✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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8- भोजन से पूर्व छींक की ध्वनि सुनना अशुभ मानी जाती है।

9- यदि कोई व्यक्ति दिन के प्रथम प्रहर में पूर्व दिशा की ओर छींक की ध्वनि सुनता है तो उसे अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं। दूसरे प्रहर में सुनता है तो देह कष्ट, तीसरे प्रहर में सुनता है तो दूसरे के द्वारा स्वादिष्ट भोजन की प्राप्ति और चौथे प्रहर में सुनता है तो किसी मित्र से मिलना होता है।

10- धार्मिक अनुष्ठान या यज्ञादि प्रारंभ करते समय कोई छींकता है तो अनुष्ठान संपूर्ण नहीं होता है।

कौवे से जुड़े शकुन अपशकुन

1- यदि किसी व्यक्ति के ऊपर कौआ आकर बैठ जाए तो उसेधन व सम्मान की
हानि होती है। यदि किसी महिला के सिर पर कौआ बैठता है तो उसके पति को गंभीर संकट का सामना करना पड़ता है।

2- यदि बहुत से कौए किसी नगर या गांव में एकत्रित होकर शौर करें तो उस नगर या गांव पर भारी विपत्ति आती है।

3- किसी के भवन पर कौओं का झुण्ड आकर शौर मचाए तो भवन मालिक पर कई संकट एक साथ आ जाते हैं।

4- कौआ यदि यात्रा करने वाले व्यक्ति के सामने आकर सामान्य स्वर में कांव-कांव करें और चला जाए तो कार्य सिद्धि की सूचना देता है।

5- यदि कौआ पानी से भरे घड़े पर बैठा दिखाई दे तो धन-धान्य की वृद्धि करता है।

6- कौआ मुंह में रोटी, मांस आदि का टुकड़ा लाता दिखाई दे तो उसे अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है।

7- पेड़ पर बैठा कौआ यदि शांत स्वर में बोलता है तो स्त्री सुख मिलता है।

8- यदि उड़ता हुआ कौआ किसी के सिर पर बीट करे तो उसे रोग व संताप होता है। और यदि हड्डी का टुकड़ा गिरा दे तो उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।

9- यदि कौआ पंख फडफ़ड़ाता हुआ उग्र स्वर में बोलता है तो यह अशुभ संकेत है।

10- यदि कौआ ऊपर मुंह करके पंखों को फडफ़ड़ाता है और कर्कश स्वर में आवाज करता है तो वह मृत्यु की सूचना देता है।

छिपकली से जुड़े शकुन अपशकुन

घरों में आमतौर पर पाई जाने वाली छिपकली भी जीवन में होने वाली कई घटनाओं के बारे में संकेत करती है।
किसी भी कार्य के वक्त घटित होने वाले प्राकृतिक व अप्राकृतिक तथ्य अच्छे व बुरे फल की भविष्यवाणी करने में सक्षम होते है॥

1- अगर छिपकली समागम करती मिले तो किसी पुराने मित्र से मिलन होता है। लड़ती दिखे तो किसी दूसरे से झगड़ा होता है और अलग होती दिखे तो किसी प्रियजन से बिछुडऩे का दु:ख होता है।

2- भोजन करते समय छिपकली का बोलना शुभ फलकारक होता है।

3- नए घर में प्रवेश करते समय गृहस्वामी को छिपकली मरी हुई व मिट्टी लगी हुई दिखाई दे तो उसमें निवास करने वाले लोग रोगी रहेंगे।

4- छिपकली किसी व्यक्ति के सिर अथवा दाहिने हाथ पर गिरे तो सम्मान तो मिलता है किंतु बाएं हाथ पर गिरती है तो धन हानि होती है।

5- यदि छिपकली किसी व्यक्ति के दाई ओर से चढ़कर बाईं ओर उतरती है तो उसे पदोन्नति और धन लाभ मिलता है।

6- यदि छिपकली पेट पर गिरती है तो अनेक प्रकार के उत्पात और छाती पर गिरती है तो सुस्वादु भोजन मिलता है।

7- घुटने पर गिरकर सुख प्राप्ति की सूचना देती है छिपकली।

8- स्त्री की बाईं बांह पर छिपकली गिरे तो सौभाग्य में वृद्धि और दाहिनी बांह पर गिरे तो सौभाग्य की हानि होती है।

9- यदि किसी के दाहिने गाल पर छिपकली गिरे तो उसे भोग-विलास की प्राप्ति होती है। बाएं गाल पर गिरे तो स्वास्थ्य में विकार उत्पन्न होते हैं।

10- यदि छिपकली नाभि पर गिरे तो पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। गुप्त अंगों पर गिरे तो रोग की संभावना होती है।

वर्षा संबंधित शकुन अपशकुन

मेदिनीय ज्योतिष में भी शकुन अपना विशेष महत्व रखते हैं। वर्षा होगी या नहीं होगी, कम होगी या अधिक होगी इस प्रकार की भविष्य वाणियां भी शकुनों के आधार पर की जाती हैं कुछ उदाहरण निम्न हैं। यदि आसमान बादलों से घिरा हो व पालतू कुत्ता घर से बाहर न जाए, तो वर्षा का सूचक है। यदि आसमान में चील 400 फुट की ऊंचाई पर उड़ रही हो, तो भी वर्षा होने वाली होती है। यदि मकड़ी घर के बाहर जाला बनाए तो वर्षा ऋतु जाने का सूचक है। मेढकों की टर्रराहट वर्षा का संकेत है। मोर का नृत्य तथा शोर भी वर्षा का सूचक है।

कुत्ते के द्वारा शुभाशुभ शकुन विचारने का नियम

कुत्ता आज के जमाने में प्रत्येक घर में मिल जाता है,और सभी को पता है कि कुत्ता की अतीन्द्रिय जागृत होती है,किसी भी होनी अनहोनी को वह जानता है,अद्र्श्य आत्मा को देखने और किसी भी बदलाव को सूंघ कर जान लेने की क्षमता कुत्ते के अन्दर होती है,कुत्ते को दरवेश का दर्जा दिया गया है,समय असमय को बताने में कुत्ता अपनी भाषा में इन्सान को बताने की कोशिश करता है,और जो कुत्ते की भाषा को समझते है,वे अनहोनियों से बचे रहते है,और जो मूर्ख होते है,और अपने को जबरदस्ती हानि की तरफ़ ले जाना चाहते है वे उसकी भाषा को बकवास कह कर टाल देते है,कुत्ता अगर यात्रा के शुरु करते ही किसी कचडे पर पेशाब करता है,तो जान लीजिये कि यात्रा या शुरु किया जाने वाला कार्य सफ़ल है,यदि किसी सूखी लकडी पर पेशाब
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करता है,तो भौतिक धन की प्राप्ति होती है,अगर कुत्ता कांटेदार झाड पर,पत्थर या राख पर पेशाब करने के बाद काम शुरु करने वाले के आगे चल दे तो वह कार्य खराब हो जाता है,यदि कुत्ता किसी कपडे को लाकर सामने खडा हो तो समझना चाहिये कि कार्य सफ़ल है,यदि कुत्ता कार्य शुरु करने वाले के पैर चाटे,कान फ़डफ़डाये,अथवा काटने को दौडे तो समझना चाहिये कि सामने काफ़ी बाधायें आ रही है,यदि कुत्ता यात्रा के समय या काम शुरु करने के समय अपने शरीर को खुजलाना चालू कर दे तो जान लेना चाहिये के वह कार्य करने अथवा यात्रा पर जाने से मना कर रहा है।

यदि कुत्ता किसी कार्य को शुरु करते वक्त या यात्रा पर जाते वक्त चारों पैर ऊपर की तरफ़ करके सोये तो भी कार्य या यात्रा नही करनी चाहिये,यदि गली मोहल्ले के आवारा कुत्ते किसी भी समय ऊपर की तरफ़ मुंह करके रोना चालू करें तो समझना चाहिये कि उस गली या मोहल्ले के प्रमुख व्यक्ति पर कोई मुशीबत आने वाली है,यात्रा करने के साथ या काम करने के साथ कुत्ते आपस में लड पडें तो भी काम या यात्रा में विघ्न पैदा होता है,कुत्ते के कान फ़डफ़डाने का समय सभी कामों के लिये त्यागने में ही भलाई होती है,कुत्ता अगर बैचैन होकर इधर उधर भागना चालू करे,तो समझना चाहिये कि कोई आकस्मिक मुसीबत आ रही है, किसी बात को सोचने के पहले या धन खर्च करते वक्त अगर कुत्ता अपनी पूंछ को पकडने की कोशिश करता है,तो मान लेना चाहिये कि आपने अपने भविष्य के लिये नही सोचा है और खर्च करने के बाद पछताना पडेगा, कुत्ता अगर सुबह के समय लान या बगीचे में घास खा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि घर के अन्दर जो खाना बना है उसमे किसी प्रकार इन्फ़ेक्सन है, कुत्ता अगर जूता लेकर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि वह बाहर जाने से रोक रहा है, लडकी के अपने ससुराल जाने के वक्त अगर कुत्ता रोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि लडकी को ससुराल से वापस आने में संदेह है।

