ है-प्रेम-दर्शन। इसमें एक प्रसंग आता है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण मथुरा पधार गये तब श्रीगोपाङ्गनायें बड़ी विकट स्थिति में हैं।
यह एक अलग दूसरी चीज है कि भगवान् कभी प्रेमियों को छोड़कर अलग जाते ही नहीं और गये भी नहीं परन्तु प्रेम-सरिता के दो तट होते हैं-विप्रलम्भ और संयोग। विप्रलम्भावस्था प्रेम के स्वारस्य को बढ़ाने वाली होती है। प्रेम-रस का संवर्धन करती है। यह विप्रलम्भ रस की बात है।
जो लोग शास्त्रवेत्ता हैं वे जानते हैं, सभी नहीं समझेंगे। उन गोपांगनाओं की स्थिति बड़ी विकट है और उनमें भी राधाजी की स्थिति बड़ी ही शोचनीय है। तब एक सखी उनको समझाती हैं। मैं यहाँ केवल भावानुवाद बता रहा हूँ।
राधाजी से सखी कहती है–‘राधे ! तुम दु:खी न हो। जो इतना छल कर सकता है, जो इतना कपट कर सकता है, जो इतना धोखा दे सकता है (यह प्रेमराज्य के शब्द हैं। इनको लेकर डरना नहीं चाहिये कि भगवान् को ऐसी बात क्यों कही गयी।) फिर भला उसका स्मरण तुम क्यों करती हो ?
जो कुछ भी तुमको पीड़ा है वह तो उसकी स्मृति की ही है न! तुम भूल जाओ। तुम यह मान लो कि कोई ऐसा था ही नहीं। तुम अपने घर में हो। तुम्हारा समृद्धिशाली राज्य है। तुम जो चाहे सो कर सकती हो। तुम रोकर व्यर्थ में अपने जीवन को क्यों बिगाड़ रही हो ? समझो।' बड़ी युक्तियों से सखी ने समझाया।
इस प्रसंग में राधिकाजी ने एक ही उत्तर दिया–‘सखी! मैं चाहती तो हूँ कि भूल जाऊँ। मैं याद रखने का अभ्यास नहीं करती और न ही याद रखने की इच्छा रखती हूँ बल्कि मैं ऐसा चाहती हूँ कि स्मरण न हो।
परन्तु क्या करूँ, मेरा मन इतना उनके अनुराग से भर गया है कि दूसरी वस्तु मेरे मन में आती ही नहीं है। मैं करूँ तो क्या करूं ? किसी भी दूसरी वस्तु को मन में लाने के लिये प्रयत्न करने पर भी दूसरी वस्तु विलुप्त हो जाती है मेरे सामने से। मेरे मन की वृत्ति से, मेरे मन के सामने दूसरी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं रहता।
दूसरी वस्तु की सत्ता मिट जाती है मेरे मन में सामने आते ही। मैं क्या जानबूझ कर याद रखती हूँ ? मैं स्त्री हूँ।'
स्मरण के लिये यह जरूरी है कि हमारे अन्दर भय, आवश्यकता और प्रीति इन तीनों में से कोई एक जाग जाय। भय तामस है, आवश्यकता राजस है और प्रीति सात्त्विक है। प्रीति साधनकाल में सात्त्विक है नहीं तो यह विनाशिनी है। प्रेम बिना शर्त होता है। प्रीति में विनिमय नहीं होता है।
अतएव मन लगाने के लिये आवश्यकता है किसी आधार की। बिना आधार के मन नहीं लगता है। वह आधार तो हम लोगों के लिये यह है कि जिससे मिलेंगे वह बन्धन में है। बन्धन का दु:ख मुक्ति के सुख को सामने लाता है और मुक्ति का सुख भगवान् में मन लगाने से, भगवान् के स्मरण से होगा। इसलिये स्मरण करते हैं। यह भी एक कारण है। यदि मुक्ति की तीव्र वांछा हो जाय तो स्मरण होगा।
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कर्म और फल
मानव जीवन एक कर्मभूमि है इसमें जैसा भी कर्म रूपी बीज डाला जाता है वैसा ही फल काटने को मिलता है बाकी योनि या तो भोग योंनिया है परंतु मनुष्य योनि ही कर्म योनि है अकसर देखा जाता है की जाने अनजाने में मानो कुछ ऐसे कर्म रूपी बीज बो देता है कि संकटों और मुसीबत से चीरा हुआ मानव बेबस होकर कभी अपने भाग्य को कोसती है और कभी भगवान को इस दुख के लिए जिम्मेदार ठहरता है वह भूल जाता है की उसने इस दुख का वह परेशानी का बीज कब बोया था
यह एक कठोर सत्य है की प्रभु तो केवल सत चित् आनंद है यह जो स्वयं ही आनंद का स्रोत है इससे दुख और पीड़ा मिलने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं रहती फिर हर कलाकार अपनी कीर्ति को सुंदर बने रहने का देखना चाहता है यह संपूर्ण रचना भी इस प्रभु की अपनी कृति है यह सर्वोत्तम कलाकार अपनी ही रचना मानव को दुख कैसे देना चाहेगा यह बात हर मानव को समझ लेना चाहिए की प्रभु कभी किसी को दुख नहीं देता हमारे अपने ही जाने अनजाने में किए कर्मों के हमारे सामने उतार चढ़ाव रूप में आ जाते हैं सत्य तो यह है कि मानव स्वयं ही अपनी इच्छाओं आशाओं आकांक्षाओं का गुलाम बनकर मानवी कर्म करने से वह नहीं खाता अपनी इच्छा की पूर्ति होते देख कर वहां बहुत प्रसन्न होता है कि उसने अपनी मनमर्जी का कार्य कर लिया है जब तक मानव अज्ञानता के अंधेरे में भटक रहा होता है उसके कर्म भी दिशाहीन बनकर रह जाते हैं
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भगवान् की असीम दया का फल

