✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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।। श्री हनुमानजी की बारह नामों की विलक्षण स्तुति ।।

श्री हनुमानजी की स्तुति जिसमें उनके बारह नामों का उल्लेख मिलता है। इन नामों के जप से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

यदि हो सके तो श्री हनुमान स्तुति जोर-जोर से करनी चाहिए, ऐसा करने से वातावरण में अमंगलकारी तत्वों का नाश होता है।

दोहा-
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान।।

स्तुति-
हनुमान अंजनी सूत् र्वायु पुत्रो महाबलः।
रामेष्टः फाल्गुनसखा पिङ्गाक्षोऽमित विक्रमः।।

उदधिक्रमणश्चैव सीता शोकविनाशनः।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः।
सायंकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्।।

तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।
(आनंद रामायण- ८ / ३ / ८-११)
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।।🕉️ श्रीपवनजाष्टकम् ।।

यह हनुमानजी की पापनाशक एवं पुण्य प्रदान करने वाली विशेष प्रार्थना है।

।। श्रीपवनजाष्टकम् ।।

भवभयापहं भारतीपतिं भजकसौख्यदं भानुदीधितिम्।
भुवनसुन्दरं भूतिदं हरिं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।१।।

अमितविक्रमं ह्यञ्जनासुतं भयविनाशनं त्वब्जलोचनम्।
असुरघातिनं ह्यब्धिलङ्घिनं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।२।।

परभयङ्करं पाण्डुनन्दनं पतितपावनं पापहारिणम्।
परमसुन्दरं पङ्कजाननं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।३।।

कलिविनाशकं कौरवान्तकं कलुषसंहरं कामितप्रदम्।
कुरुकुलोद्भवं कुम्भिणीपतिं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।४।।

मतविवर्धनं मायिमर्दनं मणिविभञ्जनं मध्वनामकम्।
महितसन्मतिं मानदायकं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।५।।

द्विजकुलोद्भवं दिव्यविग्रहं दितिजहारिणं दीनरक्षकम्।
दिनकरप्रभं दिव्यमानसं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।६।।

कपिकुलोद्भवं केसरीसुतं भरतपङ्कजं भीमनामकम्।
विबुधवन्दितं विप्रवंशजं भजत सज्जना मारुतात्मजम्।।७।।

पठति यः पुमान् पापनाशकं पवनजाष्टकं पुण्यवर्धनम्।
परमसौख्यदं ज्ञानमुत्तमं भुवि सुनिर्मलं याति सम्पदम्।।८।।
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त्रिगुणात्मक वैष्णवी-महालक्ष्मी स्तोत्र


ध्यानम्
त्रिकूटगिरीशिखरस्थितां त्रिनेत्रां,
शंखं च चक्रं गदया विभान्तं
सप्तशक्ति-समायुतां च मह्यां,
वन्दे महालक्ष्मीं अनन्तवैभवाम्॥

अर्थ:
मैं नमन करता हूँ महालक्ष्मी को, जो त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं, और जो सप्त शक्तियों से युक्त होकर अनंत वैभव प्रदान करती हैं।


जय जय त्रिगुणस्वरूपिणि, त्रिकूटगिरिवासिनि।
योगमये जगन्मातः, महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥१

अर्थ:
जय हो त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली माता को, जो त्रिकूट पर्वत पर निवास करती हैं। योगमयी और संपूर्ण जगत की माता, महालक्ष्मी को मेरा नमस्कार।


सत्त्वेन धर्मसंयुक्ता, रजसाऽऽभूतिसाधिनी।
तमसा दुःखनाशायै, शक्तित्रयमयी नमः॥२

अर्थ:
सत्त्व गुण से धर्मयुक्त, रजस से कर्मसाधिनी, तमस से दुःखों का नाश करने वाली, तीनों शक्तियों से युक्त महालक्ष्मी को नमन।


श्रीपिण्डिरूपधारिण्यै, भक्तिज्ञानप्रदायिन्यै।
शरण्ये सर्वजननी, वैष्णव्यै मङ्गलाय ते॥३

अर्थ:
जो श्रीपिंडी के रूप में प्रकट होती हैं, भक्तों को ज्ञान और भक्ति प्रदान करती हैं, और सभी के लिए शरण्य हैं, वैष्णवी माता, मैं आपकी मंगलकामना करता हूँ।


विष्णोः प्रियते देवि, नारायणपरा श्रिते।
श्रीनिकेतनवासिन्यै, भक्तवत्सलि ते नमः॥४

अर्थ:
हे देवी, जो विष्णु की प्रिय और नारायण पर आश्रित हैं, श्रीनिकेतन (विष्णु का निवास) में निवास करने वाली, भक्तवत्सलि माता आपको नमन।


सरस्वत्याः स्मृतिप्रज्ञां, लक्ष्म्याः संपद्-प्रदायिनीम्।
काल्याः च भयसंहारिं, त्वामेकां त्रिमूर्तिदाम्॥५

अर्थ:
जो सरस्वती हैं उनकी स्मृति और प्रज्ञा देती हैं, जो लक्ष्मी हैं संपत्ति प्रदान करती हैं, और जो काली हैं भय का नाश करती हैं, मैं उस एकत्रित त्रिमूर्ति स्वरूप महालक्ष्मी को नमन करता हूँ।


रत्नाकरतनूदेहे, विद्येश्वर्यादिसम्भवे।
ब्रह्मरूपिणि शाश्वत्यै, वैष्णव्यै ते नमो नमः॥६

अर्थ:
रत्नाकर के शरीर वाली, विद्याओं और देवों की उत्पत्ति में साक्षी, ब्रह्मरूपिणी और शाश्वत स्वरूप वाली वैष्णवी महालक्ष्मी को बार-बार नमन।


सिंहवाहिन्यै शुभाङ्गिने, सर्वसिद्धिप्रदायिनि।
सर्वमङ्गलि मङ्गल्ये त्वं, मम पालय मङ्गलम्॥७

अर्थ:
हे देवी, जो सिंह वाहन धारण करती हैं और आपके अंग शुभ तथा सुंदर हैं। आप सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हो। हे सर्वमंगलमयी मां, मेरी रक्षा करो और मेरे जीवन में मंगल ही मंगल बनाए रखो।


त्वमेव दुर्गा कौमारी, त्वमेव रमा सरस्वती।
एकैव त्रिगुणात्मस्था, वैष्णवी प्रणतिः मम॥८

अर्थ:
आप ही दुर्गा, कौमारी और रमा सरस्वती हैं। एक ही रूप में त्रिगुणात्मक महालक्ष्मी स्थिर हैं। हे वैष्णवी माता, मेरी शरण आप ही हैं।


धूपदीपाक्षतार्च्ये, कुङ्कुमारुणविग्रहे।
त्रिकालं यो जपेत् त्वां, स याति परमां गतिम्॥९

अर्थ:
जो व्यक्ति आपको धूप, दीप और अक्षत से पूजता है, और कुङ्कुम-लाल रूप में आपकी उपासना करता है, वह तीनों काल में आपका जप करता है, उसे परम सुख और मुक्ति प्राप्त होती है।


जय जय जननि वैष्णोदेवि, त्रिगुणात्मिका दिव्यज्योति।
शरणं तव यः प्रपन्नोऽस्ति, न पुनः संसृतिं प्रपद्ये॥१०

अर्थ:
जय हो जननी वैष्णोदेवि! त्रिगुणात्मक और दिव्य ज्योति वाली माता। जिसकी शरण में कोई आता है, वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ता।


अनन्तकोटिब्रह्माण्ड-नायिके विश्वधारिणि।
विष्णोः प्रियसलक्ष्मी स्ते, नमस्ते शरणं मम॥११

अर्थ:
अनंत कोटि ब्रह्मांडों की नायिका सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली, विष्णु की प्रिय लक्ष्मी। हे माता, मैं आपकी शरण में हूँ।