कुत्ता अगर मालिक के पैर के पास जाकर सोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि घर में किसी सदस्य के आने का संकेत है, कुत्ता अगर अपने खुद के पैर चाटना चालू करे तो यात्राओं की शुरुआत समझनी चाहिये, कुत्ता अगर एकान्त में बैठना चालू कर दे और बुलाने से आने में आनाकानी करे तो समझना चाहिये कि घर मे किसी सदस्य के लम्बी बीमारी में जाने का संकेत है, कुत्ता अगर पूंछ नीचे डालकर मुख्य दरवाजे के पास कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा हो तो समझना चाहिये कि कोई कर्जा मांगने वाला आ रहा है,कुत्ता अगर भोजन करते वक्त बार बार बाहर और अन्दर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि भोजन और कोई करने आने वाला है।

कुछ अन्य ”शुुभ शकुुन” की विस्तृत व्याख्या

”ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर। दूध, फल, फूल व वेद ध्वनि का सोर॥ अन्न, सिंहासन, जल, कलश, पशु एक बधन्त। न्योला चापा, मछली और अग्नि प्रज्वलंत॥ छाता, वैश्या, पगड़ी, अंजन, ऐना, शस्त्र। कन्या, रत्न, स्त्री, धोबी धोया वस्त्र॥ घृत मिट्टी अस्त्र शहद, मदिरा वस्त्र श्वेत। गोरोचन सरसों अमिष, गन्ना खज्जन भेद॥ बिन रोदन मुर्दा मिले, पालकी भरदुल गीत। ध्वज अकुंश बकरा पडे़, सम्मुख अपना गीत॥ बालक संग स्त्री मिले, नौ बेटा बैल सफेद। साधु सुधा सुरतर-पड़े, सम्मुख चारों वेद ॥ कूड़ा से भरी टोकरी जो सम्मुख पडंत। पाछे घट खाली पड़े, निश्चय काज बनंत। । प्रिय वाणी कानों पड़े, सम्मुख वाहन भार। कह कवि ये शुभ शकुन यात्रा चलती बार॥

अर्थात् ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर, दूध, दही, फल, फूल, कमल, वेदध्वनि, अन्न, सिंहासन, जल से भरा कलश, बंधा हुआ एक पशु, न्योला, चापा (चाहा पक्ष) मछली, प्रज्वलित अग्नि, छाता, वैश्या, पनाली, अंजन, ऐना, शस्त्र, रत्न, स्त्री, कन्या, धुले हुए वस्त्र सहित धोबी, घी, मिट्टी, सरसों, मांस, गन्ना, खज्जन पक्ष, रोदन रहित मुर्दा, पालकी, भारद्वाज पक्षी, ध्वजा, अंकुश, बकरा, अपना प्रिय मित्र, बच्चे के सहित स्त्री, गाय या गोह के सहित बछड़ा, सफेद बैल, साधु, अमृत, कल्पवृक्ष चारों वेद, शहद, शराब, गोरोचन आदि में से कुछ भी सम्मुख पड़े या कूड़े से भरी टोकरी, प्रिय वाणी या सामान से लदा वाहन यदि यात्रा के वक्त सम्मुख पड़ जाए तो निश्चय ही इच्छा पूर्ति का संकेत करते हैं। खाली घड़ा पीठ पीछे हो तो अच्छा हे ।
ये शुभ शकुन हैं।

”नीलकण्ठ छिक्कर-पिक्कर वानर कौवी भालु। जै कुकर दाएं पड़े तो सिद्ध होय सब काजु॥ अर्थात् नीलकण्ठ छिक्कर नामक विशेष मृग, पिक्कर पक्षी, कौवी (स्त्री संज्ञक) भालू व कुत्ता यदि दाएं हाथ पर पड़े तो कार्य सिद्ध होता है। मृग बाएं ते दाहिने जो आवे तत्काल। बाएं गर्दभ रेकंजा सिद्धि होय सब काज॥ अर्थात् यदि हिरण बायीं तरफ से रास्ता काटकर दायीं तरफ आ जाए या बायीं तरफ गधा बोलना प्रारंभ कर दे तो शुभ शकुन है।
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शुभ और अशुभ शुकुन
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खड़ा कोबरा, सूकरा, जाहक, कछुआ, गोह। ये शब्द कानों पड़े निश्चय कारज होय॥ पर दर्शन हो जाएं तो महाअशुभ होय। अतिहि कु शकुन जानिये काट सके ना कोय॥ अर्थात् यदि खरगोश, सर्प, सूअर, जाहक, पशु, कछुआ व गोह के शब्द कानों में पड़े तो अत्यंत शुभ शकुन समझें। परंतु यदि ये प्रत्यक्ष सामने पड़ जाएं तो महा अशुभ हैं। बानर, भालु दर्शन भले, नाम के सुनते हानि। कह कवि विचार के तब आगे करौ पदान॥

अर्थात् यदि वानर भालू यात्रा आरंभ वक्त आगे जाए तो उत्तम शकुन है परंतु यदि इनका नाम कानों में पड़े तो अपशकुन का द्योतक है।

अपशकुन विचार
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” दांए गर्दभ शब्द हो, सम्मुख काला धान्य। टूटी खाट आगे मिले तो बहुत हानि॥ कूकूर लोटे भुम्म पर, अथवा मारे कान। पांच भैंस सम्मुख पड़ें, निश्चय होवे धन॥ एक अजाः नौ स्त्री, बिल्ली दो लड़न्त। छह कुत्ता आगे पड़ें, नहीं बात में तंत॥ तीन गाय दो बानिया, एक बछड़ा एक शूद्र। हाथी सात सम्मुख पडं़े, निश्चय बिगड़े बुद्धि॥ भैंसा पर बैठा हुआ, मनुष्य सम्मुख होय। निश्चय हानि होयेगी, बचा सके ना कोय ॥ जननी का तिरस्कार होय या हो अकाल वृष्टि। क्षत्री चार सम्मुख पडे, निश्चय महाअनिष्ट ॥ तीन विप्र बैरागिया, सन्यासी केश खुलंत। भगवा व स्त्री सम्मुख पड़े, निश्चय कारण अंत॥ बंध्या, रजः, रजस्वला, भूसा हड्डी चामं। अंधा, बहरा, कूबड़ा विधवा लगड़ा पांव ॥ ईंधन लक्कड़ उन्मादिया, भैंसा दो लड़ंत। गुंड, मट्ठा, कीचड़ पड़े सम्मुख छींक हुवंत ॥ हिजड़ा विष्ठा तेल जो, मालिश तेल मनुष्य। अंग भंग नंगा पतित रोगी पूरा सुस्त॥ गंजा भिजे वस्त्र सों, चर्बी शत्रु सांप। नमक औषधि गिरगिरा कुटंबी झगड़े आप ॥ कटु बचन सम्मुख पड़े, जौ यात्रा चलती बार। कह कवि हानि महा बिगड़े सारे काज॥

