*ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विवाह में गुण मिलान*
एक सफल गृहस्थ जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच गुणों का मिलना बहुत जरुरी होता है, ये गुण कुंडली के द्वारा मिलाए जाते हैं। किसी भी मनुष्य की कुंडली उसकी जन्म तारीख, समय और स्थान के आधार पर बनाई जाती है। जन्म के समय गृह नक्षत्रों की स्थिति को देखते हुए ये कुंडली बनती है। फिर शादी के समय लड़का लड़की का कुंडली मिलान होता है।
वैवाहिक दृष्टि से कुंडली मिलान इन पांच महत्वपूर्ण आधार पर किया जाता है - कुंडली अध्ययन,भाव मिलान, अष्टकूट मिलान, मंगल दोष विचार, दशा विचार। उत्तर भारत में गुण मिलान के लिए अष्टकूट मिलान प्रचलित है जबकि दक्षिण भारत में दसकूट मिलान की विधि अपनाई जाती है। उपरोक्त पांच महत्वपूर्ण पहलुओं में से विचारणीय पहलू अष्टकूट मिलान के महत्वपूर्ण आठ कूटों का विचार होता है। अष्टकूट मिलान अर्थात आठ प्रकार से वर एवं कन्या का परस्पर मिलान को गुण मिलान के रूप में जाना जाता है।
जब भी शादी की बात आती है तो सबसे पहले कुंडली मिलान के बारे में सोच विचार किया जाता है। इसके लिए लड़के और लड़की दोनों के ही वर्ण मिलाए जाते हैं। इससे यह पता चलता है कि दोनों एक दूसरे के लिए बने है या नहीं। शादी विवाह के मामले में कुंडली मिलान को बेहद की खास माना जाता है। कई लोगों का मानना है कि अगर किसी के 36 में से 36 गुण मिलते हैं तो ऐसा होना बहुत ही शुभ रहता है। लेकिन, ऐसा नहीं है। कुंडली मिलान से लोग सिर्फ गुण मिलना ही समझते हैं लेकिन, शादी के लिए और भी कई चीजों को देखा जाता है।
कितने प्रकार के गुण
==============
गुण मिलान में कुल 8 गुण देखे जाते हैं। हर गुण का अपने एक अलग अंक होता है। इसके आधार पर ही यह तय किया जाता है कि कुल कितने गुण मिलते हैं। सबसे पहले जानते हैं 8 गुण क्या है और उनके अंक क्या हैं। वर्ण जिसका अंक 1, वश्य जिसका अंक 2, तारा का अंक 3, योनि का अंक 4 होता है। इसी तरह ग्रह मैत्री 5 अंक, गण 6 अंक, भकूट 7 अंक, नाड़ी 8 अंक इन सभी को मिलाकर कुल 36 गुण बनते हैं।
गुण मिलने पर उत्तम रहता है विवाह
========================
अगर किसी व्यक्ति के 18 से कम गुण मिलते हैं तो ऐसा विवाह के सफल होने की संभावना बहुत कम होती है। वहीं, अगर किसी व्यक्ति के 18 से 25 गुण मिलते हैं तो ऐसा होने विवाह के लिए अच्छा माना जाता है। वहीं, अगर 25 से 32 गुण मिलते हैं तो यह विवाह के लिए उत्तम माने जाते हैं। कहा जाता है कि ऐसा विवाह सफल होते हैं। अगर किसी के 32 से 36 गुण मिलते हैं तो ऐसे होने बहुत ही उत्तम माना जाता है। ऐसा विवाह सफल रहता है।
18 से कम- विवाह योग्य नहीं अथवा असफल विवाह।
18 से 25- विवाह के लिए अच्छा मिलान।
25 से 32- विवाह के उत्तम मिलान, विवाह सफल होता है।
32 से 36- ये अति उत्तम मिलान है, ये विवाह सफल रहता है।
36 गुण मिलना सफल शादी की निशानी
========================
गुण मिलान तो कुंडली मिलाने का एक छोटा सा हिस्सा है। सिर्फ गुण मिलने से किसी की शादी का सफल होना या असफल होने तय नहीं माना जाता है। आपने देखा होगी की कई बार 36 के 36 गुण मिलने के बाद भी व्यक्ति की शादी सफल नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि गुण के अलावा कुंडली में बाकी ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि विवाह स्थान के स्वामी की क्या स्थिति है। कुंडली में 7वें घर विवाह स्थान होता है। कुंडली में 7वें घर से आपको यह भी पता लगा सकता है कि आपका जीवनसाथी स्वभाव से कैसा होगा।
मंगल दोष की जांच बेहद जरुरी
====================
जब भी शादी के लिए कुंडली मिलाएं तो मंगल दोष की जांच कराना सबसे ज्यादा जुड़ी है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल लग्न भाव से पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में होता है ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति मांगलिक कहलाता है। दरअसल, अगर किसी मांगलिक की शादी अगर किसी बिना मांगलिक से हो जाए तो ऐसी शादी के टूटने की संभावना ज्यादा रहती है।
कितने गुण मिलने पर होती है शादी
=========================
विवाह के लिए वर और वधु के कम से कम 18 गुणों का मिलना ठीक माना जाता है। कुल 36 गुणों में से 18 से 21 गुण मिलने पर मिलान मध्यम माना जाता है। इससे अधिक गुण मिलने पर उसे शुभ विवाह मिलान कहते हैं। किसी भी वर और वधु का 36 गुण मिलना अत्यंत ही दुर्लभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि यदि आपकी कुंडली का मिलान 18 गुण से कम यानी 17 गुण होता है, तो विवाह नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा विवाह सुखमय नहीं हो सकता है। इससे बचना चाहिए।
एक सफल गृहस्थ जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच गुणों का मिलना बहुत जरुरी होता है, ये गुण कुंडली के द्वारा मिलाए जाते हैं। किसी भी मनुष्य की कुंडली उसकी जन्म तारीख, समय और स्थान के आधार पर बनाई जाती है। जन्म के समय गृह नक्षत्रों की स्थिति को देखते हुए ये कुंडली बनती है। फिर शादी के समय लड़का लड़की का कुंडली मिलान होता है।
वैवाहिक दृष्टि से कुंडली मिलान इन पांच महत्वपूर्ण आधार पर किया जाता है - कुंडली अध्ययन,भाव मिलान, अष्टकूट मिलान, मंगल दोष विचार, दशा विचार। उत्तर भारत में गुण मिलान के लिए अष्टकूट मिलान प्रचलित है जबकि दक्षिण भारत में दसकूट मिलान की विधि अपनाई जाती है। उपरोक्त पांच महत्वपूर्ण पहलुओं में से विचारणीय पहलू अष्टकूट मिलान के महत्वपूर्ण आठ कूटों का विचार होता है। अष्टकूट मिलान अर्थात आठ प्रकार से वर एवं कन्या का परस्पर मिलान को गुण मिलान के रूप में जाना जाता है।
जब भी शादी की बात आती है तो सबसे पहले कुंडली मिलान के बारे में सोच विचार किया जाता है। इसके लिए लड़के और लड़की दोनों के ही वर्ण मिलाए जाते हैं। इससे यह पता चलता है कि दोनों एक दूसरे के लिए बने है या नहीं। शादी विवाह के मामले में कुंडली मिलान को बेहद की खास माना जाता है। कई लोगों का मानना है कि अगर किसी के 36 में से 36 गुण मिलते हैं तो ऐसा होना बहुत ही शुभ रहता है। लेकिन, ऐसा नहीं है। कुंडली मिलान से लोग सिर्फ गुण मिलना ही समझते हैं लेकिन, शादी के लिए और भी कई चीजों को देखा जाता है।
कितने प्रकार के गुण
==============
गुण मिलान में कुल 8 गुण देखे जाते हैं। हर गुण का अपने एक अलग अंक होता है। इसके आधार पर ही यह तय किया जाता है कि कुल कितने गुण मिलते हैं। सबसे पहले जानते हैं 8 गुण क्या है और उनके अंक क्या हैं। वर्ण जिसका अंक 1, वश्य जिसका अंक 2, तारा का अंक 3, योनि का अंक 4 होता है। इसी तरह ग्रह मैत्री 5 अंक, गण 6 अंक, भकूट 7 अंक, नाड़ी 8 अंक इन सभी को मिलाकर कुल 36 गुण बनते हैं।
गुण मिलने पर उत्तम रहता है विवाह
========================
अगर किसी व्यक्ति के 18 से कम गुण मिलते हैं तो ऐसा विवाह के सफल होने की संभावना बहुत कम होती है। वहीं, अगर किसी व्यक्ति के 18 से 25 गुण मिलते हैं तो ऐसा होने विवाह के लिए अच्छा माना जाता है। वहीं, अगर 25 से 32 गुण मिलते हैं तो यह विवाह के लिए उत्तम माने जाते हैं। कहा जाता है कि ऐसा विवाह सफल होते हैं। अगर किसी के 32 से 36 गुण मिलते हैं तो ऐसे होने बहुत ही उत्तम माना जाता है। ऐसा विवाह सफल रहता है।
18 से कम- विवाह योग्य नहीं अथवा असफल विवाह।
18 से 25- विवाह के लिए अच्छा मिलान।
25 से 32- विवाह के उत्तम मिलान, विवाह सफल होता है।
32 से 36- ये अति उत्तम मिलान है, ये विवाह सफल रहता है।
36 गुण मिलना सफल शादी की निशानी
========================
गुण मिलान तो कुंडली मिलाने का एक छोटा सा हिस्सा है। सिर्फ गुण मिलने से किसी की शादी का सफल होना या असफल होने तय नहीं माना जाता है। आपने देखा होगी की कई बार 36 के 36 गुण मिलने के बाद भी व्यक्ति की शादी सफल नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि गुण के अलावा कुंडली में बाकी ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि विवाह स्थान के स्वामी की क्या स्थिति है। कुंडली में 7वें घर विवाह स्थान होता है। कुंडली में 7वें घर से आपको यह भी पता लगा सकता है कि आपका जीवनसाथी स्वभाव से कैसा होगा।
मंगल दोष की जांच बेहद जरुरी
====================
जब भी शादी के लिए कुंडली मिलाएं तो मंगल दोष की जांच कराना सबसे ज्यादा जुड़ी है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल लग्न भाव से पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में होता है ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति मांगलिक कहलाता है। दरअसल, अगर किसी मांगलिक की शादी अगर किसी बिना मांगलिक से हो जाए तो ऐसी शादी के टूटने की संभावना ज्यादा रहती है।
कितने गुण मिलने पर होती है शादी
=========================
विवाह के लिए वर और वधु के कम से कम 18 गुणों का मिलना ठीक माना जाता है। कुल 36 गुणों में से 18 से 21 गुण मिलने पर मिलान मध्यम माना जाता है। इससे अधिक गुण मिलने पर उसे शुभ विवाह मिलान कहते हैं। किसी भी वर और वधु का 36 गुण मिलना अत्यंत ही दुर्लभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि यदि आपकी कुंडली का मिलान 18 गुण से कम यानी 17 गुण होता है, तो विवाह नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा विवाह सुखमय नहीं हो सकता है। इससे बचना चाहिए।
👍5❤1