आरोग्यं धनसमृद्धिं, सन्तानं मोक्षमक्षयम्।
प्रसादं कुरु मे नित्यं, महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥१२

अर्थ:
हे महालक्ष्मी! मुझे स्वास्थ्य, धन, संतान और मोक्ष की प्राप्ति प्रदान करें। आपकी कृपा सदैव बनी रहे।

फलश्रुति

यं पठेत् श्रद्धया नित्यं, त्रिकालं भक्तिसंयुतः।
लभते सर्वसिद्धीं स, वैष्णव्याः करुणां विना॥
स कौटिग्रहमध्यस्थोऽपि, दुःखं नानुभवेत् क्वचित्।
धनधान्यसमृद्धिः स्यात्, मोक्षसौख्यं च लभ्यते॥

अर्थ:
जो श्रद्धा सहित इस स्तोत्र का प्रतिदिन तीनों कालों में जप करता है, वह सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
भक्तवत्सल वैष्णवी माता की कृपा के बिना, न तो घर में कोई दुःख अनुभव करता है, और न ही धन, समृद्धि, मोक्ष और सुख की प्राप्ति में बाधा आती है।
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ईदृग्बोधेनेश्वरस्य प्रवृत्तिर्नैव वार्यताम्।
तथापीशस्य बोधेन स्वात्मासङ्गत्वधीजनिः।।
जब किसीको ऐसा बोध हो जाय [कि ईश्वर ही पुरुषकारादि रूपमें विवर्त हो जाता है] तब भी ईश्वरकी अन्तर्यामी रूपसे प्रेरणा को वारण नहीं करना चाहिये [किंवा अन्तर्यामी की प्रेरणा को व्यर्थ नहीं मान लेना चाहिये] क्योंकि उस रूपसे जब कोई ईश्वरतत्व को जान लेगा तब उसे अपने आत्माकी असङ्गता का स्पष्ट ज्ञान उत्पन्न हो जायगा।
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान।।
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है।।
तावता मुक्तिरित्याहुः श्रुतयः स्मृतयस्तथा।
श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे इत्यपीश्वरभाषितम्।।
"आत्माकी असङ्गताका ज्ञान हो जानेसे ही मुक्ति हो जाती है" यह बात श्रुतियों और स्मृतियों ने कही है। (क्योंकि जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गतिको प्राप्त होता है।।) ईश्वरने यह भी कहा है कि ये श्रुतियाँ और स्मृतियाँ मेरी ही आज्ञायें हैं। ऐसी अवस्थामें इनके कहने को टालना नहीं चाहिये। श्रुति स्मृतीममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्य वर्तते। आज्ञाच्छेदी ममद्वेषी न मद्भक्तो न मत्प्रियः। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् हमारा हाकिम हमारे अन्दर बैठा हुआ है। जब हम कोई बुरा काम करने लगते हैं तब अन्दरसे घृणा भय संकोच आदिकी आवाज़ आती हैं। जब हम कोई शुभ कार्य करते हैं तब अन्दरसे प्रेम निर्भयता और उत्साह आदिकी स्फूर्ति होती है। ये ही सब ईश्वरकी आज्ञायें हैं! जो लोग मनुष्यसमाजमें अधिक संस्कृत होते हैं उन्हें ये आज्ञायें बड़ी स्पष्ट सुनाई पड़ा करती हैं। जो निरन्तर पापाचारी होते हैं उन्हें ये आवाजें सुनाई पड़नी बन्द हो जाती हैं।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।
इस देहमें स्थित यह आत्मा वास्तवमें परमात्मा ही है। वह साक्षी होनेसे उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होनेसे भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता, ब्रह्मा आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होनेसे परमात्मा - ऐसा कहा गया है।।
जिन्हें ये आज्ञायें स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं उन्होंने ही उन आवाजोंको साधारण लोगोंके उपकारके लिये, उनके अन्दरकी मुर्दा आवाज़को जगाने के लिये और उसके अनुकूल उनका आचरण कराने के लिये, पुस्तकों में लिख दिया है। ऐसे ये लेख ही 'श्रुति' और 'स्मृति' हैं। यों 'श्रुति' और 'स्मृति' ईश्वरकी आज्ञायें हैं। वेदोंके अपौरुषेय होनेका कारण भी यही है कि ये आवाजें बनायी नहीं जाती किन्तु ऐसी की ऐसी ही साधक लोगोंको - सत्यान्वेषी लोगोंको सुनाई पड़ा करती हैं। सुनाई पड़ने के कारण ही उनको 'श्रुति' कहा है और इन आवाजों को याद रखने को ही 'स्मृति' कहते हैं तथा ये आवाजें जानने में आने के कारण से ही इन्हें 'वेद' भी कहा गया है।
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कहानी का समय

सत्कर्म
रामगंगा नदीके तटपर एक शिवमन्दिर था। उसमें एक पण्डित और एक चोर रोज आते थे। पण्डितजी शिवलिंगपर दूध, फल-फूल चढ़ाकर पूजा-पाठ करते थे, जबकि चोर शिवभगवान्‌को खरी-खोटी सुनाकर अपने भाग्यको कोसता था।
एक दिन पण्डितजी और चोर संयोगसे साथ-सांथ मन्दिरसे बाहर निकल रहे थे। तभी अचानक चोरको द्वारपर ही सोनेकी स्वर्णमुद्राओंसे भरी थैली मिली और पण्डितजीके पैरमें उसी समय लोहेकी एक कील घुस गयी। स्वर्णमुद्राओंके मिलनेसे जहाँ चोर खूब प्रसन्न हो रहा था, वहीं कील गड़नेसे पण्डितजीको बहुत कष्ट हो रहा था। लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट और आश्चर्य पण्डितजीको भगवान्‌के इस अन्यायसे था कि मेरे पूजा-पाठके बदलेमें मुझे कष्ट मिल रहा है और इस चोरको अपने कुकर्मोंका मीठा फल मिल रहा है।
तब भगवान् शिव प्रकट हुए और बोले— 'पण्डितजी ! आजके दिन आपको फाँसी होनेवाली थी, लेकिन आपके द्वारा की गयी पूजा-आराधनाके कारण वह फाँसीकी सजा घटकर महज एक कील गड़नेतक सीमित हो गयी। जबकि इस चोरका आज राजतिलक होना था, लेकिन इसके कुकर्मोंके कारण वह पुरस्कार घटकर कुछ स्वर्णमुद्राओंतक सीमित हो गया। अतः रोनेकी बजाय सन्तोषपूर्वक अपने सत्कर्मोंपर आस्था बनाये रखिये। भाग्य कर्मोंसे ही बनता और बदलता है।
❤12
*नर से नारायण बनने की विधा*