अर्थात्
यदि यात्रा के समय गधा दायीं तरफ बोले या कोई सामने से टूटी खाट लाता हुआ मिले कारज भंग होता है। यदि कुत्ता भूमि पर लेटे या कान फड़फड़ाये, पांच भैंस सामने आये, एक बकरी नौ स्त्री, दो बिल्ली लड़ती हुई, छः कुत्ते, तीन गाय, दो वैश्य, एक बैल एक शूद्र, सात हाथी, या भैंसे पर बैठा हुआ व्यक्ति यदि सम्मुख पड़े तो अपशकुन का सूचक है।
यात्रा में चलते समय जननी का तिरस्कार करे या अकाल वर्षा हो, चार क्षत्रिय, तीन ब्राह्मण बैरागी, सन्यासी, खुले केशों वाला गेरूरा वस्त्र धारण करने वाला सम्मुख पड़ जाए तो अपशकुन है। इसी प्रकार बांझ औरत, स्त्री का रज, रजोवती स्त्री, भूसा, हड्डी, चमड़ा, अंधा, बहरा, कूबड़ा, विधवा स्त्री, जलाने वाली लकड़ी, उपला, पागल, गुड़, मट्ठा कीचड़ सामने आये, दो भैंसे लड़ते हुए, नपुसंक, विष्ठा, तेल मालिश किये आदमी, अंग भंग, नंगा नीच पुरुष, दीर्घ रोगी, गंजा भीगे वस्त्रों में, चर्बी, सर्प, शत्रु, नमक, औषधि, गिरगिट सामने आ जाए, अपने ही कुटुंबी सामने लड़ते हों, सामने कोई छींक दे या यात्रा के वक्त अप्रिय बचन सुनाई पड़ें तो अपशकुन कुुछ अन्य शकुुन अपशकुुन जो पशु पक्षियों द्वारा होते हैैं शकुनों में कौवा, छिपकली व अन्य पशु पक्षियों का विचार किया जाता है। काक स्पर्श व छिपकली के गिरने को अशुभ समझा गया है। यदि कौआ अचानक शोरगुल करे या किसी के सिर पर बैठे तो आर्थिक हानि दर्शाता है। यदि स्त्री के सिर पर बैठे तो पति को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। संध्या के समय मुर्गों की ध्वनियां महामारी दर्शाती हैं। जब मछलियां जल की सतह पर छलांग मारें, मेढक टर्र-टर्र करे, बिल्ली भूमि खोदे, चीटियां अपने अंडों को स्थानांतरित करें, सांपों का जोड़ा व पशु आकाश की ओर देखे, पालतू पशु बाहर जाने से घबराएं तो तुरंत ही वर्षा होती है यदि रात्रि में दीपकीट दिखाई दे, कीड़े या सरीसृप घास के ऊपर बैठें तो भी तत्काल वर्षा होती है। यदि वर्षा ऋतु के दौरान सायंकाल में गीदड़ों की चिल्लाहट सुनाई दे तो बिल्कुल वर्षा नहीं होती। मांसभक्षी पशु-पक्षी, का दिखाई देना अशुभ व शाकाहारी पशु, पक्षी प्रायः शुभ शकुन का संकेत देते हैं। ज्योतिष में शकुनों अपशकुनों का विशेष विचार प्रश्न आदि में किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि किसी काम की सफलता के लिए मन में उत्साह, आशा, धैर्य और पूर्ण आत्मविश्वास होना ही चाहिए। इसमें कमी आने से अपेक्षित एकाग्रता, श्रमशीलता एवं तत्परता घट जाएगी परिणामस्वरूप सफलता की संभावना में भी कमी आएगी। शुभ-अशुभ शकुनों में विश्वास करने से हाने जीवन मे हिने वाली घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है वही मन मे वहम होना एक नुकसान भी है मन अकारण ही आशंकित और आतंकित हो जाता है, जिससे असफलता के बीज पनपने लगते हैं और भली प्रकार प्रयास न कर पाने के कारण सफलता नहीं मिलती। स्मरणीय है कि अपशकुन हमें तभी याद आते हैं, जब हमको किसी कार्य में असफलता मिलती है। यदि पहले ही उस विषय मे विचार किया जाए तो शायद कार्य असफलता हो ही ना सफलता या असफलता का मिलना हमारी योग्यता या अयोग्यता का भी परिचायक है। हिन्दुओं में आज तक पुरुष के
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दाहिने और स्त्रियों के बाएं अंग फड़कने को शकुन मानते हैं और पुरुष के बाएं और स्त्रियों के दाएं अंग फड़कने को अपशकुन समझते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह नाड़ियों में रक्तप्रवाह के कारण ही अंगों में फड़कन महसूस होती है, जिसका किसी शकुन अपशकुन के साथ कोई संबंध नहीं होता। छींक आना शरीर-विज्ञान के मतानुसार एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो श्वास नली में अवरोध आने पर उत्पन्न होती है, जिसके परिणामस्वरूप आया अवरोध एकाएक दूर हो जाता है। इसके अलावा हानिकारक वायुमंडल के कण जब नाक के अंदर और श्वास नली में जमा होकर अवरोध पैदा करते हैं तो छींक रूपी प्राकृतिक उपाय से शरीर की रक्षा ही होती है। यदि यह हानिकारक गंदगी छींक के माध्यम से बाहर न हो तो मानसिक तनाव, चक्कर आना जैसे बुरे प्रभाव शरीर पर पड़ते हैं। इसलिए छींक आना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभप्रद ही है। इसी प्रकार आंख का फड़कना शुभ या अशुभ माना जाता है, जो शरीर विज्ञान के अनुसार रक्त की अनियमितता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है । रक्त प्रवाह में रुकावट और उसका दूर होना ही फड़कन का अनुभव देता है। इसलिए विज्ञान को मानने वाले जहां तक हो सके, इन अपशकुनों के चक्कर में पड़ने से बचने और कर्म में विश्वास करने की सलाह देते है जबकि कुछ ज्योतिष एवं शकुन शास्त्र के ग्रंथो और हमारी पौराणिक धार्मिक मान्यताओं अनुसार व्यक्ति के जीवन मे हर छोटी से बड़ी घटना भविष्य में होने वाली किसी न किसी अन्य घटना से जुड़ी है वैज्ञानिक मान्यता से चलने वाले लोग इन्हें भले ही पाखंड या अंध विश्वास कहे लेकिन हमारी निजी सोच एव अनुभव के आधार पर ये सभी शकुन अपशकुन किसी विशेष परिस्थिति में ही क्यो घटित होते है हर समय क्यो नही ये सबसे बड़ा विचारणीय विषय है।।
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मनुष्य जीवन में अंतिम क्षणों तक जीवन परिवर्तन की संभावना के द्वार सदा खुले रहते हैं। वह चाहे तो सदैव अपने जीवन को उत्कृष्ट से उत्कृष्ट बनाने में अथवा निकृष्ट से निकृष्ट बना पाने में समर्थ होता है। मनुष्य जीवन के अलावा अन्य सभी प्राणी प्रकृति के ही अधीन होते हैं। उनमें जन्म के बाद अपने जीवन परिवर्तन की कोई संभावना बाकी नहीं रह जाती है।

मनुष्य अपने संग से, अपने संस्कारों से एवं अपने परिवेश से जीवन को परिवर्तित करने में सक्षम होता है। यदि कुसंग से अपना पतन भी करा सकता है तो सुसंग से जीवन उन्नति एवं कल्याण के मार्ग पर भी बढ़ सकता है। उस प्रभु ने कृपा करके हमको मानव देह प्रदान किया है तो फिर श्रेष्ठ पथ का अनुगमन करते हुए, श्रेष्ठ का ही चिंतन करते हुए अपने जीवन को श्रेष्ठ बताने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना ही जीवन की परम सार्थकता है।
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मकर संक्रांति

मकर संक्रांति 2026 को लेकर इस बार कन्फ्यूजन की स्थिति बनी है क्योंकि यह पर्व एकादशी तिथि के साथ पड़ रहा है. वैदिक पंचांग के अनुसार षटतिला एकादशी 13 जनवरी दोपहर से शुरू होकर 14 जनवरी शाम तक रहेगी, जबकि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी दोपहर बाद होगा.

कब से शुरू हो रही है एकादशी तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, षटतिला एकादशी तिथि की शुरुआत 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03 बजकर 17 मिनट से हो रही है. इसकी समाप्ति 14 जनवरी 2026 को शाम 05 बजकर 52 मिनट पर होगी. सनातन परंपरा में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा.
अब इसी तरह मकर संक्रांति की तिथि पर ध्यान दें तो 14 जनवरी को मकर राशि में सूर्य का गोचर दोपहर के बाद हो रहा है. पंचांग के मुताबिक, 14 जनवरी 2026 को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे. सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना ही मकर संक्रांति कहलाता है. सूर्य 14 जनवरी को मकर संक्रांति में प्रवेश कर लेंगे लेकिन जिस समय यह घटना होगी, उसमें दिन का अधिकतम समय निकल चुका होगा.

उदया तिथि में मनाएं मकर संक्रांति
मकर संक्रांति के पर्व में उदया तिथि की मान्यता रखनी चाहिए. यह इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि यह त्योहार ही सूर्य से जुड़ा हुआ है. उदया तिथि सूर्योदय के साथ लगने वाली तिथि को मान्यता देती है. इसलिए मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनानी चाहिए. इससे मकर संक्रांति में एकादशी तिथि की छाया भी नहीं रहेगी और स्नान, दान के साथ खिचड़ी खाने की परंपरा का पालन भी हो जाएगा.
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*चित् शक्ति का क्षोम किस प्रकार से होता है

> *चित् शक्ति का क्षोम है चेतना का जड़ में संचार, हमारी बुद्धि करती है जो महत्तत्त्व से अहंकार, मन-इंद्रियां और महाभूतों की श्रृंखला बनाता है। यह सृष्टि का मूल कारण है*!

जड़ (प्रकृति) का चेतना (पुरुष) में संचार नहीं हो सकता,क्योंकि यह ईश्वरीय बुद्धि है। चित् शक्ति के क्षोभ से जड़ प्रकृति में चेतना का प्रतिबिंब मात्र आता है, वास्तविक संचार नहीं।जो चेतना की परछाईं है। यह संचार नहीं, अपितु जड़ में चेतना का आभासिक संचार है—बुद्धि पुरुष की निकटता से चैतन्यप्राया हो जाती है।

चित् शक्ति का क्षोम मुख्य रूप से जीवों के अदृष्ट, नीच कर्मों के कारण उत्पन्न होता है, जो सांख्य दर्शन में प्रकृति की शांत अवस्था में हलचल पैदा करता है।
यह क्षोभ चित् शक्ति को माया रूप में प्रकृति में स्थापित कर सृष्टि प्रक्रिया आरंभ करता है।सांख्य दर्शन के अनुसार, परमपुरुष जीवों के कर्मफल या भाग्य से प्रभावित होकर अपनी चित् शक्ति को जड़ प्रकृति में वीर्य के रूप में प्रवेश कराते हैं, जिससे त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) का साम्य भंग होता है। इससे महत्तत्त्व का प्रादुर्भाव होता है, जो आगे अहंकार और मन आदि उत्पन्न करता है।योग दर्शन में चित्त की विक्षिप्त अवस्थाएं जैसे व्याधि, स्त्यान, संशय भी क्षोम के लक्षण हैं, जो चित्त शक्ति को कमजोर बनाते हैं।
क्षोम की प्रक्रिया:---
प्रकृति की संतुलित अवस्था में चित् शक्ति का स्पंदन अदृष्ट कर्मों से प्रेरित होकर महत्तत्त्व में विकार लाता है, जिससे वैकारिक, तैजस और तामस अहंकार बनते हैं।
चित्तवृत्तियां (प्रमाण, विपर्यय आदि) क्लिष्ट रूप में सक्रिय हो जाती हैं, जो पुरुष को प्रकृति से बंधन में डालती हैं। पतंजलि के अनुसार, क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त चित्तभूमियां इसी क्षोम से उपजती हैं।
क्षोम से बचाव:--
योगसूत्र में अभ्यास, वैराग्य, ईश्वर प्रणिधान और प्राणायाम से चित्तवृत्तियों का निरोध कर क्षोम रोका जा सकता है। सत्चिन्तन से चित्त शुद्ध होता है, जो क्षोभ को एकाग्र अवस्था में परिवर्तित करता है। सांख्य में विवेक ज्ञान से पुरुष-प्रकृति भेद समझकर क्षोम का अंत होता है।
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जो मनुष्य ऊषाकाल में शयन से उठकर परमात्मा का ध्यान करते हैं, ईश्वर उन्हे बुद्धिमान और धार्मिक बनाता है। जो स्त्री-पुरूष परमात्मा की साक्षी में मधुर संबंध बनाए रखते हैं उन्हे भगवान सदैव सुखी रखते हैं।