देवत्व की वृद्धि करें
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
👉 *महान बनने के लिए आंतरिक द्वंद्व, देवासुर संग्राम लड़ना ही पड़ेगा।* इस संग्राम में देवतत्त्वों की विजय के आधार पर ही महानता प्राप्त हो सकेगी। *इस संग्राम को प्रारंभ करने की रीति यही है कि पहले यह देखा जाय कि मेरे भीतर कौन से आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हैं? उन पर निरंतर कठोर प्रहार करते रहना चाहिए और अन्यों के साथ असहयोग।* किंतु यह अपूर्ण मोर्चा होगा। *मोर्चा पूरा करने के लिए दैव वृत्तियों को पोषित और प्रोत्साहित करना होगा।*
👉 *"इस विधि से युद्ध चलाने पर आसुरी तत्त्व निर्बल और देवतत्त्व प्रबल हो उठेंगे।* एक बार पूर्णतया प्रबल हो जाने पर देवतत्व असुर तत्त्वों को पूरी तरह दबाकर उन्हें नष्ट कर देंगे। मन, बुद्धि और शरीर को अपने अधीन कर लेंगे और तब उस संग्राम में आपकी पूर्ण विजय हो जाएगी। *इस विजय के साथ ही आप स्वभावतः महानता की ओर अग्रसर हो चलेंगे।*
👉 *आसुरी तत्त्वों की निर्बलता और सुरतत्त्वों की प्रबलता एवं प्रोत्साहन का अमोघ उपाय है- "श्रेष्ठता का आवाहन"।* *संसार को सारी श्रेष्ठताएँ ईश्वरीय तत्त्व हैं, उनका आश्रय लेते ही शरीर में, मन और मस्तिष्क में शक्ति के रूप में ईश्वरीय अनुकंपा का प्रवेश होने लगेगा।* जिसको यह अनुकंपा मिल जाए, उसकी विजय को कौन रोक सकता है? हाथ में जो भी कर्तव्य लिया जाय उसे संपूर्ण श्रेष्ठता के साथ किया गया। *जिस विचार को भी स्थान दिया जाय, वह श्रेष्ठ हो।* जिस आकांक्षा एवं कल्पना को जन्म दिया जाय वह श्रेष्ठ, शुद्ध और सार्थक हो। इस प्रकार सब ओर सब प्रकार श्रेष्ठता को आश्रित करने से असुरता को परास्त और देवत्व को प्रबल होते देर न लगेगी।
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
👉 *महान बनने के लिए आंतरिक द्वंद्व, देवासुर संग्राम लड़ना ही पड़ेगा।* इस संग्राम में देवतत्त्वों की विजय के आधार पर ही महानता प्राप्त हो सकेगी। *इस संग्राम को प्रारंभ करने की रीति यही है कि पहले यह देखा जाय कि मेरे भीतर कौन से आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हैं? उन पर निरंतर कठोर प्रहार करते रहना चाहिए और अन्यों के साथ असहयोग।* किंतु यह अपूर्ण मोर्चा होगा। *मोर्चा पूरा करने के लिए दैव वृत्तियों को पोषित और प्रोत्साहित करना होगा।*
👉 *"इस विधि से युद्ध चलाने पर आसुरी तत्त्व निर्बल और देवतत्त्व प्रबल हो उठेंगे।* एक बार पूर्णतया प्रबल हो जाने पर देवतत्व असुर तत्त्वों को पूरी तरह दबाकर उन्हें नष्ट कर देंगे। मन, बुद्धि और शरीर को अपने अधीन कर लेंगे और तब उस संग्राम में आपकी पूर्ण विजय हो जाएगी। *इस विजय के साथ ही आप स्वभावतः महानता की ओर अग्रसर हो चलेंगे।*
👉 *आसुरी तत्त्वों की निर्बलता और सुरतत्त्वों की प्रबलता एवं प्रोत्साहन का अमोघ उपाय है- "श्रेष्ठता का आवाहन"।* *संसार को सारी श्रेष्ठताएँ ईश्वरीय तत्त्व हैं, उनका आश्रय लेते ही शरीर में, मन और मस्तिष्क में शक्ति के रूप में ईश्वरीय अनुकंपा का प्रवेश होने लगेगा।* जिसको यह अनुकंपा मिल जाए, उसकी विजय को कौन रोक सकता है? हाथ में जो भी कर्तव्य लिया जाय उसे संपूर्ण श्रेष्ठता के साथ किया गया। *जिस विचार को भी स्थान दिया जाय, वह श्रेष्ठ हो।* जिस आकांक्षा एवं कल्पना को जन्म दिया जाय वह श्रेष्ठ, शुद्ध और सार्थक हो। इस प्रकार सब ओर सब प्रकार श्रेष्ठता को आश्रित करने से असुरता को परास्त और देवत्व को प्रबल होते देर न लगेगी।
❤2👍1🤯1
महाशिवरात्रि का रहस्य
महाशिवरात्रि का क्याअर्थ है?-
1- हर महीने अमावस्या से पहले आने वाली रात को शिवरात्रि कहा जाता है। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि (Shivratri) को महाशिवरात्रि कहते हैं।
साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।यह रात महीने की सबसे अँधेरी रात होती है।महाशिवरात्रि साल की सबसे अंधेरी रात है और इस रात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है क्योंकि उत्तरायण या सूर्य की उत्तरी गति के पूर्वार्द्ध में आने वाली इस रात को पृथ्वी एक ख़ास स्थिति में आ जाती है, जब हमारी ऊर्जा में एक प्राकृतिक उछाल आता है।
2-शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य की भीतरी ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाती है। यह एक ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है।
3-महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे।
4-इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।
आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है।
5-हम किसी भी देवी - देवता या महात्मा आदि के जन्मदिन को रात्रि से नहीं जोड़ते। श्रीकृष्ण जी का जन्म रात्रि 12 बजे मनाते है फिर भी जन्म रात्रि शब्द का प्रयोग नहीं करते परन्तु इस रात्रि को शिव रात्रि कहा गया है। क्या इस दिन शिव जी का जन्म होता है या अवतार लेते है या अवतरण होता है।वास्तव में रात्रि का अर्थ अज्ञानता से है।
6-अज्ञान रूपी घोर रात्रि जब धरती पर पापा चार ,अत्याचार ,दुराचार फैलता है तब भक्त आत्माये दुखी होकर परमात्मा का आवाहन करती है। तब परमपिता परमात्मा शिव का इस धरती पर अवतरण होता है।आत्मा के अंदर जो अज्ञान रूपी अन्धेरा है वह ज्ञान सूर्य प्रकट होने से दूर हो जाता है।इसलिए इसी कलियुगी तमो प्रधान रूपी रात्रि पर अर्थात कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के समय ( संगम पर) शिव आते है।यही समय है जो आत्मा परमात्मा का सच्चा कुम्भ मेला है ।
7-माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्म से महेश्वर के रूप में) अवतरण हुआ था। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्रीशिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है। इस दिन भगवान शंकर की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शंकर की बारात निकाली जाती है।
8-समुद्र मंथन अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित तिथि थी, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए,देवताओं ने उनके मस्तक पर बेल-पत्र चढ़ाए और जल अर्पित किया तथा चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव के आनंद लेने और जागने के लिए, देवता अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया।
महाशिवरात्रि का क्याअर्थ है?-
1- हर महीने अमावस्या से पहले आने वाली रात को शिवरात्रि कहा जाता है। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि (Shivratri) को महाशिवरात्रि कहते हैं।
साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।यह रात महीने की सबसे अँधेरी रात होती है।महाशिवरात्रि साल की सबसे अंधेरी रात है और इस रात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है क्योंकि उत्तरायण या सूर्य की उत्तरी गति के पूर्वार्द्ध में आने वाली इस रात को पृथ्वी एक ख़ास स्थिति में आ जाती है, जब हमारी ऊर्जा में एक प्राकृतिक उछाल आता है।
2-शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य की भीतरी ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाती है। यह एक ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है।
3-महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे।
4-इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।
आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है।
5-हम किसी भी देवी - देवता या महात्मा आदि के जन्मदिन को रात्रि से नहीं जोड़ते। श्रीकृष्ण जी का जन्म रात्रि 12 बजे मनाते है फिर भी जन्म रात्रि शब्द का प्रयोग नहीं करते परन्तु इस रात्रि को शिव रात्रि कहा गया है। क्या इस दिन शिव जी का जन्म होता है या अवतार लेते है या अवतरण होता है।वास्तव में रात्रि का अर्थ अज्ञानता से है।
6-अज्ञान रूपी घोर रात्रि जब धरती पर पापा चार ,अत्याचार ,दुराचार फैलता है तब भक्त आत्माये दुखी होकर परमात्मा का आवाहन करती है। तब परमपिता परमात्मा शिव का इस धरती पर अवतरण होता है।आत्मा के अंदर जो अज्ञान रूपी अन्धेरा है वह ज्ञान सूर्य प्रकट होने से दूर हो जाता है।इसलिए इसी कलियुगी तमो प्रधान रूपी रात्रि पर अर्थात कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के समय ( संगम पर) शिव आते है।यही समय है जो आत्मा परमात्मा का सच्चा कुम्भ मेला है ।
7-माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्म से महेश्वर के रूप में) अवतरण हुआ था। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्रीशिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है। इस दिन भगवान शंकर की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शंकर की बारात निकाली जाती है।
8-समुद्र मंथन अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित तिथि थी, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए,देवताओं ने उनके मस्तक पर बेल-पत्र चढ़ाए और जल अर्पित किया तथा चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव के आनंद लेने और जागने के लिए, देवता अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया।