गुण, यह कि भगवान् बड़े प्रेमी हैं, बड़े दयालु हैं, क्षमावान हैं – ये सब उनमे अनन्त गुण हैं | उनमे क्षमा, दया, शान्ति, सन्तोष, सरलता, ज्ञान, वैराग्य अनेक गुण भरे पड़े हैं, अपरिमित हैं | हम लोग जो अनुमान करते हैं, समझते हैं, वह हमारा अनुमान और समझ बहुत कमजोर है | उनके गुणों को देख-देखकर ऐसा मुग्ध हो जाय, समझे कि मेरे ऊपर भगवान् की इतनी दया है कि वे मुझ-जैसे तुच्छ नालायक से भी इतना प्रेम करना चाहते हैं | भगवान् की तरफ से फाटक खुला हुआ है कि तुम चले आओ | भगवान् का हाथ हमारे सिर पर है, अब हमारे लिये किस बात की कमी है | क्यों चिन्ता करें | भगवान् की दया का रहस्य समझ जाय, तत्व समझ जाय तो क्षण-क्षण में उससे मुग्धता हो जाय | प्रसन्नता हो जाय तथा उसमे धीरता, गम्भीरता, वीरता – ये गुण आ जायँ, निर्भयता आ जाय | वह यह समझे कि मैं भगवान् की शरण हूँ, भगवान् के आश्रित होकर बस भगवान् की गोद में बैठा हूँ |
एक लडका किसी को गाली देकर, मारकर अपनी रक्षा के लिये दौड़कर माँ की गोद में बैठ जय तो वह देखेगा कि अब मैं सुरक्षित हो गया हूँ | परंतु दूसरा आकर कहे कि तेरे लडके ने मुझे गाली दी है, मारा है तो माँ न्याय करती है | लडके से पूछती है कि बेटा ! तूने इसे मारा है ? वह कहता है - हाँ | माँ कहती है – क्यों मारा ? वह कहता है इसने पहले मुझे मारा, तब मैंने इसे मारा | माँ उससे पूछती है – बेटा ! तूने इसे क्यों मारा ? वह कहता है – इसने पहले मुझे गाली दी थी | लडके से पूछती है बेटा ! तूने इसे गाली क्यों दी | वह कुछ भी उतर न देकर चुप हो जाता है तब माँ समझ जाती है कि मेरे लडके का कसूर है, फिर माँ उसे थपड लगाती है | थपड लगाने से लडका रोने लगता है | जो लडके शिकायत लेकर आये थे वे खुश हो जाते हैं – मन में सोचते हैं – मार पड गयी, बदला ले लिया और वह लडका साड़ी के भीतर से तो हँसता है और ऊपर से रोता है | हँसता है इसलिये कि माँ की मर तो मीठी है, वह लडका मुझे मारता तो मेरी जान ले लेता | यही बात भगवान् के विषय में है |
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शुद्ध भक्त्ति कैसे प्राप्त की जाए