समस्त प्राकृतिक तत्वों में वायु बहुत सूक्ष्म है। पृथ्वी, जल, अग्नि की अपेक्षा वायु की सूक्ष्मता बहुत अधिक है। इसी से इसका गुण और प्रभाव भी अधिक है। अन्न और जल के बिना तो कुछ समय मनुष्य जीवित रह सकता है पर वायु के बिना एक क्षण भी काम नहीं चल सकता। शरीर के अन्य तत्वों के विकार इतने हानिकारक नहीं होते जितने वायु के विकार। गंदी, अशुद्ध, सीलन भरी, दुर्गंधयुक्त वायु के विषैले वातावरण में सांस लेना भी कठिन होता है और दम घुटने लगता है। दिन भर तो कार्य-व्यापार के संबंध में हमें न जाने कहां कहां जाना पडता है और शुद्ध वायु का सेवन भी कठिनता से ही हो पाता है। ऐसे में सर्वसुलभ प्रातःकालीन प्राणवायु की अवहेलना करके मुंह ढांके सोते रहना परले दरजे की मूर्खता ही है।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहुर्त में उठकर नित्यकर्म से निवृत होकर प्राणवायु का सेवन करने के साथ व्यायाम और ईश-चिंतन भी करना चाहिए। यह सारा संसार, यह अदभुत प्रकृति, फल-फूल, अन्न, जल सब उस परमपिता परमेश्वर ने हमारे उपयोग के लिए ही उत्पन्न किए हैं। उस प्रभु का ध्यान करके उसके प्रति आभार प्रकट करना और उसके दिव्य निर्देशों को पालन करने का संकल्प लेना ही ईश-चिंतन है। किसी मंदिर में जाकर फल-फूल, जल, दूध आदि मूर्ति पर चढा देना, धूप-दीप दिखा देना और घंटा बजाकर माथा टेकना या नाक रगडना ईश्वर भक्ति नहीं है। यह तो मात्र कौतुक पूर्ण दिखावा भर है। जीवन का सदुपयोग इसी में है कि ईश्वरीय आदेशों का उचित रीति से पालन हो। आसुरी प्रवृत्तियां हमारे दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप न करने पावें। हमारे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक सभी कार्य दैवी गुणों से प्रेरित हों। स्वार्थ, लोभ, मोह, क्रोध आदि राक्षस हमें न सताएं। यही वास्तविक ईश चिंतन है।

जीवन का सदुपयोग हमारी सबसे महत्वपूर्ण समस्या है। दूरदर्शिता और बुद्धिमता का तकाजा है कि उसे सुलझाया जाए। इसके लिए प्रातःकाल का समय सर्वश्रेष्ठ होता है। कुछ समय तक प्रभु चिंतन करने से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दिव्य संदेश प्राप्त होता है। जो भी दोष दुर्गुण हैं वे दूर होते हैं तथा सदगुणों की वृद्धि होती है। मन से पाप भावना और दुष्ट विचार दूर होती है। प्रातः बेला में प्रकृति के संसर्ग से ईश्वर की सर्वव्यापक सत्ता से सीधा संबंध जुडता है और मन में पवित्र, मधुर और सुंदर विचार तरंगे उठती हैं।

इस प्रकार के धार्मिक आचरण से प्रभु कृपा का वरदान मिलता है और मनुष्य सारे दिन प्रफुल्लता व उल्लास के साथ अपने दैनिक कार्यों को करते हुए सुख, शांति, यश व कीर्ति प्राप्त करता है।
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कहानी की समय

चिठ्ठी


शेखर चार बहनों का इकलौता और सबसे छोटा भाई था...
चारों बहनों की शादी हो चुकी थी...
बीमारी के वजह से माता-पिता का निधन हो चुका था। चारों बहनों ने अपनी इकलौते भाई के लिए एक से बढ़कर एक लड़कियां ढूंढी...
लेकिन शेखर हर बार कोई ना कोई बहाना बना देता और शादी के लिए मना कर देता...
बहनें परेशान हो चुकी थीं। इस बार राखी पर अपने भाई से साफ-साफ बात कर लेने की ठान कर चारों मायके आई... यही एक ऐसा त्योहार होता था जब चारों बहने मायके आती थी....

राखी बांधने का काम पूरा होने बाद चारों बहनें शेखर को घेरकर बैठ गई और एक-एक कर सवाल पर सवाल करने लगी कि वो क्यों किसी लड़की को पसंद नहीं कर रहा। परेशान होकर शेखर ने बता ही दिया कि वो अपने ऑफिस की एक लड़की पायल से प्यार करता है और उसी से शादी करना चाहता है....
पायल एक अलग जाति से थी बहनों ने ऐतराज जताया कि उनके घर में ये सब नहीं चलता....

दूसरी बहन बोली कि "हम अपने ससुराल में क्या जवाब देंगे....

तीसरी बोली "अगर तुमने ऐसा किया तो हम समझेंगे हमारा मायका अब नहीं रहा...
उसे लगा ऐसा कहने पर शेखर शायद अपना विचार बदल ले।

शेखर जो बचपन से ही ज़िद्दी था उसने अपना फैसला सुना दिया मैं शादी करूंगा तो बस पायल से....
चारों बहनें शेखर की ज़िद जानती थी, चारों नाराज़ होकर अपने अपने ससुराल वापस चली गई

शेखर ने सबको मनाने की बहुत कोशिश की पर कोई नहीं माना, आखिर उसने पायल से कोर्ट मैरिज कर ली...
ऐसे मे बहनों ने उससे बोलना तक बंद कर दिया..
शेखर को हर साल राखी पर अपनी बहनों की याद आती थी, पायल भी उस दर्द को समझ सकती थी... शेखर दोस्तों से अपनी बहनों की खबर लेता रहता था।

पायल कहती की "अब तो बहुत समय बीत चुका है आप ही फोन लगा कर बात कर लो...
छोटे हो आप....

शेखर -"मैं तो बात कर लूंगा, मुझे किसी ने कुछ कहा तो फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन तुम्हें किसी ने कुछ कहा तो वो मैं सहन नहीं कर पाऊंगा....
ये ना हो कि रिश्ते और बिगड़ जाए...
दिन बीते, साल बीते, एक दिन खबर आयी‌ की शेखर की तीसरी बहन के पति का रोड एक्सीडेंट में निधन हो गया। शेखर के पैरों तले जमीन खिसक गई..
पायल ने शेखर के तुरंत निकलने की तैयारी कर दी। शेखर निकलते निकलते रुक गया


शेखर -मैं वहाँ कैसे....

पायल -अभी आपकी सबस ज्यादा ज़रुरत आपकी बहन को है, कोई कुछ बोल भी दे तो सुन लीजियेगा और सुनिये मैने आपके बैग में एक चिट्ठी रखी है वापस आने से पहले किसी एक बहन को दे दिजियेगा...
" शेखर चिट्ठी के बारे में पूछने की मनस्थिति में नहीं था "ठीक है.... बोल कर निकल गया

शेखर बहन के ससुराल पहुंचा, भाई को देखते ही बहन उसके गले लगकर खूब रोई....
बहन का रोना भाई की आत्मा को चीर गया हो जैसे.... सारी अंतिम क्रिया पूरी हो गई, शेखर निकलने की तैयारी करने लगा।

बड़ी बहन शेखर का सामान बैग में रखने लगी की उसके हाथ पायल की‌ रखी चिठ्ठी आयी....
ऊपर ही लिखा था दीदी एक बार जरूर पढियेगा...
बहन ने हिचकिचाहट में चिठ्ठी खोली....
जिसमें लिखा था....

प्रणाम,

मैं आप सबसे पहले तो माफी चाहती हूँ कि इस दुख की घड़ी में मैं वहां आप लोगों के साथ नहीं हूँ पर मैं और आपके भाई हमेशा आप‌ लोगों के साथ हैं....
ये आपका मायका पहले है मेरा ससुराल बाद मे... आपका पूरा हक है अपने भाई पर और आपके मायके पर....
मैं आप लोगों के बीच ना कभी आयी थी ना कभी आऊंगी...
मुझसे कोई गलती हुई हो‌ तो‌ माफ करें लेकिन अपने भाई को अनाथ ना करें....

