सारे संसार के पुण्यपाप सुकर्म कुकर्म करने कराने वाली महती स्वरूपा जो महालक्ष्मी नाम से विख्यात भगवति है, वह मैं ही हूं।
प्रचुर रूप से आश्रयण करने से मेरा ही नाम महाश्री है ।
चण्ड की प्रिया भार्या मैं ही हूं,प्रचण्डता के कारण
मेरा नाम यह नाम चण्डी हुआ है।
कल्याणरूपा में भदा हूँ, सबको एकजुट बनाये रखती हूँ इसलिये मेरा ही नाम काली है काल रूप से से सभी को भयभीत रखती हूँ इसलिये भी मेरा नाम काली है।
सत् असत् की द्बिधा में सज्जन प्रेमियों को भी भयभीत रखती हूँ इसलिये माया गुणात्मिका भद्रकाली के नाम से मैं प्रसिद्ध है।
महत्व से मेरा नाम महामाया है, सबको मोहित करती हूँ इसलिये मैं मोहिनी हूँ मेरे पाने का मार्ग कठिन है इसलिये लोग मुझे दुर्गा कहते हैं, कठिन से कठिन कष्टों से भक्तों की रक्षा करती हूँ ,इससे भी मेरा नाम दुर्गा है।
ज्ञान से समायुक्त होने पर मैं योग हूँ और योगमाया नाम से प्रसिद्ध हूँ, माया का ज्ञान योग से ही होता है। यास्क के अनुसार माया वयुनं ज्ञानम् है अर्थात् ज्ञान ही माया है, सम्भवाम्यात्ममायया आत्मसङ्कल्प से ही माया होती है, मनुष्यों में ज्ञानयोजन से योगमाया होती है, ।
जिस भगवती में सम्पूर्ण छः गुणों-ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, तेज और ऐश्वर्य का पूर्णत्व रहता है वही भगवती मैं हूँ।
वैवाहिक यज्ञ के संयोग से मैं भगवान् की पत्नी हूँ।
भगवत् यज्ञ के आश्रितजनों की रक्षा हेतु मैं स्वयं भगवत् स्वरूप हूँ, भगवत् शक्ति के बिना भगवान् भी कुछ कार्य नहीं कर सकते इसलिये यज्ञाश्रितों की रक्षा में लक्ष्मी का स्वरूप पुरूषत्व युक्त हो जाता है।
विशालता से मैं आकाश हूँ, पूर्णता से मुझे पुरी कहा जाता है,
मैं पूर्ण करती हूँ इसलिये पुरी कही जाती हूँ। मेरे परावर स्वरूप से विद्वान् मुझे परावरा कहते हैं।
शकन-सकना-सामर्थ्य के कारण मुझे शक्ति कहा जाता है, लोगों की रक्षा करके सुखी करती हूँ इसलिये राज्ञी कहा जाता है, मेरा स्वरूप निरन्तर अविकारी रहता है, शान्त रहता है इसलिये मुझे शान्ता कहा जाता है।
यह अखिल विश्व मेरी कृति है, मेरे द्वारा निर्मित है इसलिये मैं प्रकृति नाम से विश्रुत हूँ। लोकों का आश्रय हूँ इसलिये श्रयन्ती श्रयणीया हूँ, सज्जनों के कष्टों को मैं दूर करती हूँ ।
मैं दीन-दुःखियों की पुकार सुनती हूँ, त्रिगुणों से जगत् की सृष्टि करती हूँ, सभी भूतों का आश्रय हूँ, सभी पुनीत कर्मों में
मैं रमा हूँ।
मैं सदैव देवों से प्रशंसित हूँ, मैं वैष्णवों का शरीर हूं,
, वेद-वेदान्त के ज्ञानी जनों के द्वारा मुझमें इतनें गुण देखे गये हैं। श्री में श+र+ई हैं शं से श से शयेन्तः र से रमा और ई से ईड
अर्थात् स्तुति का समावेश है।
गुणयोग विधान के विद्वान् मुझे श्री रूप में देखते हैं,
इस प्रकार मैं सर्वरूपमयी और सनातनी भगवती हूँ।
तीनों गुणों की मैं स्वामिनी हूं मेरी ख्याति त्रिगुण रूप में है। सृष्टि की इच्छा से मैं अपने गुणों में विषमता असमानता की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हूं।
तपाये हुए सोने के समान मेरी आभा है, शुद्ध स्वर्णनिर्मित मेरे आभूषण हैं, आलोकविहीन लोकों को मैं अपने तेज से पूर्ण प्रकाशित करती हूँ।
सृष्टि के पूर्व अखिल लोक शून्य रहता है उसे मैं अपने से पूर्ण कर देती हूँ तब सृष्टि होती है, यह सतोगुणमयी होती है, केवल तमोगुण से मैं दूसरा रूप ग्रहण करती हूँ।
उसका वर्ण अञ्जन के समान काला होता है, सुन्दर मुख दंष्टो से युक्त होता है, उसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं, कमर पतली होती है।
उसकी विशाल चार भुजाओं में खड्ग, पात्र, नरमुण्ड और गदा शोभित रहते हैं, गले में कबन्धों का हार होता है, शिर पर नरमुण्डों की माला होती है।
तमोगुण से उत्पन्न नारियों में उत्तम, उसने मुझसे कहा हे माते तुम्हें नमस्कार है, मुझे मेरा नाम और कर्म बतलाइये ।
श्रीआद्यामहालक्ष्मी ने कहा, --उस सुन्दर कुल्हों वाली तामसी, रमणियों में श्रेष्ठ भगवती से मैंने कहा
कि मैं तुम्हारे जो-जो नाम और कर्म हैं, उन्हें बतलाती हूँ।
महाकाली, महामाया, महामारी, क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि, दुरत्यया- ये दश तुम्हारे नाम हैं। नामों से निष्पन्न अर्थ के अनुसार तुम्हारे कर्म होंगे, इन नामों का जप
जो करेगा उसे सभी सुख प्राप्त होंगे।
इस सृष्टि को अपर्याप्त समझकर मन्यमाना आदि रूप से मैंने सत्त्वोन्मेष से चन्द्रमा के. समान सुन्दर नारी को प्रकट किया।
उनके चारों हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक शोभित थे, उस श्रेष्ठ नारी को मैंने नाम और कर्म बतलाया।
उनके नाम हैं-महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, महाधेनु, वेदगर्भा, बुद्धीवरी
नामानुरूप निष्पत्र अर्थ ही उसके कार्य बतलाये गये, उसके सत्त्व गुणमय कार्य आश्चर्यजनक है। हम तीनों महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती ही जगजननी संसार को पालन करने वाली देवियों कही जाती हैं।
हरि ॐ तत्सत्
प्रचुर रूप से आश्रयण करने से मेरा ही नाम महाश्री है ।
चण्ड की प्रिया भार्या मैं ही हूं,प्रचण्डता के कारण
मेरा नाम यह नाम चण्डी हुआ है।
कल्याणरूपा में भदा हूँ, सबको एकजुट बनाये रखती हूँ इसलिये मेरा ही नाम काली है काल रूप से से सभी को भयभीत रखती हूँ इसलिये भी मेरा नाम काली है।
सत् असत् की द्बिधा में सज्जन प्रेमियों को भी भयभीत रखती हूँ इसलिये माया गुणात्मिका भद्रकाली के नाम से मैं प्रसिद्ध है।
महत्व से मेरा नाम महामाया है, सबको मोहित करती हूँ इसलिये मैं मोहिनी हूँ मेरे पाने का मार्ग कठिन है इसलिये लोग मुझे दुर्गा कहते हैं, कठिन से कठिन कष्टों से भक्तों की रक्षा करती हूँ ,इससे भी मेरा नाम दुर्गा है।
ज्ञान से समायुक्त होने पर मैं योग हूँ और योगमाया नाम से प्रसिद्ध हूँ, माया का ज्ञान योग से ही होता है। यास्क के अनुसार माया वयुनं ज्ञानम् है अर्थात् ज्ञान ही माया है, सम्भवाम्यात्ममायया आत्मसङ्कल्प से ही माया होती है, मनुष्यों में ज्ञानयोजन से योगमाया होती है, ।
जिस भगवती में सम्पूर्ण छः गुणों-ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, तेज और ऐश्वर्य का पूर्णत्व रहता है वही भगवती मैं हूँ।
वैवाहिक यज्ञ के संयोग से मैं भगवान् की पत्नी हूँ।
भगवत् यज्ञ के आश्रितजनों की रक्षा हेतु मैं स्वयं भगवत् स्वरूप हूँ, भगवत् शक्ति के बिना भगवान् भी कुछ कार्य नहीं कर सकते इसलिये यज्ञाश्रितों की रक्षा में लक्ष्मी का स्वरूप पुरूषत्व युक्त हो जाता है।
विशालता से मैं आकाश हूँ, पूर्णता से मुझे पुरी कहा जाता है,
मैं पूर्ण करती हूँ इसलिये पुरी कही जाती हूँ। मेरे परावर स्वरूप से विद्वान् मुझे परावरा कहते हैं।
शकन-सकना-सामर्थ्य के कारण मुझे शक्ति कहा जाता है, लोगों की रक्षा करके सुखी करती हूँ इसलिये राज्ञी कहा जाता है, मेरा स्वरूप निरन्तर अविकारी रहता है, शान्त रहता है इसलिये मुझे शान्ता कहा जाता है।
यह अखिल विश्व मेरी कृति है, मेरे द्वारा निर्मित है इसलिये मैं प्रकृति नाम से विश्रुत हूँ। लोकों का आश्रय हूँ इसलिये श्रयन्ती श्रयणीया हूँ, सज्जनों के कष्टों को मैं दूर करती हूँ ।
मैं दीन-दुःखियों की पुकार सुनती हूँ, त्रिगुणों से जगत् की सृष्टि करती हूँ, सभी भूतों का आश्रय हूँ, सभी पुनीत कर्मों में
मैं रमा हूँ।
मैं सदैव देवों से प्रशंसित हूँ, मैं वैष्णवों का शरीर हूं,
, वेद-वेदान्त के ज्ञानी जनों के द्वारा मुझमें इतनें गुण देखे गये हैं। श्री में श+र+ई हैं शं से श से शयेन्तः र से रमा और ई से ईड
अर्थात् स्तुति का समावेश है।
गुणयोग विधान के विद्वान् मुझे श्री रूप में देखते हैं,
इस प्रकार मैं सर्वरूपमयी और सनातनी भगवती हूँ।
तीनों गुणों की मैं स्वामिनी हूं मेरी ख्याति त्रिगुण रूप में है। सृष्टि की इच्छा से मैं अपने गुणों में विषमता असमानता की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हूं।
तपाये हुए सोने के समान मेरी आभा है, शुद्ध स्वर्णनिर्मित मेरे आभूषण हैं, आलोकविहीन लोकों को मैं अपने तेज से पूर्ण प्रकाशित करती हूँ।
सृष्टि के पूर्व अखिल लोक शून्य रहता है उसे मैं अपने से पूर्ण कर देती हूँ तब सृष्टि होती है, यह सतोगुणमयी होती है, केवल तमोगुण से मैं दूसरा रूप ग्रहण करती हूँ।
उसका वर्ण अञ्जन के समान काला होता है, सुन्दर मुख दंष्टो से युक्त होता है, उसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं, कमर पतली होती है।
उसकी विशाल चार भुजाओं में खड्ग, पात्र, नरमुण्ड और गदा शोभित रहते हैं, गले में कबन्धों का हार होता है, शिर पर नरमुण्डों की माला होती है।
तमोगुण से उत्पन्न नारियों में उत्तम, उसने मुझसे कहा हे माते तुम्हें नमस्कार है, मुझे मेरा नाम और कर्म बतलाइये ।
श्रीआद्यामहालक्ष्मी ने कहा, --उस सुन्दर कुल्हों वाली तामसी, रमणियों में श्रेष्ठ भगवती से मैंने कहा
कि मैं तुम्हारे जो-जो नाम और कर्म हैं, उन्हें बतलाती हूँ।
महाकाली, महामाया, महामारी, क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि, दुरत्यया- ये दश तुम्हारे नाम हैं। नामों से निष्पन्न अर्थ के अनुसार तुम्हारे कर्म होंगे, इन नामों का जप
जो करेगा उसे सभी सुख प्राप्त होंगे।
इस सृष्टि को अपर्याप्त समझकर मन्यमाना आदि रूप से मैंने सत्त्वोन्मेष से चन्द्रमा के. समान सुन्दर नारी को प्रकट किया।
उनके चारों हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक शोभित थे, उस श्रेष्ठ नारी को मैंने नाम और कर्म बतलाया।
उनके नाम हैं-महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, महाधेनु, वेदगर्भा, बुद्धीवरी
नामानुरूप निष्पत्र अर्थ ही उसके कार्य बतलाये गये, उसके सत्त्व गुणमय कार्य आश्चर्यजनक है। हम तीनों महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती ही जगजननी संसार को पालन करने वाली देवियों कही जाती हैं।
हरि ॐ तत्सत्
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#सर्वकारणम्_विश्वस्वरूपम्!!
(आद्यामहालक्ष्मी महिमास्तोत्र)
ॐ श्री ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ ह्री श्रीं क्रीं आद्या भगवति परमेश्वरी महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सौ: आद्यामहालक्ष्मी कमलधारिण्यै सिंहवाहिन्यै नमः।
इस स्तोत्र के पाठ से सम्पूर्ण शरीर झनझना जाता है, एक बिजली सी कौंध उठती है और साधक के हृदय में एक परम दिव्य विद्युत के रूप में श्रीलक्ष्मी प्रादुर्भावित हो जाती है। इस स्तोत्र को पढ़कर दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से अगर श्रीयंत्र या शालिग्राम शिला को स्पर्श कर दिया जाये तो उसमें तुरंत लक्ष्मी चैतन्यता, प्राण-प्रतिष्ठित हो जाती है।
( ऐसा सिद्ध साधकों का अनुभव है)
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणाहं महेश्वरी।
रजोरूपमधिष्ठाय सृष्टिमिष्टां करेम्यहम्।।
अग्रीषौममयौ भावो दिव्यौ स्त्रीपुंसलक्षणौ ।
विभ्रति चारूसर्वांंगी लोकानां हितकाम्यया ।।
चतुर्भुजाम् विशालाक्षी तप्तकाञ्चनसन्निभा
मातृलुंगं गदा खेटं सुधापात्रं च विभ्रति।।
महालक्ष्मी: समाख्याता साहं सर्वाङ्गसुन्दरी ।
महाश्रीः सा महालक्ष्मीश्चण्डा चण्डी च चण्डिका ॥
भद्रकाली तथा भद्रा काली दुर्गा महेश्वरी ।
त्रिगुणा भगवत्पत्नी तथा भगवती परा।।
एताः सञ्ज्ञास्तथा चान्यास्तत्र मे बहुधा स्मृताः ।
विकारयोगादन्याश्च तास्ता वक्ष्याम्यशेषतः ।।
लक्षयामि जगत्सर्व पुण्यापुण्ये कृताकृते।
महनीया च सर्वत्र महालक्ष्मी: प्रकीर्तिता ।।
महद्भिः श्रयणीयत्वान्महाश्रीरिति गद्यते।
चण्डस्य दयिता चण्डी चण्डत्वाच्चण्डिका मता ।।
कल्याणरूपा भद्रास्मि काली च कलनात्सताम् ।
द्विषतां कालरूपत्वादपि काली प्रकीर्तिता ।।
सुहृदां द्विषतां चैव युगपत्सदसद्विधेः ।
भद्रकाली समाख्याता मायाश्चर्यगुणात्मिका ॥
महत्वाच्य महामाया मोहनान्मोहिनी मता ।
दुर्गा च दुर्गमत्वेन भक्तरक्षाविधेरपि।।
योजनाच्चैव योगाहं योगमाया च कीर्तिता ।
मायायोगेति विज्ञेया ज्ञानयोजनतो नृणाम् ।।
पूर्णषाड्गुण्यरूपत्वात् साहं भगवती स्मृता ।
भगवद्यज्ञसंयोगात् पत्नी भगवतो ऽस्म्यहम् ॥
विशालत्वात्समृता व्योम पूरणाच्च पुरी स्मृता।
परावरस्वरूपत्वात् स्मृता चाहं परावरा।।
शकनाच्छक्तिरुक्ताह राज्यहं रञ्जनात् सदा।
सदा शांतविकारत्वाच्छान्ताहं परिकीर्तिता ।।
मत्तः प्रक्रियते विश्वं प्रकृतिः सास्मि कीर्तिता ।
श्रयन्ती श्रयणीयास्मि श्रृणामि दुरितं सताम् ।।
श्रृणोमि करुणां वाचं शृणामि च गुणैर्जगत् ।
शयेऽन्तः सर्वभूतानां रमेऽहं पुण्यकर्मणाम्।।
ईडिता च सदा देवैः शरीरं चास्मि वैष्णवम् ।
एतान्मयि गुणान् दृष्ट्वा वेदवेदान्तपारगाः । ।
गुणयोगविधानज्ञाः श्रियं मां सम्प्रचक्षते।
साहमेवंविधा नित्या सर्वाकारा सनातनी ।।
गुणत्रयमधिष्ठात्री त्रिगुणा परिकीर्तितः।
गुणवैषम्यसर्गाय प्रवृत्ताहं सिसृक्षया ।।
तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
निरालोकमिमं लोकं पूरयामि स्वतेजसा ।।
शून्यं तदखिलं लोकं स्वेन पूरयितुं पुरा ।
भरामि त्वपरं रूपं तमसा केवलेन तु।।
सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राञ्चितवरानना ।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।
खगपात्रशिरः खेटेरलङ्कृतमहाभुजा ।
कबन्धहारा शिरसि विभ्राणाहिशिरः स्त्रजम्।।
तामब्रवं वरारोहा तामसीं प्रमोदोत्ताम्।
ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते।।
महाकाली महामाया महामारी क्षुधा तृषा।
निदा कृष्णा चैकवीरा कालरात्रिदुरत्यया ।।
एतानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि नामभि:।
एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम् ।।
अपर्याप्तमिमं सर्ग मन्यमानाहमादिमम्।
सत्त्वोन्मेषमयं रूपं भरामि स्मेन्दुसन्निभम् ।।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी ।
सा बभूव वरा नारी नाम कर्म तदा ह्यदाम् ।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती ।
आर्या ब्राह्मी महाधेनुर्वेदगर्भा च श्रीश्च गीः ।।
नामानुरूपं कर्म स्यात् सात्त्विक्याः कार्यमद्भुतम् ।
वयं तिम्रो जगद्धात्र्यो मातरश्च प्रकीर्तिताः ।।
श्लोकों का हिन्दी अनुवाद
सबका आदि कारण त्रिगुणमयी महेश्वरी मैं महालक्ष्मी हूँ, रजोरूप से अधिष्ठित होकर मैं इच्छानुसार सृष्टि करती हूँ ।
अग्नि और चन्द्रमय भाव से दिव्य स्त्री-पुरूष के लक्षणों से युक्त लोककल्याण की कामना से मैं सर्वांगसुन्दर रूप से शोभायमान होती हूँ।
तपाये हुए सोने के समान वर्ण की, बड़े-बड़े नयनों वाली, चार भुजाओं से युक्त मैं सुशोभित होती हूँ, मेरे चारों हाथों में मातुलुङ्ग, गदा, खेट और अमृतपात्र शोभित रहते हैं ।
महालक्ष्मी नाम से जो विख्यात देवी हैं, वह सर्वागसुन्दरी में ही हूँ, मैं ही महालक्ष्मी, महाश्री, चण्डा, चण्डी तथा चण्डिका हूं।
मैं ही भद्रकाली, भद्रा, काली, दुर्गा, महेश्वरी भगवत्पत्री, त्रिगुणमयी, परा भगवती हूँ।
मेरे इतने नामों के अतिरिक्त अन्य कई नामों से लोग मुझे पुकारते हैं। विकार- योग से जो मेरे रूप नाम हैं उनका वर्णन अब मैं करती हूँ ।
(आद्यामहालक्ष्मी महिमास्तोत्र)
ॐ श्री ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ ह्री श्रीं क्रीं आद्या भगवति परमेश्वरी महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सौ: आद्यामहालक्ष्मी कमलधारिण्यै सिंहवाहिन्यै नमः।
इस स्तोत्र के पाठ से सम्पूर्ण शरीर झनझना जाता है, एक बिजली सी कौंध उठती है और साधक के हृदय में एक परम दिव्य विद्युत के रूप में श्रीलक्ष्मी प्रादुर्भावित हो जाती है। इस स्तोत्र को पढ़कर दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से अगर श्रीयंत्र या शालिग्राम शिला को स्पर्श कर दिया जाये तो उसमें तुरंत लक्ष्मी चैतन्यता, प्राण-प्रतिष्ठित हो जाती है।
( ऐसा सिद्ध साधकों का अनुभव है)
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणाहं महेश्वरी।
रजोरूपमधिष्ठाय सृष्टिमिष्टां करेम्यहम्।।
अग्रीषौममयौ भावो दिव्यौ स्त्रीपुंसलक्षणौ ।
विभ्रति चारूसर्वांंगी लोकानां हितकाम्यया ।।
चतुर्भुजाम् विशालाक्षी तप्तकाञ्चनसन्निभा
मातृलुंगं गदा खेटं सुधापात्रं च विभ्रति।।
महालक्ष्मी: समाख्याता साहं सर्वाङ्गसुन्दरी ।
महाश्रीः सा महालक्ष्मीश्चण्डा चण्डी च चण्डिका ॥
भद्रकाली तथा भद्रा काली दुर्गा महेश्वरी ।
त्रिगुणा भगवत्पत्नी तथा भगवती परा।।
एताः सञ्ज्ञास्तथा चान्यास्तत्र मे बहुधा स्मृताः ।
विकारयोगादन्याश्च तास्ता वक्ष्याम्यशेषतः ।।
लक्षयामि जगत्सर्व पुण्यापुण्ये कृताकृते।
महनीया च सर्वत्र महालक्ष्मी: प्रकीर्तिता ।।
महद्भिः श्रयणीयत्वान्महाश्रीरिति गद्यते।
चण्डस्य दयिता चण्डी चण्डत्वाच्चण्डिका मता ।।
कल्याणरूपा भद्रास्मि काली च कलनात्सताम् ।
द्विषतां कालरूपत्वादपि काली प्रकीर्तिता ।।
सुहृदां द्विषतां चैव युगपत्सदसद्विधेः ।
भद्रकाली समाख्याता मायाश्चर्यगुणात्मिका ॥
महत्वाच्य महामाया मोहनान्मोहिनी मता ।
दुर्गा च दुर्गमत्वेन भक्तरक्षाविधेरपि।।
योजनाच्चैव योगाहं योगमाया च कीर्तिता ।
मायायोगेति विज्ञेया ज्ञानयोजनतो नृणाम् ।।
पूर्णषाड्गुण्यरूपत्वात् साहं भगवती स्मृता ।
भगवद्यज्ञसंयोगात् पत्नी भगवतो ऽस्म्यहम् ॥
विशालत्वात्समृता व्योम पूरणाच्च पुरी स्मृता।
परावरस्वरूपत्वात् स्मृता चाहं परावरा।।
शकनाच्छक्तिरुक्ताह राज्यहं रञ्जनात् सदा।
सदा शांतविकारत्वाच्छान्ताहं परिकीर्तिता ।।
मत्तः प्रक्रियते विश्वं प्रकृतिः सास्मि कीर्तिता ।
श्रयन्ती श्रयणीयास्मि श्रृणामि दुरितं सताम् ।।
श्रृणोमि करुणां वाचं शृणामि च गुणैर्जगत् ।
शयेऽन्तः सर्वभूतानां रमेऽहं पुण्यकर्मणाम्।।
ईडिता च सदा देवैः शरीरं चास्मि वैष्णवम् ।
एतान्मयि गुणान् दृष्ट्वा वेदवेदान्तपारगाः । ।
गुणयोगविधानज्ञाः श्रियं मां सम्प्रचक्षते।
साहमेवंविधा नित्या सर्वाकारा सनातनी ।।
गुणत्रयमधिष्ठात्री त्रिगुणा परिकीर्तितः।
गुणवैषम्यसर्गाय प्रवृत्ताहं सिसृक्षया ।।
तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
निरालोकमिमं लोकं पूरयामि स्वतेजसा ।।
शून्यं तदखिलं लोकं स्वेन पूरयितुं पुरा ।
भरामि त्वपरं रूपं तमसा केवलेन तु।।
सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राञ्चितवरानना ।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।
खगपात्रशिरः खेटेरलङ्कृतमहाभुजा ।
कबन्धहारा शिरसि विभ्राणाहिशिरः स्त्रजम्।।
तामब्रवं वरारोहा तामसीं प्रमोदोत्ताम्।
ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते।।
महाकाली महामाया महामारी क्षुधा तृषा।
निदा कृष्णा चैकवीरा कालरात्रिदुरत्यया ।।
एतानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि नामभि:।
एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम् ।।
अपर्याप्तमिमं सर्ग मन्यमानाहमादिमम्।
सत्त्वोन्मेषमयं रूपं भरामि स्मेन्दुसन्निभम् ।।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी ।
सा बभूव वरा नारी नाम कर्म तदा ह्यदाम् ।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती ।
आर्या ब्राह्मी महाधेनुर्वेदगर्भा च श्रीश्च गीः ।।
नामानुरूपं कर्म स्यात् सात्त्विक्याः कार्यमद्भुतम् ।
वयं तिम्रो जगद्धात्र्यो मातरश्च प्रकीर्तिताः ।।
श्लोकों का हिन्दी अनुवाद
सबका आदि कारण त्रिगुणमयी महेश्वरी मैं महालक्ष्मी हूँ, रजोरूप से अधिष्ठित होकर मैं इच्छानुसार सृष्टि करती हूँ ।
अग्नि और चन्द्रमय भाव से दिव्य स्त्री-पुरूष के लक्षणों से युक्त लोककल्याण की कामना से मैं सर्वांगसुन्दर रूप से शोभायमान होती हूँ।
तपाये हुए सोने के समान वर्ण की, बड़े-बड़े नयनों वाली, चार भुजाओं से युक्त मैं सुशोभित होती हूँ, मेरे चारों हाथों में मातुलुङ्ग, गदा, खेट और अमृतपात्र शोभित रहते हैं ।
महालक्ष्मी नाम से जो विख्यात देवी हैं, वह सर्वागसुन्दरी में ही हूँ, मैं ही महालक्ष्मी, महाश्री, चण्डा, चण्डी तथा चण्डिका हूं।
मैं ही भद्रकाली, भद्रा, काली, दुर्गा, महेश्वरी भगवत्पत्री, त्रिगुणमयी, परा भगवती हूँ।
मेरे इतने नामों के अतिरिक्त अन्य कई नामों से लोग मुझे पुकारते हैं। विकार- योग से जो मेरे रूप नाम हैं उनका वर्णन अब मैं करती हूँ ।
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आत्मनिरीक्षण
दो आदमी यात्रा पर निकले! दोनों की मुलाकात हुई, दोनों का गंतव्य एक था तो दोनों यात्रा में साथ हो चले।
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सात दिन बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा: भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे क्या आपने मुझे पहचाना?