9-रात्रि के साथ शिव शब्द इसलिए जोड़ा गया क्योंकि शिव का अर्थ होता है - "वह जो नहीं है"। सृष्टि का अर्थ है - "वह जो है"। इसलिए सृष्टि के स्त्रोत को शिव नाम से जाना गया। शिव शब्द के अर्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह ध्वनि जो की शिव शब्द से जुडी है। यह ध्वनि एक ख़ास ऊर्जा उत्पन्न करती है जो हमें सृष्टि के स्त्रोत तक ले जा सकती है। इसलिए शिव एक शक्तिशाली मन्त्र भी है।
10-शिवरात्रि पर्व भगवान् शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।
समस्त भूतों का अस्तित्व मिटाकर परमात्मा (शिव) से आत्मसाधना करने की रात शिवरात्रि है। इस दिन जीवरूपी चंद्रमा का परमात्मारूपी सूर्य के साथ योग रहता है, अत: शिवरात्रि को लोग जागरण कर व्रत रखते हैं।
11-शिव की हर बात निराली और रहस्यमय है।भोलेनाथ संहार के अधिष्ठाता होने के
बावजूद कल्याण कारक कहलाते हैं।यह सभी जानते हैं कि भगवान शिव संहार शक्ति और तमोगुण के स्वामी है। इसीलिए रात्रि से उनका विशेष लगाव स्वाभाविक है। रात्रि को संहार काल माना जाता है।रात्रि के आते ही सबसे पहले प्रकाश पर अंधकार का साम्राज्य कायम हो जाता है। इसकी वजह यह है कि विनाश में भी सृजन के बीज छुपे रहते हैं। जब तक किसी वस्तु का विनाश नहीं होता है तब तक दूसरी वस्तु का सृजन नहीं होता है।
12-सभी जीव जंतुओं और प्राणियों की कर्म चेष्टाएँ खत्म हो जाती हैं और और निद्रा द्वारा चेतना का भी अंत होता है।पूरी दुनिया रात्रि के समय अचेतन होकर निद्रा में विलीन हो जाती
है।ऐसी परिस्थिति में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रि प्रिय होना सहज होता है। इसी वजह से भोलेनाथ की पूजा-अर्चना इस रात्रि में और हमेशा प्रदोष काल में की जाती है।
13-शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आने का भी एक विशेष अर्थ है।शुक्ल पक्ष में चंद्रमा अपना पूर्ण रूप ले लेता है और कृष्ण पक्ष में धीरे-धीरे चंद्रमा की रोशनी कम होती जाती है।
जैसे जैसे चंद्रमा बढ़ता है, वैसे वैसे संसार के सभी रसवान पदार्थों में वृद्धि और घटने पर सभी पदार्थ क्षीण हो जाते हैं। चंद्रमा के क्षीण होने का असर प्राणियों पर भी पड़ता है।
जब चंद्रमा क्षीण होता है तो जीव जंतुओं के अंतः करण में तामसी शक्तियां प्रबल होने लगती हैं। जिसके कारण उनके अंदर तरह-तरह की अनैतिक और आपराधिक गतिविधियां जन्म लेती हैं।
14- भूत प्रेत भी इन्हीं शक्तियों में से एक है, और शिव को भूत प्रेत का स्वामी माना जाता है। दिन में जब प्रकाश रहता है तब जगत आत्मा अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं, पर रात्रि के अंधकार में यही शक्तियां बलवान हो जाती हैं। इन्हीं शक्तियों का
नाश करने और इन्हें नियंत्रण में रखने के लिए शिव को रात्रि प्रिय माना गया है।जिस प्रकार पानी की गति को रोकने के लिए पुल बनाया जाता है, उसी प्रकार चंद्रमा के क्षीण होने की तिथि आने से पहले उन सभी तामसी शक्तियों का नाश करने के लिए शास्त्रों में शिवरात्रि की आराधना करने का विधान बनाया है।
शिव और महाशिवरात्रि;-
1-शिव शब्द का मतलब है ‘वह जो नहीं है’। सृष्टि वह है – “जो है”। सृष्टि के परे, सृष्टि का स्रोत वह है – “जो नहीं है’। शब्द के अर्थ के अलावा, शब्द की शक्ति, ध्वनि की शक्ति बहुत अहम पहलू है। हम संयोगवश इन ध्वनियों तक नहीं पहुंचे हैं। यह कोई सांस्कृतिक घटना नहीं है, ध्वनि और आकार के बीच के संबंध को जानना एक अस्तित्व संबंधी प्रक्रिया है। हमने पाया कि ‘शि’ ध्वनि, निराकार या रूपरहित यानी जो नहीं है, के सबसे करीब है। शक्ति को संतुलित करने के लिए ‘व’ को जोड़ा गया।
2-अगर कोई सही तैयारी के साथ ‘शि’ शब्द का उच्चारण करता है, तो वह एक उच्चारण से ही अपने भीतर विस्फोट कर सकता है। इस विस्फोट में संतुलन लाने के लिए, इस विस्फोट को नियंत्रित करने के लिए, इस विस्फोट में दक्षता के लिए ‘व’ है। ‘व’ वाम से निकलता है, जिसका मतलब है, किसी खास चीज में दक्षता हासिल करना।इसलिए सही समय पर
जरूरी तैयारी के साथ सही ढंग से इस मंत्र के उच्चारण से मानव शरीर के भीतर ऊर्जा का विस्फोट हो सकता है। ‘शि’ की शक्ति को बहुत से तरीकों से समझा गया है। यह शक्ति अस्तित्व की प्रकृति है।
3-शिव शब्द के पीछे एक पूरा विज्ञान है। यह वह ध्वनि है जो अस्तित्व के परे के आयाम से संबंधित है। उस तत्व – “जो नहीं है” - के सबसे नजदीक ‘शिव’ ध्वनि है। इसके उच्चारण से, वह सब जो आपके भीतर है – आपके कर्मों का ढांचा, मनोवैज्ञानिक ढांचा, भावनात्मक ढांचा, जीवन जीने से इकट्ठा की गई छापें – वह सारा ढेर जो आपने जीवन की प्रक्रिया से गुजरते हुए जमा किया है, उन सब को सिर्फ इस ध्वनि के उच्चारण से नष्ट किया जा सकता है और शून्य में बदला जा सकता है। अगर कोई जरूरी
10-शिवरात्रि पर्व भगवान् शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।
समस्त भूतों का अस्तित्व मिटाकर परमात्मा (शिव) से आत्मसाधना करने की रात शिवरात्रि है। इस दिन जीवरूपी चंद्रमा का परमात्मारूपी सूर्य के साथ योग रहता है, अत: शिवरात्रि को लोग जागरण कर व्रत रखते हैं।
11-शिव की हर बात निराली और रहस्यमय है।भोलेनाथ संहार के अधिष्ठाता होने के
बावजूद कल्याण कारक कहलाते हैं।यह सभी जानते हैं कि भगवान शिव संहार शक्ति और तमोगुण के स्वामी है। इसीलिए रात्रि से उनका विशेष लगाव स्वाभाविक है। रात्रि को संहार काल माना जाता है।रात्रि के आते ही सबसे पहले प्रकाश पर अंधकार का साम्राज्य कायम हो जाता है। इसकी वजह यह है कि विनाश में भी सृजन के बीज छुपे रहते हैं। जब तक किसी वस्तु का विनाश नहीं होता है तब तक दूसरी वस्तु का सृजन नहीं होता है।
12-सभी जीव जंतुओं और प्राणियों की कर्म चेष्टाएँ खत्म हो जाती हैं और और निद्रा द्वारा चेतना का भी अंत होता है।पूरी दुनिया रात्रि के समय अचेतन होकर निद्रा में विलीन हो जाती
है।ऐसी परिस्थिति में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रि प्रिय होना सहज होता है। इसी वजह से भोलेनाथ की पूजा-अर्चना इस रात्रि में और हमेशा प्रदोष काल में की जाती है।
13-शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आने का भी एक विशेष अर्थ है।शुक्ल पक्ष में चंद्रमा अपना पूर्ण रूप ले लेता है और कृष्ण पक्ष में धीरे-धीरे चंद्रमा की रोशनी कम होती जाती है।
जैसे जैसे चंद्रमा बढ़ता है, वैसे वैसे संसार के सभी रसवान पदार्थों में वृद्धि और घटने पर सभी पदार्थ क्षीण हो जाते हैं। चंद्रमा के क्षीण होने का असर प्राणियों पर भी पड़ता है।
जब चंद्रमा क्षीण होता है तो जीव जंतुओं के अंतः करण में तामसी शक्तियां प्रबल होने लगती हैं। जिसके कारण उनके अंदर तरह-तरह की अनैतिक और आपराधिक गतिविधियां जन्म लेती हैं।
14- भूत प्रेत भी इन्हीं शक्तियों में से एक है, और शिव को भूत प्रेत का स्वामी माना जाता है। दिन में जब प्रकाश रहता है तब जगत आत्मा अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं, पर रात्रि के अंधकार में यही शक्तियां बलवान हो जाती हैं। इन्हीं शक्तियों का
नाश करने और इन्हें नियंत्रण में रखने के लिए शिव को रात्रि प्रिय माना गया है।जिस प्रकार पानी की गति को रोकने के लिए पुल बनाया जाता है, उसी प्रकार चंद्रमा के क्षीण होने की तिथि आने से पहले उन सभी तामसी शक्तियों का नाश करने के लिए शास्त्रों में शिवरात्रि की आराधना करने का विधान बनाया है।
शिव और महाशिवरात्रि;-
1-शिव शब्द का मतलब है ‘वह जो नहीं है’। सृष्टि वह है – “जो है”। सृष्टि के परे, सृष्टि का स्रोत वह है – “जो नहीं है’। शब्द के अर्थ के अलावा, शब्द की शक्ति, ध्वनि की शक्ति बहुत अहम पहलू है। हम संयोगवश इन ध्वनियों तक नहीं पहुंचे हैं। यह कोई सांस्कृतिक घटना नहीं है, ध्वनि और आकार के बीच के संबंध को जानना एक अस्तित्व संबंधी प्रक्रिया है। हमने पाया कि ‘शि’ ध्वनि, निराकार या रूपरहित यानी जो नहीं है, के सबसे करीब है। शक्ति को संतुलित करने के लिए ‘व’ को जोड़ा गया।
2-अगर कोई सही तैयारी के साथ ‘शि’ शब्द का उच्चारण करता है, तो वह एक उच्चारण से ही अपने भीतर विस्फोट कर सकता है। इस विस्फोट में संतुलन लाने के लिए, इस विस्फोट को नियंत्रित करने के लिए, इस विस्फोट में दक्षता के लिए ‘व’ है। ‘व’ वाम से निकलता है, जिसका मतलब है, किसी खास चीज में दक्षता हासिल करना।इसलिए सही समय पर
जरूरी तैयारी के साथ सही ढंग से इस मंत्र के उच्चारण से मानव शरीर के भीतर ऊर्जा का विस्फोट हो सकता है। ‘शि’ की शक्ति को बहुत से तरीकों से समझा गया है। यह शक्ति अस्तित्व की प्रकृति है।
3-शिव शब्द के पीछे एक पूरा विज्ञान है। यह वह ध्वनि है जो अस्तित्व के परे के आयाम से संबंधित है। उस तत्व – “जो नहीं है” - के सबसे नजदीक ‘शिव’ ध्वनि है। इसके उच्चारण से, वह सब जो आपके भीतर है – आपके कर्मों का ढांचा, मनोवैज्ञानिक ढांचा, भावनात्मक ढांचा, जीवन जीने से इकट्ठा की गई छापें – वह सारा ढेर जो आपने जीवन की प्रक्रिया से गुजरते हुए जमा किया है, उन सब को सिर्फ इस ध्वनि के उच्चारण से नष्ट किया जा सकता है और शून्य में बदला जा सकता है। अगर कोई जरूरी
👍2
तैयारी और तीव्रता के साथ इस ध्वनि का सही तरीके से उच्चारण करता है, तो यह आपको बिल्कुल नई हकीकत में पहुंचा देगा।
4-स्थायी शांति, जिसे हम शिव कहते हैं, में जब ऊर्जा का पहला स्पंदन हुआ, तो एक नया नृत्य शुरू हुआ। आज भी, वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हुआ है कि अगर खाली स्थान में या उसके आस-पास भी आप इलेक्ट्रोमैगनेटिक ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं, तो सूक्ष्म आणविक कण प्रकट होते हैं और नृत्य करने लगते हैं। तो एक नया नृत्य शुरू हुआ, जिसे
