*आज से आरम्भ हो रहे पंच दिवसीय दीप पर्व महोत्सव की आप सभी स्वजनों को अनंत हार्दिक शुभकामनायें-*
*1 धनतेरस=* समुद्र मंथन से आयुर्वेद अमृत कलश लिये प्रकट हुये चौदहवें रत्न भगवान् धनवंतरी आपको, आपके पूरे परिवार को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु व उत्कृष्ट रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करें-
*2 रूप चतुर्दशी(नरकचतुर्दशी)=* आप को व आपके परिवार को अप्रतिम सौंदर्य व रूप यौवन प्रदान करें -
*3 दीपावली=* देवी लक्ष्मी आप पर इतनी प्रसन्न हो कि आप के घर को धन धान्य से परिपूर्ण कर आप के पास ही स्थाई वास करे-
*4 गोवर्धन=* आप के सम्पूर्ण खेत-खलिहान, यानी आय के स्त्रोत इतने फलें-फूलें कि आपकी अनन्त पीढ़ियों तक किसी भी वस्तु का अभाव न हो'
*5 भैया दूज=* भाई बहन में अटूट प्रेम दे,बहन कभी अपने आप को असहज महसूस न करे और बहन द्वारा भाई के माथे पर लगाया गया तिलक स्वर्णिम पुष्प की तरह हमेशा महकता रहे-
*यह पांच दिवसीय दीप महोत्सव आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य,सुख-समृद्धि, आत्मसंतोष, शांति, स्फूर्ति और ऊर्जा दायक हो सभी का कल्याण हो ऐसी अनंत मंगलकामना-*
🙏🏻
*1 धनतेरस=* समुद्र मंथन से आयुर्वेद अमृत कलश लिये प्रकट हुये चौदहवें रत्न भगवान् धनवंतरी आपको, आपके पूरे परिवार को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु व उत्कृष्ट रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करें-
*2 रूप चतुर्दशी(नरकचतुर्दशी)=* आप को व आपके परिवार को अप्रतिम सौंदर्य व रूप यौवन प्रदान करें -
*3 दीपावली=* देवी लक्ष्मी आप पर इतनी प्रसन्न हो कि आप के घर को धन धान्य से परिपूर्ण कर आप के पास ही स्थाई वास करे-
*4 गोवर्धन=* आप के सम्पूर्ण खेत-खलिहान, यानी आय के स्त्रोत इतने फलें-फूलें कि आपकी अनन्त पीढ़ियों तक किसी भी वस्तु का अभाव न हो'
*5 भैया दूज=* भाई बहन में अटूट प्रेम दे,बहन कभी अपने आप को असहज महसूस न करे और बहन द्वारा भाई के माथे पर लगाया गया तिलक स्वर्णिम पुष्प की तरह हमेशा महकता रहे-
*यह पांच दिवसीय दीप महोत्सव आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य,सुख-समृद्धि, आत्मसंतोष, शांति, स्फूर्ति और ऊर्जा दायक हो सभी का कल्याण हो ऐसी अनंत मंगलकामना-*
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धनतेस पर्व
*_2024: इस साल धनतेरस की तिथि को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। धनतेरस कब मनाया जाएगा इसे लेकर हर कोई कंफ्यूज है। बता दें कि धनतेरस से ही पांच दिवसीय दिवाली उत्सव आरंभ हो जाता है। हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। धनतेरस को धनत्रयोदशी, धन्वंतरि त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन देवताओं के चिकित्सक और आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था। तो आइए अब जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि इस साल धनतेरस असल में किस दिन मनाया जाएगा।_*
*_धनतेरस 2024 कब है? जानें पूजा मुहूर्त_*
*_कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 29 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 31 मिनट पर हो रहा है। त्रयोदशी तिथि समाप्त 30 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 15 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, इस साल धनतेरस 29 अक्टूबर 2024 को मनाया जाएगा। धनतेरस की पूजा के शुभ मुहूर्त 29 अक्टूबर को शाम 6 बजकर 31 मिनट से रात 8 बजकर 13 मिनट तक का रहेगा।_*
👉🏼 *_धनतेरस का महत्व_*
*_हिंदू धर्म में धनतेरस का विशेष महत्व है। इस दिन नई चीजें खरीदना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन खरीदी गई चीज अक्षय फल प्रदान करने वाली होती है। धनतेरस के दिन आप जो भी चीज खरीदेंगे उसका तेरह गुना फल आपको मिलेगा। धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और धन्वतंरि जी की पूजा जरूर करें। इससे घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।_*
*_धनतेरस के दिन क्या खरीदना चाहिए?_*
*_सोना-चांदी के गहने_*
*_वाहन_*
*_पीतल या तांबे के बर्तन_*
*_झाड़ू_*
*_नमक_*
*_घर, जमीन_*
*_मां लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति_*
*_सोना-चांदी के सिक्के_*
*_धनतेरस के दिन क्या नहीं खरीदना चाहिए?_*
*_स्टिल के बर्तन_*
*_लोहे का सामान_*
*_काले रंग के कपड़े_*
*_चीनी मिट्टी से बनी चीजें_*
*_नुकीली चीजें_*
*_एल्युमिनियम की वस्तुएं_*
*_प्लास्टिक की चीजें_*
*_कांच या शीशे के सामान_*
*_प्रत्येक राशि के लोगों की अपनी विशेषताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर क्या खरीदना चाहिए, इसके लिए आचार्य श्री गोपी राम के द्वारा विशिष्ट सुझाव दिए गए हैं।_*
🐑 *_मेष राशि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष राशि के जातकों को धनतेरस पर चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए। इससे देवी लक्ष्मी और कुबेर देव की कृपा बनी रहेगी। घर अन्न और धन से भरा रहेगा।_*
🐂 *_वृषभ राशि वालों के लिए चांदी खरीदना भी लाभकारी रहेगा। आप चाहें तो लक्ष्मी पूजा के लिए चांदी की मूर्ति खरीद सकते हैं, इससे आपकी तरक्की बढ़ेगी।_*
👩❤️👨 *_मिथुन राशि वालों को धनतेरस पर सोने से बनी चीजें खरीदनी चाहिए। सोना खरीदने से आपके सौभाग्य में तेजी से वृद्धि होगी और घर में लक्ष्मी का वास भी रहेगा।_*
🦀 *_कर्क राशि वालों के लिए धनतेरस पर चांदी का श्रीयंत्र खरीदना शुभ साबित होगा। इसके बाद इस श्रीयंत्र की पूजा करें और इसे तिजोरी में रख दें। मान्यता है कि ऐसा करने से देवी लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करती हैं।_*
🦁 *_सिंह राशि के जातक धनतेरस पर सोने के आभूषण, बर्तन, सिक्के खरीद सकते हैं। इसके अलावा कुछ धार्मिक पुस्तकें खरीदें और उनका रोजाना पाठ करें।_*
👰🏻♀ *_कन्या राशि वाले लोग धनतेरस पर पीतल के बर्तन, श्रीयंत्र या हाथी दांत की वस्तुएं भी खरीद सकते हैं। इससे आपके सुख-सौभाग्य में वृद्धि होगी।_*
⚖️ *_तुला राशि धनतेरस पर तुला राशि के लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान, रसोई का सामान या चांदी की वस्तुएं खरीद सकते हैं।_*
🦂 *_वृश्चिक राशि के लोग धनतेरस पर जमीन, भवन खरीदने के अलावा चल और अचल संपत्ति में निवेश कर सकते हैं।_*
🏹 *_धनु राशि वालों के लिए धनतेरस पर वाहन, पीतल या सोने की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर लाना शुभ रहेगा।_*
🐊 *_मकर राशि धनतेरस पर मकर राशि के लोग घर के लिए इलेक्ट्रॉनिक सामान या नीले रंग की वस्तुएं या कपड़े खरीद सकते हैं।_*
⚱️ *_कुम्भ राशि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंभ राशि के जातकों को चांदी के बर्तन या ऐसा सिक्का लेना चाहिए जिस पर देवी लक्ष्मी और गणेश जी की तस्वीर बनी हो। इससे कुबेर देव और मां लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होंगे और धन की वर्षा करेंगे।_*
🐬 *_मीन राशि के जातकों के लिए घरेलू उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक सामान और पीतल के बर्तन खरीदना लाभदायक रहेगा।_*
*_2024: इस साल धनतेरस की तिथि को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। धनतेरस कब मनाया जाएगा इसे लेकर हर कोई कंफ्यूज है। बता दें कि धनतेरस से ही पांच दिवसीय दिवाली उत्सव आरंभ हो जाता है। हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। धनतेरस को धनत्रयोदशी, धन्वंतरि त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन देवताओं के चिकित्सक और आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था। तो आइए अब जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि इस साल धनतेरस असल में किस दिन मनाया जाएगा।_*
*_धनतेरस 2024 कब है? जानें पूजा मुहूर्त_*
*_कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 29 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 31 मिनट पर हो रहा है। त्रयोदशी तिथि समाप्त 30 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 15 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, इस साल धनतेरस 29 अक्टूबर 2024 को मनाया जाएगा। धनतेरस की पूजा के शुभ मुहूर्त 29 अक्टूबर को शाम 6 बजकर 31 मिनट से रात 8 बजकर 13 मिनट तक का रहेगा।_*
👉🏼 *_धनतेरस का महत्व_*
*_हिंदू धर्म में धनतेरस का विशेष महत्व है। इस दिन नई चीजें खरीदना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन खरीदी गई चीज अक्षय फल प्रदान करने वाली होती है। धनतेरस के दिन आप जो भी चीज खरीदेंगे उसका तेरह गुना फल आपको मिलेगा। धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और धन्वतंरि जी की पूजा जरूर करें। इससे घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।_*
*_धनतेरस के दिन क्या खरीदना चाहिए?_*
*_सोना-चांदी के गहने_*
*_वाहन_*
*_पीतल या तांबे के बर्तन_*
*_झाड़ू_*
*_नमक_*
*_घर, जमीन_*
*_मां लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति_*
*_सोना-चांदी के सिक्के_*
*_धनतेरस के दिन क्या नहीं खरीदना चाहिए?_*
*_स्टिल के बर्तन_*
*_लोहे का सामान_*
*_काले रंग के कपड़े_*
*_चीनी मिट्टी से बनी चीजें_*
*_नुकीली चीजें_*
*_एल्युमिनियम की वस्तुएं_*
*_प्लास्टिक की चीजें_*
*_कांच या शीशे के सामान_*
*_प्रत्येक राशि के लोगों की अपनी विशेषताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर क्या खरीदना चाहिए, इसके लिए आचार्य श्री गोपी राम के द्वारा विशिष्ट सुझाव दिए गए हैं।_*
🐑 *_मेष राशि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष राशि के जातकों को धनतेरस पर चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए। इससे देवी लक्ष्मी और कुबेर देव की कृपा बनी रहेगी। घर अन्न और धन से भरा रहेगा।_*
🐂 *_वृषभ राशि वालों के लिए चांदी खरीदना भी लाभकारी रहेगा। आप चाहें तो लक्ष्मी पूजा के लिए चांदी की मूर्ति खरीद सकते हैं, इससे आपकी तरक्की बढ़ेगी।_*
👩❤️👨 *_मिथुन राशि वालों को धनतेरस पर सोने से बनी चीजें खरीदनी चाहिए। सोना खरीदने से आपके सौभाग्य में तेजी से वृद्धि होगी और घर में लक्ष्मी का वास भी रहेगा।_*
🦀 *_कर्क राशि वालों के लिए धनतेरस पर चांदी का श्रीयंत्र खरीदना शुभ साबित होगा। इसके बाद इस श्रीयंत्र की पूजा करें और इसे तिजोरी में रख दें। मान्यता है कि ऐसा करने से देवी लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करती हैं।_*
🦁 *_सिंह राशि के जातक धनतेरस पर सोने के आभूषण, बर्तन, सिक्के खरीद सकते हैं। इसके अलावा कुछ धार्मिक पुस्तकें खरीदें और उनका रोजाना पाठ करें।_*
👰🏻♀ *_कन्या राशि वाले लोग धनतेरस पर पीतल के बर्तन, श्रीयंत्र या हाथी दांत की वस्तुएं भी खरीद सकते हैं। इससे आपके सुख-सौभाग्य में वृद्धि होगी।_*
⚖️ *_तुला राशि धनतेरस पर तुला राशि के लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान, रसोई का सामान या चांदी की वस्तुएं खरीद सकते हैं।_*
🦂 *_वृश्चिक राशि के लोग धनतेरस पर जमीन, भवन खरीदने के अलावा चल और अचल संपत्ति में निवेश कर सकते हैं।_*
🏹 *_धनु राशि वालों के लिए धनतेरस पर वाहन, पीतल या सोने की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर लाना शुभ रहेगा।_*
🐊 *_मकर राशि धनतेरस पर मकर राशि के लोग घर के लिए इलेक्ट्रॉनिक सामान या नीले रंग की वस्तुएं या कपड़े खरीद सकते हैं।_*
⚱️ *_कुम्भ राशि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंभ राशि के जातकों को चांदी के बर्तन या ऐसा सिक्का लेना चाहिए जिस पर देवी लक्ष्मी और गणेश जी की तस्वीर बनी हो। इससे कुबेर देव और मां लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होंगे और धन की वर्षा करेंगे।_*
🐬 *_मीन राशि के जातकों के लिए घरेलू उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक सामान और पीतल के बर्तन खरीदना लाभदायक रहेगा।_*
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धनतेरस
धनतेरस मुहूर्त :_*
*_18:33:13 से 20:12:47 तक_*
*_अवधि :1 घंटे 39 मिनट_*
*_प्रदोष काल :17:37:59 से 20:12:47 तक_*
*_वृषभ लग्न काल :18:33:13 से 20:29:06 तक_*
*_धनतेरस 2024 की तारीख व मुहूर्त। धनतेरस कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला त्यौहार है। धन तेरस को धन त्रयोदशी व धन्वंतरि जंयती के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धन तेरस को धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है। धन्वंतरि देव जब समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे उस समय उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। इसी वजह से धन तेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। धनतेरस पर्व से ही दीपावली की शुरुआत हो जाती है।_*
*_धन तेरस का शास्त्रोक्त नियम_*
* 1. *_धनतेरस कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की उदयव्यापिनी त्रयोदशी को मनाई जाती है। यहां उदयव्यापिनी त्रयोदशी से मतलब है कि, अगर त्रयोदशी तिथि सूर्य उदय के साथ शुरू होती है, तो धनतेरस मनाई जानी चाहिए।_*
* 2. *_धन तेरस के दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त) में यमराज को दीपदान भी किया जाता है।जो स्वास्थ्य संबंधी त्यौहार भी है और महाराज धन्वंतरि जी की जयंती उपासना भी_*
*_धनतेरस की पूजा विधि और धार्मिक कर्म:-मानव जीवन का सबसे बड़ा धन उत्तम स्वास्थ है, इसलिए आयुर्वेद के देव धन्वंतरि के अवतरण दिवस यानि धन तेरस पर स्वास्थ्य रूपी धन की प्राप्ति के लिए यह त्यौहार मनाया जाना चाहिए।_*
* 1. *_धनतेरस पर धन्वंतरि देव की षोडशोपचार पूजा का विधान है। षोडशोपचार यानि विधिवत 16 क्रियाओं से पूजा संपन्न करना। इनमें आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन (सुगंधित पेय जल), स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध (केसर-चंदन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन (शुद्ध जल), दक्षिणायुक्त तांबूल, आरती, परिक्रमा आदि है।_*
* 2. *_धनतेरस पर पीतल और चांदी के बर्तन खरीदने की परंपरा है। मान्यता है कि बर्तन खरीदने से धन समृद्धि होती है। इसी आधार पर इसे धन त्रयोदशी या धनतेरस कहते हैं।_*
* 3. *_इस दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार और आंगन में दीये जलाने चाहिए। क्योंकि धनतेरस से ही दीपावली के त्यौहार की शुरुआत होती है।_*
* 4. *_धनतेरस के दिन शाम के समय यम देव के निमित्त दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से मृत्यु के देवता यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।_*
1. *_धनतेरस कितनी तारीख को है?वर्ष 2024 में धनतेरस भारत और अन्य देशों में 29 अक्टूबर को मनाया जायेगा। धनतेरस का पर्व दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है और इस दिन खरीदारी करने का विशेष महत्व बताया गया है।_*