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दूसरे ने कहा: नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।
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पहला यात्री बोला: महोदय मैं आपके शहर का नामी ठग हूँ परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरू निकले।
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दूसरे यात्री बोला: कैसे?
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पहला यात्री: कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला।
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इतने दिन साथ रहने के बाद मुझे यह पता है आप बहुत धनी व्यक्ति हैं और इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है? बिल्कुल खाली हाथ हैं!
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दूसरा यात्री: मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी है।
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पहला यात्री बोला: तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?
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दूसरा यात्री: मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और मुद्राएं तुम्हारी पोटली में रख देता था और तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे।
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अपनी पोटली सँभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तो फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से!
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ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी झोल़ी मे डालते हैं परन्तु हमें अपनी गठरी पर निगाह डालने की फुर्सत ही नहीं है, यही सबकी मूलभूत समस्या है।
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जिस दिन से इंसान दूसरे की ताकझाख बंद कर देगा उस क्षण सारी समस्या का समाधान हो जाऐगा।
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अपनी गठरी टटोलें! जीवन में सबसे बड़ा गूढ मंत्र है स्वयं को टटोले और जीवन-पथ पर आगे बढ़े.. सफलताये आप की प्रतीक्षा में है।
दो आदमी यात्रा पर निकले! दोनों की मुलाकात हुई, दोनों का गंतव्य एक था तो दोनों यात्रा में साथ हो चले।
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सात दिन बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा: भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे क्या आपने मुझे पहचाना?
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दूसरे ने कहा: नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।
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पहला यात्री बोला: महोदय मैं आपके शहर का नामी ठग हूँ परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरू निकले।
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दूसरे यात्री बोला: कैसे?
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पहला यात्री: कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला।
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इतने दिन साथ रहने के बाद मुझे यह पता है आप बहुत धनी व्यक्ति हैं और इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है? बिल्कुल खाली हाथ हैं!
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दूसरा यात्री: मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी है।
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पहला यात्री बोला: तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?
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दूसरा यात्री: मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और मुद्राएं तुम्हारी पोटली में रख देता था और तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे।
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अपनी पोटली सँभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तो फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से!
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ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी झोल़ी मे डालते हैं परन्तु हमें अपनी गठरी पर निगाह डालने की फुर्सत ही नहीं है, यही सबकी मूलभूत समस्या है।
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जिस दिन से इंसान दूसरे की ताकझाख बंद कर देगा उस क्षण सारी समस्या का समाधान हो जाऐगा।
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अपनी गठरी टटोलें! जीवन में सबसे बड़ा गूढ मंत्र है स्वयं को टटोले और जीवन-पथ पर आगे बढ़े.. सफलताये आप की प्रतीक्षा में है।
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अचानक सिद्धि कैसे प्राप्त हो जाती है रहस्य
क्या तुमने प्राकृतिक को अपने जैसा जड़ बुद्धि मान लिया हैं हां भाई वाकई में मान ही लिया है इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है क्योंकि अगर नही मानते तो लालच, स्वार्थ, और अनेकों बुराई लेकर साधना के छेत्र में सिद्धि के उद्देश्य हेतु प्रवेश करते इससे जायदा बड़ी जड़ता और बेवकूफी क्या हो सकती है स्वय विचार करो
अगर किसी के अंदर कोई स्वार्थ, बुराई, अवगुणी प्रवृति है और उसी दौरान अगर उसे कोई सिद्धि प्राप्त हो गई तो क्या उसका सदुपयोग संभव हैं पहली बात तो उसके रहते कोई सात्यिक सिद्धि की प्राप्ति होती नही हैं क्योंकि ये सभी चित्त को बांधने की कार्य करती है सिद्धि मुक्त मन अर्थात चेतना की विकसित अवस्था होती अर्थात मन को वो हिस्सा जो बंधन के रहते हुए सुप्त हो चुका है चित्त विषय रूपी माया के चक्रव्यूह से निकल कर कभी वहां तक पहुंचा ही नही इसलिए वो स्थान सुप्त पड़ी रहती है जब तक अवगुणी और विषयक प्रवृति चित्त में आवरण स्वरूप स्थित है तब तक चित्त उससे मुक्त होकर चेतना की उस अवस्था को कभी भेद ही नही पाएगा
और आए दिन अनेकों लोगो के द्वारा अनेकों सिद्धि जागरण करवाने की।दावे शिविर लगाए जाते है लोगो को आकर्षित किए जाते है और १०० में से ९५ प्रतिशत लोग उसी आकर्षण में फंस कर साधना के छेत्र में प्रवेश करते है और ऐसे ऐसे ढोंगी पाखंडी के सदयंत्र का शिकार होते रहते हैं
जो साधक साधना को अपने मुक्ति का उद्देश्य उस अनंत सत्ता से एकाकार और अपनी ध्येय को विराटता प्रदान करने की नियत से प्रवेश करते ईश्वर के प्रति सच्ची व्याकुलता, और प्रेम रखते है वो कभी इस तरह के आकर्षण और सिद्धि के लोभ में साधना में प्रवेश नही करते और न ही उनकी दृष्टि साधना के प्रति इस तरह की होती है और सच बोलूं तो ऐसे ही साधक को।बिना मांगे बिना उनकी ईक्षा की उन्हें सर्वस्व की प्राप्ति ईश्वर की प्राप्ति और परम मुक्ति अवश्य प्राप्त होती हैं
क्या तुमने प्राकृतिक को अपने जैसा जड़ बुद्धि मान लिया हैं हां भाई वाकई में मान ही लिया है इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है क्योंकि अगर नही मानते तो लालच, स्वार्थ, और अनेकों बुराई लेकर साधना के छेत्र में सिद्धि के उद्देश्य हेतु प्रवेश करते इससे जायदा बड़ी जड़ता और बेवकूफी क्या हो सकती है स्वय विचार करो
अगर किसी के अंदर कोई स्वार्थ, बुराई, अवगुणी प्रवृति है और उसी दौरान अगर उसे कोई सिद्धि प्राप्त हो गई तो क्या उसका सदुपयोग संभव हैं पहली बात तो उसके रहते कोई सात्यिक सिद्धि की प्राप्ति होती नही हैं क्योंकि ये सभी चित्त को बांधने की कार्य करती है सिद्धि मुक्त मन अर्थात चेतना की विकसित अवस्था होती अर्थात मन को वो हिस्सा जो बंधन के रहते हुए सुप्त हो चुका है चित्त विषय रूपी माया के चक्रव्यूह से निकल कर कभी वहां तक पहुंचा ही नही इसलिए वो स्थान सुप्त पड़ी रहती है जब तक अवगुणी और विषयक प्रवृति चित्त में आवरण स्वरूप स्थित है तब तक चित्त उससे मुक्त होकर चेतना की उस अवस्था को कभी भेद ही नही पाएगा
और आए दिन अनेकों लोगो के द्वारा अनेकों सिद्धि जागरण करवाने की।दावे शिविर लगाए जाते है लोगो को आकर्षित किए जाते है और १०० में से ९५ प्रतिशत लोग उसी आकर्षण में फंस कर साधना के छेत्र में प्रवेश करते है और ऐसे ऐसे ढोंगी पाखंडी के सदयंत्र का शिकार होते रहते हैं
जो साधक साधना को अपने मुक्ति का उद्देश्य उस अनंत सत्ता से एकाकार और अपनी ध्येय को विराटता प्रदान करने की नियत से प्रवेश करते ईश्वर के प्रति सच्ची व्याकुलता, और प्रेम रखते है वो कभी इस तरह के आकर्षण और सिद्धि के लोभ में साधना में प्रवेश नही करते और न ही उनकी दृष्टि साधना के प्रति इस तरह की होती है और सच बोलूं तो ऐसे ही साधक को।बिना मांगे बिना उनकी ईक्षा की उन्हें सर्वस्व की प्राप्ति ईश्वर की प्राप्ति और परम मुक्ति अवश्य प्राप्त होती हैं
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कहानी का समय
सुखी आदमी के जूते
*एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और बोला, गुरुदेव, दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए। शिष्य ने थोड़े शब्दों में बहुत बड़ा प्रश्न किया था। दुखों की दुनिया में जीना लेकिन उसी से मुक्ति का उपाय भी ढूंढना! बहुत मुश्किल प्रश्न था।*
*गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके पहने हुए जूते लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा।*
*शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। अपने जूते सिर्फ आज के लिए मुझे दे दो।*
*उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा पड़ोसी इतना बदमाश है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं।*
*वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं। ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि कहीं जाकर साधु बन जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ।*
*वह तीसरे घर गया, चैथे घर गया। किसी की पत्नी के पास गया तो वह पति को क्रूर बताती, पति के पास गया तो वह पत्नी को दोषी कहता। पिता के पास गया तो वह पुत्र को बदमाश बताता। पुत्र के पास गया तो पिता की वजह से खुद को दुखी बताता। सैकड़ों-हजारों घरों के चक्कर लगा आया। सुखी आदमी के जूते मिलना तो दूर खुद के ही जूते घिस गए।*
*शाम को वह गुरु के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया। न तो कोई सुखी मिला और न सुखी आदमी के जूते।*
*गुरु ने पूछा, लोग क्यों दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है?*
*उसने कहा, किसी का पड़ोसी खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है। आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुख भोग रहा है।*
*गुरु ने बताया, सुख का सूत्र है - दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो। खुद में झांको। खुद की काबिलियत पर गौर करो। प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं। जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो। खुद को सुनो, खुद को देखो। यही सुख का सूत्र है।*
*शिष्य बोला, महाराज, बात तो आपकी सत्य है लेकिन यही आप मुझे सुबह भी बता सकते थे। फिर इतनी परिक्रमा क्यों करवाई?*
*गुरु ने कहा, वत्स, सत्य दुष्पाच्य होता है। वह सीधा नहीं पचता। अगर यह बात मैं सुबह बता देता तो तू हर्गिज नहीं मानता। जब स्वयं अनुभव कर लिया, सबकी परिक्रमा कर ली, सबके चक्कर लगा लिए, तो बात समझ में आ गई। अब ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे।*
*जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो।*
सुखी आदमी के जूते
*एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और बोला, गुरुदेव, दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए। शिष्य ने थोड़े शब्दों में बहुत बड़ा प्रश्न किया था। दुखों की दुनिया में जीना लेकिन उसी से मुक्ति का उपाय भी ढूंढना! बहुत मुश्किल प्रश्न था।*
*गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके पहने हुए जूते लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा।*
*शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। अपने जूते सिर्फ आज के लिए मुझे दे दो।*
*उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा पड़ोसी इतना बदमाश है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं।*
*वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं। ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि कहीं जाकर साधु बन जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ।*
*वह तीसरे घर गया, चैथे घर गया। किसी की पत्नी के पास गया तो वह पति को क्रूर बताती, पति के पास गया तो वह पत्नी को दोषी कहता। पिता के पास गया तो वह पुत्र को बदमाश बताता। पुत्र के पास गया तो पिता की वजह से खुद को दुखी बताता। सैकड़ों-हजारों घरों के चक्कर लगा आया। सुखी आदमी के जूते मिलना तो दूर खुद के ही जूते घिस गए।*
*शाम को वह गुरु के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया। न तो कोई सुखी मिला और न सुखी आदमी के जूते।*
*गुरु ने पूछा, लोग क्यों दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है?*
*उसने कहा, किसी का पड़ोसी खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है। आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुख भोग रहा है।*
*गुरु ने बताया, सुख का सूत्र है - दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो। खुद में झांको। खुद की काबिलियत पर गौर करो। प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं। जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो। खुद को सुनो, खुद को देखो। यही सुख का सूत्र है।*
*शिष्य बोला, महाराज, बात तो आपकी सत्य है लेकिन यही आप मुझे सुबह भी बता सकते थे। फिर इतनी परिक्रमा क्यों करवाई?*
*गुरु ने कहा, वत्स, सत्य दुष्पाच्य होता है। वह सीधा नहीं पचता। अगर यह बात मैं सुबह बता देता तो तू हर्गिज नहीं मानता। जब स्वयं अनुभव कर लिया, सबकी परिक्रमा कर ली, सबके चक्कर लगा लिए, तो बात समझ में आ गई। अब ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे।*
*जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो।*
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कहानी का समय
सदा मधुर बोलना
एक राजा थे। वन-विहार को निकले। रास्ते में प्यास लगी। नजर दौड़ाई एक अन्धे की झोपड़ी दिखी। उसमें जल भरा घड़ा दूर से ही दिख रहा था। राजा ने सिपाही को भेजा और एक लोटा जल माँग लाने के लिए कहा। सिपाही वहाँ पहुँचा और बोला- ऐ अन्धे एक लोटा पानी दे दे। अन्धा अकड़ू था। उसने तुरन्त कहा- चल-चल तेरे जैसे सिपाहियों से मैं नहीं डरता। पानी तुझे नहीं दूँगा। सिपाही निराश लौट पड़ा। इसके बाद सेनापति को पानी लाने के लिए भेजा गया। सेनापति ने समीप जाकर कहा- अन्धे ! पैसा मिलेगा पानी दे।
अन्धा फिर अकड़ पड़ा। उसने कहा, पहले वाले का यह सरदार मालूम पड़ता है। फिर भी चुपड़ी बातें बना कर दबाव डालता है, जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा। सेनापति को भी खाली हाथ लौटता देखकर राजा स्वयं चल पड़े। समीप पहुँचकर वृद्ध जन को सर्वप्रथम नमस्कार किया और कहा- ‘प्यास से गला सूख रहा है। एक लोटा जल दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।’ अंधे ने सत्कारपूर्वक उन्हें पास बिठाया और कहा- ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों का राजा जैसा आदर है। जल तो क्या मेरा शरीर भी स्वागत में हाजिर है। कोई और भी सेवा हो तो बतायें।
राजा ने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई फिर नम्र वाणी में पूछा- ‘आपको तो दिखाई पड़ नहीं रहा है फिर जल माँगने वालों को सिपाही, सरदार और राजा के रूप में कैसे पहचान पाये?’ अन्धे ने कहा- ‘वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है।
*शिक्षा:-*
सदैव मीठा वचन बोलना चाहिए, इससे सभी जगह आदर, प्यार, स्नेह प्राप्त होता है.
सदा मधुर बोलना
एक राजा थे। वन-विहार को निकले। रास्ते में प्यास लगी। नजर दौड़ाई एक अन्धे की झोपड़ी दिखी। उसमें जल भरा घड़ा दूर से ही दिख रहा था। राजा ने सिपाही को भेजा और एक लोटा जल माँग लाने के लिए कहा। सिपाही वहाँ पहुँचा और बोला- ऐ अन्धे एक लोटा पानी दे दे। अन्धा अकड़ू था। उसने तुरन्त कहा- चल-चल तेरे जैसे सिपाहियों से मैं नहीं डरता। पानी तुझे नहीं दूँगा। सिपाही निराश लौट पड़ा। इसके बाद सेनापति को पानी लाने के लिए भेजा गया। सेनापति ने समीप जाकर कहा- अन्धे ! पैसा मिलेगा पानी दे।
अन्धा फिर अकड़ पड़ा। उसने कहा, पहले वाले का यह सरदार मालूम पड़ता है। फिर भी चुपड़ी बातें बना कर दबाव डालता है, जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा। सेनापति को भी खाली हाथ लौटता देखकर राजा स्वयं चल पड़े। समीप पहुँचकर वृद्ध जन को सर्वप्रथम नमस्कार किया और कहा- ‘प्यास से गला सूख रहा है। एक लोटा जल दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।’ अंधे ने सत्कारपूर्वक उन्हें पास बिठाया और कहा- ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों का राजा जैसा आदर है। जल तो क्या मेरा शरीर भी स्वागत में हाजिर है। कोई और भी सेवा हो तो बतायें।
राजा ने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई फिर नम्र वाणी में पूछा- ‘आपको तो दिखाई पड़ नहीं रहा है फिर जल माँगने वालों को सिपाही, सरदार और राजा के रूप में कैसे पहचान पाये?’ अन्धे ने कहा- ‘वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है।
*शिक्षा:-*
सदैव मीठा वचन बोलना चाहिए, इससे सभी जगह आदर, प्यार, स्नेह प्राप्त होता है.