हम सृजन का नृत्य कहते हैं।सृजन के इस नृत्य को - जो खुद ही स्थायी शांति से उत्पन्न हुआ - कई अलग-अलग नाम दिए गए। सृष्टि के उल्लास को प्रस्तुत करने की कोशिश में हमने उसे कई अलग-अलग रूपों में नाम दिया।
5-‘जो नहीं है’, उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे बिंदु, जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं, वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है।
6-वर्तमान में, आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में, सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें, तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है, ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है, वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है।
7-सामान्यतः, जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्य को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने पर, विलीन होने पर ध्यान देते हैं और उनकी उपासना और साधना का उद्देश्य विलयन ही हो, तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं।
8-प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। संसार के अपरिपक्व मस्तिष्कों ने सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है। यह हर ओर है।
9-इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं।
10-शिव शब्द या शिव ध्वनि में वह सब कुछ विसर्जित कर देने की क्षमता है, जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं। वह सब कुछ जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, फिलहाल आप जिसे भी ‘मैं’ मानते हैं, वह मुख्य रूप से विचारों, भावनाओं, कल्पनाओं, मान्यताओं, पक्षपातों और जीवन के पूर्व अनुभवों का एक ढेर है। अगर आप वाकई अनुभव करना चाहते हैं, कि इस पल में क्या है, अगर आप वाकई अगले पल में एक नई हकीकत में कदम रखना चाहते हैं, तो यह तभी हो सकता है जब आप खुद को हर पुरानी चीज़ से आजाद कर दें। वरना आप पुरानी हकीकत को ही अगले पल में खींच लाएंगे।
11-रोज, हर पल, कई दशकों का भार घसीटने का बोझ, जीवन से सारा उल्लास खत्म कर देता है।ज्यादातर लोगों के लिए बचपन की
मुस्कुराहटें और हंसी, नाचना-गाना जीवन से गायब हो गया है और उनके चेहरे इस तरह गंभीर हो गए हैं मानो वे अभी-अभी कब्र से निकले हों। यह सिर्फ बीते हुए कल का बोझ आने वाले कल में ले जाने के कारण होता है। अगर आप एक बिल्कुल नए प्राणी के रूप में आने वाले कल में, अगले पल में कदम रखना चाहते हैं, तो शिव ही इसका उपाय है।
12-तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक
मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को, हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है।
4-स्थायी शांति, जिसे हम शिव कहते हैं, में जब ऊर्जा का पहला स्पंदन हुआ, तो एक नया नृत्य शुरू हुआ। आज भी, वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हुआ है कि अगर खाली स्थान में या उसके आस-पास भी आप इलेक्ट्रोमैगनेटिक ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं, तो सूक्ष्म आणविक कण प्रकट होते हैं और नृत्य करने लगते हैं। तो एक नया नृत्य शुरू हुआ, जिसे
हम सृजन का नृत्य कहते हैं।सृजन के इस नृत्य को - जो खुद ही स्थायी शांति से उत्पन्न हुआ - कई अलग-अलग नाम दिए गए। सृष्टि के उल्लास को प्रस्तुत करने की कोशिश में हमने उसे कई अलग-अलग रूपों में नाम दिया।
5-‘जो नहीं है’, उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे बिंदु, जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं, वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है।
6-वर्तमान में, आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में, सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें, तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है, ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है, वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है।
7-सामान्यतः, जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्य को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने पर, विलीन होने पर ध्यान देते हैं और उनकी उपासना और साधना का उद्देश्य विलयन ही हो, तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं।
8-प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। संसार के अपरिपक्व मस्तिष्कों ने सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है। यह हर ओर है।
9-इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं।
10-शिव शब्द या शिव ध्वनि में वह सब कुछ विसर्जित कर देने की क्षमता है, जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं। वह सब कुछ जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, फिलहाल आप जिसे भी ‘मैं’ मानते हैं, वह मुख्य रूप से विचारों, भावनाओं, कल्पनाओं, मान्यताओं, पक्षपातों और जीवन के पूर्व अनुभवों का एक ढेर है। अगर आप वाकई अनुभव करना चाहते हैं, कि इस पल में क्या है, अगर आप वाकई अगले पल में एक नई हकीकत में कदम रखना चाहते हैं, तो यह तभी हो सकता है जब आप खुद को हर पुरानी चीज़ से आजाद कर दें। वरना आप पुरानी हकीकत को ही अगले पल में खींच लाएंगे।
11-रोज, हर पल, कई दशकों का भार घसीटने का बोझ, जीवन से सारा उल्लास खत्म कर देता है।ज्यादातर लोगों के लिए बचपन की
मुस्कुराहटें और हंसी, नाचना-गाना जीवन से गायब हो गया है और उनके चेहरे इस तरह गंभीर हो गए हैं मानो वे अभी-अभी कब्र से निकले हों। यह सिर्फ बीते हुए कल का बोझ आने वाले कल में ले जाने के कारण होता है। अगर आप एक बिल्कुल नए प्राणी के रूप में आने वाले कल में, अगले पल में कदम रखना चाहते हैं, तो शिव ही इसका उपाय है।
12-तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक
मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को, हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है।
👍1
13-एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणामयी भी हैं। वे बहुत ही उदार दाता हैं।उनकी करुणा के रूप
विलक्षण और अद्भुत रहे हैं।महाशिवरात्रि को मानव शरीर में उर्जाएं कुदरती तौर पर ऊपर की ओर जाती हैं।इसलिए इस रात को हम सब जागें और अपनी रीढ़ सीधी रखें ताकि हम इस रात को मौजूद अद्भुत ऊर्जा के लिए उपलब्ध हो पाएं ।हम सभी इस रात को अपने लिए एक जागरण की रात बनाएं।
14-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति महेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिवहै।शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
15-शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी , मंगलकारी और वह सदा आत्माओं का कल्याण करनेवाला है इसलिए वह सदाशिव है।शिवरात्रि हम सभी की शुभरात्रि है।हम शिवरात्रि के
समय उपवास रखते है और जागरण भी करते है लेकिन क्या उपवास ,जागरण करना ही इस शुभरात्रि का उद्देश्यहै। अगर हम मान भी ले तो उस दिन वॉच मेन भी जागते है तो क्या उनका जागरण नहीं हुआ। वास्तव में, आत्म जागृति की बात है जागरण की बात नहीं है ।
क्या अर्थ है आत्म जागृति का ?-
1-मनुष्य चेतना के दो आया है: एक मूर्च्छा, एक अमूर्च्छा। मूर्च्छा का अर्थ है सोये-सोये जीना; बिना होश के जीना। अमूर्च्छा का अर्थ है, होशपूर्वक जीना; जाग्रत, विवेकपूर्ण। मूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया बुझा है।अमूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया जला है।मूर्च्छा में रोशनी बाहर होती
है।बाहर की रोशनी से ही आदमी चलता है। जहां इंद्रियां ले जाती हैं, वहीं जाता है।क्योंकि अपने स्वरूप का तो कोई बोध नहीं। लोग जो समझा देते हैं, समाज जो बता देता है, वहीं आदमी चल पड़ता है क्योंकि न तो अपनी कोई जड़ें होती हैं अस्तित्व में, न अपना भान होता है। 'मैं कौन हूं,' इसका कोई पता ही नहीं।
2-अमूर्च्छित चित्त, जागा हुआ चित्त बिलकुल दूसरे ही ढंग से जीता है। उसके जीवन की व्यवस्था आमूल से भिन्न होती है। वह दूसरों के कारण नहीं चलता, वह अपने कारण चलता है। वह सुनता सबकी है। वह मानता भीतर की है। वह गुलाम नहीं होता। भीतर की मुक्ति को ही जीवन में उतारता है। कितनी ही अड़चन हो, लेकिन उस मार्ग पर ही यात्रा करता है जो पहुंचायेगा। और कितनी ही सुविधा हो, उस मार्ग पर नहीं जाता, जो कहीं नहीं पहुंचायेगा।
3-अमूर्च्छित व्यक्ति अपने भीतर अपने जीवन की विधि खोजता है। अपने होश में अपने आचरण को खोजता है। अपने अंतःकरण के प्रकाश से चलता है। कितना ही थोड़ा प्रकाश हो अंतःकरण का प्रकाश, सदा पर्याप्त
है।छोटे से छोटा दीया भी इतना तो दिखा ही देता है, कि एक कदम साफ हो जाए। एक कदम चल लो, फिर और एक कदम दिखाई पड़ जाता है। कदम-कदम करके हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है।
4-जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। तुर्या है -चौथी अवस्था। तुर्यावस्था का अर्थ है - परम ज्ञान।
तुर्यावस्था का अर्थ है कि किसी प्रकार का अंधकार भीतर न रह जाये, सभी ज्योतिर्मय हो उठे; जरा सा कोना भी अंतस का अंधकारपूर्ण न हो;सब ओर जागृति का प्रकाश फैल जाये।