*👉 **मनुष्य विधाता की रचना का सर्वश्रेष्ठ चमत्कारिक प्राणी है।* अव्यवस्थित धरती को सुव्यवस्थित रूप देने का श्रेय उसे ही प्राप्त है। ज्ञान, विज्ञान, भाषा, लिपि, स्वर आदि की जो विशेषताएँ उसे प्राप्त हैं, उनसे निःसंदेह उसकी महत्ता ही प्रतिपादित होती है। *मनुष्य इस संसार का समग्र संपन्न प्राणी है।* महर्षि व्यास ने इस संबंध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है-
*गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि नहि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित् ॥*
*"मैं बड़े भेद की बात तुम्हें बताता हूँ कि मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ भी नहीं है।* वह सर्वशक्ति संपन्न है। जहाँ चाहे उलट-फेर कर दे, जहाँ चाहे युद्ध, मार-काट मचा दे। जी में आए तो शांति और सुव्यवस्था स्थापित कर दे। *कोई भी कार्य ऐसा नहीं, जो मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है।* *धन, पद, यश आदि कोई वैभव ऐसा नहीं, जिसे वह प्राप्त न कर सकता हो।"*
👉 *भगवान राम और कृष्ण भी मनुष्य ही थे, किंतु उन्होंने अपनी शक्तियों का उत्कर्ष किया और **"नर" से "नारायण" बनकर विश्व में पूजे जाने लगे।* मनुष्य अपने पौरुष से विद्या, बुद्धि और बल से-वैभव प्राप्त कर सकता है। देवत्व की उच्च कक्षा में प्रतिष्ठित हो सकता है, *वह भगवान बन सकता है। उसकी शक्ति से परे इस संसार में कुछ भी तो नहीं है। शास्त्रकार का कथन है- "यद्ब्रह्मांडे तत्पिण्डे" अर्थात जो कुछ भी इस संसार में दिखाई देता है, वह सभी बीज रूप से मनुष्य के शरीर में- पिंड में विद्यमान है।*
👉 *मनुष्य दीन, हीन और पददलित तभी तक है जब तक वह अपने आप को पहचानता नहीं।* तुलसीदास जी जब तक निकृष्ट, जीवन व्यतीत करते रहे, तब तक वे शोक-संताप में डूबे रहे, किसी ने उन्हें जाना तक नहीं, बेचारे मारे-मारे इधर-से-उधर घूमते रहे। *किंतु जैसे ही उनकी आंतरिक शक्तियाँ प्रकाशित हुईं, "तुलसीदास जी" "अमृत पुत्र" हो गए। जन-जन की वाणी में समा गए, संत बन गए, महात्मा हो गए।* वाल्मीकि, अंगुलिमाल आदि की कथाएँ सर्वविदित हैं। विल्वमंगल सूरदास के नाम से प्रसिद्ध हुए, इसके मूल में मानवीय अंतःकरण का विकास ही सन्निहित है। *वह शक्तियाँ, वह सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में है, अंतर केवल इतना है कि लौकिक कामनाओं से घिरा हुआ इनसान पारलौकिक संभावनाओं का विचार तक नहीं करता, इसी कारण वह छोटा है, तुच्छ है, निकृष्ट है।*
❤7👎1
।। जय सूर्यदेव ।।

भगवान् सूर्य के अर्घ्यदान की विशेष महत्ता है। प्रतिदिन प्रातःकाल रक्तचन्दन आदि से मण्डल बनाकर, पीठशक्तियों की स्थापना, पूजाकर ताम्रपत्र में जल, लालचन्दन, तण्डुल, श्यामाक, रक्तकमल अथवा रक्तपुष्प और कुश आदि रखकर घुटने टेककर प्रसन्नमन से सूर्यमन्त्र का जप करते हुए अथवा निम्नलिखित श्लोक का पाठ करते हुए भगवान् सूर्य को अर्घ्य देकर पुष्पांजलि देनी चाहिए तत्पश्चात प्रदक्षिणा एवं नमस्कार अर्पित करना चाहिए

सिन्दूरवर्णाय सुमण्डलाय नमोअस्तु वज्राभरणाय तुभ्यम्।
पद्माभनेत्राय सुपङ्कजाय ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय।।

सरक्तवर्णं सुसुवर्णतोयं स्रक्कुंकुमाद्यं सकुशं सपुष्पं।
प्रदत्तमादाय सहेमपात्रं प्रशस्तमध्र्यं भगवन् प्रसीद।।
(शिवपुराण, कैलासखण्ड ६ / ३९ - ४० )

'सिन्दूरवर्ण के से सुन्दर मण्डलवाले, हीरकरत्नादि आभरणों से अलंकृत, कमलनेत्र, हाथ में कमल लिए, ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रादि (सम्पूर्ण सृष्टि ) के मूलकारण ( हे प्रभो आदित्य ) आपको नमस्कार है। भगवन् ! आप सुवर्णपात्र में रक्तवर्ण के कुंकुम, कुश, पुष्पमालादि से युक्त रक्त-स्वर्णिम जलद्वारा दिये गए श्रेष्ठ अर्घ्य को ग्रहण कर प्रसन्न हों।'

इस अर्घ्यदान से भगवान् सूर्य प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन, धान्य, क्षेत्र, पुत्र, मित्र, कलत्र, तेज, वीर्य, यश, कान्ति, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं तथा सुर्यलोक की प्राप्ति होती है। भगवान् सूर्य अत्यंत उपकारक और दयालु हैं, वे अपने उपासक को सब कुछ प्रदान करते हैं। उसके लिए मुक्ति भी सुलभ हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं।

सूर्य अर्घ्यदान के लिए विशेष मंत्र

ॐ जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । तमोऽरिं सर्वपाप्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

सूर्य गायत्री मंत्र
ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्
❤5🙏2
तुलसी वहाँ न जाइए, जन्मभूमि के ठाम"

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी काशी में विद्वानों के बीच भगवत चर्चा कर रहे थे,क्षतभी दो व्यक्ति – जो तुलसीदास जी के गाँव से थे वहाँ आये। ऐसे तो वे दोनों गंगा स्नान करने आये थे, लेकिन सत्संग सभा तथा भगवद वार्तालाप हो रहा था, तो वे भी वहाँ बैठ गए, दोनों ने उन्हें पहचान लिया, वे आपस में बात करने लगे
एक ने कहा “अरे ! ए तो अपना रामबोला है, हमारे साथ- साथ खेलता था, कैसी सब बातें कर रहा है, और लोग भी कितनी तन्मयता से उसकी वाणी सुन रहे है ! क्या चक्कर है ये सब।”
दूसरे ने कहा “हाँ भाई, मुझे तो वह पक्का बहुरूपी ठग लगता है, देखो तो कैसा ढोंग कर रहा है ! पहले तो वह ऐसा नहीं था, हमारे साथ खेलता था तब तो कैसा था और अब वेष बदल कर कैसा लग रहा है ! मुझे तो लगता है कि वह ढोंग कर रहा है।” जब तुलसीदास जी ने उन्हें देखा तो वे दोनों के पास गए, उनसे खबर पूछी और बातें की, दोनों में से एक ने कहा कि “अरे ! तूने तो कैसा वेष धारण कर लिया है ? तू सब को अँधेरे में रख सकता है, लेकिन हम तो तुम्हें अच्छी तरह से जानते है। तू सबको प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हम तो प्रभावित होने वाले नहीं, हम जानते हैं कि तू ढोंग कर रहा है।” तुलसीदास जी के मन में दोनों के अज्ञान पे दया आई, उनके मुख से एक दोहा निकल गया –
" तुलसी वहाँ न जाइए, जन्मभूमि के ठाम।
गुण-अवगुण चीन्हे नहीं, लेत पुरानो नाम।।"
अर्थात साधू को अपने जन्मभूमि के गाँव नहीं जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ के लोगों उन में प्रगट हुए गुणों को न देखकर पुराना नाम लेते रहेंगे, उनके ज्ञान-वैराग्य-भक्ति से किसी को कोई लाभ नहीं हो सकेगा।
निकट के लोग कई बार सही पहचान नहीं कर पाते, ‘अतिपरिचय अवज्ञा भवेत’ यानि अति परिचय के कारण नजदीक के लोग सही लाभ नहीं ले पाते, जबकि दूर रहने वाले आदर सम्मान कर के विद्वानों का लाभ ले पाता है।
"अति परचै तैं होत है अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चंदन देत जराय॥"
जिनसे अधिक परिचय या जान−पहचान होती है, उसकी स्वभावतः उपेक्षा भी हो जाती है। इस तरह कई बार अधिक परिचय से अरुचि तथा अनादर भी हो जाता है। जैसे मलय पर्वत पर चंदन के वृक्ष होते हैं लेकिन वहाँ पर रहने वाली भील−स्त्रियाँ चंदन को खाना पकाने के लिए ईंधन के रूप में जलाती हैं, अर्थात् वे चंदन का महत्व नहीं आंकती है और उसे साधारण लकड़ी की तरह प्रयुक्त करती हैं, यह चंदन का अनादर ही है---
"अति परिचयात अवज्ञा सन्तत गमनात अनादरः भवति।
मलये भिल्ली पुरन्ध्री चन्दन तरुकाष्ठ इन्धनम् कुरुते।।"
अति परिचय से उपेक्षा, और बार बार जाने से अनादर होता है, मलय पर्वत पर भील स्त्री चंदन की लकड़ी को इंधन में उपयोग करती है।
❤9🙏2
"सनातन में शास्त्रों के अनुसार दिशाएँ भी देवत्व से जुड़ी हैं, हर दिशा का अपना एक
रक्षक, अपना एक दिव्य पालक होता है।