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हमारे जीवन का बस एक ही उद्देश्य होना चाहिए वो केवल अपने इष्ट देव भगवान की पूजा करना। केवल भगवान ही है जो हमें इस भवसागर से सदा के लिए पार लगा सकते है। श्रीमद भागवत यानि श्री माने लक्ष्मी और मद माने अहंकार, जिनको लक्ष्मी का अहंकार हो अथवा जिसको किसी वास्तु का अहंकार हो जैसे रूप का, धन का, जवानी का, भक्ति का भी अभिमान हो, उनको श्रीमद भागवत सुननी चाहिए। श्रीमद भागवत सुनने से उनका अहंकार दूर हो जायेगा।
भक्ति में जो मुख्य बाधा होती है वो अहंकार ही होता है। हमारे और भगवान के बीच में अगर कोई भी सबसे बड़ी बाधा होती है तो वो केवल अहंकार ही होती है। अहंकार जब हमको आ जाता है तो हमारे और भगवान के बीच में बाधा आ जाती है। हम दोनों के बीच में एक अहंकार की दीवार आ जाती है। लेकिन दीवार के उस पर जो मेरे गोविन्द जी खड़े है वो ये सोचते है कि कब ये इस अहंकार की दीवार को तोड़े और मैं इसको अपने दर्शन दूँ।
ऐसा हो ही नहीं पाता है। ऐसा इसलिए नहीं हो पाता है क्योँकि हम तो अपने आप में ही व्यस्त रहते है। अपने आप में ही खोये रहते है। अहंकार को दिन प्रतिदिन बढ़ाते ही रहते है। जैसे ही महाराज श्री ने कल की कथा में कहा था कि रावण को मैंने नहीं मारा था उसको तो उसकी "मैं" ने ही मारा था। अब तो हमारे सनातन धर्म के कई लोग पहले तो केवल भोजन ही कर लिया करते थे पर अब तो कई लोग भगवान की पूजा भी कर देते है मंदिर में जुटे और चप्पल पहनकर।
इन सब को देखकर तो मेरे मन को बड़ा ही कष्ट होता है। अगर हम ही अपने भगवान का मान सम्मान नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? हम सब की तो ये पहली रेस्पोंसिब्लिटी होती है की हमको तो अपने भगवान का सम्मान तो करना ही चाहिए तभी तो हमारा सब लोग सम्मान करेंगे। भगवान को हमारी तुम्हारी जरुरत नहीं होती है। केवल हम को ही भगवान की जरुरत होती है। क्या भगवान हमारे जाने से और भी महान हो जायेगा, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा। भगवान तो जैसे थे वैसे ही बने रहेंगे।
आप विश्वास मानिये भगवान के एक ही संकल्प से ही यह पृथ्वी क्षण भर में ही नष्ट हो सकती है। और दूसरे ही संकल्प मात्र से ही उसी दुनिया का फिर से सृजन हो सकता है। तो श्रीमद भागवत हमें सिखाती है कि हमें अहंकार से दूर ही रहना चाहिए। अगर हम भगवान के मंदिर में जाएँ तो हमारे पैर में जूते और चप्पल न हो। भगवान के मंदिर में जाये तो चमड़े की बेल्ट और पर्स भी न हो। और सदा ही भगवान के मंदिर में पूरी श्रद्धा भाव से ही मंदिर में जाना चाहिए।
कल की कथा में परीक्षित राजा शुकदेव जी महाराज से कहते है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए। यहाँ पर एक बात तो पक्की थी कि राजा के पास तो सात दिन थे ही क्योँकि उनको तो सातवें दिन की मृत्यु का श्राप लगा था। अब क्या हमें इस बात का विश्वास है कि क्या हमारे पास वो सात दिन भी है की नहीं है। जब हमको ये पता ही नहीं है की क्या हमारे पास सात दिन है भी की नहीं है तो हमें किस बात का घमंड है।
आप याद रखिये की मृत्यु के तीन वजह पक्की होती है और वो है समय, स्थान और कारण। हमको अपनी मृत्यु को शोक नहीं बनाना चाहिए, मृत्यु को तो हमें उत्सव बनाना चाहिए। मेरे जाने के बाद चाहे दुनिया रोये लेकिन मुझे न रोना पड़े, यहाँ या वहां। सपोज करो की कोई आपको बता दे की आज आपका आखिरी दिन है तो इस आखिरी दिन में आप क्या करना चाहोगे। तो इस के लिए आप सोचो बैठा कर थोड़ी देर ठन्डे दिमाग से। अपना अच्छे से अच्छा सोचो की हमको क्या करना चाहिए।
भक्ति में जो मुख्य बाधा होती है वो अहंकार ही होता है। हमारे और भगवान के बीच में अगर कोई भी सबसे बड़ी बाधा होती है तो वो केवल अहंकार ही होती है। अहंकार जब हमको आ जाता है तो हमारे और भगवान के बीच में बाधा आ जाती है। हम दोनों के बीच में एक अहंकार की दीवार आ जाती है। लेकिन दीवार के उस पर जो मेरे गोविन्द जी खड़े है वो ये सोचते है कि कब ये इस अहंकार की दीवार को तोड़े और मैं इसको अपने दर्शन दूँ।
ऐसा हो ही नहीं पाता है। ऐसा इसलिए नहीं हो पाता है क्योँकि हम तो अपने आप में ही व्यस्त रहते है। अपने आप में ही खोये रहते है। अहंकार को दिन प्रतिदिन बढ़ाते ही रहते है। जैसे ही महाराज श्री ने कल की कथा में कहा था कि रावण को मैंने नहीं मारा था उसको तो उसकी "मैं" ने ही मारा था। अब तो हमारे सनातन धर्म के कई लोग पहले तो केवल भोजन ही कर लिया करते थे पर अब तो कई लोग भगवान की पूजा भी कर देते है मंदिर में जुटे और चप्पल पहनकर।
इन सब को देखकर तो मेरे मन को बड़ा ही कष्ट होता है। अगर हम ही अपने भगवान का मान सम्मान नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? हम सब की तो ये पहली रेस्पोंसिब्लिटी होती है की हमको तो अपने भगवान का सम्मान तो करना ही चाहिए तभी तो हमारा सब लोग सम्मान करेंगे। भगवान को हमारी तुम्हारी जरुरत नहीं होती है। केवल हम को ही भगवान की जरुरत होती है। क्या भगवान हमारे जाने से और भी महान हो जायेगा, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा। भगवान तो जैसे थे वैसे ही बने रहेंगे।
आप विश्वास मानिये भगवान के एक ही संकल्प से ही यह पृथ्वी क्षण भर में ही नष्ट हो सकती है। और दूसरे ही संकल्प मात्र से ही उसी दुनिया का फिर से सृजन हो सकता है। तो श्रीमद भागवत हमें सिखाती है कि हमें अहंकार से दूर ही रहना चाहिए। अगर हम भगवान के मंदिर में जाएँ तो हमारे पैर में जूते और चप्पल न हो। भगवान के मंदिर में जाये तो चमड़े की बेल्ट और पर्स भी न हो। और सदा ही भगवान के मंदिर में पूरी श्रद्धा भाव से ही मंदिर में जाना चाहिए।
कल की कथा में परीक्षित राजा शुकदेव जी महाराज से कहते है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए। यहाँ पर एक बात तो पक्की थी कि राजा के पास तो सात दिन थे ही क्योँकि उनको तो सातवें दिन की मृत्यु का श्राप लगा था। अब क्या हमें इस बात का विश्वास है कि क्या हमारे पास वो सात दिन भी है की नहीं है। जब हमको ये पता ही नहीं है की क्या हमारे पास सात दिन है भी की नहीं है तो हमें किस बात का घमंड है।
आप याद रखिये की मृत्यु के तीन वजह पक्की होती है और वो है समय, स्थान और कारण। हमको अपनी मृत्यु को शोक नहीं बनाना चाहिए, मृत्यु को तो हमें उत्सव बनाना चाहिए। मेरे जाने के बाद चाहे दुनिया रोये लेकिन मुझे न रोना पड़े, यहाँ या वहां। सपोज करो की कोई आपको बता दे की आज आपका आखिरी दिन है तो इस आखिरी दिन में आप क्या करना चाहोगे। तो इस के लिए आप सोचो बैठा कर थोड़ी देर ठन्डे दिमाग से। अपना अच्छे से अच्छा सोचो की हमको क्या करना चाहिए।
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"ईश्वर ने बहुत अच्छी व्यवस्था बनाई है, कि हम पिछले जन्मों की बातें भूल जाते हैं। यदि पिछले जन्मों की बातें याद आने लगें, तो जीना कठिन हो जाएगा।"
हम देखते हैं, कि इसी जन्म में व्यक्ति अपने जीवन की 2/4 दुखदायक घटनाओं को याद कर करके इतना दुखी हो जाता है, परेशान हो जाता है, कि कभी-कभी तो वह आत्महत्या तक कर लेता है। "जबकि ऐसा करना उचित नहीं है। क्योंकि यह ईश्वरीय तथा शासकीय संविधान दोनों के विरुद्ध होने से अपराध है। और इसका आगे चलकर दंड भी मिलेगा। यदि आत्महत्या करने वाला बच गया, तो प्रशासन उसे दंडित करेगा। और यदि वह मर गया, तो ईश्वर दंड देगा।"
जब यहां इसी जन्म के दुखों को याद कर करके यह परिणाम है, यदि पिछले 8/10 जन्मों के दुख और याद आ गए, तो आप सोचिए व्यक्ति कैसे जी पाएगा? "इसी कारण से ईश्वर ने यह बहुत अच्छी व्यवस्था बनाई है, कि व्यक्ति पिछले जन्मों की बातों को भूल जाए, और वर्तमान जीवन को ठीक प्रकार से जी सके।"
अब जैसे हम पिछले जन्मों की बातों को भूल जाते हैं, तो इस जन्म में ठीक प्रकार से जी पा रहे हैं। "इसी व्यवस्था को प्रतिदिन के लिए भी लागू करें। अर्थात पिछले दिन की दुखदायक घटनाओं को भूल जाएं, उनको याद न करके, आज का दिन नए उत्साह से जिएं। हां, इतना ध्यान जरूर रखें, पिछली दुखदायक घटनाओं से इतनी शिक्षा अवश्य लेवें, कि पहले जो गलतियां हो गई, उन्हें दोबारा नहीं करेंगे।" "पिछली गलतियों से इतनी शिक्षा लेकर आगे फिर उत्तम योजना बनाकर अपना काम बुद्धिमत्ता से करें। तभी आप का जीवन सुखमय हो सकता है।"
हम देखते हैं, कि इसी जन्म में व्यक्ति अपने जीवन की 2/4 दुखदायक घटनाओं को याद कर करके इतना दुखी हो जाता है, परेशान हो जाता है, कि कभी-कभी तो वह आत्महत्या तक कर लेता है। "जबकि ऐसा करना उचित नहीं है। क्योंकि यह ईश्वरीय तथा शासकीय संविधान दोनों के विरुद्ध होने से अपराध है। और इसका आगे चलकर दंड भी मिलेगा। यदि आत्महत्या करने वाला बच गया, तो प्रशासन उसे दंडित करेगा। और यदि वह मर गया, तो ईश्वर दंड देगा।"
जब यहां इसी जन्म के दुखों को याद कर करके यह परिणाम है, यदि पिछले 8/10 जन्मों के दुख और याद आ गए, तो आप सोचिए व्यक्ति कैसे जी पाएगा? "इसी कारण से ईश्वर ने यह बहुत अच्छी व्यवस्था बनाई है, कि व्यक्ति पिछले जन्मों की बातों को भूल जाए, और वर्तमान जीवन को ठीक प्रकार से जी सके।"
अब जैसे हम पिछले जन्मों की बातों को भूल जाते हैं, तो इस जन्म में ठीक प्रकार से जी पा रहे हैं। "इसी व्यवस्था को प्रतिदिन के लिए भी लागू करें। अर्थात पिछले दिन की दुखदायक घटनाओं को भूल जाएं, उनको याद न करके, आज का दिन नए उत्साह से जिएं। हां, इतना ध्यान जरूर रखें, पिछली दुखदायक घटनाओं से इतनी शिक्षा अवश्य लेवें, कि पहले जो गलतियां हो गई, उन्हें दोबारा नहीं करेंगे।" "पिछली गलतियों से इतनी शिक्षा लेकर आगे फिर उत्तम योजना बनाकर अपना काम बुद्धिमत्ता से करें। तभी आप का जीवन सुखमय हो सकता है।"
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असल में आप ईश्वर की कृपा पर विश्वास करेंगे, तो आप जहाँ भी देखेंगे वहाँ ही आपको “कृपा” मालूम पड़ेगी! बस, कृपा-ही-कृपा,कृपा-ही-कृपा! प्रभु की मूर्ति कृपामयी है. प्रभु के पास कृपा के सिवाय और कोई पूंजी है ही नहीं. केवल कृपा है!! कृपा है!! कृपा है!!
आशा है आपको यह कथा प्रेरक और उपयोगी लगी होगी.
आशा है आपको यह कथा प्रेरक और उपयोगी लगी होगी.
❤6
कहानी का समय
ईश्वर की कृपा
संतों की एक सभा चल रही थी. किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें.
संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था. उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे.
वह सोचने लगा- अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है! एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा. संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा. ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है.
घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था. किसी काम का नहीं था. कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है.
फिर एक दिन एक कुम्हार आया.
उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया. वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा. फिर पानी डालकर गूंथा. चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा. फिर थापी मार-मारकर बराबर किया.
बात यहीं नहीं रूकी. उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को
इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया. वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये!
मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था.
रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो. मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है! भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी!
किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया. तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी.
उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी.
आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी. अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी!
परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं. विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की.
इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते. बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे.
पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे?
आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो. कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा.
ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है. किसी के साथ देर तो किसी के साथ सबेर.
यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है. घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है.
तो क्या करना चाहिए? धैर्य कैसे रखना चाहिए? इंसान है तो उसका टूटना स्वाभाविक है पर नहीं टूटे इसके लिए क्या करें?
संतोष का मार्ग ही विकल्प है. जो प्राप्त है वह भी पर्याप्त है जब यह सोचना शुरू कर देंगे तो आत्मिक आनंद मिलने लगा.
संसार का सबसे बड़ा सुखी वह है जो मन के मौज में रहता है. आप यह क्यों नहीं सोचते कि ईश्वर ने आपको जितना दिया है संसार में अनगिनत लोग हैं उन्हें तो उतना भी नहीं मिला है. बस उसे क्यों देखते हो जिसे आपसे ज्यादा प्राप्त है.
जो प्राप्त है उसमें भी जो मस्ती की धुन में रमा रहता है वही सच्चा सुखी है. निन्यान्वे के फेर में पड़ने से खुशिया रफूचक्कर हो जाती हैं.
आपने नीम करौली बाबा के बारे में सुना होगा.
दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपति जिनसे एक मुलाकात के लिए लोग वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं, जाने क्या-क्या तिकड़म लगाते हैं. एक इशारे पर वे धनिक सबकुछ बाबा के चरणों में समर्पित करने को आतुर थे वे बाबा बस एक जोड़ी कपड़े में रहते थे, एक ही कंबल था, एक खाट और दो-एक बर्तन.
सोचना जरा आप धन से ही सारे सुख होते तो वे लोग बाबा के चरणों में क्यों लोट रहे होते. त्याग और संतोष का भाव ही इंसान को देवत्व की ओर ले जाता है. ये मिल जाए, वो मिल जाए का भाव आसुरी प्रवृतियों को जन्म देता है. इस आपाधापी में ही पापकर्म होते हैं.
ईश्वर की कृपा
संतों की एक सभा चल रही थी. किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें.
संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था. उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे.
वह सोचने लगा- अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है! एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा. संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा. ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है.
घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था. किसी काम का नहीं था. कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है.
फिर एक दिन एक कुम्हार आया.
उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया. वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा. फिर पानी डालकर गूंथा. चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा. फिर थापी मार-मारकर बराबर किया.
बात यहीं नहीं रूकी. उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को
इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया. वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये!
मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था.
रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो. मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है! भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी!
किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया. तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी.
उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी.
आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी. अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी!
परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं. विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की.
इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते. बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे.
पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे?
आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो. कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा.
ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है. किसी के साथ देर तो किसी के साथ सबेर.
यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है. घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है.
तो क्या करना चाहिए? धैर्य कैसे रखना चाहिए? इंसान है तो उसका टूटना स्वाभाविक है पर नहीं टूटे इसके लिए क्या करें?
संतोष का मार्ग ही विकल्प है. जो प्राप्त है वह भी पर्याप्त है जब यह सोचना शुरू कर देंगे तो आत्मिक आनंद मिलने लगा.
संसार का सबसे बड़ा सुखी वह है जो मन के मौज में रहता है. आप यह क्यों नहीं सोचते कि ईश्वर ने आपको जितना दिया है संसार में अनगिनत लोग हैं उन्हें तो उतना भी नहीं मिला है. बस उसे क्यों देखते हो जिसे आपसे ज्यादा प्राप्त है.
जो प्राप्त है उसमें भी जो मस्ती की धुन में रमा रहता है वही सच्चा सुखी है. निन्यान्वे के फेर में पड़ने से खुशिया रफूचक्कर हो जाती हैं.
आपने नीम करौली बाबा के बारे में सुना होगा.
दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपति जिनसे एक मुलाकात के लिए लोग वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं, जाने क्या-क्या तिकड़म लगाते हैं. एक इशारे पर वे धनिक सबकुछ बाबा के चरणों में समर्पित करने को आतुर थे वे बाबा बस एक जोड़ी कपड़े में रहते थे, एक ही कंबल था, एक खाट और दो-एक बर्तन.
सोचना जरा आप धन से ही सारे सुख होते तो वे लोग बाबा के चरणों में क्यों लोट रहे होते. त्याग और संतोष का भाव ही इंसान को देवत्व की ओर ले जाता है. ये मिल जाए, वो मिल जाए का भाव आसुरी प्रवृतियों को जन्म देता है. इस आपाधापी में ही पापकर्म होते हैं.