विनम्रता पूर्वक
पायल

उस समय तो इस चिठ्ठी का जिक्र बड़ी बहन ने किसी से नहीं किया....
समय बीता, अगले साल की राखी आ गई...
सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी, पायल ने शेखर से दरवाजा खोलने को कहा....
शेखर ने दरवाजा खोला तो सामने चारों बहनों को देखकर खुशी से चिल्लाने लगा "पायल देखो कौन आया है....

पायल हाथ में पानी का गिलास ले कर बाहर आई, वो जानती थी कि आज राखी पर शेखर की बहनें आने वाली है ये बात पायल को उन लोगों ने ही फोन कर के बतायी थी....
चारों बहनों ने कई साल बाद मायके में पैर रखा और सबसे पहले पायल को गले लगा कर धन्यवाद दिया कहा तुम्हारी चिठ्ठी ने हिम्मत दी की हम हमारे मायके आ सके... तुमने आज हमारा मायका हमें वापस दे दिया, हमेशा खुश रहो....

शेखर के हाथ में इतने सालों बाद उसकी बहनों ने राखी बांधी, उसकी खुशी उसके आँखों में नज़र आ रही थी जिसे देखकर पायल भी खुश थी.
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*"आनंद" की सत्ता से अधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु जब दूसरी नहीं है, तब संसार का क्षणिक सुख-दुःख पश्चिम में डूबते हुए सूर्य की भाँति मन के दूर देश में कहीं अस्त हो जाता है। यह जीवन में तटस्थता की दशा है, जहाँ संसार के वैभव आकाश में स्थित प्रातःकालीन नक्षत्रों की भाँति फीके होकर "आनंद" के परम प्रकाश में विलीन हो जाते हैं।* *"आनंद" की प्राप्ति के पश्चात संसार की बातों का चित्त पर असर ही नहीं होता।* फिर कोई भी पदार्थ अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते। सारे प्रपंच मिट जाते हैं।
*जब यही एक वस्तु जीवन में प्राप्त करने के योग्य है, बल्कि यही जीवन है, तब मनुष्य यहाँ के सुख-दुःख के पचड़े में पड़कर व्यर्थ अपना समय क्यों नष्ट करता है?* मार्ग में यदि कोई प्रतिरोध आ जाए तो उस पर विचार करना चाहिए और उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। *"आनंद" को संपूर्ण रूप में प्राप्त कर लेने की प्रत्येक मनुष्य के अंदर अभिलाषा होनी चाहिए।* इस पथ पर चलते हुए भी ऐसा नहीं है कि दुःख न पावे। *"दुःख" के आने पर उसे टालने की व्याकुलता न हो।* ऐसा करने से लगन के होते हुए भी लक्ष्य तक पहुँचने में विलंब होगा।
*"आनंद" की अनुभूति कोई किसी को करा दे, यह संभव नहीं है।* अपने ही प्रयास से जीवन की यह स्थिति प्राप्त की जाती है। यह कोरी कल्पना नहीं है। *बोधपूर्वक प्रयास करने पर इसमें सफलता मिलती है, यह ध्रुव "सत्य" है।* प्रत्येक मनुष्य अपने पुरुषार्थ और प्रयास के द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है। लोगों के जीवन में विभिन्नता अवश्य दृष्टिगोचर होती है, लेकिन यह कोई रुकावट नहीं है। *"सत्य" वस्तु में "कल्पना" के लिए कोई स्थान नहीं है।*
*चूंकि बहुतों के मन में "सत्य" को जान लेने की इच्छा और लगन है और किसी सरल मार्ग की खोज है, इसलिए उनको इस पथ पर चलने के लिए प्रस्तुत हो जाना चाहिए। एक बार सजग होकर पैर आगे बढ़ा देने पर फिर निराश नहीं होना पड़ता और मनुष्य पीछे कदम हटाना पसंद नहीं करता।* समझ-बूझकर जब हम इस पथ पर पैर रखेंगे, तब हमारे अंदर सुख-दुःख के रहस्य को समझने की क्षमता आ जाएगी। *"सुख" का प्रसंग आने पर हमें फूलना नहीं चाहिए और "दुःख" के प्रसंगों से घबराना नहीं चाहिए।* बल्कि उनके बीच में रहते हुए उनके रहस्य को समझकर उनसे मुक्त हो जाना चाहिए।
*"आनंद" ही एकमात्र "सत्य" है।* यही एक स्वाभाविक मंदिर है, जहाँ सबको आना है। *यहाँ बैठकर आप सच्चे ध्यान में निमग्न हो सकते हैं।* इसको एक बार दृढ़तापूर्वक अपना लेने से सारा संदेह दूर हो जाता है। *ऐसी स्थिति में मनुष्य संसार का हो जाता है और संसार उसका हो जाता है।* 'अहं' की पृथक भावना मिटकर विराट में लीन हो जाती है। राग-द्वेष की अग्नि सदा के लिए बुझ जाती है।
*इस आत्यंतिक "आनंद" के प्राप्त कर लेने पर मनुष्य स्वतंत्रतपूर्वक संसार में विचरण करता है।* जो मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र हैं और *"आनंद"* में स्थित हैं, वे संसार के सामने कुछ सही बात रख सकते हैं। *"आनंद" में प्रतिष्ठित हो जाने पर पुरुष प्राणीमात्र का "मित्र" हो जाता है और "प्रेम" ही उसका मुख्य आचरण रहता है, "प्रेम" के अतिरिक्त उसके पास और कोई वस्तु नहीं रहती।* इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर एक को अनेक में देखने की क्षमता स्वाभाविक ही रहती है। *यही "मोक्ष" की स्थिति है।
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शिव खोड़ी की गुफाएं

शिव खोड़ी शिवालिक पर्वत शृंखला में एक प्राकृतिक गुफा है, जिसमें प्रकृति-निर्मित शिव-लिंग विद्यमान है।

शिव खोड़ी तीर्थ स्थल पर महाशिवरात्रि के दिन बहुत बड़ा मेला आयोजित होता है जिसमें हजारों की संख्या में लोग दूर-दूर से यहां आकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और आयोजित इस मेले में शामिल होते हैं। शिव खोड़ी की यात्रा बारह महीने चलती है। अति प्राचीन मंदिरों के कई अवशेष अब भी इस क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं। शिव खोड़ी शिवभक्तों के लिए एक महान तीर्थ स्थल है।

शिव खोड़ी शिव तीर्थ का कोई प्रामाणिक इतिहास आज तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। लोक श्रुतियों में कहा गया है कि स्यालकोट (वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है) के राजा सालवाहन ने शिव खोड़ी में शिवलिंग के दर्शन किए थे और इस क्षेत्र में कई मंदिर भी निर्माण करवाए थे, जो बाद में सालवाहन मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

इस गुफा में दो कक्ष हैं। बाहरी कक्ष कुछ बड़ा है, लेकिन भीतरी कक्ष छोटा है। बाहर वाले कक्ष से भीतरी कक्ष में जाने का रास्ता कुछ तंग और कम ऊंचाई वाला है जहां से झुक कर गुजरना पड़ता है।

आगे चलकर यह रास्ता दो हिस्सों में बंट जाता है, जिसमें से एक के विषय में ऐसा विश्वास है कि यह कश्मीर जाता है। यह रास्ता अब बंद कर दिया गया है। दूसरा मार्ग गुफा की ओर जाता है, जहां स्वयंभू शिव की मूर्ति है। गुफा की छत पर सर्पाकृति चित्रकला है, जहां से दूध युक्त जल शिवलिंग पर टपकता रहता है।

इस गुफा में दो कक्ष हैं। बाहरी कक्ष कुछ बड़ा है, लेकिन भीतरी कक्ष छोटा है। बाहर वाले कक्ष से भीतरी कक्ष में जाने का रास्ता कुछ तंग और कम ऊंचाई वाला है जहां से झुक कर गुजरना पड़ता है।

आगे चलकर यह रास्ता दो हिस्सों में बंट जाता है, जिसमें से एक के विषय में ऐसा विश्वास है कि यह कश्मीर जाता है। यह रास्ता अब बंद कर दिया गया है। दूसरा मार्ग गुफा की ओर जाता है, जहां स्वयंभू शिव की मूर्ति है। गुफा की छत पर सर्पाकृति चित्रकला है, जहां से दूध युक्त जल शिवलिंग पर टपकता रहता है।

यह स्थान रियासी-राजोरी सड़कमार्ग पर है, जो पौनी गांव से दस मील की दूरी पर स्थित है। शिवालिक पर्वत शृंखलाओं में अनेक गुफाएं हैं।

ये गुफाएं प्राकृतिक हैं। कई गुफाओं के भीतर अनेक देवी-देवताओं के नाम की प्रतिमाएं अथवा पिंडियां हैं। उनमें कई प्रतिमाएं अथवा पिंडियां प्राकृतिक भी हैं। देव पिंडियों से संबंधित होने के कारण ये गुफाएं भी पवित्र मानी जाती हैं। डुग्गर प्रांत की पवित्र गुफाओं में शिव खोड़ी का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है।

यह गुफा तहसील रियासी के अंतर्गत पौनी भारख क्षेत्र के रणसू स्थान के नजदीक स्थित है। जम्मू से रणसू नामक स्थान लगभग एक सौ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए जम्मू से बस मिल जाती है। यहां के लोग कटरा, रियासी, अखनूर, कालाकोट से भी बस द्वारा रणसू पहुंचते रहते हैं।