2. *_धनतेरस पर क्या खरीदना चाहिए?धनतेरस के दिन नई चीज़ें जैसे सोना, चाँदी, पीतल, खरीदना बेहद शुभ माना गया है। इसके अलावा इस दिन धनिया खरीदना और झाड़ू खरीदना भी बेहद शुभ होता है।_*
3. *_धनतेरस क्यों मनाया जाता है?धनतेरस धन्वंतरि के प्रकट होने के दिन के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है दिवाली से दो दिन पहले धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है।_*
4. *_धनतेरस पूजा विधि क्या है?धनतेरस के दिन धन्वंतरि देव की षोडशोपचार विधि से पूजा की जाती है। इसके बाद शाम को मुख्य द्वार और आंगन में दीप जलाये जाते हैं। धनतेरस के दिन शाम के समय यम देवता के नाम का भी दीपक जलाया जाता है।_*
5. *_धनतेरस पर क्या खरीदें और क्या नहीं?धनतेरस के दिन सोने, चांदी और पीतल की वस्तुओं, और झाड़ू खरीदना शुभ होता है। हालांकि इस दिन काले या गहरे रंग की चीज़ें, चीनी मिट्टी से बनी चीज़ें, कांच, एल्युमीनियम, और लोहे से बनी चीज़ें नहीं खरीदनी चाहिए।_*
6. *_धनतेरस पर कौन सी झाड़ू खरीदे?धनतेरस के दिन फूल वाली झाड़ू यानि जिससे घर में झाड़ू लगाया जाता है उसे खरीदें।_*
7. *_धनतेरस के दिन झाड़ू क्यों खरीदा जाता है?धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने के पीछे जुड़ी मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि, इससे घर में माँ लक्ष्मी का आगमन होता है, घर से नकारात्मकता दूर होती है, और माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।_*
8. *_धनतेरस के दिन कितनी झाड़ू खरीदनी चाहिए?धनतेरस के दिन हमेशा विषम संख्या में (अर्थात 1, 3, 5) ही झाड़ू खरीदनी चाहिए।_*
*_हमारी ओर से सभी पाठकों को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं। हम आशा करते हैं कि धन्वंतरि देव की कृपा आप पर बनी रहे और आप निरोगी व स्वस्थ रहें।_*
*_यहां एक सत्य शास्त्रोक्त निर्णय से अवगत कराना चाहता हूं।_*
धनतेरस मुहूर्त :_*
*_18:33:13 से 20:12:47 तक_*
*_अवधि :1 घंटे 39 मिनट_*
*_प्रदोष काल :17:37:59 से 20:12:47 तक_*
*_वृषभ लग्न काल :18:33:13 से 20:29:06 तक_*
*_धनतेरस 2024 की तारीख व मुहूर्त। धनतेरस कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला त्यौहार है। धन तेरस को धन त्रयोदशी व धन्वंतरि जंयती के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धन तेरस को धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है। धन्वंतरि देव जब समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे उस समय उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। इसी वजह से धन तेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। धनतेरस पर्व से ही दीपावली की शुरुआत हो जाती है।_*
*_धन तेरस का शास्त्रोक्त नियम_*
* 1. *_धनतेरस कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की उदयव्यापिनी त्रयोदशी को मनाई जाती है। यहां उदयव्यापिनी त्रयोदशी से मतलब है कि, अगर त्रयोदशी तिथि सूर्य उदय के साथ शुरू होती है, तो धनतेरस मनाई जानी चाहिए।_*
* 2. *_धन तेरस के दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त) में यमराज को दीपदान भी किया जाता है।जो स्वास्थ्य संबंधी त्यौहार भी है और महाराज धन्वंतरि जी की जयंती उपासना भी_*
*_धनतेरस की पूजा विधि और धार्मिक कर्म:-मानव जीवन का सबसे बड़ा धन उत्तम स्वास्थ है, इसलिए आयुर्वेद के देव धन्वंतरि के अवतरण दिवस यानि धन तेरस पर स्वास्थ्य रूपी धन की प्राप्ति के लिए यह त्यौहार मनाया जाना चाहिए।_*
* 1. *_धनतेरस पर धन्वंतरि देव की षोडशोपचार पूजा का विधान है। षोडशोपचार यानि विधिवत 16 क्रियाओं से पूजा संपन्न करना। इनमें आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन (सुगंधित पेय जल), स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध (केसर-चंदन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन (शुद्ध जल), दक्षिणायुक्त तांबूल, आरती, परिक्रमा आदि है।_*
* 2. *_धनतेरस पर पीतल और चांदी के बर्तन खरीदने की परंपरा है। मान्यता है कि बर्तन खरीदने से धन समृद्धि होती है। इसी आधार पर इसे धन त्रयोदशी या धनतेरस कहते हैं।_*
* 3. *_इस दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार और आंगन में दीये जलाने चाहिए। क्योंकि धनतेरस से ही दीपावली के त्यौहार की शुरुआत होती है।_*
* 4. *_धनतेरस के दिन शाम के समय यम देव के निमित्त दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से मृत्यु के देवता यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।_*
1. *_धनतेरस कितनी तारीख को है?वर्ष 2024 में धनतेरस भारत और अन्य देशों में 29 अक्टूबर को मनाया जायेगा। धनतेरस का पर्व दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है और इस दिन खरीदारी करने का विशेष महत्व बताया गया है।_*
2. *_धनतेरस पर क्या खरीदना चाहिए?धनतेरस के दिन नई चीज़ें जैसे सोना, चाँदी, पीतल, खरीदना बेहद शुभ माना गया है। इसके अलावा इस दिन धनिया खरीदना और झाड़ू खरीदना भी बेहद शुभ होता है।_*
3. *_धनतेरस क्यों मनाया जाता है?धनतेरस धन्वंतरि के प्रकट होने के दिन के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है दिवाली से दो दिन पहले धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है।_*
4. *_धनतेरस पूजा विधि क्या है?धनतेरस के दिन धन्वंतरि देव की षोडशोपचार विधि से पूजा की जाती है। इसके बाद शाम को मुख्य द्वार और आंगन में दीप जलाये जाते हैं। धनतेरस के दिन शाम के समय यम देवता के नाम का भी दीपक जलाया जाता है।_*
5. *_धनतेरस पर क्या खरीदें और क्या नहीं?धनतेरस के दिन सोने, चांदी और पीतल की वस्तुओं, और झाड़ू खरीदना शुभ होता है। हालांकि इस दिन काले या गहरे रंग की चीज़ें, चीनी मिट्टी से बनी चीज़ें, कांच, एल्युमीनियम, और लोहे से बनी चीज़ें नहीं खरीदनी चाहिए।_*
6. *_धनतेरस पर कौन सी झाड़ू खरीदे?धनतेरस के दिन फूल वाली झाड़ू यानि जिससे घर में झाड़ू लगाया जाता है उसे खरीदें।_*
7. *_धनतेरस के दिन झाड़ू क्यों खरीदा जाता है?धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने के पीछे जुड़ी मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि, इससे घर में माँ लक्ष्मी का आगमन होता है, घर से नकारात्मकता दूर होती है, और माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।_*
8. *_धनतेरस के दिन कितनी झाड़ू खरीदनी चाहिए?धनतेरस के दिन हमेशा विषम संख्या में (अर्थात 1, 3, 5) ही झाड़ू खरीदनी चाहिए।_*
*_हमारी ओर से सभी पाठकों को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं। हम आशा करते हैं कि धन्वंतरि देव की कृपा आप पर बनी रहे और आप निरोगी व स्वस्थ रहें।_*
*_यहां एक सत्य शास्त्रोक्त निर्णय से अवगत कराना चाहता हूं।_*
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*_धनतेरस धन्वंतरि की जयंती है और मानव समाज को धन्वतरि आयुर्वेदाचार्य की कृपा प्राप्त करने की उपासना के लिए है।आज हम वस्तु खरीदने के पीछे भाग रहे हैं क्योंकि हमें बताया गया है कि इस कुछ चुनिंदा वस्तुओं की खरीद से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त की जा सकती है जो एक लक्ष्य का भटकाव है।जिसके लिए सच्चाई यह है कि हमें स्वास्थ्य धन की कामना के लिए महाराज धन्वन्तरि की पूजा उपासना करनी चाहिए जबकि धनलोलुपता में हमें स्वास्थ्य संबंधी सच्चाई को दबाकर वस्तु की बिक्री और खरीद की जानकारी आमजनमानस के मस्तिष्क में फैलाया गया है।जहां यम देव के लिए दीपक जलाने उनकी (यमदेव की) प्रत्क्ष चलन है वह स्वास्थ्य से ही संबंधित है।यह जानकारी कितनी चालाकी से लोगों के बीच अधिक प्रचलन में नहीं है जबकि लोगों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।जिससे मूल ज्ञान हम सब प्राप्त कर सकें अपने त्यौहार की वैज्ञानिकता को समझ सकें।_*
*_इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्रत्येक परिवार में कुछ न कुछ खरीद की जाती है किन्तु महाराज धन्वंतरि की उपासना किसी ग्राम कॉलोनी में शहर में शायद ही कोई महाराज धन्वन्तरि की कृपा पाने की पूजा उपासना करता हो।मूल तत्व से भटकना ही अंधी परंपरा का द्योतक है। अपनी संस्कृति को जानकारी के अभाव में धन लक्ष्मी को पाने के बदले स्वास्थ्य धन(धन्वंतरि उपासना) को छोड रहे हैं।
*_इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्रत्येक परिवार में कुछ न कुछ खरीद की जाती है किन्तु महाराज धन्वंतरि की उपासना किसी ग्राम कॉलोनी में शहर में शायद ही कोई महाराज धन्वन्तरि की कृपा पाने की पूजा उपासना करता हो।मूल तत्व से भटकना ही अंधी परंपरा का द्योतक है। अपनी संस्कृति को जानकारी के अभाव में धन लक्ष्मी को पाने के बदले स्वास्थ्य धन(धन्वंतरि उपासना) को छोड रहे हैं।
. *अष्टलक्ष्मी स्तुति*
माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि व धन में बढोतरी होती है।
व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने में अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा विश्लेष लाभकारी रहती है. श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है. पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है. इसे करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए. शुक्रवार के दिन से इसे आरंभ करते हुए जब तक हो सके करें।
इसका प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए. प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है. लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिये धन के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए.
श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पूजन विधि
स्त्रोत का पाठ करने के लिए घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए तथा ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी कि चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए. साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए श्री यंत्र को सामने रख कर उसे प्रणाम करना चाहिए और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चहिए, इसके पश्चात उक्त मंत्र बोलना चाहिए. पूजा करने के बाद लक्ष्मी जी कि कथा का श्रवण भी किया जा सकता है. माँ लक्ष्मी जी को खीर का भोग लगाना चाहिए और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए. सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए.
॥ श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः ॥
आदिलक्ष्मीः
〰〰〰〰
सुमनोवन्दितसुन्दरि माधवि चन्द्रसहोदरि हेममयि
मुनिगणकाङ्क्षितमोक्षप्रदायिनि मञ्जुलभाषिणि वेदनुते ।
पङ्कजवासिनि देवसुपूजिते सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते
जय जय हे मधुसूदनकामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धान्यलक्ष्मीः
〰〰〰
अयि कलिकल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमयि
क्षीरसमुद्भवमङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ।
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धैर्यलक्ष्मीः
〰〰〰
जय वरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमयि
सुरगणविनुते अतिशयफलदे ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ।
भवभयहारिणि पापविमोचिनि साधुसमाश्रितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धैर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
गजलक्ष्मीः
〰〰〰
जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि बहुदे शुभकलहंसगते
रथगजतुरगपदादिसमावृतपरिजनमण्डितराजनुते ।
सुरवरधनपतिपद्मजसेविततापनिवारकपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि गजलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
सन्तानलक्ष्मीः
〰〰〰〰
अयि खगवाहे मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि सन्मतिदे
गुणगणवारिधे लोकहितैषिणि नारदतुम्बुरुगाननुते ।
सकलसुरासुरदेवमुनीश्वरभूसुरवन्दितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
विजयलक्ष्मीः
〰〰〰〰
कमलनिवासिनि सद्गतिदायिनि विज्ञानविकासिनि काममयि
अनुदिनमर्चितकुङ्कुमभासुरभूषणशोभि सुगात्रयुते ।
सुरमुनिसंस्तुतवैभवराजितदीनजानाश्रितमान्यपदे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि विजयलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
ऐश्वर्यलक्ष्मीः
〰〰〰〰
प्रणतसुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमयि
मणिगणभूषितकर्णविभूषणकान्तिसमावृतहासमुखि ।
नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामितवरदे कल्पलते
जय जय हे मधुसूदनकामिनि ऐश्वर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धनलक्ष्मीः
〰〰〰
धिमिधिमिधिन्धिमिदुन्दुमदुमदुमदुन्दुभिनादविनोदरते
बम्बम्बों बम्बम्बों प्रणवोच्चारशङ्खनिनादयुते ।
वेदपुराणस्मृतिगणदर्शितसत्पदसज्जनशुभफलदे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धनलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
।इति श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः सम्पूर्णा।
माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि व धन में बढोतरी होती है।
व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने में अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा विश्लेष लाभकारी रहती है. श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है. पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है. इसे करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए. शुक्रवार के दिन से इसे आरंभ करते हुए जब तक हो सके करें।
इसका प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए. प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है. लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिये धन के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए.
श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पूजन विधि
स्त्रोत का पाठ करने के लिए घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए तथा ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी कि चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए. साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए श्री यंत्र को सामने रख कर उसे प्रणाम करना चाहिए और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चहिए, इसके पश्चात उक्त मंत्र बोलना चाहिए. पूजा करने के बाद लक्ष्मी जी कि कथा का श्रवण भी किया जा सकता है. माँ लक्ष्मी जी को खीर का भोग लगाना चाहिए और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए. सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए.