अभी जहां हम हैं, वहां या तो हम जाग्रत होते हैं या हम स्वप्न में होते हैं या हम सुषुप्ति में होते हैं। चौथे का हमें कुछ भी पता नहीं है। जब हम जाग्रत होते हैं तो बाहर का जगत तो दिखाई पड़ता है, हम खुद अंधेरे में होते हैं; वस्तुएं तो दिखाई पड़ती हैं, लेकिन स्वयं का कोई बोध नहीं होता; संसार तो दिखाई पड़ता है, लेकिन आत्मा की कोई प्रतीति नहीं होती। यह आधी जाग्रत अवस्था है।
5- सुबह नींद से उठकर...जिसको हम जागरण कहते हैं ; वह अधूरा जागरण है। और अधूरा भी कीमती नहीं है; क्योंकि व्यर्थ तो दिखाई पड़ता है और सार्थक दिखाई नहीं पड़ता। कूड़ा -करकट तो दिखाई पड़ता है, हीरे अंधेरे में खो जाते हैं। खुद तो हम दिखाई नहीं पड़ते कि कौन हैं और सारा संसार दिखाई पड़ता है।दूसरी अवस्था है स्वप्न की। हम तो दिखाई पड़ते
ही नहीं स्वप्न में, बाहर का संसार भी खो जाता है। सिर्फ, संसार से बने हुए प्रतिबिंब मन में तैरते हैं। उन्हीं प्रतिबिंबों को हम जानते और देखते है - जैसे कोई दर्पण में देखता हो.. चांद को या झील पर कोई देखता हो ..आकाश के तारों को। सुबह जागकर हम वस्तुओं को सीधा देखते हैं; स्वप्न में हम वस्तुओं का प्रतिबिंब देखते हैं, वस्तुएं भी नहीं दिखाई पड़ती।
विलक्षण और अद्भुत रहे हैं।महाशिवरात्रि को मानव शरीर में उर्जाएं कुदरती तौर पर ऊपर की ओर जाती हैं।इसलिए इस रात को हम सब जागें और अपनी रीढ़ सीधी रखें ताकि हम इस रात को मौजूद अद्भुत ऊर्जा के लिए उपलब्ध हो पाएं ।हम सभी इस रात को अपने लिए एक जागरण की रात बनाएं।
14-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति महेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिवहै।शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
15-शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी , मंगलकारी और वह सदा आत्माओं का कल्याण करनेवाला है इसलिए वह सदाशिव है।शिवरात्रि हम सभी की शुभरात्रि है।हम शिवरात्रि के
समय उपवास रखते है और जागरण भी करते है लेकिन क्या उपवास ,जागरण करना ही इस शुभरात्रि का उद्देश्यहै। अगर हम मान भी ले तो उस दिन वॉच मेन भी जागते है तो क्या उनका जागरण नहीं हुआ। वास्तव में, आत्म जागृति की बात है जागरण की बात नहीं है ।
क्या अर्थ है आत्म जागृति का ?-
1-मनुष्य चेतना के दो आया है: एक मूर्च्छा, एक अमूर्च्छा। मूर्च्छा का अर्थ है सोये-सोये जीना; बिना होश के जीना। अमूर्च्छा का अर्थ है, होशपूर्वक जीना; जाग्रत, विवेकपूर्ण। मूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया बुझा है।अमूर्च्छा का अर्थ है, भीतर का दीया जला है।मूर्च्छा में रोशनी बाहर होती
है।बाहर की रोशनी से ही आदमी चलता है। जहां इंद्रियां ले जाती हैं, वहीं जाता है।क्योंकि अपने स्वरूप का तो कोई बोध नहीं। लोग जो समझा देते हैं, समाज जो बता देता है, वहीं आदमी चल पड़ता है क्योंकि न तो अपनी कोई जड़ें होती हैं अस्तित्व में, न अपना भान होता है। 'मैं कौन हूं,' इसका कोई पता ही नहीं।
2-अमूर्च्छित चित्त, जागा हुआ चित्त बिलकुल दूसरे ही ढंग से जीता है। उसके जीवन की व्यवस्था आमूल से भिन्न होती है। वह दूसरों के कारण नहीं चलता, वह अपने कारण चलता है। वह सुनता सबकी है। वह मानता भीतर की है। वह गुलाम नहीं होता। भीतर की मुक्ति को ही जीवन में उतारता है। कितनी ही अड़चन हो, लेकिन उस मार्ग पर ही यात्रा करता है जो पहुंचायेगा। और कितनी ही सुविधा हो, उस मार्ग पर नहीं जाता, जो कहीं नहीं पहुंचायेगा।
3-अमूर्च्छित व्यक्ति अपने भीतर अपने जीवन की विधि खोजता है। अपने होश में अपने आचरण को खोजता है। अपने अंतःकरण के प्रकाश से चलता है। कितना ही थोड़ा प्रकाश हो अंतःकरण का प्रकाश, सदा पर्याप्त
है।छोटे से छोटा दीया भी इतना तो दिखा ही देता है, कि एक कदम साफ हो जाए। एक कदम चल लो, फिर और एक कदम दिखाई पड़ जाता है। कदम-कदम करके हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है।
4-जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। तुर्या है -चौथी अवस्था। तुर्यावस्था का अर्थ है - परम ज्ञान।
तुर्यावस्था का अर्थ है कि किसी प्रकार का अंधकार भीतर न रह जाये, सभी ज्योतिर्मय हो उठे; जरा सा कोना भी अंतस का अंधकारपूर्ण न हो;सब ओर जागृति का प्रकाश फैल जाये।
अभी जहां हम हैं, वहां या तो हम जाग्रत होते हैं या हम स्वप्न में होते हैं या हम सुषुप्ति में होते हैं। चौथे का हमें कुछ भी पता नहीं है। जब हम जाग्रत होते हैं तो बाहर का जगत तो दिखाई पड़ता है, हम खुद अंधेरे में होते हैं; वस्तुएं तो दिखाई पड़ती हैं, लेकिन स्वयं का कोई बोध नहीं होता; संसार तो दिखाई पड़ता है, लेकिन आत्मा की कोई प्रतीति नहीं होती। यह आधी जाग्रत अवस्था है।
5- सुबह नींद से उठकर...जिसको हम जागरण कहते हैं ; वह अधूरा जागरण है। और अधूरा भी कीमती नहीं है; क्योंकि व्यर्थ तो दिखाई पड़ता है और सार्थक दिखाई नहीं पड़ता। कूड़ा -करकट तो दिखाई पड़ता है, हीरे अंधेरे में खो जाते हैं। खुद तो हम दिखाई नहीं पड़ते कि कौन हैं और सारा संसार दिखाई पड़ता है।दूसरी अवस्था है स्वप्न की। हम तो दिखाई पड़ते
ही नहीं स्वप्न में, बाहर का संसार भी खो जाता है। सिर्फ, संसार से बने हुए प्रतिबिंब मन में तैरते हैं। उन्हीं प्रतिबिंबों को हम जानते और देखते है - जैसे कोई दर्पण में देखता हो.. चांद को या झील पर कोई देखता हो ..आकाश के तारों को। सुबह जागकर हम वस्तुओं को सीधा देखते हैं; स्वप्न में हम वस्तुओं का प्रतिबिंब देखते हैं, वस्तुएं भी नहीं दिखाई पड़ती।
👍3
6-और तीसरी अवस्था है -जिससे हम परिचित है -बाहर का जगत भी खो जाता है; वस्तुओं का जगत भी अंधेरे में हो जाता है; और प्रतिबिंब भी नहीं दिखाई पड़ते; स्वप्न भी तिरोहित हो जाता है; तब हम गहन अंधकार में पड़ जाते हैं ...उसी को हम सुषुप्ति कहते हैं। सुषुप्ति में न तो बाहर का ज्ञान रहता है,न भीतर का। जाग्रत में बाहर का ज्ञान रहता है। और जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की एक मध्य कड़ी है: स्वप्न, जहां बाहर का ज्ञान तो नहीं होता, लेकिन बाहर की वस्तुओं से बने हुए प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में तैरते है और उन्हीं का ज्ञान होता है।
7-चौथी तुर्या अवस्था है:वही सिद्धावस्था है। सारी चेष्टा उसी को पाने के लिए है। सब
ध्यान, सब योग तुर्यावस्था को पाने के उपाय हैं। तुर्यावस्था का अर्थ है: भीतर और बाहर दोनों का ज्ञान; अंधेरा कहीं भी नहीं— न तो बाहर और न भीतर, पूर्ण जागृति;जिसको हमने बुद्धत्व कहा है, जिसमें न तो बाहर अंधकार है, न भीतर, सब तरफ प्रकाश हो गया है; जिसमें वस्तुओं को भी हम जानते हैं, स्वयं को भी हम जानते है। ऐसी जो चौथी अवस्था है, वह कैसे पाई जाए ..इसके ही सब सूत्र हैं।
क्या हैं मां काली के चरणों के नीचे मुस्कराते
भगवान शंकर का रहस्य ?--
1-भगवती की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली जिनके काले और डरावने रूप की उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एकमात्र ऐसी शक्ति है जिनसे स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है कि संपूर्ण संसार की शक्तियां मिलकर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आकर लेट गए थे।
2-प्रकृति त्रिगुणमयी हैं। हमारे त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश ... तीनो प्रकृति के तीन गुणों (अग्नि, जल, आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं।वे सी क्यूब हैं ;अथार्त रचयिता, पालनकर्ता और विनाशकर्ता...। त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं।ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं।
3-मन के तीन अंग हैं- ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक। इसीलिए इन तीनों अंगों के अनुरूप ज्ञानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग का समन्वय हुआ।जब तक तीनों तत्त्वों का समुचित योग नहीं होता तब तक साधक को सफलता नहीं मिल सकती ;अर्थात जब तक संसार में त्रिगुण के 6 प्रकार के मनुष्यो में शिव नहीं दिखता साधना(.5 ) में भी नहीं पहुंचती।वास्तव में,पहुंचना है तीनों के पार....साढ़े तीन में ...3.5 में।त्रिगुण(.5 )हैं और दूसरा वह परब्रह्म (.5 ) हैं ;वह जहां कोई भी नहीं है, जहां तीनों नहीं हैं।यही हैं शक्तिसहित शिव अर्थात अद्वैत ब्रह्म। वह मूल शक्ति शिव ही हैं।
4-जीवन का मूल उद्देश्य है -शिवत्व की प्राप्ति।शक्ति के बिना ‘शिव’ सिर्फ शव हैं और शिव यानी कल्याण भाव के बिना शक्ति विध्वंसक।शक्ति जाग्रत करके शिव-मिलन कराना -यह क्रम समना तक चलता है।वास्तव में महाशिवरात्रि... रात्रि है,जाग्रत शक्ति को शिव भाव में मिलन कराने की। यही शिव और शक्ति साधना का रहस्य हैं।जो शक्ति जाग्रत करके शिवमिलन नहीं कराता वो रावण बनता हैं।और इस संसार में दोनों की ही आवश्यकता हैं..चाहे दिन और रात हो या श्रीराम और रावण।जीवन का मूल्य, मात्र सफलता में ही नहीं है।
5-सत्य के लिए हार जाना भी जीत है। क्योंकि उसके लिए हारने के साहस में ही आत्मा सबल होती है और इन शिखरों को छू पाती है, जो कि
परमात्मा के प्रकाश में आलोकित हैं।सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्। शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं.. अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मंगल, परम कल्याण।