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इस शोक पूर्ण घटना के कई दिन बाद जबकि दुखी दिल सम्हलने लगा, एक रोज हम दोनों नदी की सैर को गये। शाम का वक्त था। नदी कहीं सुनहरी, कहीं नीली, कहीं काली, किसी थके हुए मुसाफिर की तरह धीरे-धीरे बह रही थी। हम दूर जाकर एक टीले पर बैठ गये लेकिन बातचीत करने को जी न चाहता था। नदी के मौन प्रवाह ने हमको भी अपने विचारों में डुबो दिया। नदी की लहरें विचारों की लहरों को पैदा कर देती हैं। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि प्यारी चन्द्रमुखी लहरों की गोद में बैठी मुस्करा रही है। मैं चौंक पड़ा ओर अपने आँसुओं को छिपाने के लिए नदी में मुंह धोने लगा। साईंदयाल ने कहा—भाईसाहब, दिल को मजबूत करो। इस तरह कुढ़ोगे तो जरूर बीमार हो जाओगे।
मैंने जवाब दिया—ईश्वर ने जितना संयम तुम्हें दिया है, उसमें से थोड़ा-सा मुझे भी दे दो, मेरे दिल में इतनी ताकत कहॉँ।
साईंदयाल मुस्कराकर मेरी तरफ ताकने लगे।
मैंने उसी सिलसिले में कहा—किताबों में तो दृढ़ता और संतोष की बहुत-सी कहानियॉँ पढ़ी हैं मगर सच मानों कि तुम जैसा दृढ़, कठिनाइयों में सीधा खड़ा रहने वाला आदमी आज तक मेरी नजर से नहीं गुजरा। तुम जानते हो कि मुझे मानव स्वभाव के अध्ययन का हमेशा से शौक है लेकिन मेरे अनुभव में तुम अपनी तरह के अकेले आदमी हो। मैं यह न मानूँगा कि तुम्हारे दिल में दर्द और घुलावट नहीं है। उसे मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ। फिर इस ज्ञानियों जैसे संतोष और शान्ति का रहस्य तुमने कहॉँ छिपा रक्खा है? तुम्हें इस समय यह रहस्य मुझसे कहना पड़ेगा।
साईंदयाल कुछ सोच-विचार में पड़ गया और जमीन की तरफ ताकते हुए बोला—यह कोई रहस्य नहीं, मेरे कर्मों का फल है।
यह वाक्य मैंने चौथी बार उसकी जबान से सुना और बोला—जिन, कर्मों का फल ऐसा शक्तिदायक है, उन कर्मों की मुझे भी कुछ दीक्षा दो। मैं ऐसे फलों से क्यों वंचित रहूँ।
साईंदयाल ने व्याथापूर्ण स्वर में कहा—ईश्वर न करे कि तुम ऐसा कर्म करो और तुम्हारी जिन्दगी पर उसका काला दाग लगे। मैंने जो कुछ किया है, व मुझे ऐसा लज्जाजनक और ऐसा घृणित मालूम होता है कि उसकी मुझे जो कुछ सजा मिले, मैं उसे खुशी के साथ झेलने को तैयार हूँ। आह! मैंने एक ऐसे पवित्र खानदान को, जहॉँ मेरा विश्वास और मेरी प्रतिष्ठा थी, अपनी वासनाओं की गन्दगी में लिथेड़ा और एक ऐसे पवित्र हृदय को जिसमें मुहब्बत का दर्द था, जो सौन्दर्य-वाटिका की एक अनोखी-नयी खिली हुई कली थी, और सच्चाई थी, उस पवित्र हृदय में मैंने पाप और विश्वासघात का बीज हमेशा के लिएबो दिया। यह पाप है जो मुझसे हुआ है और उसका पल्ला उन मुसीबतों से बहुत भारी है जो मेरे ऊपर अब तक पड़ी हैं या आगे चलकर पडेंगी। कोई सजा, कोई दुख, कोई क्षति उसका प्रायश्चित नहीं कर सकती।
मैंने सपने में भी न सोचा था कि साईंदयाल अपने विश्वासों में इतना दृढ़ है। पाप हर आदमी से होते हैं, हमारा मानव जीवन पापों की एक लम्बी सूची है, वह कौन-सा दामन है जिस पर यह काले दाग न हों। लेकिन कितने ऐसे आदमी हैं जो अपने कर्मों की सजाओं को इस तरह उदारतापूर्वक मुस्कराते हुए झेलने के लिए तैयार हों। हम आग में कूदते हैं लेकिन जलने के लिए तैयार नहीं होते।
मैं साईंदयाल को हमेशा इज्जत की निगाह से देखता हूँ, इन बातों को सुनकर मेरी नजरों में उसकी इज्जत तिगुनी हो गयी। एक मामूली दुनियादार आदमी के सीने में एक फकीर का दिल छिपा हुआ था जिसमें ज्ञान की ज्योति चमकती थी। मैंने उसकी तरफ श्रद्धापूर्ण आँखों से देखा और उसके गले से लिपटकर बोला—साईंदयाल, अब तक मैं तुम्हें एक दृढ़ स्वभाव का आदमी समझता था, लेकिन आज मालूम हुआ कि तुम उन पवित्र आत्माओं में हो, जिनका अस्तित्व संसार के लिए वरदान है। तुम ईश्वर के सच्चे भक्त हो और मैं तुम्हारे पैरों पर सिर झुकाता हूँ।
मैंने जवाब दिया—ईश्वर ने जितना संयम तुम्हें दिया है, उसमें से थोड़ा-सा मुझे भी दे दो, मेरे दिल में इतनी ताकत कहॉँ।
साईंदयाल मुस्कराकर मेरी तरफ ताकने लगे।
मैंने उसी सिलसिले में कहा—किताबों में तो दृढ़ता और संतोष की बहुत-सी कहानियॉँ पढ़ी हैं मगर सच मानों कि तुम जैसा दृढ़, कठिनाइयों में सीधा खड़ा रहने वाला आदमी आज तक मेरी नजर से नहीं गुजरा। तुम जानते हो कि मुझे मानव स्वभाव के अध्ययन का हमेशा से शौक है लेकिन मेरे अनुभव में तुम अपनी तरह के अकेले आदमी हो। मैं यह न मानूँगा कि तुम्हारे दिल में दर्द और घुलावट नहीं है। उसे मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ। फिर इस ज्ञानियों जैसे संतोष और शान्ति का रहस्य तुमने कहॉँ छिपा रक्खा है? तुम्हें इस समय यह रहस्य मुझसे कहना पड़ेगा।
साईंदयाल कुछ सोच-विचार में पड़ गया और जमीन की तरफ ताकते हुए बोला—यह कोई रहस्य नहीं, मेरे कर्मों का फल है।
यह वाक्य मैंने चौथी बार उसकी जबान से सुना और बोला—जिन, कर्मों का फल ऐसा शक्तिदायक है, उन कर्मों की मुझे भी कुछ दीक्षा दो। मैं ऐसे फलों से क्यों वंचित रहूँ।
साईंदयाल ने व्याथापूर्ण स्वर में कहा—ईश्वर न करे कि तुम ऐसा कर्म करो और तुम्हारी जिन्दगी पर उसका काला दाग लगे। मैंने जो कुछ किया है, व मुझे ऐसा लज्जाजनक और ऐसा घृणित मालूम होता है कि उसकी मुझे जो कुछ सजा मिले, मैं उसे खुशी के साथ झेलने को तैयार हूँ। आह! मैंने एक ऐसे पवित्र खानदान को, जहॉँ मेरा विश्वास और मेरी प्रतिष्ठा थी, अपनी वासनाओं की गन्दगी में लिथेड़ा और एक ऐसे पवित्र हृदय को जिसमें मुहब्बत का दर्द था, जो सौन्दर्य-वाटिका की एक अनोखी-नयी खिली हुई कली थी, और सच्चाई थी, उस पवित्र हृदय में मैंने पाप और विश्वासघात का बीज हमेशा के लिएबो दिया। यह पाप है जो मुझसे हुआ है और उसका पल्ला उन मुसीबतों से बहुत भारी है जो मेरे ऊपर अब तक पड़ी हैं या आगे चलकर पडेंगी। कोई सजा, कोई दुख, कोई क्षति उसका प्रायश्चित नहीं कर सकती।
मैंने सपने में भी न सोचा था कि साईंदयाल अपने विश्वासों में इतना दृढ़ है। पाप हर आदमी से होते हैं, हमारा मानव जीवन पापों की एक लम्बी सूची है, वह कौन-सा दामन है जिस पर यह काले दाग न हों। लेकिन कितने ऐसे आदमी हैं जो अपने कर्मों की सजाओं को इस तरह उदारतापूर्वक मुस्कराते हुए झेलने के लिए तैयार हों। हम आग में कूदते हैं लेकिन जलने के लिए तैयार नहीं होते।
मैं साईंदयाल को हमेशा इज्जत की निगाह से देखता हूँ, इन बातों को सुनकर मेरी नजरों में उसकी इज्जत तिगुनी हो गयी। एक मामूली दुनियादार आदमी के सीने में एक फकीर का दिल छिपा हुआ था जिसमें ज्ञान की ज्योति चमकती थी। मैंने उसकी तरफ श्रद्धापूर्ण आँखों से देखा और उसके गले से लिपटकर बोला—साईंदयाल, अब तक मैं तुम्हें एक दृढ़ स्वभाव का आदमी समझता था, लेकिन आज मालूम हुआ कि तुम उन पवित्र आत्माओं में हो, जिनका अस्तित्व संसार के लिए वरदान है। तुम ईश्वर के सच्चे भक्त हो और मैं तुम्हारे पैरों पर सिर झुकाता हूँ।
मेरी सहमी हुई सूरत देखकर वह मुस्कराया और बहुत धीमी आवाज में बोला—तुम ऐसे उदास क्यों हो, यह सब मेरे कर्मों का फल है।
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मगर कुछ अजब बदकिस्मत आदमी था। मुसीबतों को उससे कुछ खास मुहब्बत थी। किसे उम्मीद थी कि वह उस प्राणघातक रोग से मुक्ति पायेगा। डाक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। मौत के मुंह से निकल आया। अगर भविष्य का जरा भी ज्ञान होता तो सबसे पहले मैं उसे जहर दे देता। आह, उस शोकपूर्ण घटना को याद करके कलेजा मुंह को आता है। धिककार है इस जिन्दगी पर कि बाप अपनी आँखों से अपनी इकलौते बेटे का शोक देखे।
कैसा हँसमुख, कैसा खूबसूरत, होनहार लड़का था, कैसा सुशील, कैसा मधुरभाषी, जालिम मौत ने उसे छॉँट लिया। प्लेग की दुहाई मची हुई थी। शाम को गिल्टी निकली और सुबह को—कैसी मनहूस, अशुभ सुबह थी—वह जिन्दगी सबेरे के चिराग की तरह बुझ गयी। मैं उस वक्त उस बच्चे के पास बैठा हुआ था और साईंदयाल दीवार का सहारा लिए हुए खामोशा आसमान की तरफ देखता था। मेरी और उसकी आँखों के सामने जालिम और बेरहम मौत ने उस बचे को हमारी गोद से छीन लिया। मैं रोते हुए साईंदयाल के गले से लिपट गया। सारे घर में कुहराम मचा हुआ था। बेचारी मॉँ पछाड़ें खा रही थी, बहनें दौड-दौड़कर भाई की लाश से लिपटती थीं। और जरा देर के लिए ईर्ष्या ने भी समवेदना के आगे सिर झुका दिया था—मुहल्ले की औरतों को आँस बहाने के लिए दिल पर जोर डालने की जरूरत न थी।
जब मेरे आँसू थमे तो मैंने साईंदयाल की तरफ देखा। आँखों में तो आँसू भरे हुए थे—आह, संतोष का आँखों पर कोई बस नहीं, लेकिन चेहरे पर मर्दाना दृढ़ता और समर्पण का रंग स्पष्ट था। इस दुख की बाढ़ और तूफानों मे भी शान्ति की नैया उसके दिल को डूबने से बचाये हुए थी।
इस दृश्य ने मुझे चकित नहीं स्तम्भित कर दिया। सम्भावनाओं की सीमाएँ कितनी ही व्यापक हों ऐसी हृदय-द्रावक स्थिति में होश-हवास और इत्मीनान को कायम रखना उन सीमाओं से परे है। लेकिन इस दृष्टि से साईंदयाल मानव नहीं, अति-मानव था। मैंने रोते हुए कहा—भाईसाहब, अब संतोष की परीक्षा का अवसर है। उसने दृढ़ता से उत्तर दिया—हॉँ, यह कर्मों का फल है।
मैं एक बार फिर भौंचक होकर उसका मुंह ताकने लगा।
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लेकिन साईंदयाल का यह तपस्वियों जैसा धैर्य और ईश्वरेच्छा पर भरोसा अपनी आँखों से देखने पर भी मेरे दिल में संदेह बाकी थे। मुमकिन है, जब तक चोट ताजी है सब्र का बाँध कायम रहे। लेकिन उसकी बुनियादें हिल गयी हैं, उसमें दरारें पड़ गई हैं। वह अब ज्यादा देर तक दुख और शोक की जहरों का मुकाबला नहीं कर सकता।
क्या संसार की कोई दुर्घटना इतनी हृदयद्रावक, इतनी निर्मम, इतनी कठोर हो सकता है! संतोष और दृढ़ता और धैर्य और ईश्वर पर भरोसा यह सब उस आँधी के समान घास-फूस से ज्यादा नहीं। धार्मिक विश्वास तो क्या, अध्यात्म तक उसके सामने सिर झुका देता है। उसके झोंके आस्था और निष्ठा की जड़ें हिला देते हैं।
लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। साईंदयाल ने धीरज को हाथ से न जाने दिया। वह बदस्तूर जिन्दगी के कामों में लग गया। दोस्तों की मुलाकातें और नदी के किनारे की सैर और तफरीह और मेलों की चहल-पहल, इन दिलचस्पियों में उसके दिल को खींचने की ताकत अब भी बाकी थी। मैं उसकी एक-एक क्रिया को, एक-एक बात को गौर से देखता और पढ़ता। मैंने दोस्ती के नियम-कायदों को भुलाकर उसे उस हालत में देखा जहॉँ उसके विचारों के सिवा और कोई न था। लेकिन उस हालत में भी उसके चेहरे पर वही पुरूषोचित धैर्य था और शिकवे-शिकायत का एक शब्द भी उसकी जबान पर नहीं आया।
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इसी बीच मेरी छोटी लड़की चन्द्रमुखी निमोनिया की भेंट चढ़ गयी। दिन के धंधे से फुरसत पाकर जब मैं घर पर आता और उसे प्यार से गोद में उठा लेता तो मेरे हृदय को जो आनन्द और आत्मिक शक्ति मिलती थी, उसे शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता। उसकी अदाएँ सिर्फ दिल को लुभानेवाली नहीं गम को भुलानेवाली हैं। जिस वक्त वह हुमककर मेरी गोद में आती तो मुझे तीनों लोक की संपत्ति मिल जाती थी। उसकी शरारतें कितनी मनमोहक थीं। अब हुक्के में मजा नहीं रहा, कोई चिलम को गिरानेवाला नहीं! खाने में मजा नहीं आता, कोई थाली के पास बैठा हुआ उस पर हमला करनेवाला नहीं! मैं उसकी लाश को गोद में लिये बिलख-बिलखकर रो रहा था। यही जी चाहता था कि अपनी जिन्दगी का खात्मा कर दूँ। यकायक मैंने साईंदयाल को आते देखा। मैंने फौरन आँसू पोंछ डाले और उस नन्हीं-सी जान को जमीन पर लिटाकर बाहर निकल आया। उस धैर्य और संतोष के देवता ने मेरी तरफ संवेदनशील की आँखों से देखा और मेरे गले से लिपटकर रोने लगा। मैंने कभी उसे इस तरह चीखें मारकर रोते नहीं देखा। रोते-रोते उसी हिचकियॉँ बंध गयीं, बेचैनी से बेसुध और बेहार हो गया। यह वही आदमी है जिसका इकलौता बेटा मरा और माथे पर बल नहीं आया। यह कायापलट क्यों?
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मगर कुछ अजब बदकिस्मत आदमी था। मुसीबतों को उससे कुछ खास मुहब्बत थी। किसे उम्मीद थी कि वह उस प्राणघातक रोग से मुक्ति पायेगा। डाक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। मौत के मुंह से निकल आया। अगर भविष्य का जरा भी ज्ञान होता तो सबसे पहले मैं उसे जहर दे देता। आह, उस शोकपूर्ण घटना को याद करके कलेजा मुंह को आता है। धिककार है इस जिन्दगी पर कि बाप अपनी आँखों से अपनी इकलौते बेटे का शोक देखे।
कैसा हँसमुख, कैसा खूबसूरत, होनहार लड़का था, कैसा सुशील, कैसा मधुरभाषी, जालिम मौत ने उसे छॉँट लिया। प्लेग की दुहाई मची हुई थी। शाम को गिल्टी निकली और सुबह को—कैसी मनहूस, अशुभ सुबह थी—वह जिन्दगी सबेरे के चिराग की तरह बुझ गयी। मैं उस वक्त उस बच्चे के पास बैठा हुआ था और साईंदयाल दीवार का सहारा लिए हुए खामोशा आसमान की तरफ देखता था। मेरी और उसकी आँखों के सामने जालिम और बेरहम मौत ने उस बचे को हमारी गोद से छीन लिया। मैं रोते हुए साईंदयाल के गले से लिपट गया। सारे घर में कुहराम मचा हुआ था। बेचारी मॉँ पछाड़ें खा रही थी, बहनें दौड-दौड़कर भाई की लाश से लिपटती थीं। और जरा देर के लिए ईर्ष्या ने भी समवेदना के आगे सिर झुका दिया था—मुहल्ले की औरतों को आँस बहाने के लिए दिल पर जोर डालने की जरूरत न थी।
जब मेरे आँसू थमे तो मैंने साईंदयाल की तरफ देखा। आँखों में तो आँसू भरे हुए थे—आह, संतोष का आँखों पर कोई बस नहीं, लेकिन चेहरे पर मर्दाना दृढ़ता और समर्पण का रंग स्पष्ट था। इस दुख की बाढ़ और तूफानों मे भी शान्ति की नैया उसके दिल को डूबने से बचाये हुए थी।
इस दृश्य ने मुझे चकित नहीं स्तम्भित कर दिया। सम्भावनाओं की सीमाएँ कितनी ही व्यापक हों ऐसी हृदय-द्रावक स्थिति में होश-हवास और इत्मीनान को कायम रखना उन सीमाओं से परे है। लेकिन इस दृष्टि से साईंदयाल मानव नहीं, अति-मानव था। मैंने रोते हुए कहा—भाईसाहब, अब संतोष की परीक्षा का अवसर है। उसने दृढ़ता से उत्तर दिया—हॉँ, यह कर्मों का फल है।
मैं एक बार फिर भौंचक होकर उसका मुंह ताकने लगा।
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लेकिन साईंदयाल का यह तपस्वियों जैसा धैर्य और ईश्वरेच्छा पर भरोसा अपनी आँखों से देखने पर भी मेरे दिल में संदेह बाकी थे। मुमकिन है, जब तक चोट ताजी है सब्र का बाँध कायम रहे। लेकिन उसकी बुनियादें हिल गयी हैं, उसमें दरारें पड़ गई हैं। वह अब ज्यादा देर तक दुख और शोक की जहरों का मुकाबला नहीं कर सकता।
क्या संसार की कोई दुर्घटना इतनी हृदयद्रावक, इतनी निर्मम, इतनी कठोर हो सकता है! संतोष और दृढ़ता और धैर्य और ईश्वर पर भरोसा यह सब उस आँधी के समान घास-फूस से ज्यादा नहीं। धार्मिक विश्वास तो क्या, अध्यात्म तक उसके सामने सिर झुका देता है। उसके झोंके आस्था और निष्ठा की जड़ें हिला देते हैं।
लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। साईंदयाल ने धीरज को हाथ से न जाने दिया। वह बदस्तूर जिन्दगी के कामों में लग गया। दोस्तों की मुलाकातें और नदी के किनारे की सैर और तफरीह और मेलों की चहल-पहल, इन दिलचस्पियों में उसके दिल को खींचने की ताकत अब भी बाकी थी। मैं उसकी एक-एक क्रिया को, एक-एक बात को गौर से देखता और पढ़ता। मैंने दोस्ती के नियम-कायदों को भुलाकर उसे उस हालत में देखा जहॉँ उसके विचारों के सिवा और कोई न था। लेकिन उस हालत में भी उसके चेहरे पर वही पुरूषोचित धैर्य था और शिकवे-शिकायत का एक शब्द भी उसकी जबान पर नहीं आया।
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इसी बीच मेरी छोटी लड़की चन्द्रमुखी निमोनिया की भेंट चढ़ गयी। दिन के धंधे से फुरसत पाकर जब मैं घर पर आता और उसे प्यार से गोद में उठा लेता तो मेरे हृदय को जो आनन्द और आत्मिक शक्ति मिलती थी, उसे शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता। उसकी अदाएँ सिर्फ दिल को लुभानेवाली नहीं गम को भुलानेवाली हैं। जिस वक्त वह हुमककर मेरी गोद में आती तो मुझे तीनों लोक की संपत्ति मिल जाती थी। उसकी शरारतें कितनी मनमोहक थीं। अब हुक्के में मजा नहीं रहा, कोई चिलम को गिरानेवाला नहीं! खाने में मजा नहीं आता, कोई थाली के पास बैठा हुआ उस पर हमला करनेवाला नहीं! मैं उसकी लाश को गोद में लिये बिलख-बिलखकर रो रहा था। यही जी चाहता था कि अपनी जिन्दगी का खात्मा कर दूँ। यकायक मैंने साईंदयाल को आते देखा। मैंने फौरन आँसू पोंछ डाले और उस नन्हीं-सी जान को जमीन पर लिटाकर बाहर निकल आया। उस धैर्य और संतोष के देवता ने मेरी तरफ संवेदनशील की आँखों से देखा और मेरे गले से लिपटकर रोने लगा। मैंने कभी उसे इस तरह चीखें मारकर रोते नहीं देखा। रोते-रोते उसी हिचकियॉँ बंध गयीं, बेचैनी से बेसुध और बेहार हो गया। यह वही आदमी है जिसका इकलौता बेटा मरा और माथे पर बल नहीं आया। यह कायापलट क्यों?