॥ श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः ॥
आदिलक्ष्मीः
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सुमनोवन्दितसुन्दरि माधवि चन्द्रसहोदरि हेममयि
मुनिगणकाङ्क्षितमोक्षप्रदायिनि मञ्जुलभाषिणि वेदनुते ।
पङ्कजवासिनि देवसुपूजिते सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते
जय जय हे मधुसूदनकामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धान्यलक्ष्मीः
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अयि कलिकल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमयि
क्षीरसमुद्भवमङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ।
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धैर्यलक्ष्मीः
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जय वरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमयि
सुरगणविनुते अतिशयफलदे ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ।
भवभयहारिणि पापविमोचिनि साधुसमाश्रितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धैर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
गजलक्ष्मीः
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जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि बहुदे शुभकलहंसगते
रथगजतुरगपदादिसमावृतपरिजनमण्डितराजनुते ।
सुरवरधनपतिपद्मजसेविततापनिवारकपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि गजलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
सन्तानलक्ष्मीः
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अयि खगवाहे मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि सन्मतिदे
गुणगणवारिधे लोकहितैषिणि नारदतुम्बुरुगाननुते ।
सकलसुरासुरदेवमुनीश्वरभूसुरवन्दितपादयुगे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
विजयलक्ष्मीः
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कमलनिवासिनि सद्गतिदायिनि विज्ञानविकासिनि काममयि
अनुदिनमर्चितकुङ्कुमभासुरभूषणशोभि सुगात्रयुते ।
सुरमुनिसंस्तुतवैभवराजितदीनजानाश्रितमान्यपदे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि विजयलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
ऐश्वर्यलक्ष्मीः
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प्रणतसुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमयि
मणिगणभूषितकर्णविभूषणकान्तिसमावृतहासमुखि ।
नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामितवरदे कल्पलते
जय जय हे मधुसूदनकामिनि ऐश्वर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
धनलक्ष्मीः
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धिमिधिमिधिन्धिमिदुन्दुमदुमदुमदुन्दुभिनादविनोदरते
बम्बम्बों बम्बम्बों प्रणवोच्चारशङ्खनिनादयुते ।
वेदपुराणस्मृतिगणदर्शितसत्पदसज्जनशुभफलदे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धनलक्ष्मि परिपालय माम् ॥
।इति श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः सम्पूर्णा।
👍3
*श्री लक्ष्मी कवच*
हिंदी अर्थ सहित
लक्ष्मी में चाग्रतः पातु कमला पातु पृष्ठतः।
नारायणी शीर्षदेभे सर्वांगे श्री स्वरूपिणी।।
भावार्थ: लक्ष्मी जी हमारे आगे के भाग की तथा कमलाजी हमारी पीठ की रक्षा करें। नारायणी हमारे सिर की और श्री स्वरूपिणी हमारे पूरे शरीर एवं अंगों की रक्षा करें।
रामपत्नी तु प्रत्यंगे रामेश्वरी सदाऽवतु।
विभालाक्षी योगमाया कौमारी चक्रिणीतथा।।
जयदात्री धनदात्री, पाभाक्षमालिनी शुभा।
हरिप्रिया हरिरामा जयंकारी महोदरी।।
कृष्णपरायणा देवी श्रीकृष्ण मनमोहिनी।
जयंकारी महारोद्री सिद्धिदात्री शुभंकरी।।
सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूटनिवासिनी।
भयं हरतु भक्तानां भवबन्ध विमुचतु।।
भावार्थ: रामपत्नी और रामेश्वरी हमारे सब अंगों-उपांगों की रक्षा करें। वह कौमारी है, चक्रधारिणी हैं, जय देने वाली और पाभाक्षमालिनी हैं, वह कल्याणी हैं, हरिप्रिया हैं, हरिरामा हैं, जयंकारी हैं, महादेवी हैं, श्रीकृष्ण का मन मोहन करने वाली हैं, महाभयंकर, सिद्धि देने वाली हैं, शुभंकरी, सुख तथा मोक्ष को देने वाली हैं जिनके चित्रकूट निवासिनी इत्यादि अनेक नाम हैं वह अनपायिनि लक्ष्मी देवी हमारे भय दूर करके सदा हमारी रक्षा करें।
कवचं तन्महापुष्यं यः पठेद्भक्तिसंयुतः।
त्रिसन्ध्यंमेकसन्ध्यं वा मुच्यते सर्वसंकटात्।।
भावार्थ: जो प्राणी भक्तिमय होकर नित्य तीन या केवल एक बार ही इस पवित्र लक्ष्मी कवच का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण संकटों से छुटकारा पा जाता है।
कवचस्यास्य पठन धनपुत्रविवर्द्धनम्।
भीतिर्विनाशनं चैव त्रिषु लोकेषु कीर्तितम्।।
भावार्थ: इस कवच का पाठ करने से पुत्र, धन आदि की वृद्धि होती है। भय दूर हो जाता है। इसका माहात्म्य तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुंकुमेनतु।
धारणद्गलदेभे च सर्वसिद्ध- र्भविष्यति।।
भावार्थ: भोजपत्र पर रचना और कुंकुम से इसको लिखकर गले में पहनने से सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम्।
मोक्षार्थी मोक्षमारनोति कवचस्या- स्यप्रसादतः।।
भावार्थ: इस कवच के प्रभाव से पुत्र, धन एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।
संकटेे विपदे घोरे तथा च गहने वने।
राजद्वारे च नौकायां तथा च रणमध्यतः।।
पठनाद्वारणादस्य जय माप्नोति निश्चितम्।।
भावार्थ: संकट, विपदा, घने जंगल, राजद्वार, नौका मार्ग, रण आदि स्थानों में इस कवच का पाठ करने से या धारण करने से विजय प्राप्त होती है।
बहुना किमी होक्तेन सर्व जीवेश्वरेश्वरी आद्या भक्तिः सदा लक्ष्मीर्भक्तानुग्रहकारणी।
धारके पाठके चैव निश्चला निवसेद् ध्रुवम।।
भावार्थ: अधिक क्या कहा जाये, जो मनुष्य इस कवच का प्रतिदिन पाठ करता है, धारण करता है, उसपर लक्ष्मी की सदैव कृपा बनी रहती है।
।। जय माँ लक्ष्मी ।।
हिंदी अर्थ सहित
लक्ष्मी में चाग्रतः पातु कमला पातु पृष्ठतः।
नारायणी शीर्षदेभे सर्वांगे श्री स्वरूपिणी।।
भावार्थ: लक्ष्मी जी हमारे आगे के भाग की तथा कमलाजी हमारी पीठ की रक्षा करें। नारायणी हमारे सिर की और श्री स्वरूपिणी हमारे पूरे शरीर एवं अंगों की रक्षा करें।
रामपत्नी तु प्रत्यंगे रामेश्वरी सदाऽवतु।
विभालाक्षी योगमाया कौमारी चक्रिणीतथा।।
जयदात्री धनदात्री, पाभाक्षमालिनी शुभा।
हरिप्रिया हरिरामा जयंकारी महोदरी।।
कृष्णपरायणा देवी श्रीकृष्ण मनमोहिनी।
जयंकारी महारोद्री सिद्धिदात्री शुभंकरी।।
सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूटनिवासिनी।
भयं हरतु भक्तानां भवबन्ध विमुचतु।।
भावार्थ: रामपत्नी और रामेश्वरी हमारे सब अंगों-उपांगों की रक्षा करें। वह कौमारी है, चक्रधारिणी हैं, जय देने वाली और पाभाक्षमालिनी हैं, वह कल्याणी हैं, हरिप्रिया हैं, हरिरामा हैं, जयंकारी हैं, महादेवी हैं, श्रीकृष्ण का मन मोहन करने वाली हैं, महाभयंकर, सिद्धि देने वाली हैं, शुभंकरी, सुख तथा मोक्ष को देने वाली हैं जिनके चित्रकूट निवासिनी इत्यादि अनेक नाम हैं वह अनपायिनि लक्ष्मी देवी हमारे भय दूर करके सदा हमारी रक्षा करें।
कवचं तन्महापुष्यं यः पठेद्भक्तिसंयुतः।
त्रिसन्ध्यंमेकसन्ध्यं वा मुच्यते सर्वसंकटात्।।
भावार्थ: जो प्राणी भक्तिमय होकर नित्य तीन या केवल एक बार ही इस पवित्र लक्ष्मी कवच का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण संकटों से छुटकारा पा जाता है।
कवचस्यास्य पठन धनपुत्रविवर्द्धनम्।
भीतिर्विनाशनं चैव त्रिषु लोकेषु कीर्तितम्।।
भावार्थ: इस कवच का पाठ करने से पुत्र, धन आदि की वृद्धि होती है। भय दूर हो जाता है। इसका माहात्म्य तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुंकुमेनतु।
धारणद्गलदेभे च सर्वसिद्ध- र्भविष्यति।।
भावार्थ: भोजपत्र पर रचना और कुंकुम से इसको लिखकर गले में पहनने से सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम्।
मोक्षार्थी मोक्षमारनोति कवचस्या- स्यप्रसादतः।।
भावार्थ: इस कवच के प्रभाव से पुत्र, धन एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।
संकटेे विपदे घोरे तथा च गहने वने।
राजद्वारे च नौकायां तथा च रणमध्यतः।।
पठनाद्वारणादस्य जय माप्नोति निश्चितम्।।
भावार्थ: संकट, विपदा, घने जंगल, राजद्वार, नौका मार्ग, रण आदि स्थानों में इस कवच का पाठ करने से या धारण करने से विजय प्राप्त होती है।
बहुना किमी होक्तेन सर्व जीवेश्वरेश्वरी आद्या भक्तिः सदा लक्ष्मीर्भक्तानुग्रहकारणी।
धारके पाठके चैव निश्चला निवसेद् ध्रुवम।।
भावार्थ: अधिक क्या कहा जाये, जो मनुष्य इस कवच का प्रतिदिन पाठ करता है, धारण करता है, उसपर लक्ष्मी की सदैव कृपा बनी रहती है।
।। जय माँ लक्ष्मी ।।
👍6
*_गोचर » बुध का वृश्चिक राशि .._*
* *_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर (29 अक्टूबर 2024)_*
*_इस लेख में आपको “बुध का वृश्चिक राशि में गोचर” से जुड़ी समस्त जानकारी प्राप्त होगी जैसे कि तिथि, समय एवं राशियों पर प्रभाव। ज्योतिष में बुध ग्रह को नवग्रहों के युवराज का दर्जा प्राप्त है और इनकी स्थिति सूर्य महाराज के सबसे निकट होती है। अब बुध महाराज 29 अक्टूबर 2024 की रात 10 बजकर 24 मिनट पर वृश्चिक राशि में गोचर करने जा रहे हैं। आइए जानते हैं बुध का यह गोचर सभी 12 राशियों को कैसे परिणाम देगा।_*
* *_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर 29 अक्टूबर 2024 को होने जा रहा है।_*
*_बुध को बुद्धि और सीखने की क्षमता का ग्रह कहा जाता है। कोई व्यक्ति बुध ग्रह के आशीर्वाद के बिना अपने गुणों और क्षमताओं के साथ जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता है और न ही इनके उपयोग से सफलता प्राप्त कर सकता है। बुध न सिर्फ सीखने में सहायता करते हैं, बल्कि यह व्यापार के क्षेत्र में सफलता प्रदान करते हैं। विशेष रूप से जिनका संबंध ट्रेड के व्यापार से होता है, वह कुंडली में बुध ग्रह की मज़बूत स्थिति से कामयाबी हासिल कर सकते हैं।_*
* *_जब बुध महाराज शुभ एवं लाभकारी ग्रह गुरु के साथ होते हैं, तब व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है और वह इससे लाभ प्राप्त करता है। अगर बुध मिथुन राशि में उपस्थित होते हैं, तो ऐसे जातक को जीवन में काफ़ी यात्राएं करनी पड़ती हैं और उन्हें यात्राएं करना पसंद होता है। साथ ही, यह लोग व्यक्तिगत विकास के इच्छुक हो सकते हैं। बुध ग्रह के कन्या राशि में विराजमान होने पर आपका झुकाव ज्योतिष, गूढ़ विज्ञान आदि में होता है और व्यापार करना पसंद करते हैं।_*
*_अब बुध का वृश्चिक राशि में गोचर होने जा रहा है और चलिए अब आगे बढ़ते हैं और जानते हैं कि यह राशि चक्र की सभी राशियों को किस तरह प्रभावित करेंगे।यह राशिफल आपकी चंद्र राशि पर आधारित है।_*
*_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर: राशि अनुसार राशिफल और उपाय👇_*
मेष राशि
* *_मेष राशि के जातकों के लिए बुध तीसरे और छठे भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके आठवें भाव में होगा।ऐसे में, आपको ज़रूरत के समय पैतृक संपत्ति और ऋण के माध्यम से अप्रत्याशित तरीके से लाभ होगा।करियर के क्षेत्र में आपको इस दौरान कार्यक्षेत्र में समस्याएं आ सकती हैं और काम करते समय बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, आपको योजना बना कर चलने की आवश्यकता हो सकती है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, वे अपनी गैर-योजना और लापरवाही के चलते लाभ कमाने से पीछे रह सकते हैं। इसके अलावा, आपको बिज़नेस पार्टनर से भी समस्या हो सकती है।आर्थिक जीवन में, बुध का गोचर आपके लिए कुछ ख़ास अनुकूल प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि आपको धन की हानि होने की संभावना है। यात्रा करते समय भी आपको धन की हानि हो सकती है।निजी जीवन को देखें, तो इस दौरान अहंकार की समस्याओं और खुशी की कमी के कारण आपका अपने जीवन साथी के साथ वाद-विवाद हो सकता है।बुध के इस राशि परिवर्तन के दौरान आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती है। तनाव और चिंता के कारण आपको पीठ दर्द होने की संभावना है, जो आपके समस्या का कारण बन सकता है।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 24 बार “ॐ नरसिंहाय नमः” का जाप करें।_*
वृषभ राशि
* *_वृषभ राशि के जातकों के लिए बुध दूसरे और पांचवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके सातवें भाव में होगा।इसके परिणामस्वरूप, आप इस दौरान नए दोस्त, सहयोगी बनाएं और अपने रिश्ते को अच्छी तरह से आगे बढ़ाएंगे।करियर की बात करें तो, आप अपने वरिष्ठों का सहयोग प्राप्त करेंगे और सहकर्मियों का समर्थन प्राप्त करेंगे, जिससे आपको अपने काम में सफलता मिलेगी और तेज़ी से आगे बढ़ेंगे।_*
*_बुध का गोचर व्यापार में आपको लाभ प्रदान करेगा। यह लाभ आप अपनी बुद्धि और खुद के द्वारा बनाई गई योजना से प्राप्त करेंगे।आर्थिक जीवन में बुध का गोचर आपको अच्छा ख़ासा धन लाभ करवाएगा। साथ ही, आप बचत करने में भी सक्षम होंगे।निजी जीवन को देखें, तो इस दौरान आपके मन में पार्टनर के प्रति प्रेम में बढ़ोतरी होगी और आप अपने जीवनसाथी का विश्वास प्राप्त करने में भी सक्षम होंगे।बुध के इस राशि परिवर्तन के दौरान आप भरपूर साहस और ऊर्जा के कारण अपने स्वास्थ्य और फिटनेस को बनाए रखेंगे।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 41 बार “ॐ बुधाय नमः” का जाप करें।_*
मिथुन राशि
* *_मिथुन राशि के जातकों के लिए बुध पहले और चौथे भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके छठे भाव में होगा।ऐसे में, आपको अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है और परिवार में भी कुछ समस्याएं आ सकती हैं, जो आपको परेशान कर सकती हैं।करियर की बात करें, तो आप कार्यक्षेत्र में तनाव महसूस कर सकते हैं। साथ ही, आपको वरिष्ठों से समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है। इस दौरान आपको चुनौतीपूर्ण कार्य
* *_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर (29 अक्टूबर 2024)_*
*_इस लेख में आपको “बुध का वृश्चिक राशि में गोचर” से जुड़ी समस्त जानकारी प्राप्त होगी जैसे कि तिथि, समय एवं राशियों पर प्रभाव। ज्योतिष में बुध ग्रह को नवग्रहों के युवराज का दर्जा प्राप्त है और इनकी स्थिति सूर्य महाराज के सबसे निकट होती है। अब बुध महाराज 29 अक्टूबर 2024 की रात 10 बजकर 24 मिनट पर वृश्चिक राशि में गोचर करने जा रहे हैं। आइए जानते हैं बुध का यह गोचर सभी 12 राशियों को कैसे परिणाम देगा।_*
* *_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर 29 अक्टूबर 2024 को होने जा रहा है।_*