6-भगवान शंकर महाकाली के चरणों में आकर लेट जाते है अथार्त विध्वंसक महाऊर्जा को आधार देकर महाकल्याणकारी बना देते है।अब ये हम पर निर्भर करता है कि 'हम क्या है', क्या हम दक्ष है जो अपनी शक्ति का शिव से विवाह नहीं कराना चाहता या 'हिमालयराज'?दक्ष का परिणाम भी हम सभी को मालूम है।तो महाशिवरात्रि का मूल उद्देश्य है अपनी ऊर्जा का शिव से मिलन कराने का /अपनी ऊर्जा को शिव का आधार देकर कल्याणकारी बनाने का...।
7-चौथी तुर्या अवस्था है:वही सिद्धावस्था है। सारी चेष्टा उसी को पाने के लिए है। सब
ध्यान, सब योग तुर्यावस्था को पाने के उपाय हैं। तुर्यावस्था का अर्थ है: भीतर और बाहर दोनों का ज्ञान; अंधेरा कहीं भी नहीं— न तो बाहर और न भीतर, पूर्ण जागृति;जिसको हमने बुद्धत्व कहा है, जिसमें न तो बाहर अंधकार है, न भीतर, सब तरफ प्रकाश हो गया है; जिसमें वस्तुओं को भी हम जानते हैं, स्वयं को भी हम जानते है। ऐसी जो चौथी अवस्था है, वह कैसे पाई जाए ..इसके ही सब सूत्र हैं।
क्या हैं मां काली के चरणों के नीचे मुस्कराते
भगवान शंकर का रहस्य ?--
1-भगवती की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली जिनके काले और डरावने रूप की उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एकमात्र ऐसी शक्ति है जिनसे स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है कि संपूर्ण संसार की शक्तियां मिलकर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आकर लेट गए थे।
2-प्रकृति त्रिगुणमयी हैं। हमारे त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश ... तीनो प्रकृति के तीन गुणों (अग्नि, जल, आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं।वे सी क्यूब हैं ;अथार्त रचयिता, पालनकर्ता और विनाशकर्ता...। त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं।ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं।
3-मन के तीन अंग हैं- ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक। इसीलिए इन तीनों अंगों के अनुरूप ज्ञानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग का समन्वय हुआ।जब तक तीनों तत्त्वों का समुचित योग नहीं होता तब तक साधक को सफलता नहीं मिल सकती ;अर्थात जब तक संसार में त्रिगुण के 6 प्रकार के मनुष्यो में शिव नहीं दिखता साधना(.5 ) में भी नहीं पहुंचती।वास्तव में,पहुंचना है तीनों के पार....साढ़े तीन में ...3.5 में।त्रिगुण(.5 )हैं और दूसरा वह परब्रह्म (.5 ) हैं ;वह जहां कोई भी नहीं है, जहां तीनों नहीं हैं।यही हैं शक्तिसहित शिव अर्थात अद्वैत ब्रह्म। वह मूल शक्ति शिव ही हैं।
4-जीवन का मूल उद्देश्य है -शिवत्व की प्राप्ति।शक्ति के बिना ‘शिव’ सिर्फ शव हैं और शिव यानी कल्याण भाव के बिना शक्ति विध्वंसक।शक्ति जाग्रत करके शिव-मिलन कराना -यह क्रम समना तक चलता है।वास्तव में महाशिवरात्रि... रात्रि है,जाग्रत शक्ति को शिव भाव में मिलन कराने की। यही शिव और शक्ति साधना का रहस्य हैं।जो शक्ति जाग्रत करके शिवमिलन नहीं कराता वो रावण बनता हैं।और इस संसार में दोनों की ही आवश्यकता हैं..चाहे दिन और रात हो या श्रीराम और रावण।जीवन का मूल्य, मात्र सफलता में ही नहीं है।
5-सत्य के लिए हार जाना भी जीत है। क्योंकि उसके लिए हारने के साहस में ही आत्मा सबल होती है और इन शिखरों को छू पाती है, जो कि
परमात्मा के प्रकाश में आलोकित हैं।सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्। शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं.. अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मंगल, परम कल्याण।
6-भगवान शंकर महाकाली के चरणों में आकर लेट जाते है अथार्त विध्वंसक महाऊर्जा को आधार देकर महाकल्याणकारी बना देते है।अब ये हम पर निर्भर करता है कि 'हम क्या है', क्या हम दक्ष है जो अपनी शक्ति का शिव से विवाह नहीं कराना चाहता या 'हिमालयराज'?दक्ष का परिणाम भी हम सभी को मालूम है।तो महाशिवरात्रि का मूल उद्देश्य है अपनी ऊर्जा का शिव से मिलन कराने का /अपनी ऊर्जा को शिव का आधार देकर कल्याणकारी बनाने का...।
संसार में दो प्रकार का सुख है। एक विषय सुख और दूसरा आध्यात्मिक सुख। दोनों विपरीत दिशाओं में रखें हैं। *"विषय सुख बाह्य इंद्रियों से मिलता है, जबकि आध्यात्मिक सुख अंदर से मिलता है। रूप रस गन्ध आदि विषयों का सुख, आंख रसना नाक आदि इंद्रियों से भोगा जाता है। जबकि आध्यात्मिक सुख अंदर से अर्थात मन से भोगा जाता है।"*
*"बाह्य विषयों का सुख और आंतरिक आध्यात्मिक सुख, किसी भी व्यक्ति को एक साथ प्राप्त होना दुष्कर है। "यदि वह बाह्य विषयों की ओर दौड़ता है, तो वह आध्यात्मिक सुख से वंचित हो जाएगा। जब वह आध्यात्मिक सुख के लिए प्रयत्न करेगा, तो उसे बाह्य विषयों के सुख छोड़ने पड़ेंगे।"*
बाह्य विषयों का सुख भोगने से व्यक्ति मन इंद्रियों का गुलाम या दास बन जाता है। उसका अपने मन इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रहता।" "जबकि आध्यात्मिक सुख भोगने वाला व्यक्ति अपने मन इंद्रियों का राजा बन जाता है। उसका अपने मन इंद्रियों पर नियंत्रण रहता है, और वह अपनी इच्छा के अनुसार मन इंद्रियों का उपयोग कर सकता है।"*
*"बाह्य विषयों का सुख आंख कान आदि बाह्य इंद्रियों से भोगा जाता है," इस बात को सभी जानते हैं। इसलिए इसकी लंबी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।" "धन खर्च करने पर, भोजन आदि वस्तुओं को खरीदने पर, इस विषय सुख को शीघ्र ही प्राप्त किया जा सकता है।"*
हां, *"जो आंतरिक सुख है, आध्यात्मिक सुख है, वह मन से प्राप्त होता है। उसकी प्राप्ति करने के लिए आपको शुभ कर्म करने होंगे। शुभ कर्मों के करने से वह सुख मन से मिलता है।" "जैसे ईश्वर का ध्यान करना प्रतिदिन यज्ञ करना माता पिता की सेवा करना गौ आदि प्राणियों की रक्षा करना
इन दोनों व्यवस्थाओं को समझें। *"बाह्य विषयों का सुख भोगने पर आपको आंतरिक सुख नहीं मिल पाएगा। और यदि आंतरिक सुख भोगना चाहते हों, तो बाह्य विषयों का सुख छोड़ना होगा।"*
*"बाह्य विषयों का सुख और आंतरिक आध्यात्मिक सुख, किसी भी व्यक्ति को एक साथ प्राप्त होना दुष्कर है। "यदि वह बाह्य विषयों की ओर दौड़ता है, तो वह आध्यात्मिक सुख से वंचित हो जाएगा। जब वह आध्यात्मिक सुख के लिए प्रयत्न करेगा, तो उसे बाह्य विषयों के सुख छोड़ने पड़ेंगे।"*
बाह्य विषयों का सुख भोगने से व्यक्ति मन इंद्रियों का गुलाम या दास बन जाता है। उसका अपने मन इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रहता।" "जबकि आध्यात्मिक सुख भोगने वाला व्यक्ति अपने मन इंद्रियों का राजा बन जाता है। उसका अपने मन इंद्रियों पर नियंत्रण रहता है, और वह अपनी इच्छा के अनुसार मन इंद्रियों का उपयोग कर सकता है।"*
*"बाह्य विषयों का सुख आंख कान आदि बाह्य इंद्रियों से भोगा जाता है," इस बात को सभी जानते हैं। इसलिए इसकी लंबी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।" "धन खर्च करने पर, भोजन आदि वस्तुओं को खरीदने पर, इस विषय सुख को शीघ्र ही प्राप्त किया जा सकता है।"*
हां, *"जो आंतरिक सुख है, आध्यात्मिक सुख है, वह मन से प्राप्त होता है। उसकी प्राप्ति करने के लिए आपको शुभ कर्म करने होंगे। शुभ कर्मों के करने से वह सुख मन से मिलता है।" "जैसे ईश्वर का ध्यान करना प्रतिदिन यज्ञ करना माता पिता की सेवा करना गौ आदि प्राणियों की रक्षा करना
इन दोनों व्यवस्थाओं को समझें। *"बाह्य विषयों का सुख भोगने पर आपको आंतरिक सुख नहीं मिल पाएगा। और यदि आंतरिक सुख भोगना चाहते हों, तो बाह्य विषयों का सुख छोड़ना होगा।"*
👍2
तुम्हारा शरीर पांच तत्वों से मिला है—वायु है, अग्रि है, आकाश है, पृथ्वी है और जल पांचों तत्व हैं, उनसे मिला है। इसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं है। लेकिन तुम्हारी चेतना, तुम्हें पांचों तत्वों में से किसी से भी नहीं मिली। तुम्हारी चेतना तुम्हें मां और पिता से भी नहीं मिली।
तुम जो—जो जानते हो वह तुमने स्कूल, विश्वविद्यालय से सीखा है, शास्त्रों से सुना है, गुरुओं से पाया है। वह तुम्हारे शरीर का हिस्सा है, तुम्हारी आत्मा का नहीं। तुम्हारी आत्मा तो वही है जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिली है। जब तक तुम उस शुद्ध तत्व को न खोज लोगे, जो निपट तुम्हारा है, जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिला है—न मां ने दिया, न पिता ने दिया, न समाज ने, न गुरु ने, न शास्त्र ने वही तुम्हारा स्वभाव है।
तुम जो—जो जानते हो वह तुमने स्कूल, विश्वविद्यालय से सीखा है, शास्त्रों से सुना है, गुरुओं से पाया है। वह तुम्हारे शरीर का हिस्सा है, तुम्हारी आत्मा का नहीं। तुम्हारी आत्मा तो वही है जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिली है। जब तक तुम उस शुद्ध तत्व को न खोज लोगे, जो निपट तुम्हारा है, जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिला है—न मां ने दिया, न पिता ने दिया, न समाज ने, न गुरु ने, न शास्त्र ने वही तुम्हारा स्वभाव है।
👍6
जीवन बड़ा अनिश्चित है क्योंकि यह सदैव चलायमान और परिवर्तनशील है मानव मस्तिष्क के विचार भी प्रतिक्षण बदल रहे हैं। सदैव नयें विचार, नयें उद्देश्य, नईं प्रतिस्पर्धाएं जन्म ले रही हैं। तुम स्वयं अपने भीतर हो रहे परिवर्तन के साक्षी हो। नवीनता के लिए जीवन का परिवर्तन भी आवश्यक हो जाता है। जब तक पुराना नहीं जाता तब तक कुछ नयें आने की संभावना भी नहीं के बराबर है। आज का पतझड़ ही कल का बसंत भी है।
👍4
देव !