रणसू से शिव खोड़ी छह किलोमीटर दूरी पर है। यह एक छोटा-सा पर्वतीय आंचलिक गांव है। इस गांव की आबादी तीन सौ के करीब है। यहां कई जलकुंड भी हैं। यात्री जलकुंडों में स्नान के बाद देव स्थान की ओर आगे बढ़ते हैं। देव स्थान तक सड़क बनाने की परियोजना चल रही है। रणसू से दो किलोमीटर सड़क मार्ग तैयार है।

यात्री सड़क को छोड़ कर आगे पर्वतीय पगडंडी की ओर बढ़ते हैं। पर्वतीय यात्रा तो बड़ी ही हृदयाकर्षक होती है। यहां का मार्ग समृद्ध प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है। सहजगति से बहते जलस्त्रोत, छायादार वृक्ष, बहुरंगी पक्षी समूह पर्यटक यात्रियों का मन बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं।

चार किलोमीटर टेढ़ी-मेढ़ी पर्वतीय पगडंडी पर चलते हुए यात्री गुफा के बाहरी भाग में पहुंचते हैं। गुफा का बाह्‌य भाग बड़ा ही विस्तृत है। इस भाग में हजारों यात्री एक साथ खड़े हो सकते हैं। बाह्‌य भाग के बाद गुफा का भीतरी भाग आरंभ होता है।

यह बड़ा ही संकीर्ण है। यात्री सरक-सरक कर आगे बढ़ते जाते हैं। कई स्थानों पर घुटनों के बल भी चलना पड़ता है। गुफा के भीतर भी गुफाएं हैं, इसलिए पथ प्रदर्शक के बिना गुफा के भीतर प्रवेश करना उचित नहीं है। गुफा के भीतर दिन के समय भी अंधकार रहता है।

अत: यात्री अपने साथ टॉर्च या मोमबत्ती जलाकर ले जाते हैं। गुफा के भीतर एक स्थान पर सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं, तदुपरांत थोड़ी सी चढ़ाई के बाद शिवलिंग के दर्शन होते हैं। शिवलिंग गुफा की प्राचीर के साथ ही बना है। यह प्राकृतिक लिंग है। इसकी ऊंचाई लगभग एक मीटर है।

शिवलिंग के आसपास गुफा की छत से पानी टपकता रहता है। यह पानी दुधिया रंग का है। उस दुधिया पानी के जम जाने से गुफा के भीतर तथा बाहर सर्पाकार कई छोटी-मोटी रेखाएं बनी हुई हैं, जो बड़ी ही विलक्षण किंतु बेहद आकर्षक लगती हैं।
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गुफा की छत पर एक स्थान पर गाय के स्तन जैसे बने हैं, जिनसे दुधिया पानी टपक कर शिवलिंग पर गिरता है। शिवलिंग के आगे एक और भी गुफा है। यह गुफा बड़ी लंबी है। इसके मार्ग में कई अवरोधक हैं। लोक श्रुति है कि यह गुफा अमरनाथ स्वामी तक जाती है।
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अक्सर दूसरे की पतंग काटने के चक्कर में ही अपनी पतंग कट जाती है। मनुष्य का जीवन भी पतंग के समान ही है। वह भी दूसरे का बुरा करने में अपना बुरा कर लेता है। और जब कभी वह आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ छूने लगता है, तो मोह, अहंकार, लालच और अतृप्तिरूपी पतंगें उसे काटने लग जाती है। इन बुरी पतंगों से अपने-आपको बचाना बड़ा कठिन है। जितनी ऊँचाई बढ़ जाती है, उतना यह खतरा बढ़ जाता है। कई पतंगें ऊँचाई तो प्राप्त कर लेती है, पर उस ऊँचाई पर रह नहीं पाती और किसी अन्य, दोषरूपी पतंग से अपने-आपको कटवा लेती हैं।
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*अलौकिक सिद्धियाँ*

सिद्धियाँ का वर्णन शरीरगत कौतूहलों के रूप में किया जाता है। काया का छोटा हो जाना, बड़ा हो जाना, पानी पर चलने लगना, हवा में उड़ जाना आदि विलक्षणताओं को शरीर द्वारा कर दिखाना सिद्ध पुरुषों का सफलता का लक्षण माना जाता है। बहुत से इन पर विश्वास भी करते हैं और तलाशते फिरते हैं कि जो ऐसे कृत्य कर दिखायें उन्हें सिद्ध पुरुष या पहुँचा हुआ योगी मानें। किन्तु ऐसे योगियों लोग कदाचित् ही कहीं होते हों।

तिब्बत को ऐसे योगियों का क्रीड़ास्थली बताया जाता रहा है। वह स्थान दुर्गम एवं प्रतिबन्धित होने के कारण वहां सर्वसाधारण की पहुँच होती रही है। इसलिए किंवदंतियों का अन्वेषण भी नहीं होता। वहाँ लामा सम्प्रदाय का प्रभुत्व था। वे अपने ज्ञान चरित्र, और सेवा के आधार पर तो अपनी विशेषता बता नहीं पाते थे अलौकिकताओं की मन गढ़न्त कहानियाँ गढ़ने वालों को बताते रहते थे। सुनने वाले उनमें और नमक मिर्च मिलाकर तिल का ताड़ बना देते थे। पर जब चीन का हमला हुआ और तिब्बत क्षेत्र हड़प लिया गया तो किसी भी लामा सिद्ध की करामात काम न आई।

बुद्ध का एक शिष्य किसी राजा द्वारा ऊँचे बाँस पर टाँगे हुए कमण्डलु को उस पर चढ़कर उतार लाया था और अपनी सिद्धाई से चमत्कृत करके उस राजा को और उसकी प्रजा को अपना शिष्य बना लिया था। स्वर्ण कमण्डलु लेकर जब वह बुद्ध के पास पहुँचा तो उनने सारी बात जानी। वह शिष्य पहले नट था। बाँस पर चढ़ने की कला आती थी। उसी अनुभव के आधार पर वह ऐसी करामात दिखाने में सफल हुआ था। बुद्ध ने समस्त शिष्य मण्डली को बुलाया और उस कमण्डलु को तुड़वाकर नदी में बहा दिया। कहा कि मेरा कोई शिष्य कभी भी ऐसा आडम्बर न रचे। यदि ऐसा हुआ तो बाजीगर लोग सिद्ध पुरुष माने जाने लगेंगे और सच्चे योगी वैसा ढोंग न रच पाने के कारण उपेक्षित तिरष्कृत होते रहेंगे। उनके सदुपदेश भी कोई न सुन सकेगा।

जिस प्रागैतिहासिक काल में शरीरों को वायु प्रधान, जल प्रधान, अग्नि प्रधान बताया जा सकता था उस जमाने में कोई ऐसा कुछ कर दिखाता भी होगा। पर इन दिनों तो पृथ्वी प्रधान शरीर होते हैं। ऐसी दशा में किसी के लिए ऐसा कर दिखाना सम्भव नहीं है। श्रीलंका के एक डॉक्टर का अभी भी बैंक में से एक लाख रुपया इसलिए जमा पड़ा हुआ है कि कोई अलौकिक चमत्कार कर दिखाये तो उस रकम को सहर्ष उठाये। पर किसी ने भी उस चुनौती को स्वीकार नहीं किया है।

योग वस्तुतः मनोविज्ञान का विषय है। उसका सम्बन्ध चेतना के परिष्कार से है। गान्धी, बुद्ध, विवेकानंद, अरविन्द आदि ने कोई करामातें नहीं दिखाई थीं। वे अपनी मानसिक उत्कृष्टता के आधार पर ही महानता के ऊँचे स्तर तक पहुँचे थे।

जहाँ ऐसे चमत्कारी वर्णन हैं वे शारीरिक नहीं भावनात्मक या अलंकारिक हैं। व्यामोह की सुरसा, हनुमान को निगलना चाहती थी वे अपने को वैभववान् नहीं, अकिंचन बनकर उससे छुटकारा पा सके। साधारण जनों को अपने में डूबा लेने वाले भवसागर के ऊपर होकर जो चल सकता है, पार जा सकता है उसे जल पर चलने की सिद्धी प्राप्त हुई यह समझना चाहिए। हनुमान की नम्रता अकिंचन भावना ही उसकी अणिमा सिद्धि थी।

सन्त दादू के पास एक महिला आई। वह पति को वश में करने का जंत्र-मंत्र चाहती थी। दादू ने उसके विश्वास को देखते हुये एक कागज पर कुछ लिखकर ताबीज पहना दिया। साथ ही पति के मधुर व्यवहार की रीति-नीति भी समझा दी। पति वश में हो गया। वह स्त्री दादू के सामने थाल भरकर धन तथा उपहार लाई। बहुत से दर्शक भी मौजूद थे। दादू ने उस जंत्र-मंत्र को उससे वापस लिया और खोलकर सब लोगों को दिखाया था। उसमें कुछ भी अनोखापन नहीं था। अपने सद्व्यवहार से ही उसने पति को वश में किया था। जादू जंत्र तंत्रो में नहीं होता अपना स्वभाव और प्रयास के बदलने से ही अभीष्ट सफलताएँ उपलब्ध होती हैं। तथ्य दादू ने सब पर प्रकट कर दिया और उपहार जरूरतमन्दों को बाँट दिया।