*_बुध को बुद्धि और सीखने की क्षमता का ग्रह कहा जाता है। कोई व्यक्ति बुध ग्रह के आशीर्वाद के बिना अपने गुणों और क्षमताओं के साथ जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता है और न ही इनके उपयोग से सफलता प्राप्त कर सकता है। बुध न सिर्फ सीखने में सहायता करते हैं, बल्कि यह व्यापार के क्षेत्र में सफलता प्रदान करते हैं। विशेष रूप से जिनका संबंध ट्रेड के व्यापार से होता है, वह कुंडली में बुध ग्रह की मज़बूत स्थिति से कामयाबी हासिल कर सकते हैं।_*
* *_जब बुध महाराज शुभ एवं लाभकारी ग्रह गुरु के साथ होते हैं, तब व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है और वह इससे लाभ प्राप्त करता है। अगर बुध मिथुन राशि में उपस्थित होते हैं, तो ऐसे जातक को जीवन में काफ़ी यात्राएं करनी पड़ती हैं और उन्हें यात्राएं करना पसंद होता है। साथ ही, यह लोग व्यक्तिगत विकास के इच्छुक हो सकते हैं। बुध ग्रह के कन्या राशि में विराजमान होने पर आपका झुकाव ज्योतिष, गूढ़ विज्ञान आदि में होता है और व्यापार करना पसंद करते हैं।_*
*_अब बुध का वृश्चिक राशि में गोचर होने जा रहा है और चलिए अब आगे बढ़ते हैं और जानते हैं कि यह राशि चक्र की सभी राशियों को किस तरह प्रभावित करेंगे।यह राशिफल आपकी चंद्र राशि पर आधारित है।_*
*_बुध का वृश्चिक राशि में गोचर: राशि अनुसार राशिफल और उपाय👇_*
मेष राशि
* *_मेष राशि के जातकों के लिए बुध तीसरे और छठे भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके आठवें भाव में होगा।ऐसे में, आपको ज़रूरत के समय पैतृक संपत्ति और ऋण के माध्यम से अप्रत्याशित तरीके से लाभ होगा।करियर के क्षेत्र में आपको इस दौरान कार्यक्षेत्र में समस्याएं आ सकती हैं और काम करते समय बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, आपको योजना बना कर चलने की आवश्यकता हो सकती है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, वे अपनी गैर-योजना और लापरवाही के चलते लाभ कमाने से पीछे रह सकते हैं। इसके अलावा, आपको बिज़नेस पार्टनर से भी समस्या हो सकती है।आर्थिक जीवन में, बुध का गोचर आपके लिए कुछ ख़ास अनुकूल प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि आपको धन की हानि होने की संभावना है। यात्रा करते समय भी आपको धन की हानि हो सकती है।निजी जीवन को देखें, तो इस दौरान अहंकार की समस्याओं और खुशी की कमी के कारण आपका अपने जीवन साथी के साथ वाद-विवाद हो सकता है।बुध के इस राशि परिवर्तन के दौरान आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती है। तनाव और चिंता के कारण आपको पीठ दर्द होने की संभावना है, जो आपके समस्या का कारण बन सकता है।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 24 बार “ॐ नरसिंहाय नमः” का जाप करें।_*
वृषभ राशि
* *_वृषभ राशि के जातकों के लिए बुध दूसरे और पांचवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके सातवें भाव में होगा।इसके परिणामस्वरूप, आप इस दौरान नए दोस्त, सहयोगी बनाएं और अपने रिश्ते को अच्छी तरह से आगे बढ़ाएंगे।करियर की बात करें तो, आप अपने वरिष्ठों का सहयोग प्राप्त करेंगे और सहकर्मियों का समर्थन प्राप्त करेंगे, जिससे आपको अपने काम में सफलता मिलेगी और तेज़ी से आगे बढ़ेंगे।_*
*_बुध का गोचर व्यापार में आपको लाभ प्रदान करेगा। यह लाभ आप अपनी बुद्धि और खुद के द्वारा बनाई गई योजना से प्राप्त करेंगे।आर्थिक जीवन में बुध का गोचर आपको अच्छा ख़ासा धन लाभ करवाएगा। साथ ही, आप बचत करने में भी सक्षम होंगे।निजी जीवन को देखें, तो इस दौरान आपके मन में पार्टनर के प्रति प्रेम में बढ़ोतरी होगी और आप अपने जीवनसाथी का विश्वास प्राप्त करने में भी सक्षम होंगे।बुध के इस राशि परिवर्तन के दौरान आप भरपूर साहस और ऊर्जा के कारण अपने स्वास्थ्य और फिटनेस को बनाए रखेंगे।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 41 बार “ॐ बुधाय नमः” का जाप करें।_*
मिथुन राशि
* *_मिथुन राशि के जातकों के लिए बुध पहले और चौथे भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके छठे भाव में होगा।ऐसे में, आपको अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है और परिवार में भी कुछ समस्याएं आ सकती हैं, जो आपको परेशान कर सकती हैं।करियर की बात करें, तो आप कार्यक्षेत्र में तनाव महसूस कर सकते हैं। साथ ही, आपको वरिष्ठों से समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है। इस दौरान आपको चुनौतीपूर्ण कार्य
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सौंपे जा सकते हैं जो आपको परेशान कर सकते हैं।_*
*_व्यापार की बात करें,आपको नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जो इस समय आपको चिंता में डाल सकता है।आर्थिक जीवन में आपको अधिक खर्चों का सामना करना पड़ सकता है और आशंका है कि ऐसे में, आपके लिए बचत कर पाना मुश्किल हो।आपके प्रेम जीवन की बात करें, तो आपको अपने जीवनसाथी के साथ अहंकार की समस्या का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से आप काफी अधिक चिंतित हो सकते हैं।स्वास्थ्य के लिहाज़ से इस समय आपको पेट दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।_*
*_उपाय- प्रतिदिन प्राचीन पाठ नारायणाय का जाप करें।_*
कर्क राशि
* *_कर्क राशि वालों के लिए बुध ग्रह आपके तीसरे और बारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके पांचवें भाव में होगा।उपरोक्त कारणों से आप अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो सकते हैं और असमंजस में पड़ सकते हैं। इस दौरान आप अपने बच्चों को लेकर भी परेशान हो सकते हैं।करियर की बात करें, तो आपको अपने वरिष्ठों के साथ संबंधों में समस्या हो सकती है और आशंका है कि इससे आपके प्रदर्शन में गिरावट आए।_*
*_व्यापार में बुध का यह गोचर आपको औसत रूप से लाभ प्रदान कर सकता हैं, जो चिंता का कारण बन सकता है। ऐसे में, आपको बेहतर रिटर्न के लिए योजना बनानी होगी।आर्थिक जीवन में आपको भारी खर्च का सामना करना पड़ सकता है, जो आपके द्वारा लिए गए भारी कर्ज के कारण संभव है।बुध गोचर की अवधि में आप पार्टनर के साथ मधुर संबंध बनाए रखने में असफल रह सकते हैं जिसकी वजह आपसी तालमेल की कमी हो सकती है।स्वास्थ्य को देखें, तो कर्क राशि के जातकों की माता को कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है और ऐसे में, आपको उनकी सेहत पर पैसा खर्च करना पड़ेगा।_*
*_उपाय- सोमवार को महिलाओं को चावल दान करें।_*
सिंह राशि
* *_सिंह राशि के जातकों के लिए बुध दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके चौथे भाव में होगा।उपरोक्त के कारण, आप अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने, संपत्ति खरीदने में निवेश करने और पैसे बचाने में सक्षम होंगे।करियर के क्षेत्र में, आपको इस दौरान नौकरी के नए अवसर प्राप्त होंगे और कार्यक्षेत्र में खुशी महसूस होगी।_*
*_सिंह राशि के व्यापार करने वाले जातक इस अवधि में अच्छा लाभ कमा सकेंगे जो कि आपके द्वारा की जा रही मेहनत का परिणाम होगा। साथ ही, प्रतिद्वंदियों को कड़ी टक्कर देने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और इसे एक अच्छी संपत्ति खरीदने में निवेश करेंगे।निजी जीवन में आपका रिश्ता जीवनसाथी के साथ अनुकूल बना रहेगा और आप अपने जीवनसाथी के साथ खुश नज़र आएंगे। साथ ही, एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करेंगे और एक-दूसरे की बात पर परस्पर सहमत होंगे।बुध गोचर की अवधि में सिंह राशि वालों की सेहत अच्छी रहेगी। आप फिट व खुशी महसूस करेंगे और यह आपके जीवनसाथी के वजह से संभव होगा।_*
*_उपाय- रविवार को दिव्यांगों को कच्चे चावल दान करें।_*
कन्या राशि
* *_कन्या राशि के जातकों के लिए बुध पहले और दसवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर तीसरे भाव में होगा।ऐसे में, आप अधिक यात्रा करेंगे। जीवन में आपको बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। साथ ही, आपको अपने भाई-बहनों आदि का सहयोग प्राप्त होगा।जब बात आती है करियर की तो, आप काम और उससे जुड़ी गतिविधियों में वृद्धि देखेंगे। इस दौरान आपको सहकर्मियों और वरिष्ठों से प्राप्त होगा।बुध के इस गोचर की अवधि में आप व्यापार के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा सकेंगे और यह आपके प्रयास और मेहनत का नतीजा हो सकता है।_*
*_आर्थिक जीवन में कन्या राशि के जातक अपने कठिन प्रयास से बहुत अच्छा लाभ प्राप्त करेंगे।निजी जीवन को देखें, आप अपने जीवनसाथी के साथ बहुत अधिक खुश नज़र आएंगे और इसके फलस्वरूप, आपके रिश्ते में खुशियां बनी रहेंगी। साथ ही, आपका रिश्ता मजबूत होगा।स्वास्थ्य के मोर्चे पर, आप इस दौरान फिट रह सकते हैं और यह आपके भीतर मौजूद अपार ऊर्जा के कारण संभव हो सकता है।स्वास्थ्य के मामले में आपके भीतर की ऊर्जा की वजह से आपकी सेहत उत्तम बनी रहेगी और आप फिट महसूस करेंगे।_*
*_उपाय- बुधवार को गरीब बच्चों को स्कूल की नोटबुक दान करें।_*
तुला राशि
* *_तुला राशि के जातकों के लिए बुध नौवें और बारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके दूसरे भाव में होगा।ऐसे में, आपको भाग्य का साथ मिलेगा और आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे। इस अवधि में आपका झुकाव अध्यात्म गतिविधियों पर अधिक होगा।बात करें करियर के क्षेत्र की, तो आपको विदेश में नौकरी के अवसर मिलेंगे और ऐसे अवसर आपके सपनों को पूरा करेंगे।_*
*_व्यापार की बात करें,आपको नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जो इस समय आपको चिंता में डाल सकता है।आर्थिक जीवन में आपको अधिक खर्चों का सामना करना पड़ सकता है और आशंका है कि ऐसे में, आपके लिए बचत कर पाना मुश्किल हो।आपके प्रेम जीवन की बात करें, तो आपको अपने जीवनसाथी के साथ अहंकार की समस्या का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से आप काफी अधिक चिंतित हो सकते हैं।स्वास्थ्य के लिहाज़ से इस समय आपको पेट दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।_*
*_उपाय- प्रतिदिन प्राचीन पाठ नारायणाय का जाप करें।_*
कर्क राशि
* *_कर्क राशि वालों के लिए बुध ग्रह आपके तीसरे और बारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके पांचवें भाव में होगा।उपरोक्त कारणों से आप अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो सकते हैं और असमंजस में पड़ सकते हैं। इस दौरान आप अपने बच्चों को लेकर भी परेशान हो सकते हैं।करियर की बात करें, तो आपको अपने वरिष्ठों के साथ संबंधों में समस्या हो सकती है और आशंका है कि इससे आपके प्रदर्शन में गिरावट आए।_*
*_व्यापार में बुध का यह गोचर आपको औसत रूप से लाभ प्रदान कर सकता हैं, जो चिंता का कारण बन सकता है। ऐसे में, आपको बेहतर रिटर्न के लिए योजना बनानी होगी।आर्थिक जीवन में आपको भारी खर्च का सामना करना पड़ सकता है, जो आपके द्वारा लिए गए भारी कर्ज के कारण संभव है।बुध गोचर की अवधि में आप पार्टनर के साथ मधुर संबंध बनाए रखने में असफल रह सकते हैं जिसकी वजह आपसी तालमेल की कमी हो सकती है।स्वास्थ्य को देखें, तो कर्क राशि के जातकों की माता को कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है और ऐसे में, आपको उनकी सेहत पर पैसा खर्च करना पड़ेगा।_*
*_उपाय- सोमवार को महिलाओं को चावल दान करें।_*
सिंह राशि
* *_सिंह राशि के जातकों के लिए बुध दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके चौथे भाव में होगा।उपरोक्त के कारण, आप अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने, संपत्ति खरीदने में निवेश करने और पैसे बचाने में सक्षम होंगे।करियर के क्षेत्र में, आपको इस दौरान नौकरी के नए अवसर प्राप्त होंगे और कार्यक्षेत्र में खुशी महसूस होगी।_*
*_सिंह राशि के व्यापार करने वाले जातक इस अवधि में अच्छा लाभ कमा सकेंगे जो कि आपके द्वारा की जा रही मेहनत का परिणाम होगा। साथ ही, प्रतिद्वंदियों को कड़ी टक्कर देने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और इसे एक अच्छी संपत्ति खरीदने में निवेश करेंगे।निजी जीवन में आपका रिश्ता जीवनसाथी के साथ अनुकूल बना रहेगा और आप अपने जीवनसाथी के साथ खुश नज़र आएंगे। साथ ही, एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करेंगे और एक-दूसरे की बात पर परस्पर सहमत होंगे।बुध गोचर की अवधि में सिंह राशि वालों की सेहत अच्छी रहेगी। आप फिट व खुशी महसूस करेंगे और यह आपके जीवनसाथी के वजह से संभव होगा।_*
*_उपाय- रविवार को दिव्यांगों को कच्चे चावल दान करें।_*
कन्या राशि
* *_कन्या राशि के जातकों के लिए बुध पहले और दसवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर तीसरे भाव में होगा।ऐसे में, आप अधिक यात्रा करेंगे। जीवन में आपको बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। साथ ही, आपको अपने भाई-बहनों आदि का सहयोग प्राप्त होगा।जब बात आती है करियर की तो, आप काम और उससे जुड़ी गतिविधियों में वृद्धि देखेंगे। इस दौरान आपको सहकर्मियों और वरिष्ठों से प्राप्त होगा।बुध के इस गोचर की अवधि में आप व्यापार के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा सकेंगे और यह आपके प्रयास और मेहनत का नतीजा हो सकता है।_*
*_आर्थिक जीवन में कन्या राशि के जातक अपने कठिन प्रयास से बहुत अच्छा लाभ प्राप्त करेंगे।निजी जीवन को देखें, आप अपने जीवनसाथी के साथ बहुत अधिक खुश नज़र आएंगे और इसके फलस्वरूप, आपके रिश्ते में खुशियां बनी रहेंगी। साथ ही, आपका रिश्ता मजबूत होगा।स्वास्थ्य के मोर्चे पर, आप इस दौरान फिट रह सकते हैं और यह आपके भीतर मौजूद अपार ऊर्जा के कारण संभव हो सकता है।स्वास्थ्य के मामले में आपके भीतर की ऊर्जा की वजह से आपकी सेहत उत्तम बनी रहेगी और आप फिट महसूस करेंगे।_*
*_उपाय- बुधवार को गरीब बच्चों को स्कूल की नोटबुक दान करें।_*
तुला राशि
* *_तुला राशि के जातकों के लिए बुध नौवें और बारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके दूसरे भाव में होगा।ऐसे में, आपको भाग्य का साथ मिलेगा और आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे। इस अवधि में आपका झुकाव अध्यात्म गतिविधियों पर अधिक होगा।बात करें करियर के क्षेत्र की, तो आपको विदेश में नौकरी के अवसर मिलेंगे और ऐसे अवसर आपके सपनों को पूरा करेंगे।_*