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कर्मों का फल - प्रेमचंद
मुझे हमेशा आदमियों के परखने की सनक रही है और अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यह अध्ययन जितना मनोरंजक, शिक्षाप्रद और उदधाटनों से भरा हुआ है, उतना शायद और कोई अध्ययन न होगा। लेकिन अपने दोस्त लाला साईंदयाल से बहुत अर्से तक दोस्ती और बेतकल्लुफी के सम्बन्ध रहने पर भी मुझे उनकी थाह न मिली। मुझे ऐसे दुर्बल शरीर में ज्ञानियों की-सी शान्ति और संतोष देखकर आश्चर्य होता था जो एक़ नाजुक पौधे की तरह मुसीबतों के झोंकों में भी अचल और अटल रहता था। ज्यों वह बहुत ही मामूली दरजे का आदमी था जिसमें मानव कमजोरियों की कमी न थी। वह वादे बहुत करता था लेकिन उन्हें पूरा करने की जरूरत नहीं समझता था। वह मिथ्याभाषी न हो लेकिन सच्चा भी न था। बेमुरौवत न हो लेकिन उसकी मुरौवत छिपी रहती थी। उसे अपने कर्त्तव्य पर पाबन्द रखने के लिए दबाव ओर निगरानी की जरुरत थी, किफायतशारी के उसूलों से बेखबर, मेहनत से जी चुराने वाला, उसूलों का कमजोर, एक ढीला-ढाला मामूली आदमी था। लेकिन जब कोई मुसीबत सिर पर आ पड़ती तो उसके दिल में साहस और दृढ़ता की वह जबर्दस्त ताकत पैदा हो जाती थी जिसे शहीदों का गुण कह सकते हैं। उसके पास न दौलत थी न धार्मिक विश्वास, जो ईश्वर पर भरोसा करने और उसकी इच्छाओं के आगे सिर झुका देने का स्त्रोत है। एक छोटी-सी कपड़े की दुकान के सिवाय कोई जीविका न थी। ऐसी हालतों में उसकी हिम्मत और दृढ़ता का सोता कहॉँ छिपा हुआ है, वहॉँ तक मेरी अन्वेषण-दृष्टि नहीं पहुँचती थी।
2
बाप के मरते ही मुसीबतों ने उस पर छापा मारा कुछ थोड़ा-सा कर्ज विरासत में मिला जिसमें बराबर बढ़ते रहने की आश्चर्यजनक शक्ति छिपी हुई थी। बेचारे ने अभी बरसी से छुटकारा नहीं पाया था कि महाजन ने नालिश की और अदालत के तिलस्मी अहाते में पहुँचते ही यह छोटी-सी हस्ती इस तरह फूली जिस तरह मशक फलती है। डिग्री हुई। जो कुछ जमा-जथा थी; बर्तन-भॉँड़ें, हॉँडी-तवा, उसके गहरे पेट में समा गये। मकान भी न बचा। बेचारे मुसीबतों के मारे साईंदयाल का अब कहीं ठिकाना न था। कौड़ी-कौड़ी को मुहताज, न कहीं घर, न बार। कई-कई दिन फाके से गुजर जाते। अपनी तो खैर उन्हें जरा भी फिक्र न थी लेकिन बीवी थी, दो-तीन बच्चे थे, उनके लिए तो कोई-न-कोई फिक्र करनी पड़ती थी। कुनबे का साथ और यह बेसरोसामानी, बड़ा दर्दनाक दृश्य था। शहर से बाहर एक पेड़ की छॉँह में यह आदमी अपनी मुसीबत के दिन काट रहा था। सारे दिन बाजारों की खाक छानता। आह, मैंने एक बार उस रेलवे स्टेशन पर देखा। उसके सिर पर एक भारी बोझ था। उसका नाजुग, सुख-सुविधा में पला हुआ शरीर, पसीना-पसीना हो रहा था। पैर मुश्किल से उठते थे। दम फूल रहा था लेकिन चेहरे से मर्दाना हिम्मत और मजबूत इरादे की रोशनी टपकती थी। चेहरे से पूर्ण संतोष झलक रहा था। उसके चेहरे पर ऐसा इत्मीनान था कि जैसे यही उसका बाप-दादों का पेशा है। मैं हैरत से उसका मुंह ताकता रह गया। दुख में हमदर्दी दिखलाने की हिम्मत न हुई। कई महीने तक यही कैफियत रही। आखिरकार उसकी हिम्मत और सहनशक्ति उसे इस कठिन दुर्गम घाटी से बाहर निकल लायी।
3
थोड़े ही दिनों के बाद मुसीबतों ने फिर उस पर हमला किया। ईश्वर ऐसा दिन दुश्मन को भी न दिखलाये। मैं एक महीने के लिए बम्बई चला गया था, वहॉँ से लौटकर उससे मिलने गया। आह, वह दृश्य याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ओर दिल डर से कॉँप उठता है। सुबह का वक्त था। मैंने दरवाजे पर आवाज दी और हमेशा की तरह बेतकल्लुफ अन्दर चला गया, मगर वहॉँ साईंदयाल का वह हँसमुख चेहरा, जिस पर मर्दाना हिम्मत की ताजगी झलकती थी, नजर न आया। मैं एक महीने के बाद उनके घर जाऊँ और वह आँखों से रोते लेकिन होंठों से हँसते दौड़कर मेरे गले लिपट न जाय! जरूर कोई आफत है। उसकी बीवी सिर झुकाये आयी और मुझे उसके कमरे में ले गयी। मेरा दिल बैठ गया। साईंदयाल एक चारपाई पर मैले-कुचैले कपड़े लपेटे, आँखें बन्द किये, पड़ा दर्द से कराह रहा था। जिस्म और बिछौने पर मक्खियों के गुच्छे बैठे हुए थे। आहट पाते ही उसने मेरी तरफ देखा। मेरे जिगर के टुकड़े हो गये। हड्डियों का ढॉँचा रह गया था। दुर्बलता की इससे ज्यादा सच्ची और करुणा तस्वीर नहीं हो सकती। उसकी बीवी ने मेरी तरफ निराशाभरी आँखों से देखा। मेरी आँसू भर आये। उस सिमटे हुए ढॉँचे में बीमारी को भी मुश्किल से जगह मिलती होगी, जिन्दगी का क्या जिक्र! आखिर मैंने धीरे पुकारा। आवाज सुनते ही वह बड़ी-बड़ी आँखें खुल गयीं लेकिन उनमें पीड़ा और शोक के आँसू न थे, सन्तोष और ईश्वर पर भरोसे की रोशनी थी और वह पीला चेहरा! आह, वह गम्भीर संतोष का मौन चित्र, वह संतोषमय संकल्प की सजीव स्मृति। उसके पीलेपन में मर्दाना हिम्मत की लाली झलकती थी। मैं उसकी सूरत देखकर घबरा गया। क्या यह बुझते हुए चिराग की आखिरी झलक तो नहीं है?
मुझे हमेशा आदमियों के परखने की सनक रही है और अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यह अध्ययन जितना मनोरंजक, शिक्षाप्रद और उदधाटनों से भरा हुआ है, उतना शायद और कोई अध्ययन न होगा। लेकिन अपने दोस्त लाला साईंदयाल से बहुत अर्से तक दोस्ती और बेतकल्लुफी के सम्बन्ध रहने पर भी मुझे उनकी थाह न मिली। मुझे ऐसे दुर्बल शरीर में ज्ञानियों की-सी शान्ति और संतोष देखकर आश्चर्य होता था जो एक़ नाजुक पौधे की तरह मुसीबतों के झोंकों में भी अचल और अटल रहता था। ज्यों वह बहुत ही मामूली दरजे का आदमी था जिसमें मानव कमजोरियों की कमी न थी। वह वादे बहुत करता था लेकिन उन्हें पूरा करने की जरूरत नहीं समझता था। वह मिथ्याभाषी न हो लेकिन सच्चा भी न था। बेमुरौवत न हो लेकिन उसकी मुरौवत छिपी रहती थी। उसे अपने कर्त्तव्य पर पाबन्द रखने के लिए दबाव ओर निगरानी की जरुरत थी, किफायतशारी के उसूलों से बेखबर, मेहनत से जी चुराने वाला, उसूलों का कमजोर, एक ढीला-ढाला मामूली आदमी था। लेकिन जब कोई मुसीबत सिर पर आ पड़ती तो उसके दिल में साहस और दृढ़ता की वह जबर्दस्त ताकत पैदा हो जाती थी जिसे शहीदों का गुण कह सकते हैं। उसके पास न दौलत थी न धार्मिक विश्वास, जो ईश्वर पर भरोसा करने और उसकी इच्छाओं के आगे सिर झुका देने का स्त्रोत है। एक छोटी-सी कपड़े की दुकान के सिवाय कोई जीविका न थी। ऐसी हालतों में उसकी हिम्मत और दृढ़ता का सोता कहॉँ छिपा हुआ है, वहॉँ तक मेरी अन्वेषण-दृष्टि नहीं पहुँचती थी।
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बाप के मरते ही मुसीबतों ने उस पर छापा मारा कुछ थोड़ा-सा कर्ज विरासत में मिला जिसमें बराबर बढ़ते रहने की आश्चर्यजनक शक्ति छिपी हुई थी। बेचारे ने अभी बरसी से छुटकारा नहीं पाया था कि महाजन ने नालिश की और अदालत के तिलस्मी अहाते में पहुँचते ही यह छोटी-सी हस्ती इस तरह फूली जिस तरह मशक फलती है। डिग्री हुई। जो कुछ जमा-जथा थी; बर्तन-भॉँड़ें, हॉँडी-तवा, उसके गहरे पेट में समा गये। मकान भी न बचा। बेचारे मुसीबतों के मारे साईंदयाल का अब कहीं ठिकाना न था। कौड़ी-कौड़ी को मुहताज, न कहीं घर, न बार। कई-कई दिन फाके से गुजर जाते। अपनी तो खैर उन्हें जरा भी फिक्र न थी लेकिन बीवी थी, दो-तीन बच्चे थे, उनके लिए तो कोई-न-कोई फिक्र करनी पड़ती थी। कुनबे का साथ और यह बेसरोसामानी, बड़ा दर्दनाक दृश्य था। शहर से बाहर एक पेड़ की छॉँह में यह आदमी अपनी मुसीबत के दिन काट रहा था। सारे दिन बाजारों की खाक छानता। आह, मैंने एक बार उस रेलवे स्टेशन पर देखा। उसके सिर पर एक भारी बोझ था। उसका नाजुग, सुख-सुविधा में पला हुआ शरीर, पसीना-पसीना हो रहा था। पैर मुश्किल से उठते थे। दम फूल रहा था लेकिन चेहरे से मर्दाना हिम्मत और मजबूत इरादे की रोशनी टपकती थी। चेहरे से पूर्ण संतोष झलक रहा था। उसके चेहरे पर ऐसा इत्मीनान था कि जैसे यही उसका बाप-दादों का पेशा है। मैं हैरत से उसका मुंह ताकता रह गया। दुख में हमदर्दी दिखलाने की हिम्मत न हुई। कई महीने तक यही कैफियत रही। आखिरकार उसकी हिम्मत और सहनशक्ति उसे इस कठिन दुर्गम घाटी से बाहर निकल लायी।
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थोड़े ही दिनों के बाद मुसीबतों ने फिर उस पर हमला किया। ईश्वर ऐसा दिन दुश्मन को भी न दिखलाये। मैं एक महीने के लिए बम्बई चला गया था, वहॉँ से लौटकर उससे मिलने गया। आह, वह दृश्य याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ओर दिल डर से कॉँप उठता है। सुबह का वक्त था। मैंने दरवाजे पर आवाज दी और हमेशा की तरह बेतकल्लुफ अन्दर चला गया, मगर वहॉँ साईंदयाल का वह हँसमुख चेहरा, जिस पर मर्दाना हिम्मत की ताजगी झलकती थी, नजर न आया। मैं एक महीने के बाद उनके घर जाऊँ और वह आँखों से रोते लेकिन होंठों से हँसते दौड़कर मेरे गले लिपट न जाय! जरूर कोई आफत है। उसकी बीवी सिर झुकाये आयी और मुझे उसके कमरे में ले गयी। मेरा दिल बैठ गया। साईंदयाल एक चारपाई पर मैले-कुचैले कपड़े लपेटे, आँखें बन्द किये, पड़ा दर्द से कराह रहा था। जिस्म और बिछौने पर मक्खियों के गुच्छे बैठे हुए थे। आहट पाते ही उसने मेरी तरफ देखा। मेरे जिगर के टुकड़े हो गये। हड्डियों का ढॉँचा रह गया था। दुर्बलता की इससे ज्यादा सच्ची और करुणा तस्वीर नहीं हो सकती। उसकी बीवी ने मेरी तरफ निराशाभरी आँखों से देखा। मेरी आँसू भर आये। उस सिमटे हुए ढॉँचे में बीमारी को भी मुश्किल से जगह मिलती होगी, जिन्दगी का क्या जिक्र! आखिर मैंने धीरे पुकारा। आवाज सुनते ही वह बड़ी-बड़ी आँखें खुल गयीं लेकिन उनमें पीड़ा और शोक के आँसू न थे, सन्तोष और ईश्वर पर भरोसे की रोशनी थी और वह पीला चेहरा! आह, वह गम्भीर संतोष का मौन चित्र, वह संतोषमय संकल्प की सजीव स्मृति। उसके पीलेपन में मर्दाना हिम्मत की लाली झलकती थी। मैं उसकी सूरत देखकर घबरा गया। क्या यह बुझते हुए चिराग की आखिरी झलक तो नहीं है?
बढ़े हैं। कई आदमी नए रखे गये हैं, मुलाज़िमों को मजदूरी के साथ कमीशन भ्री मिलता है मगर खालिस नफा पहले के मुकाबले में चौगुने के करीब है।
हरनामदास ने बड़े ध्यान से यह बात सुनी। वह ग़ौर से दीनानाथ के चेहरे की तरफ देख रहे थे। शायद उसके दिन में पैठकर सच्चाई की तह तक पहुँचना चाहते थे। सन्देहपूर्ण स्वर में बोले—दीननाथ, तुम कभी मुझसे झूठ नहीं बोलते थे लेकिन तो भी मुझे इन बातों पर यक़ीन नहीं आता और जब तक अपनी आंखों से देख न लूंगा, यकीन न आयेगा।
दीनानाथ कुछ निराश होकर बिदा हुआ। उसे आशा थी कि लाला साहब तरक्की और कारगुजारी की बात सुनते ही फूले न समायेंगे और मेरी मेहनत की दाद देंगे। उस बेचारे को न मालूम था कि कुछ दिलों में सन्देह की जड़ इतनी मज़बूत होती है कि सबूत और दलील के हमले उस पर कुछ असर नहीं कर सकते। यहां तक कि वह अपनी आंख से देखने को भी धोखा या तिलिस्म समझता है।
दीनानाथ के चले जाने के बाद लाला हरनामदास कुछ देर तक गहरे विचार में डूबे रहे और फिर यकायक कहार से बग्घी मंगवायी, लाठी के सहारे बग्घी में आ बैठे और उसे अपने चक्कीघर चलने का हुक्म दिया।
दोपहर का वक्त था। कारखानों के मजदूर खाना खाने के लिए गोल के गोल भागे चले आते थे मगर हरिदास के कारखाने में काम जारी था। बग्घी हाते में दाखिल हुई, दोनों तरफ फूलों की कतारें नजर आयीं, माली क्यारियों में पानी दे रहा था। ठेले और गाड़ियों के मारे बग्घी को निकलने की जगह न मिलती थी। जिधर निगाह जाती थी, सफाईं और हरियाली नजर आती थी।
हरिदास अपने मुहर्रिर को कुछ खतों का मसौदा लिखा रहा था कि बूढ़े लाला जी लाठी टेकते हुए कारखाने में दाखिल हुए। हरिदास फौरन उइ खड़ा हुआ और उन्हें हाथों से सहारा देते हुए बोला—‘आपने कहला क्यों न भेजा कि मैं आना चाहता हूँ, पालकी मंगवा देता। आपको बहुत तकलीफ़ हुई।’ यह कहकर उसने एक आराम-कुर्सी बैठने के लिए खिसका दी। कारखाने के कर्मचारी दौड़े और उनके चारों तरफ बहुत अदब के साथ खड़े हो गये। हरनामदास कुर्सी पर बैठ गये और बोरों के छत चूमनेवाले ढ़ेर पर नजर दौड़ाकर बोले—मालूम होता है दीनानाथ सच कहता था। मुझे यहां कई नयी सूरतें नज़र आती हैं। भला कितना काम रोज होता है? भला कितना काम रोज होता है?
हरिदास—आजकल काम ज्यादा आ गया था इसलिए कोई पांच सौ मन रोजाना तैयार हो जाता था लेकिन औसत ढाई सौ मन का रहेगा। मुझे नयी मशीन की कीमत अदा करनी थी इसलिए अक्सर रात को भी काम होता है।
हरनामदास—कुछ क़र्ज लेना पड़ा?
हरिदास—एक कौड़ी नहीं। सिर्फ मशीन की आधी कीमत बाकी है।
हरनामदास के चेहरे पर इत्मीनाना का रंग नजर आया। संदेह ने वह विश्वास को जगह दी। प्यार-भरी आंखों से लड़के की तरफ देखा और करूण स्वर में बोले—बेटा, मैंने तुम्हार ऊपर बड़ा जुल्म किया, मुझे माफ करों। मुझे आदमियों की पहचान पर बड़ा घमण्ड था, लेकिन मुझे बहुत धोखा हुआ। मुझे अब से बहुत पहले इस काम से हाथ खींच लेना चाहिए था। मैंने तुम्हें बहुत नुकसान पहुँचाया। यह बीमारी बड़ी मुबारक है जिसने तुम्हारी परख का मौका दिया और तुम्हें लियाकत दिखाने का। काश, यह हमला पांच साल पहले ही हुआ होता। ईश्वर तुम्हें खुश रखे और हमेशा उन्नति दे, यही तुम्हारे बूढ़े बाप का आशीर्वाद है।
हरनामदास ने बड़े ध्यान से यह बात सुनी। वह ग़ौर से दीनानाथ के चेहरे की तरफ देख रहे थे। शायद उसके दिन में पैठकर सच्चाई की तह तक पहुँचना चाहते थे। सन्देहपूर्ण स्वर में बोले—दीननाथ, तुम कभी मुझसे झूठ नहीं बोलते थे लेकिन तो भी मुझे इन बातों पर यक़ीन नहीं आता और जब तक अपनी आंखों से देख न लूंगा, यकीन न आयेगा।
दीनानाथ कुछ निराश होकर बिदा हुआ। उसे आशा थी कि लाला साहब तरक्की और कारगुजारी की बात सुनते ही फूले न समायेंगे और मेरी मेहनत की दाद देंगे। उस बेचारे को न मालूम था कि कुछ दिलों में सन्देह की जड़ इतनी मज़बूत होती है कि सबूत और दलील के हमले उस पर कुछ असर नहीं कर सकते। यहां तक कि वह अपनी आंख से देखने को भी धोखा या तिलिस्म समझता है।
दीनानाथ के चले जाने के बाद लाला हरनामदास कुछ देर तक गहरे विचार में डूबे रहे और फिर यकायक कहार से बग्घी मंगवायी, लाठी के सहारे बग्घी में आ बैठे और उसे अपने चक्कीघर चलने का हुक्म दिया।
दोपहर का वक्त था। कारखानों के मजदूर खाना खाने के लिए गोल के गोल भागे चले आते थे मगर हरिदास के कारखाने में काम जारी था। बग्घी हाते में दाखिल हुई, दोनों तरफ फूलों की कतारें नजर आयीं, माली क्यारियों में पानी दे रहा था। ठेले और गाड़ियों के मारे बग्घी को निकलने की जगह न मिलती थी। जिधर निगाह जाती थी, सफाईं और हरियाली नजर आती थी।
हरिदास अपने मुहर्रिर को कुछ खतों का मसौदा लिखा रहा था कि बूढ़े लाला जी लाठी टेकते हुए कारखाने में दाखिल हुए। हरिदास फौरन उइ खड़ा हुआ और उन्हें हाथों से सहारा देते हुए बोला—‘आपने कहला क्यों न भेजा कि मैं आना चाहता हूँ, पालकी मंगवा देता। आपको बहुत तकलीफ़ हुई।’ यह कहकर उसने एक आराम-कुर्सी बैठने के लिए खिसका दी। कारखाने के कर्मचारी दौड़े और उनके चारों तरफ बहुत अदब के साथ खड़े हो गये। हरनामदास कुर्सी पर बैठ गये और बोरों के छत चूमनेवाले ढ़ेर पर नजर दौड़ाकर बोले—मालूम होता है दीनानाथ सच कहता था। मुझे यहां कई नयी सूरतें नज़र आती हैं। भला कितना काम रोज होता है? भला कितना काम रोज होता है?
हरिदास—आजकल काम ज्यादा आ गया था इसलिए कोई पांच सौ मन रोजाना तैयार हो जाता था लेकिन औसत ढाई सौ मन का रहेगा। मुझे नयी मशीन की कीमत अदा करनी थी इसलिए अक्सर रात को भी काम होता है।
हरनामदास—कुछ क़र्ज लेना पड़ा?
हरिदास—एक कौड़ी नहीं। सिर्फ मशीन की आधी कीमत बाकी है।
हरनामदास के चेहरे पर इत्मीनाना का रंग नजर आया। संदेह ने वह विश्वास को जगह दी। प्यार-भरी आंखों से लड़के की तरफ देखा और करूण स्वर में बोले—बेटा, मैंने तुम्हार ऊपर बड़ा जुल्म किया, मुझे माफ करों। मुझे आदमियों की पहचान पर बड़ा घमण्ड था, लेकिन मुझे बहुत धोखा हुआ। मुझे अब से बहुत पहले इस काम से हाथ खींच लेना चाहिए था। मैंने तुम्हें बहुत नुकसान पहुँचाया। यह बीमारी बड़ी मुबारक है जिसने तुम्हारी परख का मौका दिया और तुम्हें लियाकत दिखाने का। काश, यह हमला पांच साल पहले ही हुआ होता। ईश्वर तुम्हें खुश रखे और हमेशा उन्नति दे, यही तुम्हारे बूढ़े बाप का आशीर्वाद है।
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देवकी उनको सान्त्वना देती कि आप इन बातों की आशंका न करें। कारबार बहुत खूबी से चल रहा है और खूब नफ़ा हो रहा है। पर वह भी इस मामले में तूल देते हुए ड़रती थी कि कहीं लक़वे का फिर हमला न हो जाय। हूं-हां कहकर टालना चाहती थी। हरिदास ज्यों ही घर में आता, लाला जी उस पर सवालों की बौछार कर देते और जब वह टालकर कोई दूसरा जिक्र छेड़ देता तो बिगड़ जाते और कहते—जालिम, तू जीते जी मेरे गले पर छुरी फेर रहा है। मेरी पूंजी उड़ा रहा है। तुझे क्या मालूम कि मैंने एक-एक कौड़ी किस मशक्कत से जमा की है। तूने दिल में ठान ली है कि इस बुढ़ापे में मुझे गली-गली ठोकर खिलाये, मुझे कौड़ी-कौड़ी का मुहतात बनाये।
हरिदास फटकार का कोई जवाब न देता क्योंकि बात से बात बढ़ती है। उसकी चुप्पी से लाला साहब को यकीन हो जाता कि कारखाना तबाह हो गया।
एक रोज देवकी ने हरिदास से कहा—अभी कितने दिन और इन बातों का लालाजी से छिपाओगे?