"वास्तु टिप्स" के अंतर्गत आइए आज जानते हैं, कौन-सी दिशा का कौन दिक्पाल है।

दस दिशाओं के दस दिग्पाल क्रमशः इस प्रकार हैं:

१. उर्ध्व दिशा के ____ब्रह्मा,
२. ईशान दिशा के ___शिव/ईश,
३. पूर्व दिशा के_ इंद्र,
४. आग्नेय दिशा के__ अग्नि,
५. दक्षिण दिशा के___ यम,
६. नैऋत्य दिशा के___ नऋति,
७. पश्चिम दिशा के___ वरुण,
८. वायव्य दिशा के__ वायु,
९. उत्तर दिशा के____ कुबेर और
१०.अधो दिशा के____अनंत।

ये दिशाओं के संरक्षक या रक्षक देवता हैं, जिन्हें दिक्पाल कहा जाता है।

१. उर्ध्व दिशा : उर्ध्व दिशा के देवता ब्रह्मा हैं। इस दिशा का सबसे ज्यादा महत्व है। आकाश ही ईश्वर है। जो व्यक्ति उर्ध्व मुख होकर प्रार्थना करते हैं उनकी प्रार्थना में असर होता है। वेदानुसार मांगना है तो ब्रह्म और ब्रह्मांड से मांगें, किसी और से नहीं। उससे मांगने से सब कुछ मिलता है।

वास्तु : घर की छत, छज्जे, उजालदान, खिड़की और बीच का स्थान इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। आकाश तत्व से हमारी आत्मा में शांति मिलती है। इस दिशा में पत्थर फेंकना, थूकना, पानी उछालना, चिल्लाना या उर्ध्व मुख करके अर्थात आकाश की ओर मुख करके गाली देना वर्जित है। इसका परिणाम घातक होता है।

२. ईशान दिशा : पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं। वास्तु अनुसार घर में इस स्थान को ईशान कोण कहते हैं। भगवान शिव का एक नाम ईशान भी है। चूंकि भगवान शिव का आधिपत्य उत्तर-पूर्व दिशा में होता है इसीलिए इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। इस दिशा के स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु माने गए हैं।

वास्तु अनुसार : घर, शहर और शरीर का यह हिस्सा सबसे पवित्र होता है इसलिए इसे साफ-स्वच्छ और खाली रखा जाना चाहिए। यहां जल की स्थापना की जाती है जैसे कुआं, बोरिंग, मटका या फिर पीने के पानी का स्थान। इसके अलावा इस स्थान को पूजा का स्थान भी बनाया जा सकता है। इस स्थान पर कूड़ा-करकट रखना, स्टोर, टॉयलेट, किचन वगैरह बनाना, लोहे का कोई भारी सामान रखना वर्जित है। इससे धन-संपत्ति का नाश और दुर्भाग्य का निर्माण होता है।

३. पूर्व दिशा : ईशान के बाद पूर्व दिशा का नंबर आता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह ईशान से ही निकलता है, पूर्व से नहीं। इस दिशा के देवता इंद्र और स्वामी सूर्य हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है।

वास्तु : घर की पूर्व दिशा में कुछ खुला स्थान और ढाल होना चाहिए। शहर और घर का संपूर्ण पूर्वी क्षेत्र साफ और स्वच्छ होना चाहिए। घर में खिड़की, उजालदान या दरवाजा रख सकते हैं। इस दिशा में कोई रुकावट नहीं होना चाहिए। इस स्थान में घर के वरिष्ठजनों का कमरा नहीं होना चाहिए और कोई भारी सामान भी न रखें। यहां सीढ़ियां भी न बनवाएं।

४. आग्नेय दिशा : दक्षिण और पूर्व के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। इस दिशा के अधिपति हैं अग्निदेव। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं।

वास्तु : घर में यह दिशा रसोई या अग्नि संबंधी (इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। आग्नेय कोण का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। आग्नेय कोण में शयन कक्ष या पढ़ाई का स्थान नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का द्वार भी नहीं होना चाहिए। इससे गृहकलह निर्मित होता है और निवासियों का स्वास्थ्य भी खराब रहता है।

५. दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा के अधिपति देवता हैं भगवान यमराज। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख, संपन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

वास्तु : वास्तु के अनुसार दक्षिण दिशा में मुख्‍य द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का भारी सामान रखना चाहिए। इस दिशा में दरवाजा और खिड़की नहीं होना चाहिए। यह स्थान खाली भी नहीं रखा जाना चाहिए। इस दिशा में घर के भारी सामान रखें। शहर के दक्षिण भाग में आपका घर है तो वास्तु के उपाय करें।

६. नैऋत्य दिशा : दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा नैऋत देव के आधिपत्य में है। इस दिशा के स्वामी राहु और केतु हैं।

वास्तु : इस दिशा में पृथ्वी तत्व की प्रमुखता है इसलिए इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। नैऋत्य दिशा में द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे, बोरिंग, कुएं इत्यादि नहीं होने चाहिए। इस दिशा में क्या होना चाहिए, यह किसी वास्तुशास्त्री से पूछकर तय करें।
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"सनातन में शास्त्रों के अनुसार दिशाएँ भी देवत्व से जुड़ी हैं, हर दिशा का अपना एक
रक्षक, अपना एक दिव्य पालक होता है।

"वास्तु टिप्स" के अंतर्गत आइए आज जानते हैं, कौन-सी दिशा का कौन दिक्पाल है।

दस दिशाओं के दस दिग्पाल क्रमशः इस प्रकार हैं:

१. उर्ध्व दिशा के ____ब्रह्मा,
२. ईशान दिशा के ___शिव/ईश,
३. पूर्व दिशा के_ इंद्र,
४. आग्नेय दिशा के__ अग्नि,
५. दक्षिण दिशा के___ यम,
६. नैऋत्य दिशा के___ नऋति,
७. पश्चिम दिशा के___ वरुण,
८. वायव्य दिशा के__ वायु,
९. उत्तर दिशा के____ कुबेर और
१०.अधो दिशा के____अनंत।

ये दिशाओं के संरक्षक या रक्षक देवता हैं, जिन्हें दिक्पाल कहा जाता है।

१. उर्ध्व दिशा : उर्ध्व दिशा के देवता ब्रह्मा हैं। इस दिशा का सबसे ज्यादा महत्व है। आकाश ही ईश्वर है। जो व्यक्ति उर्ध्व मुख होकर प्रार्थना करते हैं उनकी प्रार्थना में असर होता है। वेदानुसार मांगना है तो ब्रह्म और ब्रह्मांड से मांगें, किसी और से नहीं। उससे मांगने से सब कुछ मिलता है।

वास्तु : घर की छत, छज्जे, उजालदान, खिड़की और बीच का स्थान इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। आकाश तत्व से हमारी आत्मा में शांति मिलती है। इस दिशा में पत्थर फेंकना, थूकना, पानी उछालना, चिल्लाना या उर्ध्व मुख करके अर्थात आकाश की ओर मुख करके गाली देना वर्जित है। इसका परिणाम घातक होता है।

२. ईशान दिशा : पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं। वास्तु अनुसार घर में इस स्थान को ईशान कोण कहते हैं। भगवान शिव का एक नाम ईशान भी है। चूंकि भगवान शिव का आधिपत्य उत्तर-पूर्व दिशा में होता है इसीलिए इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। इस दिशा के स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु माने गए हैं।