आकाश में उड़ जाने की सिद्धि में क्या कौतूहल है? मक्खी, मच्छर और पक्षी पतंगे आकाश में उड़ते ही रहते हैं। जिन्हें पानी पर चलने की जल्दी हो वे नाव में बैठ सकते हैं और जिन्हें हवा में उड़ना हो वे हवाई जहाज का टिकट खरीद सकते हैं। इसके लिए किसी कष्टसाध्य योगाभ्यास की जरूरत नहीं है।

आकाश में उड़ने से मतलब है। अपना लक्ष्य ऊँचा रखना। अपना व्यक्तित्व सामान्य लोगों की तुलना में ऊँचा उठाना।

वायुयान यात्रा में काँच की खिड़की से झाँककर नीचे की ओर देखा जाये तो रेलगाड़ी सांप सी रेंगती दिखाई पड़ती है और हाथी घोड़े जैसे बड़े जानवर चाबी वाले खिलौने की तरह दौड़ते हैं। नदियाँ पतली नाली जैसी दीखती हैं। ऐसा ही दृष्टिकोण दुनियादारों के प्रति महामानवों का होता है। लोग तुच्छ प्रतीत होते हैं। उनके क्रिया-कलाप और परामर्श भी बच्चों जैसे। वे उनसे प्रभावित नहीं होते वरन् ओछे स्तर को बचकानापन मानकर हँस भर देते हैं। अपनी उनसे तुलना नहीं करते। वायुयान पर चढ़ा हुआ व्यक्ति दूर-दूर के दृश्य देखता है किन्तु घास
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चरने वाले छोटे जानवर आप-पास घोड़े ही दायरे में देख सकते हैं। कूप मण्डूक की दुनिया बहुत छोटी होती है। गूलर के भुनगों की उनसे भी कम दायरे की। जबकि वायुयान पर बहुत ऊँचाई पर से देखने पर दुनिया बहुत विस्तृत दीखती है।

चन्द्र यात्रियों ने चन्द्रमा पर खड़े होकर उगती हुई पृथ्वी को देखा था वह बड़े थाल के बराबर थी। पर हमारी दृष्टि में तो वही पूरा ब्रह्मांड है। इसी को कहते हैं आकाश में उड़ना।

बच्चों को चाबी वाले खिलौने ही मनोरंजन के केन्द्र बने रहते हैं। पर बड़ी आयु के व्यक्ति उन्हें खिलवाड़ भर मानते हुए तुच्छ आँकते हैं। सामान्य बुद्धि के दुनियादार लोग लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति को ही बहुत बड़ी वस्तु मानते हैं और उनकी उपलब्धि को भारी सफलता गिनते हैं। पर दूरदर्शी विवेकशील इन खिलवाड़ों में अपने को उलझते नहीं और सोचने की करने की दिशाधारा ऐसी बनाते हैं जो सृष्टा के युवराज की गरिमा को सुरक्षित रखे।

अन्य सभी अलौकिकताएँ भी इसी प्रकार की हैं। वे शारीरिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक हैं। शरीर से अचम्भे वाले करतब कर दिखाना जादूगरों बाजीगरों का काम है सिद्ध पुरुषों का नहीं।
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विचित्र

मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा ही ज्ञान विज्ञान की तरफ लेजाती है विज्ञान ने हमे नये सुख के साधन दिये पर फिर हम अधूरा महसूस करते है हम गरीब या अमीर स्त्री या पुरूष हमे एक खोज रहती हम अपने को अधुरा महसूस करते है किसे केपास झोपड़ी या महल पैदल हो या महंगी गाडी पर सब को साढे तीन फुट चौडी ओर छः फुट लम्बी आप जिन्दा है तो भी और मर गये तो भी कोई करोड़ों कमाकर भी चार रोटी खाता है और कोई भीख मांग कर भी कोई बहुत बडी जमीन का मालिक है और किसी के पास एक इंच भी नही पर रहते सब जमीन पर ही!
प्रत्येक जिनके शरीर पर रोम (शल्क भी रोम मे ही सम्मिलत है)क्यो होते ? मूलाधार चक्र मे ही प्रजनन अंग क्यो है? केन्द्र से ही सब भूतो( पदार्थों) का नियन्त्रण क्यो होता है? सभी प्राणियों मे पाव कछुए के पांवो के स्थान पर ही क्यो? मस्तिष्क सहस्रार मे ही क्यो? प्रभामण्डल क्या है? सभी पदार्थों से निकलने वाली तरंगें क्यो है? देव और दानवरूप जीव जन्तु भी सर्वत्र है, आधुनिक विज्ञान भी ब्रह्माण्ड की छाया ढूढ रहा है यह वही स्थान है जहां ब्रह्माण्ड की ऋण तरंगें निकलती है।
यह ईशान कोण की ओर साठ डिग्री कोण पर नीचे झुका हुआ तो इसकी छाया इससे कई गुणा बडी है यही ऋण ब्रह्माण्ड है और इसमे भी प्राणियों एवं शक्तियों का अस्तित्व है वैदिक विद्वानों का कथन है कि ऊर्जा शरीर प्राणी भी होते है और यह भी हो सकता है कि किसी विशेष तारे के ग्रह पर वह आक्सीजन की जगह पर अग्नि की लपटों से जीवनशक्ति प्राप्त करता हो
चेतना स्थल संयोग के समीकरण का फल नही है अपितु चेतना सर्वत्र व्याप्त है और इसके अनगिनत रूप है स्थूल शरीर तो यह अपनी प्रकृति को अनुसार निर्मित करता है पृथ्वी की परिस्थितियों मे बने शरीर मे आक्सीजन की आवश्यकता है तो यह आवश्यक नही कि किसी अन्य ग्रह की परिस्थितियों मे निर्मित शरीर मे भी उस शरीर को आक्सीजन चाहिए परिस्थितियों ये अनुसार शरीर, भोजन और आक्सीजन की मात्रा आदि का अभूतपूर्व अन्तर तो पृथ्वी पर भी प्राणियों मे दिखाई पडता है ।
मछली से लिए आक्सीजन से अधिक उसे पानी की आवश्यकता होती है कुत्ते को सडा गला मांस पोषण देता है। पर मनुष्य उसे खाते ही मर जाता है इसलिए किसी विशेष संयोग को जीवन का कारण मानना मुर्खतापूर्ण सिद्धांत है रशियन वैज्ञानिको ने 1500 डिग्री फेर नाईट पर अग्नि भक्षण करने वाले जीवाणु की तलाश की है
आपके सामने मच्छर है ये वातावरण को प्रतिरोधी तत्त्वों से किस तरह एडजस्ट करते है इसका अनुभव आपको हो रहा है इसलिए कोई भी संयोग या परिस्थिति जीवनतत्त्व का कारण नही है चेतना का मूल बीज उत्पन्न नही होता अपितु चेतना का मूल वास्तव मे है शेष सभी निर्माण वह अपनी शक्ति से परिस्थितियों को अनुसार करता है।
जब साधक गुरु मार्गदर्शन का बार-बार तिरस्कृत और उपेक्षित करता हुआ टाल-मटोल करने लगे अपनी अनुभूतियों में गुरु ईष्ट का कोई औचित्य नहीं रहता हो ऐसे साधक अपने मन गढंत विचारधारा को लेकर आराधना करते हैं या नये कल्पनाओं में नये गुरूओं के आदेश में चल रहे हैं।ऐसे शिष्यों के विषय में गुरु को गहन चिंतन आत्ममंथन की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वह सत्य से बहुत दूर जा रहा है।
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सर्पो की माता --- मनसा देवी


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कालसर्प दोष एक ऐसा ज्योतिषीय योग है, जो जातक के जीवन में अनेक बाधाएँ, कष्ट और रुकावटें लाता है। पिछले लेख में हमने इस दोष के प्रभाव और सामान्य उपायों का वर्णन किया था। परंतु आज हम चर्चा कर रहे हैं कि मनसा माता की पूजा कालसर्प दोष में क्यों सर्वश्रेष्ठ मानी गई है? इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक, पौराणिक और तार्किक कारण छिपा है।

कद्रू_विनता_कथा
नागों_को_शाप

महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध कथा है— कश्यप ऋषि की दो पत्नियाँ थीं: कद्रू और विनता। कद्रू नागों की माता बनीं, और विनता के पुत्र बने गरुड़देव। समुद्र मंथन के समय जो श्वेत अश्व उच्चैश्रवा निकला, उसे लेकर कद्रू और विनता में विवाद हुआ। कद्रू ने कहा कि अश्व की पूंछ काली है, जबकि विनता ने उसे पूर्णतः श्वेत बताया। शर्त यह थी कि जो गलत निकले, वह दूसरी की दासी बनेगी।

कद्रू ने अपने पुत्रों – नागों – से कहा कि वे अश्व की पूंछ में लिपट जाएं ताकि वह काली दिखे। कुछ नागों ने आदेश नहीं माना, तो क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें श्राप दिया कि वे जनमेजय के सर्पयज्ञ में भस्म हो जाएंगे। इसी से नाग वंश पर संकट छा गया।

नाग_वंश_की_रक्षा_हेतु_प्रयास

इस संकट से व्यथित होकर शेषनाग तपस्या में चले गए और वासुकि नाग ने नागों की रक्षा हेतु उपाय खोजा। उन्होंने ब्रह्माजी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा कि जरत्कारु ऋषि से उत्पन्न पुत्र ही नागवंश को सर्पयज्ञ से बचा सकता है। लेकिन समस्या यह थी कि ऋषि जरत्कारु ने आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प ले रखा था।