हरिदास ने जवाब दिया—मैं तो चाहता हूँ कि नयी मशीन का रुपया अदा हो जाय तो उन्हें ले जाकर सब कुछ दिखा दूँ। तब तक ड़ाक्टर साहब की हिदायत के अनुसार तीन महीने पूरे भी हो जायेंगे।
देवकी—लेकिन इस छिपाने से क्या फायदा, जब वे आठों पहर इसी की रट लगाये रहते हैं। इससे तो चिन्ता और बढ़ती ही है, कम नहीं होती। अससे तो यही अच्छा है, कि उनसे सब कुछ कह दिय जाए।
हरिदास—मेरे कहने का तो उन्हें यकीन आ चुका। हां, दीनानाथ कहें तो शायद यकीन हो
देवकी—अच्छा तो कल दीनानाथ को यहां भेज दो। लालाजी उसे देखते ही खुद बुला लेंगे, तुम्हें इस रोज-रोज की डांट-फ़टकर से तो छुट्टी मिल जाएगी।
हरिदास—अब मुझे इन फटकारों का जरा भी दुख नहीं होता। मेरी मेहनत और योग्यता का नतीजा आंखों के सामने मौजूद है। जब मैंने कारखाना आने हाथ में लिया था, आमदनी और खर्च का मीज़ान मुश्किल से बैठता था। आज पांच से का नफा है। तीसरा महीना खत्म होनेवाला है और मैं मशीन की आधी कीमत अदा कर चुका। शायद अगले महीने दो महीने में पूरी कीमत अदा हो जायेगी। उस वक्त से कारखाने का खर्च तिगुने से ज्यादा है लेकिन आमदनी पंचगुनी हो गयी है। हजरत देखेंगे तो आंखें खुल जाएंगी। कहां हाते में उल्लू बोलते थे। एक मेज़ पर बैठे आप ऊंघा करते थे, एक पर दीनानाथ कान कुरेदा करता था। मिस्त्री और फायरमैन ताश खेलते थ। बस, दो-चार घण्टे चक्की चल जाती थी। अब दम मारने की फुरसत नहीं है। सारी ज़िन्दगी में जो कुछ न कर सके वह मैंने तीन महीने मे करके दिखा दिया। इसी तजुर्बे और कार्रवाई पर आपको इतना घमण्ड था। जितना काम वह एक महीने में करते थे उतना मैं रोज कर ड़ालता हूँ।
देवकी ने भर्त्सनापूर्ण नेत्रों से देखकर कहा—अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना कोई तुमसे सीख ले! जिस तरह मां अपने बेटे को हमेशा दुबला ही समझती है, उसी तरह बाप बेटे को हमेशा नादान समझा करता है। यह उनकी ममता है, बुरा मानने की बात नहीं है।
हरिदास ने लज्जित होकर सर झुका लिया।
दूसरे रोज दीनानाथ उनको देखने के बहाने से लाला हरनामदास की सेवा में उपस्थित हुआ। लालाजी उसे देखते ही तकिये के सहारे उठ बैठे और पागलों की तरह बेचैन होकर पूछा—क्यों, कारबार सब तबाह हो गया कि अभी कुछ कसर बाकी है! तुम लोगों ने मुझे मुर्दा समझ लिया है। कभी बात तक न पूछी। कम से कम मुझे ऐसी उम्मीद न थी। बहू ने मेरी तीमारदारी ने की होती तो मर ही गया होती
दीनानाथ—आपका कुशल-मंगल रोज बाबू साहब से पूछ लिया करता था। आपने मेरे साथ जो नेकियां की हैं, उन्हें मैं भूल नहीं सकता। मेरा एक-एक रोआं आपका एहसानमन्द है। मगर इस बीच काम ही कुछ एकस था कि हाज़िर होने की मोहलत न मिली।
हरनामदास—खैर, कारखाने का क्या हाल है? दीवाला होने में क्या कसर बाकी है?
दीनानाथ ने ताज्जुब के साथ कहा—यह आपसे किसने कह दिया कि दीवाला होनेवाला है? इस अरसे में कारोबार में जो तरक्की हुई है, वह आप खुद अपनी आंखों से देख लेंगे।
हरनामदास व्यंग्यपूर्वक बोले—शायद तुम्हारे बाबू साहब ने तुम्हारी मनचाही तरक्की कर दी! अच्छा अब स्वामिभक्ति छोड़ो और साफ बतलाआ। मैंने ताकीद कर दी थी कि कारखाने का इन्तज़ाम तुम्हारे हाथ में रहेगा। मगर शायद हरिदास ने सब कुछ अपने हाथ में रखा।
दीनानाथ—जी हां, मगर मुझे इसका जरा भी दुख नहीं। वही रइस काम के लिए ठीक भी थे। जो कुछ उन्होंने कर दिखाया, वह मुझसे हरगिज न हो सकता।
हरनामदास—मुझे यह सुन-सुनकर हैरत होती है। बतलाओ, क्या तरक्की हुई?
दीनानाथ—तफ़सील तो बहुत ज्यादा होगी, मगर थोड़े मे यह समझ लीजिए कि पहले हम लोग जितना काम एक महीने में करते थे उतना अब रोज होता है। नयी मशीन आयी थी, उसकी आधी, कीमत अदा हो चुकी है। वह अक्सर रात को भी चलती है। ठाकुर कम्पनी का पांच हजार मन आटे का ठेका लिया था, वह पूरा होनेवाला है। जगतराम बनवारीलाल से कमसरियट का ठेका लिया है। उन्होंने हमको पांच सौ बोरे महावार का बयाना दिया है। इसी तरह और फुटकर काम कई गुना बढ़ गया है। आमदनी के साथ खर्च भी
हरिदास फटकार का कोई जवाब न देता क्योंकि बात से बात बढ़ती है। उसकी चुप्पी से लाला साहब को यकीन हो जाता कि कारखाना तबाह हो गया।
एक रोज देवकी ने हरिदास से कहा—अभी कितने दिन और इन बातों का लालाजी से छिपाओगे?
हरिदास ने जवाब दिया—मैं तो चाहता हूँ कि नयी मशीन का रुपया अदा हो जाय तो उन्हें ले जाकर सब कुछ दिखा दूँ। तब तक ड़ाक्टर साहब की हिदायत के अनुसार तीन महीने पूरे भी हो जायेंगे।
देवकी—लेकिन इस छिपाने से क्या फायदा, जब वे आठों पहर इसी की रट लगाये रहते हैं। इससे तो चिन्ता और बढ़ती ही है, कम नहीं होती। अससे तो यही अच्छा है, कि उनसे सब कुछ कह दिय जाए।
हरिदास—मेरे कहने का तो उन्हें यकीन आ चुका। हां, दीनानाथ कहें तो शायद यकीन हो
देवकी—अच्छा तो कल दीनानाथ को यहां भेज दो। लालाजी उसे देखते ही खुद बुला लेंगे, तुम्हें इस रोज-रोज की डांट-फ़टकर से तो छुट्टी मिल जाएगी।
हरिदास—अब मुझे इन फटकारों का जरा भी दुख नहीं होता। मेरी मेहनत और योग्यता का नतीजा आंखों के सामने मौजूद है। जब मैंने कारखाना आने हाथ में लिया था, आमदनी और खर्च का मीज़ान मुश्किल से बैठता था। आज पांच से का नफा है। तीसरा महीना खत्म होनेवाला है और मैं मशीन की आधी कीमत अदा कर चुका। शायद अगले महीने दो महीने में पूरी कीमत अदा हो जायेगी। उस वक्त से कारखाने का खर्च तिगुने से ज्यादा है लेकिन आमदनी पंचगुनी हो गयी है। हजरत देखेंगे तो आंखें खुल जाएंगी। कहां हाते में उल्लू बोलते थे। एक मेज़ पर बैठे आप ऊंघा करते थे, एक पर दीनानाथ कान कुरेदा करता था। मिस्त्री और फायरमैन ताश खेलते थ। बस, दो-चार घण्टे चक्की चल जाती थी। अब दम मारने की फुरसत नहीं है। सारी ज़िन्दगी में जो कुछ न कर सके वह मैंने तीन महीने मे करके दिखा दिया। इसी तजुर्बे और कार्रवाई पर आपको इतना घमण्ड था। जितना काम वह एक महीने में करते थे उतना मैं रोज कर ड़ालता हूँ।
देवकी ने भर्त्सनापूर्ण नेत्रों से देखकर कहा—अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना कोई तुमसे सीख ले! जिस तरह मां अपने बेटे को हमेशा दुबला ही समझती है, उसी तरह बाप बेटे को हमेशा नादान समझा करता है। यह उनकी ममता है, बुरा मानने की बात नहीं है।
हरिदास ने लज्जित होकर सर झुका लिया।
दूसरे रोज दीनानाथ उनको देखने के बहाने से लाला हरनामदास की सेवा में उपस्थित हुआ। लालाजी उसे देखते ही तकिये के सहारे उठ बैठे और पागलों की तरह बेचैन होकर पूछा—क्यों, कारबार सब तबाह हो गया कि अभी कुछ कसर बाकी है! तुम लोगों ने मुझे मुर्दा समझ लिया है। कभी बात तक न पूछी। कम से कम मुझे ऐसी उम्मीद न थी। बहू ने मेरी तीमारदारी ने की होती तो मर ही गया होती
दीनानाथ—आपका कुशल-मंगल रोज बाबू साहब से पूछ लिया करता था। आपने मेरे साथ जो नेकियां की हैं, उन्हें मैं भूल नहीं सकता। मेरा एक-एक रोआं आपका एहसानमन्द है। मगर इस बीच काम ही कुछ एकस था कि हाज़िर होने की मोहलत न मिली।
हरनामदास—खैर, कारखाने का क्या हाल है? दीवाला होने में क्या कसर बाकी है?
दीनानाथ ने ताज्जुब के साथ कहा—यह आपसे किसने कह दिया कि दीवाला होनेवाला है? इस अरसे में कारोबार में जो तरक्की हुई है, वह आप खुद अपनी आंखों से देख लेंगे।
हरनामदास व्यंग्यपूर्वक बोले—शायद तुम्हारे बाबू साहब ने तुम्हारी मनचाही तरक्की कर दी! अच्छा अब स्वामिभक्ति छोड़ो और साफ बतलाआ। मैंने ताकीद कर दी थी कि कारखाने का इन्तज़ाम तुम्हारे हाथ में रहेगा। मगर शायद हरिदास ने सब कुछ अपने हाथ में रखा।
दीनानाथ—जी हां, मगर मुझे इसका जरा भी दुख नहीं। वही रइस काम के लिए ठीक भी थे। जो कुछ उन्होंने कर दिखाया, वह मुझसे हरगिज न हो सकता।
हरनामदास—मुझे यह सुन-सुनकर हैरत होती है। बतलाओ, क्या तरक्की हुई?
दीनानाथ—तफ़सील तो बहुत ज्यादा होगी, मगर थोड़े मे यह समझ लीजिए कि पहले हम लोग जितना काम एक महीने में करते थे उतना अब रोज होता है। नयी मशीन आयी थी, उसकी आधी, कीमत अदा हो चुकी है। वह अक्सर रात को भी चलती है। ठाकुर कम्पनी का पांच हजार मन आटे का ठेका लिया था, वह पूरा होनेवाला है। जगतराम बनवारीलाल से कमसरियट का ठेका लिया है। उन्होंने हमको पांच सौ बोरे महावार का बयाना दिया है। इसी तरह और फुटकर काम कई गुना बढ़ गया है। आमदनी के साथ खर्च भी
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लाला हरनामदास रात को भले-चंगे सोये लेकिन अपने बेटे की गुस्ताख़ियां और कुछ अपने कारबार की सुस्ती और मन्दी उनकी आत्मा के लिए भयानक कष्ट का कारण हो गयीं और चाहे इसी उद्विग्नता का असर हो, चाहे बुढापे का, सुबह होने से पहले उन पर लकवे का हमला हो गय। जबान बन्द हो गयी और चेहरा ऐंठ गया। हरिदास ड़ाक्टर के पास दौड़ा। ड़ाक्टर आये, मरीज़ को देखा और बोले—डरने की कोई बात नहीं। सेहत होगी मगर तीन महीने से कम न लगेंगे। चिन्ताओं के कारण यह हमला हुआ है इसलिए कोशिश करनी चाहिये कि वह आराम से सोयें, परेशान न हों और जबान खुल जाने पर भी जहां तक मुमकिन हो, बोलने से बचें।
बेचारी देवकी बैठी रो रही थी। हरिदास ने आकर उसको सान्त्वना दी, और फिर ड़ाक्टर के यहां से दवा लाकर दी। थोड़ी देर में मरीज को होश आया, इधर-उधर कुछ खोजती हुई-सी निगाहों से देखा कि जैसे कुछ कहना चाहते हैं और फिर इशारे से लिखन के लिए कागज मांगा। हरिदास ने कागज और पेंसिल रख दी, तो बूढ़े लाला साहब ने हाथों को खूब सम्हालकर लिख—इन्तजाम दीनानाथ के हाथ मे रहे।
ये शब्द हरिदास के हृदय में तीर की तरह लगे। अफ़सोस! अब भी मुझ पर भरोसा नहीं! यानी कि दीनानाथ मेरा मालिक होगा और मैं उसका गुलाम बनकर रहूँगा! यह नहीं होने का। काग़ज़ लिए देवकी के पास आये और बोले—लालाजी ने दीनानाथ को मैनेजर बनाया है, उन्हें मुझ पर इतना एतबार भी नहीं हैं, लेकिन मैं इस मौके को हाथ से न दूंगा। उनकी बीमारी का अफ़सोस तो जरूर है मगर शायद परमात्मा ने मुझे अपनी योग्यता दिखलाने का यह अवसर दिया है। और इससे मैं जरूर फायदा उठाऊँगा। कारखाने के कर्मचारियों ने इस दुर्घटना की खबर सुनी तो बहुत घबराये। उनमें कई निकम्मे, बेमसरफ़ आदमी भरे हुए थे, जो सिर्फ खुशामद और चिकनी-चुपड़ी बातों की रोटी खाते थे। मिस्त्री ने कई दूसरे कारखानों में मरम्मत का काम उठा लिया था रोज किसी-न-किसी बहाने से खिसक जाता था। फायरमैन और मशीनमैन दिन को झूठ-मूठ चक्की की सफाई में काटते थे और रात के काम करके ओवर टाइम की मजदूरी लिया करते थे। दीनानाथ जरूर होशियार और तजुर्बेकार आदमी था, मगर उसे भी काम करने के मुकाबिले में ‘जी हां’ रटते रहने में ज्यादा मजा आता था। लाला हरनामदास मजदूरी देन में बहुत हीले-हवाले किया करते थे और अक्सर काट-कपट के भी आदी थे। इसी को वह कारबार का अच्छा उसूल समझाते थे।
हरिदास ने कारखाने में पहुँचते ही साफ शब्दों कह दिय कि तुम लोगों को मेरे वक्त में जी लगाकर काम करना होगा। मैं इसी महीन में काम देखकर सब की तरक्की करूंगा। मगर अब टाल-मटोल का गुजर नहीं, जिन्हें मंजूर न हो वह अपना बोरिया-बिस्तर सम्हालें और फिर दीनानाथ को बुलाकर कहा-भाई साहब, मुझे खूब मालूम है कि आप होशियार और सूझ-बूझ रखनेवाले आदमी हैं। आपने अब तक यह यहां का जो रंग देखा, वही अख्तियार किया है। लेकिन अब मुझे आपके तजुर्बे और मेहनत की जरूरत है। पुराने हिसाबों की जांच-पड़ताल किजिए। बाहर से काम मेरा जिम्मा है लेकिन यहां का इन्तजाम आपके सुपुर्द है। जो कुछ नफा होगा, उसमें आपका भी हिस्सा होगा। मैं चाहता हूँ कि दादा की अनुपस्थिति में कुछ अच्छा काम करके दिखाऊँ।
इस मुस्तैदी और चुस्ती का असर बहुत जल्द कारखाने में नजर आने लगा। हरिदास ने खूब इश्तहार बंटवाये। उसका असर यह हुआ कि काम आने लगा। दीनानाथ की मुस्तैदी की बदौलत ग्राहकों को नियत समय पर और किफायत से आटा मिलने लगा। पहला महीना भी खत्म न हुआ था कि हरिदास ने नयी मशीन मंगवायी। थोड़े अनुभवी आदमी रख लिये, फिर क्या था, सारे शहर में इस कारखाने की धूम मच गयी। हरिदास ग्राहकों से इतनी अच्छी तरह से पेश आता कि जो एक बार उससे मुआमला करता वह हमेशा के लिए उसका खरीदार बन जाता। कर्मचारियों के साथ उसका सिद्धांत था—काम सख्त और मजदूरी ठीक। उसके ऊंचे व्यक्तित्व का भी स्पस्ट प्रभाव दिखाई पड़ा। करीब-करीब सभी कारखानों का रंग फीका पड़ गया। उसने बहुत ही कम नफे पर ठेले ले लिये। मशीन को दम मारने की मोहलत न थी, रात और दिन काम होता था। तीसरा महीना खत्म होते-होते उस कारखाने की शकल ही बदल गयी। हाते में घुसते ही ठेले और गाडियों की भीड़ नज़र आती थी। कारखाने में बड़ी चहल-पहल थी-हर आदमी अपने अपने काम में लगा हुआ। इसके साथ की प्रबन्ध कौशल का यह वरदान था कि भद्दी हड़बड़ी और जल्दबाजी का कहीं निशान न था।
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लाला हरनामदास धीरे-धीरे ठीक होने लगे। एक महीने के बाद वह रूककर कुछ बोलने लगे। ड़ाक्टर की सख्त ताकीद थी कि उन्हे पूरी शान्ति की स्थिति में रखा जाय मगर जब उनकी जबान खुली उन्हें एक दम को भी चैन न था। देवकी से कहा करते—सारा कारबार मिट्टी में मिल जाता है। यह लड़का मालूम नहीं क्या कर रहा है, सारा काम अपने हाथ में ले रखा है। मैंने ताकीद कर दी थी कि दीनानाथ को मैनेजर बनाना लेकिन उसने जरा भी परवाह न की। मेरी सारी उम्र की कमाई बरबाद हुई जाती है।
बेचारी देवकी बैठी रो रही थी। हरिदास ने आकर उसको सान्त्वना दी, और फिर ड़ाक्टर के यहां से दवा लाकर दी। थोड़ी देर में मरीज को होश आया, इधर-उधर कुछ खोजती हुई-सी निगाहों से देखा कि जैसे कुछ कहना चाहते हैं और फिर इशारे से लिखन के लिए कागज मांगा। हरिदास ने कागज और पेंसिल रख दी, तो बूढ़े लाला साहब ने हाथों को खूब सम्हालकर लिख—इन्तजाम दीनानाथ के हाथ मे रहे।
ये शब्द हरिदास के हृदय में तीर की तरह लगे। अफ़सोस! अब भी मुझ पर भरोसा नहीं! यानी कि दीनानाथ मेरा मालिक होगा और मैं उसका गुलाम बनकर रहूँगा! यह नहीं होने का। काग़ज़ लिए देवकी के पास आये और बोले—लालाजी ने दीनानाथ को मैनेजर बनाया है, उन्हें मुझ पर इतना एतबार भी नहीं हैं, लेकिन मैं इस मौके को हाथ से न दूंगा। उनकी बीमारी का अफ़सोस तो जरूर है मगर शायद परमात्मा ने मुझे अपनी योग्यता दिखलाने का यह अवसर दिया है। और इससे मैं जरूर फायदा उठाऊँगा। कारखाने के कर्मचारियों ने इस दुर्घटना की खबर सुनी तो बहुत घबराये। उनमें कई निकम्मे, बेमसरफ़ आदमी भरे हुए थे, जो सिर्फ खुशामद और चिकनी-चुपड़ी बातों की रोटी खाते थे। मिस्त्री ने कई दूसरे कारखानों में मरम्मत का काम उठा लिया था रोज किसी-न-किसी बहाने से खिसक जाता था। फायरमैन और मशीनमैन दिन को झूठ-मूठ चक्की की सफाई में काटते थे और रात के काम करके ओवर टाइम की मजदूरी लिया करते थे। दीनानाथ जरूर होशियार और तजुर्बेकार आदमी था, मगर उसे भी काम करने के मुकाबिले में ‘जी हां’ रटते रहने में ज्यादा मजा आता था। लाला हरनामदास मजदूरी देन में बहुत हीले-हवाले किया करते थे और अक्सर काट-कपट के भी आदी थे। इसी को वह कारबार का अच्छा उसूल समझाते थे।
हरिदास ने कारखाने में पहुँचते ही साफ शब्दों कह दिय कि तुम लोगों को मेरे वक्त में जी लगाकर काम करना होगा। मैं इसी महीन में काम देखकर सब की तरक्की करूंगा। मगर अब टाल-मटोल का गुजर नहीं, जिन्हें मंजूर न हो वह अपना बोरिया-बिस्तर सम्हालें और फिर दीनानाथ को बुलाकर कहा-भाई साहब, मुझे खूब मालूम है कि आप होशियार और सूझ-बूझ रखनेवाले आदमी हैं। आपने अब तक यह यहां का जो रंग देखा, वही अख्तियार किया है। लेकिन अब मुझे आपके तजुर्बे और मेहनत की जरूरत है। पुराने हिसाबों की जांच-पड़ताल किजिए। बाहर से काम मेरा जिम्मा है लेकिन यहां का इन्तजाम आपके सुपुर्द है। जो कुछ नफा होगा, उसमें आपका भी हिस्सा होगा। मैं चाहता हूँ कि दादा की अनुपस्थिति में कुछ अच्छा काम करके दिखाऊँ।
इस मुस्तैदी और चुस्ती का असर बहुत जल्द कारखाने में नजर आने लगा। हरिदास ने खूब इश्तहार बंटवाये। उसका असर यह हुआ कि काम आने लगा। दीनानाथ की मुस्तैदी की बदौलत ग्राहकों को नियत समय पर और किफायत से आटा मिलने लगा। पहला महीना भी खत्म न हुआ था कि हरिदास ने नयी मशीन मंगवायी। थोड़े अनुभवी आदमी रख लिये, फिर क्या था, सारे शहर में इस कारखाने की धूम मच गयी। हरिदास ग्राहकों से इतनी अच्छी तरह से पेश आता कि जो एक बार उससे मुआमला करता वह हमेशा के लिए उसका खरीदार बन जाता। कर्मचारियों के साथ उसका सिद्धांत था—काम सख्त और मजदूरी ठीक। उसके ऊंचे व्यक्तित्व का भी स्पस्ट प्रभाव दिखाई पड़ा। करीब-करीब सभी कारखानों का रंग फीका पड़ गया। उसने बहुत ही कम नफे पर ठेले ले लिये। मशीन को दम मारने की मोहलत न थी, रात और दिन काम होता था। तीसरा महीना खत्म होते-होते उस कारखाने की शकल ही बदल गयी। हाते में घुसते ही ठेले और गाडियों की भीड़ नज़र आती थी। कारखाने में बड़ी चहल-पहल थी-हर आदमी अपने अपने काम में लगा हुआ। इसके साथ की प्रबन्ध कौशल का यह वरदान था कि भद्दी हड़बड़ी और जल्दबाजी का कहीं निशान न था।
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लाला हरनामदास धीरे-धीरे ठीक होने लगे। एक महीने के बाद वह रूककर कुछ बोलने लगे। ड़ाक्टर की सख्त ताकीद थी कि उन्हे पूरी शान्ति की स्थिति में रखा जाय मगर जब उनकी जबान खुली उन्हें एक दम को भी चैन न था। देवकी से कहा करते—सारा कारबार मिट्टी में मिल जाता है। यह लड़का मालूम नहीं क्या कर रहा है, सारा काम अपने हाथ में ले रखा है। मैंने ताकीद कर दी थी कि दीनानाथ को मैनेजर बनाना लेकिन उसने जरा भी परवाह न की। मेरी सारी उम्र की कमाई बरबाद हुई जाती है।
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मुबारक बीमारी - प्रेमचंद
रात के नौ बज गये थे, एक युवती अंगीठी के सामने बैठी हुई आग फूंकती थी और उसके गाल आग के कुन्दनी रंग में दहक रहे थ। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें दरवाजे की तरफ़ लगी हुई थीं। कभी चौंककर आंगन की तरफ़ ताकती, कभी कमरे की तरफ़। फिर आनेवालों की इस देरी से त्योरियों पर बल पड़ जाते और आंखों में हलका-सा गुस्सा नजर आता। कमल पानी में झकोले खाने लगता।
इसी बीच आनेवालों की आहट मिली। कहर बाहर पड़ा खर्राटे ले रहा था। बूढ़े लाला हरनामदास ने आते ही उसे एक ठोकर लगाकर कहा-कम्बख्त, अभी शाम हुई है और अभी से लम्बी तान दी!