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*_व्यापार करने वाले जातक बुध गोचर की अवधि में अच्छा लाभ कमाने में सक्षम होंगे, जो आपके द्वारा किए गए कठिन प्रयासों के कारण संभव होगा।आर्थिक जीवन के लिए इस समय को शुभ कहा जाएगा क्योंकि आप यात्रा के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में धन लाभ प्राप्त करेंगे और ऐसी यात्रा आपको संतुष्टि प्रदान करेगी।निजी जीवन की बात करें तो आप अपने सुखद व्यवहार से अपने जीवन साथी के साथ अच्छी भावनाओं को साझा करेंगे और एक-दूसरे के साथ बेहतरीन पल व्यतीत करेंगे।स्वास्थ्य के लिहाज़ से, आपको बेहतरीन स्वास्थ्य प्राप्त होगा, लेकिन आपको अपनी आंखों की जांच करने की आवश्यकता है।_*
*_उपाय- प्रतिदिन प्राचीन पाठ ललिता सहस्रनाम का जाप करें।_*
वृश्चिक राशि
* *_वृश्चिक राशि वालों के लिए बुध ग्रह आपके आठवें और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके पहले भाव में होगा।ऐसे में, आप अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने, संपत्ति खरीदने में निवेश करने और साथ ही, धन की बचत करने में सक्षम होंगे।करियर के लिहाज़ से, आपको इस दौरान नई नौकरी के अवसर और अपने काम से खुशी प्राप्त होगी।_*
*_वृश्चिक राशि के व्यापार करने वाले लोगों को इस समय अच्छा लाभ प्राप्त होगा और साथ ही आप प्रतिद्वंदियों से कड़ी टक्कर देने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में बुध के गोचर के दौरान आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और उसी का निवेश एक अच्छी संपत्ति खरीदने में कर सकते हैं।प्रेम जीवन की बात करें, तो आप जीवन साथी के साथ अपने व्यवहार में अधिक आत्मविश्वासी होंगे। इस तरह आप बेहतर आपसी तालमेल और समझ की वजह से पार्टनर के साथ ख़ुश दिखाई देंगे।स्वास्थ्य के लिहाज़ से, आप इस दौरान फिट और स्वस्थ महसूस करेंगे क्योंकि आपमें अधिक ऊर्जा और उत्साह होगा।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 41 बार “ऊँ नमो नारायण” का जाप करें।_*
धनु राशि
* *_धनु राशि के जातकों के लिए बुध सातवें और दसवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके बारहवें भाव में होगा।उपरोक्त के कारण, आप इस दौरान आपकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान में कमी आ सकती है। साथ ही आप अच्छे दोस्त और उनका समर्थन खो सकते हैं।करियर के क्षेत्र में, आप संतुष्टि की कमी के कारण नौकरी में बदलाव कर सकते हैं। साथ ही, कार्यक्षेत्र में नौकरी का दबाव आप पर आ सकता है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, वे अपने व्यवसाय में अच्छे अवसर खो सकते हैं और आगे के व्यावसायिक ऑर्डर आपके हाथ से निकल सकता है।आर्थिक जीवन की बात करें, तो आप यात्रा करते समय पैसे खो सकते हैं और यह आपको निराश कर सकता है।निजी जीवन की बात करें, तो रिश्ते में उच्च मूल्यों की कमी के कारण आपका अपने जीवन साथी के साथ संबंध खराब हो सकता है।स्वास्थ्य के लिहाज़ से, आपको अपने पैरों में दर्द हो सकता है जो इस समय तनाव के कारण उत्पन्न हो सकता है।_*
*_उपाय- गुरुवार को वृद्ध ब्राह्मण को भोजन दान करें।_*
मकर राशि
* *_मकर राशि के जातकों के लिए बुध ग्रह आपके छठे और नौवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके ग्यारहवें भाव में होगा।ऐसे में, आप इस दौरान अपने कठिन प्रयासों से सफल होंगे और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम होंगे।करियर के क्षेत्र में, आपको नौकरी के नए अवसर मिलेंगे, जिससे आपकी उम्मीद और अधिक बढ़ेगी। आप इस दौरान पूरी क्षमता और मेहनत से काम करेंगे।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, उन्हें अच्छा मुनाफा मिलेगा और प्रतिद्वंदियों से अच्छी तरह से मुकाबला करने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और इसे एक अच्छी संपत्ति खरीदने में निवेश करेंगे।निजी जीवन की बात करें, तो आप अपने जीवन साथी से खुश होंगे और उनके साथ अच्छे व्यवहार करेंगे। साथ ही, आप एक-दूसरे की बात पर सहमत होंगे।बुध गोचर की अवधि में मकर राशि वालों की सेहत अच्छी रहेगी। आप फिट व खुशी महसूस करेंगे और यह आपके जीवनसाथी के वजह से संभव होगा।_*
*_उपाय- शनिवार को दिव्यांग व्यक्तियों को कच्चे चावल दान करें।_*
कुंभ राशि
* *_कुंभ राशि के जातकों के लिए बुध पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर दसवें भाव में गोचर कर रहा है।ऐसे में, आप काम के प्रति अधिक समर्पित होंगे और उसी पर टिके रहेंगे। आप लक्ष्यों के प्रति ध्यान केंद्रित करेंगे।करियर के क्षेत्र में, इस समय आपको अपनी नौकरी के संबंध में अधिक लाभ मिलेगा और आपको नई ऑनसाइट नौकरी के अवसर भी मिलेंगे।_*
*_व्यापार के क्षेत्र में, आप व्यापार करके और उसमें शामिल होकर अच्छा मुनाफ़ा प्राप्त करेंगे।आर्थिक जीवन की बात करें, अधिक धन कमाने में और अर्जित करने में सक्षम होंगे। साथ ही, बचत करना भी आपके लिए आसान होगा।निजी जीवन को देखें, तो यह लोग अपने पार्टनर के प्रति ईमानदार रहेंगे और इसके फलस्वरूप, आपके रिश्ते में खुशियां बनी रहेंगी।स्वास्थ्य के
*_उपाय- प्रतिदिन प्राचीन पाठ ललिता सहस्रनाम का जाप करें।_*
वृश्चिक राशि
* *_वृश्चिक राशि वालों के लिए बुध ग्रह आपके आठवें और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके पहले भाव में होगा।ऐसे में, आप अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने, संपत्ति खरीदने में निवेश करने और साथ ही, धन की बचत करने में सक्षम होंगे।करियर के लिहाज़ से, आपको इस दौरान नई नौकरी के अवसर और अपने काम से खुशी प्राप्त होगी।_*
*_वृश्चिक राशि के व्यापार करने वाले लोगों को इस समय अच्छा लाभ प्राप्त होगा और साथ ही आप प्रतिद्वंदियों से कड़ी टक्कर देने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में बुध के गोचर के दौरान आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और उसी का निवेश एक अच्छी संपत्ति खरीदने में कर सकते हैं।प्रेम जीवन की बात करें, तो आप जीवन साथी के साथ अपने व्यवहार में अधिक आत्मविश्वासी होंगे। इस तरह आप बेहतर आपसी तालमेल और समझ की वजह से पार्टनर के साथ ख़ुश दिखाई देंगे।स्वास्थ्य के लिहाज़ से, आप इस दौरान फिट और स्वस्थ महसूस करेंगे क्योंकि आपमें अधिक ऊर्जा और उत्साह होगा।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 41 बार “ऊँ नमो नारायण” का जाप करें।_*
धनु राशि
* *_धनु राशि के जातकों के लिए बुध सातवें और दसवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके बारहवें भाव में होगा।उपरोक्त के कारण, आप इस दौरान आपकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान में कमी आ सकती है। साथ ही आप अच्छे दोस्त और उनका समर्थन खो सकते हैं।करियर के क्षेत्र में, आप संतुष्टि की कमी के कारण नौकरी में बदलाव कर सकते हैं। साथ ही, कार्यक्षेत्र में नौकरी का दबाव आप पर आ सकता है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, वे अपने व्यवसाय में अच्छे अवसर खो सकते हैं और आगे के व्यावसायिक ऑर्डर आपके हाथ से निकल सकता है।आर्थिक जीवन की बात करें, तो आप यात्रा करते समय पैसे खो सकते हैं और यह आपको निराश कर सकता है।निजी जीवन की बात करें, तो रिश्ते में उच्च मूल्यों की कमी के कारण आपका अपने जीवन साथी के साथ संबंध खराब हो सकता है।स्वास्थ्य के लिहाज़ से, आपको अपने पैरों में दर्द हो सकता है जो इस समय तनाव के कारण उत्पन्न हो सकता है।_*
*_उपाय- गुरुवार को वृद्ध ब्राह्मण को भोजन दान करें।_*
मकर राशि
* *_मकर राशि के जातकों के लिए बुध ग्रह आपके छठे और नौवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके ग्यारहवें भाव में होगा।ऐसे में, आप इस दौरान अपने कठिन प्रयासों से सफल होंगे और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम होंगे।करियर के क्षेत्र में, आपको नौकरी के नए अवसर मिलेंगे, जिससे आपकी उम्मीद और अधिक बढ़ेगी। आप इस दौरान पूरी क्षमता और मेहनत से काम करेंगे।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, उन्हें अच्छा मुनाफा मिलेगा और प्रतिद्वंदियों से अच्छी तरह से मुकाबला करने में सक्षम होंगे।आर्थिक जीवन में आप अच्छा लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे और इसे एक अच्छी संपत्ति खरीदने में निवेश करेंगे।निजी जीवन की बात करें, तो आप अपने जीवन साथी से खुश होंगे और उनके साथ अच्छे व्यवहार करेंगे। साथ ही, आप एक-दूसरे की बात पर सहमत होंगे।बुध गोचर की अवधि में मकर राशि वालों की सेहत अच्छी रहेगी। आप फिट व खुशी महसूस करेंगे और यह आपके जीवनसाथी के वजह से संभव होगा।_*
*_उपाय- शनिवार को दिव्यांग व्यक्तियों को कच्चे चावल दान करें।_*
कुंभ राशि
* *_कुंभ राशि के जातकों के लिए बुध पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर दसवें भाव में गोचर कर रहा है।ऐसे में, आप काम के प्रति अधिक समर्पित होंगे और उसी पर टिके रहेंगे। आप लक्ष्यों के प्रति ध्यान केंद्रित करेंगे।करियर के क्षेत्र में, इस समय आपको अपनी नौकरी के संबंध में अधिक लाभ मिलेगा और आपको नई ऑनसाइट नौकरी के अवसर भी मिलेंगे।_*
*_व्यापार के क्षेत्र में, आप व्यापार करके और उसमें शामिल होकर अच्छा मुनाफ़ा प्राप्त करेंगे।आर्थिक जीवन की बात करें, अधिक धन कमाने में और अर्जित करने में सक्षम होंगे। साथ ही, बचत करना भी आपके लिए आसान होगा।निजी जीवन को देखें, तो यह लोग अपने पार्टनर के प्रति ईमानदार रहेंगे और इसके फलस्वरूप, आपके रिश्ते में खुशियां बनी रहेंगी।स्वास्थ्य के
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लिहाज़ से, आपको बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं नहीं होंगी। लेकिन आपको केवल पीठ दर्द की समस्या हो सकती है।_*
*_उपाय- शनिवार को दिव्यांग गरीब और जरूरतमंदों को कच्चे चावल दान करें।_*
मीन राशि
* *_मीन राशि के जातकों के लिए बुध पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके नौवें भाव में होगा।ऐसे में, आप इस दौरान आपका झुकाव आध्यात्मिक गतिविधियों की ओर अधिक रहेगा और इससे आपको राहत मिलेगी।करियर के लिहाज़ में आपको उच्च लाभ प्राप्त करने में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से आपको मिले-जुले परिणाम मिलने की संभावना है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, उन्हें इस दौरान अच्छा लाभ प्राप्त होगा और आप अपने प्रतिद्वंदियों को बराबर की टक्कर देंगे।आर्थिक जीवन में आप अधिक से अधिक धन अर्जित करने और बचत करने में सक्षम होंगे। साथ ही, आपको भाग्य का साथ भी मिलेगा।प्रेम जीवन में, इस अवधि आपको अपने जीवनसाथी का पूरा साथ मिलेगी, जिस वजह से आपको खुशी महसूस होगी। आप अपने जीवनसाथी के सहयोग से सुख व सौभाग्य प्राप्त करेंगे।स्वास्थ्य की बात करें, तो आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण आप फिट व खुशहाल महसूस करेंगे।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 21 बार “ॐ गुरवे नमः” का जाप करें।_*
*_हर हर महादेव🙏_
*_उपाय- शनिवार को दिव्यांग गरीब और जरूरतमंदों को कच्चे चावल दान करें।_*
मीन राशि
* *_मीन राशि के जातकों के लिए बुध पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बुध का वृश्चिक राशि में गोचर आपके नौवें भाव में होगा।ऐसे में, आप इस दौरान आपका झुकाव आध्यात्मिक गतिविधियों की ओर अधिक रहेगा और इससे आपको राहत मिलेगी।करियर के लिहाज़ में आपको उच्च लाभ प्राप्त करने में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से आपको मिले-जुले परिणाम मिलने की संभावना है।_*
*_जिन जातकों का खुद का व्यापार है, उन्हें इस दौरान अच्छा लाभ प्राप्त होगा और आप अपने प्रतिद्वंदियों को बराबर की टक्कर देंगे।आर्थिक जीवन में आप अधिक से अधिक धन अर्जित करने और बचत करने में सक्षम होंगे। साथ ही, आपको भाग्य का साथ भी मिलेगा।प्रेम जीवन में, इस अवधि आपको अपने जीवनसाथी का पूरा साथ मिलेगी, जिस वजह से आपको खुशी महसूस होगी। आप अपने जीवनसाथी के सहयोग से सुख व सौभाग्य प्राप्त करेंगे।स्वास्थ्य की बात करें, तो आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण आप फिट व खुशहाल महसूस करेंगे।_*
*_उपाय- प्रतिदिन 21 बार “ॐ गुरवे नमः” का जाप करें।_*
*_हर हर महादेव🙏_
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*दीपकों से करिए देवी देवता को प्रसन्न*
दीपक कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे मिट्टी, आटा, तांबा, चांदी, लोहा, पीतल अथवा स्वर्ण धातु का। मूंग, चावल, गेहूं, उड़द तथा ज्वार को समान भाग में लेकर उसके आटे से बना दीपक सभी प्रकार की साधनाओं में श्रेष्ठ होता है। किसी-किसी साधना में अखंड ज्योति जलाने का भी विशेष विधान है जिसे गाय के शुद्ध घी और तिल के तेल के साथ भी जलाया जा सकता है। यह प्रयोग विशेषत: आश्रमों और देव स्थानों के लिए करना चाहिए।
अगर हमें आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
दीपको से करिए मां लक्ष्मी को प्रसन्न,
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माता लक्ष्मी को प्रकाश बेहद प्रिय है। इसलिए दीपावली पर दीपक जलाकर मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है। दीपक कहां कहां जलाए जाने चाहिए। दीपावली की रात अपने घर में सात स्थानों पर दीपक का प्रकाश जरुर करें।
पहला धन स्थान या तिजोरी- घर में जहां भी आप रुपए पैसे रखते हैं, वहां दीपक जरुर जलाएं।
दूसरा वाहन स्थल- जहां भी आपका वाहन खड़ा होता है, वहां प्रकाश जरुर करें। भले ही वह सायकिल क्यों न हो। माता की कृपा से बड़ा वाहन प्राप्त होगा।
तीसरा जल स्थल- घर में जहां कहीं भी पानी का भंडार होता है, उस स्थान को भी प्रकाशित करें।
चौथा भंडार गृह- घर में जहां भी अन्न भंडार होता है, वहां दीया अवश्य जलाएं।
पांचवां रसोईघर- रसोई घर की सबसे पवित्र जगह है। यहां दीपक जरुर प्रज्जवलित करें।
छठा मुख्य द्वार- घर के मुख्य द्वार से ही मां लक्ष्मी का आगमन होता है। इसलिए वहां माता के स्वागत के लिए दीया जरुर होना चाहिए।
सातवां पूजा गृह- पूजा घर में चौमुखा दीपक जलाएं और प्रयास करें कि ये दीपक रात भर जलता रहे।
इन स्थानों पर दीपक जलाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, और उस घर में स्थायी रुप से निवास करती हैं।
शास्त्रों मे हर देवता के लिए भिन्न -भिन्न दीपक जलाने का विधान है जानिए ! किस देवता के लिए कौन सा दीपक जलाना चाहिए ।
जब हम किसी देवता का पूजन करते हैं तो सामान्यतः दीपक जलाते हैं। दीपक किसी भी पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है । हमारे मस्तिष्क में सामान्यतया घी अथवा तेल का दीपक जलाने की बात आती है और हम जलाते हैं। जब हम धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की साधना अथवा सिद्धि के मार्ग पर चलते हैं तो दीपक का महत्व विशिष्ट हो जाता है। दीपक कैसा हो, उसमे कितनी बत्तियां हों , इसका भी एक विशेष महत्त्व है। उसमें जलने वाला तेल व घी किस-किस प्रकार का हो, इसका भी विशेष महत्त्व है। उस देवता की कृपा प्राप्त करने और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।
आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
शत्रुओं से पीड़ा हो तो सरसों के तेल का दीपक भैरव जी के सामने जलाना चाहिये।
भगवान सूर्य की प्रसन्नता के लिए घी का दीपक जलाना चाहिए ।
शनि के लिए सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
पति की दीर्घायु के लिए गिलोय के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
राहु तथा केतु ग्रह के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
किसी भी देवी या देवता की पूजा में गाय का शुद्ध घी तथा एक फूल बत्ती या तिल के तेल का दीपक आवश्यक रूप से जलाना चाहिए।
भगवती जगदंबा व दुर्गा देवी की आराधना के समय एवं माता सरस्वती की आराधना के समय तथा शिक्षा-प्राप्ति के लिए दो मुखों वाला दीपक जलाना चाहिए।
भगवान गणेश की कृपा-प्राप्ति के लिए तीन बत्तियों वाला घी का दीपक जलाना चाहिए।
भैरव साधना के लिए सरसों के तेल का चैमुखी दीपक जलाना चाहिए।
मुकदमा जीतने के लिए पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए।
भगवान कार्तिकेय की प्रसन्नता के लिए गाय के शुद्ध घी या पीली सरसों के तेल का पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए ।
भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए आठ तथा बारह मुखी दीपक पीली सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए।
माता लक्ष्मी जी की प्रसन्नता के लिए घी का सात मुखी दीपक जलाना चाहिए।
भगवान विष्णु की दशावतार आराधना के समय दस मुखी दीपक जलाना चाहिए।
इष्ट-सिद्धि तथा ज्ञान-प्राप्ति के लिए गहरा तथा गोल दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।
शत्रुनाश तथा आपत्ति निवारण के लिए मध्य में से ऊपर उठा हुआ दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।
लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए दीपक सामान्य गहरा होना चाहिए।
हनुमानजी की प्रसन्नता के लिए तिकोने दीपक का प्रयोग करना चाहिए और उसमें चमेली के तेल का प्रयोग करना चाहिए।
दीपक कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे मिट्टी, आटा, तांबा, चांदी, लोहा, पीतल अथवा स्वर्ण धातु का। मूंग, चावल, गेहूं, उड़द तथा ज्वार को समान भाग में लेकर उसके आटे से बना दीपक सभी प्रकार की साधनाओं में श्रेष्ठ होता है। किसी-किसी साधना में अखंड ज्योति जलाने का भी विशेष विधान है जिसे गाय के शुद्ध घी और तिल के तेल के साथ भी जलाया जा सकता है। यह प्रयोग विशेषत: आश्रमों और देव स्थानों के लिए करना चाहिए।
अगर हमें आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
दीपको से करिए मां लक्ष्मी को प्रसन्न,
माता लक्ष्मी को प्रकाश बेहद प्रिय है। इसलिए दीपावली पर दीपक जलाकर मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है। दीपक कहां कहां जलाए जाने चाहिए। दीपावली की रात अपने घर में सात स्थानों पर दीपक का प्रकाश जरुर करें।
पहला धन स्थान या तिजोरी- घर में जहां भी आप रुपए पैसे रखते हैं, वहां दीपक जरुर जलाएं।
दूसरा वाहन स्थल- जहां भी आपका वाहन खड़ा होता है, वहां प्रकाश जरुर करें। भले ही वह सायकिल क्यों न हो। माता की कृपा से बड़ा वाहन प्राप्त होगा।
तीसरा जल स्थल- घर में जहां कहीं भी पानी का भंडार होता है, उस स्थान को भी प्रकाशित करें।
चौथा भंडार गृह- घर में जहां भी अन्न भंडार होता है, वहां दीया अवश्य जलाएं।
पांचवां रसोईघर- रसोई घर की सबसे पवित्र जगह है। यहां दीपक जरुर प्रज्जवलित करें।
छठा मुख्य द्वार- घर के मुख्य द्वार से ही मां लक्ष्मी का आगमन होता है। इसलिए वहां माता के स्वागत के लिए दीया जरुर होना चाहिए।
सातवां पूजा गृह- पूजा घर में चौमुखा दीपक जलाएं और प्रयास करें कि ये दीपक रात भर जलता रहे।
इन स्थानों पर दीपक जलाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, और उस घर में स्थायी रुप से निवास करती हैं।
शास्त्रों मे हर देवता के लिए भिन्न -भिन्न दीपक जलाने का विधान है जानिए ! किस देवता के लिए कौन सा दीपक जलाना चाहिए ।
जब हम किसी देवता का पूजन करते हैं तो सामान्यतः दीपक जलाते हैं। दीपक किसी भी पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है । हमारे मस्तिष्क में सामान्यतया घी अथवा तेल का दीपक जलाने की बात आती है और हम जलाते हैं। जब हम धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की साधना अथवा सिद्धि के मार्ग पर चलते हैं तो दीपक का महत्व विशिष्ट हो जाता है। दीपक कैसा हो, उसमे कितनी बत्तियां हों , इसका भी एक विशेष महत्त्व है। उसमें जलने वाला तेल व घी किस-किस प्रकार का हो, इसका भी विशेष महत्त्व है। उस देवता की कृपा प्राप्त करने और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।
आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
शत्रुओं से पीड़ा हो तो सरसों के तेल का दीपक भैरव जी के सामने जलाना चाहिये।
भगवान सूर्य की प्रसन्नता के लिए घी का दीपक जलाना चाहिए ।
शनि के लिए सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
पति की दीर्घायु के लिए गिलोय के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
राहु तथा केतु ग्रह के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
किसी भी देवी या देवता की पूजा में गाय का शुद्ध घी तथा एक फूल बत्ती या तिल के तेल का दीपक आवश्यक रूप से जलाना चाहिए।
भगवती जगदंबा व दुर्गा देवी की आराधना के समय एवं माता सरस्वती की आराधना के समय तथा शिक्षा-प्राप्ति के लिए दो मुखों वाला दीपक जलाना चाहिए।
भगवान गणेश की कृपा-प्राप्ति के लिए तीन बत्तियों वाला घी का दीपक जलाना चाहिए।
भैरव साधना के लिए सरसों के तेल का चैमुखी दीपक जलाना चाहिए।
मुकदमा जीतने के लिए पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए।
भगवान कार्तिकेय की प्रसन्नता के लिए गाय के शुद्ध घी या पीली सरसों के तेल का पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए ।
भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए आठ तथा बारह मुखी दीपक पीली सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए।
माता लक्ष्मी जी की प्रसन्नता के लिए घी का सात मुखी दीपक जलाना चाहिए।
भगवान विष्णु की दशावतार आराधना के समय दस मुखी दीपक जलाना चाहिए।
इष्ट-सिद्धि तथा ज्ञान-प्राप्ति के लिए गहरा तथा गोल दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।
शत्रुनाश तथा आपत्ति निवारण के लिए मध्य में से ऊपर उठा हुआ दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।
लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए दीपक सामान्य गहरा होना चाहिए।
हनुमानजी की प्रसन्नता के लिए तिकोने दीपक का प्रयोग करना चाहिए और उसमें चमेली के तेल का प्रयोग करना चाहिए।
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दीपावली
_दीपावली शब्द दीप एवं आवली की संधि से बना है । आवली अर्थात पंक्ति । इस प्रकार दीपावली का शाब्दिक अर्थ है, दीपों की पंक्ति। दीपावली के समय सर्वत्र दीप जलाए जाते हैं, इसलिए इस त्यौहार का नाम दीपावली है। भारतवर्ष में मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक एवं धार्मिक इन दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्त्व है इसे दीपोत्सव भी कहते है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ अर्थात अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। अपने घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहे, ज्ञान का प्रकाश रहे, इसलिए सभी अत्यंत हर्षोउल्लास से दीपावली मनाते हैं । प्रभु श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, उस समय प्रजा ने दीपोत्सव मनाया। तब से प्रारंभ हुई दीपावली_
दीपावली पर्व का मूल नाम शारदीय नवसस्येष्टि पर्व है शरद् ऋतु में उत्पन्न नयी फसल के अन्न द्वारा किया जाने वाला यज्ञ इस अवसर पर खरीफ की फसल का अन्न घर में आता है तथा रबी की फसल की बुवाई प्रारम्भ होती है। ये दोनों फसलें आर्यावर्त (भारत) की मुख्य फसलें हैं भारतीय वैदिक संस्कृति में भोजन ग्रहण करने से पहले उसे यज्ञ में आहुत करने की परम्परा रही है।
इसी के साथ दीपक जलाकर, मिष्ठान्न आदि वितरण द्वारा प्रसन्नता प्रदर्शन करने की भी परम्परा रही है यह पर्व शरद् ऋतु के समापन एवं हेमन्त ऋतु के आगमन के संगम के काल में आता है इस समय अनेक रोगों का संक्रमण भी होने की पूरी आशंका रहती है। इस कारण भी इस पर्व पर बड़े-2 सामूहिक यज्ञ की भी परम्परा रही हैै।
_‘श्रीकृष्ण ने आसुरी वृत्ति के नरकासुर का वध कर जनता को भोगवृत्ति, लालसा, अनाचार एवं दुष्टप्रवृत्ति से मुक्त किया एवं प्रभुविचार (दैवी विचार) देकर सुखी किया, यह वही ‘दीपावली’ है हम अनेक वर्षों से एक रूढ़ि के रूप में ही दीपावली मना रहे हैं आज उसका गुह्यार्थ लुप्त हो गया है। इस गुह्यार्थ को ध्यान में रखते हुए, अस्मिता जागृत हो तो अज्ञानरूपी अंधकार के साथ ही साथ भोगवृत्ति, अनाचारी एवं आसुरी वृत्ति के लोगों की प्रबलता अल्प होगी एवं सज्जनों पर उनका वर्चस्व अल्प होगा।_
*1. दीपावली का इतिहास:-*
_बलिराजा अत्यंत दानवीर थे द्वारपर पधारे अतिथि को उनसे मुंहमांगा दान मिलता था। दान देना गुण है; परंतु गुणों का अतिरेक दोष ही सिद्ध होता है। किसे क्या, कब और कहां दें, इसका निश्चित विचार शास्त्रों में एवं गीता में बताया गया है । सत्पात्र को दान देना चाहिए, अपात्र को नहीं। अपात्र मानवों के हाथ संपत्ति लगने पर वे मदोन्मत्त होकर मनमानी करने लगते है। बलि राजा से कोई, कभी भी, कुछ भी मांगता, उसे वह देते थे। तब भगवान श्रीविष्णु ने ब्रह्मचारी बालक का (वामन) अवतार लिया। ‘वामन’ अर्थात छोटा। ब्रह्मचारी बालक छोटा होता है और वह ‘ॐ भवति भिक्षां देही’ अर्थात ‘भिक्षा दो’ ऐसा कहता है। विष्णु ने वामन अवतार लिया एवं बलिराजा के पास जाकर भिक्षा मांगी। बलिराजा ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए ?’’ तब वामन ने त्रिपाद भूमिदान मांगा। ‘वामन कौन है एवं इस दान से क्या होगा’, इसका ज्ञान न होने के कारण बलिराजा ने इस वामन को त्रिपाद भूमि दान कर दी। इसके साथ ही वामन ने विराट रूप धारण कर एक पैर से समस्त पृथ्वी नाप ली, दूसरे पैरसे अंतरिक्ष एवं फिर बलिराजा से पूछा ‘‘तीसरा पैर कहां रखूं ?’’ उसने उत्तर दिया ‘‘तीसरा पैर मेरे मस्तक पर रखें’’। तब तीसरा पैर उसके मस्तक पर रख, उसे पाताल में भेजने का निश्चय कर वामन ने बलिराजासे कहा, ‘‘तुम्हें कोई वर मांगना हो, तो मांगो (वरं ब्रूहि)।’’ बलिराजा ने वर मांगा कि ‘अब पृथ्वी पर मेरा समस्त राज्य समाप्त होनेको है एवं आप मुझे पाताल में भेजनेवाले हैं, ऐसे में तीन कदमों के इस प्रसंग के प्रतीकरूप पृथ्वी पर प्रतिवर्ष कम से कम तीन दिन मेरे राज्य के रूप में माने जाएं। प्रभु, यमप्रीत्यर्थ दीपदान करनेवालेको यमयातनाएं न हो। उसे अपमृत्यु न आए । उसके घर पर सदा लक्ष्मीका वास हो।’ ये तीन दिन अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, अमावस्या एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा । इसे ‘बलिराज्य’ कहा जाता है।_
*2. दीपावली कब मनाई जाती है ?*
_दीपावली पर्व के अंतर्गत आनेवाले महत्त्वपूर्ण दिन हैं, कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी (धनत्रयोदशी / धनतेरस), कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (नरकचतुर्दशी), अमावस्या (लक्ष्मीपूजन) एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (बलिप्रतिपदा) ये तीन दिन दीपावली के विशेष उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं । कुछ लोग त्रयोदशी को दीपावली में सम्मिलित न कर, शेष तीन दिनों की ही दीवाली मनाते हैं । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी, धनत्रयोदशी अर्थात धनतेरस तथा भाईदूज अर्थात यमद्वितीया, ये दिन दीपावली के साथ ही आते है इसलिए, भले ही ये त्यौहार भिन्न हों, फिर भी इनका समावेश दीपावली में ही किया जाता है । इन दिनों को दीपावली का एक अंग माना जाता है । कुछ प्रदेशों में वसुबारस अर्थात
_दीपावली शब्द दीप एवं आवली की संधि से बना है । आवली अर्थात पंक्ति । इस प्रकार दीपावली का शाब्दिक अर्थ है, दीपों की पंक्ति। दीपावली के समय सर्वत्र दीप जलाए जाते हैं, इसलिए इस त्यौहार का नाम दीपावली है। भारतवर्ष में मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक एवं धार्मिक इन दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्त्व है इसे दीपोत्सव भी कहते है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ अर्थात अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। अपने घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहे, ज्ञान का प्रकाश रहे, इसलिए सभी अत्यंत हर्षोउल्लास से दीपावली मनाते हैं । प्रभु श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, उस समय प्रजा ने दीपोत्सव मनाया। तब से प्रारंभ हुई दीपावली_
दीपावली पर्व का मूल नाम शारदीय नवसस्येष्टि पर्व है शरद् ऋतु में उत्पन्न नयी फसल के अन्न द्वारा किया जाने वाला यज्ञ इस अवसर पर खरीफ की फसल का अन्न घर में आता है तथा रबी की फसल की बुवाई प्रारम्भ होती है। ये दोनों फसलें आर्यावर्त (भारत) की मुख्य फसलें हैं भारतीय वैदिक संस्कृति में भोजन ग्रहण करने से पहले उसे यज्ञ में आहुत करने की परम्परा रही है।
इसी के साथ दीपक जलाकर, मिष्ठान्न आदि वितरण द्वारा प्रसन्नता प्रदर्शन करने की भी परम्परा रही है यह पर्व शरद् ऋतु के समापन एवं हेमन्त ऋतु के आगमन के संगम के काल में आता है इस समय अनेक रोगों का संक्रमण भी होने की पूरी आशंका रहती है। इस कारण भी इस पर्व पर बड़े-2 सामूहिक यज्ञ की भी परम्परा रही हैै।
_‘श्रीकृष्ण ने आसुरी वृत्ति के नरकासुर का वध कर जनता को भोगवृत्ति, लालसा, अनाचार एवं दुष्टप्रवृत्ति से मुक्त किया एवं प्रभुविचार (दैवी विचार) देकर सुखी किया, यह वही ‘दीपावली’ है हम अनेक वर्षों से एक रूढ़ि के रूप में ही दीपावली मना रहे हैं आज उसका गुह्यार्थ लुप्त हो गया है। इस गुह्यार्थ को ध्यान में रखते हुए, अस्मिता जागृत हो तो अज्ञानरूपी अंधकार के साथ ही साथ भोगवृत्ति, अनाचारी एवं आसुरी वृत्ति के लोगों की प्रबलता अल्प होगी एवं सज्जनों पर उनका वर्चस्व अल्प होगा।_
*1. दीपावली का इतिहास:-*