जरत्कारु_ऋषि_और_उनके_पितरों_की_करुण_दशा

एक दिन ऋषि जरत्कारु ने एक भयंकर दृश्य देखा — कुछ पितर खस के एक सूखे तिनके से लटक रहे हैं, जिसकी जड़ को कालरूप चूहा काट रहा था। पितरगण कष्ट में थे। उन्होंने ऋषि से कहा कि वे उसी वंश के हैं, और संतानहीन होने के कारण वे नर्क भोग रहे हैं। जरत्कारु ऋषि अपने ही पितरों की दुर्दशा देखकर विचलित हो गए। उन्होंने संकल्प लिया कि वे विवाह करेंगे — लेकिन शर्त रखी कि कन्या भी जरत्कारु नाम की हो, उन्हें भिक्षा स्वरूप दी जाए, और वे उसका पालन-पोषण नहीं करेंगे।

वासुकि_की_बहन_जरत्कारु_से_विवाह

यह एक संयोग था कि वासुकि की बहन का नाम भी जरत्कारु था और वह भी तपस्या से क्षीणकाय हो चुकी थी। वासुकि ने अपनी बहन को ऋषि को भिक्षा रूप में समर्पित कर दिया और उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी ली। इस प्रकार उनका विवाह सम्पन्न हुआ ।

आस्तिकमुनि_का_जन्म

जरत्कारु ऋषि ने पत्नी से शर्त रखी कि वह कोई भी अप्रिय कार्य न करे, अन्यथा वे त्याग देंगे। एक दिन ऋषि ध्यान में लीन थे, सूर्यास्त हो गया। उनकी पत्नी ने धर्म की रक्षा हेतु उन्हें जगाया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि उन्हें छोड़कर चले गए। जाते समय उन्होंने बताया कि उनके गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा, जो महान ऋषि होगा।

समय आने पर आस्तिक मुनि का जन्म हुआ। यह वही पुत्र था, जिसके लिए ब्रह्माजी ने भविष्यवाणी की थी — जो नाग वंश की रक्षा करेगा।

जनमेजय_का_सर्पयज्ञ_और_नागों_की_रक्षा

राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए महान सर्पयज्ञ आरंभ किया। अनेक नाग यज्ञ में गिरते ही भस्म हो गए। तभी आस्तिक मुनि वहाँ पहुँचे और अपनी तपस्या, ज्ञान और वाणी से राजा को प्रभावित कर यज्ञ को रोक दिया। इस प्रकार नाग वंश का नाश रुक गया।

मनसा_माता: नागों की रक्षक, आस्तिक की जननी ।। यह जरत्कारु माता का नाम ही मनसा माता है ।। मनसा माता को सर्पों की देवी माना जाता है। वे स्वयं वासुकि की बहन हैं और आस्तिक मुनि की माता भी। उनके भीतर मातृत्व, करुणा और तपस्या की शक्ति समाहित है। वे काल की पुत्री और नागों की माता हैं, इसीलिए उनका एक नाम "आस्तिक माता" भी है।

आज भी नाग वंश के प्रतीक रूप में सभी सर्प उन्हें पूजनीय माता मानते हैं। जो भक्त मनसा माता की सच्चे भाव से आराधना करता है, उन्हें सर्पदोष, भय या बाधा छू तक नहीं सकती।

कालसर्प दोष में क्यों लाभकारी है मनसा माता की पूजा?

मनसा_माता_स्वयं_सर्पों_की_अधिष्ठात्री_देवी_हैं।

वे नागों की रक्षक और आस्तिक जैसे महान पुत्र की जननी हैं, जिन्होंने सर्पयज्ञ को रोका। मनसा माता की आराधना सर्पों की कृपा और शांति को प्राप्त करने का सीधा उपाय है।

वे काल की पुत्री हैं — अतः कालसर्प दोष का कारण बनने वाली ऊर्जाओं को नियंत्रित करने की क्षमता रखती हैं।

जो मनसा माता को प्रसन्न करते हैं, उन्हें सर्प, भय और बाधा से मुक्ति अवश्य मिलती है।
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मनसा माता की पूजा केवल आस्था नहीं, एक सिद्ध उपाय है — कालसर्प दोष से मुक्त होने का। वह माता हैं, नागों की भी, और मनुष्यों की भी। जो उन्हें सच्चे भाव से स्मरण करता है, उसकी रक्षा स्वयं आस्तिक जैसे दिव्य ऋषि करते हैं। उनकी पूजा करने वाला व्यक्ति सर्पदोष, भय और जीवन की विषबाधाओं से मुक्त हो जाता है।

।। जय मनसा माता ।।
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कहानी का समय

एक घंटी


नीरा हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहने वाली महिला थी। उसका छोटा-सा परिवार—पति, माँ और आठ साल की बेटी सिया—उसी की मुस्कान से घर बन जाता था। सुबह का वक्त था। रसोई में चाय की खुशबू और गैस पर चढ़ी रोटी की महक एक साथ घुल रही थी। तभी मोबाइल की घंटी बजी—रीजते रिश्तों की आदतों की तरह, अचानक और बिना बताए।

नीरा ने सोचा—“बस दो मिनट की ही तो बात है।” एक हाथ से पलटी उठाई, दूसरे हाथ से फोन कान पर लगा लिया। दूसरी तरफ उसकी बचपन की सहेली थी। बातें पुरानी यादों की तरह बह निकलीं। चूल्हे की आँच तेज हो रही थी और रोटी धीरे-धीरे जलने लगी, मगर नीरा हँसी में डूबी रही। तभी फोन का कंपन थोड़ा तेज हुआ, मोबाइल उसके हाथ से फिसला—सीधे गैस के पास।

एक पल… और नीरा का पूरा संसार जैसे थम गया। लपटें उठीं, डर ने साँस रोक दी। नीरा का हाथ हल्का-सा जल गया। सिया दौड़कर आई—“माँ!” उसकी काँपती आवाज़ नीरा के कानों में किसी सचेत पुकार की तरह गूँज उठी। पति ने तुरंत गैस बंद की, पानी डाला और नीरा का हाथ पकड़ लिया—कंपकंपाता हुआ, मगर संभालता हुआ।

दर्द केवल हाथ का नहीं था। नीरा के भीतर अपराधबोध का एक बड़ा-सा बोझ उतर आया। उसने सिया को सीने से लगाया—“मुझे माफ कर दो… मैंने तुम्हारे सामने अपनी ही लापरवाही की मिसाल छोड़ दी।” सिया ने छोटे हाथों से उसकी आँखे पोंछ दीं। माँ बोली—“बेटी, फोन बाद में होता है, ज़िंदगी पहले।”

उस रात नीरा ने मोबाइल को रसोई से बाहर रख दिया। दीवार पर कागज़ चिपका—
“गैस पर काम करते समय फोन नहीं उठाऊँगी। ज़िंदगी का कॉल हमेशा पहले है।”

अगले दिन उसने अपनी सहेलियों को फोन किया। पहले ही वाक्य में कहा—“बोलने से पहले बस एक बात पूछ लेना, क्या मैं रसोई में तो नहीं हूँ?” हर दोस्त चुप हुई, फिर बोली—“यह तो हम सबके लिए ज़रूरी है।”

नीरा ने समझ लिया—खतरा हमेशा शोर करके नहीं आता, कभी-कभी सिर्फ एक घंटी बनकर भी आता है।
उस दिन के बाद उसके घर में एक नियम बन गया—
रसोई में केवल आग जले, फोन नहीं।

और सिया अक्सर मुस्कुराकर कहती—
“मेरी माँ ने मोबाइल नहीं, ज़िंदगी पकड़ ली।”

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज़िंदगी से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है—न फोन, न बातचीत, न छोटी सुविधा। रसोई में गैस और आग के बीच मोबाइल का उपयोग बड़ा खतरा बन सकता है और एक क्षण की लापरवाही पूरे परिवार की खुशियों को जला सकती है। सजग रहना प्रेम का ही एक रूप है, क्योंकि अपनी सुरक्षा से हम अपने परिवार की सुरक्षा भी करते हैं। इसलिए काम करते समय पूरा ध्यान उसी पर रखें, विशेषकर रसोई में गैस जल रही हो तो फोन बाद में उठाएँ। याद रखें—कॉल वापस आ सकता है, जीवन नहीं।
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श्री किशोरी जी प्रेम-रस एवं रूप की अनंत राशि हैं। उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास-रस प्राप्त करता है। इतना ही नहीं, वह किशोरी जी की सहचरी बनकर उनके साथ नित्य विहार करता है। उसे आधे पल के लिये भी रस का वियोग नहीं हो सकता। वह सदा स्वरों को साध कर अनुराग-युक्त विविध रागों के द्वारा किशोरी जी के गुणों को गाकर उन्हें प्रसन्न करता है एवं ‘धा-तिर-किट-धा-धा’ आदि नृत्य के शब्दों का उच्चारण करता हुआ विविध हाव-भाव द्वारा अलौकिक नृत्य करता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह इस प्रकार सहज ही श्यामा-श्याम के दिव्य प्रेमानन्द का निरन्तर अनुभव करता हुआ कृतार्थ रहता है