===============
🌷भारतवर्ष में देवों का वर्णन बहुत रोचक है । इसमें नदी , पेड़ , पर्वत , पशु और पक्षी भी सम्मिलित कर लिये गये है । ऐसी स्तिथि में यह बहुत आवश्यक है कि शास्त्रों के वचन समझे जाएँ और वेदों की वास्तविक शिक्षाएँ ही जीवन में धारण की जाएँ ।
देव कौन ----
'देव' शब्द के अनेक अर्थ हैं - " देवो दानाद् वा , दीपनाद् वा , द्योतनाद् वा , द्युस्थानो भवतीति वा । " ( निरुक्त - ७ / १५ ) तदनुसार 'देव' का लक्षण है 'दान' अर्थात देना । जो सबके हितार्थ अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु और प्राण भी दे दे , वह देव है । देव का गुण है 'दीपन' अर्थात प्रकाश करना । सूर्य , चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं । देव का कर्म है 'द्योतन' अर्थात सत्योपदेश करना । जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है । देव की विशेषता है 'द्युस्थान' अर्थात ऊपर स्थित होना । ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को , समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को , और राष्ट्र में ऊपर स्थित होने से राजा को भी देव कहते हैं । इस प्रकार 'देव' शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है । हाँ , भाव और प्रयोजन के अनुसार अर्थ भिन्न - भिन्न होते हैं ।
===============
🌷भारतवर्ष में देवों का वर्णन बहुत रोचक है । इसमें नदी , पेड़ , पर्वत , पशु और पक्षी भी सम्मिलित कर लिये गये है । ऐसी स्तिथि में यह बहुत आवश्यक है कि शास्त्रों के वचन समझे जाएँ और वेदों की वास्तविक शिक्षाएँ ही जीवन में धारण की जाएँ ।
देव कौन ----
'देव' शब्द के अनेक अर्थ हैं - " देवो दानाद् वा , दीपनाद् वा , द्योतनाद् वा , द्युस्थानो भवतीति वा । " ( निरुक्त - ७ / १५ ) तदनुसार 'देव' का लक्षण है 'दान' अर्थात देना । जो सबके हितार्थ अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु और प्राण भी दे दे , वह देव है । देव का गुण है 'दीपन' अर्थात प्रकाश करना । सूर्य , चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं । देव का कर्म है 'द्योतन' अर्थात सत्योपदेश करना । जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है । देव की विशेषता है 'द्युस्थान' अर्थात ऊपर स्थित होना । ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को , समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को , और राष्ट्र में ऊपर स्थित होने से राजा को भी देव कहते हैं । इस प्रकार 'देव' शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है । हाँ , भाव और प्रयोजन के अनुसार अर्थ भिन्न - भिन्न होते हैं ।
👍8
स्वप्नशास्त्र
*मत्स्य भगवान द्वारा बताये गए शुभाशुभ स्वप्नों के लक्षण*
*दुःस्वप्न:*
नाभि के अतिरिक्त अन्य अङ्गों में तृण एवं वृक्ष का उगना, मस्तक पर कांसे का कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रों का धारण करना, तेल लगाना, कीच में धँसना, लेप, ऊँचे स्थान से गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहे को इकट्ठा करना, घोड़ों को मारना, लाल पुष्प वाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटों पर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ी का भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणा को छोड़कर अन्य - वाद्यों का स्वागत करना, जल के सोते में स्नान करने के लिये जाना, गोबर लगाकर जल में स्नान करना, इसी प्रकार कीचड् युक्त जल में तथा पृथ्वी के थोड़े जल में नहाना, माता के - उदर में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इन्द्रध्वज का गिरना, चन्द्रमा और सूर्य का पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातों का दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओं का आलिङ्गन, पुरुषों के साथ सम्भोग, अपने ही शरीर का नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशा की यात्रा, किसी व्याधि से पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पों की हानि, घरोंका गिरना, घरों की सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्य के साथ क्रीडा करना, शत्रु से पराजित होना या उसकी ओर से किसी प्रकार की आपत्ति का प्रकट होना, काषाय वस्त्र को धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्री के साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दन को धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखने के बाद दूसरे से कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याण कारक है।
ऐसे स्वप्न देखने पर :
खली लगाकर स्नान, तिल से हवन और ब्राह्मणों का पूजन करे।
भगवान् वासुदेव की स्तुति उनकी पूजा और
गजेन्द्रमोक्ष की कथा का श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये।
रात्रि के पहले पहर में देखे गये स्वप्न देखने वाले को निःसंदेह एक वर्ष में, दूसरे पहर में देखे गये छ: महीने में, तीसरे पहर में देखे गये तीन महीने में तथा चतुर्थ पहर में देखे गये एक महीने में फल देते हैं। सूर्योदय के समय देखे जाने पर दस दिन में ही फल प्राप्त होता है।
यदि एक ही रात में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखने पर मनुष्य को पुनः नहीं सोना चाहिये।
*शुभदायक स्वप्न*
पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ- इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पों वाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभि में वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओं का होना, अनेक सिरोंञका होना, फलदान, उद्भिज्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओं को हाथ से पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुष का आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतों से पृथ्वी को बाँधना, निर्मल आकाश को देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियों को मुख से दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणों की प्रसन्नता ये स्वप्न शुभदायक होते हैं।
गौओं के सींग से चूने वाले अथवा चन्द्रमा से गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्नि का प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नों की प्राप्ति, वीणा का स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानों को पार करना,
घर में हथिनी, घोड़ी तथा गायों का बच्चा देना, घोड़े पर सवार होना तथा रोना-ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियों की प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरों द्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन - ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं।
मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नों को देखकर बिना प्रयास के ही निश्चितरूप में धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोग से मुक्त हो जाता है।
*श्री मत्स्य भगवान की जय*
*मत्स्य भगवान द्वारा बताये गए शुभाशुभ स्वप्नों के लक्षण*
*दुःस्वप्न:*
नाभि के अतिरिक्त अन्य अङ्गों में तृण एवं वृक्ष का उगना, मस्तक पर कांसे का कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रों का धारण करना, तेल लगाना, कीच में धँसना, लेप, ऊँचे स्थान से गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहे को इकट्ठा करना, घोड़ों को मारना, लाल पुष्प वाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटों पर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ी का भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणा को छोड़कर अन्य - वाद्यों का स्वागत करना, जल के सोते में स्नान करने के लिये जाना, गोबर लगाकर जल में स्नान करना, इसी प्रकार कीचड् युक्त जल में तथा पृथ्वी के थोड़े जल में नहाना, माता के - उदर में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इन्द्रध्वज का गिरना, चन्द्रमा और सूर्य का पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातों का दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओं का आलिङ्गन, पुरुषों के साथ सम्भोग, अपने ही शरीर का नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशा की यात्रा, किसी व्याधि से पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पों की हानि, घरोंका गिरना, घरों की सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्य के साथ क्रीडा करना, शत्रु से पराजित होना या उसकी ओर से किसी प्रकार की आपत्ति का प्रकट होना, काषाय वस्त्र को धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्री के साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दन को धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखने के बाद दूसरे से कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याण कारक है।
ऐसे स्वप्न देखने पर :
खली लगाकर स्नान, तिल से हवन और ब्राह्मणों का पूजन करे।
भगवान् वासुदेव की स्तुति उनकी पूजा और
गजेन्द्रमोक्ष की कथा का श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये।
रात्रि के पहले पहर में देखे गये स्वप्न देखने वाले को निःसंदेह एक वर्ष में, दूसरे पहर में देखे गये छ: महीने में, तीसरे पहर में देखे गये तीन महीने में तथा चतुर्थ पहर में देखे गये एक महीने में फल देते हैं। सूर्योदय के समय देखे जाने पर दस दिन में ही फल प्राप्त होता है।
यदि एक ही रात में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखने पर मनुष्य को पुनः नहीं सोना चाहिये।
*शुभदायक स्वप्न*
पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ- इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पों वाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभि में वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओं का होना, अनेक सिरोंञका होना, फलदान, उद्भिज्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओं को हाथ से पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुष का आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतों से पृथ्वी को बाँधना, निर्मल आकाश को देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियों को मुख से दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणों की प्रसन्नता ये स्वप्न शुभदायक होते हैं।
गौओं के सींग से चूने वाले अथवा चन्द्रमा से गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्नि का प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नों की प्राप्ति, वीणा का स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानों को पार करना,
घर में हथिनी, घोड़ी तथा गायों का बच्चा देना, घोड़े पर सवार होना तथा रोना-ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियों की प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरों द्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन - ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं।
मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नों को देखकर बिना प्रयास के ही निश्चितरूप में धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोग से मुक्त हो जाता है।
*श्री मत्स्य भगवान की जय*
❤4👍2
चिकित्साशास्त्र के प्रणेता महर्षि चरक, ' चरक संहिता ' में घोषणा करते हैं कि
सुखार्था: सर्वभुतानी अत: सर्व प्रवृत्तय: ।
सुखं च विनी धर्मात् तस्मात् धर्मपरो भवेत्
अर्थात - संसार के सब प्राणियों की समस्त प्रवृत्तियां,सब भाग दौड़ केवल सुख पाने के लिए ही होती है। दुख पाने के लिए कोई प्रयास नहीं करता। चरक कहते हैं कि सुख बिना धर्म के नही मिलता, इसलिए सबको धर्म परायण होना चाहिए।
सुखार्था: सर्वभुतानी अत: सर्व प्रवृत्तय: ।
सुखं च विनी धर्मात् तस्मात् धर्मपरो भवेत्
अर्थात - संसार के सब प्राणियों की समस्त प्रवृत्तियां,सब भाग दौड़ केवल सुख पाने के लिए ही होती है। दुख पाने के लिए कोई प्रयास नहीं करता। चरक कहते हैं कि सुख बिना धर्म के नही मिलता, इसलिए सबको धर्म परायण होना चाहिए।
👍7❤2
*"ईश्वर के हमेशा निराकार स्वभाव पर ध्यान दें, जो ज्ञान अवतार, चेतना और आनंद है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो उनके साकार रूप पर ध्यान दें जैसा कि आप यहां रात और दिन देखते हैं। जैसा कि आप ऐसा कर रहे हैं, आपका व्रती करेंगे। एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें और ध्याता (ध्यान लगाने वाला), ध्यान (ध्यान का कार्य), ध्येय (इस पर ध्यान) खो जाएगा और ध्यान करने वाला चेतना के साथ एक हो जाएगा और ब्रह्म में विलीन हो जाएगा।"*
*शुभ रात्रि 👏*
*शुभ रात्रि 👏*
❤5👍1
भगवान सर्वत्र विद्यमान है
लेकिन मन से, हृदय में उनका दर्शन तभी सम्भव है जब हमारा मन, अन्तःकरण या चित्त पूर्णतः निर्मल हो जाए
अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है। सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है।
हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे।
भगवान स्वयं कहते हैं-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।
लेकिन मन से, हृदय में उनका दर्शन तभी सम्भव है जब हमारा मन, अन्तःकरण या चित्त पूर्णतः निर्मल हो जाए
अतः भगवान को पाने के लिए हमें कुछ नहीं करना है। सिर्फ हमें अपने मन को निर्मल बना लेना है।
हम अगर यह काम कर ले जाएँ तो भगवान हमें मिल जाएंगे।
भगवान स्वयं कहते हैं-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।
❤9
हमारा बौद्धिक स्तर ही हमें किसी घटना से अधिक अथवा कम प्रभावित करता है। आंतरिक सूझ-बूझ के अभाव में एक धनवान व्यक्ति भी उतना ही दुःखी हो सकता है जितना एक निर्धन व्यक्ति और आंतरिक समझ की बदौलत एक निर्धन व्यक्ति भी उतना ही सुखी हो सकता है जितना एक धनवान.