वास्तु अनुसार : घर, शहर और शरीर का यह हिस्सा सबसे पवित्र होता है इसलिए इसे साफ-स्वच्छ और खाली रखा जाना चाहिए। यहां जल की स्थापना की जाती है जैसे कुआं, बोरिंग, मटका या फिर पीने के पानी का स्थान। इसके अलावा इस स्थान को पूजा का स्थान भी बनाया जा सकता है। इस स्थान पर कूड़ा-करकट रखना, स्टोर, टॉयलेट, किचन वगैरह बनाना, लोहे का कोई भारी सामान रखना वर्जित है। इससे धन-संपत्ति का नाश और दुर्भाग्य का निर्माण होता है।

३. पूर्व दिशा : ईशान के बाद पूर्व दिशा का नंबर आता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह ईशान से ही निकलता है, पूर्व से नहीं। इस दिशा के देवता इंद्र और स्वामी सूर्य हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है।

वास्तु : घर की पूर्व दिशा में कुछ खुला स्थान और ढाल होना चाहिए। शहर और घर का संपूर्ण पूर्वी क्षेत्र साफ और स्वच्छ होना चाहिए। घर में खिड़की, उजालदान या दरवाजा रख सकते हैं। इस दिशा में कोई रुकावट नहीं होना चाहिए। इस स्थान में घर के वरिष्ठजनों का कमरा नहीं होना चाहिए और कोई भारी सामान भी न रखें। यहां सीढ़ियां भी न बनवाएं।

४. आग्नेय दिशा : दक्षिण और पूर्व के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। इस दिशा के अधिपति हैं अग्निदेव। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं।

वास्तु : घर में यह दिशा रसोई या अग्नि संबंधी (इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। आग्नेय कोण का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। आग्नेय कोण में शयन कक्ष या पढ़ाई का स्थान नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का द्वार भी नहीं होना चाहिए। इससे गृहकलह निर्मित होता है और निवासियों का स्वास्थ्य भी खराब रहता है।

५. दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा के अधिपति देवता हैं भगवान यमराज। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख, संपन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

वास्तु : वास्तु के अनुसार दक्षिण दिशा में मुख्‍य द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का भारी सामान रखना चाहिए। इस दिशा में दरवाजा और खिड़की नहीं होना चाहिए। यह स्थान खाली भी नहीं रखा जाना चाहिए। इस दिशा में घर के भारी सामान रखें। शहर के दक्षिण भाग में आपका घर है तो वास्तु के उपाय करें।

६. नैऋत्य दिशा : दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा नैऋत देव के आधिपत्य में है। इस दिशा के स्वामी राहु और केतु हैं।

वास्तु : इस दिशा में पृथ्वी तत्व की प्रमुखता है इसलिए इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। नैऋत्य दिशा में द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे, बोरिंग, कुएं इत्यादि नहीं होने चाहिए। इस दिशा में क्या होना चाहिए, यह किसी वास्तुशास्त्री से पूछकर तय करें।
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कहानी का समय

*गुरु गोरखनाथ और राजा*

एक बार गुरु मछेन्द्रनाथ जी ने, गोरख नाथ जी को आदेश दिया की एक राजा को उसके राजपाट से हटाकर योग के मार्ग पर लाना है।

जो राजा ऐसो-आराम का शौकीन हो, राज पाठ संभालता हो, ऐसे राजा को योग के मार्ग पर लाना, उसको सर्वत्याग करने के लिए बोलना, बहुत ही कठिन कार्य था। लेकिन वे तो ठहरे गुरु गोरखनाथ जो, अनहोनी को भी होनी कर दे…

राजा बड़ा दयालु और धार्मिक था। साधु-संतों की पूरी सेवा करता था। किसी को अपने दरबार से खाली नहीं जाने देता था। गोरखनाथ जी वहां पहुंचे और अलख निरंजन की आवाज लगाई। राजा के नौकर-चाकर बाहर आए तो गोरखनाथ जी ने कहा कि मुझे राजा से मिलना है।

राजा तक सूचना पहुंचाई गई, राजा ने सोचा ऐसा कौनसा संत है जो, सीधा मेरे से ही मिलना चाहता है। उन्होंने गोरखनाथ जी को अपने पास बुलाने का आदेश दिया और जब गुरु गोरखनाथ राजा के पास पहुंचे तो उन्होंने, स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजन आप के महल में बहुत दुर्गंध आ रही है। तब राजा ने कहा संत जी आप कैसी बात कर रहे हो, यहां दुर्गंध का क्या मतलब, यहां तो प्रतिदिन इत्र डालकर सफाई होती है। हमें तो यहां कोई दुर्गंध नजर नहीं आती। यहां तो चारों तरफ खुशबू ही खुशबू है।

नाथ जी ने कहा कि राजन यह विषय-वासना और भोग-विलाश की दुर्गंध है। आप को नजर नहीं आएगी। आप इसमें लिप्त हो चुके हो। चलिए मेरे साथ मैं आपको दिखाता हूं की दुर्गंध क्या होती है।

नाथ जी, राजा को एक चमड़े वाले के पास लेकर गए जहां विभिन्न-विभिन्न प्रकार के चमडो का काम होता था। वहां पर कई सौ मीटर पहले से ही बदबू आना सुरु हो गयी थी। राजा ने कहा यहां तो बहुत दुर्गंध है। तब नाथ जी उस चमड़े वाले के पास गए और उसको बोला कि हे! चमड़े वाले यहां तो बहुत दुर्गंध है आप यहां पर कैसे रहते हो। तो उस व्यक्ति ने कहा हे नाथ! कैसी दुर्गंध यहां तो प्रतिदिन इत्र डालकर सफाई होती है। हमें तो किसी प्रकार की दुर्गंध नजर नहीं आती, यहां तो चारों तरफ खुशबू ही खुशबू है।

तब गोरखनाथ जी ने राजा को कहा, कि जिस तरह से यह इस गंदगी में लिप्त हो चुका है, इसे बदलू का एहसास ही नहीं हो रहा उसी तरह से आप भी राज-पाट ऐशो-आराम की दुर्गंध में समाहित हो चुके हो। आपको उस की दुर्गंध महसूस नहीं होगी। चलिए मेरे साथ आगे चलते है...

नाथ जी फिर राजा को एक मांस की दुकान के पास ले गए। वहां पर बहुत दूर से मांस के सड़ने की बदबू आ रही थी। जैसे ही वह मांस वाले की दुकान पर पहुंचे और नाथ जी ने मांस वाले से पूछा कि आप इतनी बदबू और गंदगी भरी जगह में कैसे काम कर लेते हो। तब उस दुकानदार ने कहा कि हे नाथ! आप कैसी बात कर रहे हो। यहां तो किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं है। यहां तो प्रतिदिन इत्र डाल के सफाई होती है। हमें तो हर पल खुशबू का एहसास होता है।

नाथ जी ने राजा को समझाया कि जिस तरह से मांस और चमड़े वाले की दुकान पर उन्हें बदबू नहीं आती खुशबू का एहसास होता है। वैसे ही आपको भी राजसी भोग-विलास में खुशबू और आनंद का एहसास होता है। आप मेरे साथ चलिए और फिर देखिए असली आनंद क्या है? यह तो मोह-माया और सांसारिक भोग विलास की वस्तुये है। जो एक दिन नष्ट हो जाएंगी। आनंद तो वह परम आनंद है जो, कभी नष्ट नहीं होता। उस आनंद का स्वाद अगर आपने एक बार ले लिया तो फिर आपको यह राजसी ऐसो-आराम तुक्ष और छोटे महसूस होने लगेंगे।