_बलिराजा अत्यंत दानवीर थे द्वारपर पधारे अतिथि को उनसे मुंहमांगा दान मिलता था। दान देना गुण है; परंतु गुणों का अतिरेक दोष ही सिद्ध होता है। किसे क्या, कब और कहां दें, इसका निश्चित विचार शास्त्रों में एवं गीता में बताया गया है । सत्पात्र को दान देना चाहिए, अपात्र को नहीं। अपात्र मानवों के हाथ संपत्ति लगने पर वे मदोन्मत्त होकर मनमानी करने लगते है। बलि राजा से कोई, कभी भी, कुछ भी मांगता, उसे वह देते थे। तब भगवान श्रीविष्णु ने ब्रह्मचारी बालक का (वामन) अवतार लिया। ‘वामन’ अर्थात छोटा। ब्रह्मचारी बालक छोटा होता है और वह ‘ॐ भवति भिक्षां देही’ अर्थात ‘भिक्षा दो’ ऐसा कहता है। विष्णु ने वामन अवतार लिया एवं बलिराजा के पास जाकर भिक्षा मांगी। बलिराजा ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए ?’’ तब वामन ने त्रिपाद भूमिदान मांगा। ‘वामन कौन है एवं इस दान से क्या होगा’, इसका ज्ञान न होने के कारण बलिराजा ने इस वामन को त्रिपाद भूमि दान कर दी। इसके साथ ही वामन ने विराट रूप धारण कर एक पैर से समस्त पृथ्वी नाप ली, दूसरे पैरसे अंतरिक्ष एवं फिर बलिराजा से पूछा ‘‘तीसरा पैर कहां रखूं ?’’ उसने उत्तर दिया ‘‘तीसरा पैर मेरे मस्तक पर रखें’’। तब तीसरा पैर उसके मस्तक पर रख, उसे पाताल में भेजने का निश्चय कर वामन ने बलिराजासे कहा, ‘‘तुम्हें कोई वर मांगना हो, तो मांगो (वरं ब्रूहि)।’’ बलिराजा ने वर मांगा कि ‘अब पृथ्वी पर मेरा समस्त राज्य समाप्त होनेको है एवं आप मुझे पाताल में भेजनेवाले हैं, ऐसे में तीन कदमों के इस प्रसंग के प्रतीकरूप पृथ्वी पर प्रतिवर्ष कम से कम तीन दिन मेरे राज्य के रूप में माने जाएं। प्रभु, यमप्रीत्यर्थ दीपदान करनेवालेको यमयातनाएं न हो। उसे अपमृत्यु न आए । उसके घर पर सदा लक्ष्मीका वास हो।’ ये तीन दिन अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, अमावस्या एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा । इसे ‘बलिराज्य’ कहा जाता है।_
*2. दीपावली कब मनाई जाती है ?*
_दीपावली पर्व के अंतर्गत आनेवाले महत्त्वपूर्ण दिन हैं, कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी (धनत्रयोदशी / धनतेरस), कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (नरकचतुर्दशी), अमावस्या (लक्ष्मीपूजन) एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (बलिप्रतिपदा) ये तीन दिन दीपावली के विशेष उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं । कुछ लोग त्रयोदशी को दीपावली में सम्मिलित न कर, शेष तीन दिनों की ही दीवाली मनाते हैं । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी, धनत्रयोदशी अर्थात धनतेरस तथा भाईदूज अर्थात यमद्वितीया, ये दिन दीपावली के साथ ही आते है इसलिए, भले ही ये त्यौहार भिन्न हों, फिर भी इनका समावेश दीपावली में ही किया जाता है । इन दिनों को दीपावली का एक अंग माना जाता है । कुछ प्रदेशों में वसुबारस अर्थात
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गोवत्स द्वादशी को ही दीपावली का आरंभदिन मानते है।_
दीपावली निर्णय।
निर्णय सिंधु के द्वितीय परिच्छेद के पृष्ठ क्रमांक 341 (चौखंबा प्रकाशन) के अनुसार
*तुला के सूर्य में चतुर्दशी और अमावस्या का प्रमाण मिलता है।दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो अगले दिन का प्रमाण मिलता है।*
किन्तु व्यापिनी शब्द जिसका अर्थ है पूरे प्रदोष में अमावस्या का होना जो की 31 अक्टूबर को ही मिल रही है
*तिथि तत्व में ज्योतिष का वचन है कि यदि एक घड़ी रात्रि का योग हो और अमावस्या अगले दिन हो उस स्थिति में पहले दिन की छोड़कर अगले दिन करना चाहिए।*
*यहां 31अक्टूबर को पूर्ण प्रदोष के साथ पूर्ण रात्रि अमावस्या प्राप्त हो रही है।*
देवदास के ग्रंथ में प्रदोष को कर्मकाल माना गया है ब्रह्म पुराण के अनुसार अर्धरात्रि के समय (अमावस्या) लक्ष्मी घर जाने के लिए भ्रमण करती है अतः एवं मनुष्यों को दीपकों को प्रज्वलित करके स्वयं को जागृत रह कर लक्ष्मी पूजन करना चाहिए।
*ब्रह्म पुराण की युक्ति के अनुसार प्रदोष और अर्धरात्रव्यापिनी तिथि मुख्य है।*
आगे निर्णय सिंधु यहां लिखते हैं कि यदि प्रदोष अथवा अर्धरात्रि में दोनों में से एक में ही व्याप्त होने पर अगले दिन लेनी चाहिए
*आगे निर्णय सिंधु में लिखा हैं कि प्रदोष मुख्य है प्रदोष काल में पूर्ण रूप से 31 तारीख को अमावस्या मिल रही हैं ।*
एक अन्य प्रमाण के अनुसार मध्य रात्रि अमावस्या में लक्ष्मी पूजन उत्तम माना गया है।
*डामर तन्त्र के अनुसार अमावस्या प्रतिपदा युक्त लक्ष्मी पूजन के निषेध का प्रमाण मिलता है इन सभी प्रमाणो के अनुसार 31अक्टूबर की दीपावली को महालक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ है।
लक्ष्मी पूजा 2024 शुभ मुहूर्त*
*पंचांग के मुताबिक, कार्तिक मास की अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर को 3 बजकर 52 मिनट से 1 नवंबर को शाम 6 बजकर 16 मिनट तक रहेगी।*
*दीवाली पर लक्ष्मी पूजा का सबसे अच्छा समय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल और स्थिर लग्न में है। ये सभी मुहूर्त 31 अक्टूबर को ही मिलेंगे।*
*दीपावली पूजन का पहला मुहूर्त प्रदोष काल- शाम 5:36 से 6:15 बजे तक*
*स्थिर लग्न में वृषभ लग्न का मुहूर्त- शाम 6:28 से 8:24 बजे तक*
*सिंह लग्न का मुहूर्त- दोपहर 12:56 से 3:10 बजे तक रहेगा।*
*काशी के अलावा मिथिला पंचांग में भी 31 अक्टूबर को दिवाली मनाने का उल्लेख है। जब दो तिथियों में प्रदोष काल उपलब्ध हो, तो त्यौहार पहले वाले प्रदोष काल की तिथि को मनाया जाता है।*
_दीपावली आने से पूर्व ही लोग अपने घर-द्वार की स्वच्छता पर ध्यान देते हैं । घर का कूड़ा-करकट साफ करते हैं । घर में टूटी-फूटी वस्तुओं को ठीक करवाकर घर की रंगाई करवाते है इससे उस स्थान की न केवल आयु बढ़ती है, वरन आकर्षण भी बढ़ जाता है । वर्षाऋतु में फैली अस्वच्छता का भी परिमार्जन हो जाता है । स्वच्छता के साथ ही घर के सभी सदस्य नए कपड़े सिलवाते हैं । विविध मिठाइयां भी बनायी जाती है । ब्रह्मपुराण में लिखा है कि दीपावली को श्री लक्ष्मी सदगृहस्थों के घर में विचरण करती हैं। घर को सब प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध एवं सुशोभित कर दीपावली मनानेसे श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं तथा वहां स्थायीरूप से निवास करती हैं।_
*4. दीपावली में बनाई जानेवाली विशेष रंगोलियां:-*
_दीपावली के पूर्वायोजन का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है, रंगोली । दीपावली के शुभ पर्व पर विशेष रूप से रंगोली बनाने की प्रथा है । रंगोली के दो उद्देश्य हैं – सौंदर्य का साक्षात्कार एवं मंगल की सिद्धि । रंगोली देवताओं के स्वागतका प्रतीक है । रंगोली से सजाए आंगन को देखकर देवता प्रसन्न होते हैं । इसी कारण दिवाली में प्रतिदिन देवताओं के तत्त्व आकर्षित करने वाली रंगोलियां बनानी चाहिए तथा उस माध्यम से देवतातत्त्व का लाभ प्राप्त करना चाहिए।_
*5. तेल के दीप जलाना:-*
_रंगोली बनाने के साथ ही दीपावली में प्रतिदिन किए जानेवाला यह एक महत्त्वपूर्ण कृत्य है । दीपावली में प्रतिदिन सायंकाल में देवता एवं तुलसी के समक्ष, साथ ही द्वार पर एवं आंगन में विविध स्थानों पर तेल के दीप लगाए जाते हैं । यह भी देवता तथा अतिथियों का स्वागत करने का प्रतीक है । आजकल तेल के दीप के स्थान पर मोम के दीप लगाए जाते हैं अथवा कुछ स्थानों पर बिजली के दीप भी लगाते हैं । परंतु शास्त्र के अनुसार तेल के दीप लगाना ही उचित एवं लाभदायक है । तेल का दीप एक मीटर तक की सात्त्विक तरंगें खींच सकता है । इसके विपरीत मोम का दीप केवल रज-तमकणों का प्रक्षेपण करता है, जबकि बिजली का दीप वृत्ति को बहिर्मुख बनाता है । इसलिए दीपों की संख्या अल्प ही क्यों न हो, तो भी तेल के दीप की ही पंक्ति लगाएं।_
*6. आकाश दीप अथवा आकाश कंडील:-*
_विशिष्ट प्रकारके रंगीन कागज, थर्माकोल इत्यादिकी विविध कलाकृतियां बनाकर उनमें बिजली के दिये लगाए जाते हैं, उसे आकाशदीप अथवा आकाशकंदील कहते हैं । आकाशदीप सुशोभन का ही एक भाग है।_
दीपावली निर्णय।
निर्णय सिंधु के द्वितीय परिच्छेद के पृष्ठ क्रमांक 341 (चौखंबा प्रकाशन) के अनुसार
*तुला के सूर्य में चतुर्दशी और अमावस्या का प्रमाण मिलता है।दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो अगले दिन का प्रमाण मिलता है।*
किन्तु व्यापिनी शब्द जिसका अर्थ है पूरे प्रदोष में अमावस्या का होना जो की 31 अक्टूबर को ही मिल रही है
*तिथि तत्व में ज्योतिष का वचन है कि यदि एक घड़ी रात्रि का योग हो और अमावस्या अगले दिन हो उस स्थिति में पहले दिन की छोड़कर अगले दिन करना चाहिए।*
*यहां 31अक्टूबर को पूर्ण प्रदोष के साथ पूर्ण रात्रि अमावस्या प्राप्त हो रही है।*
देवदास के ग्रंथ में प्रदोष को कर्मकाल माना गया है ब्रह्म पुराण के अनुसार अर्धरात्रि के समय (अमावस्या) लक्ष्मी घर जाने के लिए भ्रमण करती है अतः एवं मनुष्यों को दीपकों को प्रज्वलित करके स्वयं को जागृत रह कर लक्ष्मी पूजन करना चाहिए।
*ब्रह्म पुराण की युक्ति के अनुसार प्रदोष और अर्धरात्रव्यापिनी तिथि मुख्य है।*
आगे निर्णय सिंधु यहां लिखते हैं कि यदि प्रदोष अथवा अर्धरात्रि में दोनों में से एक में ही व्याप्त होने पर अगले दिन लेनी चाहिए
*आगे निर्णय सिंधु में लिखा हैं कि प्रदोष मुख्य है प्रदोष काल में पूर्ण रूप से 31 तारीख को अमावस्या मिल रही हैं ।*
एक अन्य प्रमाण के अनुसार मध्य रात्रि अमावस्या में लक्ष्मी पूजन उत्तम माना गया है।
*डामर तन्त्र के अनुसार अमावस्या प्रतिपदा युक्त लक्ष्मी पूजन के निषेध का प्रमाण मिलता है इन सभी प्रमाणो के अनुसार 31अक्टूबर की दीपावली को महालक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ है।
लक्ष्मी पूजा 2024 शुभ मुहूर्त*
*पंचांग के मुताबिक, कार्तिक मास की अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर को 3 बजकर 52 मिनट से 1 नवंबर को शाम 6 बजकर 16 मिनट तक रहेगी।*
*दीवाली पर लक्ष्मी पूजा का सबसे अच्छा समय सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल और स्थिर लग्न में है। ये सभी मुहूर्त 31 अक्टूबर को ही मिलेंगे।*
*दीपावली पूजन का पहला मुहूर्त प्रदोष काल- शाम 5:36 से 6:15 बजे तक*
*स्थिर लग्न में वृषभ लग्न का मुहूर्त- शाम 6:28 से 8:24 बजे तक*
*सिंह लग्न का मुहूर्त- दोपहर 12:56 से 3:10 बजे तक रहेगा।*
*काशी के अलावा मिथिला पंचांग में भी 31 अक्टूबर को दिवाली मनाने का उल्लेख है। जब दो तिथियों में प्रदोष काल उपलब्ध हो, तो त्यौहार पहले वाले प्रदोष काल की तिथि को मनाया जाता है।*
_दीपावली आने से पूर्व ही लोग अपने घर-द्वार की स्वच्छता पर ध्यान देते हैं । घर का कूड़ा-करकट साफ करते हैं । घर में टूटी-फूटी वस्तुओं को ठीक करवाकर घर की रंगाई करवाते है इससे उस स्थान की न केवल आयु बढ़ती है, वरन आकर्षण भी बढ़ जाता है । वर्षाऋतु में फैली अस्वच्छता का भी परिमार्जन हो जाता है । स्वच्छता के साथ ही घर के सभी सदस्य नए कपड़े सिलवाते हैं । विविध मिठाइयां भी बनायी जाती है । ब्रह्मपुराण में लिखा है कि दीपावली को श्री लक्ष्मी सदगृहस्थों के घर में विचरण करती हैं। घर को सब प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध एवं सुशोभित कर दीपावली मनानेसे श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं तथा वहां स्थायीरूप से निवास करती हैं।_
*4. दीपावली में बनाई जानेवाली विशेष रंगोलियां:-*
_दीपावली के पूर्वायोजन का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है, रंगोली । दीपावली के शुभ पर्व पर विशेष रूप से रंगोली बनाने की प्रथा है । रंगोली के दो उद्देश्य हैं – सौंदर्य का साक्षात्कार एवं मंगल की सिद्धि । रंगोली देवताओं के स्वागतका प्रतीक है । रंगोली से सजाए आंगन को देखकर देवता प्रसन्न होते हैं । इसी कारण दिवाली में प्रतिदिन देवताओं के तत्त्व आकर्षित करने वाली रंगोलियां बनानी चाहिए तथा उस माध्यम से देवतातत्त्व का लाभ प्राप्त करना चाहिए।_
*5. तेल के दीप जलाना:-*
_रंगोली बनाने के साथ ही दीपावली में प्रतिदिन किए जानेवाला यह एक महत्त्वपूर्ण कृत्य है । दीपावली में प्रतिदिन सायंकाल में देवता एवं तुलसी के समक्ष, साथ ही द्वार पर एवं आंगन में विविध स्थानों पर तेल के दीप लगाए जाते हैं । यह भी देवता तथा अतिथियों का स्वागत करने का प्रतीक है । आजकल तेल के दीप के स्थान पर मोम के दीप लगाए जाते हैं अथवा कुछ स्थानों पर बिजली के दीप भी लगाते हैं । परंतु शास्त्र के अनुसार तेल के दीप लगाना ही उचित एवं लाभदायक है । तेल का दीप एक मीटर तक की सात्त्विक तरंगें खींच सकता है । इसके विपरीत मोम का दीप केवल रज-तमकणों का प्रक्षेपण करता है, जबकि बिजली का दीप वृत्ति को बहिर्मुख बनाता है । इसलिए दीपों की संख्या अल्प ही क्यों न हो, तो भी तेल के दीप की ही पंक्ति लगाएं।_
*6. आकाश दीप अथवा आकाश कंडील:-*
_विशिष्ट प्रकारके रंगीन कागज, थर्माकोल इत्यादिकी विविध कलाकृतियां बनाकर उनमें बिजली के दिये लगाए जाते हैं, उसे आकाशदीप अथवा आकाशकंदील कहते हैं । आकाशदीप सुशोभन का ही एक भाग है।_
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*7. दीपावली पर्व पर बच्चों द्वारा बनाए जानेवाले घरौंदे एवं किले:-*
_दीपावली के अवसर पर उत्तर भारत के कुछ स्थानों पर बच्चे आंगन में मिट्टी का घरौंदा बनाते हैं, जिसे कहीं पर ‘हटरी’, तो कहीं पर ‘घरकुंडा’के नाम से जानते हैं । दीप से सजाकर, इसमें खीलें, बताशे, मिठाइयां एवं मिट्टी के खिलौने रखते हैं । महाराष्ट्र में बच्चे किला बनाते हैं तथा उसपर छत्रपति शिवाजी महाराज एवं उनके सैनिकों के चित्र रखते हैं । इस प्रकार त्यौहारों के माध्यमसे पराक्रम तथा धर्माभिमान की वृद्धि कर बच्चों में राष्ट्र एवं धर्म के प्रति कुछ नवनिर्माण की वृत्ति का पोषण किया जाता है।_
*8. दीपावली शुभसंदेश देनेवाले दीपावली के शुभेच्छापत्र:*
_दीपावली के मंगल पर्व पर लोग अपने सगे-संबंधियों एवं शुभचिंतकों को, आनंदमय दीपावली की शुभकामनाएं देते हैं इसके लिए वे शुभकामना पत्र भेजते हैं तथा कुछ लोग उपहार भी देते हैं । ये साधन जितने सात्त्विक होंगे, देनेवाले एवं प्राप्त करनेवाले को उतना ही अधिक लाभ होगा । शुभकामना पत्रों के संदेश एवं उपहार, यदि धर्मशिक्षा, धर्मजागृति एवं धर्माचरणसे संबंधित हों, तो प्राप्त करनेवाले को इस दिशा में कुछ करने की प्रेरणा भी मिलती है । हिंदू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्था द्वारा इस प्रकार के शुभेच्छापत्र बनाए जाते हैं।
*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमह शिवाय।।*.