हरिनाम जप से, सत्संग से, भगवदाश्रय से, महापुरुषों की सन्निधि से ही जीवन में विवेकशीलता एवं आंतरिक समझ का उदय होता है।
हरिनाम जप से, सत्संग से, भगवदाश्रय से, महापुरुषों की सन्निधि से ही जीवन में विवेकशीलता एवं आंतरिक समझ का उदय होता है।
❤5👍2🔥2
कुंडली के गुण मिलान में "तारा दोष"
वर-वधु कुंडली मिलान, पार्टनरशिप , नौकर रखना और मित्रता में तारा मिलान जरूरी
=========================
तारा दोष मिलान को एक प्रकार से 2 अनजान लोगों का भाग्य का मिलान भी कह सकते हैं। या यह भी कह सकते हैं कि दो अनजान लोगों का औरा का मिलान कैसा है ? दोनों की औरा मैच करती है या नहीं।
कुंडली मिलान में ताराएं 9 प्रकार की होती है। जन्म, सम्पत, विपत्त, क्षेम, प्रयतरि, साधक, वध, मित्र, अतिमित्र । इसमें 3,5,7 विपत, प्रयतरि और वध तारा बहुत हानिकारक होती है।
अगर लड़के का नक्षत्र लड़की के नक्षत्र से तीसरा , पाँचवाँ या सातवाँ आता है तो उनकी शादी के बाद या तो विपत्ति आनी शुरू हो जाती है , या एक दूसरे से शस्त्रुता रखते हैं या किसी एक की म्रत्यु हो जाती है।
इसी प्रकार आप किसी के साथ साझेदारी करते हैं तो साझेदार धोखा दे जाता है या मर जाता है। इसी प्रकार आप घर में नौकर या ड्राईवर या बड़ा स्टाफ रखते हैं। और आपकी तारा उनके साथ नहीं मिलती है तो वो भी आपको धोखा दें जाते हैं। या नौकर ही घर के आदमी को मार जाता है।
इसके अलावा कोई भी शुभ काम आप करते हैँ तो जिस दिन वो काम करना चाहते हैं उस दिन के नक्षत्र को अपने नक्षत्र से मिला लेना चाहिए। कही ऐसा न आपने शुभ मुहूर्त देखकर यात्रा शुरू की और रास्ते में दुर्घटना हो गयी।
उदाहरण के लिए आप एक यात्रा पर जा रहे हैं । आपका जन्म का नक्षत्र अश्विनी है। और जिस दिन आप यात्रा पर जा रहे हैं उस दिन का नक्षत्र सातवाँ यानि पुनर्वसु नक्षत्र है जोकि आपके नक्षत्र से वध बनता है । तो आपकी उस यात्रा के समय म्रत्यु भी संभव हो सकती है। इसलिए कुंडली मिलान में तारा दोष के 3 गुण बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं।
वर-वधु कुंडली मिलान, पार्टनरशिप , नौकर रखना और मित्रता में तारा मिलान जरूरी
=========================
तारा दोष मिलान को एक प्रकार से 2 अनजान लोगों का भाग्य का मिलान भी कह सकते हैं। या यह भी कह सकते हैं कि दो अनजान लोगों का औरा का मिलान कैसा है ? दोनों की औरा मैच करती है या नहीं।
कुंडली मिलान में ताराएं 9 प्रकार की होती है। जन्म, सम्पत, विपत्त, क्षेम, प्रयतरि, साधक, वध, मित्र, अतिमित्र । इसमें 3,5,7 विपत, प्रयतरि और वध तारा बहुत हानिकारक होती है।
अगर लड़के का नक्षत्र लड़की के नक्षत्र से तीसरा , पाँचवाँ या सातवाँ आता है तो उनकी शादी के बाद या तो विपत्ति आनी शुरू हो जाती है , या एक दूसरे से शस्त्रुता रखते हैं या किसी एक की म्रत्यु हो जाती है।
इसी प्रकार आप किसी के साथ साझेदारी करते हैं तो साझेदार धोखा दे जाता है या मर जाता है। इसी प्रकार आप घर में नौकर या ड्राईवर या बड़ा स्टाफ रखते हैं। और आपकी तारा उनके साथ नहीं मिलती है तो वो भी आपको धोखा दें जाते हैं। या नौकर ही घर के आदमी को मार जाता है।
इसके अलावा कोई भी शुभ काम आप करते हैँ तो जिस दिन वो काम करना चाहते हैं उस दिन के नक्षत्र को अपने नक्षत्र से मिला लेना चाहिए। कही ऐसा न आपने शुभ मुहूर्त देखकर यात्रा शुरू की और रास्ते में दुर्घटना हो गयी।
उदाहरण के लिए आप एक यात्रा पर जा रहे हैं । आपका जन्म का नक्षत्र अश्विनी है। और जिस दिन आप यात्रा पर जा रहे हैं उस दिन का नक्षत्र सातवाँ यानि पुनर्वसु नक्षत्र है जोकि आपके नक्षत्र से वध बनता है । तो आपकी उस यात्रा के समय म्रत्यु भी संभव हो सकती है। इसलिए कुंडली मिलान में तारा दोष के 3 गुण बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं।
👍6
श्री राम ने कहा " इस चराचर जगत का कोई जीवधारी चाहे वह मेरा द्रोही ही क्यों न हो ,यदि भयभीत तथा हताश होकर ,अति निर्मल मन से मेरी शरण में आता है , तो मैं उसे ठुकराता नहीं हूँ ! वह मेरा प्रिय पात्र बन जाता है क्योकिं शरणागत को अभय दान देना मेरा प्रण है ! याद रखना ,"मम पन सरनागत भयहारी "
विभीषण की 'शरणागति' प्रभु श्रीराम की 'शरणागतवत्सलता' पर हमारी निष्ठां को अविचल करती है ! हमें बताती है कि प्यारे प्रभु के प्रेम पात्र बननेके लिए हमे उनके साथ कितनी और कैसी "प्रीति" करनी होगी ! आधुनिक दिखावे वाली प्रीति से काम नहीं चलेगा !
श्रीरामचरितमानस के अंतिम दो दोहो में तुलसी अपने जीवन भर की भक्ति के अनुभव के आधार पर बताते हैं कि प्रभु की प्रीति, प्रभु की अहेतुकी कृपा तथा उनकी शरणागति पाने के लिए जीवधारियों को उनसे कैसी प्रीति करनी चाहिए :
कामिहि नारि पियरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम !
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम !!
विभीषण की 'शरणागति' प्रभु श्रीराम की 'शरणागतवत्सलता' पर हमारी निष्ठां को अविचल करती है ! हमें बताती है कि प्यारे प्रभु के प्रेम पात्र बननेके लिए हमे उनके साथ कितनी और कैसी "प्रीति" करनी होगी ! आधुनिक दिखावे वाली प्रीति से काम नहीं चलेगा !
श्रीरामचरितमानस के अंतिम दो दोहो में तुलसी अपने जीवन भर की भक्ति के अनुभव के आधार पर बताते हैं कि प्रभु की प्रीति, प्रभु की अहेतुकी कृपा तथा उनकी शरणागति पाने के लिए जीवधारियों को उनसे कैसी प्रीति करनी चाहिए :
कामिहि नारि पियरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम !
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम !!
👍10❤2
यदि मनुष्य जन्म का दुर्लभ अवसर प्राप्त करने के बाद भी हमने परमात्मा से मिलने का यत्न न किया और इस वास्तविक उद्देश्य की और ध्यान न दिया और अपना सारा समय काम-धंधों में व शरीर-इन्द्रियों की तुष्टि में व्यतीत कर दिया तो फ़िर समझो कि हमने अपने जीवन का अनमोल समय यूं ही नष्ट कर दिया l संतो के बचन है कि:--"काम न छोड़ा क्रोध न छोड़ा नाम जपन क्यों छोड़ दिया, कौड़ी को तो तू खूब सम्भाली लाल रतन क्यों छोड दिया" l अर्थात मनुष्य जीवन का मकसद सिर्फ एक ही है कि सांसारिक कामों के साथ-साथ भगवान का भजन करके अपना आत्म कल्याण करना !!
👍5❤1
*अद्या देवा उदिता सूर्यस्य*
*निरंहस: पिपृता निरवद्यात्।*
*तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति:*
*सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:।।*
( ऋग्वेद)
*हे देवों! आज सूर्योदय के समय हमें पाप,निन्द्यकर्म और अपकीर्ति के गति से निकालकर हमारी रक्षा करो। मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ - ये सभी देव हमारी इस प्रार्थना का सम्मान कर इसे पूर्ण करें, हमारी उन्नति और अभिवृद्धि साधित करें।'*
* जय श्री सूर्य देव *
*निरंहस: पिपृता निरवद्यात्।*
*तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति:*
*सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:।।*
( ऋग्वेद)
*हे देवों! आज सूर्योदय के समय हमें पाप,निन्द्यकर्म और अपकीर्ति के गति से निकालकर हमारी रक्षा करो। मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ - ये सभी देव हमारी इस प्रार्थना का सम्मान कर इसे पूर्ण करें, हमारी उन्नति और अभिवृद्धि साधित करें।'*
* जय श्री सूर्य देव *
👏3