नौजवान लाला हरिदास घर मे दाखिल हुए—चेहरा बुझा हुआ, चिन्तित। देवकी ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया और गुस्से व प्यार की मिली ही हुई आवाज में बोली—आज इतनी देर क्यों हुई?
दोनों नये खिले हुए फूल थे—एक पर ओस की ताज़गी थी, दूसरा धूप से मुरझाया हुआ।
हरिदास—हां, आज देर हो गयी, तुम यहां क्यों बैठी रहीं?
देवकी—क्या करती, आग बुझी जाती थी, खाना न ठन्डा हो जाता।
हरिदास—तुम ज़रा-से-काम के लिए इतनी आग के सामने न बैठा करो। बाज आया गरम खाने से।
देवकी—अच्छा, कपड़े तो उतारो, आज इतनी देर क्यों की?
हरिदास—क्या बताऊँ, पिताजी ने ऐसा नाक में दम कर दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता। इस रोज-रोज की झंझट से तो यही अच्छा कि मैं कहीं और नौकरी कर लूं।
लाला हरनामदास एक आटे की चक्की के मालिक थे। उनकी जवानी के दिनों में आस-पास दूसरी चक्की न थी। उन्होंने खूब धन कमाया। मगर अब वह हालत न थी। चक्कियां कीड़े-मकोडों की तरह पैदा हो गयी थीं, नयी मशीनों और ईजादों के साथ। उसके काम करनेवाले भी जोशीले नौजवान थे, मुस्तैदी से काम करते थे। इसलिए हरनामदास का कारखाना रोज गिरता जाता था। बूढ़े आदमियों को नयी चीजों से चिढ़ हो जाती है। वह लाला हरनामदास को भी थी। वह अपनी पुरानी मशीन ही को चलाते थे, किसी किस्म की तरक्की या सुधार को पाप समझते थे, मगर अपनी इस मन्दी पर कुढा करते थे। हरिदास ने उनकी मर्जी के खिलाफ़ कालेजियेट शिक्षा प्राप्त की थी और उसका इरादा था कि अपने पिता के कारखाने को नये उसूलों पर चलाकर आगे बढायें। लेकिन जब वह उनसे किसी परिवर्तन या सुधार का जिक्र करता तो लाला साहब जामे से बाहर हो जाते और बड़े गर्व से कहते—कालेज में पढ़ने से तजुर्बा नहीं आता। तुम अभी बच्चे हो, इस काम में मेरे बाल सफेद हो गये हैं, तुम मुझे सलाह मत दो। जिस तरह मैं कहता हूँ, काम किये जाओ।
कई बार ऐसे मौके आ चुके थे कि बहुत ही छोटे मसलों में अपने पिता की मर्जी के खिलाफ काम करने के जुर्म में हरिदास को सख्त फटकारें पड़ी थीं। इसी वजह से अब वह इस काम में कुछ उदासीन हो गया थ और किसी दूसरे कारखाने में किस्मत आजमाना चाहता था जहां उसे अपने विचारों को अमली सूरत देने की ज्यादा सहूलतें हासिल हों।
देवकी ने सहानुभूतिपूर्वक कहा—तुम इस फिक्र में क्यों जान खपाते हो, जैसे वह कहें, वैसे ही करो, भला दूसरी जगह नौकरी कर लोगे तो वह क्या कहेगे? और चाहे वे गुस्से के मारे कुछ न बोलें, लेकिन दुनिया तो तुम्हीं को बुरा कहेगी।
देवकी नयी शिक्षा के आभूषण से वंचित थी। उसने स्वार्थ का पाठ न पढा था, मगर उसका पति अपने ‘अलमामेटर’ का एक प्रतिष्ठित सदस्य था। उसे अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा था। उस पर नाम कमाने का जोश। इसलिए वह बूढ़े पिता के पुराने ढर्रो को देखकर धीरज खो बैठता था। अगर अपनी योग्यताओं के लाभप्रद उपयोग की कोशिश के लिए दुनिया उसे बुरा कहे, तो उसकी परवाह न थी। झुंझलाकर बोला—कुछ मैं अमरित की घरिया पीकर तो नहीं आया हूँ कि सारी उम्र उनके मरने का इंतजार करूँ। मूर्खों की अनुचित टीका-टिप्पणियों के डर से क्या अपनी उम्र बरबार कर दूं? मैं अपने कुछ हमउम्रों को जानता हूँ जो हरगिज मेरी-सी योग्यता नहीं रखते। लेकिन वह मोटर पर हवा खाने निकलते हैं, बंगलों में रहते हैं और शान से जिन्दगी बसर करते हैं तो मैं क्यों हाथ पर हाथ रखे जिन्दगी को अमर समझे बैठा रहूँ! सन्तोष और निस्पृहता का युग बीत गया। यह संघर्ष का युग है। यह मैं जानता हूँ कि पिता का आदर करना मेरा धर्म है। मगर सिद्धांतों के मामले में मैं उनसे क्या, किसी से भी नहीं दब सकता।
इसी बीच कहार ने आकर कहा—लाला जी थाली मांगते हैं।
लाल हरनामदास हिन्दू रस्म-रिवाज के बड़े पाबन्द थे। मगर बुढापे के कारण चौक के चक्कर से मुक्ति पा चुके थे। पहले कुछ दिनों तक जाड़ों में रात को पूरियां न हजम होती थीं इसलिए चपातियां ही अपनी बैठक में मंगा लिया करते थे। मजबूरी ने वह कराया था जो हुज्जत और दलील के काबू से बाहर था।
हरिदास के लिए भी देवकी ने खाना निकाला। पहले तो वह हजरत बहुत दुखी नजर आते थे, लेकिन बघार की खुशबू ने खाने के लिए चाव पैदा कर दिया था। अक्सर हम अपनी आंख और नाक से हाजमे का काम लिया करते हैं।
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रात के नौ बज गये थे, एक युवती अंगीठी के सामने बैठी हुई आग फूंकती थी और उसके गाल आग के कुन्दनी रंग में दहक रहे थ। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें दरवाजे की तरफ़ लगी हुई थीं। कभी चौंककर आंगन की तरफ़ ताकती, कभी कमरे की तरफ़। फिर आनेवालों की इस देरी से त्योरियों पर बल पड़ जाते और आंखों में हलका-सा गुस्सा नजर आता। कमल पानी में झकोले खाने लगता।
इसी बीच आनेवालों की आहट मिली। कहर बाहर पड़ा खर्राटे ले रहा था। बूढ़े लाला हरनामदास ने आते ही उसे एक ठोकर लगाकर कहा-कम्बख्त, अभी शाम हुई है और अभी से लम्बी तान दी!
नौजवान लाला हरिदास घर मे दाखिल हुए—चेहरा बुझा हुआ, चिन्तित। देवकी ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया और गुस्से व प्यार की मिली ही हुई आवाज में बोली—आज इतनी देर क्यों हुई?
दोनों नये खिले हुए फूल थे—एक पर ओस की ताज़गी थी, दूसरा धूप से मुरझाया हुआ।
हरिदास—हां, आज देर हो गयी, तुम यहां क्यों बैठी रहीं?
देवकी—क्या करती, आग बुझी जाती थी, खाना न ठन्डा हो जाता।
हरिदास—तुम ज़रा-से-काम के लिए इतनी आग के सामने न बैठा करो। बाज आया गरम खाने से।
देवकी—अच्छा, कपड़े तो उतारो, आज इतनी देर क्यों की?
हरिदास—क्या बताऊँ, पिताजी ने ऐसा नाक में दम कर दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता। इस रोज-रोज की झंझट से तो यही अच्छा कि मैं कहीं और नौकरी कर लूं।
लाला हरनामदास एक आटे की चक्की के मालिक थे। उनकी जवानी के दिनों में आस-पास दूसरी चक्की न थी। उन्होंने खूब धन कमाया। मगर अब वह हालत न थी। चक्कियां कीड़े-मकोडों की तरह पैदा हो गयी थीं, नयी मशीनों और ईजादों के साथ। उसके काम करनेवाले भी जोशीले नौजवान थे, मुस्तैदी से काम करते थे। इसलिए हरनामदास का कारखाना रोज गिरता जाता था। बूढ़े आदमियों को नयी चीजों से चिढ़ हो जाती है। वह लाला हरनामदास को भी थी। वह अपनी पुरानी मशीन ही को चलाते थे, किसी किस्म की तरक्की या सुधार को पाप समझते थे, मगर अपनी इस मन्दी पर कुढा करते थे। हरिदास ने उनकी मर्जी के खिलाफ़ कालेजियेट शिक्षा प्राप्त की थी और उसका इरादा था कि अपने पिता के कारखाने को नये उसूलों पर चलाकर आगे बढायें। लेकिन जब वह उनसे किसी परिवर्तन या सुधार का जिक्र करता तो लाला साहब जामे से बाहर हो जाते और बड़े गर्व से कहते—कालेज में पढ़ने से तजुर्बा नहीं आता। तुम अभी बच्चे हो, इस काम में मेरे बाल सफेद हो गये हैं, तुम मुझे सलाह मत दो। जिस तरह मैं कहता हूँ, काम किये जाओ।
कई बार ऐसे मौके आ चुके थे कि बहुत ही छोटे मसलों में अपने पिता की मर्जी के खिलाफ काम करने के जुर्म में हरिदास को सख्त फटकारें पड़ी थीं। इसी वजह से अब वह इस काम में कुछ उदासीन हो गया थ और किसी दूसरे कारखाने में किस्मत आजमाना चाहता था जहां उसे अपने विचारों को अमली सूरत देने की ज्यादा सहूलतें हासिल हों।
देवकी ने सहानुभूतिपूर्वक कहा—तुम इस फिक्र में क्यों जान खपाते हो, जैसे वह कहें, वैसे ही करो, भला दूसरी जगह नौकरी कर लोगे तो वह क्या कहेगे? और चाहे वे गुस्से के मारे कुछ न बोलें, लेकिन दुनिया तो तुम्हीं को बुरा कहेगी।
देवकी नयी शिक्षा के आभूषण से वंचित थी। उसने स्वार्थ का पाठ न पढा था, मगर उसका पति अपने ‘अलमामेटर’ का एक प्रतिष्ठित सदस्य था। उसे अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा था। उस पर नाम कमाने का जोश। इसलिए वह बूढ़े पिता के पुराने ढर्रो को देखकर धीरज खो बैठता था। अगर अपनी योग्यताओं के लाभप्रद उपयोग की कोशिश के लिए दुनिया उसे बुरा कहे, तो उसकी परवाह न थी। झुंझलाकर बोला—कुछ मैं अमरित की घरिया पीकर तो नहीं आया हूँ कि सारी उम्र उनके मरने का इंतजार करूँ। मूर्खों की अनुचित टीका-टिप्पणियों के डर से क्या अपनी उम्र बरबार कर दूं? मैं अपने कुछ हमउम्रों को जानता हूँ जो हरगिज मेरी-सी योग्यता नहीं रखते। लेकिन वह मोटर पर हवा खाने निकलते हैं, बंगलों में रहते हैं और शान से जिन्दगी बसर करते हैं तो मैं क्यों हाथ पर हाथ रखे जिन्दगी को अमर समझे बैठा रहूँ! सन्तोष और निस्पृहता का युग बीत गया। यह संघर्ष का युग है। यह मैं जानता हूँ कि पिता का आदर करना मेरा धर्म है। मगर सिद्धांतों के मामले में मैं उनसे क्या, किसी से भी नहीं दब सकता।
इसी बीच कहार ने आकर कहा—लाला जी थाली मांगते हैं।
लाल हरनामदास हिन्दू रस्म-रिवाज के बड़े पाबन्द थे। मगर बुढापे के कारण चौक के चक्कर से मुक्ति पा चुके थे। पहले कुछ दिनों तक जाड़ों में रात को पूरियां न हजम होती थीं इसलिए चपातियां ही अपनी बैठक में मंगा लिया करते थे। मजबूरी ने वह कराया था जो हुज्जत और दलील के काबू से बाहर था।
हरिदास के लिए भी देवकी ने खाना निकाला। पहले तो वह हजरत बहुत दुखी नजर आते थे, लेकिन बघार की खुशबू ने खाने के लिए चाव पैदा कर दिया था। अक्सर हम अपनी आंख और नाक से हाजमे का काम लिया करते हैं।
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समावर्तन (उपदेश) संस्कार
ब्रह्मचर्य व्रत के समापन व विद्यार्थी जीवन के अंत के सूचक के रूप में समावर्तन (उपदेश) संस्कार मनाया जाता है, जो साधारणतया 25 वर्ष की आयु में होता है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु शिष्य को इंद्रिय निग्रह, दान, दया और मानव कल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद में लिखा है
युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो 3 मनसा देवयन्तः॥
-ऋग्वेद 3/8/4
अर्थात् युवा पुरुष उत्तम वस्त्रों को धारण किए हुए, उपवीत (ब्रह्मचारी) सब विद्या से प्रकाशित जब गृहाश्रम में आता है, तब वह प्रसिद्ध होकर श्रेय मंगलकारी शोभायुक्त होता है। उसको धीर, बुद्धिमान्, विद्वान्, अच्छे ध्यान युक्त मन से विद्या प्रकाश की कामना करते हुए, ऊंचे पद पर बैठाते हैं।
अथर्ववेद 11/7/26 में लिखे मंत्र का अर्थ है कि ब्रह्मचारी समस्त धातुओं को धारण कर समुद्र के समान ज्ञान में गंभीर सलिल जीवनाधार प्रभु के आनन्द रस में विभोर होकर तपस्वी होता है। वह स्नातक होकर नम्र, शक्तिमान् और पिंगल दीप्तिमान् बनकर पृथ्वी पर सुशोभित होता है।
इस समावर्तन संस्कार के संबंध में कथा प्रचलित है-एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनों ही ब्रह्माजी के पास ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने लगे। कुछ काल बीत जाने पर उन्होंने ब्रह्माजी से उपदेश (समावर्तन) ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। सबसे पहले देवताओं ने कहा-प्रभो! हमें उपदेश दीजिए। प्रजापति ने एक ही अक्षर कह दिया 'द'। इस पर देवताओं ने कहा-'हम समझ गए। हमारे स्वर्गादि लोकों में भोगों की ही भरमार है। उनमें लिप्त होकर हम अंत में स्वर्ग से गिर जाते हैं, अतएव आप हमें 'द' से दमन अर्थात् इंद्रिय संयम का उपदेश कर रहे हैं। तब प्रजापति ब्रह्मा ने कहा-ठीक है, तुम समझ गए।'
फिर मनुष्यों को भी 'द' अक्षर दिया गया, तो उन्होंने कहा-हमें 'द' से दान करने का उपदेश दिया है, क्योंकि हम लोग जीवन भर संग्रह करने की ही लिप्सा में लगे रहते हैं । अतएव हमारा दान में ही कल्याण है। प्रजापति इस जवाब से संतुष्ट हुए।
असुरों को भी ब्रह्मा ने उपदेश में 'द' अक्षर ही दिया। असुरों ने सोचा-हमारा स्वभाव हिंसक है और क्रोध व हिंसा हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त है, तो निश्चय ही हमारे कल्याण के लिए दया ही एकमात्र मार्ग होगा। दया से ही हम इन दुष्कर्मों को छोड़कर पाप से मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार हमें 'द' से दया अर्थात् प्राणि-मात्र पर दया करने का उपदेश दिया है। ब्रह्मा ने कहा- ठीक है, तुम समझ गए। निश्चय ही दमन, दान और दया जैसे उपदेश को प्रत्येक मनुष्य को सीखकर अपनाना उन्नति का मार्ग होगा।
ब्रह्मचर्य व्रत के समापन व विद्यार्थी जीवन के अंत के सूचक के रूप में समावर्तन (उपदेश) संस्कार मनाया जाता है, जो साधारणतया 25 वर्ष की आयु में होता है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु शिष्य को इंद्रिय निग्रह, दान, दया और मानव कल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद में लिखा है
युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो 3 मनसा देवयन्तः॥
-ऋग्वेद 3/8/4
अर्थात् युवा पुरुष उत्तम वस्त्रों को धारण किए हुए, उपवीत (ब्रह्मचारी) सब विद्या से प्रकाशित जब गृहाश्रम में आता है, तब वह प्रसिद्ध होकर श्रेय मंगलकारी शोभायुक्त होता है। उसको धीर, बुद्धिमान्, विद्वान्, अच्छे ध्यान युक्त मन से विद्या प्रकाश की कामना करते हुए, ऊंचे पद पर बैठाते हैं।
अथर्ववेद 11/7/26 में लिखे मंत्र का अर्थ है कि ब्रह्मचारी समस्त धातुओं को धारण कर समुद्र के समान ज्ञान में गंभीर सलिल जीवनाधार प्रभु के आनन्द रस में विभोर होकर तपस्वी होता है। वह स्नातक होकर नम्र, शक्तिमान् और पिंगल दीप्तिमान् बनकर पृथ्वी पर सुशोभित होता है।
इस समावर्तन संस्कार के संबंध में कथा प्रचलित है-एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनों ही ब्रह्माजी के पास ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने लगे। कुछ काल बीत जाने पर उन्होंने ब्रह्माजी से उपदेश (समावर्तन) ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। सबसे पहले देवताओं ने कहा-प्रभो! हमें उपदेश दीजिए। प्रजापति ने एक ही अक्षर कह दिया 'द'। इस पर देवताओं ने कहा-'हम समझ गए। हमारे स्वर्गादि लोकों में भोगों की ही भरमार है। उनमें लिप्त होकर हम अंत में स्वर्ग से गिर जाते हैं, अतएव आप हमें 'द' से दमन अर्थात् इंद्रिय संयम का उपदेश कर रहे हैं। तब प्रजापति ब्रह्मा ने कहा-ठीक है, तुम समझ गए।'
फिर मनुष्यों को भी 'द' अक्षर दिया गया, तो उन्होंने कहा-हमें 'द' से दान करने का उपदेश दिया है, क्योंकि हम लोग जीवन भर संग्रह करने की ही लिप्सा में लगे रहते हैं । अतएव हमारा दान में ही कल्याण है। प्रजापति इस जवाब से संतुष्ट हुए।
असुरों को भी ब्रह्मा ने उपदेश में 'द' अक्षर ही दिया। असुरों ने सोचा-हमारा स्वभाव हिंसक है और क्रोध व हिंसा हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त है, तो निश्चय ही हमारे कल्याण के लिए दया ही एकमात्र मार्ग होगा। दया से ही हम इन दुष्कर्मों को छोड़कर पाप से मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार हमें 'द' से दया अर्थात् प्राणि-मात्र पर दया करने का उपदेश दिया है। ब्रह्मा ने कहा- ठीक है, तुम समझ गए। निश्चय ही दमन, दान और दया जैसे उपदेश को प्रत्येक मनुष्य को सीखकर अपनाना उन्नति का मार्ग होगा।