शुद्ध भक्ति कैसे प्राप्त की जाये इसके लिये हमें सर्वप्रथम श्रीकृष्ण भक्ति की प्रामाणिक परम्परा में किसी प्रामाणिक गुरु के पास जाकर विनम्र भाव से जिज्ञासा करनी चाहिये। प्रामाणिक गुरू की व्याख्या श्री चैतन्य महाप्रभु ने जो कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण है। इस प्रकार की है, जो गुरू कृष्ण तत्व ज्ञान से परिपूर्ण है उन्हें ही प्रमाणिक गुरू स्वीकार करना चाहिये। चाहे वह किसी भी देश जाति समुदाय एवं आयु के हो। क्योंकि गुरू ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होनें भगवान के असीम प्रेम का रस पान किया है उन्होनें ही भक्ति की वास्तविक परिभाषा को समझा है। गुरू का ज्ञान एक अग्नि की तरह है जो हमेशा प्रज्वलित रहता है। इसको इस प्रकार समझा जा सकता है। जिस प्रकार लोहे को अग्नि में तपाने से लोहा भी अग्नि की तरह प्रज्जवलित होने लगता है ठीक उसी प्रकार गुरु कृष्ण रूपी विरह अग्नि में हमेशा तपते रहते हैं और उनकी शरणागति में जाने से हमारे अन्दर भी कालान्तर में उस अग्नि की लौ फूट जाती है। यानि कोई जीव गुरू के माध्यम से यह लौ प्रज्जवलित कर लेता है तब शनैः- शनैः ज्ञान एवं भक्ति की लता बढ़ती चली जाती है एवं जीव अपने जीवन में आनन्द का अनुभव करने लगता है जो कि जीव का एक मात्र वैधानिक अस्तित्व है। यमराज ने अपने दूतों से कहा

स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः। प्रह्मदो जनको भीष्मो बलिवैयासकिर्वयम्।। द्वादशैते विजानीमो धर्म भागवतं भटाः।

गुहां विशुब्दं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते।। (६.३.२०/२१) श्रीम‌द्भागवतम्

ब्रहमा जी, नारद जी, शिव जी, चारों कुमार, देव हुति के पुत्र कुपिल और स्वयंभू मनु, प्रहलाद महाराज, महाराजा जनक, भीष्म पितामह, बलि महाराज, महर्षि वेदव्यास और स्वयं मैं धर्म के वास्तविक सिद्धांतों को जानते हैं। मेरे दूतों दिव्य धर्म सिद्धान्त जो भागवत धर्म के नाम से प्रख्यात हैं। जो कि परम ईश्वर के प्रति आत्म समर्पण करने और उनसे प्रेम करने से सम्बन्धित है, यह दिव्य धर्म त्रिगुणात्मक प्रकृति (सतो, रजो एवं तमोंगुणों) से संदूषित नहीं होता। यह अत्यन्त गोपनीय है और साधारण मनुष्य के लिये इसको समझना अत्यन्त कठिन है। किन्तु यदि सौभाग्य से कोई इसे एक बार समझ लेता है तो उसका तत्काल उद्धार हो जाता है और अपने घर भगवद्धाम को वापस चला जाता है।
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श्रीकालिका अर्गलास्तोत्रम् ॥
अस्य श्रीकालिकार्गल स्तोत्रस्य भैरव ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीकालिका देवता मम सर्वसिद्धि साधने विनियोगः।

ॐ नमस्ते कालिके देवि आद्यबीजत्रय प्रिये ।
वशमानय में नित्यं सर्वेषां प्राणिनां सदा ॥१॥
कूर्चयुग्मं ललाटे च स्थातु मे शववाहिना ।
सर्वसौभाग्यसिद्धिं च देहि दक्षिण कालिके ॥२॥

भुवनेश्वरि बीजयुग्मं भूयुगे मुण्डमालिनी ।
कन्दर्परूपं में देहि महाकालस्य गेहिनि ॥३॥
दक्षिणे कालिके नित्ये पितृकाननवासिनि ।
नेत्रयुग्मं च मे देहि ज्योतिरालेपनं महत् ॥४॥

श्रवणे च पुनर्लज्जाबीजयुग्मं मनोहरम् ।
महाश्रुतिधरत्वं च मे देहि मुक्त कुन्तले ॥५॥
ह्रीं ह्रीं बीजद्वयं देवि पातु नासापुढे मम ।
देहि नानाविधि महां सुगन्धिं त्वं दिगम्बरे ॥६॥

पुनविबीजप्रथमं दन्तोष्ठरसनादिकम् ।
गद्यपद्यमयीं वाजीं काव्यशाखाद्यलङ्कृताम् ॥७॥
अष्टादशपुराणानां स्मृतीनां घोरचण्डिके ।
कविता सिद्धिलहरीं मम जिह्वां निवेशय ॥८॥

वह्निजाया महादेवि घण्टिकायां स्थिरा भव ।
देहि मे परमेशानि बुद्धिसिद्धिरसायकम् ॥९॥
तुर्याक्षरी चित्स्वरूपा कालिका मन्त्रसिद्धिदा ।
सा च तिष्ठतु हृत्पद्म हृदयानन्दरूपिणी ॥१०॥