अब तक राजा को नाथ जी की बात समझ में आ चुकी थी और गुरु गोरख के साथ हो लिए।

जिस तरह से इस कहानी में बताया गया कि राजा को अपने महल में इत्र की खुशबू आती है। उसी तरह से चमडे और मांस वाले व्यक्ति को भी अपने यहां इत्र की खुशबू का एहसास होता है। क्योंकि वे उस में लिप्त हो चुके है। उसी तरह से हम भी इस संसार की मोह-माया ऐसो-आराम और और न जाने क्या-क्या गंदगी में लिप्त हो चुके है। हमें असली सुख का आनंद महसूस ही नहीं होता हम इसी को ही असली आनंद मान बैठे है।

उस राजा की तरह हमे भी इस गंदगी से निकलकर योग और ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हुए असली आनंद की तरफ बढ़ना चाहिए.
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श्रीलक्ष्मी द्वादशनाम स्तोत्रम् ||
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीं।
दासीभूत समस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम्।।

श्रीमन्मन्दकटाक्ष लब्ध विभव ब्रह्मेन्द्र गंगाधरां।
त्वां त्रैलोक्य कुटुंबिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम्

👉श्रीदेवी प्रथमं नाम द्वितीयं अमृत्तोद्भवा।
तृत्तीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं लोकसुन्दरी।।

पञ्चमं विष्णुपत्नी च षष्ठं स्यात् वैष्णवी ।
तथा सप्ततं तु वरारोहा अष्टमं हरिवल्लभा।।

नवमं शार्गिंणी प्रोक्ता दशमं देवदेविका ।
एकादशं तु लक्ष्मीः स्यात् द्वादशं श्रीहरिप्रिया ।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं तस्य पुण्यफलप्रदम्।।

द्विमासं सर्वकार्याणि षण्मासाद्राज्यमेव च।
संवत्सरं तु पूजायाः श्रीलक्ष्म्याः पूज्य एव च।।

इति श्रीलक्ष्मीद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्
पूर्णेन्दुवदनं पीतवसनं कमलासनम्।
लक्ष्म्या श्रितं चतुर्बाहुं लक्ष्मीनारायणं भजे॥
वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम्।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीश्वरीं ताम्॥
श्री लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः
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।। शिवपञ्चाक्षर-नक्षत्रमाला स्तोत्रम् ।।

श्रीमदात्मने गुणैकसिन्धवे नमः शिवाय
धामलेशधूतकोकबन्धवे नमः शिवाय।
नामशेषितानमद्भावान्धवे नमः शिवाय
पामरेतरप्रधानबन्धवे नमः शिवाय।।

कालभीतविप्रबालपाल ते नमः शिवाय
शूलभिन्नदुष्टदक्षफाल ते नमः शिवाय।
मूलकारणाय कालकाल ते नमः शिवाय
पालयाधुना दयालवाल ते नमः शिवाय।।

इष्टवस्तुमुख्यदानहेतवे नमः शिवाय
दुष्टदैत्यवंशधूमकेतवे नमः शिवाय।
सृष्टिरक्षणाय धर्मसेतवे नमः शिवाय
अष्टमूर्तये वृषेन्द्रकेतवे नमः शिवाय।।

आपदद्रिभेदटङ्कहस्त ते नमः शिवाय
पापहारिदिव्यसिन्धुमस्त ते नमः शिवाय।
पापदारिणे लसन्नमस्तते नमः शिवाय
शापदोषखण्डनप्रशस्त ते नमः शिवाय।।

व्योमकेश दिव्यभव्यरूप ते नमः शिवाय
हेममेदिनीधरेन्द्रचाप ते नमः शिवाय।
नाममात्रदग्धसर्वपाप ते नमः शिवाय
कामनैकतानहृद्दुराप ते नमः शिवाय।।

ब्रह्ममस्तकावलीनिबद्ध ते नमः शिवाय
जिह्मगेन्द्रकुण्डलप्रसिद्ध ते नमः शिवाय।
ब्रह्मणे प्रणीतवेदपद्धते नमः शिवाय
जिंहकालदेहदत्तपद्धते नमः शिवाय।।

कामनाशनाय शुद्धकर्मणे नमः शिवाय
सामगानजायमानशर्मणे नमः शिवाय।
हेमकान्तिचाकचक्यवर्मणे नमः शिवाय
सामजासुराङ्गलब्धचर्मणे नमः शिवाय।।

जन्ममृत्युघोरदुःखहारिणे नमः शिवाय
चिन्मयैकरूपदेहधारिणे नमः शिवाय।
मन्मनोरथावपूर्तिकारिणे नमः शिवाय
सन्मनोगताय कामवैरिणे नमः शिवाय।।

यक्षराजबन्धवे दयालवे नमः शिवाय
दक्षपाणिशोभिकाञ्चनालवे नमः शिवाय।
पक्षिराजवाहहृच्च्हयालवे नमः शिवाय
अक्षिफाल वेदपूततालवे नमः शिवाय।।

दक्षहस्तनिष्ठजातवेदसे नमः शिवाय
अक्षरात्मने नमद्बिडौजसे नमः शिवाय।
दीक्षितप्रकाशितात्मतेजसे नमः शिवाय
उक्षराजवाह ते सतां गते नमः शिवाय।।

राजताचलेन्द्रसानुवासिने नमः शिवाय
राजमाननित्यमन्दहासिने नमः शिवाय।
राजकोरकावतंसभासिने नमः शिवाय
राजराजमित्रताप्रकाशिने नमः शिवाय।।

दीनमानवालिकामधेनवे नमः शिवाय
सूनबाणदाहकृत्कृशानवे नमः शिवाय।
स्वानुरागभक्तरत्नसानवे नमः शिवाय
दानवान्धकारचण्डभानवे नमः शिवाय।।

सर्वमङ्गलाकुचाग्रशायिने नमः शिवाय
सर्वदेवतागणातिशायिने नमः शिवाय।
पूर्वदेवनाशसंविधायिने नमः शिवाय
सर्वमन्मनोजभङ्गदायिने नमः शिवाय।।

स्तोकभक्तितो.अपि भक्तपोषिणे नमः शिवाय
माकरन्दसारवर्षिभाषिणे नमः शिवाय।
एकबिल्वदानतो.अपि तोषिणे नमः शिवाय
नैकजन्मपापजालशोषिणे नमः शिवाय।।

सर्वजीवरक्षणैकशीलिने नमः शिवाय
पार्वतीप्रियाय भक्तपालिने नमः शिवाय।
दुर्विदग्धदैत्यसैन्यदारिणे नमः शिवाय
शर्वरीशधारिणे कपालिने नमः शिवाय।।

पाहि मामुमामनोज्ञदेह ते नमः शिवाय
देहि मे वरं सिताद्रिगेह ते नमः शिवाय।
मोहितर्षिकामिनीसमूह ते नमः शिवाय
स्वेहितप्रसन्न कामदोह ते नमः शिवाय।।

मङ्गलप्रदाय गोतुरंग ते नमः शिवाय
गङ्गया तरङ्गितोत्तमाङ्ग ते नमः शिवाय।
सङ्गरप्रवृत्तवैरिभङ्ग ते नमः शिवाय
अङ्गजारये करेकुरङ्ग ते नमः शिवाय।।

ईहितक्षणप्रदानहेतवे नमः शिवाय
आहिताग्निपालकोक्षकेतवे नमः शिवाय।
देहकान्तिधूतरौप्यधातवे नमः शिवाय
गेहदुःखपुञ्जधूमकेतवे नमः शिवाय।।

त्र्यक्ष दीनसत्कृपाकटाक्ष ते नमः शिवाय
दक्षसप्ततन्तुनाशदक्ष ते नमः शिवाय।
इक्षराजभानुपावकाक्ष ते नमः शिवाय
रक्ष मां प्रपन्नमात्ररक्ष ते नमः शिवाय।।

न्यङ्कुपाणये शिवंकराय ते नमः शिवाय
संकटाब्धितीर्णकिंकराय ते नमः शिवाय।
कङ्कभीषिताभयंकराय ते नमः शिवाय
पङ्कजाननाय शंकराय ते नमः शिवाय।।