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*_मनोरमा जी का चेहरा, जो सुबह से बुझा हुआ था, अचानक से बल्ब की तरह जल उठा। उनकी आँखों में वही पुरानी चमक लौट आई।_*
*_"अरे पगली, बस इतनी सी बात? मुझे लगा पता नहीं क्या हो गया। तू लेट, मैं अभी बनाती हूँ। और सुन, शाम के लिए पकौड़े भी तल दूँ? मौसम अच्छा है।"_*
*_"बिल्कुल माँ जी!" सुमन ने उत्साह से कहा। "मुझे भी आपके हाथ के आलू-प्याज़ के पकौड़े खाने हैं।"_*
*_मनोरमा जी पल्लू कसते हुए, एक नई ऊर्जा के साथ रसोई की तरफ भागीं। खट-खट, छन-छन की आवाज़ें आने लगीं। वह शोर नहीं था, वह मनोरमा जी के ज़िंदा होने का संगीत था।_*
*_सुमन ने छिपकर दरवाजे से देखा। मनोरमा जी गैस के सामने ऐसे खड़ी थीं जैसे कोई महारानी अपने सिंहासन पर खड़ी हो। वह हुक्म चला रही थीं—"अरे सुरेश (नौकर), ज़रा बेसन का डिब्बा तो उतार।"_*
*_उस रात खाने के बाद, सुमन धीरे से मनोरमा जी के पास गई।_*
*_"माँ जी, एक बात कहूँ?"_*
*_"हाँ बोल बहू।"_*
*_"हम एक सौदा कर लें?" सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "सुबह की भागदौड़ वाली रसोई मेरी, क्योंकि उसमें सिर्फ़ पेट भरना होता है। लेकिन शाम की और छुट्टी वाली रसोई आपकी, क्योंकि उसमें 'स्वाद' और 'प्यार' चाहिए होता है। मुझसे यह भारी काम अकेले नहीं होता। मुझे आपकी मदद चाहिए। मैं आपकी असिस्टेंट बनूँगी, सब्जियां काट दूँगी, आटा लगा दूँगी... लेकिन 'हेड शेफ' आप ही रहेंगी।"_*
*_मनोरमा जी ने सुमन को गले लगा लिया। उनकी आँखों में फिर आंसू थे, लेकिन इस बार ये खुशी के थे। उन्हें समझ आ गया था कि बहू ने कामचोरी के लिए नहीं, बल्कि उनका मान रखने के लिए यह कहा है।_*
*_"चल पगली," मनोरमा जी ने हंसते हुए कहा। "मक्खन लगाना तो कोई तुझसे सीखे। ठीक है, मंजूर है सौदा।"_*
*_उस दिन सुमन ने जाना कि घर की ज़िम्मेदारी लेने का मतलब सिर्फ़ 'काम करना' नहीं होता, बल्कि घर के हर सदस्य को यह महसूस कराना होता है कि वे 'ज़रूरी' हैं। उसने अपनी सास को आराम नहीं, बल्कि उनका खोया हुआ 'वजूद' लौटा दिया था।_*
*_अब उस घर की रसोई में दो रानियों का राज था। एक के पास जोश था, और दूसरे के पास तजुर्बा। और जिस घर में ये दोनों मिल जाएं, वहां का खाना कभी बेस्वाद नहीं हो सकता।_*
*_"अरे पगली, बस इतनी सी बात? मुझे लगा पता नहीं क्या हो गया। तू लेट, मैं अभी बनाती हूँ। और सुन, शाम के लिए पकौड़े भी तल दूँ? मौसम अच्छा है।"_*
*_"बिल्कुल माँ जी!" सुमन ने उत्साह से कहा। "मुझे भी आपके हाथ के आलू-प्याज़ के पकौड़े खाने हैं।"_*
*_मनोरमा जी पल्लू कसते हुए, एक नई ऊर्जा के साथ रसोई की तरफ भागीं। खट-खट, छन-छन की आवाज़ें आने लगीं। वह शोर नहीं था, वह मनोरमा जी के ज़िंदा होने का संगीत था।_*
*_सुमन ने छिपकर दरवाजे से देखा। मनोरमा जी गैस के सामने ऐसे खड़ी थीं जैसे कोई महारानी अपने सिंहासन पर खड़ी हो। वह हुक्म चला रही थीं—"अरे सुरेश (नौकर), ज़रा बेसन का डिब्बा तो उतार।"_*
*_उस रात खाने के बाद, सुमन धीरे से मनोरमा जी के पास गई।_*
*_"माँ जी, एक बात कहूँ?"_*
*_"हाँ बोल बहू।"_*
*_"हम एक सौदा कर लें?" सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "सुबह की भागदौड़ वाली रसोई मेरी, क्योंकि उसमें सिर्फ़ पेट भरना होता है। लेकिन शाम की और छुट्टी वाली रसोई आपकी, क्योंकि उसमें 'स्वाद' और 'प्यार' चाहिए होता है। मुझसे यह भारी काम अकेले नहीं होता। मुझे आपकी मदद चाहिए। मैं आपकी असिस्टेंट बनूँगी, सब्जियां काट दूँगी, आटा लगा दूँगी... लेकिन 'हेड शेफ' आप ही रहेंगी।"_*
*_मनोरमा जी ने सुमन को गले लगा लिया। उनकी आँखों में फिर आंसू थे, लेकिन इस बार ये खुशी के थे। उन्हें समझ आ गया था कि बहू ने कामचोरी के लिए नहीं, बल्कि उनका मान रखने के लिए यह कहा है।_*
*_"चल पगली," मनोरमा जी ने हंसते हुए कहा। "मक्खन लगाना तो कोई तुझसे सीखे। ठीक है, मंजूर है सौदा।"_*
*_उस दिन सुमन ने जाना कि घर की ज़िम्मेदारी लेने का मतलब सिर्फ़ 'काम करना' नहीं होता, बल्कि घर के हर सदस्य को यह महसूस कराना होता है कि वे 'ज़रूरी' हैं। उसने अपनी सास को आराम नहीं, बल्कि उनका खोया हुआ 'वजूद' लौटा दिया था।_*
*_अब उस घर की रसोई में दो रानियों का राज था। एक के पास जोश था, और दूसरे के पास तजुर्बा। और जिस घर में ये दोनों मिल जाएं, वहां का खाना कभी बेस्वाद नहीं हो सकता।_*
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कहानी का समय
*रसोई की दो रानियाँ*
*_सुमन की शादी को अभी बीस दिन ही हुए थे।_*
*_विदाई के वक्त उसकी माँ ने समझाया था, "बेटी, ससुराल में अपनी जगह बनानी है तो काम से जी मत चुराना। सास को पूरा आराम देना।" सुमन ने माँ की यह सीख गांठ बांध ली थी।_*
*_सुबह के छह बजते ही सुमन बिस्तर छोड़ देती।_* *_नहा-धोकर, पूजा करके सीधे रसोई में मोर्चा संभाल लेती। उसकी सास, मनोरमा जी, जो पिछले पैंतीस सालों से इस घर की धुरी थीं, जब सुबह सात बजे अपनी आदत के मुताबिक रसोई की ओर बढ़तीं, तो देखतीं कि चाय की केतली से भाप निकल रही है, नाश्ते की तैयारी पूरी है और रोटियों के लिए आटा लग चुका है।_*
*_शुरुआत के दो-चार दिन तो मनोरमा जी को बहुत अच्छा लगा। पड़ोसियों से कहती फिरीं, "मेरी बहू तो हीरा है, मुझे तो रसोई में पैर ही नहीं रखने देती। कहती है—माँ जी, अब आपकी उम्र आराम करने की है।"_*
*_लेकिन जैसे- जैसे दिन बीतते गए, वह 'आराम' मनोरमा जी को काटने लगा।_*
*_आज रविवार था। घर में सबके लिए छोले-भटूरे बनने थे। मनोरमा जी को छोले बनाने का बहुत शौक था। उनके हाथ के 'अमृतसरी छोले' पूरे खानदान में मशहूर थे। वह बड़े उत्साह से रसोई की तरफ बढ़ीं। उन्होंने सोचा कि आज बहू को सिखाएंगी कि मसालों का सही अनुपात क्या होता है।_*
*_जैसे ही वह रसोई के दरवाजे पर पहुंचीं, उनके कदम ठिठक गए।_*
*_सुमन पहले से वहां मौजूद थी। कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था और छोले उबल चुके थे। खुशबू बता रही थी कि तड़का लग चुका है।_*
*_"अरे बहू," मनोरमा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "तूने छोले बना भी दिए? मैं सोच रही थी कि आज मैं बनाती। सबको मेरे हाथ का स्वाद पसंद है।"_*
*_सुमन ने मुस्कुराते हुए, बिना रुके भटूरे बेलते हुए कहा, "माँ जी, आप क्यों तकलीफ करती हैं? मैंने यूट्यूब पर आपकी रेसिपी देख ली थी, कोशिश की है वैसा ही बनाने की। आप बस डाइनिंग टेबल पर बैठिए, मैं_*
*_गरमा-गरम लाती हूँ।"_*
*_मनोरमा जी चुपचाप वहां से हट गईं। वह जाकर अपने कमरे में खिड़की के पास बैठ गईं। बाहर का मौसम सुहाना था, लेकिन उनके अंदर एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था।_*
*_उन्हें लगा जैसे उनके हाथों से सिर्फ़ करछुल नहीं छीनी गई है, बल्कि इस घर पर उनकी 'सत्ता' छीन ली गई है। पिछले पैंतीस सालों से, रसोई उनका साम्राज्य था। कौन क्या खाएगा, कब खाएगा, यह सब वह तय करती थीं। इसी बहाने बेटे-पति उनसे जुड़े रहते थे। "माँ, नमक कम है," या "माँ, आज वो बना दो"—ये संवाद ही तो उनकी अहमियत का सुबूत थे।_*
*_लेकिन अब?_*
*_नाश्ते की मेज पर सबने सुमन के छोलों की तारीफ की।_*
*_"वाह सुमन! मज़ा आ गया," पति ने कहा।_*
*_"बिल्कुल माँ के हाथ जैसा स्वाद है," ससुर जी ने भी हामी भरी।_*
*_मनोरमा जी चुपचाप खाती रहीं। किसी ने नोटिस नहीं किया कि उनकी थाली में भटूरा वैसे का वैसा रखा था। उन्हें लग रहा था कि वह धीरे-धीरे इस घर के लिए 'अदृश्य' होती जा रही हैं। अगर काम नहीं, तो उनकी ज़रूरत क्या है? क्या वह सिर्फ़ एक पुरानी कुर्सी की तरह घर के कोने में पड़ी रहने के लिए हैं?_*
*_दोपहर को सुमन जब काम निपटाकर अपने कमरे में आराम करने गई, तो उसे प्यास लगी। वह पानी लेने रसोई में आई। वहां का नज़ारा देख वह हैरान रह गई।_*
*_मनोरमा जी रसोई के स्लैब के पास खड़ी थीं। वह मसालों के डिब्बे (मसालेदानी) को खोलकर एक-एक कटोरी को छू रही थीं। हल्दी, जीरा, धनिया... जैसे कोई माँ अपने बच्चों को सहला रही हो। उनकी आँखों से आंसू टपक रहे थे और मसालों के डिब्बे में गिर रहे थे।_*
*_सुमन दरवाज़े पर ही जम गई। उसे अपनी माँ की कही बात याद आई—"सास को आराम देना।" लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि एक गृहिणी के लिए उसका काम सिर्फ़ 'काम' नहीं, उसकी 'पहचान' होता है। उसे छीन लेना, उसकी पहचान को मिटा देने जैसा है।_*
*_सुमन दबे पाँव वापस मुड़ी। वह अपने कमरे में गई और कुछ देर सोचती रही। उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वह 'आदर्श बहू' बनने की होड़ में यह भूल गई थी कि मनोरमा जी अभी 'रिटायर' होने के लिए तैयार नहीं हैं।_*
*_शाम की चाय का वक्त हुआ।_*
*_रोज की तरह सुमन ने चाय नहीं बनाई। वह अपने कमरे में बैठी रही। साढ़े पांच बज गए। बाहर ससुर जी की आवाज़ आई, "अरे भाई, आज चाय मिलेगी या नहीं?"_*
*_मनोरमा जी ने घड़ी देखी। बहू अभी तक नहीं उठी? कहीं तबीयत तो खराब नहीं?_*
*_वह चिंतित होकर सुमन के कमरे में गईं। "सुमन? बेटा, तबीयत ठीक है?"_*
*_सुमन बिस्तर पर लेटी मोबाइल देख रही थी। उसने उठकर कहा, "हाँ माँ जी, सब ठीक है। बस... आज मेरा चाय बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या आप बना देंगी? और हां, वो अदरक वाली। मेरे हाथ से वो स्वाद ही नहीं आता जो आपके हाथ में है। सुबह छोले भी फीके ही लगे मुझे तो।"_*
*रसोई की दो रानियाँ*
*_सुमन की शादी को अभी बीस दिन ही हुए थे।_*
*_विदाई के वक्त उसकी माँ ने समझाया था, "बेटी, ससुराल में अपनी जगह बनानी है तो काम से जी मत चुराना। सास को पूरा आराम देना।" सुमन ने माँ की यह सीख गांठ बांध ली थी।_*
*_सुबह के छह बजते ही सुमन बिस्तर छोड़ देती।_* *_नहा-धोकर, पूजा करके सीधे रसोई में मोर्चा संभाल लेती। उसकी सास, मनोरमा जी, जो पिछले पैंतीस सालों से इस घर की धुरी थीं, जब सुबह सात बजे अपनी आदत के मुताबिक रसोई की ओर बढ़तीं, तो देखतीं कि चाय की केतली से भाप निकल रही है, नाश्ते की तैयारी पूरी है और रोटियों के लिए आटा लग चुका है।_*
*_शुरुआत के दो-चार दिन तो मनोरमा जी को बहुत अच्छा लगा। पड़ोसियों से कहती फिरीं, "मेरी बहू तो हीरा है, मुझे तो रसोई में पैर ही नहीं रखने देती। कहती है—माँ जी, अब आपकी उम्र आराम करने की है।"_*
*_लेकिन जैसे- जैसे दिन बीतते गए, वह 'आराम' मनोरमा जी को काटने लगा।_*
*_आज रविवार था। घर में सबके लिए छोले-भटूरे बनने थे। मनोरमा जी को छोले बनाने का बहुत शौक था। उनके हाथ के 'अमृतसरी छोले' पूरे खानदान में मशहूर थे। वह बड़े उत्साह से रसोई की तरफ बढ़ीं। उन्होंने सोचा कि आज बहू को सिखाएंगी कि मसालों का सही अनुपात क्या होता है।_*
*_जैसे ही वह रसोई के दरवाजे पर पहुंचीं, उनके कदम ठिठक गए।_*
*_सुमन पहले से वहां मौजूद थी। कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था और छोले उबल चुके थे। खुशबू बता रही थी कि तड़का लग चुका है।_*
*_"अरे बहू," मनोरमा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "तूने छोले बना भी दिए? मैं सोच रही थी कि आज मैं बनाती। सबको मेरे हाथ का स्वाद पसंद है।"_*
*_सुमन ने मुस्कुराते हुए, बिना रुके भटूरे बेलते हुए कहा, "माँ जी, आप क्यों तकलीफ करती हैं? मैंने यूट्यूब पर आपकी रेसिपी देख ली थी, कोशिश की है वैसा ही बनाने की। आप बस डाइनिंग टेबल पर बैठिए, मैं_*
*_गरमा-गरम लाती हूँ।"_*
*_मनोरमा जी चुपचाप वहां से हट गईं। वह जाकर अपने कमरे में खिड़की के पास बैठ गईं। बाहर का मौसम सुहाना था, लेकिन उनके अंदर एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था।_*
*_उन्हें लगा जैसे उनके हाथों से सिर्फ़ करछुल नहीं छीनी गई है, बल्कि इस घर पर उनकी 'सत्ता' छीन ली गई है। पिछले पैंतीस सालों से, रसोई उनका साम्राज्य था। कौन क्या खाएगा, कब खाएगा, यह सब वह तय करती थीं। इसी बहाने बेटे-पति उनसे जुड़े रहते थे। "माँ, नमक कम है," या "माँ, आज वो बना दो"—ये संवाद ही तो उनकी अहमियत का सुबूत थे।_*
*_लेकिन अब?_*
*_नाश्ते की मेज पर सबने सुमन के छोलों की तारीफ की।_*
*_"वाह सुमन! मज़ा आ गया," पति ने कहा।_*
*_"बिल्कुल माँ के हाथ जैसा स्वाद है," ससुर जी ने भी हामी भरी।_*
*_मनोरमा जी चुपचाप खाती रहीं। किसी ने नोटिस नहीं किया कि उनकी थाली में भटूरा वैसे का वैसा रखा था। उन्हें लग रहा था कि वह धीरे-धीरे इस घर के लिए 'अदृश्य' होती जा रही हैं। अगर काम नहीं, तो उनकी ज़रूरत क्या है? क्या वह सिर्फ़ एक पुरानी कुर्सी की तरह घर के कोने में पड़ी रहने के लिए हैं?_*
*_दोपहर को सुमन जब काम निपटाकर अपने कमरे में आराम करने गई, तो उसे प्यास लगी। वह पानी लेने रसोई में आई। वहां का नज़ारा देख वह हैरान रह गई।_*
*_मनोरमा जी रसोई के स्लैब के पास खड़ी थीं। वह मसालों के डिब्बे (मसालेदानी) को खोलकर एक-एक कटोरी को छू रही थीं। हल्दी, जीरा, धनिया... जैसे कोई माँ अपने बच्चों को सहला रही हो। उनकी आँखों से आंसू टपक रहे थे और मसालों के डिब्बे में गिर रहे थे।_*
*_सुमन दरवाज़े पर ही जम गई। उसे अपनी माँ की कही बात याद आई—"सास को आराम देना।" लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि एक गृहिणी के लिए उसका काम सिर्फ़ 'काम' नहीं, उसकी 'पहचान' होता है। उसे छीन लेना, उसकी पहचान को मिटा देने जैसा है।_*
*_सुमन दबे पाँव वापस मुड़ी। वह अपने कमरे में गई और कुछ देर सोचती रही। उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वह 'आदर्श बहू' बनने की होड़ में यह भूल गई थी कि मनोरमा जी अभी 'रिटायर' होने के लिए तैयार नहीं हैं।_*
*_शाम की चाय का वक्त हुआ।_*
*_रोज की तरह सुमन ने चाय नहीं बनाई। वह अपने कमरे में बैठी रही। साढ़े पांच बज गए। बाहर ससुर जी की आवाज़ आई, "अरे भाई, आज चाय मिलेगी या नहीं?"_*
*_मनोरमा जी ने घड़ी देखी। बहू अभी तक नहीं उठी? कहीं तबीयत तो खराब नहीं?_*
*_वह चिंतित होकर सुमन के कमरे में गईं। "सुमन? बेटा, तबीयत ठीक है?"_*
*_सुमन बिस्तर पर लेटी मोबाइल देख रही थी। उसने उठकर कहा, "हाँ माँ जी, सब ठीक है। बस... आज मेरा चाय बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या आप बना देंगी? और हां, वो अदरक वाली। मेरे हाथ से वो स्वाद ही नहीं आता जो आपके हाथ में है। सुबह छोले भी फीके ही लगे मुझे तो।"_*
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