षडक्षरी महाकाली चण्डकाली शुचिस्मिता ।
रक्तासिनी घोरदंष्ट्रा भुजयुग्मे सदाऽवतु ॥११॥
सप्ताक्षरी महाकाली महाकालरतोद्यता ।
स्तनयुग्मे सूर्यकर्णो नरमुण्डसुकुन्तला ॥१२॥

तिष्ठ स्वजठरे देवि अष्टाक्षरी शुभप्रदा ।
पुत्रपौत्रकलत्रादि सुहृन्मित्राणि देहि मे ॥१३॥
दशाक्षरी महाकाली महाकालप्रिया सदा ।
नाभौ तिष्ठतु कल्याणी श्मशानालयवासिनी ॥१४॥

चतुर्दशार्णवा या च जयकाली सुलोचना ।
लिङ्गमध्ये च तिष्ठस्व रेतस्विनी ममाङ्गके ॥१५॥
गुह्यमध्ये गुह्यकाली मम तिष्ठ कुलाङ्गने ।
सर्वाङ्गे भद्रकाली च तिष्ठ में परमात्मिके ॥१६॥

कालि पादयुगे तिष्ठ मम सर्वमुखे शिवे ।
कपालिनी च या शक्तिः खङ्गमुण्डधरा शिवा ॥१७॥
पादद्वयाङ्गलिष्वङ्गे तिष्ठ स्वपापनाशिनि ।
कुल्लादेवी मुक्तकेशी रोमकूपेषु वै मम ॥१८॥

तिष्ठतु उत्तमाङ्गे च कुरुकुल्ला महेश्वरी ।
विरोधिनी विरोधे च मम तिष्ठतु शङ्करी ॥१९॥
विप्रचित्ते महेशानि मुण्डधारिणि तिष्ठ माम् ।
मार्गे दुर्मार्गगमने उग्रा तिष्ठतु सर्वदा ॥२०॥

प्रभादिक्षु विदिक्षु माम् दीप्तां दीप्तं करोतु माम् ।
नीलाशक्तिश्च पाताले घना चाकाशमण्डले ॥२१॥
पातु शक्तिर्बलाका में भुवं मे भुवनेश्वरी ।
मात्रा मम कुले पातु मुद्रा तिष्ठतु मन्दिरे ॥२२॥

मिता में योगिनी या च तथा मित्रकुलप्रदा ।
सा में तिष्ठतु देवेशि पृथिव्यां दैत्यदारिणी ॥२३॥
ब्राह्मी ब्रह्मकुले तिष्ठ मम सर्वार्थदायिनी ।
नारायणी विष्णुमाया मोक्षद्वारे च तिष्ठ मे ॥२४॥

माहेश्वरी वृषारूढा काशिकापुरवासिनी ।
शिवतां देहि चामुण्डे पुत्रपौत्रादि चानघे ॥२५॥
कौमारी च कुमाराणां रक्षार्थ तिष्ठ में सदा ।
अपराजिता विश्वरूपा जये तिष्ठ स्वभाविनी ॥२६॥

वाराही वेदरूपा च सामवेदपरायणा ।
नारसिंही नृसिंहस्य वक्षःस्थलनिवासिनी ॥२७॥
सा मे तिष्ठतु देवेशि पृथिव्यां दैत्यदारिणी ।
सर्वेषां स्थावरादीनां जङ्गमानां सुरेश्वरी ॥२८॥

स्वेदजोद्भिजाण्डजानां चराणां च भयादिकम् ।
विनाश्याप्यभिमतिं च देहि दक्षिण कालिके ॥२९॥
य इदं चार्गलं देवि यः पठेत्कालिकार्चने ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति खेचरो जायते तु सः ॥३०॥
॥ इति श्री काली अर्गल स्तोत्रम् ॥
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*विचारोंके अनुसार मानवका स्वरूप*

*याद रखो—* जैसे प्रकाश जहाँ जाता है, वहीं अपना प्रकाश फैलाता है। चन्द्रमा जहाँ जाता है, वहीं अमृत बरसाता है, सुगन्धित पुष्प सर्वत्र अपनी सुगन्ध फैलाता है, वैसे ही तुम भी अपने जीवनके द्वारा सर्वत्र प्रकाश, अमृत और सुगन्धका प्रसार कर सकते हो। तुम्हें देखते ही लोगोंके अन्धकारका नाश, विषका शमन और दुर्गन्धका अभाव होने लगेगा और बदलेमें उजियाला, मधुर अमृतरस तथा सुन्दर सुगन्ध पाकर लोग प्रमुदित और पुलकित हो जायँगे।
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