कर्मपाशनाश नीलकण्ठ ते नमः शिवाय
शर्मदाय नर्यभस्मकण्ठ ते नमः शिवाय।
निर्ममर्षिसेवितोपकण्ठ ते नमः शिवाय
कुर्महे नतीर्नमद्विकुण्ठ ते नमः शिवाय।।

विष्टपाधिपाय नम्रविष्णवे नमः शिवाय
शिष्टविप्रहृद्गुहाचरिष्णवे नमः शिवाय।
इष्टवस्तुनित्यतुष्टजिष्णवे नमः शिवाय
कष्टनाशनाय लोकजिष्णवे नमः शिवाय।।

अप्रमेयदिव्यसुप्रभाव ते नमः शिवाय
सत्प्रपन्नरक्षणस्वभाव ते नमः शिवाय।
स्वप्रकाश निस्तुलानुभाव ते नमः शिवाय
विप्रडिम्भदर्शितार्द्रभाव ते नमः शिवाय।।

सेवकाय मे मृड प्रसीद ते नमः शिवाय
भावलभ्य तावकप्रसाद ते नमः शिवाय।
पावकाक्ष देवपूज्यपाद ते नमः शिवाय
तवकाङ्घ्रिभक्तदत्तमोद ते नमः शिवाय।।

भुक्तिमुक्तिदिव्यभोगदायिने नमः शिवाय
शक्तिकल्पितप्रपञ्चभागिने नमः शिवाय।
भक्तसंकटापहारयोगिने नमः शिवाय
युक्तसन्मनःसरोजयोगिने नमः शिवाय।।

अन्तकान्तकाय पापहारिणे नमः शिवाय
शान्तमायदन्तिचर्मधारिणे नमः शिवाय।
संतताश्रितव्यथाविदारिणे नमः शिवाय
जन्तुजातनित्यसौख्यकारिणे नमः शिवाय।।

शूलिने नमो नमः कपालिने नमः शिवाय
पालिने विरिञ्चितुण्डमालिने नमः शिवाय।
लीलिने विशेषरुण्डमालिने नमः शिवाय
शीलिने नमः प्रपुण्यशालिने नमः शिवाय।।

शिवपञ्चाक्षरमुद्रां चतुष्पदोल्लासपद्यमणिघटिताम।
नक्षत्रमालिकामिह दधदुपकण्ठं नरो भवेत्सोमः।।

।। इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपाद शिष्यस्य श्रीमच्छंकर भगवतः कृतौ शिवपञ्चाक्षर नक्षत्रमाला स्तोत्रं संपूर्णम् ।।
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।। श्री हनुमते नमः ।।

जातुधानावली- मत्तकुंजरघटा
निरखि मृगराजु ज्योंव गिरितें टूट्यो।
बिकट चटकन चोट चरन गहि पटकि महि
निघटि गए सुभट सतु सबको छूट्यो।।

दासु तुलसी परत धरनि धरकत झुकत
हाट सी उठति जम्बुकनि लूट्यो।
धीर रघुबीर को बीर रनबाँकुरों
हाँकि हनुमान कुलि कटकु कूट्यो।।
(कवितावली लंकाकाण्ड ४६)

भावार्थ-
जैसे मतवाले हाथियों के झुंड को देखकर सिंह पर्वत पर से उनपर टूट पड़ता है, वैसे ही राक्षसों के समूह को देखकर हनुमानजी उनपर झपट पड़े। चपतों की विकट चोट से और पाँव पकड़कर पृथ्वी पर पछाड़ने से सब वीर निःशेष हो गए और सबका बल जाता रहा! गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि वीरों के पृथ्वी पर गिरने से पृथ्वी धड़कने लगी और वीरों के गिरते-गिरते स्यारों ने इस प्रकार लूट लिया जैसे उठती हुई पैठ को लुटेरे लूट लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के धीर वीर रणबाँकुरे हनुमानजी ने ललकार-ललकारकर सारी सेना की कुन्दी कर दी।
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।। श्री हनुमान स्तवन ।।

स्तवन का अर्थ 'प्रसन्न' होता है। स्तवन स्तोत्र भगवान हनुमान जी को समर्पित है। इस स्तोत्र पाठ से प्रभु श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।

हनुमान जी भगवान शंकर के ११वें रुद्र अवतार हैं। हनुमान जी को अमरता का वरदान मिला हुआ है। जो हनुमान भक्त अपने मन में हनुमान जी के प्रति दृढ़ विश्वास और श्रद्धा बनाए रखता है, उस पर हनुमान जी की सदा कृपा रहती है। भगवान हनुमान जी अपने भक्तों के सभी संकटों को हर लेते हैं। इस स्तोत्र पाठ से इससे भगवान राम के साथ भगवान भोलेनाथ भी प्रसन्न होते हैं।

।। श्री हनुमान स्तवन स्तोत्र ।।

प्रनवउं पवनकुमार खल बन पावक ज्ञानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

अर्थ-
मैं उन पवन पुत्र को नमन करता हूं, जो दुष्टों को भस्म करने के लिए अग्नि के समान हैं। जो अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, जिसके हृदय में धनुष-बाण धारण करने वाले प्रभु श्री राम निवास करते हैं।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

अर्थ-
मैं उन पवन पुत्र को प्रणाम करता हूं, जो अथाह शक्ति के स्वामी हैं। जो सोने के पहाड़ की तरह चमकने वाले शरीर, दानव जाति के जंगल को भस्म करने के लिए अग्नि के समान, बुद्धिमानों में सबसे प्रमुख और सभी गुणों को धारण करने वाले हैं और जो प्रभु श्री राम के सबसे प्रिय भक्त हैं।

गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।
रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्।।

अर्थ-
मैं उन हनुमान जी की पूजा करता हूं, जिन्होंने समुद्र को गाय के खुर के समान बना दिया। जिन्होंने विशाल राक्षसों को मच्छरों की तरह नाश किया और जो "रामायण" नामक माला के मोतियों के बीच एक रत्न की तरह हैं।

अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्।।

अर्थ-
मैं अंजनी के वीर पुत्र और माता जानकी के दुखों को दूर करने वाले, वानरों के स्वामी, लंका के अक्षकुमार (रावण के पुत्र) का वध करने वाले हनुमान जी की पूजा करता हूं।

उलंघ्यसिन्धों: सलिलं सलीलं
य: शोकवह्नींजनकात्मजाया:।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां
नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्।।

अर्थ-
मैं अंजनी के पुत्र को नमन करता हूं, जिसने समुद्र में छलांग लगा जनक की पुत्री के शोक रूपी अग्नि से लंका को जला दिया, मैं उन अंजनी पुत्र को नमस्कार करता हूं।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

अर्थ-
मैं रामदूत हनुमान जी जी के चरणों में शरण लेता हूं, जो मन और वायु के समान तेज हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो ज्ञानियों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो वानरों के समूह के प्रमुख हैं और जो श्री राम के दूत हैं।

आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहम्।
पारिजाततरूमूल वासिनं भावयामि पवमाननंदनम्।।

अर्थ-
मैं उन हनुमान जी का ध्यान करता हूं, जिनका चेहरा सुर्ख है और जिनका शरीर सोने के पहाड़ की तरह चमकता है, जो सभी वरदानों को प्रदान कर सकते हैं और सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जो पारिजात वृक्ष के नीचे रहते हैं।

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृत मस्तकाञ्जिंलम।
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं राक्षसान्तकाम्।।

अर्थ-
मैं उन हनुमान जी को नमन करता हूं, जो जहां भी राम के नाम का जप किया जाता है वहां श्रद्धा से झुकते हैं, जिनकी प्रेम के आंसुओं से भरी आंखें हैं और जो पूजा में सिर झुकाते हैं, जो राक्षसों के संहारक के रूप में जाने जाते हैं।