_दीपावली के अवसर पर उत्तर भारत के कुछ स्थानों पर बच्चे आंगन में मिट्टी का घरौंदा बनाते हैं, जिसे कहीं पर ‘हटरी’, तो कहीं पर ‘घरकुंडा’के नाम से जानते हैं । दीप से सजाकर, इसमें खीलें, बताशे, मिठाइयां एवं मिट्टी के खिलौने रखते हैं । महाराष्ट्र में बच्चे किला बनाते हैं तथा उसपर छत्रपति शिवाजी महाराज एवं उनके सैनिकों के चित्र रखते हैं । इस प्रकार त्यौहारों के माध्यमसे पराक्रम तथा धर्माभिमान की वृद्धि कर बच्चों में राष्ट्र एवं धर्म के प्रति कुछ नवनिर्माण की वृत्ति का पोषण किया जाता है।_
*8. दीपावली शुभसंदेश देनेवाले दीपावली के शुभेच्छापत्र:*
_दीपावली के मंगल पर्व पर लोग अपने सगे-संबंधियों एवं शुभचिंतकों को, आनंदमय दीपावली की शुभकामनाएं देते हैं इसके लिए वे शुभकामना पत्र भेजते हैं तथा कुछ लोग उपहार भी देते हैं । ये साधन जितने सात्त्विक होंगे, देनेवाले एवं प्राप्त करनेवाले को उतना ही अधिक लाभ होगा । शुभकामना पत्रों के संदेश एवं उपहार, यदि धर्मशिक्षा, धर्मजागृति एवं धर्माचरणसे संबंधित हों, तो प्राप्त करनेवाले को इस दिशा में कुछ करने की प्रेरणा भी मिलती है । हिंदू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्था द्वारा इस प्रकार के शुभेच्छापत्र बनाए जाते हैं।
*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमह शिवाय।।*.
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महापर्व छठ पूजा का प्रारंभ
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व का लोग बड़ी ही बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। छठ पूजा का यह त्यौहार भगवान सूर्य देव और छठी मईया को समर्पित है। इस दिन महिलाएं जल में खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हैं और अपनी संतान, परिवार की मंगल कामना के लिए प्रार्थना करती हैं। छठ पूजा के पावन अवसर पर भगवान सूर्य की आराधना करने से समृद्धि एवं प्रगति की प्राप्ति होती है और मनुष्य का कल्याण होता है। छठ पूजा को सूर्य षष्ठी, डाला छठ, छठ पर्व, डाला पूजा आदि नामों से जाना जाता है। तो आइए जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि इस साल छठ पूजा की शुरुआत कब से होने वाली है।_*
📆 *_छठ पूजा 2024 कैलेंडर_*
➡️ *_छठ पूजा पहला दिन- नहाय खाय- 5 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा दूसरा दिन- खरना- 6 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य- 7 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा चौथा दिन- उषा अर्घ्य, पारण- 8 नवंबर 2024_*
*_छठ पूजा का पहला दिन- नहाय खाय_*
*_महापर्व छठ पूजा का आरंभ नहाय खाय के साथ होता है। इस दिन व्रती महिलाएंभोर में उठकर स्नान आदि कर नए वस्त्र पहल सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं। इसके बाद सात्विक आहार ग्रहण कर अपने व्रत को शुरू करती हैं। नहाय खाय के दिन कद्दू की सब्जी, लौकी चने की दाल और भात यानी चावल खाया जाता है। नहाया खाय का भोजन बिना लहसुन और प्याज के सात्विक तरीके से तैयार किया जाता है। व्रती के खाने के बाद ही परिवार के अन्य लोग नहाय खाय का खाना खा सकते हैं। नहाय खाय के दिन यानी 5 नवंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 36 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 33 पर।_*
*_छठ पूजा का दूसरा दिन- खरना_*
*_छठ पूजा के दूसरे दिन आता है खरना। इस दिन व्रती महिलाएं पूरा दिन व्रत करती हैं और फिर रात के समय खीर प्रसाद ग्रहण करती हैं। खरना के बाद से ही व्रती महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला उपवास आरंभ हो जाता है। छठ व्रत का पारण उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है। वहीं बता दें कि खरना के दिन गुड़, चावल और दूध की खीर बनाई जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिला या पुरुष को नमक का सेवन नहीं करना होता है। खरना के दिन यानी 6 नवंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 37 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 32 पर।_*
*_छठ पूजा का तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य_*
*_छठ पूजा के तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से भी जाना जाता है। संध्या अर्घ्य 7 नवंबर 2024 को दिया जाएगा। 7 नवंबर यानी छठ पूजा के दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 38 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 32 मिनट पर होगा।_*
*_छठ पूजा का चौथा दिन- उषा अर्घ्य_*
*_छठ पूजा के चौथे और आखिरी दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जिसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। इस दिन व्रती महिलाओं भोर के समय जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं। अर्घ्य के बाद इसी दिन व्रती महिलाएं छठ व्रत का पारण करती हैं। उषा अर्घ्य 8 नवंबर 2024 को दिया जाएगा। 8 नवंबर यानी छठ पूजा उषा अर्घ्य के दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 38 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 31 मिनट पर होगा।_*
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व का लोग बड़ी ही बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। छठ पूजा का यह त्यौहार भगवान सूर्य देव और छठी मईया को समर्पित है। इस दिन महिलाएं जल में खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हैं और अपनी संतान, परिवार की मंगल कामना के लिए प्रार्थना करती हैं। छठ पूजा के पावन अवसर पर भगवान सूर्य की आराधना करने से समृद्धि एवं प्रगति की प्राप्ति होती है और मनुष्य का कल्याण होता है। छठ पूजा को सूर्य षष्ठी, डाला छठ, छठ पर्व, डाला पूजा आदि नामों से जाना जाता है। तो आइए जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि इस साल छठ पूजा की शुरुआत कब से होने वाली है।_*
📆 *_छठ पूजा 2024 कैलेंडर_*
➡️ *_छठ पूजा पहला दिन- नहाय खाय- 5 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा दूसरा दिन- खरना- 6 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य- 7 नवंबर 2024_*
➡️ *_छठ पूजा चौथा दिन- उषा अर्घ्य, पारण- 8 नवंबर 2024_*
*_छठ पूजा का पहला दिन- नहाय खाय_*
*_महापर्व छठ पूजा का आरंभ नहाय खाय के साथ होता है। इस दिन व्रती महिलाएंभोर में उठकर स्नान आदि कर नए वस्त्र पहल सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं। इसके बाद सात्विक आहार ग्रहण कर अपने व्रत को शुरू करती हैं। नहाय खाय के दिन कद्दू की सब्जी, लौकी चने की दाल और भात यानी चावल खाया जाता है। नहाया खाय का भोजन बिना लहसुन और प्याज के सात्विक तरीके से तैयार किया जाता है। व्रती के खाने के बाद ही परिवार के अन्य लोग नहाय खाय का खाना खा सकते हैं। नहाय खाय के दिन यानी 5 नवंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 36 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 33 पर।_*
*_छठ पूजा का दूसरा दिन- खरना_*
*_छठ पूजा के दूसरे दिन आता है खरना। इस दिन व्रती महिलाएं पूरा दिन व्रत करती हैं और फिर रात के समय खीर प्रसाद ग्रहण करती हैं। खरना के बाद से ही व्रती महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला उपवास आरंभ हो जाता है। छठ व्रत का पारण उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है। वहीं बता दें कि खरना के दिन गुड़, चावल और दूध की खीर बनाई जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिला या पुरुष को नमक का सेवन नहीं करना होता है। खरना के दिन यानी 6 नवंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 37 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 32 पर।_*
*_छठ पूजा का तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य_*
*_छठ पूजा के तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से भी जाना जाता है। संध्या अर्घ्य 7 नवंबर 2024 को दिया जाएगा। 7 नवंबर यानी छठ पूजा के दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 38 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 32 मिनट पर होगा।_*
*_छठ पूजा का चौथा दिन- उषा अर्घ्य_*
*_छठ पूजा के चौथे और आखिरी दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जिसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। इस दिन व्रती महिलाओं भोर के समय जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं। अर्घ्य के बाद इसी दिन व्रती महिलाएं छठ व्रत का पारण करती हैं। उषा अर्घ्य 8 नवंबर 2024 को दिया जाएगा। 8 नवंबर यानी छठ पूजा उषा अर्घ्य के दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 38 मिनट पर होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5 बजकर 31 मिनट पर होगा।_*
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कहानी का समय
कर्त्तव्यपालन
किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि- ”भगवान ! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास ?” अनेक साधु अनेक प्रकार से इसका उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती।
इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा। संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।”
राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“
संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया।
घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। जिस राजकन्या का स्वयंवर था, वह अत्यन्त रूपवती थी और उसके पिता के कोई अन्य सन्तान न होने के कारण उस राजा के बाद सम्पूर्ण राज्य भी उसके दामाद को ही मिलने वाला था।
राजकन्या सौंदर्य को चाहने वाली थी, इसलिये उसकी इच्छा थी कि मेरा पति, अतुल सौंदर्यवान हो, हजारों प्रतिष्ठित व्यक्ति और देश-देश के राजकुमार इस स्वयंवर में जमा हुए थे। राज-कन्या उस सभा मण्डली में अपनी सखी के साथ घूमने लगी। अनेक राजा-पुत्रों तथा अन्य लोगों को उसने देखा पर उसे कोई पसन्द न आया। वे राजकुमार जो बड़ी आशा से एकत्रित हुए थे, बिल्कुल हताश हो गये। अन्त में ऐसा जान पड़ने लगा कि मानो अब यह स्वयंवर बिना किसी निर्णय के अधूरा ही समाप्त हो जायगा।
इसी समय एक संन्यासी वहाँ आया, सूर्य के समान उज्ज्वल काँति उसके मुख पर दमक रही थी। उसे देखते ही राजकन्या ने उसके गले में माला डाल दी। परन्तु संन्यासी ने तत्क्षण ही वह माला गले से निकाल कर फेंक दी और कहा- ”राजकन्ये। क्या तू नहीं देखती कि मैं संन्यासी हूँ? मुझे विवाह करके क्या करना है?”
यह सुन कर राजकन्या के पिता ने समझा कि यह संन्यासी कदाचित भिखारी होने के कारण, विवाह करने से डरता होगा, इसलिये उसने संन्यासी से कहा- "मेरी कन्या के साथ ही आधे राज्य के स्वामी तो आप अभी हो जायेंगे और पश्चात् सम्पूर्ण राज्य आपको ही मिलेगा।"
राजा के इस प्रकार कहते ही राजकन्या ने फिर वह माला उस साधु के गले में डाल दी, किन्तु संन्यासी ने फिर उसे निकाल पर फेंक दिया और बोला- "राजन् ! विवाह करना मेरा धर्म नहीं है।"
ऐसा कह कर वह तत्काल वहाँ से चला गया, परन्तु उसे देखकर राजकन्या अत्यन्त मोहित हो गई थी, अतएव वह बोली - "विवाह करूंगी तो उसी से करूंगी, नहीं तो मर जाऊँगी।” ऐसा कह कर वह उसके पीछे चलने लगी।
हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा- "राजन् ! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।”
राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी।
इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले- ”राजकन्ये ! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।”
राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे। उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये।
इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये ! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।” इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई।
परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-"ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण
कर्त्तव्यपालन
किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि- ”भगवान ! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास ?” अनेक साधु अनेक प्रकार से इसका उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती।
इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा। संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।”
राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“
संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया।
घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। जिस राजकन्या का स्वयंवर था, वह अत्यन्त रूपवती थी और उसके पिता के कोई अन्य सन्तान न होने के कारण उस राजा के बाद सम्पूर्ण राज्य भी उसके दामाद को ही मिलने वाला था।
राजकन्या सौंदर्य को चाहने वाली थी, इसलिये उसकी इच्छा थी कि मेरा पति, अतुल सौंदर्यवान हो, हजारों प्रतिष्ठित व्यक्ति और देश-देश के राजकुमार इस स्वयंवर में जमा हुए थे। राज-कन्या उस सभा मण्डली में अपनी सखी के साथ घूमने लगी। अनेक राजा-पुत्रों तथा अन्य लोगों को उसने देखा पर उसे कोई पसन्द न आया। वे राजकुमार जो बड़ी आशा से एकत्रित हुए थे, बिल्कुल हताश हो गये। अन्त में ऐसा जान पड़ने लगा कि मानो अब यह स्वयंवर बिना किसी निर्णय के अधूरा ही समाप्त हो जायगा।
इसी समय एक संन्यासी वहाँ आया, सूर्य के समान उज्ज्वल काँति उसके मुख पर दमक रही थी। उसे देखते ही राजकन्या ने उसके गले में माला डाल दी। परन्तु संन्यासी ने तत्क्षण ही वह माला गले से निकाल कर फेंक दी और कहा- ”राजकन्ये। क्या तू नहीं देखती कि मैं संन्यासी हूँ? मुझे विवाह करके क्या करना है?”
यह सुन कर राजकन्या के पिता ने समझा कि यह संन्यासी कदाचित भिखारी होने के कारण, विवाह करने से डरता होगा, इसलिये उसने संन्यासी से कहा- "मेरी कन्या के साथ ही आधे राज्य के स्वामी तो आप अभी हो जायेंगे और पश्चात् सम्पूर्ण राज्य आपको ही मिलेगा।"
राजा के इस प्रकार कहते ही राजकन्या ने फिर वह माला उस साधु के गले में डाल दी, किन्तु संन्यासी ने फिर उसे निकाल पर फेंक दिया और बोला- "राजन् ! विवाह करना मेरा धर्म नहीं है।"
ऐसा कह कर वह तत्काल वहाँ से चला गया, परन्तु उसे देखकर राजकन्या अत्यन्त मोहित हो गई थी, अतएव वह बोली - "विवाह करूंगी तो उसी से करूंगी, नहीं तो मर जाऊँगी।” ऐसा कह कर वह उसके पीछे चलने लगी।
हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा- "राजन् ! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।”
राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी।
इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले- ”राजकन्ये ! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।”
राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे। उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये।
इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये ! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।” इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई।
परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-"ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण
👍4
करता
हूँ।”
इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी ? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी।
यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि- "कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े।
यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया।
इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- "राजन् !! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं..!!
जय श्री राम 🙏
हूँ।”
इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी ? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी।
यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि- "कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े।
यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया।
इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- "राजन् !! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं..!!
जय श्री राम 🙏
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*_एक बार कबीर दास जी हरि भजन करते हुए एक गली से निकल रहे थे कि उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थी उसी में से एक स्त्री की शादी तय हुई थी और अपने ससुरालवालों की तरफ से भेजा गया नथनी की तारीफ वह लडकी कर रही थी।नथनी ऐसी है नथनी वैसी है खास मेरे लिए उन्होंने भेजी है।बार बार नथनी की ही बात कर रही थी।_*
*_उसके पीछे चल रहे कबीरदासजी के कानों में सारी बात पड रही थी।तेजी से कदम बढाकर कबीरदासजी उस लडकी से आगे आकर कहा।_*
*_नथनी दीनी यार, वो चिंतन बारम्बार।_*
*_नाक दीनी करतार, उनको दिया बिसार।।_*
*_सोचो यदि नाक ही ना होती तो नथनी कहां पहनती यही जीवन में हम भी करते हैं।भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं रिश्ते नाते दिये उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता।_*
*_उसके पीछे चल रहे कबीरदासजी के कानों में सारी बात पड रही थी।तेजी से कदम बढाकर कबीरदासजी उस लडकी से आगे आकर कहा।_*
*_नथनी दीनी यार, वो चिंतन बारम्बार।_*
*_नाक दीनी करतार, उनको दिया बिसार।।_*
*_सोचो यदि नाक ही ना होती तो नथनी कहां पहनती यही जीवन में हम भी करते हैं।भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं रिश्ते नाते दिये उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता।_*
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