।। इस प्रकार श्री हनुमान स्तवन स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।
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इन मनुष्यों का अन्तःकरण मनुष्योंको मिले ज्ञानके अनुसार ही होता है और यह ज्ञान भी तीन प्रकारका ही होता है। अर्थात् -
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।
जिस ज्ञानसे मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको तो तू सात्त्विक जान।।२०।।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।
किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके नाना भावोंको अलग-अलग जानता है, उस ज्ञानको तू राजस जान।।२१।।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थसे रहित और तुच्छ है - वह तामस कहा गया है।।२।। (गीता अ० १८)
मनुष्योंके अन्तःकरणके अनुरूप ही सभी मनुष्योंकी श्रद्धा होती है। अर्थात् -
जो मनुष्य शास्त्रीय संस्कारोंसे रहित होते हैं, उनकी केवल स्वभावसे उत्पन्न श्रद्धा* सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी - ऐसे तीन प्रकारकी होती है।
* अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके सञ्चित संस्कारसे उत्पन्न हुई श्रद्धा "स्वभावजा" श्रद्धा कही जाती है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
हे भारत! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।।३।।
क्योंकि यह जीवात्मा भी तो इन मनके सहित अन्तःकरणको और पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको ही तो आकर्षण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है - उसमें जाता है। अर्थात् -
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।
इस देहमें यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षण करता है।।७।।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।
वायु गन्धके स्थानसे गन्धको जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीरका त्याग करता है, उससे इन मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है - उसमें जाता है।।८।। (गीता अ० १५)
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कलियुग में केवल श्रीहरि का नाम ही कल्याण का परम साधन है ! इसको छोड़कर दूसरा कोई उपाय ही नहीं है !!

जिसकी जिह्वा के नोक पर ‘हरि’ नाम के दो अक्षर बसते हैं, उसे गङ्गा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्कर की कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नाम से ही मिल जाता है। जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरों का उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का अध्ययन कर लिया। जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणा के सहित अश्वमेध आदि यज्ञों के द्वारा यजन कर लिया। ‘हरि’ ये दो अक्षर मृत्यु के पश्चात् परलोक के मार्ग में प्रयाण करने वाले प्राणों के लिये पाथेय (मार्ग के लिये भोजन की सामग्री) हैं, संसाररूप रोगों के लिये सिद्ध औषध हैं और जीवन के दु:ख और क्लेशों के लिये परित्राण हैं।

“न गङ्गा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्।
जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।
अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधै: सदक्षिणै:।
यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्।
दु:खक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।“
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।। कालिकाष्टकम् ।।

उल्लसानुज वृंद खेदिनी भूरि दुःख भव भेद भेदिनी।
कंठ रोबोट कपालमालिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

मेरु मंदर सुमध्य वासिनी सस्मृता सकल जाद्य नाशिनि।
या जगत्कमल अस्थानालिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

यस्मृति श्रुति पुराण पंडिनी कार्मुकञ्च शरशूल दंडिनी।
ब्रम्हचित्त सरसिलिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

चंड मुंड वध केलिकालिका रक्तबिज रंदपरहारिका।
काय कांति जित मेवामालिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

राजसी सकल सर्गलक्षणी सात्विकीति जगतांचरक्षिणी।
तामसीति जगदंत कारिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

आदिशक्ति रामला सनातनी संस्मृतति दरिबोधनाशिनि।
यद्वत्द्विज कुले कुमारिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

भक्तिनम्र मुनियक्ष वंदिता सिद्धि किन्नर समूह सेविता।
शुभ दैत्य मुखुण्डलोलिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

शोणितर्द गज चर्मवासिनी मुक्त भैरव महाधाधासिनी।
दैत्य बाहु कृचारुकांचिका मंगलं मम करोतु कालिका।।

कालिकाष्टकमिदं सुनिर्मलं यः पथेद्विष्यसंदाफलं।
कष्टदान लभते परं शुभं यद्यं शोण लभते पराजयं।।

।। इति श्री शंकरार्च विरचितं कालिकाष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।
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संसार और मोक्ष का वर्णन है, उनको यदि कोई सच्चे मायनों में समझ जाय, यदि किसी को यह मालूम हो जाय कि ये बन्ध और मोक्ष तो केवल अविवेक की खसकीली बुनियाद पर चिनकर खड़े कर दिये गये हैं तब फिर बन्ध किसका? और मोक्ष किसका? इत्यादि कुशंकाओं का समाधान साधक के हृदय में स्वयमेव हो जाता है - वह जान जाता है। इन प्रश्नों को जिसने हल नहीं किया वह बद्ध है। जिसने इन प्रश्नों का हल कर दिया वह मुक्त ही है।
इस कूटस्थ तत्व को संक्षेप में यों समझना चाहिये कि जब वृत्तियाँ उदय हो जाती हैं, तब यह तत्व वृत्तियों का साक्षी होकर, जब तक वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं तब तक यह तत्व वृत्ति के प्रागभाव का साक्षी बन कर, आत्मजिज्ञासा जब किसी को हो जाय तब यह तत्व उसी का साक्षी रह कर, उससे पहले 'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे अज्ञान के साक्षी के रूप में, यह तत्व रहा करता है। (इसीलिये ही भगवान् ने भी कहा है - न तो ऐसा ही है कि मैं किसी कालमें नहीं था तू नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।। गीता २/१२।। क्योंकि - असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है।।२/१६।।) वह साक्षी कूटस्थ तत्व इस असत्य जगत् का आलम्बन है, इससे इसे 'सत्य' कहते हैं। सम्पूर्ण जड़ पदार्थों का प्रकाशक होने से इस तत्वको 'चिद्रूप' मानते हैं। (सब कर परम प्रकाशक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।।) सदा ही प्रेमका स्थान होने से इस साक्षी तत्त्वको 'आनन्दरूप' समझते हैं। यह कूटस्थ तत्व सभी अर्थों का साधक है, और सभी से सम्बद्ध है, इससे उसे 'सम्पूर्ण' भी कह देते हैं। यह कूटस्थ तत्व 'जीव' और 'ईश्वर' आदि की कल्पना से बहुत ऊपर रहता है। यह तो एक स्वयंप्रकाश केवल तथा कल्याणस्वरूप तत्व है।
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।। आदिपराशक्ति भगवती पार्वती स्तुति ।।

पार्वती शंकरार्धांगी आदिशक्ति महेश्वरी।
सर्वलोकैकधीश्वरी सिंहवाहिनी नमोस्तुते।।

जगन्मात्रे महामाये पराशक्ति गणेश्वरी।
सर्वसिद्धिप्रदा देवी सदाशिवायै नमो नमः।।

नमस्ते शैलपुत्रीश्च नमस्ते वृषवाहिनी।
नमस्ते दुर्गतिशमनी नमस्ते दुर्गनाशिनी।।

सर्वशास्त्रमयीं देवीं अनेकास्त्रशस्त्र धारिणी।
मधुकैटभ हंत्रिश्च चण्डिकायै नमो नमः।।

गौरवर्णा महागौरी सर्वालंकार भूषितां।
अम्बिका सर्वसाक्षिण्यै शिवप्रियायै नमो नमः।।

नित्यायै निर्मलायै च कन्यकायै सुरेश्वरि।
त्रिपुरायै त्रिगुणायै च मोक्षदायै नमो नमः।।

कालिका कौशिकी आर्या भवानी भावमोचिनी।
शांभवी शंकरी बाला पराम्बिकायै नमो नमः।।

प्रतिदिन इस स्तुति के मात्र ७पाठ से आदिशक्ति माँ पार्वती की असीम कृपा प्राप्त होती है। जीवन मे व्याप्त संशय दूर होकर शाश्वत भक्ति की प्राप्ति होती है। बाकी इससे जो जीवन में मिलेगा यह बात हृदय से कभी जिव्हा पर लाने का सामर्थ्य नहीं होगा।
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